05 फ़रवरी 2011

बच्चे के रूझान के मुताबिक़ हो शिक्षा


हरियाणा के पानीपत जिले में स्थित कुराना जैसे छोटे गाँव से निकलकर IIT में शिक्षा हासिल करना अशोक कुमार के लिये  सपने के सच होने जैसा था. हालांकि जब कुमार को यह महसूस हुआ कि उनकी दिलचस्पी लोगों की सेवा करने में है, तो उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (I.P.S) से जुड़ने का फैसला किया. फिलहाल वह दिल्ली में सेन्ट्रल रिजर्व पुलिस फ़ोर्स (C.R.P.F) में प्रतिनियुक्ति पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

कुमार की किताब 'Human in Khaki', जिसमें उन्होंने एक IPS  के कंरियर से जुड़े वृतांत और घटनाओं का वर्णन किया है, का हाल ही में दिल्ली में विमोचन हुआ है. इस किताब में आज के भारत के समक्ष मौजूद तमाम समकालीन मुद्दों मसलन आतंकी हमले, महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और बदलते Value System इत्यादि का जिक्र किया गया है. कुमार ने अपनी प्राथमिक शिक्षा गाँव के स्कूल में पूरी की और IIT दिल्ली से Mechanical Engineering में B.Tec और Tharmal Engineering में M.Tec Degree हासिल की. उन्हें 1986-87 में IIT, दिल्ली में Writer of the Year के खिताब से भी नवाजा गया.

कंरियर में बदलाव से जुडी मुश्किलों के बारे में बात करते हुए कुमार कहते हिं, 'हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी है कि हमें अपने कंरियर संबंधी निर्णय तब लेने पड़ते हैं, जब हम स्कूल में होते हैं और बारहवीं कक्षा वह स्तर नहीं होता जब हम आत्मावलोकन करते हुए यह तय कर सकें कि अपने जीवन में क्या करना चाहते हैं. हमारे निर्णय ज्यादातर दूसरों से प्रेरित होते हैं. कोई जाँब करते समय ही हम उसकी खूबियों या खामियों के बारे में समझ पाते हैं. तब ही हम यह तय कर पाते हैं कि बाकी जीवन भी इसे करते रहना चाहते हैं या नहीं.' उनका आगे कहना था, 'पुलिस में नौकरी करते हुए कई जगहों पर अलग-अलग तरह से सेवाएं देने के बाद अब मुझ लगता है कि तमाम मुश्किलों के बावजूद मैं आम आदमी के जीवन में कुछ बदलाव लाने में कामयाब रहा. हमेशा से यही मेरा लक्ष्य रहा है.'

कुमार के मुताबिक़ IIT जैसे संस्थान व्यक्ति को जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रभावी, सक्षम और उत्कृष्ठ बनाना सिखाते हैं. कुमार आगे कहते हैं, 'इससे मुझे अपनी पुलिस सेवा में मदद मिली. मेरी ताकत इस बात में निहित है कि मैं कितनी कुशलता से गरीब, जरूरतमंद और उत्पीडित लोगों की मदद कर सकता हूं.’

कुमार ने कंरियर में Engineering की राह न चुनकर पुलिस सेवा को चुना. लेकिन ऐसे कितने लोग हैं जो अपनी दिलचस्पी वाले काम से जुड पाते हैं? पुलिस भी अपने बीच IIT से निकले शख्स को पाकर खुश हो सकती है, लेकिन ऐसे कितने कार्यक्षेत्र हैं, जिनमें उन लोगों को जगह मिलेगी, जो उसके कार्यक्षेत्र हैं, जिनमें उन लोगों को जगह मिलेगी, जो उसके विशेषज्ञ नहीं हैं? हमारा शिक्षा तन्त्र हर काम को अनुभव करने की इजाजत नहीं देता, ताकि हम समझ सकें कि आगे चलकर कौन सा काम करना चाहते हैं.

फंडा यह है कि...                                                                                                                          
हमारे अभिभावकों व शिक्षकों को यह जानना चाहिए कि बच्चे की दिलचस्पी किस क्षेत्र में है. बच्चे की रुचि को समझकर उसे उसी दिशा में शिक्षित करे ताकि उसका जीवन सार्थक हो सके.

