11 सितंबर 2010
शिल्पा शेट्टी ( Shilpa Shetty )
साल की उम्र में अपना एक्टिंग कैरियर शुरू करने वाली शिल्पा ने बौलीवुड को अनेक सफल फ़िल्में दी हैं। उन्होंने बतौर अभिनेत्री अपने कैरियर की शुरूआत 'फिल्म गाता रहे मेरा दिल' से की थी। इस फिल्म के बाद उन्हें 'बाजीगर' फिल्म में काम करने का ऑफर मिला और इस फिल्म के हिट होने के साथ की उन के भविष्य के रास्ते खुदबखुद खुलते गए।
जिस समय उन का कैरियर ढलान पर था उस समय वह बिग ब्रदर का खिताब जीत कर एक बार फिर दुनिया भर में सुर्ख़ियों में छा गईं।
8 जून, 1975 को कर्नाटक में जन्मी शिल्पा का निक नेम है मान्या, जबकि उन की माँ उन्हें बबूचा नाम से पुकारती हैं। शिल्पा की माँ सुनंदा और पिता सुरेन्द्र शेट्टी अपने समय के मशहूर मॉडल रह चुके हैं।
अवार्ड से सम्मानित
शिल्पा को 3 बार फिल्मफेयर के बेस्ट ऐक्ट्रेस अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। शिल्पा ने अनेक फ़िल्में की हैं जैसे 'आग', 'आओ प्यार करें', 'हथकड़ी', 'छोटे सरकार', 'जमीर: द अवेकनिंग ऑफ ए सोल', 'गैंबलर', 'धड़कन', 'डरना मना है', 'शादी कर के फंस गया यार' आदि.. फिल्म फिर मिलेंगे में उन की एक्टिंग को दर्शकों और फिल्म समीक्षकों ने विशेष रूप से सराहा। इस फिल्म के लिये उन्हें बेस्ट ऐक्ट्रेस अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। इस के अलावा उन्हें 1998 में आई फिल्म 'परदेसी' के लिये जी गोल्ड बौलीवुड बेस्ट सपोर्टिंग अवार्ड भी प्रदान किया गया।
फिल्म और टीवी के अलावा उन का नाम क्रिकेट से भी जुडा है। वह राजस्थान रायल्स की सह मालकिन हैं और क्रिकेट में गहरी रुचि रखती हैं। शिल्पा आज अनेक महिलाओं की आइडियल बन चुकी हैं जिन्होंने अपनी मेहनत और संघर्षों से जूझते हुए अपने रास्ते खुद तलाशे हैं। शिल्पा के साथ अनेक विवाद जुड़े हैं।
रिचर्ड गेरे और शिल्पा के किस का मामला लम्बे समय तक सुर्ख़ियों में रहा। वहीं शिल्पा के पेरेंट्स को जबरदस्ती वसूली की धमकी भरे फोन करवाने के भी चर्चे सुर्ख़ियों में रहे। प्रफुल्ल साडी के मालिक पंकड़ अग्रवाल ने आरोप लगाया था की शिल्पा के पेरेंट्स ने उसे मुंबई अंडरवर्ल्ड गैंग से जबरन वसूली के लिये धमकाया। क्योंकि उस के पेरेंट्स का कहना था की शिल्पा ने प्रफुल्ल साडी के लिये जो मॉडलिंग असाइंमेंट साइन किया था उस के लिये शिल्पा को 3 करोड़ रूपये अदा करने की बात थी जबकि उसे मात्रा 50 लाख रूपये ही दिए गए। लेकिन पंकज अग्रवाल का कहना था की वह शिल्पा को एडवांस में ही पूरी रकम दे चुके हैं। इस विवाद से शिल्पा काफी परेशानियों में घिर गई थीं।
Posted by Udit bhargava at 9/11/2010 02:41:00 pm 1 comments
राखी सावंत ( Rakhi Sawant )
