यह घर पिता और माँ का है। चार संतानों का विवाह हो चुका है। अवकाश प्राप्ति के बाद उसके दृष्टि-केन्द्र में अब नीरजा और सुमीत हैं।
पिता भोजन के कमरे में लम्बी-चौडी मेज पर फैले कागज-पत्रों में डूबे हुए हैं। उनका पेन निरंतर चल रहा है।
माँ रसोई में खाना पकाने में संलग्न हैं। नीरजा मेज पर बरतन लगा रही है। तभी फोन की घंटी बज उठी है। पिता हाथ बढाकर फोन का चोंगा उठा लेते हैं- हैलो ऽ!
सुमीत है?
नहीं, अभी कालेज से नहीं लौटा। क्या कोई खास काम है आपको?
मेरे नोट्स उसके पास थे। मैंने सोचा, उससे कहूँ, दे जाए।
बेटी आपका नाम क्या है?
कंवलजीत।
आप घर का पता दे दें तो मैं सुमीत को कह दूँगा। वह आपके घर आकर दे जाए।
नहीं, घर ढूंढना उसके लिए मुश्किल होगा। मैं फिर फोन कर दूँगी।
यह पहली ही बार है कि किसी लडकी का सुमीत के नाम फोन आया है।
दिन के दो बजे खाना खाया जा चुकता है। माँ फिर रसोई संभालने में लग जाती हैं। नीरजा मेज को खाली करके पोंछने लगती है। पिता फिर फाइलों के आगे बैठ जाते हैं। हाथ में पेन तीव्र गति से दौडता हुआ और चश्मे के अंदर एकाग्रता के सूत्र में बंधी आंखें मंथर गति से सरकती हुई। कभी चलते-चलते पेन कागज से ऊपर उठकर कुछ सोचने लगता है। सैनिक अनुशासन से फिरा एक जीवन- एक पिता।
इसी बीच सुमीत कालेज से लौट आया है। आते ही पिता ने उसे बुलाया है। पहला सवाल पूछते हैं, तुम्हारे पास किसी के नोट्स हैं?
नहीं तो।
यह कंवलजीत कौन है? उसने कहा है कि उसके नोट्स तुम्हारे पास हैं।
मेरे पास किसी के नोट्स नहीं हैं और न मैं किसी कंवलजीत को जानता हूँ।
उसने कहा है कि वह फिर फोन करेगी। तब शायद तुम्हें पता चल जाए कि वह कौन है और तुम उसे जानते हो या नहीं। पिता ने ठहरी हुई आवाज में कहा है।
पिता की इस कोर्ट आफ इन्क्वायरी के बाद सुमीत बाहर बरामदे की मेज पर अपने आगे रखे भोजन को अनमनेपन से खाने लगा। उसका हाथ रोटी के बदले अनजाने ही में अमरूद और संतरे की प्लेट की ओर बढ गया। पास खडी नीरजा ने कोमलता से टोका, पहले खाना खा लो, फिर इसे खाना। कि तभी फोन की घंटी बज उठी।
कई कदम एक साथ कमरे की ओर बढ गये। आगे सुमीत और पीछे पिता तथा माँ। नीरजा दरवाजे की ओट में कहीं खडी रह गई, जैसे कि किसी के व्यक्तिगत मामले में यूं सबका सक्रिय ढंग से बीच में आना ठीक न हो। वह जैसे बीच में न आकर, साथियों की संख्या कम कर के सुमीत की परेशानी को कम करना चाह रही है।
हैलोऽ!
हैलोऽ!ऽ अपनी पहचान देता हुआ उधर का स्वर।
यह कोई तरीका है फोन करने का? एक आवेश, गुस्सा और तनाव है सुमीत के स्वर में।
क्यों? क्या तरीका पसंद नहीं आया?
... उत्तर में एक तना हुआ मौन है।
बहुत दिन हुए तुम बस में मिले नहीं। सोचा, फोन पर बात कर लूँ..।
उस ओर की बात के खत्म होने से पहले ही चोंगा धडाम से नीचे आकर अपने आसन पर बैठ गया, जैसे कि वह कह रहा हो, बात ही करनी थी तो पिताजी को बीच में लाने की क्या जरूरत थी?
कौन थी?
रश्मी।
तुम उसे जानते हो?
हाँ।
तुम्हारा उससे परिचय कैसे हुआ?
बस में मिली थी।
बस में जाने से क्या किसी से दोस्ती हो जाती है?
मेरी इससे कोई दोस्ती नहीं है।
फिर उसे तुम्हारा फोन नम्बर कैसे मिला?
एक बार बस में भीड थी। मेरा एक हाथ बस से छूट गया था और दूसरे हाथ में फाइल थी। मैं बडी मुश्किल से बचा। तब इस लडकी ने मेरी फाइल ले ली थी। शायद वहाँ से उसने फोन नम्बर देख लिया होगा।
पर लगता है, उससे तुम्हारी काफी गहरी और पुरानी जान-पहचान है।
पहले बस में आती थी। अब हमारा रूट बदल गया है तो कभी देखा ही नहीं।
यह ठीक है कि उसने तुम्हें सहायता दी। इसके लिए तुम्हारा धन्यवाद दे देना ही काफी था। मैं भी तो अपने जीवन के आरम्भिक दिनों में ट्रेन में रोज सफर करता था दफ्तर जाने के लिए। पर मेरा तो किसी से परिचय या दोस्ती नहीं हुई।
सुनकर सभी हँस दिए।
अब आपकी तरह सभी तो नहीं हो सकते।
इस पर पिता हँस दिए। सुमीत कहने को यह नहीं सोच पाया कि उस वक्त न लडकियाँ आज की तरह कालेज पढने जाती थीं, न नौकरी करने दफ्तर आदि।
लगा, बात यहीं हँसी में खत्म हो गई है। पिता और माँ विश्राम करने लगे। सुमीत भी खाना खाकर लेट गया। ऊपर से वह सहज था, पर मन ही मन घबराहट और कुढन से भरा हुआ। नीरजा छोटे भाई के इस तरह के स्पष्ट घिराव और पेशी पर संकोच तथा उदासी महसूस करती हुई, अपने कमरे में आकर किसी पत्रिका को पढने बैठी तो सुमीत की बातें एक-एक कर उसके मन-मस्तिष्क में चक्कर काटने लगीं। पिछले वर्ष जब चित्रलेखा और आषाढ का एक दिन सुमीत को पढा रही थी तब प्रेम और नारी का उलझा-उलझा दार्शनिक वर्णन और उसकी व्याख्या सुनते हुए उसने कहा था, जब हमें प्रेम का अता-पता नहीं कि क्या बला है तो ये क्यों ऐसी किताबें रखते हैं हमारे कोर्स में? माँ-बाप प्रेम-दोस्ती का विरोध करते हों और किताबें कोर्स में हैं। इंसान क्या करे, कुछ समझ नहीं आता इस दुनिया का चलन। सुमीत के मन-मस्तिष्क की पंखुडियाँ कदम-कदम पर इस विषय पर उत्सुकता और प्रश्नों से मुकुलित हो उठतीं। उन पंखुडियों को मूँदने के लिए उसने किसी बहस के बदले समयाभाव और परीक्षा की चिंता की ओर सुमीत का ध्यान खींच दिया था।
और एक दिन फिर किसी संदर्भ में, .. मेरा एक दोस्त है। लडकियों के अलावा कोई बात ही उसे नहीं आती। जब भी पूछो, कहाँ गया था कल? वहाँ.. अरे यार वहाँ.. तुम्हें क्या पता..। रहनी-बहनी नहीं रही उसमें। सभ्यता नहीं रही। बटन खुले, बूट सफेद, बिल्कुल मजनू। ठीक है, दोस्ती करो मैं कहता हूँ करनी चाहिए। एकाध लडकी से दोस्ती करनी ही चाहिए.. पर दोस्ती दोस्ती तक.. जायज दोस्ती.. नाजायज दोस्ती नहीं.. दूसरे का जीवन बरबाद करने के लिए.. धोखा देने के लिए नहीं। लडकियों से दोस्ती एक मायने रखती है। उनसे बोलना.. कहीं जाना उनके साथ.. उनके साथ खडा होना मायने रखता है.. व्यक्ति सीखता है बहुत कुछ। यह क्या हुआ कि शादी के बाद जो एक स्त्री मिले, बस उसी से दोस्ती, प्रेम, लडाई-झगडा आदि सब कुछ की शुरुआत और अंत करो। उस दिन संजय भाई इस तरह मुझसे बात कर रहा था जैसे कि लडकियों से दोस्ती करना केवल उसी को आता है..।
नीरजा ने टोकना चाहकर भी धैर्य से सुनने के बाद भयातुर होकर कहा था, अभी तुम बच्चे हो न! समय आने पर अपने आप हो जाएगी दोस्ती।
हाँ, कल बच्चा था.. आज भी बच्चा हूँ.. शादी के बाद भी माँ-बाप बच्चा ही कहेंगे। अपने तो माँ-बाप ही ऐसे हैं.. दोस्ती के नाम पर बवंडर खडा कर देने वाले। कोई कुछ कर ही नहीं सकता।
जिंदगी व्यवस्थित हो जाए, कुछ पढ लो तो ठीक है न!
सब व्यवस्थित है। कॉलेज में आ गया हूँ। अगर इस जीवन में दोस्ती न हुई तो क्या बूढे होकर दोस्ती करेंगे?
मनोनुकूल श्रेणी पाने के लिए अभी तुम्हें कुछ अंकों की कमी पूरी करनी है। लगता है, परीक्षा के दिनों की परेशानी और चिंता तुम भूल गये हो।
नीरजा ने सुमीत का ध्यान बंटाने की बार-बार कोशिश की लेकिन वह नहीं बंटा, शुरू में कुछ दिन परेशानी होती है जरा.. माइंड डिस्टर्ब रहता है.. अपने को उसकी पटरी पर लाना या उसको अपनी पर.. फिर तो सब सहज चलता रहता है।
नीरजा सोचती है.. इतनी समझदारी और जानकारी की बातें क्या कोई बिना अनुभव के कर सकता है? पर उसने पूछा तो सुमीत ने इनकार कर दिया। तब सांत्वनाभाव से समझाने और अप्रत्यक्ष भाव से उसके मन की भटकन को वर्जते हुए वह बोली, दोस्ती तो ऐसी चीज है जो अपने आप होती है.. उसके लिए सोचने या यत्न की क्या जरूरत है?
यत्न की जरूरत होती है। लडकों को लडकी से दोस्ती करने के लिए चुनाव करना होता है.. किससे करें.. किससे नहीं। वह उत्तर देते-देते नीरजा के प्रश्न पर एकाएक सचेत होकर उसे देखने लगा था।
नीरजा ने उसकी दृष्टि से सचेत होकर कहा, मैंने तो यूँ ही पूछा है। जैसे तुमने सब कुछ कहा है सहजभाव से, क्या मैं तुम्हारी तरह नहीं कह-पूछ सकती?
