25 अप्रैल 2010
हर सुख के पीछे से आता है दु:ख
सुख कभी अकेला नहीं आता, उसके पीछे से चुपके-चुपके दु:ख भी आ जाता है। हमें समझना चाहिए कि दु:ख भी जीवन के लिए उतना ही जरूरी है जितना सुख। हम लाख चाहें, दु:ख को आने से नहीं रोक सकते, न सुख को जाने से रोक सकते हैं। हां, तरीका बदला जा सकता है, हम तलाश करें ऐसे सुख की जो स्थायी हो, दु:ख रहे या चला जाए, सुख चिरस्थायी हमारे साथ ही बना रहे।
स्नान करके तन तो शुद्ध किया जाता है लेकिन मन को शुद्ध करने के लिए ध्यान ही करना पड़ेगा। ध्यान की प्रत्येक विधि शुद्ध होने की प्रक्रिया है। यूं भी कहा जा सकता है कि शुद्धता की शोध का नाम ही ध्यान है। आत्मा का सुख पाने के लिए मन और शरीर को भूलना होगा। इन दोनों के विस्मरण में ही आत्मा का स्मरण है और यहीं परमात्मा की अनुभूति है जिसे सामान्य भाषा में आस्तित्व का आनंद कहा गया है।हम दोनों ओर देखने की कोशिश करते हैं बाहर भी भीतर भी। वह भी एक साथ, यह असंभव है। जब अपने भीतर भी उतर रहे हों तो पूरा भीतर उतरें, बाहर को उन क्षणों में भूल ही जाएं। इस भीतर उतरने की क्रिया में ज्यादा अक्ल भी नहीं लगाना पड़ती है। हमारे सामने कबीर और बुद्ध का उदाहरण है। कबीर अनपढ़ थे कुछ तो उन्हें बुद्धु भी मानते रहे। बुद्ध परम विद्वान थे। लेकिन दोनों गहरे में जहां पहुचे वहां जाकर फर्क समाप्त हो गया। नतीजा यह है कि परमात्मा की निकटता को, ध्यान की अवस्था को बुद्धु भी पा सकते हैं बुद्धिमान भी। इसलिए ध्यान लगाने के लिए बुद्धिमान होना जरूरी नहीं है, हां समर्पित होना जरूरी है।समर्पित होने का लाभ यह भी है कि हम सुख-दुख से परे आनंद की स्थिति में जीने लगते हैं। हम जीवनभर सुख की तलाश में रहते हैं। सफलता, महत्वाकांक्षा के लिए अपना सबकुछ झोंक देने को तैयार रहते हैं। इस दौरान हमें जो सुख मिल भी जाते हैं वे दुख मिश्रित होते हैं। सफलता के लगे-लगे दुख भी होते हैं। कभी-कभी दुख इतने भारी होते हैं कि हमें पूरी तरह से तोड़ जाते हैं और हमारी सफलता का मजा खत्म ही हो जाता है। दुख मिश्रित सुख की जगह शुद्ध सुख चाहते हैं तो स्व की ओर चलना होगा, मुड़िए भीतर। वहां जो समाधि सुख मिलेगा उसमें दुख का कोई मिश्रण नहीं होगा।
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Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:56:00 am 0 comments
नजरिया बदलें, नजर अपने आप बदल जाएगी
यह मानवीय व्यवहार है कि हम जिसके बारे में जैसा सुनते हैं, उसी के अनुसार अपना मानस भी तैयार कर लेते हैं। किसी के बारे में गलत सुना है तो फिर हम उसके भीतर हमेशा ही गलतियां ढूंढ़ने लगते हैं। अपना नजरिया बदलें, अच्छा देखने का भी प्रयास करें, आपको अच्छाई भी अपनेआप दिखाई देने लगेगी।
अपनी उपलब्धियों के पीछे उपयोग किए गए साधनों की शुद्धता के प्रति अत्यधिक सावधान रहें। आपके किए जा रहे काम की नीयत परिणाम पर उसर रखेगी। शहंशाह अकबर की तारीफ में स्वामी रामतीर्थ कहते थे जहां चाहे जिस गोद को चाहे अपना सरहाना बनाकर बेफिक्री से जो नींद निकाल सकता था, आईने अकबरी के लेखक अबुल फजल, पुर्तगाल के पादरी, बड़े बड़े हिन्दू पंडितों के दिल में जो राज करता था वो शाहंशाह अकबर था। उनकी नजर में अकबर एक आध्यात्मिक आदमी था। अकबर की दिनचर्या थी च्च्नमाजोरोजा ओ तसवीही-तोबा इस्तगफारज्ज यानी नमाज, रोजा तसबीह (माला) तोबा (पश्चाताप) और इस्तगफार (क्षमा-प्रार्थना)।दरअसल रामतीर्थ जिस ओर इशारा कर रहे हैं वह हमारे काम की बात है। अकबर के जीवन में लगातार जीत हांसिल हो रही थी। अकेले में अकबर को ख्याल आता था धन मेरा सेवक, वैभव मेरा अनुचर हो गया है आखिर इतनी ताकत मेरे दिल दिमाग में कहां से आती है, कौन देता है?
