सोरायसिस, जिसे हिन्दी में विचर्चिका, चम्बल या अपरस रोग कहते हैं, बहुत ही कष्टदायक, कष्टसाध्य और किसी किसी केस में असाध्य (लाइलाज) रोग है। इस रोग का सही-सही निदान नहीं हो पाया है कि यह रोग किन कारणों से होता है।
इस रोग में पूरे शरीर में कहीं भी खुजली चला करती है, त्वचा पर लाल-लाल, गोलाकार चवन्नी-अठन्नी के आकार के चकत्ते (चठ्ठे या दंदोड़े) बनते हैं, त्वचा पर छिछड़े जैसी परतें उभर आती हैं, जिन्हें खुजाने पर रक्त निकल आता है। ये चकत्ते पूरे शरीर में, यहाँ तक कि हथेली और पैर के तलुओं में भी, निकल आते हैं।
यह रोग स्त्री या पुरुष किसी को भी किसी भी आयु में हो सकता है। इस रोग के प्रभाव से त्वचा मलिन होने लगती है, धीरे-धीरे काली पड़ जाती है। इस रोग के प्रभाव से सिर की त्वचा में भी खुजली चलने लगती है और सिर के बाल उड़ने लगते हैं।
चिकित्सा
इसकी एक चिकित्सा है, जिसे 6-7 मास तक नियमित रूप से बिना भूले-चूके, करना चाहिए-
चोपचन्यादि चूर्ण 50 ग्राम, बंगभस्म, लौहभस्म, ताप्यादि लोह, तीनों 10-10 ग्राम, गन्धक रसायन 30 ग्राम, स्वर्णमाक्षिक भस्म व समीर पन्नग रस 5-5 ग्राम। सबको ठीक से मिलाने के लिए खरल में डालकर थोड़ी देर तक घुटाई करें, फिर इस मिश्रण की 60 पुड़िया बनाकर बॉटल या डिब्बे में रख लें। सुबह-शाम 1-1 पुड़िया शहद में मिलाकर चाट लें। इसके एक घण्टे बाद अरोग्यवर्द्धिनी वटी विशेष नं। 1 और पंच निम्बादि वटी की 2-2 गोली पानी के साथ लें।
भोजन करने के बाद दोनों वक्त खदिरारिष्ट, महामंजिष्ठादि काढ़ा और रक्त शोधान्तक या रक्तदोषान्तक-तीनों 4-4 चम्मच आधा कप पानी में डालकर पिएं। सोने से पहले चन्दनबला लाक्षादि तेल पूरे शरीर पर लगाएं। सुबह उठने के बाद चर्म रोगनाशक तेल पूरे शरीर पर लगाएं और आधा घंटे बाद कुनकुने गर्म पानी से स्नान करें।
07 फ़रवरी 2010
सोरायसिस रोग
Labels: आयुर्वेद
Posted by Udit bhargava at 2/07/2010 07:06:00 am 3 comments
06 फ़रवरी 2010
संयुक्त घराना के अकार्य
अनेक प्रकार्यो के साथ-साथ, संयुक्त परिवार अथवा घराना की संरचना में कई अकार्य भी देखने में आते हैं। समाजशास्त्रियों द्वारा निम्नलिखित अकार्यों की चर्चा की गई है:-
संयुक्त घर छोटी-छोटी बातों पर संघर्ष का केंद्र होता है। सदस्यों के बीच में आपसी तालमेल, समायोजन तथा सात्मीकरण का सामान्यत: अभाव होता है। मतभेद एवं कटुता से आंतरिक अंतर्विरोध पैदा होता है। जो संयुक्त घराने के विघटन के लिए रास्ता तैयार करता है।
संयुक्त घराने को सदस्यों के स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास में बाधा माना जाता है। सामान्यत: घर का मुखिया सारे महत्त्वपूर्ण निर्णय खुद लिया करता है फलस्वरूप हर व्यक्ति की पसंद या नापसंद का खयाल रखना संयुक्त घर में संभव नहीं हो पाता। इस तरह स्वतंत्र रचनात्मक संभावना का पूरी तरह विकास एवं दोहन नहीं हो पाता।
कभी-कभी नये विवाहित जोड़ी के बीच आत्मीयता का विकास नहीं हो पाता फलस्वरूप मनोवैज्ञानिक असंतोष एवं नासमझी का माहौल रहता है। संयुक्त परिवार व्यवस्था के अंतर्गत विवाहित युवा स्त्रियों का अधिकांश समय घर के सभी सदस्यों की आवश्यकता पूर्ति में खर्च होता है। इसके कारण उन्हें उचित तरीके से अपने स्वास्थ्य पर धयान देने या आनंद उठाने के लिए समय या अवसर नहीं मिल पाता।