हाँ, हाँ, क्यों नहीं? मैं तो ये सारी बातें तुमसे इसलिए करता हूँ क्योंकि तुम अभी नादान हो। इससे तुम्हारा ज्ञान बढेगा, जैसे कि हमारा ज्ञान हमारे दोस्त ने बढाया है। नीरजा का मन हँस देता है इस छोटी-सी बुजुर्गियत पर।
सुमीत शंकित होकर चेतावनी देता है, कहीं तुम ये सारी बातें पिताजी को मत कह देना। मैंने देखा है, हमारे घर के लोग किसी बात को ज्यादा देर तक पेट में नहीं पचा सकते।
रात के दस बजे थे। सुमीत के कमरे में पिता और माँ ने उसे जा घेरा और वह इस तरह घिर गया जैसे वह इसके लिए तैयार ही बैठा था। पिता की हँसी के बावजूद उसे मामले के इतनी जल्दी और इतनी आसानी से शांत हो जाने का विश्वास नहीं था। उसे हैरानी यह थी कि घिराव इतनी देर से क्यों हुआ है? एक बार फिर पिता उसे स्पष्ट समझा रहे थे, .. जीवन कुछ खास सिद्धांतों पर चलता है और उन सिद्धांतों में किसी के साथ.. माँ-बाप के साथ.. प्रिय से प्रिय के साथ भी समझौता नहीं किया जाता। क्या तुम्हारे जीवन में ऐसे किसी सिद्धांत का स्थान है? तुम्हारा व्यक्तित्व बहुत ही नाजुक किस्म का है, जो जल्दी ही किसी प्रलोभन में आ जाता है। एक बार आगे भी कहा था.. तुम अपने चाल-चलन का दान हमें दे दो.. उसके अतिरिक्त हमें कुछ भी नहीं चाहिए। लडकियों का मामला बडा खतरनाक होता है.. आत्मघाती.. हत्यारा। उसके साथ खेलना आग के साथ खेलना है। अपने इसी मोहल्ले की यह घटना है..। याद होगी तुम्हें। लडकी माँ बनने वाली थी। लडकी के पिता और भाई लडके वालों के घर आए कि शादी करो। वह नहीं माने। लडका भाग गया। उन्होंने उसके बडे भाई और पिता की हत्या कर दी। इस तरह से तो भ्रष्ट स्त्री ही मिलेगी, फिर उससे छुटकारा पाना कठिन है। तुम्हारी उम्र क्या है अभी? अभी से इस चक्कर में पड गए तो तुम पागल हो जाओगे.. टी.बी. हो जाएगी.. यह पढाई धरी की धरी रह जाएगी। पढाई साधना मांगती है। सुबह-सुबह कोई माँस नहीं खाता। हम साधारण लोग हैं.. हमें साधारण ही बनकर रहना चाहिए.. यह सब चीजें हमारे लिए नहीं..। जिन्दगी में वैसे ही अनेक परेशानियां हैं। तुम हमारे लिए एक और परेशानी खडी कर रहे हो।
पर मैं आपको सच बता दूँ कि ऐसा कुछ मैंने किया नहीं जिस पर मुझे शर्मिन्दा होने या डरने की जरूरत हो। वास्तव में इस लडकी के साथ मेरा कोई संबंध है ही नहीं। मेरे दोस्त के साथ उसकी मित्रता जरूर रही है। वह उम्र में मुझसे कितनी बडी है। किसी फर्म में रिसेप्शनिस्ट है। और कोई काम न हुआ तो बैठे-बैठे फोन करना उसका शगल है..। इस सारे स्पष्टीकरण से पिता और माँ के मन का बोझ उतर गया था। भले ही एक बोझ सुमीत के मन पर आकर ठहर गया था। किसी भी समस्या को सुलझाने में पिता ने इससे अधिक वक्त कभी नहीं लिया। उनके पास न कभी किसी प्रश्न का संकोच रहा है, न उत्तर का, न निर्णय का.. हर बात और हर फैसला एक ऊँची-सधी और सीधी वाणी में निष्कांपित.. जो कि कभी स्पद्र्धा का विषय भी हो सकता है और कभी दु:ख तथा उदासी का भी।
दूसरे दिन जब सुमीत कॉलेज से लौटा था तो नीरजा से मन की बात कहते हुए बोला, यह बात मैं केवल तुम्हें ही बता रहा हूँ। मैं अपने दोस्त के साथ उस लडकी के पास गया था। पर वह उसके सामने फोन की बात से साफ इनकार कर गई। अब मैं उसे क्या कहता और कैसे डांटता? लडकों से दोस्ती से तो मुझे हमेशा नुकसान ही हुआ है, लडकियों से पहचान का श्रीगणेश भी कैसा खराब हुआ है। बात कुछ भी नहीं और मुफ्त की बदनामी। पिता जी तो बात-बात पर ऐसे-ऐसे बही-खाते, उदाहरण-आँकडें खोलकर बैठ जाते हैं कि रूह कांपने लगती है। लगता है, किसी लडकी से मित्रता या प्रेम न हुआ, कोई हत्या का षड्यंत्र हुआ। इन्हें मुझपर जरा विश्वास नहीं रहा। कोई भी बाहरी व्यक्ति आकर इनसे मेरे बारे में कोई बात कह देगा तो यह उसकी बात मान लेंगे। मेरी स्थिति काफी नाजुक हो गयी है। अब कॉलेज से लौटता हूँ तो ऐसा लगता है मैं कोई चोर हूँ.. पता नहीं मैं बाहर क्या-क्या करके आया हूँ.. पता नहीं मेरे पीछे फिर किस लडकी का फोन आया होगा और मेरी आफत आएगी.. सूँघ लेता हूँ चारों ओर.. सब ठीक तो है।
12 जनवरी 2010
विरोध
Posted by Udit bhargava at 1/12/2010 09:01:00 pm 1 comments
नोटों में उलझे प्रश्न
छोटी-सी 8-9 साल की लडकी, झुग्गी में ही रहती थी। माँ तो थी उसकी, बाप नहीं था। माँ कोठी में काम पर जाती थी। कभी-कभी जब माँ को घर वापस आने की जल्दी होती थी या माँ की तबियत खराब होती थी तो वह भी माँ के साथ जाया करती थी।
माँ सुबह-सवेरे काम पर निकल जाती थी, वह अभी सोई होती थी। माँ जाते हुए आवाज लगा देती थी और वह आँख मलती उठ बैठती थी। उसे कोई लम्बा-चौडा काम नहीं रहता था, बस झोपडी की सफाई, पानी भरना और सध चुके नन्हें-नन्हें हाथों से स्टोव जलाना, चाय बनाना, रोटी बनाना और फिर आस-पडोस की झोपडियों में घूमना-फिरना।
वह आस-पास की झोपडियों के बच्चों को स्कूल जाता हुआ देखती थी तो उसके मन में हूक सी उठती थी। एक दिन वह आँख मलती उठी, मुँह धोया, बाहर आई तो देखा बच्चे स्कूल जा रहे थे। उसके चेहरे पर उदासी घिर आई- वह स्कूल क्यों नहीं जाती? माँ उसे पढाती क्यों नहीं? वह भी पढना चाहती है, वर्दी पहनकर स्कूल जाना चाहती है। वह दौडकर ऊबड-खाबड झोपडियों की कतार से बाहर आई, सडक पर जाते बच्चों को देखा, उन बापों को देखा जो साइकिलों-स्कूटरों पर अपने-अपने बच्चों को स्कूल छोडने जा रहे थे।
उसका बाप कहाँ है? उसकी माँ अकेली क्यों है? उसका कोई भाई बहन भी नहीं। अपनी बाल-बुद्धि से अनेक प्रश्न पूछती वह वापस चली आई। उसे भूख लगी थी, माँ की बनाई चाय के साथ रात की बची रोटी निगल उसने जल्दी-जल्दी झाडू लगाया और झोपडी का टूटा दरवाजा बंद कर अपनी सहेली सुषमा के पास चली आई। सुषमा उस लडकी नीना से थोडी बडी थी। नीना आश्वस्त थी कि सुषमा उसके सवालों का जवाब दे पाएगी। उसने पूछा, सुषमा, तू जानती है मेरा बाप कहाँ है?
- तूने अपनी माँ से नहीं पूछा?
- पूछा था, बताती नहीं। अच्छा यह तो बता, बाप होता कौन है?
- अरे! तुम्हें यह भी नहीं पता, तू तो निरी बुद्धू है। जो माँ के साथ सोता है वह बाप होता है।
इससे ज्यादा शायद सुषमा को भी पता नहीं था। नीना को तसल्ली नहीं हुई। वह अनसुलझी वापस चली आई। सोचती रही, बाप वह होता है जो माँ के साथ सोता है। उसकी माँ के पास तो बहुत लोग आते थे, कभी-कभी कोठी का मालिक भी जिसकी बीबी मोटी काली भैंस है और कभी-कभी कोठी का नौकर भी जो बूढा तो है पर अच्छा है, उसे चॉकलेट और टॉफी भी देता है। कभी-कभी उसकी अपनी झुग्गी में कोई मर्द आता है तो माँ उसे सुषमा के घर सोने भेज देती है। उसे बुरा नहीं लगता, बल्कि सुषमा के साथ सोना, बातें करना, कहानी सुनना अच्छा लगता है। सुषमा ने उसे बताया था कि शायद उसकी माँ उसे कहीं से उठा के लाई थी, इसीलिए उसका बाप नहीं है, इसीलिए उसकी माँ उसे स्कूल नहीं भेजती। परन्तु सुषमा की माँ भी तो उसे स्कूल नहीं भेजती, सुषमा का तो बाप भी है। उसे सुषमा की बात पर विश्वास नहीं हुआ।
नीना के पास कोई काम नहीं था। अपनी झुग्गी में आई तो उसकी एक और सहेली शन्नो जो स्कूल तो जाती थी, पर आज नहीं गई थी, उसके पास चली आई। नीना ने शन्नो को उसकी किताब लाने को कहा। जब शन्नो किताब लाई तो नीना ने कहा कि उसे पढना सिखाए। शन्नो को बहुत खुशी हुई, उसे अध्यापिका बनने का अवसर जो मिल गया था। वह नीना को पढाने लगी। तीन-चार बार उसने बताया, बोला-अ से अनार, आ से आम। नीना ने सीखा, पर उसे यह समझ नहीं आया कि यह अनार और आम अ से क्यों होता है, डंडी न लगाओ तो अनार, डंडी लगाओ तो आम, क्या एक डंडी भर लगा देने से इतना फर्क पड जाता है। अपनी उत्सुकता मन में रख वह सीखने की कोशिश करती रही। जब कहीं अटक जाती तो शन्नो डांटती थी। शन्नो भी उसी के जितनी आयु की थी। थोडी देर में दोनों सहेलियां पढाई से ऊब गई और बातें करने लगीं। नीना ने पूछा,
शन्नो तू आज स्कूल नहीं गई?
मेरा भाई हुआ है न, इसलिए, शन्नो ने जवाब दिया।
तेरे तो पहले ही चार भाई-बहन हैं और मेरा कोई भी नहीं। नीना उदास हो गई। शन्नो के घर से आवाज आई तो वह भाग गई। किसी तरह दोपहर तक समय गुजरा और नीना की माँ काम करके वापस आ गई।
माँ का मूड देख नीना ने कहा, माँ, मुझे पढना है, स्कूल में दाखिल करवा दे ना! देख, अपनी झुग्गियों से सारे बच्चे स्कूल जाते हैं।
हाँ, देखूँगी, माँ ने अनमना-सा जवाब दिया।
नीना ने पूछा, माँ मेरा बाप कहाँ है? माँ उखड गई, बोली, मरी, क्या लेना है तुझे बाप से पता नहीं पास-पडोस के लोग मरे क्या सिखाते हैं, लडकी उ्ल्टे-सीधे सवाल करती है। अब तू बडी हो गई है, तेरा कुछ प्रबन्ध करना ही पडेगा।
उस रात उसकी झोपडी में दो लोग आए थे। माँ बहुत खुश थी। उन दो लोगों में से एक ने नीना को बहुत प्यार किया था, उसके गाल पर चिकोटी काट ली थी और उसे अपनी गोद में बिठा लिया था, उसे चॉकलेट भी दिया था। नीना उसके साथ घुलमिल गई थी। उसे लगा था, शायद वह उसका बाप हो। वह चाहने लगी थी कि अगले दिन वह आदमी फिर आए, बल्कि उसकी झुग्गी में रहे, उसकी माँ के साथ सोये, उसे स्कूल छोडने जाए। काश: वह उसका बाप बन जाए।
सचमुच वह आदमी अगले दिन भी आया था। उसके पास बहुत-से रुपये थे। रुपयों की एक गड्डी उसने नीना की माँ को दी थी। उसकी माँ फूलकर कुप्पा हो गई थी। नीना भी खुश हो गई थी। चेहरे का नूर देखते ही बनता था। उसकी माँ के पास इतने पैसे थे। उसकी माँ अब जरूर उसे स्कूल में दाखिला दिलवा देगी। उस आदमी ने नीना से पूछा था,
गुडिया, मेरे साथ चलेगी?
