10 दिसंबर 2011

कलयुग केवल नाम अधारा

संतो व सिद्धों को अपनी गति और नियति का पहले से ही अनुमान होता है। हुनमान भक्त पुरुषोत्तम दास जी भी ऐसे ही संत हैं। सबसे पहले कई दशक पूर्व वे माघ माह में स्नान करने प्रयाग आए, यहीं उनका परिचय कानपुर के अयोध्या प्रसाद शुक्ल और गंगा सागर मिश्र से हुआ। उनकी हनुमत भक्ति और विद्वता से प्रभावित होकर ही दोनों ने उन्हें कानपुर आने का आमंत्रण दिया और पनकी के पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन का आग्रह किया।

माघ समाप्त होने के बाद पुरुषोत्तम दास जी कानपुर आए और पनकी स्थित पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन किए। पुरुषोत्तम दास जी के मन में काफी दिनों से एक शंका थी कि हनुमान चालीसा की चौपाई 'हाथ वज्र और ध्वजा विराजे' में हुनमान जी का वज्र कहां है? पुरुषोत्तम दास जी की इस शंका का निवारण भी पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन के बाद हो गया। उन्होंने अपने एक शिष्य को बताया कि हनुमानजी की कृपा से ही मुझे यह ज्ञान मिला कि वज्र खुद हनुमान जी का हाथ ही है। इसी प्रकार पुरुषोत्तम दास जी के मन में एक शंका यह भी थी कि अगर हनुमान जी शिव जी के अवतार हैं तो पार्वती जी कहां हैं? पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन के बाद पुरुषोत्तम जी अपने एक शिष्य से बोले, 'पार्वती जी हनुमान जी के साथ उनकी पूंछ में प्रतिष्ठापित थीं। जब शंकर जी ने विश्वकर्मा से पार्वती जी के लिए लंका का निर्माण करवाया तो गृहप्रवेश के समय रावण को ही उन्होंने अपना आचार्य बनाया था। लेकिन रावण ने शिव जी से दक्षिणा में लंका ही मांग ली। इससे पार्वती बहुत रुष्ट हुईं। शिव जी को पार्वती जी उतनी ही प्रिय थीं जितनी वानर को अपनी पूंछ। अतः शिव जी ने जब हनुमान जी के रूप में अवतार लिया तब पार्वती जी उनकी पूंछ बनी और इसी पूंछ से उन्होंने लंका को जलाकर रावण से अपना बदला लिया।

पुरुषोत्तम दास जी कहते हैं कि कलयुग में प्रभु नाम का स्मरण ही मोक्ष का माध्यम है। प्रभुनाम स्मरण स्वतंत्र साधना है और यह बाह्य आचरण पर निर्भर नहीं है। शायद इसीलिए उन्होंने १३ करोड़ राम नाम के जप का संकल्प लिया था जिसे १२ अक्तूबर १९८५ को पूरा के बाद बिठूर में महाराज घाट पर गंगा में विसर्जित कर दिया।

                                                                                                                                                                                -शशिशेखर त्रिपाठी

समाज-सुधारक थे श्रीमद्‌ शंकरदेव

असम के महान संत श्रीमद्‌ शंकरदेव का जन्म नौगांव जिले के अली पुखरी में १४४९ में हुआ था। उनका जीवन अनेक अनूठी घटनाओं से पूर्ण था। अपने दूरदर्शी प्रयास से उन्होंने अनेक जाति-वर्गों में विभाजित पूर्वोत्तर में भक्ति रस की जो धारा प्रवाहित की और जनसाधारण को कल्याण की राह दिखाई, वह अतुलनीय है।
शंकरदेव के पूर्वज चंडीवर भूइयां पहले बंगाल आकर बसे थे और वहां से असम आ गए थे। उनके वशंजों ने मध्य असम के विभिन्न भागों में भूइयां-राज्यों की स्थापना की थी। शंकरदेव के पिता शिरोमणि भूइयां कुसुंबर अली पुखरी में आकर बस गए थे।
शंकरदेव की माता का नाम सत्यसंधा था। बचपन में ही शंकर को माता-पिता की स्नेह-छाया से वंचित होना पड़ा।
उनका पालन-पोषण दादी खेरसुती ने किया। बारह वर्ष की आयु में शंकर महेंद्र कंदली की संस्कृत पाठशाला में अध्ययन करने लगे। विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन के माध्यम से उनके मन में तत्व-ज्ञान की ज्योति जल उठी। अल्प समय में ही अतुल शास्त्र ज्ञान प्राप्त कर वे घर लौटे, परंतु उनका मन भक्ति में रम गया था।
आम लोगों की दशा पर उन्होंने ध्यान दिया और अनुभव किया कि भक्ति की राह पर चलकर ही उनको उचित मार्गदर्शन मिल सकता है। परिवार के सदस्यों के आग्रह पर उन्होंने सूर्यावती से विवाह किया। सांसारिक कर्मों से उदासीन होकर वे चिंतन-लेखन में जुट गए। इन्हीं दिनों उन्होंने चिह्न यात्रा नाटक की रचना की और उसका मंचन किया। फिर वे अपने साथियों के साथ बारह वर्षों तक भ्रमण करते रहे। इस दौरान जहां उन्होंने तीर्थ स्थानों की यात्रा की, वहीं कई संतों के संपर्क में भी आए। उन्हें श्रीमद्‌भागवत पर आधारित कृष्ण भक्ति का प्रचार करने की प्रेरणा मिली।

वे ब्रजावली भाषा में भक्ति-पद की रचाना करने लगे। काशी, वृंदावन, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ आदि स्थानों की उन्होंने यात्रा की। तीर्थाटन से लौटने के बाद वे ग्रंथ लेखन और भक्ति धर्म का प्रचार करने में जुट गए। उन्हें अनेक शिष्यों के साथ माधवदेव जैसा प्रतिभाशाली शिष्य मिल गया। दोनों जनसाधारण के बीच धर्म का प्रचार करने लगे। ११९ वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर का परित्याग किया।
शंकरदेव मूलतः संत और धर्म प्रचारक-सुधारक थे। उन्होंने समाज-व्यवस्था की त्रुटियों की तरफ ध्यान दिया था। उन्होंने राज्याश्रय प्राप्त तत्कालीन ब्राह्मणों-पुरोहितों का अहंकार देखा, जो जनजातीय लोक-संस्कृति को हिकारत की नजरों से देखते थे। यही वजह है कि इन सब खामियों को दूर करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया।
शंकरदेव की प्रमुख कृतियां विशुद्ध असमिया भाषा में -काव्यः हरिशचंद्र उपाख्यान एवं रुक्मिणी हरण काव्य -भक्ति पद : कीर्तन घोष, भक्ति प्रदीप, गुणमाला ब्रजावली भाषा में - प्रगीत पद- बरगीत - टीकाः शंकरदेव ने भक्ति तत्व संबंधी संस्कृत ग्रंथ भक्ति रत्नावली की टीका भी लिखी थी। अनूदित कृतियां शंकरदेव ने उत्तर कांड रामायण तथा श्रीमद्‌ भागवत के कई स्कंधों का असमिया भाषा में अनुवाद भी किया।
शंकरदेव ने धर्म वंचित, शोषित, अशिक्षित, अंत्यज, शूद्र, जनजातीय जनों को धर्म-ज्ञान देने के लिए संस्कृत भाषा की दीवार तोड़ते हुए जनसाधारण की भाषा में मौलिक कृतियों की रचना की।