लीवुड की आइटम गर्ल यानी राखी सावंत किसी परिचय की मुहताज नहीं हैं। इस का कारण यह है की उन्हें हमेशा सुर्ख़ियों में बने रहने का हुनर आता है। राखी सावंत और विवादों का चोलीदामन का साथ रहा है। कभी उन के बॉयफ्रेंड अभिषेक से उन का ब्रेकअप के कारण तो कभी मीका के चुम्बन विवाद से वे हमेशा लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचती रही हैं।
राखी ने फिल्मों में काम करने के बाद टीवी का रूख करते हुए कई शो किये, जिन से उन की लोकप्रियता खूब बढी। लेकिन 'राखी का स्वयंवर' शो के बाद घरघर में उन की चर्चा शुरू हो गई। यहाँ तक की उन्होंने टीवी पर स्वयंवर रचाने की नई प्रथा की शुरूआत की। राखी का जन्म 25 नवम्बर 1978 को मुंबई में हुआ। उन का नाम पहले कुट्टी सावंत था।
विवादों का साया
राखी सावंत में दूसरों का ध्यान आकर्षित करने की विशेष योग्यता है। उन्होंने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरूआत 1997 में 'अग्निचक्र' के साथ की। राखी के लिये यह कहना गलत नहीं होगा की हिट आइटम नंबरों और अलबमों में डांस की वजह से राखी आईटम डांसर के नाम से मशहूर हुईं।
इस के बाद फिल्मों में आइटम डांस के जरिये उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बना ली।
राखी सावंत का सब से विवादस्पद मुद्दा राखी और मीका चुम्बन रहा, जिस के बाद से विवादों ने उन का साथ नहीं छोड़ा। इस से पहले राखी का विवाद उन के बॉयफ्रैंड अभिषेक को ले कर रहा। काफी लम्बे समय तक राखी का अभिषेक के साथ अफेयर आखिरकार 'नच बलीए' शो के बाद ख़त्म हो गया।
बिग बौस रियलिटी शो में राखी सावंत का विवाद कश्मीरा शाह के साथ शुरू हुआ, जो अब तक चला आ राह है। अपने बडबोलेपन और तेज स्वभाव की वजह से आए दिन राखी किसी न किसी नए विवाद को जन्म दे देती हैं।
बनीं बिजनेस विमन
सेंसर बोर्ड ने राखी से कहा है की वे अपने ने अलबम के एक गीत से 'कमीनी' शब्द को हटाएं। इस बारे में राखी सावंत का कहना है की जब सेंसर बोर्ड एक पूरी फिल्म 'कमीने' को रिलीज होने दे सकता है तो मेरे वीडियो अलबम से उन्हें क्या दिक्कत है।
विवादों और रियालिते शो में थकहार राखी आजकल बिजनेस विमन के नाम से जानी जा रही है। मुंबई में स्पा का बिजनेस शुरू कर चुकीं राखी अब प्रोडक्शन हाउस, डांस एकेडमी और रेकार्डिंग स्टूडियो भी खोलने जा रही हैं। इस स्टूडियो को ले कर अब राखी बड़ेबड़े सपने देख रही हैं। यही नहीं वे बाइबल पर सीरियल बनाए का फैसला भी कर चुकी हैं।
Posted by Udit bhargava at 9/11/2010 05:57:00 am 0 comments
10 सितंबर 2010
कुछ बातें नाखून के बारे में ( Some things about Nail )
आपके नाखूनों में और भी बहुत से रहस्य छिपे हैं, आपके नाखून आपके व्यक्तित्व, आपके स्वस्थ और आपकी समृद्धि के संबंध में भी बताते हैं। यदि अपने नाखूनों पर प्रकृति द्वारा अंकित शुभ संदेशों को पढ़ लें तो आप अपने जीवन को और अधिक सुखी बना सकते हैं।
वो कैसे, आइए जाने-
यदि किसी के नाखून बढे हुए हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि वह व्यक्ति बहुत ही आलसी और कामचोर है।
