31 दिसंबर 2010

यहाँ भी मिल सकती है नौकरी

केस 1- गायिका आकांक्षा जाचक ने अपनी ऑरकुट प्रोफाइल पर अपने रिकॉर्ड, गाने के उद्देश्य, उपलब्धियों सहित कुछ गीत भी डाउनलोड कर रखे हैं। इतना ही नहीं, किसी खास अवसर पर वे अपनी फ्रेंड लिस्ट में शामिल लोगों को स्क्रेप में भी अपने द्वारा गाया गीत ही भेजती हैं।

केस 2- सॉफ्टवेयर इंजीनियर अनुराग ने अपनी ऑरकुट प्रोफाइल पर सभी प्रोजेक्ट्स की डिटेल दे रखी है। पुरानी कंपनी में जहाँ वे काम कर चुके हैं, उसके साथ ही वर्तमान कंपनी की डिटेल सहित खुद के पद, जॉब प्रोफाइल आदि के बारे में भी दर्शा रखा है।

केस 3- मीडिया प्रोफेशनल अभिनव ने भी अपनी ऑरकुट प्रोफाइल में अपने कार्यक्षेत्र और बीट्‍स के बारे में निर्धारित तरीके से बताया है। इसी के साथ उन्होंने अपनी एक्सक्लूसिव स्टोरी फोटो के साथ यहाँ लोड कर रखी है।

एचआर हेड कहते हैं सोशल नेटवर्किंग साइट्स से अच्छे उम्मीदवारों की हाइरिंग करना काफी पुराना फंडा है। यह बात अलग है कि यह लाइमलाइट में अब आया है। वे बताते हैं हेड हंटर्स फेसबुक, ऑरकुट या लिंक्डइन जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स अचानक से विजिट करते हैं।

यहाँ वे प्रोफाइल में दी गई जानकारियों के जरिए जॉब सीकर्स (जॉब लेने वाले) को तलाशते हैं। उनकी प्रोफाइल को आधार बनाकर वे कम्युनिटी के ऑनर से कॉन्टेक्ट करते हैं और निर्धारित व्यक्ति के बारे में जानकारियाँ लेते हैं। उन्होंने कहा, इसलिए कोई फ्रेशर हो या अनुभवी व्यक्ति अपनी प्रोफाइल में जानकारियों को अच्छे से सजाकर जॉब प्रोफाइडर को आकर्षित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए मीडिया संबंधित कोर्स कर चुके फ्रेशर हाल ही में स्वयं द्वारा पूरा किया गया प्रोजेक्ट अपलोड कर सकते हैं। वे अपनी प्रोफाइल पर लिंक भी क्रिएट कर सकते हैं।

एक अन्य एचआर मैनेजर कहती हैं, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए किसी व्यक्ति की स्कील्स के बारे में पता चलता है और कंपनी की कॉस्ट में कट भी हो जाता है। वे कहती हैं हाँ लेकिन यह ध्यान रखने योग्य बात है कि ऑरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट से शॉर्टलिस्ट होने के बाद अपने रिज्यूम को अच्छे-से तैयार करें।

जब भी इंटरव्यू के लिए जाएँ, अपने सीवी में किसी भी झूठी बात का समावेश न करें, क्योंकि आपके सीवी को आपकी ऑरकुट प्रोफाइल से वेरीफाई भी किया जा सकता है। इसके अलावा स्क्रेपबुक को चेक करके ब्रेकग्राउंड चेकिंग भी की जा सकती है।इंदौर। इन तीन केसेस के जरिए हम बताना चाह रहे हैं कि सोशल नेटवर्किंग साइट केवल चैटिंग, दोस्तों से कनेक्ट रहने और एंटरटेनमेंट के लिए ही नहीं है, बल्कि इसके जरिए अब कंपनियाँ व जॉब प्रोफाइडर अपने-अपने श्रेत्र के बेहतर कर्मचारियों को भी ढूँढ़ रहे हैं यानी अब क्लासीफाइड्स को भूल जाइए...।

अब अदद उम्मीदवार ढूँढने वाले लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सही उम्मीदवार का चयन करने लगे हैं। ऐसे में हो सकता है आपकी ऑरकुट या लिंक्डइन प्रोफाइल इनका अगला डेस्टिनेशन हो।

29 दिसंबर 2010

गुरू कैसा हो?

