28 जनवरी 2011

समझें सेहत की अहमियत

हमारे देश अमेरिका में वर्ष 1990 से लेकर अब तक प्रति व्यक्ति चिकित्सकीय खर्च तीन गुना तक बढ़ गया है. अमेरिकन के नेशनल हेल्थ सर्विसेज का तो यही कहना है. भारत में 50 से 60 वर्ष की उम्र के बीच के लोग मेरी इस बात से सहमत होंगे कि हमारे यहाँ भी चिकित्सा बिल में पहले के मुकाबले जबरदस्त इजाफा हो चुका है.

दूसरी ओर यह भी देखा गया है कि ज्यादा से ज्यादा अमेरिकियों में बाहर खाने की आदतों के साथ मोटापे की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है. इसे देखते हुए वहां कई जगहों पर स्थानीय सरकारों ने लोगों को पौष्टिक खाना खाने के प्रति प्रोत्साहित करके की कोशिश की.

उन्होंने यह सोचते हुए अपने यहाँ के हर खाघ उत्पाद के पैकेट पर कैलोरी व वसा की मात्रा लिखनी शुरू कर दी इससे लोग कुछ भी उलटा-सीधा खाने से डरेंगे और हल्का, सुपाच्य व पौष्टिक खाना खाने के लिए प्रोत्साहित होंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जिस तरह हम जैसे कई लोग सिगरेट के पैकेट पर लिखी कैंसर संबंधी चेतावनी को नजरंदाज कर देती हैं, उसी तरह अमेरिकी भी कैलोरी संबंधी सूक्ष्म जानकारी को अनदेखी कर रहे हैं.

वाशिंगटन में टेको टाइम नामक एक फास्ट-फ़ूड श्रृंखला से जुड़े शोधार्थियों ने पाया कि खान-पान की आदतें बहुत मुश्किल से छूटती है.  वहां मेन्यू में कैलोरी संबंधी जानकारी देने से पिज्जा जैसे किसी भोज्य पदार्थ की खपत पर कोई असर नहीं पडा.

भारत में बाहर खाने की प्रवृत्ति बढी है, जिसका प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च से सीधा संबंध जोड़ा जा सकता है.

दूसरी ओर सिंगापुर में प्राथमिक स्कूलों के 3000 से ज्यादा बच्चों पर दो वर्ष तक किये गए एक अध्ययन ने बच्चों और गेमिंग के बीच जुड़ाव पर रोशनी डाली. कम्प्युटर या मोबाइल फोन लगातार दीवानों की तरह वीडियो गेम खेलते रहना किसी भी किशोरवय बच्चे के लिये दोपहर गुजारने का कोई सेहतमंद तरीका तो नहीं है. यह नई रिसर्च कहती है कि लगातार वीडियो गेम से चिपके रहने वाले इन 'लती' गेमर्स के अभिभावकों को इनकी मानसिक बीमारी से जुडी समस्याओं से जूझना पड़ सकता है.

फंडा यह है कि...
आगे चलकर हेल्थ का मसला काफी अहम होगा. डाँक्टरों के लिये भले ही यह कारोबारी अवसर हो, लेकिन आम इंसानों के लिये यह चिंता का विषय है.

26 जनवरी 2011

गुस्से की एनर्जी को जोश में बदलो

जब एक व्यक्ति को गुस्सा आता है, तो वह पागलपन की हदें पार कर जाता है. अपने गुस्से को ठंडा करने के लिये वह कुछ भी कर गुजरता है.

कहते हैं कि एक पोले मैच हारने के बाद [स्वतंत्रता से पहले] अलवर के महाराजा को इतना अधिक गुस्सा आया कि उन्होंने अपने घोड़े पर पेट्रोल छिड़क कर सबके सामने उसको आग लगा दी.

इसी तरह के दूसरे उदहारण में समय-समय पर आने वाले अनचाहे मेहमानों से परशान होकर एक दिन महाराजा ने एक ज्योतिषी [जो मुम्बई से चलकर अलवर पहुंचा था] को जेल में डाल दिया. जब उसने पूछा कि यह सब उसके साथ क्यों हो रहा है, तो उसकी हंसी उड़ाते हुए उसको बताया गया कि वह एक अक्षम ज्योतिषी है क्योंकी वह अपनी स्वयं की गिरफ्तारी की भविष्यवाणी नहीं कर पाया.

