किसी महिला या पुरुष को अपने पार्टनर में किन गुणों की तलाश होती है, अगर यह सवाल अलग-अलग लोगों से पूछा जाए तो उनके जवाब एक हो ही नहीं सकते। कई लोग शारीरिक सुंदरता को महत्व देते हैं तो कुछ लोग मन की खूबसूरती के दीवाने होते हैं। कुछ लोग इस सवाल का वह जवाब भी देंगे, जो आपके जहन में है। अलग-अलग लोगों के मन में अपनी ड्रीम गर्ल या सपनों के शहजादे की अलग-अलग तस्वीर होती है, फिर भी महिलाओं के कुछ ऐसे गुण हैं, जिनकी चाहत ज्यादातर पुरुषों को होती है। आइए इनकी चर्चा करते हैं।
29 दिसंबर 2011
कैसी हो आपकी ड्रीम पार्टनर
अच्छे पार्टनर की तलाश सभी को रहती है, लेकिन अच्छाई के पैमाने सबके अलग-अलग होते हैं। फिर भी कुछ चीजें तो ऐसी हैं ही, जिन्हें हर पुरुष अपनी पाटर्नर में देखना चाहता है। आइए देखें क्या हैं वे चीजें:
किसी महिला या पुरुष को अपने पार्टनर में किन गुणों की तलाश होती है, अगर यह सवाल अलग-अलग लोगों से पूछा जाए तो उनके जवाब एक हो ही नहीं सकते। कई लोग शारीरिक सुंदरता को महत्व देते हैं तो कुछ लोग मन की खूबसूरती के दीवाने होते हैं। कुछ लोग इस सवाल का वह जवाब भी देंगे, जो आपके जहन में है। अलग-अलग लोगों के मन में अपनी ड्रीम गर्ल या सपनों के शहजादे की अलग-अलग तस्वीर होती है, फिर भी महिलाओं के कुछ ऐसे गुण हैं, जिनकी चाहत ज्यादातर पुरुषों को होती है। आइए इनकी चर्चा करते हैं।
किसी महिला या पुरुष को अपने पार्टनर में किन गुणों की तलाश होती है, अगर यह सवाल अलग-अलग लोगों से पूछा जाए तो उनके जवाब एक हो ही नहीं सकते। कई लोग शारीरिक सुंदरता को महत्व देते हैं तो कुछ लोग मन की खूबसूरती के दीवाने होते हैं। कुछ लोग इस सवाल का वह जवाब भी देंगे, जो आपके जहन में है। अलग-अलग लोगों के मन में अपनी ड्रीम गर्ल या सपनों के शहजादे की अलग-अलग तस्वीर होती है, फिर भी महिलाओं के कुछ ऐसे गुण हैं, जिनकी चाहत ज्यादातर पुरुषों को होती है। आइए इनकी चर्चा करते हैं।
टॉल वुमन
अगर कोई महिला अन्य महिलओं की तुलना में लंबी है, उसका ड्रेसिंग सेंस गजब का है, वह नियमित एक्सरसाइज करती है और खुद पर उसका पूरा होल्ड है, तो वह निश्चित रूप से पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करेगी।बोल्ड एंड ब्यूटिफुल
पुरुष यह अच्छी तरह जानते हैं कि महिलाएं भावुक होती हैं। पता नहीं, वे किस बात पर हर्ट हो जाएं और उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगे। पति या प्रेमी इस बात का पूरा ख्याल तो रखते हैं कि उनकी किसी बात से उनकी वाइफ या गर्लफ्रेंड को ठेस न पहुंचे, लेकिन उनके मन के किसी कोने में बोल्ड और ब्यूटिफुल वुमन की इमेज भी होती है, जो विपरीत माहौल में उनके कंधे से कंधा मिलाकर चल सके। सॉफ्टवेयर सैवी
ज्यादातर महिलाएं मजबूत कद-काठी वाले पुरुषों को पसंद करती है, जबकि पुरुषों के मन में नरम स्वभाव की महिलाएं जल्दी घर बना लेती हैं। अगर वह महिला कंप्यूटर फ्रेंडली है, तो फिर तो क्या कहने। अगर कोई महिला कंप्यूटर के नेटवर्क, सिस्टम और कनेक्शन से अच्छी तरह परिचित है, तो इससे उसकी स्मार्टनेस में चार चांद लग जाते हैं। स्पेशल मोमेंट्स
महिलाओं या पुरुषों को ऐसे हमसफर की तलाश होती है, जो जिंदगी में खास लम्हों को याद रख सके। सभी लोग चाहते हैं कि मैरिज एनिवर्सरी या बर्थडे पर सबसे पहले वह ही उन्हें विश करें, जो उनकी लाइफ में सबसे स्पेशल हैं। इसके अलावा खास मौकों पर ड्रेस पहनने का आपका सेंस भी काफी महत्वपूर्ण है। फ्रेश रिलेशनशिप
परफ्यूम और बॉडी लोशन तो सभी पसंद करते हैं, लेकिन संडे की सुबह सोकर उठने पर बेड टी के साथ सुगंधित शैंपू से धुले उनके बालों की खुशबू आपका स्वागत करे, तो समझ लीजिए आपके रिश्तों की ताजगी अभी बरकरार है। डिफरेंट नेचर
जिस तरह पांचों उंगलियां एक सी नहीं होतीं, उसी तरह सभी पुरुषों और महिलाओं के व्यवहार में कुछ न कुछ अंतर होता है। कुछ लोग केवल फिजिकल फिटनेस और खूबसूरती को महत्व देते हैं, तो कुछ लोगों को कामकाजी और तेजतर्रार महिलाएं पसंद आती हैं।टेक हेल्प
ज्यादातर पुरुषों को स्मार्ट लेडीज पसंद आती हैं, लेकिन उन्हें यह भी अच्छा लगता है कि कभी-कभी उनकी गर्लफ्रेंड उनकी मदद मांगे या कहे कि यह काम आपके बगैर तो हो ही नहीं सकता। इससे उन्हें पता चलता है कि जिसे वे स्पेशल मान रहे हैं, उसकी जिंदगी में उनके लिए खास जगह है।विस्पर मोर
पुरुष चाहते हैं कि उनकी ड्रीम गर्ल उनके कान में धीरे से कुछ कहे। दरअसल, इस तरह उनकी गर्म सांसों की हल्की महक और प्यार भरी मीठी बातें पुरुषों के अंदर सेंसेशन पैदा करती हैं। पेट नेम