जिस गुरू, संत-महापुरूष में ये सब बातें हों-
1 - जो हमारी दृष्टि में वास्तविक बोध्वान, तत्वग्य दीखते हों और जिनके सिवाय और किसी में वैसी अलौकिकता, विलाक्शंता नहीं दीखती हो.
2 - जो कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि साधनों को तत्व से ठीक-ठीक जानने वाले हों.
3 - जिनके संगसे, वचनों से हमारे ह्रदय में रहने वाली शंकाएं बिना पूछे ही स्वतः दूर हो जाती हों.
4 - जिनके पास में रहने से प्रसन्नता, शान्ति का अनुभव होता हो.
5 - जो हमारे साथ केवल हमारे हितके लिये ही संबंध रखते हुए दीखते हों.
6 - जो हमारे से किसी भी वास्तु की किंचिन्मात्र भी आशा न रखते हों.
7 - जिनकी सम्पूर्ण चेष्टाएं केवल साधकों के हित के लिये ही होती हों.
8 - जिनके पासे में रहने से लक्ष्य की तरफ हमारी लगन स्वतः बढ़ती हो.
9 - जिनके संग, दर्शन, भाषण, स्मरण आदि से हमारे दुर्गुण-दुराचार दूर होकर स्वतः सद्गुण-सदाचार रूप देवी संपत्ति आती हो.

श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज के प्रवचन से

श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज के कल्याणकारी वचन

दुःख क्यों होता है ?

सुनना चाहते हैं, इसलिए न सुनने का दुःख होता है.
देखना चाहते हैं, इसलिए न दीखने का दुःख होता है.
बल चाहते हैं, इसलिए निर्बलता का दुःख होता है.
धन चाहते हैं, इसलिए निर्धनता का दुःख होता है.
जवानी चाहते हैं, इसलिए बुढापे का दुःख होता है.
जीना चाहते हैं, इसलिए मरने का दुःख होता है.
तात्पर्य है कि वास्तु के अभाव से दुःख नहीं होता, प्रत्युत उसकी चाहना से दुःख होता है.


दुःख दूर करने का उपाय

संसार की मात्रा वास्तु का निरंतर वियोग हो रहा है. उत्पन्न होते ही शरीर में विनाश की क्रिया आरम्भ हो जाती है. इसलिए बालक जन्मता है तो वह बड़ा होगा कि नहीं होगा, पढेगा कि नहीं पढेगा, व्यापार आदि करेगा कि नहीं करेगा, विवाह करेगा कि नहीं करेगा, उसकी संतान होगी कि नहीं होगा, वह धनी बनेगा कि नहीं बनेगा आदि सब बातों में संदेह रहता है, पर वह मरेगा कि नहीं मरेगा- इस बात में कोई संदेह नहीं रहता. अगर इस संदेहरहित बात को हम वर्तमान में ही धारण कर लें अर्थात जिसका वियोग अवश्यम्भावी है, उसके वियोग को वर्मान में ही स्वीकार कर लें और उसमें सुख की आशा न रखें तो फिर हमें दुखी नहीं होना पडेगा.
                                                                                                                                                                                                         (प्रवचन से)
                     

24 दिसंबर 2010

परहित में निहित स्वहित

पार्वती ने तप करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया, संतुष्ट किया। शिवजी प्रकट हुए और पार्वती के साथ विवाह करना स्वीकार कर लिया। वरदान देकर अन्तर्धान हो गए। इतने में थोडे दूर सरोवर में एक मगर ने किसी बच्चे को पकडा। बच्चा रक्षा के लिए चिल्लाने लगा। पार्वती ने गौर से देखा तो वह बच्चा बडी दयनीय स्थिति में है: मुझ अनाथ को बचाओ॥ मेरा कोई नहीं..बचाओ..बचाओ। वह चीख रहा है, आक्रंद कर रहा है। पार्वती का हृदय द्रवीभूत हो गया। वह पहुंचीं, वहां। सुकुमार बालक का पैर एक मगर ने पकड रखा है और घसीटता हुआ लिए जा रहा है गहरे पानी में। बालक क्रंदन कर रहा है: मुझ निराधार का कोई आधार नहीं। न माता है न पिता है। मुझे बचाओ.. बचाओ..बचाओ..।

