24 जुलाई 2010

रामायण - अयोध्याकाण्ड - कैकेयी कोपभवन में ( Ramayana - Ayodhyakand - Kaackeyie in Kaophven )

राम के राजतिलक का शुभ समाचार आँधी की भाँति अयोध्या के घर-घर में पहुँच गया। सारा नगर प्रसन्नता से झूम उठा। प्रत्येक घर में मंगलाचार होने लगे। रातभर स्त्रियाँ मधुर कण्ठ से मंगलगान करती रहीं। सूर्योदय होते ही नगरनिवासी अपने-अपने घरों को वन्दनवार, ध्वाजा-पताका आदि से सजाने लगे। नाना प्रकार के सुगन्धित एवं रंग-रंग के पुष्पों से सजे हाट बाजारों की शोभा वर्णनातीत हो गई। नट, नर्तक, गवैया आदि अपने अद्भुत खेल दिखाकर पुरवासियों का मनोरंजन करने लगे। स्थान-स्थान पर कदली-स्तम्भों के द्वार बनाये गये। ऐसा प्रतीत होता था कि अयोध्या नगरी नववधू की भाँति ऋंगार कर राम के रूप में वर के आगमन की प्रतीक्षा कर रही है।

महारानी कैकेयी कि प्रिय दासी मंथरा के हृदय को रामचन्द्र के राजतिलक का समाचार सुनकर और नगर की इस अभूतपूर्व छटा को देखकर बड़ा आघात लगा। वह सोचने लगी कि कौशल्या का पुत्र राजा बनेगा तो कौशल्या राजमाता कहलायेगी। जब कौशल्या की स्थिति अन्य रानियों से श्रेष्ठ हो जायेगी तो उसकी दासियाँ भी अपने आपको मुझसे श्रेष्ठ समझने लगेंगीं। इस समय कैकेयी राजा की सर्वाधिक प्रिय रानी है। राजमहल पर एक प्रकार से उसका शासन चलता है। इसीलिये राजप्रासाद की सब दासियाँ मेरा सम्मान करती हैं। किन्तु कौशल्या के राजमाता बनने पर वे मुझे हेय दृष्टि से देखने लगेंगीं। उनकी उस दृष्टि को मैं कैसे सहन कर सकूँगी। नहीं, यह सब कुछ मैं नहीं सह सकूँगी। मुझे इस विषय में अवश्य कुछ करना चाहिये।

मंथरा ने महल में लेटी हुई महारानी कैकेयी के पास जाकर कहा, "महारानी! उठिये, यह समय सोने का नहीं है। क्या आपको पता है कि कल महाराज दशरथ राम का युवराज के रूप में अभिषेक करेंगे?" कैकेयी मंथरा से यह समाचार सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुईं और पुरस्कार के रूप में मंथरा एक बहुमूल्य आभूषण देते हुये बोलीं, "मंथरे! राम मुझे अत्यंत प्रिय है। तूने मुझे बड़ा प्रिय समाचार सुनाया है। यह आभूषण तो कुछ भी नहीं है, इस समाचार के लाने के लिये तू जो माँगेगी मैं तुझे दूँगी।" यह सुन कर मंथरा क्रोध से जल-भुन गई। कैकेयी द्वारा दिये गये आभूषण को फेंकते हुये उसने कहा, "रानी आप बड़ी नादान हैं। यह मत भूलिये कि सौत का बेटा शत्रु होता है। कौशल्या का अभ्युदय होगा और उसके राजमाता बन जाने पर आप उसकी दासी बन जायेंगी। आपके पुत्र भरत को भी राम की दासता स्वीकर करनी पड़ेगी। भरत के प्रभुत्व का विनाश होने पर आपकी बहू भी एक दासी का जीवन व्यतीत करेगी।" मंथरा की इस बात पर कैकेयी बोली, "मंथरा तू यह समझने का प्रयत्न क्यों नहीं करती कि राम महाराज के बड़े पुत्र हैं और सद्गुणों में सब भाइयों से श्रेष्ठ हैं। राम और भरत में अत्यधिक प्रेम भी है और राम को राज्य मिलने का अर्थ है भरत को राज्य मिलना क्योंकि वे सब भाइयों को अपने ही समान समझते हैं।"

कैकेयी के इन वचनों ने मंथरा को और भी दुःखी कर दिया। वह बोली, "रानी! आप यह बात क्यों भूल जाती हैं कि राम के बाद राम का पुत्र ही अयोध्या के राजसिंहासन का अधिकारी होगा। इस प्रकार भरत राज परम्परा से अलग हो जायेंगे। याद रखिये कि राज्य मिल जाने के बाद राम भरत को राज्य से निर्वासित कर देंगे। सम्भव है कि वे भरत को यमलोक ही भेज दें।" मंथरा के मुख से भरत के अनिष्ट की आशंका की बात सुनकर कैकेयी विचलित हो उठी। उसने मंथरा से पूछा, "ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिये?" मंथरा बोली, "सम्भवतः आपको स्मरण होगा कि एक बार देवासुर संग्राम के समय आपको साथ लेकर आपके पति युद्ध में इन्द्र की सहायता करने के लिये गये थे। उस युद्ध में असुरों ने अस्त्र-शस्त्रों से महाराज दशरथ के शरीर को जर्जर कर दिया था और वे मूर्छित हो गये थे। आपने सारथी बन कर उनकी रक्षा की थी जिसके बदले में उन्होंने आपसे दो वरदान मांगने के लिये कहा था। इस पर आपने कह दिया था कि जब कभी मुझे आवश्यकता होगी मैं इन वरदानों को माँग लूँगी। अब उन वरदानों को माँगने का अवसर आ गया है। आप एक वर से भरत का राज्याभिषेक और दूसरे वर से राम के लिये चौदह वर्ष तक का वनवास माँग लीजिये। इस कार्य की सिद्धि के लिये आप मैले-कुचैले वस्त्र पहन कर कोपभवन में जाकर बिना बिस्तर बिछाये भूमि पर लेट जाइये। आपको दुःखी और कुपित देखकर महाराज आपको मनाने का प्रयत्न करेंगे। आप उसी समय अपने दोनों वर माँग लीजिये। वर माँगने के पूर्व उनसे वचन अवश्य ले लेना क्यों कि वचन देने के पश्चात् वे दोनों वरदानों को देने के लिये बाध्य हो जायेंगे।"

