27 सितंबर 2011

तोड़ना

बडे भाई के रोएं खडे हो गए थे। चेहरे पर डर, असमंजस और अनिर्णय के ऐसे मिले-जुले भाव थे, जैसे उसके सामने ही किसी की हत्या कर दी गई हो। कुछ मिनटो तक वह वैसे ही सन्न खडा रहा, जैसे निर्णय नही कर पा रहा हो कि क्या किया जाए। फिर उसके चेहरे की भंगिमा बदलती गई। अब वहां जो कुछ हुआ, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसा की चाहना थी। उसकी आंखो मे लाल डोरे उभर आए थे। होठ फडक रहे थे। मै समझ गया कि क्या होगा। हुआ वही। उसने अपने दाएं हाथ से मेरे केशो को पकडा और उसका बायां हाथ तडातड मेरे गालो पर पडने लगा। फिर उसने ढकेल कर मुझे जमीन पर गिरा दिया। मैने भी एक-दो हाथ चलाए थे, लेकिन भाई ने उसे अपने मजबूत हाथो के ढाल से बेअसर कर दिया था। अंतत: मै जमीन पर पडा-पडा गालियां बकने लगा। उसने मेरी गालियो को अनसुना कर दिया और पास ही जमीन पर पडी उस मूर्ति को उठाकर देखने लगा। उसके चेहरे पर असीम पीडा का भाव छा गया। जैसे अपने बच्चे की लाश देख रहा हो। उस कछुए की गर्दन टूट कर एक किनारे शांत पडी हुई थी। काली स्याही से रंगी पीठ भी जगह-जगह से फट गई थी और अब पीली मिट्टी साफ दिख रही थी। जैसे रेगिस्तान मे खडे आदमी का भ्रम टूटा हो, जादूगर का जादू खत्म हो गया हो। मुझे लगा भाई रो पडेगा, लेकिन वह रोया नही। बस सुन्न-सा उस टूटी मूर्ति को कुछ देर निहारने के बाद धीरे से वही पटक दिया। आखिर मैने इसे बनाया ही क्यो था..? उसके मुंह से एक आह फूटी थी। वह तेज कदमो से चलता हुआ गैरेज से निकला और घर की ओर बढ गया। धीरे-धीरे अपने हाथ-पैर और कपडो मे लगी धूल झाडता हुआ मै उठ खडा हुआ। इस पंद्रह मिनट के अंतराल मे जो कुछ हुआ था तीन दिन पहले तक हम उसकी कल्पना भी नही कर सकते थे। सब कुछ कितना अप्रत्याशित था। भाई का मुझे डांटना, उसका दुखी होना..। 

अब मुझे दुख हो रहा था। भाई की आह मेरे आसपास चक्कर काट रही थी। उस आह को मै अपने अगल-बगल ढूंढने लगा, लेकिन वह नही मिली। कुछ क्षण के बाद मैने अपने से तीन चार फर्लाग दूर उस टूटी हुई मूर्ति पर नजर दौडाई, तो देखा- वह आह वहां जा चिपकी थी। मै समझ नही पा रहा था कि अचानक मेरे भीतर वह कौन-सा तूफान उठ खडा हुआ था। एक ऐसा आवेग, जिसे रोक पाना किसी भी हालत मे संभव न था। शायद वह आत्मीयता की शक्ति थी, अपने बेकाम होने की कुंठा थी। मैने रचने की कोशिश की थी, लेकिन रच नही पाया था इसलिए दूसरे की रचना नष्ट कर उसे अपने समानांतर खडा करने की दुष्ट कोशिश की थी।

पास के बाजार मे सडक किनारे फुटपाथ पर दशहरा और दीपावली मे ढेर सारे रंग-बिरंगे खिलौने बिकने के लिए आते थे। न जाने क्यो इन मूर्तियो को देखकर मेरा मन सतयुग की अतल-असीम गहराइयो मे डूबने उतराने- लगता है। मां और दादी से सुनी रामायण की अनंत कहानियों से अहिल्या का कल्पित चेहरा झांकने लगता है, जो रामजी के पांवो से ठोकर खाकर जीती-जागती स्त्री बन गई थी। निर्जीव से सजीव हो उठी थी। उन दिनो हमे सचमुच यह विश्वास नही हो पाता कि बेरूप की मिट्टी से भी इतने सुंदर रूपाकार गढे जा सकते है। गांव मे मैने कुम्हारो को देखा था और यहां बसंत-पंचमी के पहले ज्ञान और विद्या की आराध्यदेवी मां सरस्वती की मूर्तियां बनाने वाले कारीगरो को भी। यह देखकर हैरानी होती है कि उनके चेहरे, वेशभूषा आदि एक ही जैसे होते है। कडी, धनी, धनुषाकार मूछे, सांवला चेहरा, चौकन्नी आंखे, चेहरे पर चेचक के दाग और पुरानी धोती-कुरते मे लिपटी नाटी काया। मै अक्सर सोचता, भले ये कुरूप होते है, लेकिन इनके अंतर मे जरूर कोई ऐसी सुंदरता या दैवी शक्ति होती है, जिस कारण यह मिट्टी से इतने सुंदर और सजीव रूपाकार गढ लेते है। हमारे घर से तीस-चालीस फर्लाग की दूरी पर पीली चिकनी मिट्टी का एक ढेर था, जिसे हम मिट्टी की पहाडी कहते थे। दीवाली के घरौदे बनाने के लिए हम कई बार यही से मिट्टी खोद कर ले गए थे। 


