29 दिसंबर 2009

भक्ति के महाद्वार हैं हनुमान



विश्व-साहित्य में हनुमान के सदृश पात्र कोई और नहीं है। हनुमान एक ऐसे चरित्र हैं जो सर्वगुण निधान हैं। अप्रतिम शारीरिक क्षमता ही नहीं, मानसिक दक्षता तथा सर्वविधचारित्रिक ऊंचाइयों के भी यह उत्तुंग शिखर हैं। इनके सदृश मित्र, सेवक ,सखा, कृपालु एवं भक्तिपरायणको ढूंढनाअसंभव है। हनुमान के प्रकाश से वाल्मीकि एवं तुलसीकृतरामायण जगमग हो गई। हनुमान के रहते कौन सा कार्य व्यक्ति के लिए कठिन हो सकता है?
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरेतेते॥
तो आप अगर किसी कष्ट से ग्रस्त हैं, किसी समस्या से पीडित हैं, कोई अभाव आपको सता रहा है तो देर किस बात की! हनुमान को पुकारिए, सुंदर कांड का पाठ कीजिए, वह कठिन लगे तो हनुमान-चालीसा का ही परायण कीजिए और आप्तकामहो जाइए। हनुमान की प्रमुख विशेषताओं को गोस्वामी ने इन चार पंक्तियों में समेटने का प्रयास किया है-
अतुलितबलधामंहेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुंज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानंवानरणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तंवातजातंनमामि।।

अतुलित बलशाली, सोने के पर्वत के सदृश विशाल कान्तिमान् शरीर, दैत्य (दुष्ट) रूपी वन के लिए अग्नि-समान, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के खान, वानराधिपति,राम के प्रिय भक्त पवनसुतहनुमान का मैं नमन करता हूं।
अब ढूंढिएऐसे चरित्र को जिसमें एक साथ इतनी विशेषताएं हों। जिसका शरीर भी कनक भूधराकारहो, जो सर्वगुणोंसे सम्पन्न भी हो, दुष्टों के लिए दावानल भी हो और राम का अनन्य भक्त भी हो। कनक भूधराकारकी बात कोई अतिशयोक्ति नहीं, हनुमान के संबंध में यह यत्र-तत्र-सर्वत्र आई है।
आंजनेयंअति पाटलाननम् कांचनाद्रिकमनीयविग्रहम्।
पारिजाततरुमूलवासिनम् भावयामिपवननन्दनम्॥

अंजना पुत्र,अत्यन्त गुलाबी मुख-कान्ति तथा स्वर्ण पर्वत के सदृश सुंदर शरीर, कल्प वृक्ष के नीचे वास करने वाले पवन पुत्र का मैं ध्यान करता हूं। पारिजात वृक्ष मनोवांछित फल प्रदान करता है। अत:उसके नीचे वास करने वाले हनुमान स्वत:भक्तों की सभी मनोकामनाओंकी पूर्ति के कारक बन जाते हैं। आदमी तो आदमी स्वयं परमेश्वरावतारपुरुषोत्तम राम के लिए हनुमान जी ऐसे महापुरुष सिद्ध हुए कि प्रथम रामकथा-गायक वाल्मीकि ने राम के मुख से कहलवा दिया कि तुम्हारे उपकारों का मैं इतना ऋणी हूं कि एक-एक उपकार के लिए मैं अपने प्राण दे सकता हूं, फिर भी तुम्हारे उपकारों से मैं उऋण कहां हो पाउंगा?
एकैकस्योपकारस्यप्राणान्दास्यामितेकपे।
शेषस्येहोपकाराणांभवामऋणिनोवयम्।।
उस समय तो राम के उद्गार सभी सीमाओं को पार कर गए जब हनुमान के लंका से लौटने पर उन्होंने कहा कि हनुमान ने ऐसा कठिन कार्य किया है कि भूतल पर ऐसा कार्य सम्पादित करना कठिन है, इस भूमंडल पर अन्य कोई तो ऐसा करने की बात मन में सोच भी नहीं सकता।
कृतंहनूमताकार्यसुमहद्भुविदुलर्भम्।
मनसापियदन्येनन शक्यंधरणी तले॥
गोस्वामी जी हनुमान के सबसे बडे भक्त थे। वाल्मीकि के हनुमान की विशेषताओं को देखकर वह पूरी तरह उनके हो गए। हनुमान के माध्यम से उन्होंने राम की भक्ति ही नहीं प्राप्त की, राम के दर्शन भी कर लिए। हनुमान ने गोस्वामी की निष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें वाराणसी में दर्शन दिए और वर मांगने को कहा। तुलसी को अपने राम के दर्शन के अतिरिक्त और क्या मांगना था? हनुमान ने वचन दे दिया। राम और हनुमान घोडे पर सवार, तुलसी के सामने से निकल गए। हनुमान ने देखा उनका यह प्रयास व्यर्थ गया। तुलसी उन्हें पहचान ही नहीं पाए। हनुमान ने दूसरा प्रयास किया। चित्रकूट के घाट पर वह चंदन घिस रहे थे कि राम ने एक सुंदर बालक के रूप में उनके पास पहुंच कर तिलक लगाने को कहा। तुलसीदास फिर न चूक जाएं अत:हनुमान को तोते का रूप धारण कर ये प्रसिद्ध पंक्तियां कहनी पडी-
चित्रकूट के घाट पर भई संतनकी भीर।
तुलसीदास चन्दन रगरैतिलक देतराम रघुबीर॥
हनुमान ने मात्र तुलसी को ही राम के समीप नहीं पहुंचाया। जिस किसी को भी राम की भक्ति करनी है, उसे प्रथम हनुमान की भक्ति करनी होगी। राम हनुमान से इतने उपकृत हैं कि जो उनको प्रसन्न किए बिना ही राम को पाना चाहते हैं उन्हें राम कभी नहीं अपनाते। गोस्वामी ने ठीक ही लिखा-
राम दुआरेतुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनुपैसारे॥
अत:हनुमान भक्ति के महाद्वारहैं। राम की ही नहीं कृष्ण की भी भक्ति करनी हो तो पहले हनुमान को अपनाना होगा। यह इसलिए कि भक्ति का मार्ग कठिन है। हनुमान इस कठिन मार्ग को आसान कर देते हैं, अत:सर्वप्रथम उनका शरणागत होना पडता है। भारत में कई ऐसे संत व साधक हुए हैं जिन्होंने हनुमान की कृपा से अमरत्व को प्राप्त कर लिया। रामायण में राम और सीता के पश्चात सर्वाधिक लोकप्रिय चरित्र हैं हनुमान जिनके मंदिर भारत ही नहीं भारत के बाहर भी अनगिनत संख्या में निर्मित हैं। धरती तो धरती तीनों लोकों में इनकी ख्याति है-
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।
जय कपीसतिहूंलोक उजागर॥