                                                                                                                                                                                      - ब्रजमोहन सिंह

23 नवंबर 2011

प्रेम के चार रूप : भक्ति, श्रद्धा, मैत्री और स्नेह

जीवन के दो रूप हैं- स्वार्थ केन्द्रित और पर-केन्द्रित। एक तीसरा रूप है- परमार्थ- केन्द्रित जिसमें स्वार्थ और पर का भेद समाप्त हो जाता है। स्वार्थ- केन्द्रित जीवन भोग है, पर- केन्द्रित त्याग है और परमार्थ- केन्द्रित प्रेम है। भोग में घुटन है, त्याग में कष्ट है, प्रेम में आनंद है।

इसमें प्रेम के चार रूप हैं- भक्ति, श्रद्धा, मैत्री और स्नेह। अस्तित्व- मात्र के प्रति भक्ति है, बड़ों के प्रति प्रेम श्रद्धा है, बराबर वालों से प्रेम मैत्री है और छोटों के प्रति प्रेम स्नेह है। प्रेम के इन चारों ही रूपों में अहंकार का विसर्जन रहता है जिसे हमने अस्तित्व कहा उसे सामान्य भाषा में भगवान् कहते हैं। हम अस्तित्व का एक भाग हैं। इस बोध में भक्तिभाव उत्पन्न होता है। अस्तित्व ही अस्तित्व के लिए कुछ कर रहा है, मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। यह भावभक्ति है।

अस्तित्व निराकार है। वह साकार बनता है हमारे परिवेश के रूप में। माता-पिता, गुरूजन भी अस्तित्व का ही रूप हैं। इसलिए इन्हें हम भगवान् ही कहते हैं-
"गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु:, गुरूर्देवो महेश्वर:। गुरू: साक्शात्परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।"
गुरूजनों के प्रति यह श्रद्धा हममें नमनीयता लाती है, ग्रहणशीलता लाती है। हम ग्रहणशील होते हैं तो कुछ सीख पाते हैं- 'श्रद्धावान लभते ज्ञानम्'। उद्दण्ड व्यक्ति कुछ नहीं सीख पाता। श्रद्धा में झुकना पड़ता है तो अहंकार छोड़ना पड़ता है। बराबर वालों से मैत्री होती है| मैत्री में परायापन नहीं होता। जिस रहस्य को हम किसी से नहीं कह सकते उसे मित्र से कह कर मन हल्का कर लेते हैं। मित्रता में अद्वैत रहता है। यह अद्वैत भी भगवान् का ही एक रूप है। अर्जुन की श्रीकृष्ण से मैत्री थी तो उसके लिए श्रीकृष्ण भगवान् ही बन गये।

अपने से छोटों के प्रति प्रेम स्नेह कहलाता है। यही वात्सल्य-रस है। हमारे यहाँ एक शब्द प्रचलित है- बाल-गोपाल। अर्थ यह है की छोटे बच्चे भी भगवान् का ही एक रूप हैं। वे सब कार्य नि:स्वार्थ-भाव से करते हैं। वे सरल होते हैं। उनमें अपने पराये का भेद नहीं होता। साधना का उत्कृष्ट रूप यह है की व्यक्ति बच्चा बन जाये। इस प्रकार प्रेम नर में ही नारायण की प्रतिष्ठा कर देता है। सेवा, त्याग, तपस्या आदि नैतिकता के शब्द हैं; प्रेम अध्यात्म का शब्द है। नैतिकता में दबाव रहता है कर्तव्य-भावना का। प्रेम में कोई दबाव नहीं होता।

अहंकार का पत्थर हटे तो प्रेम का झरना फूट सकता है। प्रेम ही ज्ञान है- 'ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।' प्रेम ही जीवन है। प्रेम के बिना व्यक्ति का सांस लेना ऐसा ही है जैसा लोहार की धौंकनी का चलना।

जीवन जीने की कला : जरा रखिये सकारात्मक सोच

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धैर्य और आशा के साथ अपने प्रेरणा पूर्ण नवाचारों के माध्यम से लक्ष्य प्राप्ति के दृष्टिकोण को पूरा करने में समर्थ एवं सफल होने को ही सकारात्मक सोच कहा गया है।

सकारात्मक सोच क्यों-
इंसान ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है, और चेतना के विकास के साथ ही मानव ने प्रश्न पूछना प्रारम्भ किया जो अन्य जातियां नहीं कर सकी, और उन्हीं प्रश्नों को पूरा करने की चाह में आज हम कहाँ आ पहुंचे हैं।
आज प्रत्येक व्यक्ति की परम इच्छा होती है की लोग उसकी प्रशंसा करें, उसके कार्य को सराहा जाए, उससे मिलना एवं बात करना पसंद करें, और यही प्रश्न वह अपने आप से पूछता है की मैं अपने आप में ऐसा क्या आकर्षण निर्मित करूँ कि मेरे प्रश्नों का हल प्राप्त हो जाए।
आकर्षण का नियम जीवन का महान रहस्य है।
आकर्षण का नियम कहता है कि सामान चीजें, सामान चीजों को आकर्षित करती हैं, इसलिए जब आप एक विचार सोचते हैं तो आप उसी जैसे अन्य विचारों को अपनी और आकर्षित करते हैं।
विचार चुम्बकीय है और हर विचार की एक फ्रिक्वेंसी होती है, जब आपके मन में विचार आते हैं तो वे ब्रह्माण्ड में पहुँचते है और चुम्बक की तरह उसी फ्रिक्वेंसी वाली सारी चीजों को आकर्षित करते हैं। हर भेजी गयी चीजें स्त्रोत तक यानी आप तक लौटकर आती हैं।
आप मानवीय ट्रांसमिशन टाँवर की तरह हैं और अपने विचारों की फ्रिक्वेंसी प्रसारित कर रहें हैं, अगर आप अपनी जिंदगी में कोई चीज बदलना चाहते हैं तो अपने विचार बदलकर फ्रिक्वेंसी बदल लीजिये।
आपके वर्त्तमान विचार आपके भावी जीवन का निर्माण कर रहे हैं। आप जिसके बारे में सबसे ज्यादा सोचते हैं, या जिस पर सबसे ज्यादा ध्यान केन्द्रित करते हैं, वह आपकी जिंदगी में प्रकट हो जाएगा।

आपके विचार वस्तु बन जाते हैं-
आपके विचार वस्तु कैसे बन जाते हैं, आपको बताना चाहूंगा इस कहानी से: अफ्रीका का एक कबीला जिसके बारे में कहावत थी कि वे जब भी डांस करते हैं, बारिश होती है, तब उनसे इसका राज जाना गया तो पता चला कि वो तब तक डांस करते हैं जब तक वर्षा नहीं हो जाती।