मैनेजमेंट विशेषज्ञ यह मानते हैं कि गुस्सा आने का एकमात्र कारण- 'एक व्यक्ति द्वारा अपने टार्गेट को प्राप्त करने में असफल होना'. एक व्यक्ति एक दिन में प्रत्येक मिनट किसी न किसी गतिविधि या क्रिया में व्यस्त होता है. मैनेजमेंट विशेषज्ञ यह कहते हैं कि 'ऐसी कोई भी गतिविधि या कार्य नहीं होता, जिसका कोई उद्देश्य नहीं हो'. इसका सीधा सा मतलब होता है कि एक व्यक्ति प्रत्येक मिनट किसी ना किसी उद्देश्य का पीछा कर्ता है. उद्देश्य प्राप्ति पर उसे बहुत खुशी होता है परन्तु उद्देश्य की पूर्ती ना होने पर उसके गुस्सा या आक्रामक होने की अत्यधिक संभावनाएं होती है. रोजाना एक व्यक्ति को लगभग 50 प्रतिशत कार्यों में पाने उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं होती है. इसलिए एक औसत आदमे को रोजाना किसी न किसी बात पर गुस्सा जरूर आता है. उदहारण के लिये, आपके सामने गाडी चलाने वाला व्यक्ति आपके बार-बार होर्न मारने के बावजूद साइड नहीं देता है, तो आप गुस्से में कुछ उलटा-सीधा कर बैठते हैं.

क्रोध एक ऐसे एनर्जी है जिसको यदि सही वक्त पर उचित दिशा में धकेल दिया जाए, तो वह एक जोश का रूप धारण कर लेती है, और इस जोश के फलस्वरूप एक व्यक्ति दीर्घकाल में बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हासिल करने में सक्षम हो जाता है.

मैनेजमेंट विशेषग्य ये सलाह देते हैं कि गुस्से के रूप में निकलने वाली ऊर्जा से एक व्यक्ति को अपनी क्रिएटिवीटी ट्रिगर करना चाहिए. यदि उसको उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो रही है तो उस पर गुस्सा करने के बजाय अपनी रचनात्मकता को उपयोग में लाकर ऐसे रास्तों की खोज करनी चाहिए जिससे आपके उद्देश्य प्राप्त हो सके. आप में स्वयं में आत्मविश्वास भी होना चाहिए को जो उद्देश्य अभी आपको प्राप्त नहीं हो सका है उसको आप कुछ समय बाद अपनी क्रिएटिवीटी से अवश्य प्राप्त कर लोगे. इससे आपको अपना क्रोध कम करने में मदद मिलेगी, और क्रोध की ऊर्जा को जोश की तरह इस्तेमाल करके दीर्घकाल में आप एक सफल इंसान भी बनोगे.

25 जनवरी 2011

भवन कि नींव

घर की नींव लगाते समय ध्यान रखें 

मकान की नींव ही उसकी मजबूती का आधार होती है। नींव खुदवाते समय ध्यान रखें व्यक्ति को नींव प्रारंभ करने हेतु शुभ समय, शुभ माह, शुभ तिथि, सुभ नक्षत्र, शुभ लग्न और नींव खुदाई की शुभ दिशा का व्यक्ति हेतु शुभ मुहूर्त का चयन करके ही निर्माण करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है मन खुश रखने के लिये नींव का शुभ होना आवश्यक है।

नींव खोदना
सर्वप्रथम नींव ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) दिशा से खोदना चाहिए। फिर दक्षिण-पूर्व व वायव्य कोण (पश्चिम-उत्तर) की तरफ नींव खोदनी चाहिए। इसके बाद आग्नेय से नैऋत्य (पश्चिम-दक्षिण) व वायव्य से नैऋत्य (पश्चिम-दक्षिण) व वायव्य से नैऋत्य की ओर खुदवाना चाहिए।