इसी कारण सूफी संतों की संगत उन्हें खूब लुभाती थी। ऐसी कामयाबी पर रामतीर्थ की टिप्पणी थी कि क्या भोग विलास और कामयाबी एक साथ चल सकते हैं। चिमगादड़ भले ही दोपहर के वक्त शिकार करने आ जाए लेकिन सियाह दिली (हृदय की मालिकता) सफलता के तेज को नहीं सह सकती है।रामतीर्थ का संकेत है कि सफल आदमी के जीवन का शुभ पक्ष देखा जाए तो हम भी अपने सफल होने के इरादे को मजबूत बनाए रख सकेंगे। हर राजा की आलोचना की जा सकती है और की भी गई है। अकबर के आसपास भी आरोपों का घेरा रहा है। रामतीर्थ अकबर के बहाने यह कह गए हैं कि योग्यता और सफलता को केवल आलोचनाओं से मत नवाजो, परखो। खूबियों को जाति-पाति, देश, काल, परीस्थिति के मुताबिक खुले दिल से कबूल किया जाए।
अपनी उपलब्धियों के पीछे उपयोग किए गए साधनों की शुद्धता के प्रति अत्यधिक सावधान रहें। आपके किए जा रहे काम की नीयत परिणाम पर उसर रखेगी। शहंशाह अकबर की तारीफ में स्वामी रामतीर्थ कहते थे जहां चाहे जिस गोद को चाहे अपना सरहाना बनाकर बेफिक्री से जो नींद निकाल सकता था, आईने अकबरी के लेखक अबुल फजल, पुर्तगाल के पादरी, बड़े बड़े हिन्दू पंडितों के दिल में जो राज करता था वो शाहंशाह अकबर था। उनकी नजर में अकबर एक आध्यात्मिक आदमी था। अकबर की दिनचर्या थी च्च्नमाजोरोजा ओ तसवीही-तोबा इस्तगफारज्ज यानी नमाज, रोजा तसबीह (माला) तोबा (पश्चाताप) और इस्तगफार (क्षमा-प्रार्थना)।दरअसल रामतीर्थ जिस ओर इशारा कर रहे हैं वह हमारे काम की बात है। अकबर के जीवन में लगातार जीत हांसिल हो रही थी। अकेले में अकबर को ख्याल आता था धन मेरा सेवक, वैभव मेरा अनुचर हो गया है आखिर इतनी ताकत मेरे दिल दिमाग में कहां से आती है, कौन देता है?