संयुक्त घराने में बुर्जुग तथा युवा दोनों प्रकार के सदस्य पाये जाते है, फलस्वरूप पीढ़ियों के संघर्ष कई प्रकार से उभरते रहते है। बुर्जग लोग कठोरता से पारंपरिक मूल्यों एवं विश्वासों का पालन करते हैं। वे नए सांस्कृतिक चलन एवं सीमा को स्वीकार नहीं पाते। आजकल युवा व्यक्तिवाद के पक्षञ्र होने लगे है एवं पारंपरिक मूल्यों को अञ्निायकवादी, पक्षपातपूर्ण एवं अन्यायी मानकर इनका विरोध करने लगे हैं। इसके कारण कई बार परिवार में समस्याएँ पैदा हो जाती है और घर की शांति भंग हो जाती है। विभिन्न पीढ़ियों की सामाजिक अभिरूचियों में अंतर होता है।
संयुक्त परिवार में परिवर्तन
संयुक्त परिवार में निम्नलिखित परिवर्तनों की चर्चा समाजशास्त्रियों द्वारा अक्सर की जाती है :-
.
संरचनात्मक परिवर्तन
जिन तथ्यों एवं मूल्यों ने संयुक्त परिवार या घराने की व्यवस्था का पोषण किया, स्थायित्व दिया एवं कायम रखा वे निम्नलिखित हैं :-
(1) पुत्रों में पिता के प्रति समर्पण की भावना,
(2) आर्थिक रूप से समर्थ सदस्यों का संयुक्त परिवार के अन्य सदस्यों की मदद के लिए तत्पर रहना जो खुद अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ हैं,
(3) बुजुर्ग स्त्री-पुरूष के लिए राज्य द्वारा नियोजित सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था का अभाव होना, एवं
(4) जमीन, पूंजी एवं श्रम के चतुर्दिक लाभ की दृष्टि से संगठन एवं दोहन के लिए संयुक्त परिवार के आकार द्वारा दिया गया भौतिक प्रोत्साहन।
अब संयुक्त घरों में निम्नलिखित कारणों से विघटन हो रहा है :-
(1) भाइयों की आमदनी में अंतर जो घर में कलह को जन्म देता है।
(2) बेटों और उनकी पत्नियों में पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने की भावना में कमी।
(3) पाश्चात्य शैली के प्रभावस्वरूप युवकों मे व्यक्तिवाद का विकास।
(4) अर्थव्यवस्था में सेवाक्षेत्र का बढ़ता महत्त्व तथा बाहरी आमदनी के बढ़ते अवसर के कारण नाभिकीय परिवारों को वरीयता।
प्रकार्यात्मक परिवर्तन
इसकी तीन स्तरों पर पड़ताल की जा सकती है :
1। पति-पत्नी संबंध - पारंपरिक घरों में निर्णय लेने के काम में पत्नी, अपने पति के सहायक की भूमिका निभाती थी। परन्तु समकालीन घरों में पत्नी, अपने पति के बराबर ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाती है। फलस्वरूप घर के कार्य एवं बाहर के कार्य की दृष्टि से पति-पत्नी एक - दूसरे के साथ सहयोग एवं समयोजन करने लगे हैं।
2। माता-पिता एवं बच्चों का संबंध - पारंपरिक परिवारों में शक्ति एवं अधिकार पूरी तरह से र् कत्ता के हाथ में होता था और उसे शिक्षा, व्यवसाय एवं बच्चों के विवाह के बारे में निर्णय लेने के लिए परिवार में असीमित अधिकार प्राप्त होते थे। समकालीन परिवारों में अब अधिकांशत: माता-पिता एवं उनके बच्चे सामूहिक रूप से मिल-जुल कर निर्णय करने लगे हैं।
3। सास-श्वसुर (ससुर) के साथ बहू का संबंध - इस संबंध में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है। शिक्षित बहू अपने ससुर के सामने पर्दा नहीं रखती। सास-बहू के संबंध में भी पहले की तुलना में अब कम कटुता है। सास अब शक्तिशाली पद नहीं रहा परन्तु वह ससुर की तरह एक सम्मानीय संबंधी अब भी है।
