15 सितंबर 2010

गायत्री उपासना हम सभी के लिये अनिवार्य ( Gayatri Worship is greatful for us )

यत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है । वेदों से लेकर धर्मशास्त्रों तक का समस्त दिवय ज्ञान गायत्री के बीजाक्षरों का ही विस्तार है । माँ गायत्री का आँचल पकड़ने वाला साधक कभी निराश नहीं हुआ । इस मंत्र के चौबीस अक्षर शक्तियों, सिद्घियों के प्रतीक है । गायत्री उपासना करने वाले साधक की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती है, ऐसा ऋषिगणों का अभिमत है ।

गायत्री वेदमाता है एवं मानव मात्र का पाप का नाश करने की शक्ति उनमें है । इससे अधिक पवित्र करने वाला और कोई मंत्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है । भौतिक लालसाओं से पीड़ित व्यक्ति के लिये भी और आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु के लिये भी एक मात्र आश्रय गायत्री ही है । गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु कीर्ति, धन एवं ब्रहमवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गये है, जो विधिपूर्वक उपासना करने वाले हर साधक को निश्चित ही प्राप्त होते है ।

भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को नित्य नियमित गायत्री उपासना करनी चाहिये । विधिपूर्वक की गई उपासना साधक के चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण करती है व विभिन्न विपत्तियों, आसन्न विभीषिकाओं से उसकी रक्षा करती है । प्रस्तुत समय इक्कीसवीं सदी का ब्रहम मुहूर्त है । आगतामी वर्षों में पूरे विश्व में तेजी से परिवर्तन होगा । इस विशिष्ट समय में की गयी गायत्री उपासना के प्रतिफल भी विशिष्ट होंगें । युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री के तत्वदर्शन को जन-जन तक पहुँचाया व उसे जन-सुलभ बनाया । प्रत्यक्ष कामधेनु की तरह इसका हर कोई पय पान कर सकता है । जाति, मत, लिंग भेद से परे गायत्री सार्वजनीन है, सबके लिये उसकी उपासना-साधना करने व लाभ उठाने का मार्ग खुला हुआ है ।

गायत्री उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है । हर स्थिति में यह लाभदायी है, परन्तु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकांडों के साथ की गई उपासना अति फलदायी मानी गई है । तीन माला नायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है । शौच-स्नान से निवृत होकर नियत स्थान, नियत समय पर सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की जानी चाहियें ।

उपासना का विधि विधान इस प्रकार है

ब्रह्म संध्या – जो शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिये की जाती है । इसके अन्तर्गत पाँच कृत्य करने पड़ते है ।

पवित्रीकरण – बाँए हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढक लिया जाए । पवित्रीकरण का मंत्रोच्चारण किया जाए । तदुपरांत उस ज को सिर तथा शरीर पर छिड़क लिया जाये ।

ऊँ अपवित्रः पवित्रोवा, सर्वावस्थां गतोडपि वा ।
यः स्मरेत्पुणडरीकाक्षं, स बाहृाभ्यन्तरः शुचिः ।।
ऊँ पुनातु पुण्डरीकाक्षः, पुनातु पुण्डरीकाक्षः, पुनातु ।

आचमन – वाणी, मन व अन्तःकरण की शुद्घि के लिये चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें । हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाये ।

ऊँ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।। 1 ।।
ऊँ अमृतापिधानमसि स्वाहा ।। 2 ।।
ऊँ सत्यं यशः श्रीर्मयि, श्रीः श्रयतां स्वाहा ।। 3 ।।

शिखा स्पर्श एवं विंदन – शिखा के स्थान को भीगी पाँचों अंगुलियों से स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सदविचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे । निम्न मंत्र का उच्चारण करें ।

ऊँ चिदरुपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्घि कुरुष्व मे ।।

प्रणायाम – श्वास को धीमी गति से बाहर से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के कृत्य में आता है । श्वांस खींचने के साथ भावना करें कि प्राणशक्ति की श्रेष्ठता श्वांस के द्घारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वांस के साथ बाहर निकल रहे है । प्राणायाम, मंत्र के उच्चारण के बाद किया जाये ।

ऊँ भूः ऊँ भुवः ऊँ स्वः ऊँ महः ऊँ जनः ऊँ तपः ऊँ सत्यम् । ऊँ भूर्भवः स्वः त्तसवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । ऊँ आपोज्योतीरसोडमृतं, ब्रहम भूर्भऊवः स्वः ऊँ ।

न्यास – इसका प्रयोजन है – शरीर के सभी महत्तवपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि देवपूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । बाँयें हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों अंगुलियों को उसमें भिगोकर बताए गये स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।