अभीष्ट सिद्ध करें सिद्धिविनायक



भगवान् श्रीगणेश साधारण देवता नहीं हैं। वे साक्षात् अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक,परात्पर, पूर्णतम,परब्रह्म, परमात्मा ही हैं। सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार को निर्विघ्न बनाने के लिए ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी इनका ध्यान करते हैं। ऋग्वेद का कथन है-न ऋचेत्वत्क्रियतेकिंचनारे।हे गणेश! तुम्हारे बिना कोई भी कर्म प्रारंभ नहीं किया जाता। आदौ पूज्योविनायक:- इस उक्ति के अनुसार समस्त शुभ कार्यो के प्रारंभ में सिद्धिविनायककी पूजा आवश्यक है। विघ्नेश्वरप्रसन्न होने पर विघ्नहर्ता बनकर जब कार्य-सिद्धि में सहायक होते हैं, तब वे सिद्धिविनायक के नाम से पुकारे जाते हैं। गणपति की कृपा के बिना किसी भी कार्य का निर्विघ्न सम्पन्न होना संभव नहीं है क्योंकि वे विघ्नों के अधिपति हैं। याज्ञवलक्यस्मृतिके गणपतिकल्प में स्पष्ट शब्दों में यह उल्लेख है-
विनायक: कर्मविघ्नसिद्धयर्थविनियोजित:।
गणानामाधिपत्येचरुद्रेणब्रह्मणातथा॥
ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर ने विनायक को गणों का आधिपत्य प्रदान करके कार्यो में विघ्न डालने का अधिकार तथा पूजनोपरान्तविघ्न को शांत कर देने का अधिकार भी प्रदान किया। इसलिए किसी भी देवता के पूजन में सर्वप्रथम श्रीगणेश की पूजा होती है। ऐसा न करने पर वह व्रत-अनुष्ठान निष्फल हो जाता है। भविष्यपुराणमें लिखा है-
देवतादौयदा मोहाद्गणेशोन चपूज्यते।
तदा पूजाफलंहन्तिविघ्नराजोगणाधिप:॥
यदि किसी कारणवश देव-पूजन के प्रारंभ में विघ्नराजगणपति की पूजा नहीं की जाती है तो वे कुपित होकर उस साधना का फल नष्ट कर देते हैं। इसी कारण सनातनधर्म में गणेशजीकी प्रथम पूजा का विधान बना। मानव ही नहीं वरन् देवगण भी प्रत्येक कर्म के शुभारंभ में विघ्नेश्वरविनायक की पूजा करते हैं। पुराणों में इस संदर्भ में अनेक आख्यान वर्णित हैं।
श्रीगणेशपुराणमें भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्थी को आदिदेव गणपति के आविर्भाव की तिथि माना गया है। स्कन्दपुराणमें भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से इस तिथि के माहात्म्य का गुणगान करते हुए कहते हैं-
सर्वदेवमय:साक्षात् सर्वमङ्गलदायक:।
भाद्रशुक्लचतुथ्र्यातुप्रादुर्भूतोगणाधिप:॥
सिद्धयन्तिसर्वकार्याणिमनसा चिन्तितान्यपि।
तेन ख्यातिंगतोलोकेनाम्नासिद्धिविनायक:॥

समस्त देवताओं की शक्ति से सम्पन्न मंगलमूर्तिगणपति का भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन आविर्भाव हुआ। इस तिथि में आराधना करने पर वे सब कार्यो को सिद्ध करते हैं तथा मनोवांछित फल देते हैं। आराधकोंका अभीष्ट सिद्ध करने के कारण ही वे सिद्धिविनायक के नाम से लोक-विख्यात हुए हैं।
ब्रह्मवैवर्तपुराणके अनुसार भगवती पार्वती नेपरब्रह्मको पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए देवाधिदेव महादेव के परामर्श पर परम दुष्कर पुण्यकव्रत का अनुष्ठान किया था। इस व्रतराजके फलस्वरूप ही साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर ही श्रीगणेश के रूप में उनके यहां आए।
गणेश-पूजन के समय उनके सम्पूर्ण परिवार का स्मरण करना चाहिए। सिद्धि और बुद्धि उनकी पत्नियां हैं। मुद्गलपुराणके गणेशहृदयस्तोत्रमें सिद्धि-बुद्धि से सेवित विघ्ननायकगणपति की स्तुति की गई है-
सिद्धि-बुद्धिपतिम् वन्दे ब्रह्मणस्पतिसंज्ञकम्।
माङ्गल्येशंसर्वपूज्यंविघ्नानांनायकंपरम्॥