इसी कारण सूफी संतों की संगत उन्हें खूब लुभाती थी। ऐसी कामयाबी पर रामतीर्थ की टिप्पणी थी कि क्या भोग विलास और कामयाबी एक साथ चल सकते हैं। चिमगादड़ भले ही दोपहर के वक्त शिकार करने आ जाए लेकिन सियाह दिली (हृदय की मालिकता) सफलता के तेज को नहीं सह सकती है।रामतीर्थ का संकेत है कि सफल आदमी के जीवन का शुभ पक्ष देखा जाए तो हम भी अपने सफल होने के इरादे को मजबूत बनाए रख सकेंगे। हर राजा की आलोचना की जा सकती है और की भी गई है। अकबर के आसपास भी आरोपों का घेरा रहा है। रामतीर्थ अकबर के बहाने यह कह गए हैं कि योग्यता और सफलता को केवल आलोचनाओं से मत नवाजो, परखो। खूबियों को जाति-पाति, देश, काल, परीस्थिति के मुताबिक खुले दिल से कबूल किया जाए।
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Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:55:00 am 0 comments
प्रशंसा का भोग पहले भगवान को लगाएं
प्रशंसा सभी को प्रिय होती है लेकिन प्रशंसा का नुकसान यह होता है कि वह आपके भीतर कहीं-न-कहीं अहंकार का बीजारोपण कर देती है। बहुत कम ऐसे लोग होते हैं जो प्रशंसा को पचा पाते हैं, वरना अधिकांश समय ऐसा ही होता है तारीफ की बहुत ज्यादा खुराक आदमी में अभिनाम के रोग को जन्म दे देती है। हनुमानजी ने इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका बताया है, हम प्रशंसा भी पा सकते हैं और अहंकार से दूर भी रह सकते हैं।
अनेक परिवारों में भोजन के पूर्व भगवान को भोग लगाने की परंपरा है। शास्त्र कहते हैं धान-दोष (अन्न का कुप्रभाव) दूर करने के लिए भोजन करने से पूर्व उसे परमात्मा को समर्पित करना चाहिए। सीधे भोजन न किया जाए उसे भोग बनाया जाए। भोजन भगवान को अर्पित होने के बाद प्रसाद बन जाता है। जीभ के भोजन को तो देव-अर्पित किया जाता है लेकिन जब हमें अपने कर्म का भोजन यानी प्रशंसा परोसी जाती है तब हम भगवान को भोग लगाना भूल जाते हैं। अपने प्रति हुई प्रशंसा का भोग भी परमात्मा को लगाना चाहिए। एक भक्त की घटना है। उसे समाज से प्रशंसा मिली तो उसने भगवान को परोस दी। भगवान भी ठिठोली के भाव में आ गए और पूछा इस भोजन को मुझे कुपथ्य मानकर परोस रहे हो या सुपथ्य मानकर? भक्त का जवाब था मेरे लिए तो कुपथ्य (परहेज) ही है, प्रशंसा पचाना विष से भी अधिक कठिन है लेकिन आप तो वष्रो से प्रशंसा ही सुन रहे हैं आप आसानी से पचा जाएंगे। मैं यदि सीधे प्रशंसा का भोजन कर लूंगा तो अहंकार की बीमारी से घिर जाऊंगा। आप पचाने में समर्थ हैं।हमारे समझने की बात यह है कि जीवन में विजय और सफलता मिले तो पहले प्रभु के सामने परोसें उसके बाद जो प्रसादी हमें मिलेगी उससे अहंकार के अपच होने की संभावना खत्म हो जाएगी। यहां यह भी समझ लें कि हमारे यहां प्रसादी के भी कुछ कायदे हैं। सबसे पहले भगवान को चढ़ाएं फिर समाज को बांटें उसके बाद स्वयं लें। शास्त्रों में तो यहां तक कहा है कि प्रसाद के मामले में हाथ में जितना लगा रह जाए उतने को ही अपना हिस्सा मानो। भोजन के संदर्भ हो सकता है यह कठिन लगे लेकिन प्रशंसा के भोजन में भोग लगाकर, प्रसाद बनाकर, बंटवारा कर, स्वयं प्राप्त करें।