यदि नाखूनों में मेल भी है तो समझिये कि वह अत्यंत दुखी व्यक्ति है। लेकिन इसी के साथ ऐसे व्यक्ति का विशेष गुण यह है कि वह किसी को धोखा नहीं देना चाहता। वह अधिकतर चुप रहना चाहता है।
यदि आपके नाखून लाली दर्शा रहे हैं तो आप प्यार के मामले में बहुत ही भाग्यशाली हैं। आप प्यार दे सकते हैं, और प्यार पा सकते हैं।
यदि नाखूनों में सफेदी की चमक अधिक है तो इसका अर्थ है- दुर्भाग्य।
कभी-कभी यदि गुलाबी नाखून वाले व्यक्ति को देखें तो पायेंगे कि वह अपने वायदे निभाने में पका है, चाहे इन वायदों का संबंध पैसे से हो या प्यार-मुहब्बत के मामलों से हो।
किसी व्यक्ति को आप नाखून चबाते देखें तो समझ लें कि वह व्यक्ति अपनी जिन्दगी को भी यूं ही चबा रहा है, अर्थात गँवा रहा है और जीवन के संघर्ष में समय के साथ नहीं चल रहा, इसका अर्थ यह भी हुआ कि व्यक्ति का अपने ऊपर नियंत्रण नहीं है और तनाव में जी रहा है। ऐसा व्यक्ति अक्सर तनाव सम्बन्धी तकलीफें अपने बारे में बताता हुआ मिलेगा।
यदि कोई व्यक्ति बात करते हुए नाखूनों को चबाता भी जा राह है तो समझ लें कि उस व्यक्ति के मन में कुछ और है वह कह कुछ और रहा है।
कई प्रकार की रक्त संबंधी बीमारियों का पता नाखूनों द्वारा लगता है। जब कभी नाखूनों के नीचे खून के धब्बे उभरते नजर आएं तो समझ लें कि कोई रक्त संबंधी बीमारी हो गई है और चिकित्सक को दिखाएँ।
ह्रदय रोग से पीड़ित व्यक्ति की पहचान है कि उसके नाखून हलके नीले पद जाते हैं। यदि आपके नाखून सफेदी लिये हुए हैं तो समझ लें आपमें खून की कमी हो गई है और आप 'एनीमिक' हैं।
हम अपने नाखूनों को काटते हैं, घिसते हैं, उन्हें रूप देते हैं, सुन्दर बनाते हैं, लेकिन हमारे स्वस्थ में वे महत्वपूर्ण सूचनाएं देते हैं, जैसे- एनीमिक होने के साथ और विटामिनों की कमी के बारे में भी बताते हैं।
नाखूनों के संबंध में मजेदार बात यह है कि गर्मियों में वे अधिक तेजी से बढ़ते हैं।
नाखूनों के बढ़ने की औसत गति गर्मियों के मौसम में एक मास में एक इंच का आंठवा भाग बढ़ने की है। बीच की ऊंगली का नाखून अधिक तेजी से बढ़ता है, जबकि बाकी दो ऊँगलियाँ कम गति से बढती हैं। इनसे भी कम गति से अंगूठे और छोटी ऊंगली के नाखून बढ़ते हैं। यदि किसी दुर्घटनावश आपकी ऊंगली या अंगूठे का पूरा नाखून ही उतर जाए तो नया नाखून पूर्ण रूप से बढ़ने में लगभग आधा साल लग जाता है। यदि आप अपने नाखून कभी न काटें या उन्हें टूटने भी न दें और पचास वर्षों तक इसी प्रकार से बढ़ने दें तो उनकी औसत लम्बाई 6 फुट हो जायेगी।
Posted by Udit bhargava at 9/10/2010 05:14:00 pm 1 comments
इस खीरे में बड़े-बड़े गुण ( The Cucumbers large - large properties )
खीरा बहुत गुणकारी है, यह तो सभी जानते हैं। फिर भी खीरे के ऎसे कई गुण हैं, जिनसे हम अनजान हैं। आइए जानते हैं खीरे के कुछ ऎसे ही गुणों के विषय में...