पुरुषों की इच्छा होती है कि उनकी ड्रीम गर्ल उनका कोई पेट नेम रखें। हालांकि उनकी इच्छा यह भी होती है कि यह काम उनकी मर्जी से किया जाए। इससे उन्हें प्यार की गहराई का अहसास होगा। होल्ड हैंड्स
ज्यादातर पुरुषों को ऐसी महिलाएं पसंद आती हैं, जिनमें पब्लिक प्लेस पर उनका हाथ थामकर चलने की हिम्मत हो। ऐसा करके पुरुषों को लगता है कि उनकी ड्रीम गर्ल का नेचर उनके प्रति पजेसिव है। पुरुषों की चाहत होती है कि उनकी पार्टनर उनके साथ हंसी-मजाक की बातें करें, साथ पिक्चर देखे और रोमांस करे।Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 12/29/2011 07:16:00 pm 0 comments
पावरफुल लव स्टोरीज
प्यार वो जज्बा है, जो कभी भी किसी को भी हो सकता है। बात चाहे सिलेब्रिटी की हो, पावरफुल लोगों की हो या फिर आम आदमी की, प्यार की हिलोरें सबके दिल में एक जैसे ही उछाल मारती हैं। यही वजह है कि वर्ल्ड में ऐसे तमाम उदाहरण हैं, कामयाबी के शिखर पर बैठे लोगों ने इश्क की पींगें बढ़ाईं, लेकिन ऐसे लोगों की इश्क की कहानियों को लोग न केवल दिलचस्पी से सुनते हैं, बल्कि कई बार इन कहानियों में गॉसिप्स का मसालेदार तड़का भी लगाया जा सकता है। हाल ही में निकोलस सरकोजी और उनकी गर्लफ्रेंड (अब पत्नी बन चुकी हैं) के बारे में काफी कुछ कहा और लिखा गया है। मीडिया की सुर्खियों में रहे फ्रांसीसी राष्ट्रपति के इस रोमांस के बहाने वर्ल्ड के कुछ और पावरफुल लोगों के रोमांस की बात भी ध्यान में आना स्वाभाविक है। ऐसे ही कुछ और पावरफुल लव स्टोरीज की चर्चा करते हैं।
राजीव का लव ऐट र्फस्ट साइट
अगर आपने कभी जवाहर लाल नेहरू की ऑटोबायोग्राफी पढ़ी हो, तो आपको पता होगा कि इस भरे-पूरे ग्रंथ में उन्होंने कमला नेहरू के साथ अपनी अरेंज्ड मैरिज के बारे में महज कुछ लाइनें लिखी हैं। इस मुद्दे पर उन्होंने सिर्फ शादी की डेट, वेन्यू और पत्नी के नाम आदि जैसी सूचनाएं ही पाठकों के सामने रखी हैं। अपनी अरेंज्ड मैरिज में शायद उन्हें कुछ ऐसा रोमांटिक नजर नहीं आया, जिसे दर्शकों के सामने रखना वह जरूरी समझते। अगर उनकी पुत्री और पोतों ने भी उनके रास्ते को ही चुना होता, तो दुनिया वाले तमाम शानदार लव स्टोरीज से महरूम रह जाते। राजीव गांधी की बात करें तो उनका प्यार लव एट र्फस्ट साइट का एक बेहतरीन नमूना था। कैंब्रिज के कैंपस में वह दिन आम दिनों की तरह ही था। राजीव पॉलिटिक्स पर होने वाले एक डिस्कशन में हिस्सा ले रहे थे। जैसे ही सोनिया वहां पहुंचीं, राजीव और सोनिया दोनों को ही कुछ-कुछ हो गया।जेएफके का प्यार
जॉन एफ कैनेडी की गिनती अमेरिका के सबसे ज्यादा ग्लैमरस राष्ट्रपतियों में की जाती है। मर्लिन मुनरो के साथ उनके रोमांस की खबरें लोगों के बीच बेहद चर्चा का विषय बनीं। कैनेडी की एक बर्थडे पर ईवनिंग गाउन में लिपटी ग्लैमरस मर्लिन ने उन्हें विश करने के लिए हैपी बर्थ डे... गाया। गाने को सुनकर कैनेडी अपना दिल मर्लिन को दे बैठे और उसके बाद जब उन्होंने इतनी अच्छी विशेज के लिए मर्लिन का शुक्रिया अदा किया, तो उस शुक्रिया में वहां मौजूद लोगों को प्यार की मिठास नजर आई।रश्दी का रोमांस
सलमान रश्दी की लेटेस्ट बुक 'फरी' के बारे में रिव्यूअर कहते हैं कि इसका मेन हीरो सलमान की निजी जिंदगी का चित्र पेश करता है। बुक में एक अंग्रेज लड़की के साथ मलिक सोलंका की शादी दिखाई गई है और फिर यह दिखाया गया है कि कैसे वह उस लड़की को छोड़कर अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करने अमेरिका चला जाता है। गौर से देखा जाए तो यह सब सलमान रश्दी की जिंदगी की ही कहानी नजर आती है। जब से ईरान के अयातुल्ला ने रश्दी को जान से मार डालने का फतवा जारी किया, तब से रश्दी का कद एक हीरो की तरह हो गया है। उनकी कहानी को लव इन द फास्ट लेन कहा जा सकता है। एक बड़े एज गैप के बावजूद सलमान रश्दी पद्मालक्ष्मी से रोमांस करते नजर आए और उसके बाद अब चर्चा इस बात की है कि सलमान साहब रिया सेन के साथ इश्क फरमा रहे हैं।डायना की कहानी
इश्क और रोमांस की बात चलने पर ऐसा हो ही नहीं सकता कि प्रिंसेस डायना का नाम न आए। ऐसी बहुत कम महिलाएं हैं, जिन्हें टाइम मैगजीन ने अपने कवर पर छापा है, लेकिन प्रिंसेस डायना टाइम मैगजीन के कवर पर सबसे ज्यादा छपने वाली महिला हैं। प्रिंस चार्ल्स के साथ उनकी लव स्टोरी की चर्चा की जाए तो उसमें एक सिजलिंग रोमांस के सभी एलिमेंट नजर आ जाएंगे। इस रोमांटिक कहानी में सब कुछ है, एक हीरो, एक हीरोइन, एक विलेन।Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 12/29/2011 07:11:00 pm 0 comments