मंथरा का परामर्श मानकर कैकेयी ने ऐसा ही किया और कोपभवन में जाकर लेट गई।

23 जुलाई 2010

परिक्रमा ब्रज चौरासी कोस की ( Braj Parikrama of abusing 84 )

ब्रज भूमि भगवान् श्रीकृष्ण एवं उनकी शक्ति राधा रानी की लीला भूमि है। यह चौरासी कोस की परिधि में फैली हुई है। यहां पर राधा-कृष्ण ने अनेकानेक चमत्कारिकलीलाएं की हैं। सभी लीलाएं यहां के पर्वतों, कुण्डों, वनों और यमुना तट आदि पर की गई। पुराणों में ब्रज भूमि की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। ऐसा माना जाता है कि राधा-कृष्ण ब्रज में आज भी नित्य विराजते हैं। अतएव, उनके दर्शन के निमित्त भारत के समस्त तीर्थ यहां विराजमान हैं। यही कारण है कि इस भूमि के दर्शन करने वाले को कोटि-कोटि तीर्थो का फल प्राप्त होता है। ब्रज रज की आराधना करने से भगवान् श्री नन्द नन्दन व श्री वृषभानुनंदिनी के श्री चरणों में अनुराग की उत्पत्ति व प्रेम की वृद्धि होती है। साथ ही ब्रज मण्डल में स्थित श्रीकृष्ण लीला क्षेत्रों के दर्शन मात्र से मन को अभूतपूर्व सुख-शांति व आनन्द की प्राप्ति होती है। इसीलिए असंख्य रसिक भक्त जनों ने इस परम पावन व दिव्य लीला-भूमि में निवास कर प्रिया-प्रियतम का अलौकिक साक्षात्कार करके अपना जीवन धन्य किया है। वस्तुत:इस भूमि का कण-कण राधा-कृष्ण की पावन लीलाओं का साक्षी है। यही कारण है कि समूचे ब्रज मण्डल का दर्शन व उसकी पूजा करने के उद्देश्य से देश-विदेश से असंख्य तीर्थ यात्री यहां वर्ष भर आते रहते हैं। ब्रज चौरासी कोस में उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले के अलावा हरियाणा के फरीदाबाद जिले की होडलतहसील और राजस्थान के भरतपुरजिले की डीगव कामवनतहसील का पूरा क्षेत्रफल आता है। ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा के अंदर 1300से अधिक गांव, 1000सरोवर, 48वन, 24कदम्ब खण्डियां,अनेक पर्वत व यमुना घाट एवं कई अन्य महत्वपूर्ण स्थल हैं। ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा वर्ष भर चलती रहती हैं, किंतु दीपावली से होली तक मौसम की अनुकूलता के कारण प्रमुख रूप से चलती है। इन पद यात्राओं में देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों तीर्थ यात्री जाति, भाषा और प्रान्त की सीमाओं को लांघ कर प्रेम, सौहा‌र्द्र,श्रद्धा, विश्वास, प्रभु भक्ति और भावनात्मक एकता आदि अनेक सद्गुणों के जीवन्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। साथ ही ब्रज संस्कृति से वास्तविक साक्षात्कार भी होता है। इन यात्राओं में राधा-कृष्ण लीला स्थली, नैसर्गिक छटा से ओत-प्रोत वन-उपवन, कुंज-निकुंज, कुण्ड-सरोवर, मंदिर-देवालय आदि के दर्शन होते हैं। इसके अलावा सन्त-महात्माओं और विद्वान आचार्यो आदि के प्रवचन श्रवण करने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। पुराणों में ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा का विशेष महत्व बताया गया है। कहा गया है, ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा को लगाने से एक-एक कदम पर जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह भी कहा गया है, ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा चौरासी लाख योनियों के संकट हर लेती है।

शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस परिक्रमा के करने वालों को एक-एक कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। साथ ही जो व्यक्ति इस परिक्रमा को लगाता है, उस व्यक्ति को निश्चित ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। गर्ग संहिता में कहा गया है कि एक बार नन्द बाबा व यशोदा मैया ने भगवान् श्रीकृष्ण से चारों धामों की यात्रा करने हेतु अपनी इच्छा व्यक्त की थी। इस पर भगवान् श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि आप वृद्धावस्था में कहां जाएंगे! मैं चारों धामों को ब्रज में ही बुलाए देता हूं। भगवान् श्रीकृष्ण के इतना कहते ही चारों धाम ब्रज में यत्र-तत्र आकर विराजमान हो गए। तत्पश्चात यशोदा मैया व नन्दबाबाने उनकी परिक्रमा की। वस्तुत:तभी से ब्रज में चौरासी कोस की परिक्रमा की शुरुआत मानी जाती है। यह परिक्रमा पुष्टि मार्गीयवैष्णवों के द्वारा मथुरा के विश्राम घाट से एवं अन्य सम्प्रदायों के द्वारा वृंदावन में यमुना पूजन से शुरू होती है। ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा लगभग 268कि.मी. अर्थात् 168मील की होती है। इसकी समयावधि 20से 45दिन की है। परिक्रमा के दौरान तीर्थयात्री भजन गाते, संकीर्तन करते और ब्रज के प्रमुख मंदिरों व दर्शनीय स्थलों के दर्शन करते हुए समूचे ब्रज की बडी ही श्रद्धा के साथ परिक्रमा करते हैं।
कुछ परिक्रमा शुल्क लेकर, कुछ नि:शुल्क निकाली जाती हैं। एक दिन में लगभग 10-12कि.मी. की परिक्रमा होती है। परिक्रमार्थियोंके भोजन व जलपान आदि की व्यवस्था परिक्रमा के साथ चलने वाले रसोडोंमें रहती है। परिक्रमा के कुल जमा 25पडाव होते हैं। आजकल समयाभाव व सुविधा के चलते वाहनों के द्वारा भी ब्रज चौरासी कोस दर्शन यात्राएं होने लगी हैं। इन यात्राओं को लक्जरी कोच बसों या कारों से तीर्थयात्रियों को एक हफ्ते में समूचे ब्रज चौरासी कोस के प्रमुख स्थलों के दर्शन कराए जाते हैं। यात्राएं प्रतिदिन प्रात:काल जिस स्थान से प्रारम्भ होती हैं, रात्रि को वहीं पर आकर समाप्त हो जाती हैं।

अगर सिरदर्द हो रूममेट ( If the headache Roommate )

हरप्रीत कौर सियान उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर की हैं और पिछले 2 सालों से दिल्ली में रह कर चार्टर्ड एकाउंटेंट का कोर्स कर रही हैं। वह दिल्ली के लक्ष्मी नगर के एक प्राइवेट गर्ल्स होस्टल में रहती हैं? हरप्रीत अकेली नहीं, वह अपनी ही हमउम्र मेघा के साथ रूम शेयर करतीं हैं। यह पूछे जाने की रूममेट के साथ रहते हुए किस तरह के अनुभव होते हैं। हरप्रीत कहती हैं, "रूममेट के साथ रहते हुए हमें पता होता है की हमने कुछ दिन अपने-अपने मकसद के लिये साथ रहना है।

इसलिए अगर आपस में हमारे किन्हीं बातों को लेकर मतभेद होते हैं तो व्यावहारिकता को ध्यान में रखते हुए उन मतभेदों की अनदेखी करणी पड़ती है। इसलिए कह सकते हैं की रूममेट के साथ रहना है तो वह अगर दोस्त न भी हो तो भी दोस्त की तरह ही उस के साथ रहना होता है। आखिरकार इस के पीछे पढाई, कैरियर या ऐसा ही कोई मकसद होता है।"

वास्तव में रूममेट भले ही जीवन के किसी मोड़ का बहुत थोड़े दिनों का ही साथी क्यों न हो, फिर भी वह इतना अस्थायी भी नहीं होता जितना की साथ में सफ़र करने वाला कोई यात्री।

रूममेट्स कैसे भी हो सकते हैं। शोर मचाने वाले, हमेशा चुप रहने वाले, कमरे को अस्तव्यस्त रखने वाले, चिपकू या दूसरों पर निर्भर रहने वाले, और भी न जाने कितनी अलग तरह की आदतों वाले रूममेट्स से यंग जनरेशन को सामना करना पड़ता है। कई स्टुडेंट्स का तो रूममेट्स के साथ रहने का अनुभव इतना कड़वा होता है की वे बड़ी मुशिकल से अपना समय गुजारते हैं। कई रूममेट्स की खराब आदतों के कारण दूसरे रूममेट्स को एडजस्ट करने में काफी परेशानी होती है।

आइए जाने, रूममेट्स के साथ किस-किस तरह की समस्याएँ हो सकती हैं और उन समस्याओं पर काबू पाने के लिए हमें क्या-क्या उपाय करने चाहिए:-
जो स्टुडेंट्स होस्टल में आवास की असुविधा पाने में असफल रहते हैं, उन्हें मजबूरन कालेज के आसपास ही अलग घर ले कर रहना पडा है। दिल्ली जैसे शहर मेंम जहाँ एक कमरे का किराया एक स्टुडेंट्स को देना भारी होता है, उसे अपने साथ दूसरे स्टुडेंट्स को देना भारी होता है, उसे अपने साथ एक स्टुडेंट्स को रखना मजबूरी होती है। यदि किसी का सामना ऐसे रूममेट्स से हो जाए, जो हर समय कमरे को अस्तव्यस्त रखते हों तो ऐसा रूममेट हर समय एक समाया बने रहते हैं, क्योंकि ऐसे लोग पूरे कमरे में खाना खाने के बात जूठे बर्तनों को फैला देते हैं। उन्हें गंदे कपडे के ढेर लगा कर लम्बे समय तक रखने की भी आदत होती है। इस में यदि दूसरा रूममेट भी ऐसा ही हो तो परेशानी नहीं होती। लेकिन व्यवस्थित व अनुशाषित ढंग से रहने वाले रूममेट को ऐसे रूममेट्स के साथ काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इस तरह के रूममेट्स से निबटने के लिये थोड़ा कडा रूख अख्तियार करना होगा, क्योंकि ऐसे लोग थोड़ी सख्ती से ही सही रह सकते हैं।