खीरे में विटामिन-बी और कार्बोहाइड्रेट होता है, जो तुरंत एनर्जी देता है। यह फैट्स कम करता है। साथ ही यह सिरदर्द भगाने और मुंह की दुर्गन्ध दूर करने में भी काम आता है। इसे खाना डायबिटीज, किडनी, लीवर आदि की बीमारियों में भी लाभदायक है।
भोजन के साथ ही खीरा अन्य कार्यों में भी उपयोगी है। इससे आप स्टील के बर्तनों पर पड़े पुराने दाग मिटा सकते हैं। साथ ही यह कपड़ों से पेन के दाग मिटाने के काम भी आता है।
खीरे की तासीर ठंडी होती है। ऐसे में यह त्वचा के लिए काफी लाभदायक होता है। इसका रस चेहरे पर लगाने से चमक आती है। इसमें फाइटो केमिकल होता है, जिससे झुर्रियां कम होती हैं।
खीरे में विटामिन-बी, फोलिक एसिड, कैल्शियम, आयरन, मैगनीशियम, फासफोरस, मिनरल और जिंक जैसे कई तत्व होते हैं, जो हमारे शरीर के पोषण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
Labels: आहार
Posted by Udit bhargava at 9/10/2010 06:34:00 am 1 comments
09 सितंबर 2010
थकान से बचिए विश्राम करिए ( Do rested from fatigue Bacie )
यः यह देखा गया है कि जब मनुष्य थकता है तो वह तुरंत पोषक तत्व विटामिंस, खनिज लावण और टांनिक की गोलियों या पेय पदार्थों की ओर झुकता है। परन्तु इस प्रकार की विधियों से थकावट मिटती नहीं, दब जाती है। ज्योंही इन पोषक तत्वों को बंद किया जाता है, थकावट पहले से अधिक विकृत अवस्था में उभरकर सामने आ जाती है। अतः शारीरिक और मानसिक थकावट को प्राकृतिक ढंग से दूर किया जाए तो वे जड़ से दूर होती है दबती नहीं।
शारीरिक थकावट
थकावट दो प्रकार की होती है शारीरिक और मानसिक। मानव शरीर की रचना ऐसी होती है कि यदि उसके विभिन्न अवयवों से आवश्यकता एवं उसकी शक्ति से अधिक कार्य लिया जाए तो वे कुछ समय पश्चात विद्रोह कर बैठते हैं और परिणामतः शारीरिक थकावट बढ़ती जाती है। आवश्यकता एवं सामर्थ्य से अधिक कार्य करने के कारण शरीर के अवयवों के शिथिल हो जाने को हम शारीरिक थकावट कहते हैं।
मानसिक थकावट
मानसिक थकावट के अनेक कारण होते हैं- यदि किसी व्यक्ति को कोई ऐसा कार्य दे दिया जाए, जिसमे उसे रुचि न हो या वह काम उसकी कार्यक्षमता से अधिक हो तो वह व्यक्ति मानसिक थकावट महसूस करेगा। मानसिक थकावट का वैसे वास्तविक कारण है अव्यवस्थित जीवन, अनावश्यक दौड-धूप और चिंतन से इसका जन्म होता है। थकावट के अन्य मुख्य कारण हैं- कब्ज, गर्म और उत्तेजक पदार्थों का सेवन, सिर से रक्त की अधिकता, रक्त की अल्पता, अत्यधिक चिंतन, पौष्टिक आहार की कमी, असंतुलित भोजन, क्रोध, भय, चिंता, घृणा, ईर्ष्या-द्वेष तथा चिडचिडेपन की अधिकता, मानसिक थकावट के अन्य प्रमुख कारण हैं।
थकावट दूर करने के उपाय
यदि आप रोज थके-थके से रहते हैं तो सबसे पहले अपनी रोज की कार्यप्रणाली पर ध्यान देकर उसमें उचित परिवर्तन लाएं। अपनी कार्यक्षमता से अधिक कार्य न करें।