24 दिसंबर 2011
10 दिसंबर 2011
व्यक्तित्व को भी नष्ट कर देता है अहंकार
अहंकार और आत्मगौरव दोनों मनोभावों में मैं प्रधान होता है। मगर दोनों मनोभाव एक दूसरे के एकदम विपरीत होते हैं। मैंने देश के साथ कभी गद्दारी नहीं की - यह आत्मगौरव है। मेरे समान कोई दूसरा देशभक्त नहीं है- यह अहंकार है। आत्मगौरव व्यक्ति के चरित्र और स्वभाव को बल प्रदान करता है। अहंकार व्यक्ति के चरित्र और स्वभाव को केवल नष्ट ही नहीं करता, अहंकारी द्वारा कल्पित उसके नए चरित्र और स्वभाव को उसके मौलिक चरित्र और स्वभाव पर आरोपित कर देता है।
अहंकार के जन्म के कल्पनीय-अकल्पनीय असंख्य कारण हो सकते हैं। अहंकार सम्मान से भी उत्पन्न हो सकता है, अपमान से भी। वह सुख से भी उत्पन्न हो सकता है, दुख से भी, उपलब्धि से भी, अनुपलब्धि से भी, संपन्नता से भी, विपन्नता से भी, विजय से भी, पराजय से भी। मगर वह जिससे भी उत्पन्न हो, अहंकारी के ग्रहण करने की क्षमता के साथ-साथ उसके उचित-अनुचित विवेक को नष्ट कर देता है। वह इतना प्रबल और प्रभावशाली होता है कि वशिष्ठ जैसे ब्रह्म ज्ञान से संपन्न ब्राह्मण को भी आक्रांत कर सकता है, अपनी तपस्या और ब्रह्म-ज्ञान-साधन से राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने विश्वामित्र को भी।
ब्रह्मर्षि बने विश्वामित्र जुड़ा एक प्रसंग इसका एक सटीक उदाहरण है। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र जंगल में ध्यानमग्न थे कि अचानक उन्हें भगवान के कहीं निकट ही उत्पन्न होने का आभास हुआ। यह आभास होते ही वे आनंद से विह्वल हो उठे और फिर ध्यानमग्न होकर यह जानने की कोशिश करने लगे कि भगवान ने कहां अवतार लिया है। उन्होंने ध्यान में देखा कि भगवान ने अयोध्या के राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या के गर्भ से राम के रूप में जन्म लिया है। इससे अधिक प्रसन्नता की और क्या बात हो सकती थी? उन्होंने फिर ध्यानमग्न होकर यह जानने की कोशिश की भगवान का सान्निध्य सुख उन्हें कैसे प्राप्त हो सकता है। जो उन्होंने जाना, उससे उनके अहंकार को गहरी ठेस लगी। वे राजर्षि से ब्रह्मर्षि तो हो गए थे, मगर सारे ब्रह्मज्ञान के बावजूद उनका क्षत्रियोचित अहंकार अभी भी नष्ट नहीं हुआ था। जिस वशिष्ठ को अपने ब्रह्मज्ञान से पराजित कर वे राजर्षि से ब्रह्मर्षि हुए थे, भगवान के सानिध्य-सुख का अवसर वशिष्ठ की अनुमति के बिना नहीं मिल सकता। यह विश्वामित्र का सौभाग्य था कि उनका अहंकार उन पर इतना हावी नहीं हुआ कि वे उस महान अवसर से वंचित रह जाते। वे वशिष्ठ की शरण में गए और यह आश्वासन प्राप्त करने में सफल हुए कि दशरथ के पुत्रों को शिक्षित करने का सौभाग्य उन्हें ही प्राप्त होगा।
लेकिन अहंकार शायद ही ऐसे विवेक का अवसर देता है। इसीलिए प्रत्येक अहंकार के त्याग का उपदेश करता है। जैन धर्म साधना की तो यह पहली शर्त है। जैन ग्रथों में इससे जुड़ी अनेक कहानियां प्राप्त होती हैं। एक कहानी के अनुसार एक राजा का पुत्र जब युवा हुआ और उसे राज्य के उत्तरदायित्व सौंपने के दिन करीब आए, राजा ने उसे उचित शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने गुरु के यहां भेजने का निर्णय किया। उन्होंने अपने पुत्र को बुलाकर शिक्षा के लिए उनके आश्रम में जाने का आदेश किया। पुत्र राजा का बेटा था, वैसा होने के अहंकार से भरा। स्वभावतर् उसने गुरु को भी अपने सेवकों की नजर से देखा। गुरु पर रौब जमाने की गरज से वह नौकर-चौकरों की एक पूरी फौज के साथ उनके आश्रम की ओर चला। गुरु को उसके इस अहंकार का पूर्वाभास हो गया।
उसने आश्रम में रहने वाले अपने शिष्यों को उसके आते ही उसे मार-पीट कर भगा देने का आदेश किया। पिटकर राजपुत्र वापस लौट गया। पिता से शिकायत की। पिता ने समझाया -तुमसे जरूर कोई भूल हुई होगी। इस बार अकेले जाओ। वे तुम्हें जरूर स्वीकार करेंगे। पिता की आज्ञा मानकर राजपुत्र दुबारा गया, पर अकेले। मगर आश्रम में प्रवेश करते ही गुरु के शिष्यों ने गुरु की आज्ञा से उसे फिर मार-पीट कर भगा दिया। बहरहाल राजपुत्र रोते-गाते फिर पिता के सामने उपस्थित हुआ। पिता ने फिर समझाया-तुमसे फिर कोई गलती हुई होगी। इस बार ऐसा करो कि आश्रम के बाहर विनीत भाव से बैठ जाओ। मन ही मन पूरी भक्ति के साथ प्रार्थना करते रहना कि हे गुरुदेव मुझे स्वीकार कीजिए। राजपुत्र ने वैसा ही किया। कई दिन गुजर गए, कुछ नहीं हुआ। मगर ध्यानमग्न राजपुत्र को किसी के आने न आने का ध्यान ही कहां था? एक दिन गुरु शिष्यों के साथ आए। और उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया।