गर्मियो के दिन थे। दोपहर को चारो ओर उमस और एक अजीब-सी मनहूसियत छायी रहती। हम घरो मे दुबके होते और बाहर सायं-सायं करती लू चलती रहती। एक दिन दोपहर जब गर्मी और उमस उतनी ही थी, वैसी ही धूल उडाती लू चल रही थी, हम दोनो भाई एक पुराना थैला लिए उस मिट्टी की पहाडी की ओर जा रहे थे। हमने मिट्टी खोदी और थैला भरकर गैरेज मे आ गए। बडे भाई की सक्रियता बढी। वह कही से ढूंढकर टीन का एक डब्बा ले आया और थैले की सारी मिट्टी उसमे उलट दी। फिर उसने मुझे एक पुराना प्लास्टिक का मग देकर उसमे पानी भर लाने को कहा। जब मै मग मे पानी भरकर लाया तो टीन मे मिट्टी के अनुपात मे पानी डालकर वह उसे तन्मयता से आटा जैसा गूंधने लगा। जब मिट्टी और पानी पूरी तरह एक-दूसरे मे मिल गए, तो मै दंग रह गया। मिट्टी पानी से ज्यादा चिपचिपा न होकर गुंधे हुए आटे की तरह ठोस हो गया था। इतना सही अंदाजा। मै सोच भी नही सकता था। मैने भाई के चेहरे को देखा। भाई का रंग सांवला था। माथे के ऊपर केशो से पसीने की मोटी-मोटी बूंदे कान और गालो पर टपक रही थीं। मुझे उसका चेहरा उन्ही कुम्हारो और कारीगरो जैसा लगा, जो मेरे लिए हमेशा रहस्य और जुगुप्सा का विषय रहे है। मै कभी उसका चेहरा, कभी मिट्टी पर घूमते उनके हाथो को देखता रहा। उसने मिट्टी का एक बडा-सा गोला बनाया और उसके अगले भाग पर दाएं हाथ की उंगलियो से हल्का-हल्का जोर देकर डंडा जैसे आकार निकालने लगा। फिर उस गोले को धीरे-धीरे दबाकर बहुत बारीकी से फैलाने लगा। अब वह गोला एक स्पष्ट आकृति ग्रहण करने लगा था। थोडी देर और लगे रहने के बाद भाई ने उस गोले को कछुए की देह और उस डंडे को उसकी गर्दन का आकार दे दिया। आंखो की जगह उसने दोनो तरफ दो गोल-छोटे चमचमाते हुए शीशे लाग दिए और गर्दन के नीचे और पीछे वैसे ही खीचकर चार टांगे बना दीं।

सात अनमोल जीवन उपयोगी प्रेरणाएं

1.  त्याग से शांति व पवित्रता जीवन में आती है, ग्रहण करने से अशांति व अपवित्रता का आगमन होता है।
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2.  अपने हित-पूर्ती में क्रियारह रहना दानवता है, व सभी जीवों के कल्याण हेतु प्रयासरत रहना मानवता है।
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3.  विनयशीलता महान लोगों का गुण होता है, निरंकुश व्यवहार चेतन शून्य व अविवेकी व्यक्तियों का लक्षण होता है।
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4.  ईश्वर के लिए किया गया एक पल का प्रयास भी समय आने पर सार्थक व सफल परिणाम लाता है।
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5.  हमारे पास ईश्वरीय अनुग्रह से जो भी सामर्थ्य है, वह सभी के हित में बांटने के लिए है, हमें उस पर अपना एकाधिकार नहीं ज़माना चाहिए उसको अपने लिए ही संचित करके नहीं रखना चाहिए।
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6.  कामनाओं व वासनाओं की पूर्ती में लगा जीव विषय वासनाओं का गुलाम हो जाता है परिणामस्वरूप जीवन-भर दुखी जीवन जीने को मजबूर होता है।
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7.  कागज़ के नोट धन है तो भगवान् का भजन परमधन है अतः भागवत शरणागति में समर्पित होना चाहिए। इसी में परम लाभ की प्राप्ति संभव है।