ग्राहक और बाजार के बारे में रहे पूरी जानकारी


ग्राहक एक बार किसी कंपनी से मुंह फेर लें, तो फिर दुबारा उसकी ओर नहीं लौटता. इन ग्राहकों को आपसे दूर ले जाने का काम कोई और नहीं आपके प्रतिस्पर्धी ही करते हैं. यह कहना है Rodenberg Tilmain and Associates के Managing Partner Joseph Rodenberg का. उनका मानना है कि संतुष्टि का भाव ही सफलता का सबसे बड़ा शत्रु है.

किसी भी कंपनी के सबसे अहम निर्णय बोर्डरूम के अंदर नहीं, बल्कि बाहर लिये जाते हैं. इन निर्णयों को लेने वाले कोई दूसरे नहीं, कंपनी के ग्राहक ही होते हैं. ये निर्णय इस सन्दर्भ में होते हैं कि कंपनी के उत्पाद खरीदे जाएं या नहीं. उनके कंपनी दैनिक, साप्ताहिक या मासिक आधार पर एक्सेल चार्ट पर निगाह दौडाते हुए यह जानने की कोशिश करती हैं कि बिक्री में किस तरह का उतार-चढ़ाव आया. यदि उनकी बिक्री बढ़ती है तो वे जश्न मनाती हैं और अगर इसमें गिरावट आती है तो अपनी सेल्स टीम को बुलाकर फटकारती हैं या पुराने सेल्सकर्मियों को हटाकर नए लोग ले आती है. इस पूरी प्रक्रिया में बड़ी संख्या में कंपनियों के भीतर Competitive Intelligence (प्रतिस्पर्धी जानकारी) पर आधारित प्रबंधन व नीति-निर्धारण पीछे छूट जाता है.

इस प्रतिस्पर्धी  माहौल को देखते हुए किसी भी बाजार में कंपनी के लिये ऐसी जानकारियों की जरूरत होती है, जिस पर आगे काम किया जा सके. इसके लिये विशुद्ध तथ्यों पर आधारित Competitive Intelligence (सीआई) बहुत अहम है. Strategic and Technical Intelligence यह जानना है कि बाजार आपको 'क्यों' और 'कैसे' प्रभावित करता है. बाजार के आंकड़े और जानकारिया सबके लिये उपलब्ध हैं, लेकिन इनमें से 80 फीसदी आंकड़े बेतरतीब होते हैं. उपलब्ध आंकड़े कंपनी के लिये प्रासंगिक हो भी सकते हैं और नहीं भी. यदि इन आंकड़ों पर काम न किया जाते तो ये बेतरतीब पड़े-पड़े बेकार हो जाते हैं. Competitive Intelligence आंकड़ों को उपयोगी जानकारी में बदलने की कला है. इसके लिये उन आकड़ों का विशलेक्षण करना होता है जो कंपनी के लिये प्रासंगिक हैं. अपनी बाजार संबंधी नीति तैयार करने के लिये ऐसी जानकारी जुटानी पड़ती है, जिस पर आगे काम किया जा सके.

किसी भी कंपनी को अपने ग्राहक, बाजार की हलचल, तकनीक व रूझान में बदलाव, अपने प्रतिस्पर्धियों, उनकी रणनीति, उनके लक्ष्य, ग्राहकों के Feedback इत्यादि के बारे में लगातार जानकारी जुटाने की जरूरत है.

 रोड़ेनबर्ग कहते हैं, 'Competitive Intelligence पर आधारित मेरी मास्टर क्लास से जुड़ने वाले ज्यादातर लोग Strategic Intelligence based Management and Marketing की जरूरत को समझते हैं, लेकिन वे लगातार पूछते रहते हैं कि उन्हें इससे सम्बंधित जानकारी कहाँ से मिल सकती है?' प्रबंधन द्वारा रणनीतिक मामलों पर चर्चा के लिये सालाना बैठक बुलाने की Competitive Intelligence कोई साल में एक बार होने वाली प्रक्रिया नहीं है. यह तो अपने ग्राहकों और प्रतिस्पर्धियों के बारे में जानकारी पाने और उसे लगातार अपडेट करते रहने की सतत प्रक्रिया है. यह अनुशासित ढंग से सोचने और काम करने की प्रक्रिया है. Competitive Intelligence कंपनी को अग्रगामी रूप से सक्रीय होने और बाजार के बदलावों के प्रति प्रतिक्रियाशील न होने में मदद करती है.