ऊँ वाड.मे आस्येडस्तु (मुख को)
ऊँ नसोर्मेप्राणोडस्तु (नासिका के दोनो छिद्रों को)
ऊँ अक्ष्णोर्मेचक्षुरस्तु (दोनों नेत्रों को)
ऊँ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । (दोनों कानों को)
ऊँ बाहृोर्मे बलमस्तु । (दोनों भुजाओं को)
ऊँ ऊर्वोर्मे ओजोडस्तु । (दोनों जंघाओं को)
ऊँ अरिष्टानि मेड़्रानि, तनूस्तन्वा में सह सन्तु (समस्त शरीर को)

आत्मशोधन की ब्रहम संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि साधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्घि होतथा मलिनाता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो । पवित्र प्रखर व्यक्ति ही भगतवान के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते है ।

देवपूजन – गायत्री उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतंभरा गायत्री है । उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें । भावना करें कि साधक की भावना के अनुरुप माँ गायत्री की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापिर हो रही है ।

ऊँ आयातु वरदे देवि । त्र्यक्षरे ब्रहमवादिनि ।
गायत्रिच्छन्दसां मातः, ब्रहृयोने नमोडस्तु ते ।। 3 ।।
श्री गायत्र्यै नमः । आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।
ततो नमस्कारं करोमि ।

गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है । सदगुरु के रुप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिनन्दन करते हुए उपासना की सफलता हेतु प्रार्थना के साथ गुरु आवाहन् निम्न मंत्रोच्चर के साथ करें ।

ऊँ गुरुब्रर्हमा गुरुविष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः ।
गुरुरेव परब्रहृ, तस्मै श्री गुरवे नमः ।। 1 ।।
अखन्डमणडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः ।। 2 ।।
मातृवत् लालयित्री च, पितृवत् मार्गदर्शिका ।
नमोडस्तु गुरु सत्तायै, श्रद्घा-प्रज्ञायुता च या ।। 3 ।।
ऊँ श्री गुपवे नमः । आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, धयायामि ।

माँ गायत्री व गुरुसत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापना हेतु पंचोपचार पूजन किया जाता है । इन्हें विधिवत् संपन्न करें । जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेघ प्रतीक के रुप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते है । एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पांचों को समर्पित करते चलें । जल का अर्थ है – नम्रता, सहृदयता । अंक्षत का अर्थ है – समयदान, अंशदान । पुष्प का अर्थ है – प्रसन्नता, आंतरिक उल्लास । धूप-दीप का अर्थ है – सुगंध व प्रकाश का वितरण, पुण्य परमार्थ तथा नैवेघ का अर्थ है – स्वभाव व व्यवहार में मधुरता, शालीनता का समावेश ।

ये पांचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिये किये जाते है । कर्मकांड के पीछे भावना महत्वपूर्ण है ।

3. जप – गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः पन्द्रह मिनट नियमित रुप से किया जाये, अधिक बन पड़े तो अधिक उत्तम । होंठ हिलते रहे, किंतु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें । जप प्रकि्या कषाय-कल्मषों-कसंस्कारों को धोने के लिये की जाती है ।
ऊँ भूर्भवः स्वः त्तसवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए भावना की जाए कि हम निरंतर पवित्र हो रहे है । दुर्वुद्घि की जगह सदबुद्घि की स्थापना हो रही है

4. ध्यान - जप तो अंग अवयव करते है, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है । साकार ध्यान में गायत्री माता के आँचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रुप से प्राप्त होने की भावना की जाती है । निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों के शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्घा-प्रज्ञा निष्ठा रुपी अनुदान उतरने की मान्यता परपक्व की जाती है । जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस कृत्य का महत्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है ।

5. सूर्याध्र्यदान – जप समाप्ति कके पश्चात् पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में अर्घ्य रुप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है ।

ऊँ सूर्यदेव । सहस्त्रांशो, तेजोराशे जगत्पते ।
अनुकम्पय मां भक्तया, गृहाणार्घ्य दिवाकर ।।
ऊँ सूर्याय नमः, आदित्याय नमः, भास्कराय नमः ।।

भावना यह करें कि जल आत्मसत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराट ब्रहृ का तथा हमारी सत्ता-संपदा समष्टि के लिये समर्पित विर्सजित हो रही है ।

नमस्कार एवं विसर्जन – इतना सब करने के बाद पूजा स्थल पर विदाई के लिये करबद्घ नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख लिया जाये । जप के लिये माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिये । सूर्योदय के दो घंटे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री उपासना की जा सकती है । मौन मानसिक जप चौबीस घंटे कभी किया जा सकता है । माला जपते समय तर्जनी उंगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें ।

ऊँ घौः शान्तिरन्तरिक्ष ऊँ शान्तिः, पृथिवि शान्तिरापः, शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्र्वेदेवाः, शान्तिब्रर्हशान्तिः, सर्व ऊँ शान्तिः, शान्तिरेवः, सा मा शान्तिरेधि ।। ऊँ शान्तिः, शान्तिः, शान्ति । सर्वारिष्ट-सुशान्तिभर्वतु ।।