मुझे तो स्कूल जाना है, उसने जवाब दिया था।
मैं तुम्हें स्कूल में प्रवेश दिला दूँगा ना, बहुत अच्छे स्कूल में पढाऊँगा। ऐसी ट्रेनिंग दिलाऊँगा कि पैसा ही पैसा बरसेगा।
नीना की आँखों में चमक आ गई थी। उस चमक ने झुग्गी को भी सराबोर कर दिया। यह आदमी सचमुच उसका बाप होगा। खुशी के आवेग में उसने उस आदमी के गले में बाँहें डाल दी। उस आदमी ने समूची उस छोटी-सी देह को भींच लिया। माँ की आँखों में पैसों के नशे की झलक थी, पेट में कुलबुलाती पैसों की भूख थी, हाथों में नोटों की गड्डी की सरसराहट थी।
उस आदमी ने कहा, मैं तुम्हें ऐसे स्कूल में पढाऊँगा जहाँ तू होस्टल में रहेगी।
अंकल, वहां माँ नहीं होगी? उसने उत्सुकता वश पूछ लिया था, भले ही उसे माँ से बहुत प्यार नहीं रहा हो, माँ ने कभी उसे प्यार किया ही नहीं था, फिर भी माँ थी वह। वह भागी-भागी सुषमा के पास गई- सुषमा सुन, मैं स्कूल पढने जाऊँगी, होटल में रहूँगी, होटल में। बहुत बडी ट्रेनिंग करके, वह बनूंगी, वह, क्या कहते हैं, मैं तो भूल ही गई, उसने माथे पर हाथ मारा।- अच्छा! सुषमा ने हैरान होकर कहा।
नीना उदास हो गई, पर जल्दी ही उदासी से बाहर आकर बोली, मुझे नाम भूल गया होगा, पर मैं जाऊंगी, वह अंकल आए हैं ना, वह मुझे ले कर जाएंगे। कोठी में आने-जाने से उसे पता चल गया था कि किसी भी आदमी को वह अंकल कह सकती है। सुषमा की माँ और उसके बाप ने उनकी बातें सुनी, मुँह बिचकाया, थूका, नाक सिकोडा, आँखें तरेरीं और सुषमा को आवाज लगाई। नीना को लगा, सुषमा की माँ उसकी किस्मत पर जल उठी है। सुषमा का कोई ऐसा अंकल नहीं है ना, अच्छे बाप जैसा। वह तो अब पढ लेगी, सुषमा बिना पढे ही रह जाएगी, सिर्फ कोठियों में काम करने लायक, वह घर वापस आ गई।
आज माँ के पास कोई नहीं था। नीना अंदर आ गई तो माँ ने दरवाजा बंद कर दिया। आज माँ ने उसे जी भर कर प्यार किया, उसे अपने साथ सटाकर सुलाया। उसने सोचा, सुषमा कितना झूठ बोलती है कि माँ उसे कहीं से उठाकर लाई है। माँ के शरीर की गरमाहट से उसे जल्दी नींद आ गई।
सप्ताह भर में माँ ने उसे नये कपडे सिला दिए। वह आदमी रविवार को उसे लेने आया। वह खुशी-खुशी उसकी उंगली पकड कर चल पडी, सब देख रहे थे- माँ, सुषमा, शन्नो और आसपास की झुग्गियों के कुछ दूसरे लोग। स्टेशन तक वे ऑटो रिक्शा पर आए। स्टेशन से उन्होंने गाडी ली। नीना पहली बार गाडी पर चढी थी। जैसे-जैसे गाडी आगे बढ रही थी, नीना का मन भी उडान भर रहा था- कहाँ होगा उसका बडा-सा स्कूल, उस स्कूल में पढकर क्या बनेगी वह? कुछ तो बनेगी! शायद फिर उसकी सहेलियां सुषमा और शन्नो उसे मिल ही न पाएं, अगर कभी मिल जाएं तो, कितना जलेंगी! गाडी के हिचकोलों में कुछ समय के लिए उसे नींद आ गई।
जब नीना की नींद खुली तो उस आदमी के पास कोई पुलिस वाला बैठा था। नीना को पुलिस की पहचान थी क्योंकि उनकी झोपडियों में तो बहुत बार पुलिस आती थी। पुलिस वाले की आँखों ने ऊपर से नीचे तक उसे देखा और उस आदमी से पूछा, बेटी है तेरी? फिर हँसते हुए स्वयं ही बोला, ला पैसे निकाल।
नोटों की एक गड्डी पुलिस वाले के हाथ में थी। पुलिस वाला चला गया।
वे लोग एक बडे-से स्टेशन पर उतरे। वहाँ एक कार उन्हें लेने आई थी। नीना के तो पंख लग गए थे। वह जल्दी से जल्दी स्कूल पहुँच जाना चाहती थी। वह हॉस्टल में रहेगी (अब उसे कहना आ गया था) वह ट्रेनिंग लेगी, बहुत-बहुत बडी कुछ बनेगी। उसकी माँ कितनी अच्छी है! वह जिसके साथ मर्जी सोये, नीना को क्या फर्क पडता है उसका कोई भी बाप हो, तो भी उसे क्या फर्क पडता है।
वे लोग एक सुन्दर और बडी-सी कोठी में आ गए। नीना ने हैरान होकर देखा- यह स्कूल है! यहाँ तो बच्चों ने वर्दियां नहीं पहनीं, बल्कि यहाँ तो पढने वाले बच्चे ही नहीं हैं, यहाँ यह बडी-सी औरत कौन है जिसके साथ अंकल बात कर रहे हैं? शायद बडी मैडम होगी, पर लगती तो नहीं, यहाँ तो सिर्फ लडकियाँ हैं, छोटी-बडी लडकियाँ, सुषमा जैसी, शन्नो जैसी और उसकी माँ जैसी भी! क्या ये सब पढने आई हैं? हैरानी के आवरण ने उसकी खुशी को छा लिया था। वह बाप जैसे अंकल से कुछ पूछना चाहती थी। उस अंकल के हाथ में नोटों की एक बडी-सी गड्डी थी, नीना की आँखों में तैरते प्रश्न थे- यह हॉस्टल है? यहाँ ट्रे¨नग मिलेगी? वह पढेगी? कुछ बनेगी? पैसों की बरसात होगी? बाप जैसा अंकल बिना उससे बात किये ही चला गया। नीना रोने लगी, उसे कोई टीका लगा दिया गया। बेहोशी में वह देख रही थी- माँ के हाथों में नोट, पुलिस वाले के हाथों में नोट, बाप जैसे अंकल के हाथों में नोट!
Posted by Udit bhargava at 1/12/2010 08:59:00 pm 0 comments
अविश्वसनीय
गोमती हमेशा की तरह लेट थी। कोई कितनी ही डींगे हांके, इस देश का रेल विभाग न अब तक संभला है, न आगे संभलेगा। आमदनी बढाने के कितने ही फर्जी आंकडे गिनाए जाएं, अपने प्रबंध-कौशल की कितनी ही प्रशंसा कर लें, ट्रेनें न वक्त पर चल सकती हैं, न उनमें भीड-भडक्का कम हो सकता है, न गुंडागर्दी थम सकती है, न नकली वेंडरों पर लगाम कसी जा सकती है, न खाने-पीने की चीजें सही मिल सकती हैं, न साफ-सफाई और रख-रखाव ठीक हो सकता है, न दुर्घटनाएं रुक सकती हैं, न रेल-कर्मचारियों की लापरवाहियां रुक सकती हैं, स्लीपर क्लास हो या ए.सी. डिब्बे, हर जगह सौदेबाजी से सीटें पाने वालों को न रोका जा सकता है.. न लूटपाट, उठाईगीरी, जहरखुरानी रुक सकती है, न पुलिस वालों की धन वसूली की आदतें, न चोरी गए बल्ब, ट्यूबलाइट्स और न, न चलने वाले पंखों को दुरुस्त किया जा सकता है..।
गरमी बेतहाशा थी। बेतहाशा गरमी हो, लू चल रही हो और लू से बचने का दिल्ली हो या कोई भी स्टेशन, आम आदमी पर कोई उपाय न हो तो वह सिवा झल्लाने और रेल विभाग को कोसने के और कर ही क्या सकता है? दिल्ली स्टेशन पर गोमती पकडने के लिए जब मैं आया था तो जलती लाल रंग की रोशनियां बता रही थीं, गाडी दो घंटे देरी से आ रही है, यानी लू और गरमी में दो घंटे प्लेटफार्म पर और भुनना पडेगा। भुनता हुआ आदमी भुनभुनाएगा ही। हजार गालियां रेल विभाग को देता, बुरी तरह झल्लाता, कुढता, सीढियां चढ रहा था। सामान कुछ खास नहीं था, सिर्फ एक बैग था, जिसे कंधे पर लटकाए था।
प्लेटफार्म पर कहीं पांव तक रखने को जगह नहीं थी, बाप रे! इतने लोग हर दिन, हर वक्त कहां जाते रहते हैं? इनके पास और कोई काम नहीं है क्या? बसें तो भरी हुई। हवाई यात्री भी परेशान, टिकटें नहीं! क्या मुसीबत है। अस्पतालों में जगह नहीं, बाजारों में कंधे छिलते हैं। मॉल बन गए तो वहां रईसजादों की रेलपेल..। होटलों-रेस्तराओं तक में पहले से बुक न कराओ तो जगह नहीं मिलती। स्कूल-कालेजों में एडमीशन समस्या है.. सीटें कम, दाखिला चाहने वाले लाखों! बेरोजगारों की भीड, बाप रे बाप.. हर जगह भीड, कहीं चैन नहीं! कहीं पांव रखने की जगह नहीं! क्या होगा इस देश का? इस देश की बेतहाशा-बेलगाम हो रही आबादी का? गेहूं की पैदावार घट रही है। कृषि उपज गिर रही है। जमीन का पानी खत्म हो रहा है। नहरें सूखी पडी हैं। पहाडों के ग्लेशियर खत्म होते जा रहे हैं। नदियां जहरीली हो गई हैं। लौकी-तोरई तक की बेलों में ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं, रात भर में लौकी हाथ भर लंबी कर ली जाती हैं। बाबाजी रोज कहते हैं, लौकी का जूस पिओ! मरोगे क्या? ऑक्सीटोसिन से लंबी की गई लौकी का जूस! कैंसर पाओ, किडनी फेल कराओ!
दूध सिंथैटिक, उसमें यूरिया, वाशिंग पाउडर, सफेदा, वनस्पति घटिया वाला और न जाने क्या-क्या! पिलाओ अपने बच्चों को और मारो बेमौत उन्हें! पूरा देश मानो एक वृद्ध निठारी बना जा रहा है! बच्चियां गर्भ में मार दो, बच जाएं तो कोई न कोई निठारी, फिर भी बदकिस्मती से बच जाएं तो अपहरण करवा दो, मुंबई-कलकत्ता-दिल्ली के चकलाघरों में बेच आओ! दुष्टाएं फिर भी घरों में रह जाएं तो उन्हें कुपोषण से मार दो, मरगिल्ली बना दो! फिर भी बच जाएं तो दहेजलोभियों या शराबियों-व्यभिचारियों को ब्याह दो! वह उन्हें जला कर मार देगा या फिर धंधे में डाल कर घर बैठा मुफ्त की तोडेगा! है कोई इस देश में किसी से कुछ पूछने वाला। सेंसेक्स उछालें ले रहा है। देश विकास कर रहा है। मॉल पर मॉल बने रहे हैं। नई-नई मंहगी कारें बाजार में धडाधड बिक रही हैं। अर्थव्यवस्था ठाठें मार रही हैं। चारों तरफ बूम है, धूम मची हुई है! इंडिया छलांगे रहा है, शाइन कर रहा है। हर कोई नाच-गा रहा है, अखबारों में, टीवी पर, पत्रिकाओं में। एक महानायक के बेटे की नायिका से शादी क्या हुई, टीवी पर सिर्फ वही शादी! किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। मंहगाई की मार से आदमी बिलबिला रहा है। आलू-प्याज तक रोटी खाने को नसीब नहीं हो रहे, और हमारे नेताओं के लिए अर्थव्यवस्था सेंसेक्स की तरह उछालें मार रही है।
कुढता, भुनभुनाता, झल्लाता, झुंझलाता, लगातार गरमी में तपता, लू के थपेडे सहता प्लेटफार्म पर वह जगह तलाश रहा था, जहां थोडी ठंडक मिले, तपन कम हो, चैन मिले। फिर सोचा, पानी लिया जाए, ठंडा मिनरल वाटर! गला तर किया जाए, वरना मुंह सूख चुका है। लेकिन पेशाब लग आया है। है कहीं, जहां..?
किसी का मोबाइल बजा.. मोबाइल में किसी तारिका का कलेजा ये दहक रहा था और वह चीख रही थी- बीडी जलईले करेजवा में बडी आग है। लडके भी कैसी-कैसी ट्यूनें मोबाइलों में फीड कर लेते हैं। करेजवा में तो मेरे भी आग जल रही है पर मैं बीडी या सिगरेट नहीं जला सकता। ठंडे के स्टाल पर पहुंचा? रेल नीर लिया। पता नहीं साला शुद्ध होगा या देश की गंगा-यमुना के पानी की तरह प्रदूषित। किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। हर जगह पैसा कमाऊ लोग बगुलाभगती कर रहे हैं। मौका मिला कि आप मछली की तरह गडप!