अनेक परिवारों में भोजन के पूर्व भगवान को भोग लगाने की परंपरा है। शास्त्र कहते हैं धान-दोष (अन्न का कुप्रभाव) दूर करने के लिए भोजन करने से पूर्व उसे परमात्मा को समर्पित करना चाहिए। सीधे भोजन न किया जाए उसे भोग बनाया जाए। भोजन भगवान को अर्पित होने के बाद प्रसाद बन जाता है। जीभ के भोजन को तो देव-अर्पित किया जाता है लेकिन जब हमें अपने कर्म का भोजन यानी प्रशंसा परोसी जाती है तब हम भगवान को भोग लगाना भूल जाते हैं। अपने प्रति हुई प्रशंसा का भोग भी परमात्मा को लगाना चाहिए। एक भक्त की घटना है। उसे समाज से प्रशंसा मिली तो उसने भगवान को परोस दी। भगवान भी ठिठोली के भाव में आ गए और पूछा इस भोजन को मुझे कुपथ्य मानकर परोस रहे हो या सुपथ्य मानकर? भक्त का जवाब था मेरे लिए तो कुपथ्य (परहेज) ही है, प्रशंसा पचाना विष से भी अधिक कठिन है लेकिन आप तो वष्रो से प्रशंसा ही सुन रहे हैं आप आसानी से पचा जाएंगे। मैं यदि सीधे प्रशंसा का भोजन कर लूंगा तो अहंकार की बीमारी से घिर जाऊंगा। आप पचाने में समर्थ हैं।हमारे समझने की बात यह है कि जीवन में विजय और सफलता मिले तो पहले प्रभु के सामने परोसें उसके बाद जो प्रसादी हमें मिलेगी उससे अहंकार के अपच होने की संभावना खत्म हो जाएगी। यहां यह भी समझ लें कि हमारे यहां प्रसादी के भी कुछ कायदे हैं। सबसे पहले भगवान को चढ़ाएं फिर समाज को बांटें उसके बाद स्वयं लें। शास्त्रों में तो यहां तक कहा है कि प्रसाद के मामले में हाथ में जितना लगा रह जाए उतने को ही अपना हिस्सा मानो। भोजन के संदर्भ हो सकता है यह कठिन लगे लेकिन प्रशंसा के भोजन में भोग लगाकर, प्रसाद बनाकर, बंटवारा कर, स्वयं प्राप्त करें।
Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:54:00 am 1 comments
अगर मिटाना हो कामना और वासना को
परमात्मा तक जाने वाली राह में दो रोड़े बड़े हैं। कामना और वासना। इनसे ऊपर उठने की जद्दोजहद में कइयों की जिंदगी निकल जाती है। यहीं पर गुरु का भी महत्व साबित होता है, जिसके पास सच्च मार्गदर्शक है वह आसानी से इन पर विजय पा लेता है। कामना और वासना एकदम पीछा छुड़ाना मुश्किल है, ज्यादा अच्छा यह है कि हम इनका रूप बदल दें।
आध्यात्मिक जीवन में निष्कामता का बड़ा महत्व है। सभी के मन में यह प्रश्न उठता है आखिर कामनाओं का त्याग कैसे हो। गीता में चार प्रकार बताए हैं कामना त्याग के। एक विस्तारक प्रक्रिया, दो एकाग्र प्रक्रिया, तीन सूक्ष्म प्रक्रिया तथा चौथी है विशुद्ध प्रक्रिया। विस्तारक प्रक्रिया का अर्थ है हमारी जो कामना व्यक्तिगत हो उसे हम सामाजिक रूप दे दें। जैसे हम अपने बच्चे को पढ़ाना चाहें तो पूरे गांव में ही स्कूल खोल लें। इससे हमारी वासना शुद्ध रूप से विस्तृत होकर विलीन हो जाएगी। दूसरी प्रक्रिया है एकाग्र। इसमें जो भी हमारी प्रबल वासना हो केवल उस पर ही अपने चित्त को टिका दें और अन्य वासनाओं को छोड़ दें। यह ध्यान योग जैसा है। जैसे-जैसे एकाग्रता सधेगी, साधक उस एकमात्र वासना से मुक्त होने लगता है। तीसरी विधि है सूक्ष्म प्रक्रिया। इसमें स्थूल वासनाओं को त्यागकर सूक्ष्म वासनाओं पर टिक जाएं। शरीर या बुद्धि को सजाना हो तो उसके स्थान पर मन और हृदय को सजाएं। इससे हम अंतर्मुखी होंगे और बाहरी वासनाएं गिर जाएंगी। इसे संतों ने ज्ञानयोग की युक्ति कहा है। चौथी प्रक्रिया है विशुद्ध। इसमें वासना को न व्यक्तिगत, न सामाजिक, न स्थूल, न सूक्ष्म मानें। दो ही तरह की वासना होगी, शुभ या अशुभ वासना। अच्छी वासना को रखें और बुरी वासना को त्याग दें। विनोबाजी एक उदाहरण देते थे यदि मीठा खाना हो तो मिठाई के स्थान पर आम खा लें। इस तरीके से इस प्रक्रिया में वासना को मारने का दबाव नहीं है बल्कि अशुभ को शुभ में परिवर्तित करने का आग्रह है। अशुभ वासनाओं का त्याग और शुभ वासनाओं की पूर्ति करते-करते मन एक दिन शुद्ध होकर वासनाहीन हो जाता है। इसीलिए यह चौथी पद्धति अधिक मान्य है। अन्य में थोड़े खतरे हैं।