सकारात्मक सोच कैसे-
वजन कम करने के लिए वजन कम करने पर ध्यान केन्द्रित न करे। इसके बजाय अपने आदर्श वजन पर ध्यान केन्द्रित करें। अपने आदर्श वजन की संभावनाएं महसूस करेंगे तो आप इसका आह्वान करके इसे अपनी और आकर्षित कर सकेंगे।
आकर्षण के नियम की शक्ति महसूस करने के लिए छोटी चीजों से शुरूआत करें, सफलता मिलने पर बड़ी चीजों की कल्पना करने लगेंगे। उम्मीद एक प्रबल आकर्षण शक्ति है उन चीजों की उम्मीद करें जिन्हें आप चाहते हैं उन चीजों की उम्मीद न करें, जिन्हें आप नहीं चाहते है। आकर्षण के नियम का लाभ लेने के लिए इसे सिर्फ एक बार की घटना न बनाकर इसको आदत में शामिल कर लें।
हंसी, खुशी को आकर्षित करती है। नकारात्मक को नष्ट करती है और चमत्कारिक इलाज की और ले जाती है क्योंकि खुशी के साइड इफेक्ट्स पर किये गये शोधों में पाया गया है कि खुश लोग ज्यादा सफल होते हैं, क्योंकि खुश लोग -
-    मजबूत रिश्तों का आनंद उठाते है।
-    कम बीमार पड़ते है।
-    उम्मीद हमेशा ज़िंदा रखते है।
-    बुरे अनुभवों से जल्दी उभर जाते है।

महत्वपूर्ण बातें -
-     आप अपने आपको अभी अच्छा महसूस करें।
-     काम को इस तरीके से करे जिससे आप खुशी महसूस करें, जिससे खुशियाँ आपकी तरफ दौड़ी आयेंगी।
-     आलोचना करने से कभी कोई सुधरता नहीं अलबत्ता सम्बन्ध जरूर बिगड़ जाते हैं।

लोगों को प्रभावित करने के मूल तरीके -
-     बुराई मत करों, निंदा मत करो, शिकायत मत करो।
-     सच्ची तारीफ़ करने की आदत डालिये।
-     सामने वाले आदमी में प्रबल इच्छा जगाइये।

लोगों का चहेता बनने के तरीके -
-     दूसरे लोगों में सचमुच रुचि लें।
-     मुस्करायें।
-     याद रखें किसी व्यक्ति का नाम उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण और मधुरतम शब्द होता है।
-     बोलने वाले सबकी पसंद नहीं होते किन्तु सुनने वाले सबको भाते हैं, अच्छा श्रोता बनाने का प्रयास करें।
-     सामने वाले व्यक्ति की रुचि के विषय में बात करें।
-     सामने वाले व्यक्ति के महत्वपूर्ण होने का अहसास करायें और ईमानदारी से करायें।
-     गलती मानने का अर्थ यह है कि अब आप पहले से बेहतर है।

लोगों से अपनी बात कैसे मनवायें -
-     बहस से एक ही फायदा हो सकता है और वह है इससे बचना।
-     दूसरे व्यक्ति के विचारों के प्रति सम्मान दिखाएँ और यह कभी नहीं कहे- "आप गलत है"
-     अगर गलती आपकी हो तो तत्काल और पूरी तरह अपनी गलती मान लें।
-     बातचीत दोस्ताना तरीके से शुरू करें।
-     सामने वाले से तत्काल हाँ हाँ कहलवाने का प्रयास करें।
-     सामने वाले आदमी को ज्यादा बातें करने दें।
-     दूसरे व्यक्ति को यह लगने दे कि यह विचार उसी का है।
-     ईमानदारी से सामने वाले व्यक्ति का नजरिया समझने की कोशिश करें। सामने वाले व्यक्ति के विचारों और इच्छाओं के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करने का प्रयास करें।
-     तारीफ़ और सच्ची प्रशंसा से बात शुरू करें।
-     लोगों की गलतियाँ सीधे तरीके से न बतायें।
-     किसी की आलोचना करने से पहले अपनी गलती बतायें।
-     सीधे आदेश देने की बजाय प्रश्न पूछना अधिक बेहतर होगा।
-     थोड़े से भी सुधार की तारीफ़ करें और हर सुधार पर तारीफ़ करें।
-     सामने वाले व्यक्ति को कई काम इस तरह सौपें कि वह आपका कहा काम खुशी से कर दें।

यदि यह सब अपने दैनिक जीवन में कर सकें तो अच्छा होगा।
                                                                                                                                                                          - कपिल, अलवर

08 नवंबर 2011

आत्माएं भटकती क्यों है?

जी हां!...कुछ लोगों को आत्माओं से साक्षात्कार हुआ है!....कहतें है कि मनुष्य का शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा नष्ट नहीं होती!....कुछ आत्माओं को पुनर्जन्म प्राप्त नहीं होता!...उनकी मुक्ति हो जाती है...वह आत्माएं ईश्वर रुपी शक्ती में विलीन हो जाती है!...उन्हे पुण्यात्मा कहा जाता है!...ज्यादातर आत्माएं एक शरीर का त्याग कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है!...आत्मा को कभी पिछ्ले जन्म की याद नही रहती!....कुछ आत्माओं को रह जाती है...नया जन्म लेने के बाद भी पिछ्ले जन्म की कहानी कहने वाले लोग मिल जातें है!...ये लोग अपने पिछ्ले जन्म के ठिकाने...गांव या शहर का नाम भी बताते है...उनकी मृत्यु कैसे हुई थी यह भी बताते है!...अपने पिछ्ले जन्म के घर का पता भी बताते है....उनके माता-पिता और भाई बहनों को ...अगर वे जिंदा है तो पहचान भी लेते है!...पिछ्ले जन्म के लोगों की फोटोएं भी पहचान लेते है!....कुछ लोगों को तो अपने पिछ्ले तीन से चार जन्मों की याद होने के उदाहरण मिले हुए है!

हां..कुछ आत्माओं को नया शरीर प्राप्त नहीं होता....और वे भटकती रहती है!...ऐसी आत्माएं दुष्ट्ता पर उतर आती है!...मौका मिलते ही किसी जीवित व्यक्ति के शरीर में घुस कर उसे और उससे जुडे हुए अन्य मनुष्यों को तकलीफ देती है!...धन का नाश करती है...बिमारियां फैलाती है...गंदगी के ढेर लगाती है..कुछ आत्माएं तो जान से मार कर ही किसी शरीर को छोडती है!

कुछ आत्माएं बिना शरीर में दाखिल हुए भी किसी रासायनिक पदार्थ का इस्तेमाल करती है....और टेढे मेढे स्वरुप में दिखाई देती है!...उन्हे देख कर लोग डर जाते है!...पुराने आवासों मे या खंडहर या टूटे-फूटे मकानों मे बसना इन्हें अच्छा लगता है!....मनुष्य को छोड कर अन्य प्राणी इनके अस्तित्व को तुरन्त पहचान जाते है....विशेषतः कुत्ते इनकी उपस्थिति पहचान जाते है, और भौंकना शुरु कर देते है...आपने देखा होगा बिना किसी वजह के भी कुत्ता भौंकता है!....ऐसे में समझ लीजिएगा की भट्कती आत्मा वहां घूम रही है!...ऐसी आत्माओं को वहां से भगाना बहुत जरुरी हो जाता है!