नींव भरवाई
सर्वप्रथम नैऋत्य (पश्चिम-दक्षिण) में आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) से ईशान (उत्तर-पूर्व) की तरफ बढ़ते हुए नींव भरवानी चाहिए। प्लीन्थ के ऊपर यदि दीवारों की मोटाई 25 इंच रखना चाहते हैं, तो प्लीन्थ तक कम से कम दो फुट चौड़ी दीवार बनवानी चाहिए। यदि ऊपर केवल नौ इंच मोटी दीवारें बनवानी हो, तो प्लींथ की दीवारों की मोटाई 15 से 18 इंच तक रखी जा सकती है। भूखण्ड की प्लींथ पर्याप्त ऊंची रखनी चाहिए, ये आसपास निर्मित भवनों से थोड़ा अधिक होना चाहिए।

नींव भरते समय
तुलसी की 35 पत्तियाँ, लोहे की चार कीलें, चांदी के सांप का जोड़ा, जनेऊ, पान के 11 पत्ते, मिट्टी के 11 दिए, कुछ सिक्के, आते की पंजीरी, मौसम का कोई भी फल, लड्डू, गुड, हल्दी की 5 गांठे, रोली, चावल, पुष्प, पांच छोटे चौकोर पत्थर, पांच छोटे-छोटे 2 औजार, शहद, राम मंत्र लिखित पुस्तिका, ताम्बे के कलश में उपरोक्त सभी वस्तुओं को लाल कपडे में बाँध कर नींव में रखें। तत्पश्चात नव गृह विधि एवं नवग्रह शांति का विधान करें और वास्तुनुसार निर्माण करवाएं। शुभ समय में कार्य प्रारम्भ कर कन्याओं व कारीगरों में गुड बांटकर कार्य प्रारंभ कर कन्याओं व कारीगरों में गुड बांटकर कार्य शुरू करें व 10 प्रतिशत भूमि खाली छोड़ें। भवन के दक्षिण-पश्चिम में कम और ईशान से अधिक खाली स्थान छोड़ें। 

महिलाओं से बढ़ता है वेल्थ क्रियेशन

मैनेजमेंट विशेषज्ञ ये मानते हैं कि किसी भी समाज की सम्रद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि वहां की स्त्रियाँ कितना व्यापारिक गतिविधियों में भाग लेती है. जितनी उनकी व्यापारिक भागीदारी बढ़ती जायेगी, उतना ही समाज में वेल्थ क्रियेशन [पूंजी का निर्माण] भी अधिक होगा।

उदहारण के लिये अमरीका में महिलाओं की व्यापारिक भागीदारी सन 1972 में मात्रा 4 प्रतिशत थी, अर्थात अमरीका 4 प्रतिशत व्यापार पर उनका मालिकाना हक़ था। जो 2006 तक बढ़कर 38 प्रतिशत से भी अधिक हो गया।  इसका सीधा सा मतलब उन महिलाओं द्वारा संचालित व्यापारिक गतिविधियों से लगभग 20 लाख करोड़ रूपयों से अधिक का कारोबार होता है और तकरीबन 30 लाख भी अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त हो रहा है।

इसका मुख्य कारण वहां पर मैनेजमेंट डिग्री के अंतर्गत एंटरप्रेन्योर्शिप विषय के प्रोत्साहन से है। एंटरप्रेन्योर्शिप का सीधा सा मतलब होता है 'रीलेंटलैसपरसूट आँव अपोर्च्यूनीटीज बियांड रिसोर्सिस करंटली कंट्रोल्ड' अर्थात उन व्यापारिक अवसरों से कदम रखो जो आपके वर्तमान के रिसोर्सिस की सीमा में असंभव दीखते हैं। लोन आदि के माध्यम से पूंजी जुटाकर व्यापारिक गतिविधियाँ प्रारंभ करके उसे सफल बनाना, अपने लोन को चुकाना और लाभ के माध्यम से समाज में सम्रद्धि का विस्तार करना।

भारत में महिलाओं की भागीदारी अमरीका के मुकाबले नगण्य है। हालांकि एमबीए आदि डिग्री में लडकियां अधिक से अधिक प्रवेश लेने लगी हैं, लेकिन उनकी भागीदारी में अधिक इजाफा नहीं हुआ है। 'एक मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर के अनुसार 'अभी भी अधिकाँश लडकियां एमबीए डिग्री को एक कास्मेटिक डिग्री मानती हैं, इससे उनके शादी के प्रोस्पेक्टस अच्छे हो जाते हैं। शादी करने के बाद वे कोई कार्य नहीं करती, सिर्फ अपना घर-बार संभालती है।