आध्यात्मिक जीवन में निष्कामता का बड़ा महत्व है। सभी के मन में यह प्रश्न उठता है आखिर कामनाओं का त्याग कैसे हो। गीता में चार प्रकार बताए हैं कामना त्याग के। एक विस्तारक प्रक्रिया, दो एकाग्र प्रक्रिया, तीन सूक्ष्म प्रक्रिया तथा चौथी है विशुद्ध प्रक्रिया। विस्तारक प्रक्रिया का अर्थ है हमारी जो कामना व्यक्तिगत हो उसे हम सामाजिक रूप दे दें। जैसे हम अपने बच्चे को पढ़ाना चाहें तो पूरे गांव में ही स्कूल खोल लें। इससे हमारी वासना शुद्ध रूप से विस्तृत होकर विलीन हो जाएगी। दूसरी प्रक्रिया है एकाग्र। इसमें जो भी हमारी प्रबल वासना हो केवल उस पर ही अपने चित्त को टिका दें और अन्य वासनाओं को छोड़ दें। यह ध्यान योग जैसा है। जैसे-जैसे एकाग्रता सधेगी, साधक उस एकमात्र वासना से मुक्त होने लगता है। तीसरी विधि है सूक्ष्म प्रक्रिया। इसमें स्थूल वासनाओं को त्यागकर सूक्ष्म वासनाओं पर टिक जाएं। शरीर या बुद्धि को सजाना हो तो उसके स्थान पर मन और हृदय को सजाएं। इससे हम अंतर्मुखी होंगे और बाहरी वासनाएं गिर जाएंगी। इसे संतों ने ज्ञानयोग की युक्ति कहा है। चौथी प्रक्रिया है विशुद्ध। इसमें वासना को न व्यक्तिगत, न सामाजिक, न स्थूल, न सूक्ष्म मानें। दो ही तरह की वासना होगी, शुभ या अशुभ वासना। अच्छी वासना को रखें और बुरी वासना को त्याग दें। विनोबाजी एक उदाहरण देते थे यदि मीठा खाना हो तो मिठाई के स्थान पर आम खा लें। इस तरीके से इस प्रक्रिया में वासना को मारने का दबाव नहीं है बल्कि अशुभ को शुभ में परिवर्तित करने का आग्रह है। अशुभ वासनाओं का त्याग और शुभ वासनाओं की पूर्ति करते-करते मन एक दिन शुद्ध होकर वासनाहीन हो जाता है। इसीलिए यह चौथी पद्धति अधिक मान्य है। अन्य में थोड़े खतरे हैं।
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Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:49:00 am 0 comments
जीवन को जीएं उत्सव की तरह
हमारे जीने के तरीके में खुशी कम और निराशा अधिक है। छोटी-छोटी बातों को हम बड़ा बना लेते हैं, जहां खुश रहा जा सकता है वहां भी दु:खी हो जाया करते हैं। खासतौर पर युवा पीढ़ी के मन में नैराश्य का भाव गहरा उतरा है। जीवन जीने का तरीका बदलें, इसे ऐसे जीएं जैसे कोई उत्सव है। जीवन को एक विशेष अवसर की तरह ही जीएं क्योंकि यहां हर पल ही विशेष है, इसी का नाम उत्सव है।
यह काम करने का समय है लेकिन कर्मयोग को उत्सव बनाया जाए नशा नहीं। विचार करें हमारा जीवन काम है या उत्सव। जीवन का आनंद उत्सव में है काम में नहीं। जो लोग कर्म को केवल काम की तरह करते हैं वे एक दिन जीवन को तनाव से भर लेते हैं। यदि कर्म को उत्सव की तरह किया जाए तो उत्साह आनंद बना रहेगा। पशु-पक्षियों को देखें वे जो भी काम करते हैं उत्सव की तरह करते हैं। केवल मनुष्य ही ऐसा है जो अपने कर्म को काम की तरह करता है। इस समय एक और बीमारी यह फैल गई है कि हर आदमी जल्दी में है। धन और सफलता के लिए धर्य और प्रतीक्षा मूर्खता लगने लगी है। जिस देश में हरि बोल की गूंज थी वहां हरि-अप का शोर गूंज रहा है। राम बोल को रन-अप में बदल दिया गया है। कृष्ण बोल कम-अप और शिव बोल शट-अप के रूप में सुनाई देते हैं।अपने काम को उत्सव में बदलना बहुत आवश्यक है। यह अत्यधिक कर्म करने का समय है तो तनाव और दबाव स्वभाविक है। मीरा नाचती थीं उत्सव के रूप में, कृष्ण बंसी बजाते थे या हनुमान लंका जला रहे थे सभी स्थिति में उनके भीतर उत्सव का भाव था। उत्सव में मनुष्य स्वयं प्रसन्न रहना चाहता है और दूसरों को भी खुश रखना चाहता है। जब हम उत्सव में जीते हैं तब हमारे लक्ष्य बड़े शुद्ध होते हैं। उत्सव का अर्थ ही अपने अंदर की उदासी को विदाई दे देना। उत्सव की पूर्णता पर थकान की जगह और उत्साह बना रहता है। उत्सव आदमी को सबसे जुड़े रहने के लिए प्रेरणा देता है। सबके साथ सबकी इच्छा को रखते हुए जीना या कुछ करना चुनौती का काम है लेकिन उत्सव वृत्ति इसे सरल बना देती है।