देखा गया है कि कुछ भटकती आत्माएं अच्छी भी होती है और किसी की जान भी बचाती है!..बडे बडे हादसे होने वाले होते है...तब भी अच्छी आत्माएं कुछ न कुछ संकेत दे कर आने वाले संकट से हमें अवगत कराती है!...मुझे भी ऐसा ही संकेत एक आत्मा ने दिया था..उसने होने वाले ट्रेन एक्सिडैंट से मुझे आगाह कर दिया...और मेरा बचाव हो गया!..उसने ट्रेन में मौजूद अन्य लोगों को भी आगाह किया था...लेकिन वे उसका संकेत समझ नहीं पाए और जान से हाथ धो बैठे!

इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि....अगर भगवान होता है, तो आत्माएं भी अच्छी और बुरी, दोनों तरह की होती है, जिन्हें हम भूत कहतें है!

भगवान् बुद्ध की देशना - जीवन के चार आर्य सत्य


भगवन बुद्ध ने संसार को जीवन के चार आर्य सत्य दिए हैं। भगवान् की यह देशना सर्वकालिक है। वे ढाई हजार वर्ष पूर हुए पर उनके बताये हुए मार्ग उस समय भी सटीक थे, आज भी हैं और जब तक मनुष्य है तब तक रहेंगे। उन्होंने मनुष्य के स्वभाव और चेतना की बात की है- श्रद्धा पर नहीं पर विज्ञान पर आधारित कर। उन्होंने एक जीवन विज्ञान दिया, दर्शन शास्त्र की बात ही नहीं की मात्र रोग व मोचिकित्सा की बात की है। किसी और पर आश्रित होने को नहीं कहा परन्तु स्वयं के जागरण व होश को महत्व दिया। इशारे दिए और मार्ग स्वयं ढूँढने को कहा। उनका सारा जोर इस बात पर था की मनुष्य की पीड़ा कैसे दूर हो, उसमें कैसे रूपांतर आए और वह स्वयं ही आनंद रूपी स्वभाव की पहचान कर सके।

इसके लिए भगवान् बुद्ध ने चार आर्य सत्यों की घोषणा की- 
1.  दुःख है, मनुष्य दुखी है।
2.  मनुष्य के दुःख का, उसके दुखी होने का कारण है क्योंकि दुःख अकारण तो होता नहीं।
3.  दुःख का निरोध है दुःख के कारणों को हटाया जा सकता है। दुःख के मिटाने के साधन है, वे ही आनन्द को पाने के साधन है।
4.  दुःख निरोध की अवस्था है। एक ऐसी दशा है जब दुःख नहीं रह जाता, दुःख से मुक्त होने की पूरी संभावना है।

जीवन में दुःख है
भगवान् बुद्ध ने कहा जीवन में दुःख है, जीवन ही दुःख है इसलिए कि मनुष्य दुःख में पडा है और उसे दुःख दिखाई नहीं देता। बुद्ध कहते हैं, जन्म दुःख है, जवानी दुःख है, मित्रता दुःख है, प्रेम दुःख है, रोग दुःख है, सम्बन्ध दुःख है। असफलता तो दुःख है ही सफलता भी दुःख है। लगता है की बुद्ध महादुखवादी है। यों भी तो कहा जा सकता था कि जीवन आनन्द है, आनन्द के उपाय हैं, आनन्द पाया जा सकता है, आनन्द की एक दशा है। यह पूर्णता की स्थिति है, यह दुःख निरोध की स्थिति है। तो प्रश्न उठता है कि बुद्ध ने नकारात्मक पहलू क्यों चुना? कारण साफ़ है। दुःख तो सबने जाना है, आनंद किसने जाना है। जिससे साक्षात्कार ही नहीं हुआ, जिसको जानते ही नहीं, कोई परिचय नहीं उससे बात आरम्भ करें तो समझ में कैसे आए, आरम्भ तो अनुभव पर आधार बनाकर किया जा सकता है। जीवन दुःख है, यह तो जीवन का तथ्य है, इससे कौन इनकार करेगा। दुःख से हर कोई मुक्त होना चाहता है। बुद्ध जीवन की निंदा नहीं कर रहे हैं वे तो इतना ही कह रहे हैं कि जो जीवन का ढंग है, वह दुःख है। जीवन में लोग दुःख रोग से ग्रस्त हैं। वे रोग से परिचय करा रहे हैं फिर वे रोग के कारण समझाते हैं, रोग से छुटकारे के लिए औषधियां बताते हैं और रोग से मुक्त हुए लोगों की दशा से परिचित कराते हैं। वे यह सब करूणा के कारण कह रहे हैं कि जीवन दुखों का घर बना है अपनी जीवन पद्वति के कारण। वे तो जीवन का यथार्थ बता रहे हैं ताकि वह चुभने लगे, फिर उसे दूर करने का उपाय करें जिससे महासुख मिले, आनन्द की प्राप्ति हो।

दुःख का कारण है
भगवान् बुद्ध आनन्द की बात नहीं करते। वे तो कहते हैं की दुःख पैदा करने के आयोजन छोड़ दो, आनन्द तो अपने आप हो जाएगा क्योंकि आनन्द तो मनुष्य का स्वभाव ही है। आनद तो है ही, उसे पाना थोड़े ही है। दुःख न रहे तो आनन्द तो स्वतः ही हो जाएगा। व्यक्ति सोचता है कि जब आनन्द मौजूद ही है तो उसे पाने की ही कोशिश करें। परन्तु आनन्द मिलता नहीं दुःख को मिटाए बिना। आनन्द की खोज में वह दुःख को भूल जाता है। दुःख के रास्ते पर चलता है और आनन्द की कामना करने लगता है। बीमारी के कारण बने रहें तो स्वास्थ्य की कामना का कोई परिणाम नहीं होता। अतः बुद्ध कहते हैं कि स्वास्थ्य पाना है तो बीमारियों के कारण ढूंढों और उन्हें हटाओ तभी स्वास्थ्य घटेगा। बुद्ध की देशना में सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने कोई सीधे कारण नहीं बताये, इशारे किये और महत्वपूर्ण बात कही- 'अप्प दीपोभाव' अपने दीये स्वयं बनो। उन्होंने कहा- आकाशे च पदं नत्थि, समणों नत्थि बाहरे- आकाश में पथ नहीं होता और जो बाहर की तरफ दौड़ता है वह ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकता। इसीलिये तो बुद्ध के मार्ग में ध्यान पर सबसे अधिक जोर है, होश पर सबसे अधिक जोर है। ध्यान में जितनी निर्विचार की स्थिति आएगी, उतना ही आनद स्पष्ट होने लगेगा। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होगा कि जो सुख, आनन्द संसार में खोजा तो नहीं मिला पर ध्यान के घंटे, आधे घंटे में प्रकाश की छोटी-छोटी किरणों ने जीवन दृष्टि में बदलाव आरम्भ कर दिया। दुःख के कारणों पर दृष्टि पडी तो इलाज आरम्भ हुआ।