कुछ समय से भारतीय परिवारों की सोच में कुछ बदलाव जरूर आया है, जिसके कारण से महिलाएं रोजगार क्षेत्र में प्रवेश करने लगी है, लेकिन स्वयं का व्यापार प्रारम्भ करने में अभी भी बहुत पीछे है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि वृहद स्तर पर ऐसे प्रयास किये जाएँ, जिससे अधिक से अधिक महिलाएं व्यापार के क्षेत्र में आगे आयें।

24 जनवरी 2011

हरितालिका तीज व्रत

भाद्र शुक्ल पक्ष की तृतीय को हस्त नक्षत्र होता है. इस तिथि को हरितालिका तीज व्रत मनाया जाता है. इस व्रत को करने से कन्याओं को मनोनुकूल वर तथा सौभाग्यवती महिलाओं को अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है. इस दिन प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर वृति स्त्री को हरितालिका तीज व्रत करने का संकल्प करना चाहिए. तदुपरांत उसे पूरे दिन निराहार रहना चाहिए. सायंकाल को पुनः स्नान करके शुद्ध एवं उज्जवल वस्त्र धारण करके शिव एवं पार्वती की पूजा उपासना करनी चाहिए. माता पार्वती को सुहाग का जोड़ा एवं सुहाग पेटी चढ़ानी चाहिए. भगवान् शिव को धोती, कुर्ता आदि पांच वस्त्र चढाने चाहिए. इसके उपरान्त सौभाग्यवती स्त्री को तेरह प्रकार के मिष्ठान बनाकर सास को भेंट करने चाहिए. अंत में हरितालिका तीज व्रत की कथा का श्रवण करना चाहिए.

व्रत-कथा
माता सती जब अपने पिता दक्ष के होमकुंड में जलकर भस्म हो गईं, तो उसके पश्चात उन्होंने मैना और हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और पार्वती कहलाईं. पार्वती बाल्यावस्था से ही शिव को पति के रूप में चाहती थीं. इसके लिये उन्होंने कठोर शिव्राध्ना करना आरम्भ किया. उन्होंने वर्षों तक अन्न त्यागकर शिव की कठोर तपस्या के. जब उनकी तपस्या फलोन्मुख हो रही थी, तो उन्हीं दीयों देवर्षि नारद हिमालय के यहाँ आए और उन्होंने पार्वते के साथ विवाह के लिये भगवान् विष्णु का प्रस्ताव रखा. हिमालय भी इस प्रस्ताव को पाकर प्रसन्न हो गए और पानी पुत्री पार्वती को इसके लिये मनाने का प्रयास किया. पार्वतीजी इस प्रस्ताव को सुनकर मूर्छित हो गई, जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने पुनः घने जंगलों में जाकर शिव की आराधना करने का निश्चय किया. अपनी सखियों के साथ पार्वतीजी ने घने जंगलों में जाकर एक गुफा में भाद्रपद शुक्लपक्ष की त्रितीय के दिन शिवलिंग की स्थापना करके शिव की तपस्या आरम्भ कर दी. शीघ्र ही भगवान् शिव ने पार्वतीजी को दर्शन दिए और अपने पत्नी के रूप में वरण करने का वरदान भी दिया. इस प्रकार हरितालिका तीज के दिन तपस्या आरम्भ करने के कारण पार्वतीजी को मनोनुकूल एवं शिवजी जैसा वर प्राप्त हुआ. इसके बाद से ही मनोनुकूल वर की कामना एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिये स्त्रियाँ हरितालिका तीज व्रत करती हैं.

वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन को सुखद-समृद्ध करें

फेंगशुई हजारों वर्षों से चीन के निवासियों का वास्तुशास्त्र है। यह सरल एवं समृद्धदात्री विधि है, जो भवन निर्माण एवं सजावट के काम आती है। बहुत पुरानी बात है कि चीन की पीली नदी पर मजदूर वर्ग कृषक कार्य कर रहे थे, तब उन्होंने एक विशाला कछुए को देखा। तभी से चीन में उसे शुभ शकुन के रूप में स्वीकार किया जाने लगा। उसकी पीठ पर नौ चौकोर खानों में कुछ अंक लिखे थे। इनका हर तरफ से योग 15 आता था। आगे चलकर यही चीनी अंकविद्या तथा पा-कुआ का आधार बना। फेंगशुई में पा-कुआ को कम्पास की तरह उपयोग किया जाता है।

पा-कुआ को भूखण्ड पर रखकर विभिन्न कमरों एवं आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है। फेंगशुई में चौकोर भूखण्ड श्रेष्ठ समझे जाते हैं, क्योंकि इस तरह के भूखण्ड में आदर्श परिवार की जरूरी सभी चीजें सम्मलित होती है।

फेंगशुई में 'ची' अर्थात ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को विशेष महत्व दिया जाता है। 'ची' की रचना में 'यान' तथा 'यांग' का संयोग आवश्यक होता है। यह स्त्री एवं पुरूष स्वरुप है तथा भर्ती दर्शन में यह शिव-शक्ति के संयोग के नाम से जाना जाता है, जो शक्ति एवं ऊर्जा के साथ निर्माण में सहायक है। जब शक्ति का घर के किसी भाग विशेष में अभाव होता है, तभी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

सांसारिक जीवन का आधार विवाह है। अतः घर के शयनकक्ष में शक्ति का निरंतर प्रवाह आवश्यक है। शयनकक्ष या विवाह से सम्बंधित केंद्र को कुछ सामान्य फेंगशुई उपायों से सक्रीय किया जा सकता है। घर के शयनकक्ष में वस्तुएँ बिखरी न हों तथा कपड़ों का ढेर न लगा हो। अगर वहां अलमारियां है, तो उन पर शीएशे कदापि न हों। शयनकक्ष में चांदी की सजावट की वस्तुएँ आनन्दायक होती हैं।

मन अशांत हो, बहुत क्रोध हो या कोई विवाद की स्थिति हो, उस समय शयनकक्ष में प्रवेश न करें, न ही जीवन साथी से किसी तरह का प्रेम-प्रसंग या रोमांस करें। शयनकक्ष की दीवारों तथा पर्दों का रंग मटमैला या उड़ा हुआ रोमांस नहीं होना चाहिए। इस कक्ष में आराध्य देव की भी तस्वीर कभी नहीं रखना चाहिए।

शयनकक्ष से लगे शौचालय या बाथरूम का दरवाजा सदैव बंद रखें। अगर शयनकक्ष में ड्रेसिंग टेबल या शीशा है, तो उस पर हल्का या पारदर्शी पर्दा लगा दें। शीशा किसी भी स्थिति में पलंग को प्रतिबिंबित न करे। शयनकक्ष में करूं रस या रौद्र रूप वाली पेंटिंग या चित्र न लगाए। प्रेम एवं वात्सल्य को चित्रित करने वाले चित्र इस क्षेत्र की ऊर्जा को सक्रीय करते हैं। रंगों का चुनाव करते वक्त सावधानी रखें। हल्का लाल एवं पीला रंग सुखद है, लेकिन इसकी अधिकता अनिद्रा तथा सिर के रोग उत्पन्न कर देती है। अगर विवाह संबंध एवं प्रेम में व्यवधान आ रहा है, तो शयन कक्ष में दो मोमबत्ती जलाएं।

'ची' की सक्रियता के लिये क्रिस्टल बाँल और फानूस लगाना चाहिए। नालों से पानी नहीं टपकना चाहिए। पलंग दीवार से लगा हो तथा खिड़की से दूर हो, पलंग के नीचे सामान न रखें, तो उत्तम है। विंड चाइम लटकाएं, बांसुरी एवं घंटियों को लटकाना भी इसके लिये सुखद है। ये सावधानियां शयनकक्ष को सक्रिय कर शक्ति से भर देती हैं।

फेंगशुई के साधनों से विवाह एवं पारिवारिक जीवन को सुखद एवं समृद्ध बनाया जा सकता है।

21 जनवरी 2011

पुनर्विवाह के बाद कैसे करें एडजस्टमेंट ?