सद्बुद्धिसे विचार करके काम करने पर ही मनोरथ सिद्ध होता है। सिद्धि-बुद्धि के साथ विनायक का ध्यान करने का यही अभिप्राय है। श्रीगणेशजीके वामभागमें (बायें) सिद्धि और दक्षिण भाग में (दाहिने) बुद्धि की संस्थितिहै। सिद्धिविनायककी उपासना से मस्तिष्क पर छाया अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है तथा बुद्धि जाग्रत होकर कार्य-सिद्धि की योजना बनाने में सक्षम हो जाती है। सिद्धि-बुद्धि से युक्त विनायक का तेज करोडों सूर्यो के प्रकाश से भी ज्यादा है- सिद्धिबुद्धियुत: श्रीमान् कोटिसूर्याधिकद्युति:।शिवपुराणकी रुद्रसंहिताके कुमारखण्डमें श्रीगणेश के सिद्धि-बुद्धि के साथ विवाह का प्रसंग वर्णित है। गणेशपुराणके उपासनाखण्डमें भी श्रीगणेश के विवाह का विस्तार से वर्णन है। लोक-प्रचलन में गणेशजीकी पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि के नाम से जानी जाती हैं। गणेशजीकी पत्नी सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ नाम के अतिशय शोभासम्पन्नदो पुत्र हुए-
सिद्धेर्गणेशपत्न्यास्तुक्षेमनामासुतोऽभवत्।
बुद्धेर्लाभाभिध:पुत्र आसीत्परमशोभन:॥
गणपति के रेखाचित्र स्वस्तिक (") के दोनों तरफ दो रेखायें (॥) उनकी दो पत्नियों और दो पुत्रों का प्रतीक हैं। दीपावली, बही-बसना अथवा गृह-प्रवेश आदि के समय ऋद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ लिखना गणेशजीका पत्नियों व पुत्रों सहित आवाहन करना ही है। क्षेम का ही दूसरा नाम शुभ है। इस प्रकार सम्पूर्ण गणेश-परिवार सदा से ही प्रथमपूज्यरहा है।
श्रीरामचरितमानसमें गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम-विवाह के बाद सीताजीके जनकपुर से अयोध्या में आगमन के अवसर पर सिद्धिविनायकका स्मरण चित्रित किया है-
प्रेमबिबसपरिवारुसब जानिसुलगन नरेस।
कँुअरिचढाई पालकिन्हसुमिरे सिद्धि-गनेस॥
भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्थी के दिन श्रीसिद्धिविनायकका आविर्भावोत्सवबडे धूमधाम से मनाया जाता है।
गणेशपुराणके अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा देख लेने पर कलंक अवश्य लगता है। ऐसा गणेश जी के अमोघ शाप के कारण है। स्वयं सिद्धिविनायकका वचन है-
भाद्रशुक्लचतुथ्र्यायो ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपिवा।
अभिशापीभवेच्चन्द्रदर्शनाद्भृशदु:खभाग्॥
जो जानबूझ कर अथवा अनजाने में ही भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा का दर्शन करेगा, वह अभिशप्त होगा। उसे बहुत दुख उठाना पडेगा। भाद्र-शुक्ल-चतुर्थी का चंद्र देख लेने के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण को स्यमन्तकमणि की चोरी का मिथ्या कलंक लगा था। श्रीमद्भागवत महापुराणके दशम स्कन्ध के 57वेंअध्याय में यह कथा है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्र-दर्शन हो जाने पर उसका दोष दूर करने के लिए श्रीमद्भागवत में वर्णित इस प्रसंग को पढना अथवा सुनना चाहिए।
वस्तुत:सिद्धिविनायक चतुर्थी हमें ईश्वर के विघ्नविनाशकस्वरूप का साक्षात्कार कराती है जिससे अभीष्ट-सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। जीवन को निर्विघ्न बनाने के लिए आइये हम सब इनकी स्तुति करें-
आदिपूज्यंगणाध्यक्षमुमापुत्रंविनायकम्।
मङ्गलंपरमंरूपंश्रीगणेशंनमाम्यहम्॥