जैन-धर्म साधना में अहंकार का नाश इसीलिए पहली शर्त है क्योंकि अहंकार ज्ञान के मार्ग तो अवरुद्ध करता ही है, व्यक्ति को स्वभाव से भी विमुख कर देता है। वह अपने यथार्थ को भूल जाता है। ऐसा केवल साधारण व्यक्तियों के साथ ही नहीं होता है। भारतीय पुराणों-महाकाव्यों में परशुराम एक ऐसे ही महापुरुष हैं। परशुराम का नाम भी राम ही था, मगर क्षत्रियों के विनाश की प्रक्रिया में वे परशु की शक्ति से इस हद तक अभिभूत हो गए और उन्हें अपनी शक्ति का ऐसा ऐसा अहंकार हो गया कि वे स्वयं को राम की जगह परशुराम के नाम से जानने लगे। उन्हें अपना सब कुछ भूल गया-अपना विगत, अपना वंश, अपना ब्राह्मणत्व। शक्ति के अहंकार से अभिभूत परशुराम को सीता स्वयंवर के अवसर पर शिव के धनुष का राम द्वारा तोड़ा जाना असहज और अविश्र्वसनीय प्रतीत हुआ। वे राम की शक्ति से प्रसन्न न होकर राम लक्ष्मण को दंडित करने पर उतारू हो गए। राम के द्वारा उनके क्रोध को शांत करने का हर विनम्र उपाय उन्हें उदंडता लगे। क्षत्रिय चरित्र के अहंकार के कारण उन्हें भृगुवंशी होना, करुणामूर्ति कहा जाना गाली की तरह मालूम हुए।
जो अहंकार परशुराम जैसे महापुरुष के स्वभाव को नष्ट कर सकता है, उसे साधारण मनुष्यों के स्वभाव को नष्ट करने में कितना समय लग सकता है?
अहंकार के जन्म के कल्पनीय-अकल्पनीय असंख्य कारण हो सकते हैं। अहंकार सम्मान से भी उत्पन्न हो सकता है, अपमान से भी। वह सुख से भी उत्पन्न हो सकता है, दुख से भी, उपलब्धि से भी, अनुपलब्धि से भी, संपन्नता से भी, विपन्नता से भी, विजय से भी, पराजय से भी। मगर वह जिससे भी उत्पन्न हो, अहंकारी के ग्रहण करने की क्षमता के साथ-साथ उसके उचित-अनुचित विवेक को नष्ट कर देता है। वह इतना प्रबल और प्रभावशाली होता है कि वशिष्ठ जैसे ब्रह्म ज्ञान से संपन्न ब्राह्मण को भी आक्रांत कर सकता है, अपनी तपस्या और ब्रह्म-ज्ञान-साधन से राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने विश्वामित्र को भी।
ब्रह्मर्षि बने विश्वामित्र जुड़ा एक प्रसंग इसका एक सटीक उदाहरण है। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र जंगल में ध्यानमग्न थे कि अचानक उन्हें भगवान के कहीं निकट ही उत्पन्न होने का आभास हुआ। यह आभास होते ही वे आनंद से विह्वल हो उठे और फिर ध्यानमग्न होकर यह जानने की कोशिश करने लगे कि भगवान ने कहां अवतार लिया है। उन्होंने ध्यान में देखा कि भगवान ने अयोध्या के राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या के गर्भ से राम के रूप में जन्म लिया है। इससे अधिक प्रसन्नता की और क्या बात हो सकती थी? उन्होंने फिर ध्यानमग्न होकर यह जानने की कोशिश की भगवान का सान्निध्य सुख उन्हें कैसे प्राप्त हो सकता है। जो उन्होंने जाना, उससे उनके अहंकार को गहरी ठेस लगी। वे राजर्षि से ब्रह्मर्षि तो हो गए थे, मगर सारे ब्रह्मज्ञान के बावजूद उनका क्षत्रियोचित अहंकार अभी भी नष्ट नहीं हुआ था। जिस वशिष्ठ को अपने ब्रह्मज्ञान से पराजित कर वे राजर्षि से ब्रह्मर्षि हुए थे, भगवान के सानिध्य-सुख का अवसर वशिष्ठ की अनुमति के बिना नहीं मिल सकता। यह विश्वामित्र का सौभाग्य था कि उनका अहंकार उन पर इतना हावी नहीं हुआ कि वे उस महान अवसर से वंचित रह जाते। वे वशिष्ठ की शरण में गए और यह आश्वासन प्राप्त करने में सफल हुए कि दशरथ के पुत्रों को शिक्षित करने का सौभाग्य उन्हें ही प्राप्त होगा।
लेकिन अहंकार शायद ही ऐसे विवेक का अवसर देता है। इसीलिए प्रत्येक अहंकार के त्याग का उपदेश करता है। जैन धर्म साधना की तो यह पहली शर्त है। जैन ग्रथों में इससे जुड़ी अनेक कहानियां प्राप्त होती हैं। एक कहानी के अनुसार एक राजा का पुत्र जब युवा हुआ और उसे राज्य के उत्तरदायित्व सौंपने के दिन करीब आए, राजा ने उसे उचित शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने गुरु के यहां भेजने का निर्णय किया। उन्होंने अपने पुत्र को बुलाकर शिक्षा के लिए उनके आश्रम में जाने का आदेश किया। पुत्र राजा का बेटा था, वैसा होने के अहंकार से भरा। स्वभावतर् उसने गुरु को भी अपने सेवकों की नजर से देखा। गुरु पर रौब जमाने की गरज से वह नौकर-चौकरों की एक पूरी फौज के साथ उनके आश्रम की ओर चला। गुरु को उसके इस अहंकार का पूर्वाभास हो गया।