दोष युक्त मन
भगवान् बुद्ध ने कहा है- यदि कोई दोष युक्त मन से बोलता है या कर्म करता है तो दुःख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाडी का चक्का खीचने वाले बैलों के पैर का। यदि मन में किसी को दुःख देने का भाव उठता है तो बीज गिर रहा है। बीज बड़ा होकर वृक्ष बनेगा और उस पर फल लगेगा तो भोगना भी उसे ही पडेगा। अक्सर जब दुःख आता है तो व्यक्ति सोचता है कि कोई दूसरा उसके लिए दुःख उत्पन्न कर रहा है- पत्नी, पति, पुत्र, पिता, मित्र, समाज आदि। पर बुद्ध कहते हैं कि दुःख के कारण व्यक्ति के मन में होते हैं, बाहर खोजने गए तो गलती हो गई। वे कहते हैं कि यदि कोई गाली दे तो तुम उसे स्वीकार ही मत करो। दोष उसका है, क्रोध करके तो हम अपने को दंड देते हैं। जब हम किसी चीज को भीतर ले लेते हैं तब ही वह सक्रीय होती है। दूसरे से न लें, भीतर न उतरने दें तो फिर दुःख का कोई कारण नहीं होगा। सारी बात मन की है, उसकी व्याख्या की है, सब इसी पर निर्भर होता है।

इसीलिये बुद्ध कहते हैं कि जितनी हानि द्वेषी की या बैरी बैरी की करता है, उससे अधिक बुराई गलत मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है। वे कहते हैं कि दुश्मन से डरने की जरूरत नहीं है, चित्त से डरना चाहिए क्योंकि गलत दिशा में जाता हुआ चित्त ही हानि पहुंचाता है। ठीक दिशा में जाने वाला चित्त तो मित्र होता है अतः चित्त से सावधान होने की जरूरत है। गलत मार्ग पर ले जाने वाला चित्त व्यक्ति को सब दिशाओं में भटकाता है, स्वयं को भीतर की खोज का साधन नहीं बनने देता, वह स्वयं को अकेला नहीं होने देता। चित्त यदि भीड़ से हट जाए, स्वयं में केन्द्रित हो जाए तो दुःख का कारण ही समाप्त हो जाता है।

सुख, दुःख व्याख्या पर निर्भर
सुख और दुःख देखने पर निर्भर ही, दृष्टि पर निर्भर है। ये सब अपनी व्याख्याएं हैं। एक बात किसी के लिए सुख हो सकती है, वही दूसरे के लिए दुःख की। उसी बात में कोई व्यक्ति निरपेक्ष रह सकता है, न दुःख अनुभव करे, न सुख। यह भी हो सकता है कि जो आज सुख लग रहा है, कल दुःख हो जाए। इसके विपरीत भी हो सकता है। यदि जीवन का ठीक ठीक निरीक्षण हो तो निश्चय ही ज्ञात हो जाता है कि जीवन में जो कुछ भी हम अनुभव करते हैं, दुःख या सुख, सब हमारी व्याख्याए हैं। व्याख्याए बदली नहीं कि जीवन दूसरा हो जाता है। व्याख्याए अपनी है, हर व्यक्ति उसे बदलने में स्वतंत्र है, किसी और का कोई बंधन नहीं है।
भगवान् बुद्ध ने धम्मपद में कहा है ससुखं वत। जीवाम  वेरिनेसू स्वेरिनो। वेरिनेसू मनुस्सेसू विहराम अवेरिनो।। अर्थात वैरियो के बीच अबैरी होकर, अहो हम सुख पूर्वक जीवन बिता रहे हैं। बैरी मनुष्यों के बीच अबीरी होकर हम विहार करते हैं। यह गाथा बुद्ध ने एक विशेष अवसर के कारण कही। इसके पीछे सूत्र के जन्म की कथा है। शाक्य और कोली राजाओं में रोहिणी नामक नदी के पानी को रोक कर दोनों जनपदवासी खेतों की सिंचाई करते थे। एक बार ज्येष्ठ मास में फसलों को सूखते देखकर दोनों जनपदवासी पहले अपने खेतों को सींचना चाहते थे अतः दोनों और के नौकरों में झगडा हो गया। इस झगड़े की खबार दोनों और के मालिकों को मिली तो दोनों सेना को साथ लेकर युद्ध करने को आ गए। भगवान् बुद्ध रोहिणी नदी के तट पर ही ध्यान करते थे। उन्हें जब यह खबर मिली तो वे युद्ध को तत्पर दोनों सेनाओं के मध्य आए।

भगवान्  को देखकर शाक्य और कोलियों ने हथियार फ़ंड कर वन्दना की। भगवान् बुद्ध ने दोनों राजाओं को कहा-यह किस बात का झगड़ा है। राजाओं ने कहा कारण हम नहीं जानते। भगवान ने पूछा, फिर कारण कौन जानता है ? सेनापतियों को शायद पता हो। सेनापतियों ने उपसेनापतियों की और इशारा किया, उपसेनापतियों ने सैनिकों के प्रति और बात फिर नौकरों तक पहुँची। नौकरों ने कहा-भगवान पानी के कारण। बुद्ध ने कहा पानी तो सदा से बहता है, पानी के कारण नहीं हो सकता। नौकरों ने कहा पहले कौन उपयोग करे। बुद्ध ने कहा, पहले के कारण पानी के कारण नहीं।

बुद्ध हँसे। शाक्य व कोलियों के प्रधानों से पूछा पानी का क्या मूल है और मनुष्यों का क्या मूल्य है। उन्होंने कहा, पानी का तो नाम मात्र मूल्य है और मनुष्य अमूल्य है। बुद्ध ने कहा, फिर सोचो, नाम मात्र के मूल्य के लिए अमूल्य को मिटाने चले हो, असार के लिए सार को गंवाते हो।

दृष्टि बदल गयी तो सब बदल गया। व्याख्या बदल गयी तो सब बदल गया।

सुख-दुःख स्वयं के
साधारणतया धारणा यह रहती है की दूसरे दुःख दें रहें हैं। इसका यह भी अर्थ है की दूसरे ही सुख देंगे। बुद्ध के जीवन की एक घटना है। बुद्ध को किसी ने गालियाँ दी। बुद्ध ने कहा तेरी बात पूरी हो गयी हो तो जाऊं। उस व्यक्ति ने कहा, बात नहीं है, हम तो गालियाँ दे रहे हैं। बुद्ध ने कहा, मेरे लिए बात ही है, तुम्हारे लिए गाली होगी। यदि तुम दस साल पहले आते तो यह मेरे लिए गाली थी। अब मैं दूसरों की भूलों के लिए अपने को दंड नहीं देता, दुःख नहीं पाता। गाली दे रहे हो तो तुम जानो, हम बीच में आते ही नहीं। वह व्यक्ति गया पर रात भर नहीं सो सका। वह सुबह माफी माँगने आया। बुद्ध ने कहा, जो हमने ली ही नहीं, उसके लिए क्षमा कैसे करें। तुम जानो, तुम्हारा काम जाने। दुखी होना चाहें तो यह घटना काफी है पर यदि इस पर भी प्रसन्न रहना चाहें, दुखी न हों तो कोई दूसरा बाधा नहीं डाल सकता। सीधा सा अर्थ है कि कोई दूसरा न तो दुःख दे सकता है, न सुख। हम स्वयं अपने मालिक बनें तो कोई दूसरा दुःख दे ही नहीं सकता। दरअसल दूसरे के हाथ में चाबी दे दें, दूसरों के हाथ में खेलें, अपना बटन दूसरों को दबाने दे, तभी दूसरा दुःख दे सकता है।