28 दिसंबर 2009

व्यापार हमेशा साफ-सुथरा ही करना चाहिए

वे जीने की कला (आर्ट ऑफ लिविंग) के प्रणेता आध्यात्मिक गुरू रविशंकर के संपर्क में आए और उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करना शुरू कर दिया। गुप्ता कहते हैं कि वह एक ऎसे व्यक्ति हैं, जिनका उनके जीवन पर सबसे ज्यादा असर हुआ है। महेश गुप्ता ने तीन दशक पहले अपने कॅरियर के शुरू में जब पहली नौकरी की तो उनकी हैसियत एक दोपहिया वाहन खरीदने लायक भी नहीं थी। आज वे देश में उपलब्ध सबसे बेहतरीन कार बीएमडब्ल्यू 750 आई सिरीज के नवीनतम मॉडल को चलाते हैं।उनका कहना है कि "मेरा जन्म एक साधारण से परिवार में हुआ। हम चार बहन और दो भाई थे, जो निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से थे, इसलिए जीवनशैली की दृष्टि से हम पर कई बंदिशें थीं।" इन्हीं बंदिशों के कारण जीवन में बड़ा बनने की उदात्त आकांक्षा जाग्रत हुई। "स्वाभाविक रू प से मैं अच्छे कपड़े पहनना चाहता था; मेरी इच्छा अच्छा वाहन खरीदने की थी और मैं जानता था कि मैं बहुत कुछ करने का इच्छुक हूं और यह सब पाने में समर्थ हो जाऊंगा।"उनके पिता सरकारी सेवा में थे। महेश का बचपन शुरू में लोधी रोड और बाद में साउथ एक्सटेंशन में बीता, जहां वे हाल ही तक रहते थे। वह स्कूल में हमेशा सर्वप्रथम रहते थे। स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा दी और छुटि्टयां मनाने अपनी बहन के पास कोटा चले गए। पिता उनके भविष्य को लेकर बहुत चिंतित थे, लेकिन महेश को पूरा भरोसा था कि उन्हें आईआईटी में प्रवेश मिल जाएगा। हुआ भी ऎसा ही। उन्होंने आईआईटी कानपुर में प्रवेश ले लिया।"हालांकि मैं सर्वश्रेष्ठ छात्रों में शामिल था, फिर भी मुझ पर मनोवैज्ञानिक दबाव था, क्योंकि मेरी पृष्ठभूमि बहुत ऊंची नहीं थी।" उनकी मानसिकता बदलने में एक साल लगा। उसके बाद वे सहज हो गए। प्रथम वर्ष में तो वह 10 में से केवल 6।7 अंक ही ले पाए। तृतीय वर्ष में पहुंचते-पहुंचते उन्होंने खोया आत्मविश्वास फिर पा लिया और 10 में से 10 अंक प्राप्त कर दिखाए। वह गर्व से बताते हैं कि आईआईटी में तृतीय वर्ष की पढ़ाई सबसे कठिन मानी जाती है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद गुप्ता 1978 में इंडियन ऑइल कॉरपोरेशन (आईओसी) से जुड़ गए और कड़ी मेहनत की बदौलत वहां उन्हें जल्दी-जल्दी पदोन्नति मिली, जिससे कम्पनी में वह तेजी से आगे बढ़े। वहां काम बहुत अच्छा था, फिर भी गुप्ता ने 1988 में आईओसी की नौकरी छोड़ दी। उन्होंने कहा कि ईमानदारी से कहूं तो उसके दो कारण थे। "एक तो यह कि मैं अपना घर दिल्ली छोड़ना नहीं चाहता था। कम्पनी की नीति हर 3-4 साल में तबादला करने की थी और मेरा पदस्थापन मुंबई में था। मैं जानता था कि मैं दिल्ली में अपनी पोस्टिंग कराने के लिए किसी से नहीं कहने वाला। आखिर मैं कितनी बार ऎसा कर सकता था" दूसरा कारण यह था कि मैं मानवता की व्यापक भलाई के काम में उसे बाधक महसूस करता था। आईओसी में तो वह कम्पनी की सोच के हिसाब से ही काम कर सकते थे। वह लोगों को यह सिखाना चाहते थे कि तेल (ईधन) कैसे बचाया जा सकता है।आईओसी की "पक्की" नौकरी छोड़कर उन्होंने ठीक ऎसा ही काम शुरू किया। कुछ महीने तो पिता उनसे नाराज भी रहे, लेकिन बाद में बेटे की अपने निजी उद्यम के प्रति उत्कंठा को उन्होंने महसूस किया। गुप्ता के अनुसार "इसके बाद उन्होंने मुझे सहयोग देना शुरू कर दिया। आज 73 साल की उम्र होने के बावजूद वे मुझे पूरा सहयोग दे रहे हैं।"तेल से वह पानी पर कैसे आ गए वर्ष 1998 में महेश गुप्ता के दोनों बच्चों को दूषित पानी पीने के कारण पीलिया हो गया। इसके बाद उन्होंने पानी पीने योग्य साफ बनाने वाली प्रणाली की तलाश की। गुप्ता को महसूस हुआ कि बाजार में सही मायने में ऎसी कोई प्रणाली उपलब्ध नहीं है, जो पीने के पानी को हानिरहित करने के मानदंडों पर पूरी तरह खरी उतर सके। इसके बाद उन्होंने अपने घर के गैरेज में ही पहली आरओ प्रणाली तैयार की। इसी के साथ उनके दिमाग में यह बात भी आई कि जब मैं अपने लिए यह प्रणाली तैयार कर सकता हूं, तो दूसरों के लिए क्यों नहीं इसी सोच से केंट आरओ अस्तित्व में आया।इसी दौरान गुप्ता आध्यात्मिक दृष्टि से कई परिवर्तनों से गुजरे। वे जीने की कला (आर्ट ऑफ लिविंग) के प्रणेता आध्यात्मिक गुरू रविशंकर के संपर्क में आए और उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करना शुरू कर दिया। गुप्ता कहते हैं कि वह एक ऎसे व्यक्ति हैं जिनका उनके जीवन पर सबसे ज्यादा असर हुआ है। "उन्होंने मेरी सोच को ही पूरी तरह बदल दिया।" गुप्ता हर महीने 5-7 दिन अपने गुरू के आश्रम जाते हैं। अपने मैनेजमेंट मंत्रों के बारे में पूछने पर वह कहते हैं- "मैं बहुत अनुदार हूं।" और मानता हूं कि किसी को भी अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरू प ही आगे बढ़ना चाहिए।" उनका दूसरा मंत्र है "व्यापार हमेशा साफ-सुथरा ही करना चाहिए।" दस साल में केंट आरओ परिवार एक से बढ़ते-बढ़ते डेढ़ हजार लोगों की एक सशक्त टीम बन गया है। आज उनकी कम्पनी नगण्य से बढ़कर दो सौ करोड़ की हो गई है।वह केंट आरओ परिवार के लिए सदस्यों का चयन कैसे करते हैं यह पूछने पर उन्होंने बताया कि हम पढ़ाई-लिखाई देखकर तय करते हैं, यदि वह ठीक है तो हम प्रशिक्षण देकर उसे अपने योग्य बना लेते हैं। गुप्ता जब से आर्ट ऑफ लिविंग से जुड़े हैं, उनका "हर क्षण उत्सव" होता है। वह शाकाहारी हैं और प्रतिदिन ध्यान-पूजन करते हैं। उनके परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी और एक बेटा है। बेटा वरूण उनके साथ कारोबार में लगा है और बेटी सुरभि ने प्राचीन स्मारकों के पुनरूद्धार में विशेषज्ञता अर्जित की है।आज के युवाओं के लिए उनका क्या संदेश है यह पूछने पर गुप्ता ने कहा आज के युवा में आत्मविश्वास की कमी है। "उन्हें लगता है कि भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाने से आत्मविश्वास आता है, लेकिन ऎसा नहीं है। आत्मविश्वास तभी आता है, जब यह भावना आए कि मैं यह काम कर सकता हूं। उन्हें यह महसूस करने की जरू रत है कि सफलता तभी मिलेगी, जब वह अपनी पूरी क्षमता से काम करेंगे अन्यथा समय की बर्बादी ही होगी।