उसने आश्रम में रहने वाले अपने शिष्यों को उसके आते ही उसे मार-पीट कर भगा देने का आदेश किया। पिटकर राजपुत्र वापस लौट गया। पिता से शिकायत की। पिता ने समझाया -तुमसे जरूर कोई भूल हुई होगी। इस बार अकेले जाओ। वे तुम्हें जरूर स्वीकार करेंगे। पिता की आज्ञा मानकर राजपुत्र दुबारा गया, पर अकेले। मगर आश्रम में प्रवेश करते ही गुरु के शिष्यों ने गुरु की आज्ञा से उसे फिर मार-पीट कर भगा दिया। बहरहाल राजपुत्र रोते-गाते फिर पिता के सामने उपस्थित हुआ। पिता ने फिर समझाया-तुमसे फिर कोई गलती हुई होगी। इस बार ऐसा करो कि आश्रम के बाहर विनीत भाव से बैठ जाओ। मन ही मन पूरी भक्ति के साथ प्रार्थना करते रहना कि हे गुरुदेव मुझे स्वीकार कीजिए। राजपुत्र ने वैसा ही किया। कई दिन गुजर गए, कुछ नहीं हुआ। मगर ध्यानमग्न राजपुत्र को किसी के आने न आने का ध्यान ही कहां था? एक दिन गुरु शिष्यों के साथ आए। और उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया।
जैन-धर्म साधना में अहंकार का नाश इसीलिए पहली शर्त है क्योंकि अहंकार ज्ञान के मार्ग तो अवरुद्ध करता ही है, व्यक्ति को स्वभाव से भी विमुख कर देता है। वह अपने यथार्थ को भूल जाता है। ऐसा केवल साधारण व्यक्तियों के साथ ही नहीं होता है। भारतीय पुराणों-महाकाव्यों में परशुराम एक ऐसे ही महापुरुष हैं। परशुराम का नाम भी राम ही था, मगर क्षत्रियों के विनाश की प्रक्रिया में वे परशु की शक्ति से इस हद तक अभिभूत हो गए और उन्हें अपनी शक्ति का ऐसा ऐसा अहंकार हो गया कि वे स्वयं को राम की जगह परशुराम के नाम से जानने लगे। उन्हें अपना सब कुछ भूल गया-अपना विगत, अपना वंश, अपना ब्राह्मणत्व। शक्ति के अहंकार से अभिभूत परशुराम को सीता स्वयंवर के अवसर पर शिव के धनुष का राम द्वारा तोड़ा जाना असहज और अविश्र्वसनीय प्रतीत हुआ। वे राम की शक्ति से प्रसन्न न होकर राम लक्ष्मण को दंडित करने पर उतारू हो गए। राम के द्वारा उनके क्रोध को शांत करने का हर विनम्र उपाय उन्हें उदंडता लगे। क्षत्रिय चरित्र के अहंकार के कारण उन्हें भृगुवंशी होना, करुणामूर्ति कहा जाना गाली की तरह मालूम हुए।
जो अहंकार परशुराम जैसे महापुरुष के स्वभाव को नष्ट कर सकता है, उसे साधारण मनुष्यों के स्वभाव को नष्ट करने में कितना समय लग सकता है?
Posted by Udit bhargava at 12/10/2011 10:04:00 am 0 comments
व्यवहार बदलने की कला :ध्यान
मेडिटेशन यानी ध्यान हमारे मस्तिष्क को शांत रखने में सहायक है। यह हमें शांत मस्तिष्क के साथ साथ जीवन के विभिन्न आयामों में सफलता की तरफ ले जाता है। तब हम विचलित हुए बिना सफल होते हैं। अगर हमारे मन में शांति नहीं है, तो हमारी सफलता उस फूल की तरह है, जिसमें सुगंध नहीं होती।
हमारे अंदर असुरक्षा की भावना आने के पीछे विगत का असंतोष, वर्तमान का भ्रम और भविष्य के प्रति एक अविश्वास का होना है। किसी भी व्यक्ति को अपने विगत के अनुभव से सीखना चाहिए, वर्तमान का आनंद लेना चाहिए और भविष्य के लिए उसके मन में एक योजना होनी चाहिए। ये तीनों बातें हमारे अंदर की असुरक्षा की भावना को कम करने में सहायक हैं। मनस्थिति की ये अलग अलग अवस्थाएं हैं।
इसका भाव यही है कि अगर अतीत में ही उलझे रहोगे, तो वर्तमान के आनंद से वंचित हो जाओगे। अगर विगत से अनुभव नहीं लोगे, तो जीवन को बेहतर नहीं बना पाओगे, और भविष्य के लिए अगर योजना नहीं होगी तो आगे के सफर में मन में विचलन रहेगा।
यथार्थ जीवन हमारी अंतश्चेतना में समाया रहता है। वह हमारी प्रवृत्तियों में नजर आता है। इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि अगर किसी व्यक्ति का मस्तिष्क बिल्ली की तरह है, तो वह बाहरी जीवन के किसी चीज का प्रभाव पड़ने पर बिल्ली की प्रवृति के अनुकूल ही काम करेगा।
इस प्रवृति के लोगों में भी यही व्यवहार देखा जाता है, उन्हें केवल अपने से मतलब होता है। दूसरी प्रवृत्ति कुत्ते की है जो केवल तब तक दुम हिलाता है जब तक उसे प्यार मिलता है। मेडिटेशन हमारे मस्तिष्क की ऐसी प्रवृत्तियों को दूर करता है। मेडिटेशन मस्तिष्क के इस तरह के क्षणिक स्वभाव को दूर करने में सहायक है। मेडिटेशन से हमारा मस्तिष्क स्थिर और शांत होता है। मेडिटेशन की अवस्था के अलग अलग चरण हैं। इसमें आनंद की अवस्था धीरे-धीरे आती है। मेडिटेशन से जब हमारे व्यवहार में भी परिवर्तन आने लगे तो यह अवस्था कुछ पा जाने की है। मेडिटेशन से विचारों पर तो एकदम प्रभाव पड़ता है, लेकिन महत्व इस बात का है कि मेडिटेशन आपके व्यवहार में भी बदलाव ला दे। यह अवस्था अभ्यास से लाई जाती है। दिमाग की अवस्था हमेशा एक सा होनी चाहिए। हमेशा संतुलन की स्थिति होनी चाहिए। विचलन की स्थिति ठीक नहीं। हमारे दिमागी संतुलन और मस्तिष्क चेतना के लिए मेडिटेशन की पुरानी और आधुनिक पदतियां उपयोगी साबित हुई हैं। इससे दिमागी असंतुलन को दूर करने में मदद मिली है। यह हमें व्यावहारिक रूप से भी सहज बनाता है। उसमें भी एक तरह का संतुलन लाने में सहायक हुआ है।