प्रेम और भक्ति में हिसाब! ( According to the love and devotion! )

क पहुंचे हुए सन्यासी का एक शिष्य था, जब भी किसी मंत्र का जाप करने बैठता तो संख्या को खडिया से दीवार पर लिखता जाता। किसी दिन वह लाख तक की संख्या छू लेता किसी दिन हजारों में सीमित हो जाता। उसके गुरु उसका यह कर्म नित्य देखते और मुस्कुरा देते।

एक दिन वे उसे पास के शहर में भिक्षा मांगने ले गये। जब वे थक गये तो लौटते में एक बरगद की छांह बैठे, उसके सामने एक युवा दूधवाली दूध बेच रही थी, जो आता उसे बर्तन में नाप कर देती और गिनकर पैसे रखवाती। वे दोनों ध्यान से उसे देख रहे थे। तभी एक आकर्षक युवक आया और दूधवाली के सामने अपना बर्तन फैला दिया, दूधवाली मुस्कुराई और बिना मापे बहुत सारा दूध उस युवक के बर्तन में डाल दिया, पैसे भी नहीं लिये। गुरु मुस्कुरा दिये, शिष्य हतप्रभ!

उन दोनों के जाने के बाद, वे दोनों भी उठे और अपनी राह चल पडे। चलते चलते शिष्य ने दूधवाली के व्यवहार पर अपनी जिज्ञासा प्रकट की तो गुरु ने उत्तर दिया,

'' प्रेम वत्स, प्रेम! यह प्रेम है, और प्रेम में हिसाब कैसा? उसी प्रकार भक्ति भी प्रेम है, जिससे आप अनन्य प्रेम करते हो, उसके स्मरण में या उसकी पूजा में हिसाब किताब कैसा?'' और गुरु वैसे ही मुस्कुराये व्यंग्य से।

'' समझ गया गुरुवर। मैं समझ गया प्रेम और भक्ति के इस दर्शन को।

न्यायपूर्वक अर्जित धन का दान ही सुखदायी है ( Justly earned the money donated is comfortable )

तनाव को दूर भगाने के लिए सबसे बढिया तरीका है दान देना

 यायपूर्वक अर्जित धन का दान करना सुखदायी होता है। सबसे पहले मनुष्य को न्यायपूर्वक धन की प्राप्ति का उपाय जानना ही सूक्ष्म विषय है। उस धन को सत्पात्र की सेवा में अर्पण करना उससे भी श्रेष्ठ है। साधारण समय में दान देने की अपेक्षा उत्तम समय पर दान देना और भी अच्छा है, किंतु श्रद्धा का महत्व काल से भी ब़ढ़कर है।

आप भी सोचेंगे यह क्या बेहूदी बात हुई। दान देने से तनाव का क्या लेना देना? लेकिन लेना-देना है और बहुत गहरा लेना देना है। जिनके पास कुछ नहीं है क्या आपने कभी उतना तनावग्रस्त देखा है जितना उन्हें जिनके पास बहुत कुछ है। आप अध्ययन कर लीजिए जिसकी पाने की मानसिकता होती है वह हमेशा तनाव में रहता है। लेकिन जो कुछ पाना ही नहीं चाहता उसे कभी तनाव नहीं होता। कबीरदास कहते हैं-

चाह गयी चिंता मिटी मनुवा बेपरवाह
जिनको कछु न चाहिए, सोई शंहशाह

बात बहुत साधारण है। पाने की मानसिकता हमारे दुख का कारण है। जो जितना पाना चाहता है वह उतना ही दुखी रहता है। फिर आप सोचेंगे कि पाना न हुआ तो जीवन कैसे चले? फिर हमारे होने का मतलब क्या है? यह बात सही है इच्छा का विस्तार होता है तो संसार बनता है। और जब संसार बनता है तो दुख औऱ तनाव तो आयेंगे ही।

फिर इससे बचने का रास्ता क्या है? तनाव से बचने का एक ही रास्ता है आप चुपचाप दान करना शुरू कर दें। जिंदगी पाने और देने के समन्वय से चलती है। केवल पाते गये तो बहुत संकट हो जाएगा। भरते भरते आदमी खुद एक भार हो जाता है। इसलिए भरने के साथ साथ खाली होने की प्रकृया भी चलनी चाहिए। जितना मिल रहा है उसका एक निश्चित हिस्सा हमारे हाथ से लोगों तक पहुंचना भी चाहिए। आज हो यह रहा है कि हमारी पाने की प्रवृत्ति तो बनी हुई है लेकिन देने की मंशा खत्म हो गयी है।
आप एक प्रयोग करिए। रोज कुछ दान करना शुरू करिए। अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा। बस देना शुरू करिए। ज्यादा तर्क-वितर्क मत करिए। कुछ दिनों का प्रयोग मानकर इसे शुरू कर दीजिए। मान लीजिए कि यह आपकी साधना है। यही आपकी आराधना है। यही रामजी की पूजा है। एक सप्ताह ऐसा करके देखिए। आपको अपने व्यक्तित्व में क्रांतिकारी परिवर्तन नजर आयेगा। आप देखेंगे कि आपके दुख अपने आप कम होने लगे। आपको अब उतना तनाव भी नहीं रहता। अब आप अपनी समस्याओं को लेकर इतने परेशान भी नहीं रहते। मन में अंदर से एक आनंद प्रस्फुटित होना शुरू हो जाएगा।