हिसाब-किताब की आदत डालें

तमिलनाडु के सेलम शहर में स्थित विनायक विद्यालय के एक योग टीचर महज छ्ह महीने में अपने तमाम छात्रों की पाकेटमनी की राशि लिखने के लिए कहा। इसके बाद उनहोंने छात्रों से पाकेटमनी में से खर्च किये गए एक-एक पैसे का हिसाब लिखने के लिए कहा। हालांकि उन्होंने बच्चों से कभी यह नहीं कहा की उन्हें किस आइटम पर खर्च करना चाहिए। हरेक छात्र ने दो महीने तक खर्चे का पूरा हिसाब-किताब रखा। दो महीने बाद वे अपने साठ दिनों का ब्यौरा लेकर अपने शिक्षक के सामने आये। सभी छात्रों ने अलग-अलग आइटम्स पर अपने सारे पैसे खर्च कर दिए थे। कुछ छात्रों ने चाकलेट्स पर खर्च किया तो किसी ने बिस्किट, स्नैक्स ,कोल्ड ड्रिंक्स और फिल्मों इत्यादि पर। जहां उनकी 80 फीसदी पाकेटमनी फिल्मों पर खर्च होती थी, वहीँ कुछ छात्रों ने 75 फीसदी तक चाकलेट्स पर खर्च किया था। कुछ ओवर स्मार्ट छात्रों ने जंक फ़ूड पर ज्यादा खर्च किया था, जिसके बगैर वे शायद रह नहीं सकते थे। उन्होंने इसकी गणना कर खर्चे के प्रत्येक चार्ट का पीओपी और एमओएम एनेलिसिस किया।
मैनेजमेंट की भाषा में उत्पाद-दर-उत्पाद विश्लेषण को पीओपी एनेलिसिस और महीने-दर-महीने विश्लेषण को एमओएम एनेलिसिस कहा जाता है। गणपति ने हर चार्ट का पीओपी और एमओएम एनेलिसिस करते हुए छात्रों को बताया कि वे हरेक आइटम पर हर महीने कितना ज्यादा खर्च कर रहे हैं। गणपति ने उन्हें यह भी बताया की साल भर में उन आइटम्स पर उनका अनुमानित खर्चा कितना हो सकता है।
छात्रों को सच का सामना करवाने वाली यह तकनीक बेहद आशार्यजनक लगी और अचानक उन्हें समझ में आ गया कि अब तक उनका पैसा कहाँ जा रहा था।
अगले दो महीनों में उन्होंने अनावश्यक मदों पर अपना खर्च बचाया और उनमें से कुछ छात्रों ने तो महीने के अंत में बचा पैसा अपने पितो को वापस सौंप भी दिया। गणपति ने खुश होते हुए बताया की कुछ छात्रों ने चार महीने के बाद बचे पैसे से साइकिल खरीद ली और अब उनमें पैसे के इस्तेमाल को लेकर एक अनुशासन आ गया है।


फंडा यह है कि.......