Posted by Udit bhargava at 2/06/2010 07:57:00 pm 0 comments
जीवन साथी चुनने के नियम
समाज के एक खास समूह की पहचान व पवित्रता कायम रखने के लिए हिन्दू स्मृतिकारों ने योग्य साथी चुनने या विवाह करने के लिए विस्तृत नियम तथा रीतियों की व्यवस्था दी है। ये नियम दो सिध्दांतों पर आधारित हैं, यथा अन्तर्विवाह के नियम तथा बहिर्विवाह के नियम।
अन्तर्विवाह - जीवन साथी चुनने के लिए अपनी जाति या उपजाति के अंतर्गत ही चुनाव करने की स्वतंत्रता है।
1। जातिय अंतर्विवाह : इस नियम के अंतर्गत एक व्यक्ति को अपनी जाति के अंतर्गत ही विवाह करने की छूट है। कोई व्यक्ति अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता। इस नियम को नहीं मानने वाले व्यक्ति को जाति पंचायत के द्वारा सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कठोर दंड दिया जाता है। दंड के फलस्वरूप व्यक्ति के साथ जातिगत सहयोग और सुरक्षा के हर दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और उसे जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है।
2। उपजातिय अंतर्विवाह : प्रत्येक जाति अनेक उपजाति में विभक्त होती है जिनमें तुलनात्मक श्रेष्ठता को लेकर अंतर्विरोध होता है। ऐसे प्रत्येक समूह धीरे-धीरे अंतर्विवाही बन जाते है। जैसे ब्राह्मण जाति के अंतर्गत ही सारस्वत, गौड़, कान्यकुब्ज जैसी उपजातियाँ हैं जो अंतर्विवाही हैं।
बहिर्विवाह :
बहिर्विवाह के नियम के अनुसार हर व्यक्ति को अपने समूह के बाहर विवाह करना होता है। यद्यपि अंतर्विवाह एवं बहिर्विवाह के नियम प्रत्यक्ष रूप में विराधी दिखाई पड़ते हैं परन्तु दोनों नियम एक - दूसरे के पूरक है तथा दो स्तरों पर व्यवहारित होते हैं। हिंदू समाज में बहिर्विवाह के दो रूप पाये जाते हैं :-
1. सगोत्र बहिर्विवाह :
एक गोत्र से जुड़े व्यक्ति सगोत्रीय कहलाते हैं। गोत्र एक वंश समूह (क्लान) या परिवार समूह है, जिसके सदस्य आपस में विवाह करने से प्रतिबंञ्ति होते हैं। यह मान्यता है कि सभी सगोत्रीय एक ही पूर्वज की संतान होते हैं और उन सभी में रक्त संबंध होता है। सगोत्र बहिर्विवाह के नियम को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 ने अप्रभावी बना दिया है।
2. सपिण्ड बहिर्विवाह :
सपिण्ड लोग एक दूसरे के रक्त संबंधी होते हैं। पिता की ओर से सात एवं माता की ओर से पांच पीढ़ियों तक जुड़े रक्त संबंध सपिण्ड कहलाते हैं। एक व्यक्ति अपने जीवन साथी का चुनाव सपिण्ड समूह के अंतर्गत नही कर सकता। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 सामान्यत: सपिण्ड अन्तर्विवाह की इजाजत नहीं देता, परन्तु दक्षिण भारत में प्रचलित ममेरे-फुफेरे भाई बहनों को भी प्रथागत रूप में अपवाद स्वरूप स्वीकार करता है। सपिण्ड बहिर्विवाह का नियम सपिण्ड रिश्तेदारों में विवाह का निषेध करता है। जीवित व्यक्ति और उसके मरे हुए पुरखों के बीच संबंध को सपिण्ड संबंध कहते हैं। सपिण्ड का अर्थ है (1) वे जिनके शरीर का पिण्ड एक समान हैं तथा (2) वे जो मृत पूर्वज को एक साथ पिण्ड दान करते हैं। हिंदु स्मृतिकार सगोत्र की अलग-अलग परिभाषा देते हैं। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 पिता की तरफ से पांच पीढ़ियों एवं माता की तरफ से तीन पीढ़ियों तक सपिण्ड संबंध से जुड़े व्यक्तियों के बीच वैवाहिक संबंध की स्वीकृति नहीं देता।