ऐसा हो तो एक सप्ताह के प्रयोग के बाद इसे अपने जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना लीजिए। यह मत सोचिए कि आप कितना कमाते हैं। 100 रूपया रोज कमानेवाला भी महादानी हो सकता है और 100 हजार रूपये रोज कमानेवाला भी महा कंजूस। सवाल पैसे का नहीं है। सवाल है आपकी मानसिकता का। आपको अपनी मानसिकता का इलाज करना है। बुद्धि को वह अभ्यास करवाना है जिसे वह भूल चुका है। और इसी कारण उस बुद्धि ने आपके लिए तनाव के हजार रास्ते बना रखे हैं। इसलिए आप कितना पैसा दान करते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है। आप दान करते हैं यह महत्वपूर्ण है और आपके अपने लिए जरूरी भी।

वैसे तो नियम है कि आप अपनी कमाई का 10 प्रतिशत दान दें लेकिन आपकी अपनी जरूरते शायद ज्यादा होंगी। इसलिए अपनी कमाई का एक प्रतिशत दान करना शुरू करिए। ध्यान रखिए यह नित्यप्रति होना चाहिए क्योंकि आप नित्यप्रति के हिसाब से ही कमाते हैं। अपनी कमाई का एक प्रतिशत समाज के कमजोर और निसहाय लोगों की मदद में खर्च करना शुरू करिए। कोई हल्ला नहीं। कोई प्रचार नहीं। क्योंकि यह काम आप अपने इलाज के लिए कर रहे हैं। क्या आप अपने इलाज का प्रोपोगंडा करते हैं क्या? आप खुद अनुभव करेंगे कि आप अंदर से कितने बड़े हो गये हैं। तनाव तो खोजे नहीं मिलेगा।

कहते हैं राजा रन्तिदेव के पास जब कुछ नहीं रह गया था तो उन्होंने शुद्ध हृदय से केवल जल का दान किया था। अन्यायपूर्वक प्राप्त हुए द्रव्य के द्वारा महान फल देने वाले ब़ड़े-ब़ड़े दान करने से धर्म को प्रसन्नता नहीं होती। धर्म देवता तो न्यायोपार्जित थो़ड़े से अन्न का श्रद्धापूर्वक दान करने से ही संतुष्ट होते हैं। राजा नृग ने विद्वानों (ब्राह्मणों) को हजारों गाएँ दान की थीं, किंतु एक ही गौ उन्होंने दूसरे को दान कर दी जिसे अन्यायतः प्राप्त द्रव्य दान करने के कारण उन्हें नरक में जाना प़ड़ा।

उशीनगर के राजा शिबि ने श्रद्धापूर्वक अपने शरीर का मांस देकर पुण्यात्माओं की गति प्राप्त की। न्यायपूर्वक एकत्रित किए हुए धन का दान करने से जो लाभ होता है वह बहुत-सी दक्षिणा वाले अनेक यज्ञ का अनुष्ठान करने से भी नहीं होता। यही कारण है कि संसार में अनेक लोग न्यायपूर्वक प्राप्त की हुई वस्तु प्राप्त होने के बाद भी प्रसन्नता से दान कर अमर हो गए हैं।

हर सच्चा कर्म पूजा है ( Every true act is prayer )

म अपने पूजाघर में बैठकर भगवान का भजन करते हैं और सोचते हैं कि हम भक्त हैं। हम मंदिर में बैठकर भजन-कीर्तन करते हैं और हमें लगता है कि हम भक्त हैं। लोगों के साथ मिलकर हम धार्मिक आयोजन करते हैं और हम समझते हैं कि हम भक्त हैं।

ये सब धारणाएँ सही हैं, पर भक्ति की एक और भी अवस्था है, जिसे सही मायने में सच्ची भक्ति कहा जा सकता है। और वह है-ईश्वर को पूजाघर, मंदिर और धार्मिक आयोजनों के बाहर भी देखना। यदि यह सही है कि यह जगत ईश्वर से ही निकला है और उसी में स्थित है, तब इस संसार में ऐसा कुछ नहीं है,जो ईश्वर से रहित हो।