पार्वती कहती है: हे ग्राह! हे मगरदेव!इस बच्चे को छोड दो। मगर बोला: क्यों छोडूं? दिन के छठे भाग में मुझे जो जो आ प्राप्त हो वह अपना आहार समझकर स्वीकार करना, ऐसी मेरी नियति है। ब्रह्माजीने दिन के छठे भाग में मुझे यह बालक भेजा है। अब मैं इसे क्यों छोडूं? पार्वती ने कहा :हे ग्राह! तुम इसको छोड दो। बदले में जो चाहिए वह मैं दूंगी।

तुमने जो तप किया और शिवजी को प्रसन्न करके वरदान मांगा, उस तप का फल अगर मुझे दे दो तो मैं बच्चे को छोड दूं। ग्राह ने यह शर्त रखी।
बस इतना ही?॥तो लो :केवल इस जीवन में इस अरण्य में बैठकर जो तप किया इतना ही नहीं बल्कि पूर्व जीवनों में भी जो कुछ तप किए हैं, उन सबका फल, वे सब पुण्य मैं तुमको दे रही हूं। इस बालक को छोड दो। जरा सोच लो। आवेश में आकर संकल्प मत करो। मैंने सब सोच लिया है।

पार्वती ने हाथ में जल लेकर अपनी संपूर्ण तपस्या का पुण्यफलग्राह को देने का संकल्प किया। तपस्या का दान होते ही ग्राह का तन तेजस्विता से चमक उठा। उसने बच्चे को छोड दिया और कहा: हे पार्वती! देखो! तुम्हारे तप के प्रभाव से मेरा शरीर कितना सुन्दर हो गया है! मैं कितना तेजपूर्णहो गया हूं! मानों मैं तेजपुंजबन गया हूं। अपने सारे जीवन की कमाई तुमने एक छोटे-से बालक को बचाने के लिए लगा दी? पार्वती ने जवाब दिया: हे ग्राह! तप तो मैं फिर से कर सकती हूं लेकिन इस सुकुमार बालक को तुम निगल जाते तो ऐसा निर्दोष नन्हा-मुन्ना फिर कैसे आता? देखते-ही-देखते वह बालक और ग्राह दोनों अन्तर्धान हो गए। पार्वती ने सोचा: मैंने अपने सारे तप का दान कर दिया। अब फिर से तप करूं। वह तप करने बैठीं। थोडा-सा ही ध्यान किया और देवाधिदेव भगवान शंकर प्रकट हो गए और बोले:
पार्वती! अब क्यों तप करती हो?
प्रभु! मैंने तप का दान कर दिया इसलिए फिर से तप कर रही हूं।
अरे सुमुखी! ग्राह के रूप में भी मैं था और बालक के रूप में भी मैं ही था। तेरा चित्त प्राणिमात्र में आत्मीयता का एहसास करता है कि नहीं, इसकी परीक्षा लेने के लिए मैंने यह लीला की थी। अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक का एक हूं। अनेक शरीरों में शरीर से न्यारा अशरीरी आत्मा हूं। मैं तुझ से संतुष्ट हूं।
परहित बस जिन्हके मन माहीं।
तिन्हको जग दुर्लभ कछुनाहीं।

21 दिसंबर 2010

वाणी ही व्यक्तित्व की सही पहचान है

रघुनाथ मंदिर में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए पण्डित माधवानन्दने कहा कि वाणी के सही इस्तेमाल करने पर ही व्यक्ति के व्यक्तित्व की सही पहचान होती है। इसी के माध्यम से कोई संत-महात्मा बन जाता है और कोई डाकू-लुटेरा। उन्होंने कहा कि मनुष्य को मन, वचन व कर्म से नि:स्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए। मन में किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं रखना चाहिए तथा अपनी वाणी से किसी को कठोर शब्द नहीं कहने चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य के बोलचाल के ढंग के माध्यम से ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण भी होता है।