अंतर्जातीय विवाह :
दो भिन्न जातियों के स्त्री-पुरूष के बीच के वैवाहिक संबंध को अंतर्जातीय विवाह कहते हैं। उदाहरण के लिए, जब ब्राह्मण जाति की एक स्त्री बुनकर जाति के एक पुरूष से विवाह करती है तो इसे अंतर्जातीय विवाह कहते हैं। प्रथा के अनुसार अंतर्जातीय विवाह को स्वीकृति नहीं है, परंतु अब शहरी इलाकों में इस प्रथा का पूरी तरह से पालन नहीं किया जाता।
विवाह के अन्य नियम :
1. अनुलोम विवाह - अनुलोम उस विवाह को कहते है, जिसमें उच्च कुल का पुरूष निम्न कुल की स्त्री से विवाह करता है ।
2। प्रतिलोम विवाह - प्रतिलोम उस विवाह को कहते हैं, जिसमें उच्च कुल की स्त्री निम्न कुल के पुरूष से विवाह करती है। विशेष विवाह अध्िनियम 1954, हिन्दू विवाह अधिनियम 1955, हिन्दू विवाह कानून (संशोञ्न) अधिनियम 1976 इत्यादि के कारण अब अंतर्जातीय विवाह को कानूनी मान्यता प्राप्त हो गई है। फलस्वरूप प्रतिलोम नियम कमजोर हो गया है।
Posted by Udit bhargava at 2/06/2010 07:35:00 pm 0 comments
हिन्दू विवाह के प्रकार
हिन्दू धर्म ग्रंथों में विवाह के आठ प्रकार का वर्णन है जो निम्नलिखित हैं :
1। ब्राह्म विवाह : हिन्दुओं में यह आदर्श, सबसे लोकप्रिय और प्रतिष्ठित विवाह का रूप माना जाता है। इस विवाह के अंतर्गत कन्या का पिता अपनी कन्या के लिए विद्वता, सामर्थ्य एवं चरित्र की दृष्टि से सबसे सुयोग्य वर को विवाह के लिए आमंत्रित करता है। और उसके साथ पुत्री का कन्यादान करता है। इसे आजकल सामाजिक विवाह या कन्यादान विवाह भी कहा जाता है।
2। दैव विवाह : इस विवाह के अंतर्गत कन्या का पिता अपनी सुपुत्री को यज्ञ कराने वाले पुरोहित को देता था। यह प्राचीन काल में एक आदर्श विवाह माना जाता था। आजकल यह अप्रासंगिक हो गया है।
3। आर्ष विवाह : यह प्राचीन काल में सन्यासियों तथा ऋषियों में गृहस्थ बनने की इच्छा जागने पर विवाह की स्वीकृत पध्दति थी। ऋषि अपनी पसन्द की कन्या के पिता को गाय और बैल का एक जोड़ा भेंट करता था। यदि कन्या के पिता को यह रिश्ता मंजूर होता था तो वह यह भेंट स्वीकार कर लेता था और विवाह हो जाता था परंतु रिश्ता मंजूर नहीं होने पर यह भेंट सादर लौटा दी जाती थी।
4। प्रजापत्य विवाह : यह ब्राह्म विवाह का एक कम विस्तृत, संशोञ्ति रूप था। दोनों में मूल अंतर सपिण्ड बहिर्विवाह के नियम तक सीमित था। ब्राह्म विवाह का आदर्श पिता की तरफ से सात एवं माता की तरफ से पांच पीढ़ियों तक जुड़े लोगों से विवाह संबंध नहीं रखने का रहा है। जबकि प्रजापत्य विवाह पिता की तरफ से पांच एवं माता की तरफ से तीन पीढ़ियों के सपिण्डों में ही विवाह निषेध की बात करता है।
5। आसुर विवाह : यह विवाह का वह रूप है जिसमें ब्राह्म विवाह या कन्यादान के आदर्श के विपरीत कन्यामूल्य एवं अदला-बदली की इजाजत दी गई है। ब्राह्म विवाह में कन्यामूल्य लेना कन्या के पिता के लिए निषिध्द है। ब्राह्म विवाह में कन्या के भाई और वर की बहन का विवाह (अदला-बदली) भी निषिध्द होता है।