मैनेजमेंट की भाषा में कहें तो अपने द्वारा किये गए हर काम का लगातार पीओपी और एमओएम विश्लेषण करते रहे। सामने आंकड़े होने पर आपमें काफी सुधार हो सकता है।

काम के प्रति रहे फोकस्ड


जीवन के किसी भी स्तर पर अपनी राह से भटक जाना आजकल आम होता जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकी छोटी सी समयावधि बहुत कुछ प्रदशित या जाहिर करने के चक्कर मे हम अपने कार्य की मुख्य धुरी से भटक जाते हैं।
इसका एक ताजा उदाहरण मुझे हाल ही में समपन्न फ़िल्म समारोह मे नजर आया। यहाँ प्रदशित होने वाली हर फ़िल्म से पहले एक अजीब सी रस्मअदायगी की गयी। कोई युवा श्ख्स मच पर आता, अपने काल सेंटर वाले बेह्तरीन लह्जे मे लोगो में वहा प्रदशित होने वाली फ़िल्म का कथासार प्रस्तुत करता। यह वक्ता वही पढ़कर सुनाता जो वहा मौजूद लोगो के बीच बाट दिए गए ब्रोशर मे लिखा होता। इस समारोह के मुख्य आयोजन स्थल ( मुबई के अँधेरी इलाके मे स्थित फ़न रिपब्लिक मल्टीप्लेक्स ) के स्टाफकर्मी अलग-अलग फॉर्मेट में बनी फिल्मों को सही तरीके से हैंडल और प्रदशित करने के लिहाज से अप्रशिक्षित नज़र आये। उनमें से एक ने तो आंगंतुकों को प्रोजेक्ट कबिन में न घुसने के लिए कड़े शब्दों में चेतावनी तक दे डाली। फिल्म समारोह में आने वाले शिष्टमंडल की गंभीरता को देखते हुए इस तरह की उदघोषणा और ब्रोशर को पढ़कर सुनाता कतई जरुरी नहीं था। फिल्म समारोह का मुख्य फोकस दस दिन की समयावधि में चुनिंदा २०० फिल्मों का प्रदशन करना था। इसके बजाय इससे जुड़े ज्यादा से ज्यादा अनुषंगी आयोजनों से दर्शक उबने लगे, जो वहां कुछ गंभीर योजनाओं के साथ आये थे। फिल्म समारोह में ज्यादातर वही लोग आते हैं और इसे समर्थन देते हैं जो फिल्म मेंकिंग व मनोरंजन के कारोबार में हैं। वे वहां अपना मनोरंजन करने नहीं आते। उन्हें मनोरंजन से परेशानी नहीं है, लेकिन उनका फोकस अपने यहाँ प्रदशित होने वाली दुनियाभर की फिल्मों से कुछ सीखना होता है।


 
फंडा यह है कि.......