संसार में सर्वत्र वही रमा है और उसकी भक्ति जैसे पूजाघर, मंदिर और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से की जा सकती है, वैसे ही अपने हर कर्म के माध्यम से भी की जा सकती है। इस प्रकार सच्ची भक्ति की अवस्था वह है, जहाँ हमारा प्रत्येक कार्य भगवान की पूजा बन जाता है।

और जब व्यक्ति का हर कर्म पूजा बन जाता है तब उसके लिए मंदिर और प्रयोगशाला में भेद नहीं रह जाता। भगिनी निवेदिता 'विवेकानंद साहित्य' की भूमिका में लिखती हैं- 'यदि एक और अनेक सचमुच एक ही सत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं, तो केवल उपासना के ही विविध प्रकार नहीं वरन सामान्य रूप से कर्म के भी सभी प्रकार, संघर्ष के भी सभी प्रकार, सृजन के भी सभी प्रकार, सत्य साक्षात्कार के मार्ग हैं।

अतः लौकिक और धार्मिक में आगे कोई भेद नहीं रह जाता। कर्म करना ही उपासना है। विजय प्राप्त करना ही त्याग है। स्वयं जीवन ही धर्म है। विदेशों की यात्रा से लौटने के बाद रामेश्वरम्‌ के मंदिर में भाषण देते हुए स्वामी विवेकानंद ने भक्ति की व्याख्या करते हुए कहा था -'वह मनुष्य जो शिव को निर्धन, दुर्बल तथा रुग्ण व्यक्ति में देखता है, वही सचमुच शिव की उपासना करता है, परंतु यदि वह उन्हें केवल मूर्ति में देखता है, तो कहा जा सकता है कि उसकी उपासना अभी नितांत प्रारंभिक ही है।

यदि किसी मनुष्य ने किसी एक निर्धन मनुष्य की सेवा-सुश्रूषा बिना जाति-पाँति अथवा ऊँच-नीच के भेदभाव के, यह विचार कर की है कि उसमें साक्षात्‌ शिव विराजमान हैं तो शिव उस मनुष्य से दूसरे एक मनुष्य की अपेक्षा, जो कि उन्हें केवल मंदिर में देखता है, अधिक प्रसन्ना होंगे।'

आगे उन्होंने कहा था- 'जो व्यक्ति अपने पिता की सेवा करना चाहता है, उसे अपने भाइयों की सेवा सबसे पहले करनी चाहिए। इसी प्रकार जो शिव की सेवा करना चाहता है, उसे उसकी संतान की, विश्व के प्राणीमात्र की पहले सेवा करनी चाहिए। शास्त्रों में भी कहा गया है किजो भगवान के दासों की सेवा करता है, वही भगवान का सर्वश्रेष्ठ दास है।' यही सच्ची भक्ति का स्वरूप है।

धर्मों में ॐ उच्चारण का महत्व

हिंदू या सनातन धर्म की धार्मिक विधियों के प्रारंभ में 'ॐ' शब्द का उच्चारण होता है, जिसकी ध्वनि गहन होती है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। प्राचीन भारतीय धर्म विश्वास के अनुसार ब्रह्मांड के सृजन के पहले प्रणव मंत्र का उच्चारण हुआ था। ॐ का हिंदू धर्म के अलावा अन्य धर्मों में भी महत्व है।

योगियों में यह विश्वास है कि इसके अंदर मनुष्य की सामान्य चेतना को परिवर्तित करने की शक्ति है। यह मंत्र मनुष्य की बुद्धि व देह में परिवर्तन लाता है। ॐ से शरीर, मन, मस्तिष्क में परिवर्तन होता है और वह स्वस्थ हो जाता है। ॐ के उच्चारण से फेफड़ों में, हृदय में स्वस्थता आती है। शरीर, मन और मस्तिष्क स्वस्थ और तनावरहित हो जाता है। ॐ के उच्चारण से वातावरण शुद्ध हो जाता है।

ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है। जिनका उच्चारण एक के बाद एक होता है। ओ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है, जिसके अनुसार साधक या योगी इसका उच्चारण ध्यान करने के पहले व बाद में करता है। ॐ 'ओ' से प्रारंभ होता है जो चेतना के पहलेस्तर को दिखाता है। चेतना के इस स्तर में इंद्रियाँ बहिर्मुख होती हैं। इससे ध्यान बाहरी विश्व की ओर जाता है। चेतना के इस अभ्यास व सही उच्चारण से मनुष्य को शारीरिक व मानसिक लाभ मिलता है।

आगे 'उ' की ध्वनि आती है, जहाँ पर साधक चेतना के दूसरे स्तर में जाता है। इसे तेजस भी कहते हैं। इस स्तर में साधक अंतर्मुखी हो जाता है और वह पूर्व कर्मों व वर्तमान आशा के बारे में सोचता है। इस स्तर पर अभ्यास करने पर जीवन की गुत्थियाँ सुलझती हैं व उसे आत्मज्ञान होने लगता है। वह जीवन को माया से अलग समझने लगता है। हृदय, मन, मस्तिष्क शांत हो जाता है।