फंडा यह है कि...                                                                                                               
यदि आप अपने ग्राहकों के बारे में नहीं जानते और यह नहीं समझते कि वे आपके उत्पाद को क्यों पसंद या नापसंद करते हैं, तो प्रतिस्पर्धी बाजार में अंदर ही अंदर चल रहे बदलावों के बारे में सटीक जानकारी नहीं जुटा पायेंगे. 

04 फ़रवरी 2011

परदेश में बसो तो ध्यान रखो...

अपने देश को छोड़कर दूसरे देशों में रहने की तमन्ना भारतीयों में अथाह है. जोड़-तोड़ लगाकर और जोश में भारतीय चले तो जाते हैं, लेकिन वहां के समाज में घुलने-मिलने में प्रारम्भिक वर्षों में उन्हें बहुत कठिनाई होती है. उन्हें दूसरे देश के निवासियों का रिजेक्शन झेलना पड़ता है और चरम परिस्थितियों में कई भारतीय एडजस्ट नहीं होने के कारण मानसिक अवसाद से ग्रस्त होकर आत्महत्या तक को मजबूर हो जाते हैं. जिसकी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि बातें बहुत छोटी-छोटी सी होती है.

अमरीकी किसी के भी बहुत जल्दी दोस्त बन जाते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आपके कठिन परिस्थितियों में वे आपके वित्तीय एवं व्यक्तिगत दायित्वों की पूर्ती में सहायक होंगे. भारत में इसके विपरीत किसी भी दोस्ती में दोनों ही चीजों की आवश्यकता है.

जापान के समाज में निवासी बनने से पहले यह जान लो कि किसी भी जापानी द्वारा की गई सहायता [चाहे कितनी भी छोटी हो या बड़ी हो] को भविष्य में आपके द्वारा लौटाना आवश्यक है. अक्सर जापानी यह आशा करते हैं कि कुछ हजार डाँलर आपको डाक्टर, वकील, अध्यापक को प्रति वर्ष उनकी फीस के अलावा देने हैं, क्योंकि वे आपके परिवार का ध्यान रखते हैं. वहां यह भी पारंपरिक है कि जैसे ही आपका बच्चा प्राइमरी स्कूल की क्लास उत्तीर्ण करे, तो एक-दो लाख रूपये आप स्कूल के अधिकारियों को थेंक यू मनी के रूप में दे. इसी तरह से यदि आप कहीं बैठकर गप-शाप कर रहे हैं, तो किसी भी उम्र का अमरीकन यह आशा करेगा कि आप उसके प्रथम नाम से उसे पुकारें. यहीं जर्मनी, फ्रांस आदि के नागरिक इसको ठीक नहीं मानते हैं. चीन में यदि कोई अपना नाम बताता है तो पहले वह अपना फेमिली नेम बताता है और फिर अपना नाम. वे भी इस बात से हिचकिचाते हैं कि कोई भी उन्हें बिना प्रगाढ़ संबंध बने, प्रथम नाम से पुकारें. यदि हम उपहार की बात करें, तो अमरीका में कपड़ों का उपहार देना ठीक नहीं माना जाता है क्योंकि कपड़ों के बारे में निर्णय बहुत पर्सनल डिसीजन माने जाते हैं. इसी तरह से कपड़ों के उपहार रसिया में रिश्वत मानी जाती है. रूमालों के उपहार थाईलैंड, इटली, वेनेजुएला, ब्राजील देशों में ठीक नहीं माने जाते क्योंकि वहां इसको ट्रेजडी का प्रतीक माना जाता है. इसी तरह से चीन और जापान में कभी भी 'चार' वस्तुएँ एक साथ उपहार में नहीं देनी चाहिए. इसे अशुभ माना जाता है. इसी तरह ताइवान एवं चीन में घड़ी एक उपहार की तरह नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि यह मृत्यु का घोतक है.  

फंडा यह है कि...                                                                                                                                           
सारांश यही है कि जब किसी भी देश में रहने जाएं, तो उसकी संस्कृति का अध्ययन करें और उसका अपने व्यवहार में ध्यान रखें.