हमारे अंदर असुरक्षा की भावना आने के पीछे विगत का असंतोष, वर्तमान का भ्रम और भविष्य के प्रति एक अविश्वास का होना है। किसी भी व्यक्ति को अपने विगत के अनुभव से सीखना चाहिए, वर्तमान का आनंद लेना चाहिए और भविष्य के लिए उसके मन में एक योजना होनी चाहिए। ये तीनों बातें हमारे अंदर की असुरक्षा की भावना को कम करने में सहायक हैं। मनस्थिति की ये अलग अलग अवस्थाएं हैं।
इसका भाव यही है कि अगर अतीत में ही उलझे रहोगे, तो वर्तमान के आनंद से वंचित हो जाओगे। अगर विगत से अनुभव नहीं लोगे, तो जीवन को बेहतर नहीं बना पाओगे, और भविष्य के लिए अगर योजना नहीं होगी तो आगे के सफर में मन में विचलन रहेगा।
यथार्थ जीवन हमारी अंतश्चेतना में समाया रहता है। वह हमारी प्रवृत्तियों में नजर आता है। इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि अगर किसी व्यक्ति का मस्तिष्क बिल्ली की तरह है, तो वह बाहरी जीवन के किसी चीज का प्रभाव पड़ने पर बिल्ली की प्रवृति के अनुकूल ही काम करेगा।
इस प्रवृति के लोगों में भी यही व्यवहार देखा जाता है, उन्हें केवल अपने से मतलब होता है। दूसरी प्रवृत्ति कुत्ते की है जो केवल तब तक दुम हिलाता है जब तक उसे प्यार मिलता है। मेडिटेशन हमारे मस्तिष्क की ऐसी प्रवृत्तियों को दूर करता है। मेडिटेशन मस्तिष्क के इस तरह के क्षणिक स्वभाव को दूर करने में सहायक है। मेडिटेशन से हमारा मस्तिष्क स्थिर और शांत होता है। मेडिटेशन की अवस्था के अलग अलग चरण हैं। इसमें आनंद की अवस्था धीरे-धीरे आती है। मेडिटेशन से जब हमारे व्यवहार में भी परिवर्तन आने लगे तो यह अवस्था कुछ पा जाने की है। मेडिटेशन से विचारों पर तो एकदम प्रभाव पड़ता है, लेकिन महत्व इस बात का है कि मेडिटेशन आपके व्यवहार में भी बदलाव ला दे। यह अवस्था अभ्यास से लाई जाती है। दिमाग की अवस्था हमेशा एक सा होनी चाहिए। हमेशा संतुलन की स्थिति होनी चाहिए। विचलन की स्थिति ठीक नहीं। हमारे दिमागी संतुलन और मस्तिष्क चेतना के लिए मेडिटेशन की पुरानी और आधुनिक पदतियां उपयोगी साबित हुई हैं। इससे दिमागी असंतुलन को दूर करने में मदद मिली है। यह हमें व्यावहारिक रूप से भी सहज बनाता है। उसमें भी एक तरह का संतुलन लाने में सहायक हुआ है।
Posted by Udit bhargava at 12/10/2011 10:00:00 am 0 comments
कलयुग केवल नाम अधारा
संतो व सिद्धों को अपनी गति और नियति का पहले से ही अनुमान होता है। हुनमान भक्त पुरुषोत्तम दास जी भी ऐसे ही संत हैं। सबसे पहले कई दशक पूर्व वे माघ माह में स्नान करने प्रयाग आए, यहीं उनका परिचय कानपुर के अयोध्या प्रसाद शुक्ल और गंगा सागर मिश्र से हुआ। उनकी हनुमत भक्ति और विद्वता से प्रभावित होकर ही दोनों ने उन्हें कानपुर आने का आमंत्रण दिया और पनकी के पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन का आग्रह किया।
माघ समाप्त होने के बाद पुरुषोत्तम दास जी कानपुर आए और पनकी स्थित पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन किए। पुरुषोत्तम दास जी के मन में काफी दिनों से एक शंका थी कि हनुमान चालीसा की चौपाई 'हाथ वज्र और ध्वजा विराजे' में हुनमान जी का वज्र कहां है? पुरुषोत्तम दास जी की इस शंका का निवारण भी पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन के बाद हो गया। उन्होंने अपने एक शिष्य को बताया कि हनुमानजी की कृपा से ही मुझे यह ज्ञान मिला कि वज्र खुद हनुमान जी का हाथ ही है। इसी प्रकार पुरुषोत्तम दास जी के मन में एक शंका यह भी थी कि अगर हनुमान जी शिव जी के अवतार हैं तो पार्वती जी कहां हैं? पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन के बाद पुरुषोत्तम जी अपने एक शिष्य से बोले, 'पार्वती जी हनुमान जी के साथ उनकी पूंछ में प्रतिष्ठापित थीं। जब शंकर जी ने विश्वकर्मा से पार्वती जी के लिए लंका का निर्माण करवाया तो गृहप्रवेश के समय रावण को ही उन्होंने अपना आचार्य बनाया था। लेकिन रावण ने शिव जी से दक्षिणा में लंका ही मांग ली। इससे पार्वती बहुत रुष्ट हुईं। शिव जी को पार्वती जी उतनी ही प्रिय थीं जितनी वानर को अपनी पूंछ। अतः शिव जी ने जब हनुमान जी के रूप में अवतार लिया तब पार्वती जी उनकी पूंछ बनी और इसी पूंछ से उन्होंने लंका को जलाकर रावण से अपना बदला लिया।