पर्सनल चीजों का इसेमाल 
घर से बाहर रेस्टोरेंट में खाना खाने के बाद अपना बिल न अदा करना, अपने हिस्से के किराए तमाम दूसरे खर्चों को देने में आनाकानी करने वाले रूममेट्स सिरदर्द होते हैं, ऐसे रूममेट्स से निबटने के लिये उन्हें पहले प्यार से समझाने का प्रयास करें की उन का अपने हिस्से का पैसा न देना, उन के दूसरे रूममेट्स के लिये कितनी बड़ी समस्या है। यदि वे अपनी आदत को नहीं सुधारते हों तो उन से किनारा कर लेने में ही भलाई है।

प्राइवेसी
एक रूममेट की अनुपस्थिति में दूसरे रूममेट का अपनी गर्लफ्रैंड/ बाँयफ्रैंड को रूम में आमंत्रित करना और स्वयं को सेक्स की गतिविधियों में संलग्न करना कई बार दूसरे रूममेट के लिये काफी परेशानी का विषय बन जाता है। इस विषय में भी दोनों रूममेट्स को समझदारी से काम लेना चाहिए।
बहरहाल, अगर आप स्टुडेंट्स हैं और स्कूल, कालेज या यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रह रहे हैं या फिर कैरियर बनाने के लिये किसी छोटे शहर से आए हैं और किराया शेयर करने के लिए साथी तालाश रहे हैं तो भी इस बात में झिझक की जरूरत नहीं है। अपनी गर्लफ्रैंड/ बाँयफ्रैंड को कमरे में आमंत्रित करने वाले रूममेट से साफ़ कह दें की वह उस की अनुपस्थिति में कमरे में इस तरह की गलत चीजों को करने से अपने आप को रोके, क्योंकि इस से मकान मालिक को भी आपत्ति हो सकती है और दोनों को वहां से बाहर किया जा सकता है।

रोमांचक सैक्सुअल लाइफ ( Thriller Sexual life )



शादी-शुदा जिन्दगी में सेक्स का अपना अलग महत्व है। सेक्स कोई जरूरत नहीं, एक-दूसरे के लिये वह प्यार है जो पति-पत्नी के रिश्ते को और अधिक गहरा बना देता है, यों बढाएं आपसी प्यार:

अलार्म क्लाक
अलार्म क्लाक से खेल खेलें। सेक्स करने से पहले टाइम सेट कर दें। सेक्स के दौरान जब यह अलार्म बजेगा तो दोनों में से एक अपनेआप को फ्रीज कर दे, साथ ही दूसरा उस के शरीर को एन्जॉय जरे। ऐसा दोनों बारीबारी से करें। इस तरह करने से आप की सेक्स की इच्छा और कैपिसिटी दोनों ही काफी बढ़ जाती हैं।

रोल प्लेइंग
इस गेम के जरिये आप बहुत कुछ अपने मन का कर सकती हैं। चाहे तो उन्हें स्ट्रिपटीज एक्ट के साथ रोमांटिक ड्रामा करने के लिये कहें या आप खुद उन की पसंद की सेक्सी ड्रेस पहन सकती हैं, साथ में कुछ नॉटी एक्ट भी हो जाए तो सौ फीसदी सम्भव है की आप के पार्टनर को फिर कुछ और तब तक नजर नहीं आयेगा जब तक आप नहीं चाहेंगी।

रंगों का महत्व
आँखों के द्वारा हमारे दिमाग को 75% जानकारी पहुँचती है। यह हम पर निर्भर करता है की हम अपनी जिन्दगी को किस तरह खुशनुमा बना सकते हैं। यदि आप अपने कमरे में कैंडल्स डेकोरेट करकर के बोर हो चुकी हैं तो आप इलेक्ट्रिक बल्ब कमरे में लगाएं, जो अलग अलग कलर्स में हो साथ ही कम वाट्स के हों। पर्पल कलर स्त्रियों में सेक्स को और अधिक बढ़ा देता है।

वनीला टी
यदि आप खाना खाने के बाद कुछ लेना चाहते हैं तो वनीला टी लें। एक सर्वेक्षण के अनुसार 342 व्यक्तियों में, जो नापुन्द्स्क थे, उन में भी वनीला लेने से कामोत्तेजना को बढ़ते हुए देखा गया। इसलिए वनीला लेने पर आप अपने पार्टनर के साथ सेक्स को और अधिक एन्जॉय कर सकेंगे।