इसी के माध्यम से कोई संत-महात्मा बन जाता है और कोई डाकू-लुटेरा बन जाता है। यह मनुष्य के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपने भाषाई स्वर का किस प्रकार इस्तेमाल करता है। उन्होंने कहा कि एकता के अभाव में अधिकतर लोग अपनी शक्ति का उपयोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए करते हैं जबकि उन्हें अपनी शक्ति का उपयोग आपस में लडने की बजाय अन्याय व दूसरी बुराईयों से लडने के लिए करना चाहिए। मनुष्य में भक्ति भावना व संस्कार ग्रहण करने की प्रवृति गायब होती जा रही है, जिसके चलते हमारे समाज में निरन्तर बुराइयों को अपनाने की प्रवृति को बढावा मिल रहा है।

बुराइयों पर विजय प्राप्त करने पर ही मनुष्य का सर्वागीण विकास संभव है। उन्होंने कहा कि मानव सेवा ही सबसे बडा धर्म है इसलिए मनुष्य को अपनी शक्ति का उपयोग मानव सेवा करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति मानव सेवा में लीन रहते हैं वे मनुष्य सदैव बुराईयों से दूर रहते हैं। जिसके कारण उन्हें मानव सेवा करने पर अत्यन्त खुशी महसूस होती है। उन्होंने कर्म के संदर्भ में कहा कि मनुष्य द्वारा किया गया कर्म ही उसका भाग्य विधाता होता है अच्छे कर्मो से ही अच्छे भविष्य का निर्माण होता है।

19 दिसंबर 2010

नए वर्ष में खुशी का पैगाम

हेलो दोस्तो! यह कैसा विचित्र सा समय है। वर्ष के बीत जाने का दुख और नए वर्ष के आने की खुशी, दोनों ही अहसास इस कदर घुलमिल गए हैं कि उनमें भेद कर पाना कठिन हो रहा है। ऐसा लगता है मानो हम बीते वर्ष के साथ अभी पूरी तरह जी भी नहीं कह पाए थे कि वह हाथ से निकल गया। कितना कीमती था वह हर पल, हर लम्हा, हर दिन, हर सप्ताह और हर महीना! आज उसकी अहमियत समझ में आ रही है। मन में यही कसक उठती है कि काश एक बार फिर से यही वर्ष जीने को मिल जाए तो वे सारे पल जिसकी हम कद्र नहीं कर पाए, उसे आदरपूर्वक गले लगा लेते। वर्ष के हर क्षण का सदुपयोग कर पाते। पर गया वक्त कभी हाथ आया है क्या? इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए नए वर्ष का पूरे सम्मान के साथ स्वागत करना चाहिए।

जो छूट गया उसका अफसोस करने के बजाए जो आने वाला है उसके स्वागत की तैयारी करनी है हमें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारी जरा सी चूक से आने वाला समय भी हमसे कतराकर चला जाएगा। हमारा फर्ज बनता है कि आने वाले हर लम्हे के लिए हम सतर्क हो जाएँ। आने वाले हर पल का हिसाब हमारे मन में, हमारी डायरी में भली-भाँति होना चाहिए। आने वाले वर्ष का हर लम्हा, हर दिन हमारे लिए अनेक अनमोल तोहफे और कामयाबी की सौगात लेकर खड़ा है। उसे जतन और प्यार से हासिल करने का सचेत प्रयास हमें जी-जान से करना चाहिए। आने वाला हर समय खुशियों के अनेक रंगों के गुलदस्ते लिए हमारे इंतजार में है इसलिए बेहद चतुराई से आलस को चकमा देकर उसे हमें हासिल करना है।

यह बहुत ही सही समय है जब हमें बारीकी से विचार कर लेना चाहिए कि हम कहाँ-कहाँ चूक गए और हमें संकल्प लेना चाहिए कि वह भूल हम फिर नहीं दुहराएँ। समय तभी तक हमारा है जब तक हम कुछ सोच सकते हैं और उसके अनुरूप कार्य कर सकते हैं। जब हमारे अंदर वह ताकत नहीं बचती कि हम अपनी सोच को साकार कर सकें तो वह समय हमारा होकर भी हमारा नहीं होता इसीलिए उन सभी लोगों के लिए यह समय बेशकीमती बन जाता है जो वयस्क हैं और जिन्हें अपने सपने को साकार करने का मौका मिला है।

हमें आने वाले वर्ष में इस बात का बेहद सतर्कता से ध्यान रखना चाहिए कि हम खुद को न भूलें। समय का सही उपयोग तभी होता है जब हम स्वयं को खुश रखने के बारे में गंभीरता से सोचें। एक खुश व्यक्ति अपनों को भी खुश रखने की चेष्टा करता है।