टाइम मैनेजमेंट का हुनर सीखें

एक ऐसा Topic है जिसके बारे में हर Meetings या Business Deal के दौरान चर्चा होती है, वह है Time Management, Time Manage कैसे किया जाए? यहाँ इसका जवाब पेश है. आप एक Paper Sheet लें और उसके शीर्ष पर 'बेहद अहम' लिख लें. ऐसी बेहद-बेहद अहम चीजों को याद करें, जिनके बगैर आप जिन्दगी से हाथ धो सकते हैं, आपकी नौकरी छूट सकती है, आपकी जमापूंजी ख़त्म हो सकती है या आपका परिवार छूट सकता है. ज्यादातर समय तो इस Column में कुछ भी ऐसा लिखने को नहीं मिलेगा.

अब इस कागज़ पर एक खडी रेखा खींचते हुए इसे दो हिस्सों में बाँट दें और उसके दोनों ओर 'Urgent व 'Non-Urgent' लिख लें. इनके नीचे आप अपनी समझ के मुताबिक UrgentNon-Urgent कार्यों को लिखें. आप 'Urgent Column के अंतर्गत तो कई Points लिख सकते हैं, लेकिन 'Non-Urgent' काँलम में कुछ भी लिखने में मुश्किल हो सकती है. अब उस 'Non-Urgent' को काटकर वहां 'अपने व अपने परिवार के लिये निवेश' के बारे में लिखें. यहाँ आप जो Points लिखेंगे, उन्हें देखकर हैरत हो सकती है. यहाँ पर Carrier और Health जैसे विषयों के अलावा आप यह भी लिख सकते हैं कि आपके बच्चे को मैट्रिक के बाद या Graduation अथवा Post Graduation में कौन सा कोर्स करना चाहिए. अब इस Chart को गौर से देखें. तमाम जरूरी व Urgent काम जो आपको अपने लिये करने हैं, वे अपने या अपने परिवार के लिए निवेश Column के अंतर्गत आ जाते हैं, जबकि बाकी सारे काम जो आसानी से अपने सहकर्मियों या किसी और को दे सकते हैं, 'Urgent' Column के अंतर्गत आ जाते हैं. इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपके Ideas कितने जबरदस्त हैं और आपका उत्पाद कितना बेहतरीन हैं. यदि आपके पास ग्राहकों की शिकायतों पर गौर करने का समय नहीं है तो आपका बिजनेस ख़त्म हो जायेगा.

यहीं आकर Choice Management की महत्ता समझ में आती है. चूंकि आप हर काम खुद करना चाहते हैं, इसलिए आपके पास समय नहीं होता. आपको काम बांटना होगा. अपने पास कम से कम काम रखते हुए यह समझना होगा कि आस-पास क्या चल रहा है. आपके पास जितना अधिक वक्त होगा, उतने बेहतर ढंग से आप अपना काम Manage कर पायेंगे.

बढाएं अपनी रोजगार क्षमता


बिहार की मोनिका डोगरा बेहतर शैक्षणिक रिकार्ड के बावजूद मुम्बई में अपना ड्रीम Job पाने में नाकाम रहीं. Networking के एक कोर्स पर 45,000 रूपये खर्च करने के बाद भी वह अपने लिये ऐसी नौकरी नहीं तलाश सकीं जिससे उन्हें अपने रोजाना के खर्चों के अलावा पढाई का खर्च उठाने में भी मदद मिलाती. उन्हें Computer Product बेचने वाली एक दुकान में महज 2500 रूपये मासिक वेतन पर एक Technical Support Job ही मिल सका. इसके पीछे मुख्य वजह यह थी कि मोनिका को English बोलनी नहीं आती थी.

दरअसल मोनिका समझ ही नहीं पाई कि पढाई-लिखाई के अलावा आप English, Soft Skills और Personality Development की ट्रेनिंग के जरिये Corporate जगत की जरूरत के मुताबित बन सकते हैं. तभी मोनिका को अपने कुछ परिचितों की मदद से तीन महीने के एक कोर्स के बारे में पता चला जिससे उसकी जरूरतें पूरी हो सकती थीं. सोमवार से शनिवार तक रोज आठ घंटे चलने वाली इस कक्षा में प्रशिक्षकों ने मोनिका को अपना अँग्रेजी शब्दज्ञान, व्याकरण और बोलने का लहजा बेहतर करने के साथ-साथ आत्मविश्वास बढाने में भी मदद की.