रोले द डाइस
कागज़ पर दोनों पार्टनर नंबर के साथ काम लिख लीजिये, जैसे ही आप डाइस को घुमाएंगी, जो नंबर आयेगा, आप के पार्टनर को वही करना पडेगा। एक बार आप डाइस घुमाएंगी और एक बार वह। इसी तरह जितनी बार चाहें। डाइस घुमाती जाएं। डाइस घुमाने के बहाने आप वह करा सकती हैं जिसे कहते हुए आप को आज तक झिझक होती रही हैं।

सेक्स और खाने की हैबिट
सेक्स और खाने की हैबिट दोनों का एक दूसरे से काफी गहरा सम्बन्ध है। जिस तरह जल्दबाजी में खाया गया खाना लाभदायक नहीं होता, उसी तरह सेक्स के दौरान जल्दबाजी सही नहीं। इस से आप को पूरी तरह संतुष्टि नहीं मिल पाएगी। इसलिए सेक्स करें। लेकिन जल्दबाजी नहीं। फिर देखिएगा, आप को कितनी संतुष्टि मिलती है।

रामायण - अयोध्याकाण्ड - राजतिलक की तैयारी ( Ramayana - Ayodhyakand - Coronation preparation )

दूसरे दिन राजा दशरथ ने अपना दरबार लगाया जिसमें सभी देशों के राजा लोग उपस्थित थे। उन्हें सम्बोधत करते हुये दशरथ ने कहा, "हे राजागण! मैं आप सबका अपनी और अयोध्यावासियों की ओर से हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह तो आपको ज्ञात ही है कि इस अयोध्या पर कई पीढ़ियों से इक्ष्वाकु वंश का शासन चलता आ रहा है। इस परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये इसका शासन-भार मैं अपने सब प्रकार से योग्य, वीर, पराक्रमी, मेधावी, धर्मपरायण और नीतिनिपुण ज्येष्ठ पुत्र राम को सौंपना चाहता हूँ। मैंने अपनी प्रजा को सब प्रकार से सुखी और सम्पन्न बनाने का प्रयास किया है। अब वृद्ध होने के कारण मैं प्रजा के कल्याण के लिये अधिक सक्रिय रूप से कार्य करने में असमर्थ हूँ और मुझे विश्वास है कि राम अपने कौशल और सूझ-बूझ से प्रजा को मुझसे भी अधिक सुखी रख सकेगा। इस विचार को कार्यान्वित करने के लिये मैंने राज्य के ब्राह्मणों, विद्वानों एवं नीतिज्ञों से अनुमति ले ली है। वे सब सहमत हैं कि राम शत्रुओं के आक्रमणों से भी देश की रक्षा करने में सक्षम है। उसमें राजत्व के सभी गुण विद्यमान हैं। उनकी दृष्टि में राम अयोध्या का ही नहीं, तीनों लोकों का राजा होने की भी योग्यता रखता है। इस राज्य के लिये आप लोगों की सम्मति का भी महत्व कम नहीं है अतः मैं आप लोगों की सम्मति जानना चाहता हूँ।" इस पर वहाँ पर उपस्थित सभी राजाओं ने प्रसन्नता पूर्वक राम के राजतिलक के लिये अपनी सम्मति दे दी।

राजा दशरथ ने कहा, "आप लोगों की सम्मति पाकर मैं अत्यंत प्रसन्न हुआ हूँ। मेरा विचार है कि इस चैत मास - जो सब मासों में श्रेष्ठ मधुमास कहलाता है - में कल ही राम के राजतिलक के उत्सव का आयोजन किया जाय। मैं मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी से प्रार्थना करूँगा कि वे राम के राजतिलक की तैयारी का प्रबन्ध करें।" राजा दशरथ का निर्देश पाकर राजगुरु वशिष्ठ जी ने सम्बंधित अधिकारियों को आज्ञ दी कि वे यथाशीघ्र स्वर्ण, रजत, उज्वल माणिक्य, सुगन्धित औषधियों, श्वेत सुगन्धियुक्त मालाओं, लाजा, घृत, मधु, उत्तम वस्त्रादि एकत्रित करने का प्रबन्ध करें। चतुरंगिणी सेना को सुसज्जित रहने का आदेश दें। स्वर्ण हौदों से सजे हुये हाथियों, श्वेत चँवरों, सूर्य का प्रतीक अंकित ध्वजाओं और परम्परा से चले आने वाले श्वेत निर्मल क्षत्र, स्वर्ण निर्मित सौ घोड़े, स्वर्ण मण्डित सींगों वाले साँड सिंह की अक्षुण्ण त्वचा आदि का शीघ्र प्रबन्ध करें। सुसज्जित वेदी का निर्माण करें। इस प्रकार के जितने भी आवश्यक निर्देश थे, वे उन्होंने सम्बंधित अधिकारियों को दिये।