6। गंधर्व विवाह : यह आधुनिक प्रेम विवाह का पारंपरिक रूप था। इस विवाह की कुछ विशेष परिस्थितियों एवं विशेष वर्गों में स्वीकृति थी परन्तु परंपरा में इसे आदर्श विवाह नहीं माना जाता था।
7। राक्षस विवाह : यह विवाह आदिवासियों में लोकप्रिय हरण विवाह को हिन्दू विवाह में दी गई स्वीकृति है। प्राचीन काल में राजाओं और कबीलों ने युध्द में हारे राजा तथा सरदारों में मैत्री संबंध बनाने के उद्देश्य से उनकी पुत्रियों से विवाह करने की प्रथा चलायी थी। इस विवाह में स्त्री को जीत के प्रतीक के रूप में पत्नी बनाया जाता था। यह स्वीकृत था परंतु आदर्श नहीं माना जाता था।
8। पैशाच विवाह : यह विवाह का निकृष्टतम रूप माना गया है। यह ञेखे या जबरदस्ती से शीलहरण की गई लड़की के अधिकारों की रक्षा के लिए अंतिम विकल्प के रूप में स्वीकारा गया विवाह रूप माना गया है। इस विवाह से उत्पन्न संतान को वैध संतान के सारे अधिकार प्राप्त होते हैं।
Posted by Udit bhargava at 2/06/2010 07:32:00 pm 0 comments
संत शिरोमणि गुरु रविदास
संत रविदास की गणना केवल भारत में ही नहीं अपितु विश्व के महान संतों में की जाती है। जिन्हें संत शिरोमणि गुरु रविदास से नवाजा गया है। संत रविदास की वाणी के अनुवाद संसार की विभिन्न भाषाओं में पाए जाते हैं, जिसका मूल कारण यह है कि संत रविदास उस समाज से सम्बद्ध थे, जो उस समय बौद्धिकता और ज्ञान के नाम से पूर्णतः अछूता था।
समय जहाँ विविध प्रकार की समस्याओं को लेकर आता है वहीं समाधान भी अपने आगोश में छिपाए रहता है। परंतु महान व्यक्तित्व समय की परिधि को लाँघकर अपने बाद के हजारों वर्षों बाद तक प्रेरणा प्रदान करते रहते हैं। वे ऐसे कार्य की शुरुआत करते हैं जिनका मूल्य समय के क्रूर प्रहारों से कम नहीं हो सकता। ऐसे संत रविदासजी की जयंती, जो पूरे विश्व में मनाई जाती है।
।
।
आज दिवस लेऊँ बलिहारा,
मेरे घर आया प्रभु का प्यारा।
आँगन बंगला भवन भयो पावन,
प्रभुजन बैठे हरिजस गावन।
करूँ दंडवत चरण पखारूँ,
तन मन धन उन परि बारूँ।
कथा कहैं अरु अर्थ विचारैं,
आप तरैं औरन को तारैं।
कहिं रैदास मिलैं निज दास,
जनम जनम कै काँटे पांस।
ऐसे पावन और मानवता के उद्धारक सतगुरु रविदास का संदेश निःसंदेह दुनिया के लिए बहुत कल्याणकारी तथा उपयोगी है।
Labels: संत महापुरुष
Posted by Udit bhargava at 2/06/2010 03:26:00 pm 0 comments
भारतीय रहस्यदर्शी मेहर बाबा
सूफी, वेदांत और रहस्यवादी दर्शन से प्रभावित मेहर बाबा एक रहस्यवादी सिद्ध पुरुष थे। कई वर्षों तक वे मौन साधना में रहे। मेहर बाबा के भक्त उन्हें परमेश्वर का अवतर मानते हैं।
25 फरवरी 1894 में मेहर बाबा का जन्म पूना में पारसी परिवार में हुआ। 31 जनवरी 1969 को मेहराबाद में उन्होंने देह छोड़ दी। उनका मूल नाम मेरवान एस। ईरानी था। वह एस. मुंदेगर ईरानी के दूसरे नंबर के पुत्र थे।
बाबा एक अच्छे कवि और वक्त थे तथा उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था। 19 वर्ष की आयु में उनकी मुलाकात रहस्यदर्शी महिला संत हजरत बाबाजान से हुई और उनका जीवन बदल गया। इसके बाद उन्होंने नागपुर के हजरत ताजुद्दीन बाबा, केदगाँव के नारायण महाराज, शिर्डी के साँई बाबा और साकोरी के उपासनी महाराज अर्थात पाँच महत्वपूर्ण हस्तियों को अपना गुरु माना।