पानी ठंडा था। गटागट, लगभग आधी बोतल उतार गया। बोतल पीने का अभ्यास न होने के कारण कुछ पानी शर्ट और शर्ट की जेब में रखे रुपयों और टिकट पर गिरा। भींग गए होंगे। भींग जाएं! लू में फिर सूख जाएंगे! मैं भी कितना वाहियात आदमी हूं! एकदम बेशऊर! ठीक से पानी भी नहीं पी सकता!
बुक स्टाल पर आ खडा हुआ। अंग्रेजी उपन्यासों पर नजर डाली। फिर पत्रिकाओं पर।
- नमस्ते सर.. नमस्ते! बगल में खडी लडकी की तरफ नजर गई.. पहचाना सर..?.. पहचान लिया, पर नाम याद नहीं.. प्रतिभा सर.. आपने बी.ए. में पढाया था सर.. हिन्दी। .. हां, याद आया.. यहां दिल्ली में कैसे? ..एक इंटरव्यू देने आई थी..। क्या उम्मीद है? नौकरी मिल जाएगी?.. आप तो जानते हैं सर, हर जगह सोर्स-सिफारिश चलती है। फेयर सिलैक्शन कहां होता है? सिफारिश न हो तो कैश या काइंड.. और लडकी के पास तो .. हां वो तो है। नौकरी न मिली तो क्या करोगी? कुछ कर रही हो?.. हां सर। एल.एल.बी. में एडमीशन ले रखा है। फायनल इयर है सर। .. अच्छा है। कभी किसी मुकद्में में फंसा तो काम आओगी तुम! खीसें निपोरने लगा।
- जरूर सर! कोई मर्डर भी कर देंगे तो बचा लूंगी सर!.. मर्डर करना तो चाहता हूँ पर करने की हिम्मत नहीं है। काश! आतंकवादी या नक्सली होता तो. बहुत नाराज हैं क्या आप?.. वह हंसने लगी।.. बहुत! मैं झल्लाया।
- क्या बताएं प्रतिभा! अब यह गाडी देखो.. नाम गोमती! कभी देश की नामी-गिरामी गाडी थी! अब कई साल से कभी टाईम पर नहीं आती! क्यों आए? सुपरफास्ट है तो क्या हुआ? नेता लोगों ने अपनी शताब्दी चला ली! या हैलीकॉप्टर हवाई जहाज से आते-जाते हैं! मरे कम्बख्त पब्लिक! उसकी किसे फिकर है? मैं तो आत्महत्या करने वाले किसानों से कहना चाहूंगा, अरे सुसरों मर तो रहे ही हो! दो-चार हरामियों को मार कर मरो न! कम से कम जनता को कुछ तो सुकून मिले!
- सर आपका तो बहुत परिचय है.. कहीं मेरी कुछ जुगाड फिट करिए।
क्या चाहती हो?.. कहीं पांव टिकाने की जगह सर! एम.ए. अंग्रेजी से किया है। किसी डिग्री कालेज में डेली वेजेज पर रखवा दीजिए..।
- कौन सी डिवीजन है एम.ए.?.. पांच नंबर से फर्स्ट डिवीजन मारी गई सर.. कालेज में खूब नकल की सर.. पर अंतिम पेपर के वक्त यूनिवर्सिटी का उडनदस्ता आ गया! नकल का मैटर फैंकना पडा! अगर टीप लेती तो फर्स्ट आती सर! बेड लक सर!
- नकल करके खुद पास हुई हो, डिग्री क्लासों को पढाओगी कैसे?
.. आजकल पढता-पढाता कौन है सर? आप खुद प्रोफेसर रहे हैं सर.. आपने देखा नहीं है क्या सर?.. क्लासों में कभी कोई पढने आता है? कालेज तो पिकनिक स्पाट है सर.. लडके इश्क लडाने आते हैं और लडकियां अपनी फैशन दिखाने।.. हर किसी पर मोबाइल है, हर किसी पर विक्की या बाइक। कोई न पढना चाहता है, न कोई पढाना चाहता है। बट्टे की तनखा मिलती है सर!
डेली वेजेज पर तुम्हें मिलेगा क्या..? पांच हजार पर दस्तखत कराएंगे, हजार-पन्द्रह सौ देंगे! उसके पीछे घिरी रहोगी दिन भर कालेज में और बेमतलब ही-ही करती डोलोगी स्टाफ के बीच! सुंदर लडकी हो, साला कोई शोहदा पीछे पड गया तो एसिड-वेसिड फेंक देगा चेहरे पर।.. कालेजों में रोज तो कांड होते हैं। गोली चलना मामूली बात है। किसी को कानून का डर तो रह नहीं गया। सब बडे बाप के बेटे हैं, सबकी पहुंच ऊपर तक है! सब तीस मार खां हैं। कहां फंसना चाहती हो? देश-प्रदेश में कहीं कानून-व्यवस्था रह गई है?
- फिर भी सर.. कुछ तो करना ही पडेगा.. लॉ पढ रही हूं। पर घाघ वकील लोग कहते हैं.. वकालत में अब कुछ नहीं रह गया है। बहुत बुरी हालत है कोर्ट-कचहरी की।
किसी की अच्छी हालत है इस देश में?.. बताओ? कभी-कभी तो लगता है कि यह देश बर्बाद हो चुका है! अब तो शायद सब कुछ नष्ट होने के बाद ही भले संभले।..
उसे कोल्ड पिलाने के लिए लिवा ले गया.. जिससे करेजवा की आग कुछ बुझ सके!
Posted by Udit bhargava at 1/12/2010 08:57:00 pm 0 comments
महाप्रयाण
बाबा! भोजन कर लेते, तब चला जाता वहां। मनुहार करते हुए शान्तनु ने बाबा से कहा।
कहां बच्चा? तुम कहां चलने की बात कर रहे हो? बाबा ने मुस्कराते हुए पूछा।
वहीं जहां आप चलना चाहते हैं। दबी जबान उत्तर आया। बाबा ने जोर देते हुए प्रतिप्रश्न किया- वही तो पूछ रहा हूं, तुम क्या समझ रहे हो! तुम्हें कैसे मालूम कि मैं कहां जाने की तैयारी कर रहा हूं?
शान्तनु चुप रह गया। जानता तो है कि पिछले एक साल से बाबा रोज कहां जाने की तैयारी करते हैं और घर के सभी सदस्य यहाँ तक कि नौकर चाकर भी इसी जुगत में लगे रहते हैं कि बाबा भोजन करके सो जाए। उठने के बाद स्वयं भूल जायेंगे। संकट टल जाएगा।
यह सच है कि बाबा अब चीजों को भूलने लगे हैं। उनकी उम्र एक सौ एक वर्ष से आगे निकल गयी है। एक तरह से कह सकते हैं कि बाबा की जीवन-धारा तीन शताब्दियों का स्पर्श करती हुई प्रवाहित है। अठारह सौ निन्यानबे में बाबा का जन्म हुआ था। अपने पहले वर्ष को पार करते ही उन्होंने बीसवीं शताब्दी में प्रवेश किया। पूरी एक शताब्दी का भरापूरा जीवन जीकर बाबा ने जब इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेश किया तो शान्तनु ने एक छोटा सा जश्न कर डाला। वही उनका सबसे दुलारा प्रपौत्र है। उन्होंने उसका नाम रखा रखा था शान्तनु।
अपने पिता और पितामह के सामने कभी उन्होंने अपने बेटे को हाथ भी नहीं लगाया था। वह तो बहुत बाद में जब वे बाबा बने-रघुवीर का जन्म हुआ। तो वे नये सिरे से जवान होने लगे। जीवन में रस लौट आया। अति वृद्ध हो गयीं पत्नी को भी बच्चों के साथ खेल में घसीट लेने लगे। सबको लगने लगा कि वंशवृक्ष की बाढ देखकर कैसा नवजीवन उमंगने लगा है और जब रघुवीर का बेटा आया तो खुशी से गदगद बाबा ने उसका नाम शान्तनु रख दिया। शान्तनु भी अपने पिता और पितामह से अधिक बाबा की माया ममता का एकाधिकारी बन बैठा।
तीसरी शताब्दी को स्पर्श करने वाले बाबा को नए कपडों से सजा कर शान्तनु ने उनकी आरती उतारी। सभी रिश्तेदारों को जुटाया गया था। गाँव जवार से लोग उमड पडे थे। बाबा कौतुक के साथ सब कुछ देखते रहे थे। जब इस भीड-भाड और अपनी आरती का मतलब समझ में नहीं आया तो उन्होंने अपने लाडले शान्तनु को पास बुला कर पूछा-यह सब क्या कर रहे हो? शान्तनु ने कहा-बाबा! आपने तीसरी शताब्दी में प्रवेश किया है। बाबा का मुंह खुला रह गया था। मन ही मन अपनी उम्र अपने बाल-बच्चों, नाती-पोतों और अपने किये कार्यो का लेखा-जोखा पगुराते रहे। उन्हें अब सभी लोग बाबा या बाबाजी कहने लगे हैं। कई बार उन्हें अपना यही नाम याद रह जाता है, शेष सब भूल जाया करता है।
अपने एक काम को बाबा एक बार रोज याद रखते हैं। जमींदारी खतम होने ही वाली थी कि उनके गांव के जमींदार ने बाबा के सामने एक प्रस्ताव रख दिया। गांव से थोडी ही दूर पर पांच एकड खेत का एक टुकडा था। जिसे जमींदार बाबा के नाम कर देना चाहता था। एक हजार रुपये की मांग थी उसकी। बाबा को वह खेत बहुत पसंद था मगर एक साथ इतना रुपया कहां से आता? बाबा ने पूछा कि कब तक इन्तजाम करना होगा? जमींदार ने बताया कि दो चार दिन में हो जाना चाहिए नहीं तो हाथ से निकल जाएगा। बाबा ने घर भर की तलाशी ले डाली। अपनी पत्नी और बहू के गहने निकलवा कर एक पोटली में बांध कर सुनार के यहां गए। उसने तीस रुपये तोले के भाव से सोना और एक रुपये के भाव से चांदी के गहने खरीदे। तब भी पूरा न हुआ। बैल, भैंस, पेड, बांस बेचकर और कुछ हथफेर लेकर बाबा ने वह खेत जमींदार से अपने नाम करा लिया। उस खेत का मालिक बनकर उन्हें सबसे ज्यादा खुशी हुई थी।
दूसरे खेतों की सुध भूलकर वे उसी की संभालने में लगे रहते। उस खेत ने भी जैसे नए मालिक की भावनाओं को समझ लिया। इतनी भरपूर उपज होने लगी कि तीन साल में सबके गहने बन गए, सबके उधार लौटा दिए गये, पहले से अच्छे बैल खरीद लिये गये। भैंसें आ गयीं। हलवाहों की संख्या बढ गयी। वह खेत क्या आया लक्ष्मी अपनी पूरी उदारता के साथ बाबा के घर आ गई। जमींदारी उन्मूलन हुआ। किसानों ने लगान का दस गुना सरकारी खजाने में जमा करके भूमिधर होने की सनद ले ली। बाबा ने सबसे पहले उसी खेत का दसगुना जमा किया, बाद में दूसरे खेतों का।
रघुवीर जब खेती में रुचि लेने लगे तो उन्होंने ट्रैक्टर खरीदने की इच्छा व्यक्त की। बाबा को पहले विश्वास ही नहीं हुआ कि लोहे की गाडी उनके खेत जोतेगी। जैसे-तैसे उन्हें समझा बुझाकर ट्रैक्टर आया। उसका फायदा देखकर बाबा प्रसन्न हुए, मगर उन्होंने रघुवीर और उनके पिता दोनों को सख्ती से चेताया-टठ्टर तो ठीक है, पर एक काम करना, बैल कभी मत बेचना। बैल, गाय, भैंस रखना कभी मत भूलना और सबसे जरूरी बात तो यह कि पांच एकड वाला खेत सबसे बडा कमाऊ पूत है इस घर का- इस बात को गांठ बांध लेना।
रघुवीर तो एकदम नए बछेडा थे। उन्होंने और उनके बाप ने भी बाबा को भरोसा दिलाया कि ऐसा ही होगा। ट्रैक्टर के साथ नए तरह की खाद का चलन हुआ और ट्यूबवेल लगाकर पानी का सोता खेत में ही खुलवा लिया। बाबा के घर परिवार में धन और सुख सौभाग्य की बाढ आ गयी। एक चिन्ता चकबन्दी के साथ आई। मगर सौभाग्य से एक चक वहीं काट दिया गया। दुलारा वह खेत जस का तस रह गया। रघुवीर ने एक दिन कहा- बाबा! अपने खेत के पास से पक्की सडक निकाली जा रही है। अपना खेत साफ-साफ बच गया है।