इसके पश्चात् राजा दशरथ ने प्रधानमन्त्री सुमन्त से कहा, "आप जाकर राम को शीघ्र लिवा लाइये।" आज्ञा पाते ही सुमन्त रामचन्द्र जी को रथ में अपने साथ बिठा कर लिवा लाये। राम ने बड़ी श्रद्धा के साथ पिता को प्रणाम किया और उपस्थित जनों का यथोचित अभिवादन किया। राजा दशरथ ने राम को अपने निकट बिठाकर मुस्कुराते हुये कहा, "हे राम! तुमने अपने गुणों से समस्त प्रजाजनों को प्रसन्न कर लिया है। इसलिये मैंने निश्चय किया है किस मैं कल तुम्हारा राजतिलक दर दूँगा। इस विषय में मैंने ब्राह्मणों, मन्त्रियों, विद्वानों एवं समस्त राजा-महाराजाओं की भी सम्मति प्राप्त कर लिया है। इस अवसर पर मैं तम्हें अपने अनुभव से प्राप्त कुछ बातें बताना चाहता हूँ। सबसे पहली बात तो यह है कि तुम कभी विनयशीलता का त्याग मत करना। इन्द्रियों को सदा अपने वश में रखना। अपने मन्त्रियों के हृदय में उठने वाले विचारों को प्रत्यक्ष रूप से जानने और समझने का प्रयास करना। प्रजा को सदैव सन्तुष्ट और सुखी रखने का प्रयास करना। यदि मेरी कही इन बातों का तुम अनुसरण करोगे तो तुम सब प्रकार की विपत्तियों से सुरक्षित रहोगे और लोकप्रियता अर्जित करते हुये निष्कंटक राजकाज चला सकोगे। यह सिद्धांत की बात है कि जो राजा अपनी प्रजा को प्रसन्न और सुखी रखने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहता है, उसका संसार में कोई शत्रु नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति स्वार्थवश उसका अनिष्ट करना भी चाहे तो भी वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता क्योंकि ऐसे राजा को अपनी प्रजा एवं मित्रों का हार्दिक समर्थन प्राप्त होता है।"

पिता से यह उपयोगी शिक्षा प्राप्त करके राम ने स्वयं को धन्य माना और उन्होंने अपने पिता को आश्वासन दिया कि वे अक्षरशः इन बातों का पालन करेंगे। उधर दास-दासियों.राजा के मुख से राम का राजतिलक करने की बात सुनी तो वे प्रसन्नता से उछलते हुये महारानी कौशल्या के पास जाकर उन्हें यह शुभ संवाद सुनाया जिसे सुनकर उनका रोम-रोम पुलकित हो गया। इस शुभ समाचार के सुनाने वालों को उन्होंने बहुत सा स्वर्ण, वस्त्राभूषण देकर मालामाल कर दिया।

22 जुलाई 2010

रामायण - राम जन्म ( Ramayana - Rama birth )

कौशल नामक सुरम्य प्रदेश कल-कल करती हुई पवित्र सरयू नदी के तट पर स्थित है। धन-धान्य से परिपूर्ण सुन्दर नगरी अयोध्या इसकी राजधानी है। इस नगरी की स्थापना वैवस्वत मनु ने की थी। इस वंश में अनेक शूरवीर, पराक्रमी, प्रतिभाशाली तथा यशस्वी राजा हुये जिनमें से राजा दशरथ भी एक थे। राजा दशरथ चारों वेदों के ज्ञाता, रणकुशल, धर्मात्मा, दयालु और प्रजावत्सल थे तथा उनके राज्य में प्रजा सभी प्रकार से सुखी थी। उनकी प्रजा सत्य-परायण तथा ईश्वरभक्त थी और किसी के प्रति किसी का द्वेषभाव नहीं था।

एक दिन महाराज दशरथ को दर्पण में अपने कृष्णवर्ण केशों के मध्य एक श्वेत रंग का बाल दिखाई पड़ा और वे विचार करने लगे कि अब यौवन मेरा साथ छोड़ रहा है और अब तक मेरे वंश को आगे बढ़ाने वाला इस राज्य का उत्तराधिकारी मेरा पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ है। उन्होंने पुत्र प्राप्ति हेतु पुत्रयेष्ठि यज्ञ करने का संकल्प किया। उन्होंने अपने कुलगुरु वशिष्ठ जी को बुलाकर अपना मन्तव्य बताया और यज्ञ के लिये उचित विधान बताने का अनुरोध किया।

राजा दशरथ के विचारों को सर्वथा उचित और युक्ति संगत समझ कर गुरु वशिष्ठ जी ने कहा - "राजन्! मुझे विश्वास है कि पुत्रयेष्ठि यज्ञ करने से आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। इसके लिये आपको अश्वमेघ यज्ञ करना होगा। आप शीघ्रातिशीघ्र यज्ञ के सामग्रियों की व्यवस्था करके एक सुन्दर श्यामकर्ण घोड़ा छोड़िये और सरयू नदी के उत्तरी तट पर यज्ञभूमि का निर्माण करवाइये। मन्त्रियों और सेवकों को सारी व्यवस्था करने की आज्ञा दे कर महाराज दशरथ ने रनिवास में जा कर अपनी तीनों रानियों कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को यह शुभ समाचार सुनाया और उन सबसे यज्ञ की दीक्षा लेने के लिये तैयार रहने का आग्रह किया। महाराज के वचनों को सुन कर सभी रानियाँ प्रसन्न हो गईं।

राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म

महाराज की आज्ञानुसार यज्ञ भूमिका निर्माण हो गया और श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छोड़ दिया गया। सुसज्जित यज्ञशाला अत्यन्त मनोरम था। यज्ञ सम्पन्न कराने के लिये देश देशान्तर से मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को बुलाया गया। सभी के एकत्रि हो जाने पर महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा महाराज के परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि के साथ यज्ञ मण्डप में पधारे और विधिवत इस महान यज्ञ का शुभारम्भ हुआ। समिधा की सुगन्ध से सम्पूर्ण वातावरण महकने लगा और वेदों की ऋचाओं का उच्च स्वर में पाठ होने लगा।