मेहर मंदिर : उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में बाबा के भक्त परमेश्वरी दयाल पुकर ने 1964 ई। में मेहर मंदिर का निर्माण करवाया था। 18 नवम्बर 1970 ई. को मंदिर में अवतार मेहर बाबा की प्रतिमा स्थापित की गई थी। यहाँ पर प्रत्येक वर्ष 18 और 19 नवम्बर को मेहर प्रेम मेले का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा भी मेहर बाबा के कई मंदिर है।
मेहराबाद आश्रम : हालाँकि मूलत: उनका विशालकाय आश्रम महाराष्ट्र के अहमदनगर के पास मेहराबाद में हैं जो मेहर बाबा के भक्तों की गतिविधियों का केंद्र माना जाता है। इसके पहले मुंबई में आश्रम था।
Labels: संत महापुरुष
Posted by Udit bhargava at 2/06/2010 03:15:00 pm 0 comments
गजानन महाराज
समर्थ श्री गजानन महाराज का प्रगटोत्सव 5 फरवरी को मनाया जाता है। पृथ्वी पर समस्त जग का कल्याण करने के लिए समय-समय पर संतों के अवतार होते हैं और वे परोपकार में ही अपनी देह खपाते रहते हैं। ऐसे ही एक संत है- श्री गजानन महाराज शेगाँव वाले। उनका समाधि मंदिर शेगाँव में ही है।
गजानन महाराज दिगंबर वृत्ति के सिद्ध कोटि के साधु थे। जो भी मिले खा लेना, कहीं भी रह लेना, कहीं भी भ्रमण करना और मुख से हमेशा परमेश्वर का भजन करते रहना, ऐसी उनकी दिनचर्या थी।
भक्तों के संकट दूर करके परमेश्वर दर्शन करवाने के सैकड़ों उदाहरण उनके चरित्र में हैं। शेगाँव स्थित गजानन महाराज के मंदिर में हमेशा भक्तों की भीड़ लगी रहती है। शेगाँव का नाम महाराष्ट्र के प्रमुख तीर्थस्थानों में शामिल है।
महाराष्ट्र में बुलढाना जिले में सेंट्रल रेलवे के मुंबई-नागपुर मार्ग पर शेगाँव स्थित है। श्री गजानन का मंदिर बीचों-बीच स्थित है जिसके महाद्वार की खिड़की रात भर खुली रहती है। उनका समाधि मंदिर गुफा में स्थित है। मंदिर परिसर में वर्ष भर भजन व प्रवचन चलते रहते हैं। रोजाना सुबह होने वाली पूजा-अर्चना विधिवत चलती है। जिसमें काकड़ आरती और शयन आरती भी शामिल हैं।
श्री गजानन महाराज का प्रकट दिवस माघ वद्यानवमी (फरवरी माह) में तथा इनकी पुण्यतिथि (ऋषि पंचमी के दिन) पर शेगाँव में प्रमुख उत्सव मनाया जाता है, मंदिर के चारों ओर रोशनी की जाती है। हाथी, घोड़ा, रथ, पालकी, दिंडी आदि के साथ जुलूस निकाला जाता है।
शहरी चमक-दमक से दूर शेगाँव में सादगी और महाराष्ट्र के ग्रामीण जीवन की सहजता की झलक मिलती है। जो लोग यहाँ आध्यात्मिक शांति की तलाश में आते हैं, उनके लिए यहाँ पर बहुत कुछ हैं। मंदिर परिसर में ही एक धार्मिक वाचनालय है। जो भक्तों के लिए खुला रहता है। पास में ही 'गजानन वाटिका' नामक सुंदर वाटिका है और एक प्राणी संग्रहालय भी हैं। बाहर से आने वाले भक्तों की सुविधा के लिए मंदिर परिसर में ही भव्य 'भक्त निवास' बना हुआ है, जहाँ कम दरों पर कमरे मिलते हैं। साथ ही महाप्रसादी का वितरण भी किया जाता है।
Labels: संत महापुरुष
Posted by Udit bhargava at 2/06/2010 03:12:00 pm 0 comments

एक टिप्पणी भेजें