पुरुषोत्तम दास जी कहते हैं कि कलयुग में प्रभु नाम का स्मरण ही मोक्ष का माध्यम है। प्रभुनाम स्मरण स्वतंत्र साधना है और यह बाह्य आचरण पर निर्भर नहीं है। शायद इसीलिए उन्होंने १३ करोड़ राम नाम के जप का संकल्प लिया था जिसे १२ अक्तूबर १९८५ को पूरा के बाद बिठूर में महाराज घाट पर गंगा में विसर्जित कर दिया।
-शशिशेखर त्रिपाठी
माघ समाप्त होने के बाद पुरुषोत्तम दास जी कानपुर आए और पनकी स्थित पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन किए। पुरुषोत्तम दास जी के मन में काफी दिनों से एक शंका थी कि हनुमान चालीसा की चौपाई 'हाथ वज्र और ध्वजा विराजे' में हुनमान जी का वज्र कहां है? पुरुषोत्तम दास जी की इस शंका का निवारण भी पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन के बाद हो गया। उन्होंने अपने एक शिष्य को बताया कि हनुमानजी की कृपा से ही मुझे यह ज्ञान मिला कि वज्र खुद हनुमान जी का हाथ ही है। इसी प्रकार पुरुषोत्तम दास जी के मन में एक शंका यह भी थी कि अगर हनुमान जी शिव जी के अवतार हैं तो पार्वती जी कहां हैं? पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन के बाद पुरुषोत्तम जी अपने एक शिष्य से बोले, 'पार्वती जी हनुमान जी के साथ उनकी पूंछ में प्रतिष्ठापित थीं। जब शंकर जी ने विश्वकर्मा से पार्वती जी के लिए लंका का निर्माण करवाया तो गृहप्रवेश के समय रावण को ही उन्होंने अपना आचार्य बनाया था। लेकिन रावण ने शिव जी से दक्षिणा में लंका ही मांग ली। इससे पार्वती बहुत रुष्ट हुईं। शिव जी को पार्वती जी उतनी ही प्रिय थीं जितनी वानर को अपनी पूंछ। अतः शिव जी ने जब हनुमान जी के रूप में अवतार लिया तब पार्वती जी उनकी पूंछ बनी और इसी पूंछ से उन्होंने लंका को जलाकर रावण से अपना बदला लिया।
पुरुषोत्तम दास जी कहते हैं कि कलयुग में प्रभु नाम का स्मरण ही मोक्ष का माध्यम है। प्रभुनाम स्मरण स्वतंत्र साधना है और यह बाह्य आचरण पर निर्भर नहीं है। शायद इसीलिए उन्होंने १३ करोड़ राम नाम के जप का संकल्प लिया था जिसे १२ अक्तूबर १९८५ को पूरा के बाद बिठूर में महाराज घाट पर गंगा में विसर्जित कर दिया।
-शशिशेखर त्रिपाठी
Labels: संत महापुरुष
Posted by Udit bhargava at 12/10/2011 09:59:00 am 0 comments
समाज-सुधारक थे श्रीमद् शंकरदेव
असम के महान संत श्रीमद् शंकरदेव का जन्म नौगांव जिले के अली पुखरी में १४४९ में हुआ था। उनका जीवन अनेक अनूठी घटनाओं से पूर्ण था। अपने दूरदर्शी प्रयास से उन्होंने अनेक जाति-वर्गों में विभाजित पूर्वोत्तर में भक्ति रस की जो धारा प्रवाहित की और जनसाधारण को कल्याण की राह दिखाई, वह अतुलनीय है।
शंकरदेव के पूर्वज चंडीवर भूइयां पहले बंगाल आकर बसे थे और वहां से असम आ गए थे। उनके वशंजों ने मध्य असम के विभिन्न भागों में भूइयां-राज्यों की स्थापना की थी। शंकरदेव के पिता शिरोमणि भूइयां कुसुंबर अली पुखरी में आकर बस गए थे।
शंकरदेव की माता का नाम सत्यसंधा था। बचपन में ही शंकर को माता-पिता की स्नेह-छाया से वंचित होना पड़ा।
उनका पालन-पोषण दादी खेरसुती ने किया। बारह वर्ष की आयु में शंकर महेंद्र कंदली की संस्कृत पाठशाला में अध्ययन करने लगे। विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन के माध्यम से उनके मन में तत्व-ज्ञान की ज्योति जल उठी। अल्प समय में ही अतुल शास्त्र ज्ञान प्राप्त कर वे घर लौटे, परंतु उनका मन भक्ति में रम गया था।
आम लोगों की दशा पर उन्होंने ध्यान दिया और अनुभव किया कि भक्ति की राह पर चलकर ही उनको उचित मार्गदर्शन मिल सकता है। परिवार के सदस्यों के आग्रह पर उन्होंने सूर्यावती से विवाह किया। सांसारिक कर्मों से उदासीन होकर वे चिंतन-लेखन में जुट गए। इन्हीं दिनों उन्होंने चिह्न यात्रा नाटक की रचना की और उसका मंचन किया। फिर वे अपने साथियों के साथ बारह वर्षों तक भ्रमण करते रहे। इस दौरान जहां उन्होंने तीर्थ स्थानों की यात्रा की, वहीं कई संतों के संपर्क में भी आए। उन्हें श्रीमद्भागवत पर आधारित कृष्ण भक्ति का प्रचार करने की प्रेरणा मिली।