'म' ध्वनि के उच्चार से चेतना के तृतीय स्तर का ज्ञान होता है, जिसे 'प्रज्ञा' भी कहते हैं। इस स्तर में साधक सपनों से आगे निकल जाता है व चेतना शक्ति को देखता है। साधक स्वयं को संसार का एक भाग समझता है और इस अनंत शक्ति स्रोत से शक्ति लेता है। इसके द्वारा साक्षात्कार के मार्ग में भी जा सकते हैं। इससे साधक के शरीर, मन, मस्तिष्क के अंदर आश्चर्यजनक परिवर्तन आता है। शरीर, मन, मस्तिष्क, शांत होकर तनावरहित हो जाता है।

ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। साधक बैठने में असमर्थ हो तो लेटकर भी इसका उच्चारण कर सकता है। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।

नियम वो जिससे भगवान प्रसन्न हों

बात उन दिनों की है जब महाराज युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ पर राज्य करते थे। राजा होने के नाते वे काफी दान आदि भी करते थे। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दानवीर के रूप में फैलने लगी और पांडवों को इसका अभिमान होने लगा।

कहते हैं कि भगवान दर्पहारी हैं। अपने भक्तों का अभिमान तो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। एक बार कृष्ण इंद्रप्रस्थ पहुंचे। भीम व अर्जुन ने युधिष्ठिर की प्रशंसा शुरू की कि वे कितने बड़े दानी हैं। तब कृष्ण ने उन्हें बीच में ही टोक दिया और कहा, लेकिन हमने कर्ण जैसा दानवीर और नहीं सुना। पांडवों को यह बात पसंद नहीं आई। भीम ने पूछ ही लिया, कैसे? कृष्ण ने कहा कि समय आने पर बतलाऊंगा।

बात आई गई हो गई। कुछ ही दिनों में सावन प्रारंभ हो गया व वर्षा की झड़ी लग गई। उस समय एक याचक युधिष्ठिर के पास आया और बोला, महाराज! मैं आपके राज्य में रहने वाला एक ब्राह्मण हूं और मेरा व्रत है कि बिना हवन किए कुछ भी नहीं खाता-पीता। कई दिनों से मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है। यदि आपके पास हो तो, मुझ पर कृपा करें, अन्यथा हवन तो पूरा नहीं ही होगा, मैं भी भूखा-प्यासा मर जाऊंगा।

युधिष्ठिर ने तुरंत कोषागार के कर्मचारी को बुलवाया और कोष से चंदन की लकड़ी देने का आदेश दिया। संयोग से कोषागार में सूखी लकड़ी नहीं थी। तब महाराज ने भीम व अर्जुन को चंदन की लकड़ी का प्रबंध करने का आदेश दिया। लेकिन काफी दौड़- धूप के बाद भी सूखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई। तब ब्राह्मण को हताश होते देख कृष्ण ने कहा, मेरे अनुमान से एक स्थान पर आपको लकड़ी मिल सकती है, आइए मेरे साथ।

ब्राह्मण की आखों में चमक आ गई। भगवान ने अर्जुन व भीम को भी इशारा किया, वेष बदलकर वे भी ब्राह्मण के संग हो लिए। कृष्ण सबको लेकर कर्ण के महल में गए। सभी ब्राह्मणों के वेष में थे, अत: कर्ण ने उन्हें पहचाना नहीं। याचक ब्राह्मण ने जाकर लकड़ी की अपनी वही मांग दोहराई। कर्ण ने भी अपने भंडार के मुखिया को बुलवा कर सूखी लकड़ी देने के लिए कहा, वहां भी वही उत्तर प्राप्त हुआ।

ब्राह्मण निराश हो गया। अर्जुन-भीम प्रश्न-सूचक निगाहों से भगवान को ताकने लगे। लेकिन वे अपनी चिर-परिचित मुस्कान लिए बैठे रहे। तभी कर्ण ने कहा, हे देवता! आप निराश न हों, एक उपाय है मेरे पास। उसने अपने महल के खिड़की-दरवाजों में लगी चंदन की लकड़ी काट-काट कर ढेर लगा दी, फिर ब्राह्मण से कहा, आपको जितनी लकड़ी चाहिए, कृपया ले जाइए। कर्ण ने लकड़ी पहुंचाने के लिए ब्राह्मण के साथ अपना सेवक भी भेज दिया।

ब्राह्मण लकड़ी लेकर कर्ण को आशीर्वाद देता हुआ लौट गया। पांडव व श्रीकृष्ण भी लौट आए। वापस आकर भगवान ने कहा, साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपने सर्वस्व को त्याग देने का ही नाम दान है। अन्यथा चंदन की लकड़ी के खिड़की-द्वार तो आपके महल में भी थे।