एक बाहर का पहलवान गाँव में आया। दंगल हुआ गाँव के पहलवान से वह हार गया। लोग उसकी हार पर हंसने लगे, तालियाँ बजाने लगे तो हारा हुआ पहलवान भी जोर-जोर से हंसने लगा। लोगों की हंसी रूक गयी और आश्चर्यचकित हुए कि यह हारा हुआ पहलवान इतना क्यों हंस रहा है। उस पहलवान ने कहा कि हम भी देख रहे हैं, बड़े पहलवान बने फिरते थे, खूब हुई चारों खाने चित्त। वह पहलवान तो था ही, पर उससे ज्यादा उसकी फकीरी थी, मस्ती थी। वह दूसरों के कारण सुखी, दुखी नहीं हुआ, गुलाम नहीं बना।

सुख की आशा से दुःख
दुःख आता है सुख की आशा से। सुख की आशा भी अपने निकटतम से ही होती है। पति से होती है, पत्नी से होती है, पुत्र से होती है। यदि कोई औरत बिना देखे निकल जाए तो दुःख नहीं होता परन्तु यदि पत्नी बिना देखे निकल जाए तो दुःख होता है। यदि किसी का बेटा अपने को सम्मान न दे तो दुःख नहीं होता परन्तु अपना बेटा सम्मान न दे तो दुःख होता है तो बेटा दुःख देता है, पत्नी दुःख देती है, पति दुःख देता है। मित्र दुःख देते हैं अर्थात जो निकट हैं वे दुःख देते हैं क्योंकि जो निकट हैं उनसे उतना ही सुख मिलता है। मिलता तो नहीं है पर आभास होता है। जिससे सुख की आशा की जाती है उसी से दुःख मिलता है।

दुःख अपेक्षा से मिलता है। जितनी बड़ी सुख की उपेक्षा होती है, उतनी ही टूटती है। अपरिचित से उपेक्षा नहीं होती इसलिए दुःख भी नहीं होता, दुःख तो परिचितों से ही मिलता है। यदि उपेक्षा छोड़ दी जाए, सुख न माँगा जाए तो कोई दुःख नहीं होता। न बाहर से सुख आता है, न बाहर से दुःख आता है। दुःख सुख की उपेक्षा का ही परिणाम होता है। लाओत्से ने कहा, मैंने कभी सम्मान चाहा ही नहीं तो मेरा अपमान कैसे हो सकता है।

दुःख से छुटकारा पाने के लिए बुद्ध ने उपेक्षा एक कारगर उपाय बताया है। उपेक्षा का अर्थ है, न दुःख मिलता है, न सुख मिलता है। कोई उपेक्षा नहीं रखी का अर्थ उपेक्षा है। उपेक्षा में जीने वाले को न कोई चीज दुःख दे सकती है और न सुख। यह तो साक्षी भाव से जीता है वह दोनों की समदृष्टि से देखता है।

दुःख न देने तो स्वतः सुख
दुःख मनुष्य का मूल स्वाभाव नहीं है अतः वैसा घटने पर तकलीफ होती है, अच्छा नहीं लगता। यह किसी एक व्यक्ति के साथ नहीं सभी व्यक्तियों के साथ होता है। इसी कारण सभी धर्मों में कहा गया है कि ऐसा कोई व्यव्हार दूसरों के साथ मत करा करो जो स्वयं दूसरे से अपने साथ नहीं चाहो। सीधा सा अर्थ यह है कि ऐसा कोई कार्य मत करो जिससे दूसरे को दुःख पहुंचे। विश्व के सभी प्राणी सुख से रहना चाहते हैं पर साधारण मनुष्य अपने लिए अलग नियम बनाता है और दूसरों के लिए अलग। वह चाहता है कि चाहे सारे संसार को दुःख मिले तो भी मैं सुख चाहूंगा। दूसरे को दुःख देगा अपने सुख के लिए। प्रकृति का नियम है कि जो देंगे वही लौटेगा। अस्तित्व में कोई सीमा नहीं है सभी एक दूसरे से जुड़े हैं पर गहरी दृष्टि नहीं होने पर सभी अलग-अलग लगते हैं। जो किसी को दुःख देगा, दुःख उसी पर लौट आएगा। इसलिए तो सभी वेड कुरआन, बाइबिल, धम्मपद आदि में सभी ने एक ही स्वर्ण नियम दिया है- जो तुम अपने लिए चाहते हो उससे अन्यथा दूसरे के लिए मत करना।

पर मनुष्य का स्वभाव अलग ही है। वह अपने निकटतम व्यक्ति पुत्र, पुत्री या अन्य पर अत्याचार भी करता है तो इस नाम से कि वह उसके भले के लिए कर रहा है। आकान्शाओं से दूसरे का जीवन सुखद नहीं होता पर दुःख पहुंचाया जाता है, सुख का लेबल लगाकर। हिंसा इतनी गहन है कि दूसरे को सुख देने के नाम पर भी कोई सता सकता है, किसी को दुःख दे सकता है। इसी कारण भगवान् बुद्ध ने कहा- अतानं उपमं कत्वा न हत्रेय न घातये। अर्थात अपने सामान ही सबको जानकार न मारे न किसी को मारने की प्रेरणा दें। उन्होंने कहा कि यदि दूसरों को दुःख नहीं दिया तो अपने जीवन में फूल खिलने शुरू हो जाएंगे क्योंकि जीवन ऐसा है कि जो दुःख नहीं देता तो सुख अपने आप हो जाता है।

 दुःख भोगने से सुख का अहसान
भगवान् बुद्ध ने कहा कि जो बाल्यावस्था में ब्रहमचारी का पालन नहीं करते और युवावस्था में धन नहीं कमाते वे वृद्धावस्था में चिंता को प्राप्त होते हैं। बड़ा अजीब लगता है कि बुद्ध कहे कि धन कमाए अर्थात मह्त्वकांशा हो, पद हो, धन एकत्रीटी करें अर्थात जो व्यक्ति है उसको भी इकट्ठा करें। एक यहूदी रबाई से एक गरीब आदमी ने आकर कहा कि मई बहुत दुखी हूँ, मुझे मरने का आशीर्वाद दें। उसने कहा कि जीना नरक हो गया है। एक छोटा सा कमरा है, वर्षा में पानी टपकता है। उसमें ही मैं, मेरी पत्नी, दो बच्चे, मेरी सास और ससुर रहते हैं। उसी में मेरे पिता व मेरी माँ। हिलने डुलने की भी जगह नहीं है, ऊपर से चिडचिडे व क्रोध भरे। नया मकान लेने की भी सामर्थ्य नहीं। नरक है, मरने की आगया दे दें। बूढ़े रबाई ने कहा, तुम्हे रोकूंगा नहीं, केवल सात दिन रूक जाओ। उसने कहा तुम्हारे पास कितने जानवर है. उसने कहा, एक कुत्ता, छह बकरिया, एक गाय और एक बछडा। रबाई ने कहा ऐसा करो कि इन सबको भी कमरे में ले आओ। उस व्यक्ति ने जवाब दिया कि यों ही मरे जा रहे है, इन्हें लेकर तो खड़े रहने की भी जगह नहीं रहेगी। उस रबाई ने कहा, सात ही दिन का मामला है, फिर तुम मर जाना, इतना तो मान लो। सारी जिन्दगी तुमने मेरी बात मानी मरते वक्त तो न टालो। उस व्यक्ति ने कहा कि ऐसे तो सात दिन ज़िंदा ही नहीं रहूँगा। बूढ़े ने कहा कोई चिंता नहीं जब मरना ही है तो मरने की क्या फिकर।