कहते हैं प्रेम से जो खुशी मिलती है वह और किसी चीज से नहीं मिल सकती। प्रेम से जो प्रेरणा मिलती है वह हर हौसले को इतना बुलंद कर देती है कि सागर, पर्वत सब तुच्छ जान पड़ते हैं पर प्रेम के सही मायने तभी तक सार्थक लगते हैं जब तक इसकी ताकत से जीवन को सकारात्मकता के साथ रचा जाए। इसकी ताकत का सही उपयोग तभी होता है जब प्रेम की भावना में मिट जाने के बजाए निर्माण की सोचें।

" हमें आने वाले वर्ष में इस बात का बेहद सतर्कता से ध्यान रखना चाहिए कि हम खुद को न भूलें। समय का सही उपयोग तभी होता है जब हम स्वयं को खुश रखने के बारे में गंभीरता से सोचें।"
प्यार के रिश्ते में भावनाओं का नियंत्रण बेहद जरूरी है। जिस प्रकार संभलकर बिजली का उपयोग करने पर हमारा घर रोशन हो उठता है पर जरा सी लापरवाही से सब कुछ खाक हो जाता है। उसी प्रकार प्रेम से भी जीवन में तभी तक प्रकाश मिलता है जब तक हम होश में रहें। आवेश में किए गए वायदे, बड़े-बड़े दावे पूरे नहीं होने पर वे साथी को बहुत आहत करते हैं। इस रिश्ते में यदि लंबी रेस का घोड़ा बनना है तो कछुए की चाल चलना ही ठीक है। धीमी गति ही सही पर आप मंजिल तक सोच-समझकर पहुँच तो पाएँगे।

यदि प्रेम में कोई भी साथी दूसरे को गंभीरता से नहीं लेता है, केवल अपनी सुविधा, अपनी मर्जी से रिश्ते को चलाना चाहता है तो सामने वाला अपना धैर्य खो देता है। कोई पूरी निष्ठा, ईमानदारी से कितना भी समर्पित भाव क्यों न रखता हो उसके बलिदान की भी सीमा होती है। एक वक्त आता है जब ऐसे रिश्ते बेजान होकर टूट जाते हैं। प्रेम के रिश्ते में दोस्ती की भावना को सबसे ज्यादा अहमियत देनी चाहिए ताकि दोनों को समान रूप से उसकी शक्ति मिलती रहे।

प्रेम करने वाले एक-दूजे के साथ चाहे जैसा भी व्यवहार करें, जितना भी समय बिताएँ पर नेकनीयती का दामन न छोड़ें। यदि एक दूसरे के बारे में नीयत साफ न हो तो वह प्यार अपनी गरिमा खो देता है। कई बार अच्छा समय बिताने को भी प्यार का नाम दे देते हैं। पर समय के बीतने के साथ ही उसकी गहराई समझ में आ जाती है। दोनों की भावना, नीयत एक समान है या नहीं इसे जानने का एक ही तरीका है, समय। जिस रिश्ते को दूर तक ले जाना है, उसे धीमी गति से परखने का मौका देना चाहिए।

नए वर्ष में पूरी ईमानदारी से रिश्ते को निभाने का संकल्प लें। जिनके दिल टूट गए हैं उनके लिए जिंगल बेल अवश्य बजेंगे। बस इस बार प्यार का दामन जीवन को संवारने के लिए थामें, जिंदगी में घुन लगाने के लिए नहीं।