बाबा घबराए। बोले-सडक निकलने में अच्छी बात क्या हो गयी? रघुवीर ने और फायदे गिनाते हुए बताया कि अब अपने खेत की मालियत बहुत बढ जाएगी। कोई चाहे तो एक लाख रुपये एकड के भाव से जमीन बिक जाएगी।
सुनकर बाबा बौखला उठे। क्रोध से थर थर कांपते हुए बोले-एक लाख नहीं, दस लाख रुपये एकड का भाव मिले तब भी उस खेत को बेचने का सपना भी मत देखना। सभी लोगों ने बाबा को मनाया। सबने आश्वासन दिया कि खेत बेचने का कोई सवाल ही नहीं उठता। हम लोगों को क्या कमी है कि खेत बेचेंगे? बाबा संतुष्ट हो गये। रघुवीर ने खेती, बागवानी, पशुपालन, मछली पालन, मशीन से कुटाई-पिसाई के काम एक साथ संभालते हुए कारोबार को बहुत आगे बढा दिया। शान्तनु उनसे भी आगे निकलने लगे। शहर में पढाई करने के बाद नौकरी करने के बदले उन्होंने खेती को ही उद्योग में बदल देने की योजना बनाई। चढने के लिए पहले जीप खरीदी गयी। बाद में कार आ गयी।
बाबा नब्बे से ऊपर पहुंच रहे थे। अब भी वे एक बार अपने दुलारे खेत की मेड पर जाकर कुछ देर खडे रहते। खेत में खडी फसल को हाथ से छूते, दुलारते, कुछ बुदबुदाते। देखने वाले कहते-बाबा अपने खेत और उसमें लगी फसलों से ही अपने मन की बातें कहते।
धीरे-धीरे भारी डील-डौल वाले बाबा का शरीर खेतों की ओर जाने की शक्ति से खाली होता गया। और नहीं, कभी-कभी पांच एकड वाले खेत तक जाते। बीच में थक कर बैठ जाते। फिर वह भी कठिन हो गया तो शान्तनु जीप पर बिठाकर उस खेत तक बाबा को पहुंचा देते। बाबा कुछ देर मेड पर बैठकर वापस लौट आते। बाद में यह सिलसिला भी बन्द हो गया। शान्तनु का कारोबार जैसे-जैसे बढता गया, उनके लिए एक मिनट का समय निकालना भी मुश्किल होता गया।
एक दिन शहर से लौटकर शान्तनु ने अपने पिता को बताया कि सडक के किनारे वाले खेत को पचास लाख रुपये में एक सिन्धी खरीदना चाहता है। सुनकर रघुवीर पीले पड गये। जल्दी से उन्होंने बाबा की खटिया की दिशा में देखा-कहीं उनके कान में यह भनक न पड जाय।
पिता साफ मुकर गए-यह जानकर शान्तनु उस सिन्धी से फिर मिलने नहीं गए। तीसरे दिन वह स्वयं आ गया। रघुवीर ने साफ मना कर दिया। शान्तनु चाहकर भी कुछ नहीं कर सके। सिन्धी ने अगला प्रस्ताव रखा-ठीक है, आप खेत बैनामा न करें। दस साल के लिए दे दें। हम उसमें ईट का बहुत बडा भट्टा बनाएंगे। दस साल बाद खेत आपका ही हो जायेगा। कुछ गड्ढा हो जाएगा जो दो चार साल में बराबर हो जायेगा। पैसे हम आपको पूरे देंगे।
यह प्रलोभन शान्तनु और उसके पिता रघुवीर से छोडते न बना। गुपचुप सौदा हो गया। सबको हिदायत दे दी गयी कि बाबा को न तो खेत तक कोई ले जायेगा और न उसके बारे में कोई उनको कुछ बतायेगा। गांव के जो लोग बाबा के पास कभी कभार आते थे, उनको भी समझा दिया गया। शहर में उधर करोडों रुपये का कोई बडा भारी कारोबार शान्तनु ने नए ढंग से शुरू किया। अब वे गांव कभी आते भी तो पलभर बाबा के पास बैठकर लौट जाते।
जिस दिन खेत में सिन्धी के मजूर मिस्त्री लगे, उस दिन बाबा दिन भर बुरे सपनों से घिरे बडबडाते रहे। सबसे कहते-हमे खेत पर ले चलो सब लोग बिना कुछ बोले एक ओर हो जाते। नींद, सपनों औैैर जागरण के बीच बाबा एक साल तक पडे रहे। रोज सबेरे वे खेत की ओर जाने की जिद करने लगते। किसी न किसी बहाने बहला फुसलाकर उन्हें खाना खिला दिया जाता। खा पीकर वे ऊंघने लगते, एक दिन और बीत जाता।
उस दिन सबेरे बाबा की आंख खुली तो उनको याद आया कि आज असाढ की पूर्णमासी हैं। दस बरस हो गये, इसी तिथि को उनकी वृद्धा पत्नी का स्वर्गवास हुआ था। दिन भर व्रत रखकर संध्या समय गंगाजल मुंह में डालते ही चल बसी थीं। बाबा को दूसरी याद अपने दुलारे खेत की आई। उन्होंने निश्चय किया कि आज मुंह में अन्न का दाना तभी डालेंगे जब खेत पर से लौट आएंगे। रोज की तरह चाय पीकर बाबा तैयार होने लगे। नौकर से कहकर पास की चौकी पर पानी रखवाया। उसी के सहारे उठकर चौकी पर बैठे। इत्मीनान से स्नान किया, नौकर के सहारे अपने बिस्तर पर आए। साफ धोती निकलवा कर पहनी। नौकर से कहकर मिर्जई निकलवा कर पहनी, किन्तु उस दिन बाबा किसी के बहकावे में नही आए। शान्तनु से उन्होंने साफ कह दिया-खेत पर जाना है। वहाँ से लौटकर ही अन्न ग्रहण करूंगा। शान्तनु किस खेत पर बाबा को ले जायें, उस खेत में तो विशालकाय चिमनी खडी है। कई सौ मजूर मिस्त्री काम कर रहे हैं। ट्रकों से ईटों की ढुलाई हो रही है। बाबा को कहां ले जायें? कैसे मनाएं? शहरी दिमाग में उपाय कौंध गया। शान्तनु बाबा को अपनी कार में बिठाकर सडक पर ले आए। अपने खेत से पहले वाले खेत के पास गाडी रोक कर उतर पडे। बाबा से बोले-आप बैठे रहिए, यही खेत हैं, देख लीजिए।
बाबा ने कुछ देखा, कुछ विचारा, गाडी का फाटक खोलने लगे उनकी जिद देखकर शान्तनु ने फाटक खोल दिया। बाबा उतरकर मेड पर बैठे, पलभर बाद उठ गये बोले-नहीं यह हमारा खेत नही हैं। आगे चलो, शान्तनु कुछ बोलें उससे पहले ही बाबा आगे की ओर बढ चले। आगे बढकर शान्तनु ने सहारा दिया। अपने खेत की मेड पर आकर बाबा रुक गये। मेड क्या वह तो भट्ठे से निकली राख और राबिश से सडक जैसी बन चुकी थी। खेत में दानव की तरह आसमान से धुआँ उगलती चिमनी खडी थी। चारों ओर पकी ईटों के चट्टे लगे थे। ट्रकों, ट्रालियों पर ईटों की लदाई हो रही थी। भट्ठे में दहकती आग का ताप देह में लग रहा था। वर्षा में देर के कारण अभी भी ईटें पकाई जा रही थीं।
पलभर बाबा मुंह उठाए उस अग्नि मैदान में खडे दानव को देखते रहे फिर धीरे से बैठ गये। शान्तनु ने उन्हें संभालना चाहा किन्तु बाबा लेट गये, उनका सिर शान्तनु ने अपनी बांहों मे सहेजा। बाबा के चेहरे पर परम शान्ति दिखाई पडी। उन्होंने शान्तनु से कहा-अपनी जांघ पर मेरा सिर रख लो। भट्ठे की राख में पालथी मारकर जमीन पर बैठे शान्तनु ने बाबा का सिर अपनी जांघ पर रख लिया। झुक कर बाबा की शान्त आंखों में देखकर पूछा-अब कुछ आराम है? घर चलें बाबा।
बाबा मुस्कुराए चमकती आंखों से प्रपौत्र के मुख को भरपूर निहारते हुए बोले-घर ही जा रहा हूं बेटा एक काम करना, मुझे काशी प्रयाग-अयोध्या मत ले जाना। ठीक इसी जगह जलाना, मेरी यह आखिरी बात मत टालना।
शान्तनु हां या न कुछ कहें उससे पहले ही बाबा की आंखें धीरे-धीरे बंद हो गई। चेहरे पर शान्ति विराज रही थी। शान्तनु को जमीन पर इस तरह बैठा देखकर लोग दौड पडे। जुट आने वाली भीड में से किसी ने बाबा की नब्ज पकडकर कहा-बाबा तो गए।
Posted by Udit bhargava at 1/12/2010 08:56:00 pm 0 comments
निशान
लेबर रूम में जैसे ही उसे होश आया, उसने अपना पेट देखने की कोशिश की थी मगर डॉक्टर ने उसे हिलने-डुलने से मना कर दिया। जरा सी करवट बदलते ही दर्द की एक लकीर उसकी जाँघों के बीच से होकर नाभी लाँघती हुई मस्तक तक चढ गयी। उसने होंठ भींच कर दर्द पीने का प्रयास किया साथ ही उस दर्द से जन्मे परिणाम को जानने के प्रयास में उसने अपनी खुली आँखों, भिंचे होठों से ही अनुनय भाव से डॉक्टर की ओर देखा। महिला डॉक्टर ने मुस्कराते हुए उसकी ओर देखा। डॉक्टर की इस मुस्कराहट पर उसकी बेचैनी और बढ गयी। वह और व्यग्रता से अगल-बगल निगाह पसार कर पीडा के परिणाम को ढूंढने का प्रयास करने लगी। डॉक्टर की अनुभवी- पेशेवर निगाहें समझ गयीं कि वो क्या जानना चाहती है सो बिना उसका मौन तुडवाये ही बोल दी। नर्स ले गयी है, अभी तुम्हें रूम में शिफ्ट किया जाएगा वहीं उसे भी नहला-धुलाकर तुम्हारे पास पहुँचा दिया जाएगा। माँ के रूम में जाने के बाद ही हम बच्चे को माँ को सौंपते हैं। माँ शब्द सुनते ही उसके बदन में एक झुरझुरी सी दौड गयी। उसकी रग-रग में एक रोमाँच सा भर गया। उसे लगा जैसे नाभी के पास से उठती एक तेज लहर उसकी छाती से बह निकलेगी। बिल्कुल भागीरथ की गंगा की तरह। उसका हाथ अनायास उठा और सीने पर रेंग गया। सचमुच एक भीगापन उसने महसूस किया। इस भीगेपन के अहसास के साथ ही उसका मन भीगने लगा और उसे याद हो आयी अपनी माँ। माँ.. जो उसके जिज्ञासु स्वभाव से उठते प्रश्नों के जवाब में अक्सर कहा करती थी.. जब खुद माँ बनोगी तब समझोगी कि माँ क्या चीज होती है? माँ के शब्दों के साथ उसका चेहरा भी उसकी आँखों में कौंध गया। बिल्कुल गोरा रंग, दमकता चेहरा, दुबली पतली..। चेहरे की दमक के साथ-साथ कुंठाओं और पीडाओं की कुछ लकीरें भी माँ के माथे पर बन गयी थीं। एक खास बात और माँ के चेहरे पर थी वो ये कि प्रकृति ने ही उसके माथे पर बिल्कुल उस जगह जहाँ से वह माँग निकाल कर सिंदूर भरने की शुरुआत करती थीं एक बडा सा भूरे रंग का मस्सा उगा दिया था। जब वह छोटी थी तो अक्सर माँ के पास लेटकर उस मस्से से खेलती हुई माँ से सवाल-जवाब किया करती थी। एक दिन उसने माँ से पूछा था.. माँ यह क्या है? माँ ने मुस्कराते हुए कहा था, यह एक खजाना है जिसमें मेरा सुख-सुहाग, धन, दौलत सब भरा है। सो कैसे..? उसने फिर पूछा तो माँ समझाने की मुद्रा में बोली थी। देख सुहाग के लिए औरतें बोरला (माथे का एक जेवर) बाँधती हैं मुझे तो भगवान ने ही यह पहनाकर भेजा है और दुनिया की सबसे सुखी औरत वही है जो संसार से सुहागन जाए वही सबसे धनी भी। माँ सुहाग को ही दुनिया का सबसे बडा धन और सुख मानती थी। सुहाग पर आयी विपत्ति ही उसकी दृष्टि में विपत्ति थी बाकी सब संसार की सहज घटनाएं थीं। सचमुच माँ हर स्थिति में स्थिर रहती थीं। माँ के चेहरे के साथ एक चीज और थी माँ की देह पर, जो अक्सर उसके सोच में सवालों की झडी लगा देती थी और वो थे माँ के पेट पर नाभी से नीचे पडे खरोंच जैसे निशान। माँ के गोरे सुन्दर जिस्म पर उसे ये निशान भद्दे लगते थे। जब कभी माँ के दुबलेपन के कारण उनकी धोती नाभी से थोडी नीचे खिसक जाती वह उन निशानों के साथ बँध जाती। फिर एक दिन उसने पूछ ही लिया, माँ तुम्हारे पेट पर यह क्या हुआ? क्या किसी ने नोचा है? नोचने की बात उसने इसलिए पूछी थी कि एक बार जब भाई ने खिलौना छीनते समय उसे हाथ पर नकोट लिया था तो खुरंट उतरने के बाद कुछ दिन ऐसा ही निशान पडा रहा था मगर माँ के यह निशान तो वह अपनी समझ की उम्र से बराबर देखती चली आयी थी सो पूछ बैठी..। माँ ने हँसते हुए जवाब दिया था, हाँ नोचा है। तुम सब भाई-बहनों ने। उसे लगा माँ कितना झूठ बोल रही हैं और वह भी हंसकर। वह सोचने लगी थी कि मैंने, दीदी ने, भैया ने या छोटी ने कभी भी माँ को नहीं नकोटा, क्योंकि माँ से तो हमारा कभी झगडा भी नहीं हुआ। ..