प्रत्येक कार्य को एक-एक कर निपटाइए। जब थकावट या ऊब महसूस करें तो काम बंद कर दीजिये।
अपने आहार पर विशेष ध्यान दें। पौष्टिक तत्वों, खनिज लवणों से भरपूर संतुलित और सात्विक भोजन की आदत डालें।
आवश्यकता से अधिक भोजन करने से लाभ के बजाय हानि ही होती है, क्योंकि पाचन-तंत्र उन्हें पचाने में असमर्थ रहते हैं और वह पचा-अधपचा आँतों में इधर-इधर जमा होकर विकार उत्पन्न करता है।
सप्ताह में एक बार उपवास अवश्य करें। किसी खुले, हवादार स्थान पर जाकर गहरी-गहरी साँसे लेकर छोड़ें। इससे आपको एकदम आराम महसूस होगा। वैसे भी स्वस्थ्य और शारीरिक सौंदर्य के लिये शुद्ध वायु सेवन बहुत जरूरी है।
जम्हाई या उबासी आने को लोग बहुधा आलस्य और थकावट का चिन्ह मानते हैं, परन्तु वास्तव में जम्हाई तब आती है जब फेफड़ों को सुचारू रूप से कार्य करने के लिये अतिरिक्त आक्सीजन की आवश्यकता पड़ती है।
कब्ज से बचिए तथा अपने आपको चिंताओं से मुक्त रखने का प्रयास कीजिये।
रात्री को प्रायः हल्का-सुपाच्य भोजन कीजिये और भोजन के बाद थोड़ा टहलिए।
सोने से पहले ठन्डे पानी से हाथ-मुंह, पैरों को अच्छी तरह धोइए। इससे अच्छी और गहरी नींद आयेगी और शरीर का तनाव दूर होगा।
गर्म, उत्तेजक, अधिक मिर्च-मसाले का भोजन मत कीजिये।
अधिक से अधिक हरी सभियों, मौसमी फलों का उपयोग कीजिये, जो सब्जियां कच्ची खाने लायक हों, उन्हें कच्चा ही खाइए।
पेट, आतों, फेफड़ों, नस-नाड़ियों आदि को विकारयुक्त रखने के लिये नियमित योग, व्यायाम-प्राणायाम की आदत डालिए। कुल मिलाकर 15-20 मिनट भी उचित ढंग से व्यायाम योग आदि कर लिया जाए तो काफी आराम होता है।
प्रतिदिन आंवला, नीम्बू या थोड़े से शहद का नियमित सेवन कीजिये।
शरीर की थकन मिटाने के लिये मालिश सबसे कारगर इलाज है। तेल मालिश से शरीर की मासपेशियों, नस-नाड़ियों क तनाव दूर होता है।
Posted by Udit bhargava at 9/09/2010 05:27:00 pm 0 comments
अनूठा है गुरु शिष्य का संबंध ( Unique master disciple relationship )
म संबंधों में एक इंसान अपने लिये, अपनी इच्छा अनुसार, अपने जैसा, अपने योग्य-अयोग्य, भला-बुरा आदि देख कर ही किसी को चुनता है, और संबंध बनाता है। प्रेम में इंसान बिना सोचे-समझे, किसी भी नफ़ा-नुकसान की चिंता के, किसी को चुनता नहीं है बल्कि किसी का हो जाता है। सामने वाले को ज्यों का त्यों हर बुराई-अच्छाई के साथ स्वीकार करता है और बिना किसी लोभ के संबंध बनाता है। एक मतलबी, चालाक व्यक्ति या राजनीतिज्ञ बहुत सोच समझकर किसी से संबंध बनाता है वह अपने से ऊंचे, ताकतवर या कामयाब आदि से संबंध बनाता है ताकि वह उसके काम आ सके, उसे अपनी सफलता का सोपान बना सके। तमाम तरह के संबंधों में से एक संबंध ऐसा भी है जो स्वयं में अद्भुत एवं पूजनीय है और वह है गुरू-शिष्य संबंध। यह एक ऐसा संबंध है जिससे जीवन के सारे द्वार खुल जाते हैं। यह एक ऐसा बंधन है जहाँ बंधन मुक्ति बन जाता है। न केवल संसार का बल्कि स्वयं का मोह भी पीछे छूट जाता है। यह बंधन जन्म-जन्म के बंधनों से शिष्य को स्वतंत्र कर देता है।