यज्ञ के समाप्ति होने पर राजा दशरथ ने समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा किया और यज्ञ के प्रसाद चरा को लेकर अपने महल में जाकर सभी रानियों में प्रसाद वितरित किया। इस प्रसाद को ग्रहण करने पर परमपिता परमात्मा की कृपा से वे सभी रानियाँ गर्भवती हुईं।

कालक्रम चलता रहा और चैत्र मास आ गया। शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे। कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से तेजोमय, परम कान्तिवान, अद्भुत सौन्दर्यशाली और श्यामवर्ण वाले शिशु का जन्म हुआ। जो भी उसे देखता ठगा सा रह जाता था। इसके पश्चात् शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी ने पुत्र को जन्म दिया। फिर तीसरी रानी सुमित्रा के गर्भ से दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। महाराज के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में सम्पूर्ण राज्य में आनन्द मनाया जाने लगा। गन्धर्व गान करने लगे और अप्सरायें नृत्य करने लगीं। आकाश में देवता अपने-अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे। राजद्वार पर भाट, चारण, आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों की भीड़ लग गई। महाराज ने उन्मुक्त हस्त से सभी को दान दक्षिणा दी। प्रजा-जनों को धन-धान्य से और दरबारियों को रत्न, आभूषण तथा उपाधियों से पुरष्कृत किया गया। महर्षि वशिष्ठ ने चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार कराया तथा उनके नाम रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गये।

रामचन्द्र अपने भाइयों से आयु में बड़े होने के साथ ही साथ गुणों में भी उन से आगे थे एवं प्रजा में अत्यंत लोकप्रिय थे। अपने विलक्षण प्रतिभा से उन्होंने अल्प काल में ही समस्त विषयों में पारंगत हो गये। सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने में और हाथी, घोड़े एवं सभी प्रकार के वाहनों की सवारी में उन्हें असाधारण निपुणता प्राप्त थी। माता-पिता और गुरुजनों की सेवा में निरन्तर लगे रहते थे। शेष तीन भाई भी उनका अनुसरण करते थे। इन चारों भाइयों में गुरुजनों के प्रति जितनी श्रद्धा भक्ति थी उतना ही उनमें परस्पर प्रेम और सौहार्द था। अपने पुत्रों को देख कर महाराज दशरथ का हृदय गर्व और आनन्द से भर उठता था।

रामायण - वाल्मीकि रामायण भूमिका ( Ramayana - Valmiki Ramayana role )

एक दिन महर्षि वाल्मीकि अपने आश्रम में बैठे हुये परमपिता परमात्मा का चिन्तन कर रहे थे, तभी परम प्रभुभक्त महर्षि नारद भगवान के नाम का संकीर्तन करते हुये और वीणा की स्वर लहरी गुँजाते हुये वाल्मीकि जी के आश्रम में पहुँचे। अपने यहाँ नारद जी का पदार्पण होते देख ऋषिश्रेष्ठ वाल्मीकि अत्यंत प्रसन्न हुये और उनका सब प्रकार से आदर-सत्कार करके उन्हें बैठने के लिये उचित आसन प्रदान किया। फिर नारद जी ने कुशल-मंगल पूछकर मुनिराज भगवद् चर्चा करने लगे। सहसा उन्होंने प्रश्न किया, "हे मुनियों में श्रेष्ठ नारद जी! आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और देश-देशान्तरों में भ्रमण करते हैं, नाना प्रकार के प्राणियों के बीच विचरण करते हैं। इसलिये कृपा करके यह बताइये कि इस समय सारे भूमण्डल और नव द्वीपों में ऐसा कौन सा अपूर्व मेधावी, विद्वान, परोपकारी एवं ज्ञान विज्ञान में पारंगत, धर्मात्मा तथा समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति है जो मनुष्यमात्र का ही नहीं, चर-अचर और प्राणिमात्र का कल्याण करने के लिये सदैव तत्पर रहता हो? जिसने अपने पराक्रम और त्याग से सम्पूर्ण इन्द्रियों, विषय-वासनाओं एवं मन को वश में कर लिया हो, जो कभी क्रोध, अहंकार जैसी दुष्प्रवृतियों के वशीभूत न होता हो? यदि ऐसा कोई महापुरुष आपकी दृष्टि में आया हो तो कृपया सम्पूर्ण वृतान्त मुझे सांगोपांग सुनाइये। उसकी पुण्य कथा सुन कर मैं कृतार्थ होना चाहता हूँ।"