इस कहानी का तात्पर्य यह है कि हमें ऐसे कार्य करने चाहिए कि हम उस स्थिति तक पहुंच जाएं जहां पर स्वाभाविक रूप से जीव भगवान की सेवा करता है। हमें भगवान को देखने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने को ऐसे कार्यों में संलग्न करना चाहिए कि भगवान स्वयं हमें देखें। केवल एक गुण या एक कार्य में अगर हम पूरी निष्ठा से अपने को लगा दें, तो कोई कारण नहीं कि भगवान हम पर प्रसन्न न हों। कर्ण ने कोई विशेष कार्य नहीं किया, किंतु उसने अपना यह नियम भंग नहीं होने दिया कि उसके द्वार से कोई निराश नहीं लौटेगा।

श्रीकृष्ण का कर्म संदेश

भादों की अष्टमी थी। मूसलाधार पानी बरस रहा था। यमुना में बाढ़ आ गई थी, पूरे उफान पर थी यमुना। ऐसी भयंकर बारिश में कौन कहाँ जाएगा? इसीलिए सो गए थे सभी पहरेदार और जेल में जन्म दिया था, देवकी ने अपनी आठवीं संतान पुत्र को।

विलक्षण बात तो यह थी कि पुत्र के जन्म लेते ही खुल गए थे सभी बंधन माँ-बाप के। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब आँधी, तूफान ने जेल के बंद किवाड़ों को भी खोल दिया था। वासुदेव की आँखें चमक उठी थीं।

आनन-फानन वासुदेव ने अपने लाडले को कपड़े में लिपटाया और छिपा दिया था टोकरी में। टोकरी को वासुदेव ने धरा सिर पर और ले चले गोकुल-यमुना पार। पर यमुना तो विकराल बनी थी, पूरे उफान पर थी। वासुदेन न डरे और न रुके, चल पड़े यमुना में।

पहले उनके घुटनों तक पानी आया, फिर कमर तक, फिर छाती तक और फिर सिर तक आ गया। पर वासुदेव के पैर नहीं थमे, बढ़ते गए मंजिल की ओर। तभी एक चमत्कार हुआ। जैसे ही जल ने नन्हे के पाँव को छुआ, यमुना-मैया उतरने लगी।

वासुदेव की आँखें अपलक निहार रही थीं अपने दुलारे को। आँसू रुक नहीं रहे थे, भिगो रहे थे दोनों के तन-मन को। मन में भय था वासुदेव के, न जाने कब देख पाएँगे अपने दुलारे को। देख भी पाएँगे कभी या नहीं। पर मन में कहीं अटूट भरोसा था अपने सखा नंद पर, इसीलिए अपने पुत्र रत्न को जल्दी से यशोदा की गोद में डाल वे उल्टे पाँव ही लौट आए थे जेल में।

यशोदा की गोद भर गई थी। ढोलक की थाप और सोहर के गीतों से गूँज उठा था घर-द्वार और ग्वालिनों के लिए राग-रंग उत्सव, उल्लास का दिन था वह। भूल गई थीं वे दूध बिलौना और छछिया बेचना। सभी के कदम बढ़ गए थे यशोदा के द्वार पर, जहाँ कान्हा, झूल रहे थे।

ग्वालिनों में यशोदा निहाल हो गई थी पुत्र पाकर। वह आज गर्वीली सी थी। होती भी क्यों नहीं? घर आँगन भर गया था उसका, मनचाही खुशियों से। बाबा नन्द की खुशियों का पारावार ही न था वे तो मात्र हँस-हँस कर सबसे मिल रहे थे। उनकी वीणा तो मानो मूक हो गई थी।

इसी कान्हा ने दूध पीते-पीते पूतना के प्राण पी लिए थे। माखन चुराते-चुराते अपने सखाओं का मन जीत लिया था। डरा दिया था इसने यशोदा मैया को अपने मुख में ब्रह्मांड दिखाकर। पेड़ों पर उछल-कूद मचाते, कर दिया था इसने कालीनाग का मर्दन और उसके फन पर नृत्य करते मुस्कुराते हुए, यमुना नदी से बाहर आ गए थे विजयी मुद्रा में।

इसकी बंसी की धुन सुनकर गौएँ और गोपियाँ अपनी सुध-बुध भूल जाती थीं। हो जाती थीं गोपियाँ इसके महारास के रस में सराबोर। ऐसा था यशोदा मैया का छोरा कन्हैया। यही नटखट, माखनचोर, बंसी बजैया, कान्हा मथुरा में आकर बन गया कृष्ण।