माँ के झूठ पर उसे बहुत हैरानी हुई .. उसे कम करने के लिए वह फिर पूछ बैठी.. पर हमने तो तुम्हें कभी नहीं नोचा..। माँ अचानक गंभीर हो गयी और समझाते हुए बोली.. अरे बेटा ये निशान तुम लोगों ने तब नोच-नोच कर डाले हैं जब तुम मेरे पेट में थे। तुम सब पेट के भीतर से मुझे नोचते थे और ये निशान बढते चले जाते थे। माँ की बात सुनकर उसकी हैरानी और बेचैनी बढ गयी थी.. हम पेट में थे.. पेट में गये कैसे..? गये तो निकले कैसे..? फिर हमने माँ को क्यों नोचा तमाम सवाल उसके मन में उठे थे। जब-जब उसने अपने सवालों का उत्तर मांगा, माँ यह कहकर टाल देती कि जब खुद माँ बनोगी तब पता चल जाएगा..। अबोध जिज्ञासा के प्रति इस उलझे जवाब से उत्पन्न कुंठा ने न जाने उसके मस्तिष्क पर कैसा प्रभाव डाला था कि जब भी वह किसी स्त्री की नाभि पर निगाह डालती वह वहाँ उन निशानों को ढूँढती। परिवार में तो उसने अपनी दादी, नानी, बुआ, ताई, चाची सबके पेट पर पडे निशान देख ही लिये थे। एक बार जब पडोस वाली आंटी अपनी माँ के घर से बहुत दिन बाद लौटीं तो माँ उनसे मिलने गयीं। वह भी माँ के साथ चल दी। वहाँ पहुँचने पर उसने दो बातें देखीं। एक तो आंटी का मोटा पेट सामान्य था और उनके बिस्तर पर एक नन्हा बच्चा कपडों में लिपटा हुआ सो रहा था। आंटी माँ को बता रही थीं, पूरा पेट चीरना पडा बडी मुश्किल से हुआ है चीरने का अर्थ वह जानती थी। यह बताते हुए आंटी ने साडी खिसका कर माँ को वह चीरे जाने का निशान भी दिखाया। काली मोटी त्वचा की गट्ठर सी बनी लम्बी लकीर। वह डर गयी थी उसे अचानक याद हो आया जब पेंसिल छीलते समय ब्लेड से उसकी उंगली कट गयी थी तो कितना दर्द हुआ था। कितना खून भी निकला था। उसे लगा इतना कटने पर तो कितना खून निकला होगा और दर्द का अहसास डर बनकर उसके भीतर समा गया था। उसने फिर माँ से पूछा था, माँ आंटी को बहुत दर्द हुआ होगा ना। माँ ने फिर वह जवाब दिया था जब खुद माँ बनोगी तभी समझ पाओगी, अभी नहीं। निशानों के सत्य को जानने की जिज्ञासा उसके स्वभाव का हिस्सा बन गयी थी। शायद ही कोई स्त्री हो जो उसकी निगाह के दायरे में आती हो और वह उसके पेट पर पडे निशान देखने का प्रयास न करती हो। अक्सर उसे कहीं ज्यादा कहीं कम ये निशान दिख भी जाते। कई बार तो वह बस-रिक्शा में चढती-उतरती स्त्रियों के पेट को घूरने लगती जब उसे वो निशान ढूंढने में दिक्कत होती तो उसे लगता कि इसकी साडी का पल्ला खिसका कर देखें कि इसका पेट कितना नुचा-कटा है। एक अनदेखी पीडा, एक अभोगा डर और एक अनाम सहानुभूति से घिरी वह हर वक्त अपने आपको पाती। उसे बडी तसल्ली होती जब नहाते समय या कपडे बदलते समय वह अपने पेट को देखती। बिल्कुल गोरा, चिकना, कहीं कोई निशान नहीं.. बिल्कुल मूर्तियों जैसा। उसने माँ से पूछा भी था, माँ जो देवी होती है उनके पेट पर भी ये कटे-नुचे निशान होते हैं क्या? माँ चौंक कर हँस पडी थीं और बोली थीं, नहीं। देवियाँ बच्चे पेट से नहीं जनतीं, इसलिए नहीं होते। उसे यह तो बहुत पहले से पता था कि बच्चे सिर्फ औरतों के ही होते हैं इसलिए आदमियों के पेट पर ऐसे निशान होने का प्रश्न ही नहीं उठता। दिन पर दिन एक बात और उसे समझ में आती जा रही थी कि जो भी माँ है उसे दर्द जरूर सहना पडा होगा..। अपनी उम्र के साथ-साथ इन निशानों का भय भी उसके मस्तिष्क में बढता चला गया। अपने भय के कारण वह अक्सर शीशे के सामने खडी होकर अपना पेट देखती रहती। धीर-धीरे उम्र बढने के साथ-साथ स्त्री होने के तमाम रहस्य स्वत: उसके सम्मुख खुलते चले गये। अब उसे ज्यादा बातें माँ से पूछने की जरूरत नहीं पडती थी क्योंकि उसे पता चल गया था कि माँ महीने में तीन-चार दिन भगवान को क्यों नहीं छूती। क्यों दीदी को अचार के मर्तबान में हाथ नहीं डालने देती। क्यों हम बहनों को ज्यादा कूदने और अकेले इधर उधर आने जाने को मना करती हैं? क्यों लडकियाँ कुर्ते के नीचे शमीज पहनती हैं। सब कुछ सहजता से उसकी जानकारी में आता जा रहा था। शरीर में उठती लडकीपन की पीडाएं बर्दाश्त करना भी उसकी आदत में आता जा रहा था। सब कुछ बडा सहज लगता था मगर पेट पर पडे निशानों का डर और उन्हें देखने की जिज्ञासा उसकी ज्यों कि त्यों थी। कभी-कभी उसे लगता कि वह भैया पापा की तरह आदमी क्यों नहीं? उसे एक सत्य और समझ में आ गया था कि ये निशान तभी पडते हैं जब कोई औरत किसी बच्चे को अपने पेट के अन्दर पालती है। वह निशानों के डर से भइया से ईष्र्या करने लगी थी यहाँ तक कि हर लडके से उसे ईष्र्या होती थी। उसके भीतर एक अभिलाषा भी जन्मती थी कि काश उसके पेट पर ये निशान कभी न पडंे। मगर यह संभव नहीं हो सका। तमाम इनकार के बाद भी उसके पिता ने 21वां लगते-लगते दीदी की ही तरह उसका भी विवाह कर दिया। विवाह यानी प्रकृति के तमाम रहस्य उसके सम्मुख स्वत: खुलते गये और सारे रहस्य जैसे उसके पेट में समाते चले गए; जिनके भरने में उसके पेट का आकार बढता गया। उन रहस्यों में ममता, पीडा, दर्द, जिज्ञासा, आशंका और क्या कुछ नहीं था, जैसे अब किसी सत्य को जानने की इच्छा ही नहीं रह गयी थी। हाँ, एक डर अभी भी उसे चौंकाता था कि न जाने कितने निशान उसके पेट पर पडेंगे। अब कभी-कभी पेट के भीतर से किसी के नोचने का दर्द भी वह महसूस करती थी। और अब जब आज डॉक्टर ने कहा, तुम माँ बन गयी हो तो माँ शब्द के साथ ही वह पेट पर पडने वाले निशान देखने को झुकी थी। उसे लेबर रूम से कमरे में शिफ्ट कर दिया गया था। थोडी ही देर में नर्स गुलाबी चादर में लिपटी एक नन्हीं मानव आकृति उसकी गोद में देकर मुस्कराई। लो अब इसे दूध पिलाओ। शिशु के गोद में आते ही उसके भीतर फिर कुछ बहा। उसने जिज्ञासावश नर्स को देखा, नर्स मुस्करा कर बोली खुद देख लो लडका है या लडकी। उसने बच्चे के चेहरे पर निगाह गडाये हुए चादर हटाई। चेहरे से होती हुई उसकी फिसलती निगाह छाती से होती हुई नाभी तक और फिर जाँघों के पास से पैरों तक गयी। निगाह जितनी तेजी से पैरों तक गयी उससे अधिक तीव्रता से पेट तक लौट आयी फिर नाभि से जाँघों के बीच ठहर गयी। अचानक उसे लगा इस नन्हे गुलाबी पेट पर बडे-बडे निशान उभर आए हैं। कटे हुए निशान, नुचे हुए निशान। भय जल बनकर आँखों से बहने लगा, वह महसूस कर रही थी उसकी जाँघों के बीच गरम-गरम लावे सा रक्त बह रहा है। उसका मन बुक्का फाड कर रोने का हो रहा था कि तभी नन्हें गुलाबी होठों में हरकत हुई। पहले होंठ थोडा सिकुडे, फिर फैले फिर उनमें से रुदन फूट पडा। ऊँ.वा.ऊँ वा का कोमल स्वर कानों में पडते ही उसे लगा उसकी छाती से बहुत तेजी से कुछ बहने लगा है। किसी यंत्र की तरह उसकी देह में प्रतिक्रिया हुई। उसने बच्ची को उठाया और उसके होठों को अपने वक्ष से लगा लिया। बच्ची के होठों का स्पर्श पाते ही उसे लगा दूध जल और रक्त की त्रिवेणी उसकी देह से प्रवाहित हो रही है और कोई ठंडा मरहम उसके पेट की पीडा को दूर कर रहा है। नन्हें होठों के दबाव के आनंद से उसकी आँखें मुँदने लगीं..। ममता से बोझिल आँखों के सम्मुख उसे उभरता दिखा अपनी माँ का चेहरा और दिखे मुस्कराते हुए माँ के पेट के निशान।
Posted by Udit bhargava at 1/12/2010 08:52:00 pm 0 comments
वक्त-बेवक्त भेडिया..
आदमी ही आत्महत्या करता है।
और जानवर?
कोई जानवर आत्महत्या नहीं करता। उसमें इतनी बुद्धि भी नहीं होती।
तुम्हारा मतलब क्या है?
मेरा मतलब साफ है कि जो सोचता है, वही मरता है। यह ज्ञान अत्यन्त पीडामय होता है।
तन्वी श्रीवास्तव और प्रलय वर्मा घर के ड्राइंग रूम में आमने-सामने बैठे हुए गंभीर बातचीत कर रहे थे।
दोनों मित्र प्रबुद्ध और हर पहलू पर गंभीरता से सोचने वाले। बदलाव को पसंद करने वाले।
तन्वी ने उठकर कहा, ताजा चाय बनाकर लाती हूँ। बातों ही बातों में काफी समय बीत गया। चाय ठंडी हो गयी। एकदम बर्फ। प्रलय ने कान खुजाते हुए कहा, बहस का भी अपना आनंद होता है।
मैं समझती हूँ कि बहस का सबसे सुनहरा परिणाम यह है कि समय आसानी और जल्दी-जल्दी गुजर जाता है।
तन्वी अपने सामान्य ड्राइंग-रूम से दडबेनुमा रसोईघर में गयी जो दायीं ओर एक खांचे में बना था। वह व्यर्थ ही गुनगुनाने लगी। केतली में चाय डालकर वह जैसे ही ड्राइंग रूम में घुसी उसने प्रणय को शीशे में निहारते पाया। वह मन ही मन मुस्करा कर बोली, शीशे में निहारने पर व्यक्तित्व नहीं निखरता?