यह काम करने का समय है लेकिन कर्मयोग को उत्सव बनाया जाए नशा नहीं। विचार करें हमारा जीवन काम है या उत्सव। जीवन का आनंद उत्सव में है काम में नहीं। जो लोग कर्म को केवल काम की तरह करते हैं वे एक दिन जीवन को तनाव से भर लेते हैं। यदि कर्म को उत्सव की तरह किया जाए तो उत्साह आनंद बना रहेगा। पशु-पक्षियों को देखें वे जो भी काम करते हैं उत्सव की तरह करते हैं। केवल मनुष्य ही ऐसा है जो अपने कर्म को काम की तरह करता है। इस समय एक और बीमारी यह फैल गई है कि हर आदमी जल्दी में है। धन और सफलता के लिए धर्य और प्रतीक्षा मूर्खता लगने लगी है। जिस देश में हरि बोल की गूंज थी वहां हरि-अप का शोर गूंज रहा है। राम बोल को रन-अप में बदल दिया गया है। कृष्ण बोल कम-अप और शिव बोल शट-अप के रूप में सुनाई देते हैं।अपने काम को उत्सव में बदलना बहुत आवश्यक है। यह अत्यधिक कर्म करने का समय है तो तनाव और दबाव स्वभाविक है। मीरा नाचती थीं उत्सव के रूप में, कृष्ण बंसी बजाते थे या हनुमान लंका जला रहे थे सभी स्थिति में उनके भीतर उत्सव का भाव था। उत्सव में मनुष्य स्वयं प्रसन्न रहना चाहता है और दूसरों को भी खुश रखना चाहता है। जब हम उत्सव में जीते हैं तब हमारे लक्ष्य बड़े शुद्ध होते हैं। उत्सव का अर्थ ही अपने अंदर की उदासी को विदाई दे देना। उत्सव की पूर्णता पर थकान की जगह और उत्साह बना रहता है। उत्सव आदमी को सबसे जुड़े रहने के लिए प्रेरणा देता है। सबके साथ सबकी इच्छा को रखते हुए जीना या कुछ करना चुनौती का काम है लेकिन उत्सव वृत्ति इसे सरल बना देती है।
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Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:41:00 am 0 comments
कब, कैसा दिखना है, यह भी कला है
यह व्यवसायिकता और मैनेजमेंट का दौर है, हमें हर क्षेत्र में परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करना होता है। अपना अलग-अलग रूप दिखाना होता है। कई बार हम परिस्थिति के अनुसार खुद को प्रस्तुत नहीं कर पाते, असफलता की कहानी यहीं से शुरू होती है। आपके भीतर अगर बहुत संभावनाएं भी भरी हों तो उन्हें आवश्यकता पड़ने पर ही प्रदर्शित कीजिए। इस बात को हनुमानजी के जीवन से सीखा जा सकता है।
वर्तमान समय में आदमी यह भूल गया है कि कहां बड़ा होना और कहां छोटा होना है। समाज में कई लोग प्रतिष्ठित, मान्य और ख्यात होते हैं। घर आते हैं तो इसकी अकड़ और ऐंठ लेकर आ जाते हैं। यहीं से घर के सदस्यों से उनका झगड़ा शुरू हो जाता है। घर में आपस में समानता का व्यवहार होना चाहिए। पर आदमी बड़ा का बड़ा ही बना रहता है। कहां बड़ा होना और कहां छोटा होना यह एक कला है। हमारे हनुमानजी महाराज इसमें बहुत दक्ष हैं। सुंदरकांड के एक प्रसंग से हम सीख सकते हैं। अशोक वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की चर्चा चल रही थी। वे सीताजी को धर्य बंधा रहे थे किंतु सीताजी का आत्मविश्वास लौट नहीं रहा था। हनुमानजी ने कहा मां भरोसा रखें प्रभु श्रीराम आएंगे और आपको ले जाएंगे। वैसे तो मैं आपको यहां