महर्षि वाल्मीकि का प्रशन सुनकर तीनों लोकों का भ्रमण करने वाले नारद जी ने कहा, "हे मुनिराज! आपने जिन गुणों का वर्णन किया है ऐसे गुणों से युक्त व्यक्ति का इस पृथ्वी तल पर मिलना अत्यंत दुर्लभ है। फिर भी एक अद्भुत गरिमामय व्यक्ति के चरित्र का आपके सामने करता हूँ। उसमें आपके बताये हुये सभी गुण ही नहीं हैं, बल्कि वे गुण भी हैं जिनकी आपने चर्चा नहीं की है और जो जन-साधारण की कल्पना से परे हैं| ऐसी महान विभूति का नाम रामचन्द्र है। उन्होंने वैवस्वत मनु के वंश में महाराजा इक्ष्वाकु के कुल में जन्म लिया है। वे अत्यंत वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करने वाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत को शरण देने वाले, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न हैं। इस युग में तो उनके जैसा धीर, वीर, बली, विक्रमी, सत्यवक्ता, सदाचारी, गौ-ब्राह्मण-साधु प्रतिपालक, शत्रुओं और कुबुद्धि राक्षसों का विनाश करने वाला अभूतपूर्व त्यागी, कृपासिन्धु ढूंढने से भी नहीं मिलेगा| देखने में वे अत्यंत सुंदर, कामदेव को भी लज्जित करने वाले, किशलय से भी कोमल और समरभूमि में वज्र से भी कठोर हैं। कवि की सभी उपमायें उनके व्यक्तित्व के सामने हेय प्रतीत होती हैं। जैसा उनका हृदय निर्मल है, चरित्र उज्जवल है, वैसा ही उनका शरीर निर्मल एवं कांतिमय है। उनका हृदय समुद्र से भी अधिक उदार और विचार नगराज हिमालय से भी महान है।"

नारद जी द्वारा श्री रामचन्द्र जी का यह विशद वर्णन सुनकर वाल्मीकि जी बहुत अधिक प्रभावित हुये। उन्होंने नारद जी से प्रार्थना की, "मुनिराज! कृपा करके मुझे ऐसे महान पुरुष का सम्पूर्ण चरित्र एवं क्रिया-कलाप विस्तारपूर्वक सुनाइये। उन्हें सुनकर मैं अपना जीवन धन्य कारना चाहता हूँ।" उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर के नारद मुनि ने राम की सम्पूर्ण कथा महर्षि वाल्मीकि को संक्षेप में कह सुनाई। उन्होंने बताया कि किस प्रकार अयोध्या के राजा दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न हुये, जिनमें से राम और लक्ष्मण को मुनि विश्वामित्र यज्ञ की रक्षा के लिये अपने साथ आश्रम में ले गये। फिर वे राजा जनक द्वारा आयोजित शिव धनुष यज्ञ एवं सीता स्वयंवर में भाग लेने के लिये जनकपुरी गये। सीता से विवाह कर के जब वे अयोध्या लौटे तो प्रजाहित की भावना से राजा दशरथ ने उन्हें युवराज पद देना चाहा। तभी राम की सौतेली माँ कैकेयी ने वर माँग कर राम को वनवास दिला दिया। सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ गये। पुत्र वियोग में महाराजा दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिये। श्रंगवेरपुर में निवास कर राम राक्षसों का विनाश करते हुये आगे बढ़े। मार्ग में जिस प्रकार सीता का रावण द्वारा हरण हुआ, हनुमान सुग्रीव आदि से मिलाप हुआ। इसके पश्चात् जिस प्रकार राम ने बालि का वध किया और लंकापति रावण का कुल सहित नाश करके उसके भाई विभीषण को लंका का राज्य सौंपा तथा सीता सहित अयोध्या लौट आये। यह सारी राम कथा उन्होंने संक्षेप में कह सुनाई| इस कथा को सुन कर ऋषि वाल्मीकि अत्यंत प्रसन्न हुये। उन्होंने अति आदर सत्कार और पूजा करके नारद जी को विदा किया।

महर्षि नारद के चले जाने के पश्चात् वाल्मीकि जी शिष्य मंडली के साथ भ्रमण करते हुये तमसा नदी के तट पर पहुँचे| वहाँ पर वे प्राकृतिक दृश्यों का आनंद ले रहे थे कि एक निर्दयी व्याघ्र ने कामरत क्रौंच पक्षी के एक जोड़ में से नर पक्षी को मार गिराया तथा नर पक्षी के वियोग में मादा पक्षी क्रन्दन करने लगी। इस दृश्य ने वाल्मीकि के हृदय को व्यथा और करुणा से परिपूर्ण कर दिया। अनायास ही उनके मुख से व्याघ्र के लिये ये शाप निकल गया - अरे बहेलिये, तू ने काममोहित मैथुनरत क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी।

इस घटना के कारण वाल्मीकि का हृदय अशांत रहने लगा। इसी अशांत अवस्था के मध्य एक दिन उनके आश्रम में ब्रह्मा जी पधारे। महर्षि वाल्मीकि ने ब्रह्मा जी की अभ्यर्थना तथा समुचित आदर सत्कार करने के पश्चात् अपनी अशांति के विषय में उन्हें बताया। इस पर ब्रह्मा जी ने कहा, "हे मुनिराज! आप श्री राम के चरित्र का काव्यमय गुणगान करके ही इस अशांति को दूर कर सकते हैं। आपके इस काव्य से न केवल आपकी अशांति ही दूर होगी वरन् वह काव्य समस्त संसार के लिये भी हितकारी होगा। इस कार्य को पूर्ण करने के लिये मेरा आशीर्वाद सदैव आपके साथ रहेगा।"

ब्रह्मा जी के इस प्रस्ताव को गम्भीरता पूर्वक स्वीकार कर उनके चले जाने के पश्चात् दत्तचित्त होकर वाल्मीकि जी राम का चरित्र लेखन में व्यस्त हो गये।