उसने चाय बनायी।
प्रलय उसे निरीक्षक की भावना से देखने लगा। देखते-देखते सोचने लगा कि इसने पति से तलाक ले लिया और एक अफसर ने उसको विवाह का आश्वासन देकर बलात्कार कर लिया। फिर भी इसके सुन्दर और आकर्षक मुख पर सतियोंवाली पावनता दपदप कर रही है। यह खूबसूरत लगती है।
न जाने सोचते-सोचते उसने आँखें क्यों बंद कर लीं जैसे उसने क्षणिक समाधि लगा ली हो।
तन्वी ने उसे गौर से देखा- बहुत बुद्धिमान है पर मार खा गया व्यक्तित्व में। प्रलय की शख्सियत जीरो है। इसलिए कई बार आधा-अधूरा लगता है।
प्रलय! कहाँ खो गए? उसने उसका ध्यान भंग किया।
कहीं नहीं। उसने सिर को झटका दिया।
उसने अपने अधरों पर अर्थ भरी मुस्कान लाकर कहा, सोच तो जरूर रहे थे, बताओ भले ही नहीं। कई बार आदमी व्यर्थ ही बातों को छुपाने का प्रयास करता है और दूसरे उन्हें अनुमान से भाँप लेते हैं।
प्रलय ने चाय की चुस्की ली। साथ दिया तन्वी ने। मौन उनके बीच चट्टान की तरह बैठ गया। तन्वी व्यर्थ ही चाय के चम्मच को कप में हिलाने लगी।
प्रलय ने कहा, मैं सोच रहा था कि तुम्हारे चेहरे पर पावनता झलक रही है। एक ऐसी उ”वलता जो सतियों के चेहरों पर चमकती है।
तन्वी हँस पडी। घूंट लेकर बोली, मैं तो कुंती, द्रोपदी और मत्स्यगंधा की वंशज हूँ। मैं ययाति की बेटी माधवी की बहिन हूँ। तुम जानते हो, महादानी, महायोद्धा, महाकामी ययाति ने अपने को श्रीहीन और असमर्थ बताकर अपनी विदुषी और पितृभक्त आज्ञाकारिणी बेटी माधवी को गालव ऋषि को आठ सौ श्याम कर्ण अश्वों को प्राप्त करने के बदले में दे दिया था। और माधवी ने पितृाज्ञा को सर्वोपरि मानकर विभिन्न पुरुषों द्वारा चार पुत्रों को पैदा किया और फिर भी वह वरदान के कारण पवित्र रही। प्रलय! यह पवित्रता और अपवित्रता की जंग कब से शुरू हुई थी?
जब से पितृसत्तात्मकता ने बल पकडा।.. यह तुम खूब जानती हो कि पुरुषों का सदैव व्यवस्था पर एकाधिकार रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो राम सीता को त्यागते नहीं? .. उमस बढ रही है..।
तन्वी ने खिडकियों के आगे से पर्दे हटाए। वह बाहर देखने लगी।
वापस आकर बोली, अभी मैंने खिडकी की ओर अंतरिक्ष का जो हिस्सा देखा, मुझे लगा कि उजियाले के आगे छेदों वाली चादर लटका दी है और सुराख विपरीत दिशा में तारों की मानिंद लग रहे हैं। .. मैं उस चादर को ओढकर परी की तरह आकाश की सैर कर रही हूँ।
प्रलय में हलके से प्याले को प्लेट में पटक सा दिया, ऐसा एक भावुक लडकी ही सोच सकती है।.. देखो, जमीन की बात सोचो! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी यह भावुकता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
दोनों रोशनी पर मंडराते दो-चार पतिंगों को देखते रहे।
तन्वी कंधों को तनिक नचा कर बोली, यह तुम ठीक कहते हो। मैंने अपने पति को बेहद प्यार किया। मैं अपने से छल-कपट कतई नहीं कर सकती। एक विशुद्ध औरत की तरह मैंने अपने पति को उत्साह और समर्पण भाव से प्रेम किया था।
उसने सहसा लम्बा साँस लेकर फिर कहा, मेरा अनुभव है कि कोई स्त्री जब तक प्रेमिका रहती है, पुरुष उसका दीवाना होता है। उस पर प्रेमिल शब्दों की वर्षा करता है, तब उसे अपनी प्रेमिका के लिए जुनून की हद तक चिपकाव होता है। पर जैसे ही वह उसकी पत्नी बनती है, तो पति की तमाम सडियल भावनाएं उभर आती हैं। वह उसे चंद ही दिनों में अपनी दासी समझने लगता है। यह मैं अपने अनुभवों से कह सकती हूँ। वह अपने को हल्का झटका देकर बोली, एक बात और है। पत्नी को प्रेमिका की तरह अपने पति की नजरों से घायल करते रहना चाहिए, बीच-बीच में नाराजगी दिखानी चाहिए, उसे अपने नखरों से सताना चाहिए। ..मेरा कहने का मतलब है उसे पति को परमेश्वर नहीं मानना चाहिए बल्कि उसको समानता का अहसास कराते रहना चाहिए।
वह पल भर के लिए चुप हो गयी। उसके चेहरे पर उदासियां मटमैलेपन का अहसास कराने लगीं।
प्रलय ने पूछा, तन्वी! तुम ठीक तो हो? तुम्हारा चेहरा निस्तेज क्यों हो गया?
तेज आयेगा कहाँ से? अपनी सारी सोचों को कुचलते हुए मैंने महसूसा है। पति ने वस्तु की तरह बरता और बलात्कारी ने दरिंदे की तरह नोचा है। तब साहस नहीं जुटा पायी कि दोनों की स्त्री के प्रति वहशी दृष्टि को अदालत में नंगा कर दूं। इतनी असहाय और विवश मैं तब क्यों हो गयी थी?
फिर उसने ऐसे कहा जैसे वह स्वयं से कह रही हो, यह शरीर विभिन्न सूंइयों से बिंध रहा है। मेरे अंग-प्रत्यंग में बीस नाखून पीडा दे रहे हैं। चाहती हूँ कि पुरुष बन जाऊँ। यदि प्रकृति या ईश्वर नर-नारी को यह अवसर देता कि वह आधी उम्र पुरुष रहेंगे और आधी उम्र स्त्री तो किसी को कोई मलाल नहीं होता। सारे अनुभव एक ही उम्र में हो जाते। कदाचित पुनर्जन्म की लालसा भी नहीं रहती।
प्रलय ने उसे झिंझोडा मानो वह जुनून में बोल रही हो।
क्या पागलों की तरह प्रलाप कर रही हो अब तुम तन्वी, अपने अतीत से मत उलझो। बीते कल को ब्लैक बोर्ड पर लिखे, चाक के अक्षरों की तह मिटा डालो। नौकरी तुम कर रही हो.. तन्वी! तुमने न जाने क्यों शादी की?
यही सोचकर कि वकील, डाक्टर, न्यायाधीश, बडे अधिकारी, पुलिस कमिश्नर, आईएएस, राजनेता, लखपति-करोडपति स्त्रियां शादी करती हैं, यह सोचकर मैंने भी शादी कर ली। तब मैं सोचती थी कि यह सुरक्षात्मक जीवन शैली है। पर अब समझती हूँ जो पीडाएं मुझे बलात्कार होने पर न हुई, वह सामाजिक व धार्मिक परम्परा से बने वैधानिक पति से हुई हैं।
प्रलय ने सिगरेट सुलगा ली। तन्वी को ऑफर की पर उसने मना कर दिया।
तुम ड्रिंक लो तो बाहर से लाऊं।
बाहर जा रहे हो तो दो चिकन तंदूरी और कटा प्याज भी ले आना। उसने आलस मरोडा और छींक पडी।
तुम्हें जुकाम तो नहीं है।
नहीं, मुझे सिगरेट के धुएं से एलर्जी है।
प्रलय ने सिगरेट बुझा दी। वह बाहर निकल गया। तन्वी फिर सोचने लगी, जो सोचता है, वह आत्महत्या करता है फिर हत्या कौन करता है?
वह सहसा गंभीर हो गयी। मौन धारण कर लिया। भांति-भांति के संघर्ष की लहरें उसके मन-सागर में उठ रही थीं।
प्रलय भीतर आया। उसके हाथ में भोजन और शराब की बोतल थी।
सब कुछ व्यवस्थित होने पर दोनों ने रोमांटिक पेयर की तरह जाम टकराए। तन्वी ने दो-चार घूंट लिए। प्रलय ने तो जाम खाली कर दिया और फिर से जाम भर लिया। तन्वी ने पूछा, प्रलय! आदमी हत्या क्यों करता है?
उसने घूंट लेकर कहा, इस नशीले क्षणों में आत्महत्या और हत्या की बातें छोडो डार्लिग।
वह उठकर उसके पास बैठ गया।
वह जरा तल्ख स्वर में बोली, इतने रोमांटिक मत बनो। देखो, मेरा मूड खराब है। खराब क्या, उस पर किसी ने तेजाब के छींटे डाल दिये हो। इसलिए मर्यादा में रहो? मैं पीकर कपडों से बाहर नहीं होती।
प्रलय ने सतही तौर पर अजीब-सा मुँह बनाकर कहा, अरे यार! पीने के बाद सारा मूड पलट जाता है और.. और..। उसने उसका चुम्बन लेना चाहा कि वह धकेल कर उठ गयी। ताडना भरे स्वर में बोली, खबरदार! अपने पर काबू रखो। मैं पीने वालों की प्रकृति से भिन्न हूँ। मैं पीकर और ज्यादा कांशंस हो जाती हूँ। कुतिया की तरह सजग-सचेत। अपने को संभालो और इसी वक्त मेरे फ्लैट से चले जाओ। सुनो, मैं घात-प्रत्याघात बहुत झेल चुकी हूँ, अब किसी तरह की इच्छारहित हलचल पसंद नहीं करती। प्रलय को झटका सा लगा। वह सचेत सा हुआ।
तन्वी ने अपना कथन फिर दोहराया, मैं पूछती हूँ कि आदमी हत्या क्यों करता है? वह मृत्यु का खेल क्यों खेलता है?
उसे नशे का सुरूर था। अपने को संभालकर वह बुदबुदाया, मैं नहीं जानता डार्लिग, इस समय मेरी मन:स्थिति सिर्फ तुम्हें देख रही है, हमें उत्तेजनाओं के सागर में तैरना चाहिए।
तुम मेरे प्रश्न का उत्तर दो। उसने उसे झिंझोडा।
प्रलय ने अपने को संभाल लिया। अस्पष्ट स्वर में बोला, आदमी शत्रुता, घृणा, प्रतिशोध, स्वार्थ, दु:ख, हताशा, आवेश, अनायास और कभी-कभी व्यर्थ और निरुद्देश्य हत्या करता है।
निरुद्देश्य और व्यर्थ भी हत्या करता है?