15 दिसंबर 2010

वैदिक साहित्य में पुरूषार्थ चतुष्टय

भारतीय विचारकों एवं मनीषियों ने व्यक्ति एवं समाज के उदात्त स्वरुप तथा सर्वाड्गीण विकास के लिये पुरूषार्थों का विधान किया है।
सामान्य रूप में पुरूषार्थ का शाब्दिक अर्थ है 'पुरूषार्रथ्यर्ते इति पुरूषार्थ:' अर्थार्थ पुरूष के द्वारा इष्ट होता है, वही पुरूषार्थ है। पुरूषार्थ शब्द पुरूष एवं अर्थ इन दो शब्दों से मिलकर बना है। पुरूष से तात्पर्य है; विवेकशील प्राणी' और अर्थ से तात्पर्य है 'लक्ष्य'। उक्त लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास जब सचैतान्य किया जाता है, तो यह पुरूषार्थ कहलाता है। ये चार्पुरूशार्थ हैं - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। ये चारों पुरूषार्थ मानव जीवन के आर्थिक, बौद्धिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक आदि विभिन्न पक्षों से सम्बद्ध है। इनमें से अर्थ और काम प्रवृत्ति मूलक पुरूषार्थ हैं। मोक्ष निवृत्ति मूलक पुरूषार्थ है एवं धर्म प्रवृत्ति-निव्रत्तिमूलक पुरूषार्थ है अर्थात धर्म ही एकमात्र ऐसा पुरूषार्थ है, जो संसार में प्रवृत्त कराते हुए मोक्ष की ओर प्रेरित कर्ता है। इससे भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों उन्नति सम्भव है।
हमारा वैदिक साहित्य उक्त चारों पुरुषार्थों के विषय में क्या कहता है - इस विषय को प्रस्तुत करना ही इस शोध लेक का उद्देश्य है।

धर्म 
सामाजिक एवम पार्लौकित दोनों की दृष्टियों से धर्म को परम पुरूषार्थ माना गया है। बिना धर्म के तो सुव्यवस्थित समाज का निर्माण हो सकता है और न पारलौकिक सुख की प्राप्ति हो सकती है। अतः कहा गया है कि 'यतोsभ्युदय नि:श्रेयस सिद्धि स धर्म:।'
'धर्म शब्द का अर्थ बहुत विस्तृत एवं व्यापक है। धर्म शब्द का सबसे व्यापक अर्थ उसके व्याकरंगत मूल धातु 'धृञ्' पर आश्रित है। जिसका शाब्दिक अर्थ है - धारण करना. अतः धर्म उन सब नियमों एवं वावास्थाओं का नाम है, जो समाज और व्यक्ति को धारण करती है।

वस्तुतः देखा जाए तो धर्म मानव की अनवारी आवश्यकता है। आज समाज में जो हिंसा, क्रूरता, क्रोध, अहंकार, परस्पर ईर्ष्या एवं वैचारिक भिन्नता के बाव पनप रहे हैं उसका एक कारण हमारे धर्म विमुखता भी है। धर्म, कर्म के अभाव में हम अपने नैतिक मूल्य छोड़ते जा रहे हैं। अतः हमें आवश्यकता है स्वहित की भावना के ऊपर उठकर सर्वहित की भावना अपने मन में विकसित करने कि तथा वेदोक्त धर्म को समझने की, क्योंकि ऋग्वेद में धर्म का प्रयोग विश्व को धारण करने के अर्थ में हुआ है।

धर्म का उद्देश्य समाज को संतुलन में रखना है। यह संतुलन तभी रह सकता है। जब हम अपनी वैचारिक संकीर्णताओं को छोड़कर प्राणिमात्र को ईश्वर की सृष्टि समझ कर सबके प्रति समानता का व्यवहार करें तथा परस्पर मिलकर अपने कर्तव्य का पालन करें। इसी उदात भावना का उल्लेख हमें ऋग्वेद के अंतिम मंडल से प्राप्त होता है--
संगच्छध्वं संवदध्वं संवै मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथापूर्वे संजानाना उपासते ॥ 

समानो मंत्र: समिति: समानी, समानं मन: सहचित्तमेषाम् ।
समानं मंत्रमभिमन्त्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि ।
                                  ऋ. 10.191.3

वैदिक धर्म की पहचान हेतु मनु ने अपने ग्रन्थ मनुस्मृति में वैदिक धर्म के दस लक्षण बताते हुए कहा है---
धृति: क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्वीघा सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥
                                                  मनु. 6.91
अर्थात धैर्य, क्षमा, दं, असते, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य एवं क्रोध न करना, ये धर्म के दस लक्षण हैं, जिन्हें ऋग्वेद के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है --
1. धृति --- धृति अर्थात धैर्य से तात्पर्य है मानव का सुख-दुःख, सफलता-असफलता, गरीबी-अमीरी आदि द्वंद्वात्मक अवस्थाओं में भी विचलित न होना। ऋग्वेद में धीर पुरूषों के द्वारा ही सफलता का विधान किया गया है -- धीरा इच्छेकुर्धरूणेष्वारभम्।

2. क्षमा - क्षमा को भी वैदिक धर्म का लक्षण माना गया है. अपने प्रति किसी व्यक्ति द्वारा भूल या अज्ञानतावश किये गए अपराधों के लिये क्षमा करने की भावना धर्म का लक्षण होती है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में प्राप्त होता है.