अँग्रेजी भाषा का ज्ञान और बोलचाल का लहजा सुधरने के साथ अब मोनिका की आय चार अंकों के बजाय पांच अंकों की श्रेणी में पहुच गई. यहाँ पर यह समझना जरूरी है कि अँग्रेजी एकमात्र योग्यता नहीं है, बल्कि आपको Corporate एटीकेट का भी ज्ञान होना चाहिए, जिनके बारे में कई बार एमबीए छात्रों को भी पता नहीं होता. इसके अलावा Corporate एटीकेट और मैनरिज्म कुछ ऐसी चीजें हैं, जिन पर छोटे शहरों में ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता. त्रिची, शिलांग, मालदा और मोगा जैसी जगहों पर मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, कामर्स व हास्पिटैलिटी  इत्यादी की पढाई कर रहे अनेक छात्र अब ऐसे कार्यक्रमों को भी अपना रहे हैं, जिससे उनकी रोजगार पाने की क्षमता में इजाफा हो. किसी भी Job में दूसरे व्यक्तियों के साथ प्रभावी Communication की जरूरत होती है. Selectors ऐसे कर्मियों की तलाश में रहते हैं जो दूसरों के सामने अपनी बात स्पष्ट ढंग से रख सकें.

फंडा यह है कि.....                                                                                                      
यदि आप बेहतर नौकरी हासिल करना चाहते हैं तो आपको ऐसी क्षमताओं से लैस होना होगा जो कारपोरेट जगत के हिसाब से जरूरी है. 

अलग तरह से भी हो सकती है देशभक्ति

बड़े कामों की शुरूआत कई बार छोटी-छोटी चीजों से और छोटी-छोटी जगहों पर होती है. इस बार गणतंत्र दिवस के अवसर जहाँ पूरा देश राष्ट्रीय तिरंगे को फहराते हुए राष्ट्रगान गा रहा था, वही बिहार की राजधानी पटना की एक काँलोनी में स्थित 'Trimurti Housing Society' में रहने वाले लोगों ने इस राष्ट्रीय पर्व को कुछ अलग ढंग से मनाने का फैसला किया. इस Apartment के ठीक सामने झुग्गी-झोपड़ियों की एक कतार है, जिनमें रहने वाले ज्यादातर परिवारों के मुखिया मुजरिम करार देते हुए विभिन्न सजाओं के अंतर्गत बेउर जेल में बंद हैं. इन झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चे गरीबी में जीने को विवश हैं, जिनका शिक्षा से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा. ऐसे में गणतंत्र दिवस पर Apartment के रहवासियों ने अपने परिसर में एक सरस्वती पूजा का आयोजन किया और झोपड़ियों में रहने वाले 6 से 14 वर्ष के तकरीबन 30 बच्चों को इकट्ठा करते हुए उन्हें शिक्षा के साथ जोड़ने की पहल की.

धुल-मिट्टी से सने हुए इन बच्चों का पेन्सिल या इरेजर से कभी कोई वास्ता नहीं पडा था. एक बच्चे ने पेन्सिल को हाथ में चाकू की तरह थाम लिया और बोला, 'मेरे पिता इसी तरह चाकू पकड़ते हैं, जब वह मेरी माँ को धमकाते हैं' उन बच्चों को बताया गया कि पेन्सिल को उँगलियों के बीच कैसे थामा जाता है. बच्चे भी पहली बार अपने हाथ में पेन्सिल पकड़ कागज़ पर उल्लती-सीधी लिखावट में कुछ लिखते हुए काफी उत्साहित थे. यह देखते हुए Trimurti के रहवासियों ने इन बच्चों को पास के एक सरकारी स्कूल में भर्ती कराने का फैसला किया. अपने इस प्रयास के लिये Funds जुटाने की खातिर ये लोग निकट स्थित अन्य आवासीय Societies को भी Approach करने के बारे में सोच रहे हैं. ऐसे में हमें खुद से यह सवाल पूछना होगा- आखिर देशभक्ति क्या है? दरअसल Trimurti Apartment के रहवासियों ने जो किया, उसमें देशभक्ति की सच्ची भावना की झलक मिलती है. उन्होंने इन बच्चों को अपराध की दुनिया में जाने से बचाते हुए  शिक्षा के साथ जोड़ते की पहल की. 18वीं सदी में ब्रिटीश राजनीतिज्ञ  रांबर्ट वालपोल ने कहा था, 'लोग अक्सर देशभक्ति के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करते हैं इसकी सार्थकता तभी है, जबकि इसे सही मायनों में अमल में लाया जाए.' यदि पटना में रहने वाले कुछ लोग देशभक्ति की सही भावना को व्यवहार में ला सकते हैं तो हम क्यों नहीं.