से ले जा सकता हूं किंतु श्रीराम की ऐसी आज्ञा नहीं है। वे वानरों के सहित आएंगे और राक्षसों का नाश करके आपको ले जाएंगे। तब सीताजी ने कहा था राक्षस बहुत बलवान हैं और वानर तुम्हारी तरह छोटे-छोटे होंगे, मुझे संदेह है। इतना सुनते ही हनुमानजी ने अपने शरीर को पर्वत के समान विशाल कर दिया। सीताजी के मन में विश्वास हो गया। हनुमानजी तत्काल छोटे हो गए। उन्हें लगा कहीं सीताजी यह न समझ लें कि मैं अपनी बढ़ाई कर रहा हूं। अगली ही पंक्ति में हनुमानजी ने स्पष्ट किया
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।
यानि हे माता सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है। इस तरह अपनी बढ़ाई, श्रेष्ठता को जो लोग परमात्मा से जोड़ते हैं उन्हें अहंकार नहीं आता है।
वर्तमान समय में आदमी यह भूल गया है कि कहां बड़ा होना और कहां छोटा होना है। समाज में कई लोग प्रतिष्ठित, मान्य और ख्यात होते हैं। घर आते हैं तो इसकी अकड़ और ऐंठ लेकर आ जाते हैं। यहीं से घर के सदस्यों से उनका झगड़ा शुरू हो जाता है। घर में आपस में समानता का व्यवहार होना चाहिए। पर आदमी बड़ा का बड़ा ही बना रहता है। कहां बड़ा होना और कहां छोटा होना यह एक कला है। हमारे हनुमानजी महाराज इसमें बहुत दक्ष हैं। सुंदरकांड के एक प्रसंग से हम सीख सकते हैं। अशोक वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की चर्चा चल रही थी। वे सीताजी को धर्य बंधा रहे थे किंतु सीताजी का आत्मविश्वास लौट नहीं रहा था। हनुमानजी ने कहा मां भरोसा रखें प्रभु श्रीराम आएंगे और आपको ले जाएंगे। वैसे तो मैं आपको यहां से ले जा सकता हूं किंतु श्रीराम की ऐसी आज्ञा नहीं है। वे वानरों के सहित आएंगे और राक्षसों का नाश करके आपको ले जाएंगे। तब सीताजी ने कहा था राक्षस बहुत बलवान हैं और वानर तुम्हारी तरह छोटे-छोटे होंगे, मुझे संदेह है। इतना सुनते ही हनुमानजी ने अपने शरीर को पर्वत के समान विशाल कर दिया। सीताजी के मन में विश्वास हो गया। हनुमानजी तत्काल छोटे हो गए। उन्हें लगा कहीं सीताजी यह न समझ लें कि मैं अपनी बढ़ाई कर रहा हूं। अगली ही पंक्ति में हनुमानजी ने स्पष्ट किया
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।
यानि हे माता सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है। इस तरह अपनी बढ़ाई, श्रेष्ठता को जो लोग परमात्मा से जोड़ते हैं उन्हें अहंकार नहीं आता है।
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Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:38:00 am 1 comments
समझिए इस रिश्ते की गहराई को
हमारी संस्कृति में रिश्ते का महत्व है। रिश्ता कोई भी हो उसे पूरे समर्पण से निभाना चाहिए। और अगर बात गुरु-शिष्य के रिश्ते की हो तो फिर समर्पण का भाव सबसे आगे रहे। आधुनिक काल में इस रिश्ते के मायने बदल गए हैं, अब पहले जैसे गुरु-शिष्य नहीं रहे लेकिन अगर जीवन में सफलता चाहते हैं तो अच्छे शिष्य बनने का प्रयास कीजिए, परमात्मा अच्छा गुरु खुद ही उपलब्ध कराएगा।