हाँ, अपने आप से ऊब कर। अपने आप से ग्लानि करते-करते। कई बार वह इतना विक्षिप्त और असंतुलित हो जाता है कि अनायास वह दूसरे की भी हत्या कर देता है।
हाँ प्रलय, तुम सही कहते हो। कभी-कभी आदमी अपने आप से घृणा और ग्लानि करने लगता है। उसे अपने होने का अहसास भी नहीं होता। तन्वी भावातिरेक हो गई। बोली, वह अपने आप से अजनबी हो जाता है। फिर उसके लिए मृत्यु एक तमाशा हो जाती है और वह तमाशा करने वाला। कई बार हम मृत्यु का वरण इसलिए भी कर लेते हैं कि हमने जो निरंतर त्रुटियां की हैं, उन्हें सुधार नहीं सकते। तंग आ जाते हैं हम। फिर नष्ट करने की सोच लेते हैं, अपने और दूसरे को। हत्या या आत्महत्या कर लेते हैं।
उसकी कठोर मुखाकृति को देखकर प्रलय के मन में करण्ट सा लगा। वह सजग हो गया। वह विस्मय से बोला, क्या तुम मेरी हत्या करोगी?.. तन्वी! अब इन गंभीर चिंतन-मनन वाली बातों पर थूको। आओ, हम आनंद के चरमबिंदु को स्पर्श करें। तुम भावुक हो। कोमल हो। व्यर्थ की उलझनों में मत फंसो। हर बात का एक समय होता है। यह समय..।
प्रलय तो सम्पूर्ण आदम हो गया था। वासना ने उसे एक ही बिंदु पर केंद्रित कर दिया था। पर तन्वी जरा भी हव्वा नहीं बनी। वह इसके व्यवहार पर विस्मित थी।
तन्वी ने कहा, प्रलय! यह क्या पागलपन है। मुझे तुम बौद्धिक रूप से प्रभावित करते हो। तुम्हारे विचारों में एक नया द्वंद्व व बोध होता है, यथार्थ भी होता है। एक नयी दृष्टि भी। जो जीवन में फैले कर्मकांड और पाखंड के प्रति मनुष्य को जाग्रत करती है लेकिन तुमसे मैं सैक्स की दृष्टि से जरा भी प्रभावित नहीं हूँ। तुम्हारे जिस्म, आँखें, हाथ, टाँगें यानि तुम्हारे शरीर का सम्पूर्ण ढांचा मुझमें वितृष्णा भरता है। चलो, हटो, बलात्कारी वाला दुष्कर्म मत करो। उसने उसे धक्का-सा दिया।
प्रलय भावशून्य-सा हो गया। वह उदास तो लगा पर उसकी आँखों में अपमानजनित हिंस्त्र दोष की स्फुलिंगें दहक रही थीं। उसने अपने रोष व आक्रोश को दबाया। शांत भाव से बोला, मैं अपनी बॉडी लैंग्वेज को बखूबी समझता हूँ। तन्वी! यह एक अनिवार्य जरूरत है।
तन्वी ने उसे तिरस्कार भरी दृष्टि से देखा। कहा, मैं मान लेती हूँ कि तुम मर्द हो, मित्र हो, वासना में अंधे हो पर मुझे तुम समर्पण के लायक मर्द नहीं लगते। तुम्हें समर्पण करने की सोचते ही घृणास्पद लहरें मुझमें जन्मने लगती हैं। आई एम सॉरी फॉर दिस..।
तदुपरान्त हताश पुरुष ने दृढ इच्छा से अपना अंतिम पासा फेंका, अतृप्ति और तनाव, मुझे जबरदस्ती करने के लिए मजबूर कर दें तो?
वह खिलखिलाकर हँस पडी। पलंग से उठकर खडी हो गयी। आश्चर्य भरे स्वर में बोली, तुम समझते हो कि मैं इतनी कमजोर हूँ कि तुम्हारी धमकियों से डर जाऊँगी। पागल हो तुम।.. एक शरीफ बुद्धिजीवी की तरह तुम चुपचाप चले जाओ।
उसने आखिरी प्रार्थना भरा दांव फेंका, यदि मैं तुम्हें शादी का वचन दूँ तो?
अरे वाह! क्षणिक तृप्ति के लिए तुम यह वायदा भी करने लगे। वासना आदमी को बहुत कमजोर बना देती है। और सुनो जिसके व्यक्तित्व से मैं जरा भी प्रभावित नहीं हूँ, उससे मैं शादी की कैसे सोच सकती हूँ? प्रलय! जैसे कई व्यक्ति काकरोच को देखकर अजीब सी घृणा से भर जाते उसी तरह तुम्हें इस रूप में देखकर मैं घिन से भर जाऊँगी। मैं शरीर की पवित्रता पर विश्वास नहीं करती पर मन के विरुद्ध कुछ भी करना भी तो बलात्कार है।
वासना का भूत प्रलय की बौद्धिकता पर हावी सा हो रहा था। उसने उसे पकडना चाहा। वह भाग कर बाथरूम में गयी और तेजाब की बोतल उठाकर ले आयी। चेतावनी भरे स्वर में बोली, प्रलय! इसमें तेजाब है। मैं झूठ नहीं बोल रही हूँ। यदि यह शरीर के किसी हिस्से पर पड गया तो वह जलकर विकृत हो जाएगा। तुम और बदसूरत हो जाओगे। तब मजाक में लोग कहेंगे- श्रीमानजी! पहले ही बडे खूबसूरत थे और ऊपर से खाक मलली।
उसने उसके बाएं हाथ की उंगलियों पर जरा-सा तेजाब गिरा दिया।
वह चीख पडा। पीडा से आहत होकर वह बोला, यह क्या पागलपन है? तुमने मुझे जला दिया। क्या तुम मेरी हत्या करना चाहती हो? वह तडपने-सा लगा।
वह गंभीर स्वर में बोली, नहीं। बहस का और सवालों का मतलब यह नहीं है कि उनका प्रयोग यूं ही कर लिया जाय। लगता है कि तुम्हारा नशा और उन्माद उतर गया है। सामने दरवाजा है बाहर चले जाओ। चुपचाप वर्ना मैं बोतल भी उडेल सकती हूँ।
तन्वी ने दरवाजा खोला। हाथ के इशारे से कहा, जाइए श्रीमान्, अभी जिंदगी बहुत बाकी है, किसी भी औरत से शादी कर लीजिए ताकि आप उत्तेजना में अंधे होकर कोई अपराध न करें और सामान्य रहें।
तन्वी ने दरवाजा बंद करके घृणा भरा वाक्य उछाला- कम्बख्त! इन मर्दो को वक्त-बेवक्त भेडिया बनते देर नहीं लगती।
वह बिस्तर पर जाकर पड गयी।
Posted by Udit bhargava at 1/12/2010 08:49:00 pm 0 comments
उपहार
उस दिन शेरोजा का जन्मदिन था। इस मौके पर उसे ढेर सारे उपहार मिले। किसी ने खूबसूरत पेंटिंग्स दिए, तो किसी से मिला उसे मनपसंद घोडेवाला खिलौना। लेकिन एक उपहार इन सबसे बिल्कुल अलग था।दरअसल, शेरोजा के अंकल ने उसे एक चिडिया पकडने वाला पिंजरा (ट्रैप) दिया था।
मां-मां देखो न, अंकल ने कितना सुंदर उपहार दिया है। यह बेहद अलग है और सबसे खास भी, शेरोजा ने मां को पिंजरा दिखाते हुए कहा।
अरे, यह खेलने की चीज नहीं है और चिडिया पकडकर तुम क्या करोगे? मां ने हैरानी से पूछा।
मैं सुंदर-सुंदर चिडियों को इसमें फंसाकर रखूंगा, शेरोजा ने तुरंत कहा, मुझे चिडिया की आवाज बहुत पसंद है। बहुत मजा आएगा, जब वे मीठे सुरों में मुझे गाना सुनाएंगी। हां, उन्हें पिंजरे में यूं ही नहीं रखूंगा। उनकी पूरी देखभाल भी करूंगा। उन्हें दाना-पानी दूंगा और रोजाना पिंजरे की सफाई भी करूंगा, उसने प्रसन्नता से कहा।
शेरोजा भागकर गया और घर से कुछ दाने ले आया। अंकल के सुझाए गए तरीकों के मुताबिक, उसने घर के आंगन में पिंजरा रखकर उसमें दाने बिखेर दिए और वहीं खडा हो गया। दरअसल, वह देखना चाहता था कि कैसे इस ट्रैप में चिडिया फंसती है। लेकिन शायद शेरोजा की मौजूदगी के कारण वहां कोई चिडिया नहीं आ रही थी। शेरोजा को भूख लगी थी, इसलिए वह पिंजरे को वहीं छोडकर डिनर के लिए चला गया।
अरे वाह, इतनी सुंदर चिडिया। यह तो बहुत प्यारी है-डिनर से वापस आने के बाद शेरोजा ने पिंजडे में एक नन्ही-सी चिडिया को देखकर कहा। उसने देखा कि वह बार-बार पिंजरे की दीवार पर चोंच मार रही है और बाहर आने के लिए छटपटा रही है। उससे रहा नहीं गया और वह तुरंत पिंजरे को घर के अंदर ले आया।
मां देखो न, मैंने कितनी खूबसूरत चिडिया पकडी है-शेरोजा ने खुशी से लगभग चीखते हुए कहा।
मेरे खयाल से यह बुलबुल है। जरा देखने दो कि इसकी धडकन सही है या नहीं-चिडिया को हाथ में लेकर मां ने कहा, अरे, यह तो वाइल्ड कनारी है। जरा सावधान रहना। इसे तुम परेशान बिल्कुल मत करना। बेहतर होगा, यदि तुम इसे आजाद कर दो-मां ने शेरोजा को सलाह दी।
नहीं-शेरोजा ने तल्खी से कहा।
मैं जाता हूं और इसके लिए कुछ खाने-पीने का प्रबंध करता हूं -शेरोजा यह कहते हुए वहां से चला गया। उसने पक्षी को पिंजरे में दोबारा रख दिया और उसकी देखभाल करने लगा। दो दिनों तक लगातार उसने उस नन्ही-सी चिडिया की अच्छी देखभाल की। लेकिन तीसरे दिन से उसकी चिडिया में दिलचस्पी कम हो गई। पिंजरा बेहद गंदा हो चुका था। उसमें रखा पानी भी पुराना हो चुका था।
देखो, तुम चिडिया की देखभाल नहीं कर रहे हो। अब भी समझ जाओ शेरोजा। बेहतर होगा, तुम इसे आजाद कर दो-मां ने पिंजरे की तरफ इशारा करते हुए शेरोजा से कहा।
मां की बात पर ध्यान न देते हुए शेरोजा ने पिंजरे की सफाई शुरू कर दी। जब तक वह सफाई करता रहा, वह नन्ही चिडिया उसमें बुरी तरह फडफडा रही थी। शायद वह शेरोजा से बहुत डरी हुई थी।
पिंजरे की सफाई करने के बाद शेरोजा पानी लाने के लिए चला गया। इस दौरान वह पिंजरे का दरवाजा बंद करना भूल गया। मां ने जब यह देखा तो शेरोजा को आवाज दी- शेरोजा, पिंजरे का दरवाजा बंद कर दो। वरना चिडिया उड जाएगी। उसे चोट भी पहुंच सकती है-मां ने शेरोजा से इतना ही कहा। वह यह बताना भूल गई थीं कि पिंजरे का दरवाजा खुला देख चिडिया कितनी खुश थी और पंख फैलाकर कमरे में इधर-उधर फुदकने लगी थीं।
मां की आवाज सुनते ही शेरोजा दौडते हुए आया और चिडिया को फिर से पिंजरे में कैद कर दिया। अगले दिन उसने देखा कि चिडिया की सांसें तेज-तेज चल रही है और वह बिल्कुल अधमरी सी हो गई है। शेरोजा उसे बार-बार देख रहा था। उसे आभास हो चुका था कि जरूर कुछ बुरा हुआ है।
मां देखो न, चिडिया को क्या हो गया है। मैं अब क्या करूं?-शेरोजा ने रोते हुए मां से पूछा।
अब कुछ नहीं हो सकता। जो होना था, वह हो चुका-मां ने नाराजगी जाहिर की।
शेरोजा पूरे दिन पिंजरे को लिए बैठा रहा। वह देख रहा था कि कैसे पेट के बल लेटी हुई चिडिया अपनी अंतिम सांसें गिन रही है। रात को जब वह सोने गया, तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। यह शेरोजा के लिए एक बडा सदमा था।
चिडिया की मौत ने उसे कई रातों तक सोने नहीं दिया। जब भी आंखें बंद करता, तो उसे पिंजरे में कैद फडफडाती और आजादी के लिए संघर्ष करती वह नन्ही-सी चिडिया ही दिखाई देती।
सुबह उसने देखा कि पिंजरे में चिडिया पीठ के बल लेटी हुई है। उसके दोनों पैर ऊपर की ओर हैं और एक-दूसरे से लिपटे हुए हैं। यह एक ऐसी घटना थी, जो उस उपहार की वजह से ही हुई थी। लेकिन शेरोजा को इससे मिला सबक उस उपहार के मूल्य से कहीं ज्यादा बडा था।
पेश है रूसी उपन्यासकार लियो टॉल्सटाय की कहानी द बर्ड।
जन्मदिन पर मिले उपहार ने एक बच्चे को कैसे सिखाया बड़ा सबक?
यही बयां कर रही है यह कहानी।
Posted by Udit bhargava at 1/12/2010 08:39:00 pm 0 comments

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