3. दम - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य आदि आतंरिक शत्रुओं का दमन कर आत्म संयम रखना कहलाता है. इस संबंध में उल्लेख मिलता है - योग्निं तत्वो दमे देवं मर्त सपयर्ति। तस्मा इद्दीयद् वसु॥ अर्थात जो साधक मन को वशीभूत करके उपासना में निरत होता है, उसके समक्ष वासवी शक्तियां प्रदीप्त हो उठाती हैं.

4. असते - दूसरों के अधिकार, संपत्ति एवं परिक्श्रम की चोरी न करना असते कहलाता है. चोरी नैतिक अपराध है. ऋग्वेद उसके नाश की प्रार्थना कर्ता है.

5. शुद्ध - बाह्य एवं आतंरिक पवित्रता एवं स्वच्छता शौच कहलाती है. ऋग्वेद मानसिक शुद्धि पर ज्यादा जोर देता है, क्योंकि वहां परमात्मा से भावों को पवित्र बनाने के लिये खा गया है.

6. इन्द्रिय निग्रह - पञ्च ज्ञानेन्द्रियों एवं पञ्च कर्मेन्द्रियों को नियंत्रण में रखकर उन्हें कुत्सित विषयों से हटाकर सद्विश्यों में लगाना इन्द्रिय निग्रह है. वेदों में अच्छा देखें, अच्छा सुने आदि के भाव परिलक्षित होते हैं.

7. धी:  - 'धी:' शब्द का शाब्दिक अर्हत है 'बुद्धि', अर्थात हमें बुद्धि और विवेक के सहारे ही सत्य-असत्य, पाप-पुण्य आदि का विचार कर धर्माचरण करना चाहिए. ऋग्वेद में भी 'धियो यो नः  प्रचोदयात अर्थात ईश्वर हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर लगाए, जैसी भावनाएं प्राप्त होती हैं.

8. विद्या - अविद्या का नाश या विद्या की प्राप्ति धर्म का साधन है. वेदानुसार विद्या मनुष्यों की बुद्धि को प्रकाशित करती है. महोअर्ण - धियो विश्वा विराजति।
 9. सत्य - सत्याचरण धर्म का प्रमुख लक्षण है, इसलिए सत्य का ग्रहण एवं असत्य का त्याग धर्म का लक्षण माना है. वेद में इसे ऋत भी कहा गयाः है. ऋग्वेद के अनुसार राष्ट्र की प्रतिष्ठा का आधार ऋत ही है. "


10. आक्रोश - राग द्वेशादी के वशीभूत होकर किसी पर क्रोध न करना धर्म का दसवां लक्षण है 'उलूकयांतु शुशुलूकयातुं' के माध्यम से उल्लू, भेदिये आदि की वृत्ति को त्यागने का आदेश दिया गया है.
धर्म को आधार बनाकर न केवल ऋग्वेद में अपितु यजुर्वेद, अथर्वेद एवं उपनिषद ग्रंथों में भी प्रचुर ज्ञान प्राप्त होता है. मनुष्य की व्यक्तिगत और सामजिक उन्नति एवं व्यवस्था को बनाए रखें एक उद्देश्य से यजुर्वेद कहता है कि किसी के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और न किसी के धन का लालच करना चाहिए.
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किज्च् जगत्याञ्जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: मागृध: कस्यस्विद्धनम्॥