इस संबंध को और भी निराला बनाती है गुरू-शिष्य के बीच की असमानता। अर्थात जहाँ एक ओर अन्य संबंध अपने आपसी संबंधों में समानता तलाशते हैं वहीं गुरू-शिष्य संबंध में दोनों एक दूसरे के ठीक विपरीत होते हैं बल्कि असमान भी होते हैं। दोनों की अवस्था एवं स्तर में जमीन आसमान का अंतर होता है परन्तु यही अंतर दोनों के संबंध का आधार होता है। गुरू महाज्ञानी होता है तो शिष्य महामूढ़ होता है। गुरू मुक्त होता है, तो शिष्य बंधा होता है। गुरू देने वाला होता है तो शिष्य लेने वाला। इतनी असमानता होने के बावजूद भी दोनों में संबंध निर्मित होता है।
अन्य संबंधों में हर कोई स्वयं को ऊपर या श्रेष्ठ समझता है तथा अपने सामने वाले को हराना चाहता है। स्वयं की हार या नुकसान को कभी गले नहीं लगाना चाहता बल्कि अपनी हार या कमी को दूसरों के कंधे पर लाद देता है और अपनी हर असफलता के लिये दूसरे को जिम्मेदार ठहराता है परन्तु गुरू शिष्य संबंध में ऐसा नहीं है। जिस दिन गुरू अपने शिष्य से हार जाता है उस दिन उसका सीना गर्व से और चौड़ा हो जाता है। ठीक इसके विपरीत यदि शिष्य कहीं कोई गलती करता है या अपनी कमी के कारण लज्जित होता है तो गुरू स्वयं को जिम्मेदार पाता है। कमी अपने शिष्य में नहीं अपनी शिक्षा-दीक्षा में ढूँढता है।
अन्य सांसारिक संबंधों में हर इंसान पल प्रतिपल घुटता है, मरता है लेकिन किसी का शिष्य होकर इंसान पल-पल मिटता नहीं संवारता है, बल्कि बार-बार मिटने में ही वह बनाता है, सच तो यह है इस संबंध में इंसान का पुनर्जन्म होता है। गुरू के सानिध्य में आत्मिक रूपांतरण द्वारा इंसान को शिष्य के रूप में पुनःजीवन मिलता है। असली मुक्ति, असली जीवन या दूसरा जन्म का अवसर इंसान को इस संबंध से गुजर कर ही प्राप्त हो सकता है।
यह तो सभी जानते हैं कि शिष्य अपने गुरू से बहुत कुछ सीखता है तथा उसके निर्देशन में स्वयं को निखरता है। परन्तु इसी दीक्षा के दौरान गुरू भी स्वयं को मांझता रहता है। गुरू न केवल शिष्य की परीक्षाएं लेता है बल्कि स्वयं भी एक मूक, अद्रश्य परीक्षा से गुजरता रहता है। हर गुरू अपने हर शिष्य के साथ नए अनुभवों से गुजरता है और यहीं अनुभव गुरू को और भी ज्ञानी या परम ज्ञानी बनाते हैं। क्योंकि शिष्य के सवालों एवं जिज्ञासाओं को शांत करते-करते गुरू भी और निखरता रहता है। इसलिए जितना एक शिष्य एक अच्छा गुरू पाकर स्वयं को कृतज्ञ महसूस करता है, उतना ही एक गुरू भी एक अच्छा शिष्य पाकर स्वयं को धन्यभागी समझता है।