अपने दो साल के कडवे, त्रासदीपूर्ण और दर्द भरे दाम्पत्य जीवन से हताश अनुभव को अंत में जब तालाक मिल गया तो उसने राहत की सांस ली। लगा जैसे काल कोठरी में रहने के बाद उसे आजादी मिल गई और वह भी अब खुली हवा में सांस ले सकती है। शादी से उसका विश्वास उठ चुका था। अब बस वह अपनी नौकरी के साथ अकेले खुश रहना चाहती थी। लेकिन साल बीतते-बीतते उसे तन्हाई खलने लगी। इसी बीच उसके मनमोहक व्यक्तित्व से प्रभावित हो कई पुरूषों ने उसे पुनर्विवाह के लिये प्रपोज किया. माता-पिता ने भी बहुत समझाया, लेकिन वह अपनी अतीत की पीड़ादायक यादों से उबर नहीं पा रही थी। कहीं इस विवाह के बाद भी वैसा ही हुआ तो? पहली शादी में भी तो शुरू-शुरू में सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन कुछ दिनों बाद ही सब कुछ बिखरने-सा लगा था। सहेलियां समझातीं कि सब पुरूष एक से नहीं होते और न ही सब जगह परिस्थितियाँ एक-सी होती हैं। लेकिन आखिर क्या गारंटी कि इस दूसरी शादी में फिर से वही सारी परेशानियां न हों।

आसमान और भी हैं...
इस तरह के अंतर्द्वन्द और प्रश्न प्रत्येक उस महिला तथा पुरूष के सामने खड़े होते हैं, जो तलाक अथवा वैधव्य या विधुरता के बाद पुनर्विवाह कि सोचते हैं कुछ लोग तो अकेले ही जीवन गुजारना पसंद करते हैं और वे कमोबेश अपने फैसले से संतुष्ट भी रहते हैं। किन्तु कुछ के लिये बिना किसी साथी के जीवन गुजारना कठिन हो जाता है और वे फिर से घर बसाना चाहते हैं। प्रसिद्ध लेखिका शोबा डे ने अपनी पुस्तक स्पाउस में लिखा है- 'जिन्दगी में सबको दूसरा मौक़ा जरूर मिलना चाहिए और जब यह सामने हो तो इसे फ़ौरन ले लेना चाहिए'
वास्तव में यदि एक बार विवाह असफल होता है अथवा असमय ही जीवनसाथी का साथ छूट जाता है तो प्रत्येक व्यक्ति को हक़ है कि वह दुबारा विवाह करके नए सिरे से अपनी जिन्दगी शुरू करे।

पुनर्विवाह से पहले जरूरी है प्लानिंग
यों तो विवाह नाम ही समझौते यानी कि एडजस्टमेंट का है, किन्तु पुनर्विवाह में ये बातें अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि पहली बार विवाह करने पर जहाँ एक-दूसरे की बहुत-सी कमियाँ तथा अवगुण दाम्पत्य के शुरूआती खुमार, दैहिक आकर्षण तथा सेक्स के नए-नए अनुभवों के बीच काफी हद तक दब जाती हैं तथा अनदेखी कर दी जाती है, वहीं पुनर्विवाह के मामले में इस तरह की गुंजाइश कम ही रहती है।

दोबारा विवाह करते समय पहले विवाह के कडवे अनुभव उससे जुडी यादें अपने साथी की प्रत्येक गतिविधि को संदेह के घेरे में रखने लगते हैं। अतः यदि आप दुबारा घर बसाने जा रहे हैं तो अपने भावी वैवाहिक जीवन की सफलता के लिये पहले से कुछ प्लानिंग जरूरी है।

सबसे पहले अपने मन में यह बात बैठा लें कि परफेक्ट मैरिज अथवा परफेक्ट जीवनसाथी जैसी कोई चीज दुनिया में नहीं होती। कोई भी शादी चाहे वह कितनी भी अच्छी और कितनी भी सफल क्यों न हो, कमियाँ और दोषों से रहित नहीं होती।