हर सच्चा गुरु चाहता है उसका शिष्य उससे अधिक शोहरत हासिल करे और ऐसा होने पर गुरु दिल ही दिल में खुश भी होते हैं। इस रिश्ते में ईष्र्या नहीं होती। मुस्लिम संत हसन बसरी के शिष्य थे हबीब अज़्ामी। हबीब गुरु से जितना भी सीखते उसे जिंदगी मंे अमल में ले आते। एक बार दोनों को दरिया पार करना था। वे किश्ती का इंतजार कर रहे थे। तब हबीब ने अपने गुरु हसन से कहा पानी पर पैर रखकर निकल चलते हैं। गुरु हसन बसरी ने कहा यह कैसे मुमकिन है। हबीब ने कहा खुदा और उस्ताद पर यकीन करें और पार निकल जाएं। गुरु ने तो ऐसा नहीं किया लेकिन शिष्य हबीब अज़्ामी पानी पर पैर रखकर दूसरी ओर चले गए। गुरु हसन बसरी सोचने लगे हबीब ने मुझसे इल्म सीखा और मुझे ही नसीहत देकर पानी पर चल दिया। थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने शिष्य हबीब से पूछा ऐसे कैसे कर लिया। मेरे इल्म का फायदा मुझे नहीं मिला और तुम्हे कैसे मिल गया। हबीब बोले मैं दिल साफ करता रहा और आप कागज स्याह करते रहे। उनका मकसद गुरु का अपमान करना नहीं था बल्कि वे कहना चाहते थे कि गुरु की सच्ची श्रृद्धा ऐसे परिणाम देती है। गुरु और शिष्य की एक ऐसी ही बेमिसाल हस्ती हैं गुरु गोविंदसिंह। उन्होंने अपने पूर्व की नौ पीढ़ियों के सिख समुदाय को खालसा में परिवर्तित किया था। उन्होंने परिभाषा दी थी कि जो सत्य की ज्योति को प्रज्वलित रखता है, जिसके भीतर प्रेम, विश्वास और पवित्रता है, वह व्यक्ति खालसा है। अपने जीवन के अंतिम समय में उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब का यथाविधि प्रकाश किया था और तभी से गुरु की गादी पर ग्रंथ च्च्साहिबज्ज बनकर विराजित किए गए। आध्यात्मिक दुनिया का यह अद्भुत प्रयोग है। गुरु शिष्य के रिश्ते अपनी गरिमा के लिए जाने जाते रहे हैं। वे भाग्यशाली हैं जिनके पास गुरु होते हैं और वे शौभाग्यशाली हैं जिनको ऐसे शिष्य मिल जाते हैं।
हर सच्चा गुरु चाहता है उसका शिष्य उससे अधिक शोहरत हासिल करे और ऐसा होने पर गुरु दिल ही दिल में खुश भी होते हैं। इस रिश्ते में ईष्र्या नहीं होती। मुस्लिम संत हसन बसरी के शिष्य थे हबीब अज़्ामी। हबीब गुरु से जितना भी सीखते उसे जिंदगी मंे अमल में ले आते। एक बार दोनों को दरिया पार करना था। वे किश्ती का इंतजार कर रहे थे। तब हबीब ने अपने गुरु हसन से कहा पानी पर पैर रखकर निकल चलते हैं। गुरु हसन बसरी ने कहा यह कैसे मुमकिन है। हबीब ने कहा खुदा और उस्ताद पर यकीन करें और पार निकल जाएं। गुरु ने तो ऐसा नहीं किया लेकिन शिष्य हबीब अज़्ामी पानी पर पैर रखकर दूसरी ओर चले गए। गुरु हसन बसरी सोचने लगे हबीब ने मुझसे इल्म सीखा और मुझे ही नसीहत देकर पानी पर चल दिया। थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने शिष्य हबीब से पूछा ऐसे कैसे कर लिया। मेरे इल्म का फायदा मुझे नहीं मिला और तुम्हे कैसे मिल गया। हबीब बोले मैं दिल साफ करता रहा और आप कागज स्याह करते रहे। उनका मकसद गुरु का अपमान करना नहीं था बल्कि वे कहना चाहते थे कि गुरु की सच्ची श्रृद्धा ऐसे परिणाम देती है। गुरु और शिष्य की एक ऐसी ही बेमिसाल हस्ती हैं गुरु गोविंदसिंह। उन्होंने अपने पूर्व की नौ पीढ़ियों के सिख समुदाय को खालसा में परिवर्तित किया था। उन्होंने परिभाषा दी थी कि जो सत्य की ज्योति को प्रज्वलित रखता है, जिसके भीतर प्रेम, विश्वास और पवित्रता है, वह व्यक्ति खालसा है। अपने जीवन के अंतिम समय में उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब का यथाविधि प्रकाश किया था और तभी से गुरु की गादी पर ग्रंथ च्च्साहिबज्ज बनकर विराजित किए गए। आध्यात्मिक दुनिया का यह अद्भुत प्रयोग है। गुरु शिष्य के रिश्ते अपनी गरिमा के लिए जाने जाते रहे हैं। वे भाग्यशाली हैं जिनके पास गुरु होते हैं और वे शौभाग्यशाली हैं जिनको ऐसे शिष्य मिल जाते हैं।
Labels: ज्ञान- धारा
Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:36:00 am 0 comments
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