गुरू यदि अपने ज्ञान एवं अनुभव से गुरू बनाता तो शिष्य अपने समर्पण एवं सीखने के भाव से शिष्य बनता है। गुरू का ज्ञानी होना जरूरी है तो शिष्य का समर्पित होना जरूरी है। गुरू के देने एवं शिष्य के लेने के ढंग पर यह रिश्ता टिकता है। एक तरफ़ा यह संबंध नहीं टिक सकता। दोनों की समान रूप से प्रतिक्रया बहुत जरूरी है। गुरू चाहे कितना ही ज्ञानी हो यदि शिष्य ही मिटने को राजी नहीं है तो गुरू के ज्ञान का कोई लाभ नहीं। ठीक उसी तरह शिष्य कितना ही सच्चा या समर्पित शिष्य हो यदि गुरू ही नाम का गुरू निकले, ज्ञान का नहीं, तब भी सब व्यर्थ है।
सच्चे गुरू और सच्चे शिष्य का मिलाप ही इस संबंध की नींव है। बांटना एक कला है तो ग्रहण करना भी के हुनर है। यदि यह प्रमुख है कि गुरू क्या व कैसे बांटता है तो यह भी महत्वपूर्ण है कि शिष्य क्या, कैसे व कितना समझता है? गुरू के उपदेश में दम होना चाहिए तो शिष्य के अनुसरण में भक्ति। ताली दोनों हाथों से बजनी चाहिए ये नहीं कि बातें सुनी, कंठस्थ की और जीवन में नहीं उतारी। गुरू हर एक को शिष्य नहीं बनाता। गुरू पहले परिक्षा लेता है, परखता है तब किसी को अपना शिष्य बनाता है। गुरू अपने ज्ञान एवं गुणों से गुरू बनता है ठीक ऐसे ही शिष्य भी किसी का गुरू मंत्र लेने या किसी आश्रम में नियमित तौर में चक्कर काटने में शिष्य नहीं बनता, उसके स्वयं के सीखने की, झुकने की, मिटने की, नया होने की प्रबल इच्छा व लगन ही उसे सही मायने में शिष्य बनाती है।
आज के गुरू-शिष्य
आज टी.वी. खोलने की देर है आपको तमाम संत, गुरू आदि उपदेश देते दिख जायेंगे। लगता है कि गुरू बनाना, प्रवचन देना एक ट्रेंड सा बन गया है। कोई भगवे कपड़ों की आड़ ले रहा है तो कोई 'पर्सनेलिटी डेवलेपर' के मुखौटे में जनता को बदलने में लगा हुआ है। मजे की बात तो यह है कि गुरू बनने की ही होड़ नहीं लगी हुई शिष्य बनने की भी लोगों में एक अच्छी-खासी दौड़ जारी है।
शिष्य होना जैसे एक फैशन सा हो गया है। लोग भले ही गुरू का अनुसरण करे न करे, लेकिन उनके आसपास इकट्ठे होकर यह जरूर जता देते हैं कि उनसे बड़ा और सच्चा शिष्य कोई और नहीं है। गुरूओं के नाम पर लोग लड़ रहे हैं। एक पंथ दूसरे पंथ को नीचा दिखाने में तुला हुआ है। एक संस्थान दूसरी संस्थान की पोल खोलना चाहती है। हालत तो यह है कि गुरू-शिष्य एक दूसरे पर निर्भर हो गए हैं, दोनों की साझेदारी से ही दोनों की गाडी चलती है, तथा एक दूसरे की सहायता में ही एक दूसरे की भलाई है। शिष्य ज्यादा हैं तो गुरू को लाभ है और गुरू विख्यात है तो शिष्यों की चांदी हैं। संतुष्टि न शिष्य को न गुरू को। शिष्य गुरू होना चाहता है और गुरू भगवान् होना चाहता है। इसलिए न तो गुरू कहीं पहुंचता मालून होता है ना ही शिष्य।