महाभारत युद्ध में यही कृष्ण बना धनुर्धर अर्जुन का सारथी। कुरुक्षेत्र में युद्ध का शंखनाद हो चुका था। रणभेरी गूँज उठी थी, परंतु यह क्या? महारथी अर्जुन के हाथ-पाँव शिथिल होने लगे। मुँह सूखने लगा। शरीर में कँपकपी होने लगी। आँखें आँसुओं से भर आईं, मन विषाद से। हाथ से गांडीव सरककर जमीन पर गिर पड़ा, क्योंकि पृथा-पुत्र के मस्तिष्क पर छा गया था मोह।

देखा था परंतप अर्जुन ने विपक्ष में खड़े अपने दादा, परदादा, आचार्यों, मामाओं, पुत्र-पौत्रों, मित्रों, स्वजनों, परिजनों और बंधुजनों को। सोचने लगे कि जिनके हाथों ने मुझे झुलाया, जिनकी गोद में खेलकर मैं बड़ा हुआ, जिनके आश्रम में रहकर मैंने विद्या पाई, जिन्होंने मुझे धनुष-बाण चलाना सिखाया क्या उन्हीं से युद्ध करूँ?

इन्हें मारने से तो बेहतर होगा कि मैं भीख माँगकर खाऊँ। इन सभी के खून से लथपथ, सना हुआ राज्य लेकर मैं क्या करूँगा। चले गए थे विषादग्रस्त पार्थ, कृष्ण की शरण में शिष्य भाव से। ऐसे में श्रीकृष्ण ने समझाया था यूँ उस किंकर्तव्यविमूढ़ पार्थ को।

हे पार्थ! जो जन्मता है वह मरता है। जो मरता है वह जन्मता है। यह है प्रकृति का अटूट नियम। मनुष्य जैसे पुराने वस्त्रों को छोड़कर कर लेता है नए वस्त्र धारण वैसे ही देही पुराने शरीर को छोड़कर धारण कर लेता है नए शरीर को। न तो यह आत्मा जन्म लेती है और न मरती है।

आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गिरा सकता है, न वायु सुखा सकती है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य शाश्वत और सनातन है। जो आत्मा को मरने वाला समझता है, जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते कि न तो आत्मा मरती है और न ही मारी जाती है, इसीलिए सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को एक मानकर तुम युद्ध करो।

हे धनंजय! कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, उसके फलों में नहीं। तुम कर्मफल का कारण भी मत बनो। कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति नहीं होनी चाहिए। तुम योगस्थ होकर कर्म करो, क्योंकि सिद्धि-असिद्धि, हर्ष-विषाद में समभाव से रहना ही योग है। 'समत्वं योग उच्यते।' कर्मों की कुशलता ही योग है। 'योगः कर्मसु कौशलम्‌।'

इन्द्रियों को अंतर्मुखी कर, मन को संयमित और नियंत्रित कर, बुद्धि को स्थिर कर तुम 'स्थितप्रज्ञ' बनो। कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। तुम कर्मफल में आसक्त हुए बिना ही कर्म करो। कर्मों की गति गहन है।

कर्म संन्यास और कर्मयोग दोनों ही मुक्ति देने वाले हैं, परंतु कर्म संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है। कर्मफल में आसक्ति को त्यागकर कर्मों को ब्रह्म में समर्पित करके कार्य करना श्रेयस्कर है, कर्म करते हुए कर्मफलों को त्यागने से ही मनुष्य त्यागी बनता है।

हे नरश्रेष्ठ अर्जुन! प्रत्येक वर्ण के अपने-अपने कर्म हैं। पराक्रम, तेज, धर्म, चतुराई, युद्ध से मुँह न मोड़ना, दान और ईश्वरभाव ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! यदि अहंकार का आश्रय लेकर तुम यह समझते हो कि युद्ध नहीं करोगे तो तुम्हारा निश्चय व्यर्थ है, क्योंकि तुम्हारा क्षत्रिय स्वभाव तुम्हें युद्ध में प्रवृत्त करके ही रहेगा।

हे कौन्तेय! तुम मोह के कारण युद्ध नहीं करना चाहते, परंतु तुम अपने स्वभावज कर्म के कारण युद्ध करोगे। यूँ भी स्वधर्म में मरना श्रेयस्कर है। 'स्वधर्में निधनं श्रेयः' इसलिए सब धर्मों को त्यागकर तुम केवल मेरी शरण में आ जाओ। 'मामेकं शरणं व्रज।'

हे धनुर्धर अर्जुन! जो शोक करने के योग्य नहीं है उन बान्धवों के लिए तुम शोक कर रहे हो। मोह से उत्पन्न हुए शोक को तुम त्याग दो। तुम युद्ध करो। 'ततस्पाद् युध्यस्व भारत।' कर्म के इस संदेश को पार्थ ने सुना था।

योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुखारविन्द और वे प्रवृत्त हो गए थे अपने धर्म, अपने कर्म-युद्ध में। श्रीकृष्ण का यह कर्म संदेश सदियों से मानव पथ को आलोकित करता रहा है और इस नव सहस्राब्दी में भी करता रहेगा।