घर जाकर उसने सारी बात बताई। सभी ने विरोध किया। वे भी रबाई के पास गए। रबाई ने कहा कि हाँ मैंने ही कहा है, करने दो। जब रबाई कहता है तो करना पड़ता है। ले लिया सबको अन्दर। सात दिन माह नरक के थे। सात दिन बाद वह व्यक्ति आया। रबाई ने कहा, अब मरने के पहले उन सबको घर के बाहर कर दे। उसने घर के बाहर कर दिया। रबाई ने दो-तीन दिन प्रतीक्षा की। वह आदमी लौटा नहीं तो रबाई उसके घर गया। कहा, क्या मामला है, मरना नहीं है? उसने कहा, कमरा वही है, अब इतनी जगह मालूम होती है, ऐसा आनद कभी जाना भी नहीं था, सब में प्रेम भाव भी बढ़ गया है। अब कौन मरता है, तुम्हारी कृपा है।
दुःख सघन हुआ, फिर अनुभव हुआ सुख की जैसी स्थिति में थे। यहाँ दुःख ने भी दिशा दी, सुख का अहसास कराया। जीवन में दुःख भी जरूरी है, सुख के आभास के लिए।

दुःख का निरोध है
भगवान् जेतवन में ठहरे थे। उनके साथ पांच सौ भिक्षु भी ठहरे थे। व आसंशाला में बैठे रात्री को बाते कर रहे थे। उनकी बात साधारण जनों जैसी थी। भगवान् मौन बैठे उन्हें सुन रहे थे। वे बातों में इतने तल्लीन थे कि भगवान् को भूल ही गए थे। कोई कह रहा था कि अमुख गाँव का मार्ग बड़ा सुन्दर है, अमुक गाँव का मार्ग बड़ा खराब है। अमुख मार्ग पर छायादार वृक्ष है, स्वच्छ सरोवर भी है और अमुक मार्ग बहुत रूखा है, उससे भगवान् बचाए। और कोई कह रहा था कि अमुक राजा भी अद्भुत व नगर सेठ भी अद्भुत बड़ा दानी। फलां नगर का राजा भी कंजूस और नगरसेठ भी कंजूस वहां तो कोई भूल कर पैर नहीं रखे। इस प्रकार की कई बातें हो रही थे। भगवान ने यह सब सुना। चौके भी, हँसे भी। भिक्षुओं को पास बुलाय। उन्हें कहा कि भिक्षु होकर भी बाह्य मार्गों की बात करते हो। समय थोड़ा है और करने को बहुत है। बाह्य मार्गों पर जन्म जन्म भटकते रहे हो, अब भी थके नहीं। अंतर्मार्गों की सोच। सौन्दर्य तो अंतर्मार्गों में है। शरण भी खोजनी हो तो वहा खोजो क्योंकि दुःख निरोध का वही मार्ग है। उन्होंने कहा कि भिक्षुओं मग्गानुट्ठगिको सेट्टो-यदि श्रेष्ठ मार्ग की बात करनी है तो आर्य अष्टान्गिक मार्ग की बात करो। यह तुम किन मार्गों की बात करते हो। तब उन्होंने गाथा कही उर कहा कि भीतर आने के बहुत मार्गों में आठ अंगों वाला मार्ग श्रेष्ठ है।

भगवान् बुद्ध ने दुःख निरोध के आठ सूत्र दिए। पहला, सम्यक दृष्टि अर्था जैसा है, वैसा ही देखना अपनी धारणाओं को बीच में लाकर नहीं देखना। आँख निर्दोष हो जैसे दर्पण खाली हो। यदि दर्पण पर धुल पडी हो कोई रंग लगा हो कोई पक्ष पडा हो तो जैसा सत्य है, वैसा दिखाई नहीं पड़ता। सम्यक दृष्टि का अर्थ है सभी दृष्टियों से मुखत निष्पक्ष।

दूसरा सूत्र सम्यक संकल्प। इसका अर्थ है कि जो करने योग्य है वह करना और उस पर पूरा जीवन लगा देना। करना किसी अहंकार के कारण न हो, वही सम्यक संकल्प। ऐसा संकल्प जो बोध से हो, जीवन की प्रौढ़ता से हो, क्षणिक उत्साह, लोग क्या कहेंगे इस भावना से न हों। जिसमें बाहरी उत्साह नहीं हो आतंरिक उत्साह हो।

तीसरा है सम्यक वाणी-जैसा है वैसा ही करना। अपनी मिलाकर, बदल कर नहीं. ऐसा नहीं कि भीतर कुछ है और बाहर कुछ। वाणी में ह्रदय की सही अवस्था प्रकट हो। जो बोलना है, वही बोले, असार न बोले जितनी आवश्यकता हो जिसके बिना का चले। अधिक बोलने से बड़ी दिक्कते होती है, जीवन व्यर्थ के जाल में फंस जाता है।

चौथा है सम्यक कर्मात अर्थात वही करना जो ह्रदय करने को कहे। ऐसा नहीं कि कोई खे वैसा कर दें। करें वही जो स्वयं को करने योग्य लगे। व्यर्थ काम नहीं, वही काम जिससे जीवन का सार मिले। व्यस्त रहना, कुछ न कुछ करते रहना जरूरी नहीं है। करना वही जो जरूरी हो, उसी को बुद्ध सम्यक कर्म कहते हैं।

पांचवा सम्यक आजीव। आजीव का अर्थ आजीविका से है। रोटी तो कमानी ही है पर आजीविका सम्यक हो, विध्वंसात्मक न होकर सृजनात्मक हो और जीवन को परमात्मा की तरफ ले जाने वाली हो। बुद्ध कहते है कि अपने जीने के लिए किसी का जीवन नष्ट करना अनुचित है। आजीविका ऐसी हो जिससे किसी का अहित न होता हो। यदि कोई दूसरे का अहित करता है तो वह अपने ही अहित के बीज बोता है।

छठा है सम्यक व्यायाम। यहाँ व्यायाम का अर्थ श्रम से समयक श्रम न तो आलस्य और न ही अति कर्मठता है जहाँ दौड रुके ही नहीं। दोनों का मध्य मार्ग है समयक व्यायाम, जहाँ जीवन की ऊर्जा संतुलित हो।

सांतवा सूत्र है सम्यक समाधि अर्थात मन बंद हो जाए और होश भी बना रहे। असली बात जाग्रत रह कर आनंद को उपलब्ध होना, उसीक ओ बुद्ध ने सम्यक समाधि कहा है। अंतिम दो चरण सर्वाधिक महत्व है। सम्यक स्मृति परिधि पर और सम्यक समाधि केंद्र पर। परिधि पर होश हो और फिर केंद्र में भी होश की ज्योति जले तो ही सम्यक समाधि।