फंडा यह है कि...                                                                                                                  
देशभक्ति होने के लिये तिरंगा फहराना या राष्ट्रगान गाना ही काफी नहीं है. हमें कुछ ऐसा काम करना होगा, जिससे देश और समाज का व्यापक तौर पर भला हो सके.

साथ मिलकर काम करने में आसानी

मुंबई के लोग बंगलों की बजाय फ़्लैट्स में रहना ज्यादा पसंद करते हैं। इसकी वजह सिर्फ़ जगह की कमी और इसकी आसमान छूती कीमतें ही नहीं हैं, बल्कि बंगलों में जाने के बाद जिस तरह की कागजी खानापूर्ति और मेंटेनेंस का काम करना होता है, उससे भी वे बचना चाहते हैं। इस महानगर में 99.5 फ़ीसदी लोग फ़्लैट्स में रहते हैं और 95 फ़ीसदी लोगों को पता भी नहीं होता कि उन्हें पानी किस तरह मिलता है, उनकी सोसायटी की चौकीदारी कौन करता है, वे कितना कर चुकाते हैं और उनकी मैनेजिंग कमेटी को नगर प्राधिकरणों, विघुत आपूर्तिकर्ताओं जैसे विभिन्न सेवा प्रदाताओं से कितना जूझना पड़ता है। इन 95 फीसदी लोगों में से 70 फीसदी यह भी नहीं जानते कि मैनेजिंग कमेटी में कौन-कौन है। जब भी कोई बिल आता है तो वे चेक काटकर दे देते हैं और आँफिस निकल जाते हैं। याद रखें, यदि आप अकेले हैं तो आप पर अपनी व्यक्तिगत जरूरतें पूरी करने का बोझ और बढ़ जाता है. इसे यहाँ पेश एक स्टोरी के जरिये बेहतर ढंग से समझा जा सकता है.

आपने भी कभी-कभार आकाश में हंसों को 'वी' आकार के समूह में उड़ाते देखा होगा। उनके इस तरह उड़ने के पीछे एक वैज्ञानिक कारण है। दरअसल समूह में जब भी कोई हंस अपने पंख फडफडाता है तो वह अपने से पीछे वाले हंस के लिये झटका उत्पन्न कर उसे उड़ने में सहयोग करता है। अकेले पक्षी के मुकाबले 'वी' आकार में पूरा समूह 71 फीसदी ज्यादा दूर तक उड़ सकता है। इसी तरह जो लोग एक ही दिशा में जाते हैं या जिनमें टीम भावना होती है, वे ज्यादा दूर तक आसानी से यात्रा कर लेते हैं। ऐसा इसलिए क्योकि वे एक-दूसरे के सहयोग से यात्रा करते हैं। जब भी कोई हंस इस आकार (समूह) से बाहर आता है तो उसे उड़ान में कठिनाई होने लगती है और जल्द ही वह फिर से 'वी' आकार के समूह में लौट आता है।

जब समूह में सबसे आगे उड़ने वाला हंस थक जाता है, तो वह पीछे आ जाता है और दूसरा हंस उसका स्थान ले लेता है। मुश्किल काम करते समय अदला-बदली करने में ही समझदारी है। पीछे उड़ रहे हंस प्रोत्साहन के स्वर निकालकर आगे उड़ने वाले हंसों को प्रोत्साहित करते हैं। अगर हममें भी हंसों जैसी बुद्धि हो तो हम कभी भी एक-दूसरे की मदद करने से नहीं चूकेंगे।

फंडा यह है कि....                                                                                                        
यदि बहुत से लोगों का लक्ष्य एक है तो बेहतर यही होगा कि अलग-अलग काम करने के बजाय मिलकर काम किया जाए।