किसी भी इवेंट में मिशन स्टेटमेंट को तय कर उसी पर फोकस करना चाहिय।

25 दिसंबर 2009

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – भीष्म का प्राण त्याग


श्रीकृष्ण पाण्डव सभी, गये भीष्म के पास।
प्राण त्याग भीषम कियो, तज मन की सब आस॥
अपने वंश के नाश से दुखी पाण्डव अपने समस्त बन्धु-बान्धवों तथा भगवान श्रीकृष्ण को साथ ले कर कुरुक्षेत्र में भीष्म पितामह के पास गये। भीष्म जी शरशैया पर पड़े हुये अपने अन्त समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। भरतवंश शिरोमणि भीष्म जी के दर्शन के लिये उस समय नारद, धौम्य, पर्वतमुनि, वेदव्यास, वृहदस्व, भारद्वाज, वशिष्ठ, त्रित, इन्द्रमद, परशुराम, गृत्समद, असित, गौतम, अत्रि, सुदर्शन, काक्षीवान्, विश्वामित्र, शुकदेव, कश्यप, अंगिरा आदि सभी ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा राजर्षि अपने शिष्यों के साथ उपस्थित हुये। भीष्म पितामह ने भी उन सभी ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों तथा राजर्षियों का धर्म, देश व काल के अनुसार यथेष्ठ सम्मान किया।
सारे पाण्डव विनम्र भाव से भीष्म पितामह के पास जाकर बैठे। उन्हें देख कर भीष्म के नेत्रों से प्रेमाश्रु छलक उठे। उन्होंने कहा, “हे धर्मावतारों! अत्यंत दुःख का विषय है कि आप लोगों को धर्म का आश्रय लेते हुये और भगवान श्रीकृष्ण की शरण में रहते हुये भी महान कष्ट सहने पड़े। बचपन में ही आपके पिता स्वर्गवासी हो गये, रानी कुन्ती ने बड़े कष्टों से आप लोगों को पाला। युवा होने पर दुर्योधन ने महान कष्ट दिया। परन्तु ये सारी घटनायें इन्हीं भगवान श्रीकृष्ण, जो अपने भक्तों को कष्ट में डाल कर उन्हें अपनी भक्ति देते हैं, की लीलाओं के कारण से ही हुये। जहाँ पर धर्मराज युधिष्ठिर, पवन पुत्र भीमसेन, गाण्डीवधारी अर्जुन और रक्षक के रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हों फिर वहाँ विपत्तियाँ कैसे आ सकती हैं? किन्तु इन भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को बड़े बड़े ब्रह्मज्ञानी भी नहीं जान सकते। विश्व की सम्पूर्ण घटनायें ईश्वाराधीन हैं! अतः शोक और वेदना को त्याग कर निरीह प्रजा का पालन करो और सदा भगवान श्रीकृष्ण की शरण में रहो।
ये श्रीकृष्णचन्द्र सर्वशक्तिमान साक्षात् ईश्वर हैं, अपनी माया से हम सब को मोहित करके यदुवंश में अवतीर्ण हुये हैं। इस गूढ़ तत्व को भगवान शंकर, देवर्षि नारद और भगवान कपिल ही जानते हैं। तुम लोग तो इन्हें मामा का पुत्र, अपना भाई और हितू ही मानते हो। तुमने इन्हें प्रेमपाश में बाँध कर अपना दूत, मन्त्री और यहाँ तक कि सारथी बना लिया है। इनसे अपने अतिथियों के चरण भी धुलवाये हैं। हे धर्मराज! ये समदर्शी होने पर भी अपने भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं तभी यह मेरे अन्त समय में मुझे दर्शन देने कि लिये यहाँ पधारे हैं। जो भक्तजन भक्तिभाव से इनका स्मरण, कीर्तन करते हुये शरीर त्याग करते हैं, वे सम्पूर्ण कर्म बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। मेरी यही कामना है कि इन्हीं के दर्शन करते हुये मैं अपना शरीर त्याग कर दूँ।
धर्मराज युधिष्ठिर ने शरशैया पर पड़े हुये भीष्म जी से सम्पूर्ण ब्रह्मर्षियों तथा देवर्षियों के सम्मुख धर्म के विषय में अनेक प्रश्न पूछे। तत्वज्ञानी एवं धर्मेवेत्ता भीष्म जी ने वर्णाश्रम, राग-वैराग्य, निवृति-प्रवृति आदि के सम्बंध में अनेक रहस्यमय भेद समझाये तथा दानधर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म, स्त्रीधर्म, भगवत्धर्म, द्विविध धर्म आदि के विषय में विस्तार से चर्चा की। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के साधनों का भी उत्तम विधि से वर्णन किया।
उसी काल में उत्तरायण सूर्य आ गये। अपनी मृत्यु का उत्तम समय जान कर भीष्म जी ने अपनी वाणी को संयम में कर के मन को सम्पूर्ण रागादि से हटा कर सच्चिदान्द भगवान श्रीकृष्ण में लगा दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना चतुर्भुज रूप धारण कर के दर्शन दिये। भीष्म जी ने श्रीकृष्ण की मोहिनी छवि पर अपने नेत्र एकटक लगा दिये और अपनी इन्द्रियों को रो कर भगवान की इस प्रकार स्तुति करने लगे – “मै अपने इस शुद्ध मन को देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों में अर्पण करता हूँ। जो भगवान अकर्मा होते हुये भी अपनी लीला विलास के लिये योगमाया द्वारा इस संसार की श्रृष्टि रच कर लीला करते हैं, जिनका श्यामवर्ण है, जिनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है, जो पीताम्बरधारी हैं तथा चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, पद्म कण्ठ में कौस्तुभ मणि और वक्षस्थल पर वनमाला धारण किये हुये हैं, ऐसे भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों में मेरा मन समर्पित हो।
इस तरह से भीष्म पितामह ने मन, वचन एवं कर्म से भगवान के आत्मरूप का ध्यान किया और उसी में अपने आप को लीन कर दिया। देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और दुंदुभी बजाये। युधिष्ठिर ने उनके शव की अन्त्येष्टि क्रिया की।

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ –श्रीकृष्ण का द्वारिका प्रस्थान



कौरव दल को नाश करि, गये द्वारिका नाथ।
करि दर्शन आनन्द सों, पुरजन भये सनाथ॥

कौरव पाण्डव दोनों वंश काल की गति से परस्पर लड़ कर नष्ट हो गये। केवल भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की कृपा से उत्तरा का गर्भ ही सुरक्षित रह गया।
धर्मराज युधिष्ठिर के राज्य में अधर्म का नाश हो गया। वे देवराज इन्द्र की भाँति सम्पूरण पृथ्वी पर शासन करने लगे। उनके चारों भाई भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव उनकी आज्ञा का पालन करते थे। राज्य में यथासमय वृष्टि होती थी, पृथ्वी उर्वरा होकर समुचित मात्रा से भी अधिक अन्न तथा फल उत्पन्न करती थी और रत्नों से भरपूर थी, गौएँ पर्याप्त से भी अधिक मात्रा में दूध देती थीं, अकाल का कहीं नामोनिशान तक न था। प्रजा सुखी थी, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण तथा स्नातक यज्ञ योगादि कर्मों को नित्य नियमपूर्वक करते थे। प्रजा वर्ण आश्रमों के अनुकूल धर्म का आचरण करती थी। सम्पूर्ण प्राणी दैविक, भौतिक और आत्मिक तापों से मुक्त थे।
अपनी बहन सुभद्रा तथा पाण्डवों की प्रसन्नता के लिये अनेक मासों तक हस्तिनापुर में रहने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्णचन्द्र, राजा युधिष्ठिर से आज्ञा लेकर, द्वारिका के लिये विदा हुये। कृपाचार्य, धृतराष्ट्र, गांधारी, कुन्ती, द्रौपदी, धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव, उत्तरा, युयुत्स, गुरु धौम्य तथा वेदव्यास जी ने उन्हें प्रेमपूर्वक विदा किया। विदाई के समय मृदंग, ढोल, नगाड़े, घण्ट, शंख, झालर आदि बजने लगे। नगर की नारियाँ अपनी-अपनी अट्टालिकाओं से झाँक कर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन करने लगीं। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। यद्यपि भगवान के लिये ब्राह्मणों के आशीर्वाद का कोई महत्व नहीं था फिर भी लोकाचार के अनुसार ब्राह्मण भगवान श्रीकृष्णचन्द्र को आशीर्वचन कहने लगे। उन्हें को किसी प्रकार की सुरक्षा की भी आवश्यकता नहीं थी फिर भी धर्मराज युधिष्ठिर ने एक विशाल सेना उनके साथ भेज दिया। सभी पाण्डव दूर तक भगवान श्रीकृष्णचन्द्र को छोड़ने के लिये गये।
सभी लोगों को वापस जाने के लिये कह कर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने केवल उद्धव और सात्यकी को अपने साथ रखा। वे विशाल सेना के साथ कुरुजांगल, पाञ्चाल, शूरसेन, यमुना के निकटवर्ती अनेक प्रदेश, ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्य, सारस्वत मरु प्रदेश आदि को लांघते हुये सौवीर और आभीर देशों के पश्चिमी भाग आनर्त्त देश में पहुँचे। थके हुये घोड़ों को रथ से खोल कर विश्राम दिया गया। जिस प्रान्त से भी भगवान श्रीकृष्णचन्द्र गुजरते थे वहाँ के राजा बड़े आदर के साथ अनेक प्रकार के उपहार दे कर उनका सत्कार करते थे।