दुःख निरोध की अवस्था
जब इस बात का अहसास हो गया कि जब जीवन है तो दुख अवश्यम्मभावी है, फ़िर कारण पर विचार किया और उन कारणों को दूर करने के लिये आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण कर सातवें-आठवें सूत्र तक पहुंचे तो निदान हो गया, उपाय हो गया कारण मिट गये, तब चौथा आर्य सत्य सुख की अवस्था आ गई। इसे निर्वाण की अवस्था महासुख की अवस्था कुछ भी कहा जा सकता है। इस अवस्था में आने पर मनुष्य की सभी तृष्णाएं समाप्त हो जाती हैं तो फ़िर उसका वापिस जन्म लेकर इस संसार में वापिस आने का कोई कारण नहीं रह जाता। जैसे ही दुख समाप्त हुए, संसार की यात्रा समाप्त हो गई। फ़िर यह व्यक्ति का आखिरी पडाव रह। एक बार दुख निरोध की अवस्था या महासुख को उपलब्ध करने पर शरीर छोडने के उपरान्त वह वापिस नहीं लौटता। ज्योति में ज्योति मिल जाती है। अन्य शब्दों में वही तो निर्वाण है, यही तो फ़िर मोक्ष है। जब ज्योति में ज्योति विलुप्त हो गई तो सूक्ष्म शरीर में समाहित इच्छाएं, तृष्णाएं, अहंकार, अस्मिता आदि जो पुनर्जन्म लेने का कारण बनती है, वे ही नहीं रहती तो वह आत्मा भैतिक शरीर के समाप्त होने के बाद आवागमन से मुक्त हो जाती है। भारतीय अध्यात्म में इस महासुख से बढकर जीवन की अन्य कोई उपलब्धि नहीं मानी गई है। इस चार आर्यसत्यों के माध्यम से भगवान बुद्ध ने व्यक्ति को चरम सीमा तक पहुंचने का मार्ग बताया है।

अप्प दीपो भव
भगवान बुद्ध ने अपनी देशना में मानने पर कत्तई जोर नहीं दिया, जोर दिया अनुभव कर स्वयं जानने पर। जीवन का सत्य बताया, रोग का इलाज दिया जिसे लेकर गूंगे के गुड की तरह अनगिनत लोग दुखों से मुक्त हुए, महासुख की अवस्था प्राप्त की। उनके बताए मार्ग को समझने, ह्रदयगम करें, उस पर चले तो बुद्ध की तरह कोई भी व्यक्ति उस स्थिति को पा सकता है। उन्हें महामानव, भगवान, अलौकिक शक्तियों से युक्त बताकर अपने को असमर्थ मानें तो हम अपने को धोखा देते हुए मनुश्य की गरिमा को ही कम करते हैं जिसे बुद्ध ने जीवन को सार्थक बनाने के लिये अप्प दीपो भव की देशना देकर शिखर पर पहुंचाया है। यह जन्म तो अनन्त जन्मों में आगे की एक कडी है। यात्रा यदि चालू रहे, कदम बढते रहें, दिशा यदि सही संकल्प और होश बढाने की है, हर मनुष्य को अपने भीतर छिपी दिव्यता को पहचानने और सही दिशा में चलने की है। भगवान बुद्ध ने तो मानव मात्र के कल्याण के लिये जीवन के सत्य उदघाटित किये हैं। 

07 नवंबर 2011

इंटरव्यू में आत्मविश्वास से काम लें

किसी इंटरव्यू से पहले के कई क्षण कभी-कभी इतने कठिन महसूस होते है कि अक्सर लोगों को दोबारा इंटरव्यू  के नाम से ही डर लगने लगता है। इंटरव्यू के बारे में सुनते ही लगता है मानो कोई अभी आयेगा और हमें  निगल जायेंगा। इस डर का असर आपके परफार्मन्स पर भी पडता हैं। सबसे ज्यादा डर इस बात का लगता है कि वो कौन से सवाल पूछेंगें? क्या मैने पूरी तैयारी कर ली है? क्या ऐसे सवाल भी पूछे जायेंगें जिसका मेरे काम के साथ कोई संबध नहीं होगा? ...लेकिन यह सब इतना मुश्किल भी नही है, जितना हम समझते हैं.. इंटरव्यू को एक खुशनुमा अनुभव भी बनाया जा सकता है।

जानें इंटरव्यू बोर्ड को
'इंटरव्यू बोर्ड' जिसका परिचय अब तक आपको मिल चुका है, उसकी बात करते हैं... इंटरव्यू बोर्ड मे कभी एक या कभी उससे अधिक लोग हो सकते हैं, लेकिन समझने वाली बात यह है कि हम एक समय में सिर्फ एक से बात कर रहे होते हैं। लिहाजा यह जरूरी है कि उस वक्त उसी पर गौर करें, हालांकि बाकी सभी पर भी आपकी नज़र दौडती रहनी चाहिये। भले ही 'बोर्ड' में कई सदस्य हों, सब का एक ही मकसद होता है... सबसे अच्छे उम्मीदवार का चुनाव।

सवाल-जवाब का सिलसिला
इंटरव्यू बोर्ड के सदस्य अपने डिपार्टमेंट या विभाग की ज़रूरत को ध्यान मे रखकर सवाल पूछते हैं। इंटरव्यू केवल सवाल-जवाब का एक सिलसिला नहीं है। यह उम्मीदवार को कंपनी के बारे में और कंपनी को उम्मीदवार के बारे में जानने का पहला ज़रिया भी है। आमतौर परइंटरव्यू काफी औपचारिक माहौल मे होते हैं। लेकिन इसमे भी बदलाव आ रहा है। शायद आपने भी सुना होगा कि कई लोग जो इंटरव्यू मे चुने नही जाते है, कहते हैं,  "इंटरव्यू का अनुभव अच्छा रहा..." यह तब होता है जब इंटरव्यू मे हुई बातचीत तनावपूर्ण माहौल मे ना हुई हो। वैसे यह हमारे हाथ मे तो नही है..तो फिर क्या है हमारे हाथ में?

कहां से लाएं आत्मविश्वास?
आत्मविश्वास..आप कहेंगें कहनातो  आसान है पर ऐन वक्त पर सारा आत्मविश्वास कहीं गायब हो जाता है... हाथ-पैर काँपने लगते हैं। गला सूख जाता है। आत्मविश्वास जन्म से किसी मे नहीं होता है। इसे पैदा किया जाता है। इसका प्रदर्शन अक्सर जीत की वजह होती है। आत्मविश्वास अपने विषय मे निपुणता के कारण आ सकता है, या फिर पहले के इंटरव्यूज़ के अनुभव से या फिर सबसे अच्छा तरीका है खुद से... जी हां, अपने-आप से अपने अंदर से जो विश्वास आता है ...वही सच्चा आत्मविशवास होता है।

कुछ सुझाव
वैसे तो किताबें पढ़कर, लोगों से बातें करके, टीवी या फिल्में देखकर अपने विचारो का आदान-प्रदान करके आत्मविश्वास पैदा किया जा सकता है, लेकिन सबसे ज़रूरी है अपने अंदर के डर को भगाना। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार एक बहुत अच्छा तरीका है आईने के सामने खडे होकर खुद से बातें करना। किसी भी विषय पर। सुनने में अजीब लग सकता है। एक बार कोशिश कर के देखिये आपको अपने आत्मविशवास मे खुद फर्क नज़र आयेगा।