वाजसनेयी संहिता में धर्म निश्चित नियम और आचरण नियम अर्थों में प्रयुक्त हुआ है.
अथर्वेद में धर्म शब्द का प्रयोग धार्मिक क्रिया एवं संस्कार से अर्जित गुण के अर्हत में प्रयुक्त हुआ है. इसके अतिरिक्त अथर्वेद से ही हमें विविध मानवीय धर्मों की भी शिक्षा प्राप्त होती है.
छान्दोग्योपनिषद में सबके प्रति उद्दार विचार रखना, किसी से भी अशिष्ट व्यवहार न करना, विद्वानों का अनादर न करना जैसे उदात्त भावों का उल्लेख धर्म के रूप में मिलता है.
धर्म का हमारे जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष से सीधा संबंध है, जैसा कि कहा भी है.
धर्म करत संसार सुख, धर्म करत निर्वाण।
धर्म पंथ साधे बिना, नर तिर्यंच समान॥

इस प्रकार वैदिक धर्म मानव समाज की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति कर उसे सुख, शांति एवं परमानंद प्राप्ति कराने वाले कर्मों का नाम है.

अर्थ
जीवन का द्वितीय पुरूषार्थ अर्थ धन और भौतिक कल्याण से सम्बंधित है. अर्थ से अभिप्राय है विद्या और क्षमता के अनुसार परिक्श्रम से धन प्राप्ति और धर्म के अनुसार उसका उपयोग एवं उपभोग.
अर्थ से तात्पर्य धन-संपदा के साथ-साथ प्रयोजनादी भी लिया गया है. श्रुतियां भी अर्थ का निषेध नहीं करती है. इसी कारण ब्रह्मा, विष्णु भी हिरण्यगर्भ और लक्ष्मीश होते हुए भी श्रेष्ट रूप को धारण करते हैं.
वेद में कहा गया है कि वैदिक आर्य


काम
मानव जीवन को उदात्त एवं संयमित बनाने के लिये काम रूप तीसरे पुरूषार्थ की स्थापना की गई. काम एक जैविक प्रवृत्ति है जो मानव स्वभाव में प्रधान होती है. यदि मनुष्य को उसके संवेगात्मक जीवन से वंचित कर दिया जाए तो वह जंगलियों के समान आचरण करने लगेगा. यह स्थिति उसके शारीरिक एवम मानसिक स्वास्थ्य के लिये लाभकारी नहीं होती. अतः काम मानावे जीवन हेतु अनिवार्य पुरूषार्थ है जिसकी पूर्ती के लिये हमारी संस्कृति में गृहस्थाश्रम का विधान किया गया है. काम का सामान्य अर्हत उन सब इच्छाओं से है जिनकी पूर्ती करके मनुष्य सांसारिक सुख प्राप्त कर्ता है. काम के माध्यम से मनुष्य की सौन्दर्य प्रियता की प्रत्ति तुष्ट होती है.वस्तुतः देखा जाए तो काम और अर्थ साधन हैं, साध्य नहीं.
वेदों में काम को सारी सृष्टि का मूल कहा गया है. ऋग्वेद में इसे मन का प्रथम तेतास कहा गया है जो आरम्भ से ही विद्यमान था.
ऋग्वेद में काम के माध्यम से'बहु स्याम बहु प्रजायेयम' इस रूप में आत विस्तार की कामना की गई है. वेद के अनुसार पति-पत्नी को एवं संयमशील विद्वान् को उपयुक्त अवस्था में काम भाव प्राप्त होता है. ऋग्वेद का अगस्त्य - लोपामुद्रा आख्यान भी काम रूप पुरूषार्थ को पुष्ट करता है.
हमारा प्रथम पुरूषार्थ धर्म है, परन्तु उपनिषदों के अनुसार धर्मपालन के लिये संतति आवश्यक थी. यही कारण था कि गृहस्थाश्रम को सर्व आश्रमों में श्रेष्ठ आश्रम माना है. स्नातक बने सिष्य को उपदेश देते हुए आचार्य स्पष्ट रूप में कहते हैं कि प्रजा रूपी तंतु को कभी विचिन्न मत करना. बृहदारणयकोपनिषद में स्पष्ट उल्लिखित है कि जैसे कोई अपनी प्रिय पत्नी से मिलते हुए बाहर के जगत में कुछ नहीं जानता और न आतंरिक जगत को ही जानता है, उसी प्रकार प्राग्य आत्मा से जुडा हुआ पुरूष न बाहर की वास्तु जानता है और न ही अंदर की किसी वास्तु को.
बृहदारणयक उपनिषद में रति को सबसे बड़ा आनंद माना है एवं उसे ब्रह्मानंद सहोदर कहा है.

मोक्ष