मगन भये नर नारि सब, सुनि आगम यदुराय।
ले लेकर उपहार बहु, धाये जन हरषाय॥

आनर्त्त देश अति सम्पन्न और वैभवयुक्त था तथा उसी के निकट अमरावती के समान उनकी नगरी द्वारिकपुरी थी। अपनी सीमा में पहुँचते ही भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया जिसकी ध्वनि से सम्पूर्ण प्रजा की विरह वेदना नष्ट हो गई। श्वेत शंख उनके ओष्ठों तथा करों पर ऐसा शोभायमान था जैसे लाल कमल पर राजहंस शोभा पाता है। उनके शंख की ध्वनि को सुन कर सम्पूर्ण प्रजा उनके दर्शनों के लिये गृहों से निकल पड़ी। जो जिस भी हालत में था उसी हालत में ऐसे दौड़ कर आया जैसे गाय के रंभाने की ध्वनि सुन कर बछड़ा दौड़ कर आता है। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के दर्शन करके सबके मुखों पर प्रसन्नता छा गई और वे इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे – “हे भगवन्! आपके चरणों की स्तुति ब्रह्मा, शंकर तथा इन्द्रादि सभी देवता करते हैं। आप ही विश्व का कल्याण करते हैं। ये चरण कमल हमारा आश्रय है। इन चरणों की कृपा से कराल काल भी हमारी ओर दृष्टि नहीं कर सकता। आप ही हमारे गुरु, माता-पिता और मित्र हैं। आपके दर्शन बड़े बड़े योगीजन, तपस्वी तथा देवताओं को भी प्राप्त नहीं होते किन्तु हम अति भाग्यशाली हैं जो निरन्तर आपके मुखचन्द्र का दर्शन करते रहते हैं। द्वारिका छोड़ कर आपके मथुरा चले जाने पर हम निष्प्राण हो जाते हैं और आपके पुनः दर्शन से ही सप्राण हो पाते हैं। हम आपको प्रणाम करते हैं।”
उनके इन वचनों को सुनकर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने उन पर अपनी कृपादृष्टि डाली और द्वारिकापुर में प्रवेश किया। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की द्वारिकापुरी अमरावती के समान मधु, भोज, दाशार्ह, अर्हकुकुर, अन्धक तथा वृष्णि वंशी यादवों से उसी प्रकार सुरक्षित रहती थी जिस प्रकार नागों से पातालपुरी सुरक्षित रहती है। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के स्वागतार्थ नगर वासियों ने नगर के फाटकों, गृहद्वारों तथा सड़कों पर बन्दनवार, चित्र-विचित्र ध्वजायें, कदली खम्भ और स्वर्णकलश सजाये। सुगन्धित जल से छिड़काव किया गया। उनके उपहार के लिये दधि, अक्षत, फल, धूप, दीप आदि सामग्री लेकर नगरवासी अपने द्वारों पर खड़े थे। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के शुभागमन का समाचार पाकर वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन, महाबली बलराम, प्रद्युम्न, साम्ब आदि परिजन मांगलिक सामग्रियों के साथ ब्राह्मणों को लेकर शंख तुरही, मृदंग आदि बजाते हुये उनकी अगवानी के लिये आ गये। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने भी अपने बन्धु-बान्धवों तथा नगरवासियों का यथोचित सम्मान किया। सर्वप्रथम उन्होंने माताओं के महल में जाकर देवकी आदि माता के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। फिर अपनी सोलह सहस्त्र एक सौ आठ रानियों हृदय से लगा कर सान्त्वना दी।
भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने सम्पूर्ण राजाओं को परस्पर भिड़ाकर पृथ्वी के भार को बिना शस्त्रास्त्र ग्रहण किये ही हल्का कर दिया। रति के समान सुन्दर भार्यायें निरन्तर उनके साथ रहकर भी उन्हें भोगों में आसक्त न कर सकीं क्योंकि वे योग-योगेश्वर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र कर्म करते हये भी हृदय में उनके प्रति आसक्त नहीं थे, वे प्रकृति में स्थित रहते हुये भी प्रकृति के गुणों में लिप्त नहीं थे। उनकी योगमाया से मोहित होकर ही स्त्रियाँ उन पर मुग्ध रहती थीं और भगवान श्रीकृष्णचन्द्र को स्ववश समझती थीं।