वे ब्रजावली भाषा में भक्ति-पद की रचाना करने लगे। काशी, वृंदावन, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ आदि स्थानों की उन्होंने यात्रा की। तीर्थाटन से लौटने के बाद वे ग्रंथ लेखन और भक्ति धर्म का प्रचार करने में जुट गए। उन्हें अनेक शिष्यों के साथ माधवदेव जैसा प्रतिभाशाली शिष्य मिल गया। दोनों जनसाधारण के बीच धर्म का प्रचार करने लगे। ११९ वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर का परित्याग किया।
शंकरदेव मूलतः संत और धर्म प्रचारक-सुधारक थे। उन्होंने समाज-व्यवस्था की त्रुटियों की तरफ ध्यान दिया था। उन्होंने राज्याश्रय प्राप्त तत्कालीन ब्राह्मणों-पुरोहितों का अहंकार देखा, जो जनजातीय लोक-संस्कृति को हिकारत की नजरों से देखते थे। यही वजह है कि इन सब खामियों को दूर करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया।
शंकरदेव की प्रमुख कृतियां विशुद्ध असमिया भाषा में -काव्यः हरिशचंद्र उपाख्यान एवं रुक्मिणी हरण काव्य -भक्ति पद : कीर्तन घोष, भक्ति प्रदीप, गुणमाला ब्रजावली भाषा में - प्रगीत पद- बरगीत - टीकाः शंकरदेव ने भक्ति तत्व संबंधी संस्कृत ग्रंथ भक्ति रत्नावली की टीका भी लिखी थी। अनूदित कृतियां शंकरदेव ने उत्तर कांड रामायण तथा श्रीमद् भागवत के कई स्कंधों का असमिया भाषा में अनुवाद भी किया।
शंकरदेव ने धर्म वंचित, शोषित, अशिक्षित, अंत्यज, शूद्र, जनजातीय जनों को धर्म-ज्ञान देने के लिए संस्कृत भाषा की दीवार तोड़ते हुए जनसाधारण की भाषा में मौलिक कृतियों की रचना की।
- ब्रजमोहन सिंह
शंकरदेव के पूर्वज चंडीवर भूइयां पहले बंगाल आकर बसे थे और वहां से असम आ गए थे। उनके वशंजों ने मध्य असम के विभिन्न भागों में भूइयां-राज्यों की स्थापना की थी। शंकरदेव के पिता शिरोमणि भूइयां कुसुंबर अली पुखरी में आकर बस गए थे।
शंकरदेव की माता का नाम सत्यसंधा था। बचपन में ही शंकर को माता-पिता की स्नेह-छाया से वंचित होना पड़ा।
उनका पालन-पोषण दादी खेरसुती ने किया। बारह वर्ष की आयु में शंकर महेंद्र कंदली की संस्कृत पाठशाला में अध्ययन करने लगे। विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन के माध्यम से उनके मन में तत्व-ज्ञान की ज्योति जल उठी। अल्प समय में ही अतुल शास्त्र ज्ञान प्राप्त कर वे घर लौटे, परंतु उनका मन भक्ति में रम गया था।
आम लोगों की दशा पर उन्होंने ध्यान दिया और अनुभव किया कि भक्ति की राह पर चलकर ही उनको उचित मार्गदर्शन मिल सकता है। परिवार के सदस्यों के आग्रह पर उन्होंने सूर्यावती से विवाह किया। सांसारिक कर्मों से उदासीन होकर वे चिंतन-लेखन में जुट गए। इन्हीं दिनों उन्होंने चिह्न यात्रा नाटक की रचना की और उसका मंचन किया। फिर वे अपने साथियों के साथ बारह वर्षों तक भ्रमण करते रहे। इस दौरान जहां उन्होंने तीर्थ स्थानों की यात्रा की, वहीं कई संतों के संपर्क में भी आए। उन्हें श्रीमद्भागवत पर आधारित कृष्ण भक्ति का प्रचार करने की प्रेरणा मिली।
वे ब्रजावली भाषा में भक्ति-पद की रचाना करने लगे। काशी, वृंदावन, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ आदि स्थानों की उन्होंने यात्रा की। तीर्थाटन से लौटने के बाद वे ग्रंथ लेखन और भक्ति धर्म का प्रचार करने में जुट गए। उन्हें अनेक शिष्यों के साथ माधवदेव जैसा प्रतिभाशाली शिष्य मिल गया। दोनों जनसाधारण के बीच धर्म का प्रचार करने लगे। ११९ वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर का परित्याग किया।
शंकरदेव मूलतः संत और धर्म प्रचारक-सुधारक थे। उन्होंने समाज-व्यवस्था की त्रुटियों की तरफ ध्यान दिया था। उन्होंने राज्याश्रय प्राप्त तत्कालीन ब्राह्मणों-पुरोहितों का अहंकार देखा, जो जनजातीय लोक-संस्कृति को हिकारत की नजरों से देखते थे। यही वजह है कि इन सब खामियों को दूर करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया।
शंकरदेव की प्रमुख कृतियां विशुद्ध असमिया भाषा में -काव्यः हरिशचंद्र उपाख्यान एवं रुक्मिणी हरण काव्य -भक्ति पद : कीर्तन घोष, भक्ति प्रदीप, गुणमाला ब्रजावली भाषा में - प्रगीत पद- बरगीत - टीकाः शंकरदेव ने भक्ति तत्व संबंधी संस्कृत ग्रंथ भक्ति रत्नावली की टीका भी लिखी थी। अनूदित कृतियां शंकरदेव ने उत्तर कांड रामायण तथा श्रीमद् भागवत के कई स्कंधों का असमिया भाषा में अनुवाद भी किया।
शंकरदेव ने धर्म वंचित, शोषित, अशिक्षित, अंत्यज, शूद्र, जनजातीय जनों को धर्म-ज्ञान देने के लिए संस्कृत भाषा की दीवार तोड़ते हुए जनसाधारण की भाषा में मौलिक कृतियों की रचना की।
- ब्रजमोहन सिंह
Labels: संत महापुरुष
Posted by Udit bhargava at 12/10/2011 09:49:00 am 0 comments
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