Posted by Udit bhargava at 9/09/2010 11:36:00 am 3 comments
08 सितंबर 2010
बछेंद्री पाल ( Bachendri pal )
छेंद्री पाल वह शाख्शीयत है जिस ने बहुत ही कम उम्र में पर्वत शिखर एवरेस्ट की ऊंचाई को छुआ। इस ऊंचाई को छूने वाली दुनिया की 5वीं महिला और भारत की पहली महिला के रूप में भारतीयों का सिर ऊंचा किया। उत्तरकाशी की पैदाइश बछेंद्री पाल पहाड़ों की गोद में पलींबढीं। 1954 में पैदा हुई बछेंद्री बचपन से ही थोड़ी विद्रोही स्वभाव की थीं।
बछेंद्री के लिए पर्वतारोहण का पहला मौक़ा 12 साल की उम्र में आया, जब उन्होंने अपने स्कूल की सहपाठियों के साथ 400 मीटर की चढ़ाई की। यह चढ़ाई उन्होंने किसी योजनाबद्ध तरीके से नहीं की थी। दरअसल, वे स्कूल पिकनिक पर गई हुए थीं। चढ़ाई चढ़ती गईं। लेकिन तब तक शाम हो गई। जब लौटने का खयाला आया तो पता चला की उतरना सम्भव नहीं है। जाहिर है, रातभर ठहरने के लिये उन के पास पूरा इंतजाम नहीं था। बगैर भोजन और टैंट के उन्होंने खुले आसमान के नीचे रात गुजार दी।
बुलंद हौसला
मेधावी और प्रतिभाशाली होने के बावजूद उन्हें कोई अच्छा रोजगार नहीं मिला। जो मिला वह अस्थायी, जूनियर स्तर का था और वेतन भी बहुत कम था। इस से बछेंद्री को निराशा हुई और उन्होंने नौकरी करने के बजाय नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग कोर्स के लिये आवेदन कर दिया। यहाँ से बछेंद्री के जीवन को नई राह मिली। 1982 में एडवांस कैम्प के तौर पर उन्होंने गंगोत्री (6,672 मीटर) और रूदुगैरा (5,819) की चढ़ाई को पूरा किया। इस कैम्प में बछेंद्री को ब्रिगेडियर ज्ञान सिंह ने बतौर इंस्ट्रक्टर पहली नौकरी दी।
इस बीच 1984 में भारत का चौथा एवरेस्ट अभियान शुरू हुआ। दुनिया में अब तक सिर्फ 4 महिलाऐं एवरेस्ट की चढ़ाई में कामयाब हो पाई थीं।
1984 के इस अभियान में जो टीम बनी, उस में बछेंद्री समेत 7 महिलाओं और 11 पुरूषों को शामिल किया गया था। 1 बजे 29,028 फुट (8,848 मीटर) की ऊंचाई पर सागरमाथा (एवरेस्ट) पर भारत का झंडा लहराया गया। इस के साथ एवरेस्ट अपर सफलतापूर्वक कदम रखने वाले वे दुनिया की 5वीं महिला बनीं। केंद्र सरकार ने उन्हें पदमश्री से सम्मानित किया।
फिलहाल वे जमशेदपुर स्थित टाटा स्टील एडवेंचर फ़ौंडेशन की ओर से आयोजित एडवेंचर अभियान की प्रमुख हैं। यह कंपनी अभियान न सिर्फ जमशेदपुर में बल्की देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आयोजित करती है। रिवर क्रासिंग, रिवर राफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग से ले कर विभिन्न किस्म के अभियानों की वे मुखिया हैं।
Posted by Udit bhargava at 9/08/2010 09:17:00 am 0 comments






































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