अधिक पुनर्विवाह स्वेच्छा से न करके जरूर अथवा मजबूरीवश किये जाते हैं, अतः विवाह से पहले ये अवश्य जांच लें कि आप एक-दूसरे की जरूरतों पर खरा उतरने के योग्य हैं अथवा नहीं, मसलन यदि आप निसंतान हैं और किसी बच्चे के पिता से शादी करने जा रही हैं तो अपने माँ की भूमिका के लिये अपने आपको तैयार पाती हैं या नहीं।

आप जिससे शादी करने जा रहे हैं, उनके भी बच्चे हैं और आपके भी हैं तो एक-दूसरे के बच्चों की सहमती लेना जरूरी है।

आप जिनसे विवाह करने जा रही हैं, वे तलाकशुदा हैं तो पहले विवाह की असफलता के कारणों की जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें। यदि पति के कमियों की वजह से पत्नी ने तलाक की पहल की है तो आपको सतर्क हो जाना चाहिए। यदि पत्नी कि कमियों की वजह से पति ने तलाक लिया है तो आप उनकी पूर्व पत्नी की कमियों के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर लें। देखिये, कहीं आप में भी वही सब कमियाँ तो नहीं।

यदि आप दोनों तलाकशुदा हैं तो एक-दूसरे के तलाक की कागजी कार्यवाही की पूरी जांच-पड़ताल अवश्य कर लें। क़ानून के दायरे में हर पहलू जायज हो तभी विवाह की सहमती दें।

कैसे बैठाएं तालमेल पुनर्विवाह के बाद
यह सच है कि दूसरी शादी को कामयाब बनाने के लिये बहुत मेहनत तथा गंभीरता से प्रयास करने पड़ते हैं, क्योंकि पुनर्विवाह में सिर्फ दो व्यक्ति ही नहीं जुड़ते, बल्कि उनके साथ उनका पहला वैवाहिक अतीत भी जुड़ता है। अतः वैवाहिक जीवन की दूसरी पारी की शुरूआत ठोस धरातल पर करने के लिये आपको बहुत समझदारी से काम लेना होगा।

कहावत है कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है, अतः यदि आप तलाकशुदा हैं तो अपनी पिछली असफलताओं से सबक लेकर नई जिन्दगी में बहुत संभल-संभल कर कदम रखना होगा।

एक-दूसरे के पहले विवाह की असफलताओं के कारणों को जानकार उन्हें दूर करने का प्रयास करें। पिछली गलतियों को फिर दोहराने की भूल न करें।

यदि आप विधवा अथवा विधुर हैं तो ध्यान रहे कि आपके वर्तमान जीवन के बीच आपका अतीत कहीं भी न आए हालांकि यह भी मुश्किल है कि जिस साथी के साथ आपने जीवन के इतने साल गुजारे हैं, उनका जिक्र भी न आए किन्तु यदि ऐसा होता है तो एक-दूसरे की यादों के प्रति सम्मान तथा सद्भावना बनाए रखें। यदि आपका पहला दाम्पत्य जीवन सुखमय था तो सफल नुस्खे का प्रयोग अपने वर्मान जीवन में अवश्य करें।

पुनर्विवाह के समय यदि एक दूसरे के बच्चे भी हैं तो परस्पर एक-दूसरे के बच्चो को समझाने और स्वीकार करने का समय दें। एकदम से उनसे एक ईमानदार माँ अथवा पिता की भूमिका की उम्मीद न पालें।

एक विवाह टूटने अथवा जीवनसाथी छूटने से व्यक्ति की दैहिक मांगों में कोई कमी आना जरूरी नहीं। अतः सेक्स के मामले में कोई पूर्वाग्रह न पाएं और दूसरे की इच्छा का पर्याप्त ध्यान रखें।

अधिकांशत पुनर्विवाह कंडीशनल होते हैं, अतः सेक्स को लेकर अधिक डिमान्डिग होने से भी बचें। पुनर्विवाह को लेकर कोई अपराधबोध न पालें और अपने आपको बेचारा बनाकर न पेश करें आत्मविश्वास और एक-दूसरे पर विश्वास बनाए रखें।

अब आपके सामने एक नई और खूबसूरत दुनिया बांहे पसारे खडी है, उसका स्वागत करें और जीवन का आनंद उठायें।