25 सितंबर 2011

निवेश एक नहीं कई जगह

आज रिश्ते से ऊपर पैसे की अहमियत हो गई है, तो बचत भी बहुत जरूरी है। जब बात महिलाओं की आती है तो अब वें आर्थिक तौर पर अब किसी पर निर्भर नहीं रहीं, खुद कमाने, खुद खर्च करने के लिए स्वतंत्र हैं। आमतौर पर कहा जाता है कि महिलाएं बहुत खर्चीली होती हैं लेकिन अब जब उन्हें आफ़िसों में दिनरात खटना पडता है, कडी मेहनत करनी पडती है तो पैसे की वैल्यू वे भी अच्छी तरह जानती हैं। आज लोगों को कमाई के साथसाथ अपनी बचत का निवेश कई जगह करना चाहिए, ताकि वे अपना और परिवार का भविष्य सुरक्शित तथा चिंतारहित बना सकें। निवेश के लिए कई फ़ैक्टर हैं। आप अविवाहित हैं या विवाहित, बच्चे और आश्रित कितने हैं, इन सब बातों को देखते हुए निवेश की प्लानिंग करनी चाहिए। सब से मह्त्वपूर्ण बात यह है कि आप केवल एक ही जगह नहीं, कई जगह निवेश करें ताकि कम से कम आप अपना और परिवार का भविष्य सुरक्षित बना सकें।

पी.पी.एफ़., पी.एफ़.(लौंग टर्म निवेश)
आप चाहे वेतनभोगी हों या बिजनेसमैन, अपनी बचत का करीब 25% लौंग टर्म योजनाओं में निवेश कर सकते हैं। दीर्घकालीन निवेश में पब्लिक प्रोविडेंट फ़ंड, प्रोविडेंट फ़ंड और लाइफ़ इंश्योरेंस में 15 से 25 साल तक का निवेश किया जाना चाहिए।
पी.पी.एफ़. और पी.एफ़. योजनाओं में मौजूदा समय में 8% वार्षिक रिटर्न मिल रहा है।

एल.आई.सी.
एल.आई.सी. में भी कई स्कीमें हैं। इन में बीमारी, एक्सीडेंट, लोन सुविधा कवर होने के साथसाथ परिपक्वता में मोटी राशि मिल जाती है। एल.आई.सी. में 5 से 7% रिटर्न मिलता है। यह सेल्फ़ इनवेस्टमेंट है। इस से आप खुद और आप की फ़ैमिली सुरक्षित रह्ती है। परिवार पर दवाब नहीं पडता। मुसीबत के समय बच्चों की पढाई, बीमारी, विवाह जैसे काम रूकते नहीं।

इक्विटी [शेयर मार्केट]
इस के बाद अगर आप के पास सरप्लस मनी बचती है तो हाई रिस्क और हाई रिटर्न के लिए इक्विटी सेक्टर यानी शेयर मार्केट है। जहां आप के धन में गुणात्मक बढोतरी होती रह्ती है। लेकिन इस में रिस्क को ध्यान में रखना होगा।
इस में फ़ंडामेंटल स्ट्रोंग कंपनियां हैं जैसे बैंकिग सेक्टर, पावर सेक्टर, आई.टी. सेक्टर, आटो सेक्टर, मेटल सेक्टर, टेक्सटाइल, इंफ़्रास्ट्रक्चर सेक्टर आदि।
बैंकिग में सब से पौपुलर और विश्वसनीय है एस.बी.आई., एच.डी.एफ़.सी., आई.सी.आई.सी.आई., आई.डी.बी.आई. आदि।
पावर सेक्टर में एन.टी.पी.सी. यह पब्लिक के लिए सब से भरोसेमंद है।
आई.टी. में इनफ़ोसिस, विप्रो, टी.सी.एस. प्रमुख हैं।
मेटल में हिंडालको, सेल, टिस्को हैं।
आटो सेक्टर में मारूति, हीरो होंडा मह्त्वपूर्ण हैं।
टेक्सटाइल में रिलायंस इंडस्ट्रीज, ग्रासिम आदि तथा इंफ़्रास्ट्रक्चर सेक्टर में डी.एल.एफ़., यूनिटेक का नाम आता है।

गोल्ड में निवेश
आप गोल्ड, सिल्वर आदि में निवेश कर सकते हैं। लेकिन इस में अधिक नहीं, क्योंकि एक हद से अधिक फ़ायदा इस में नहीं मिलता। इस में अपनी बचत का 15 से 25% ही निवेश करें तो ज्यादा ठीक रहेगा। सोनेचांदी जैसी धातुओं में उतारचढाव चलता रहता है।

एन.एस.सी. में निवेश
एन.एस.सी. एक लौंग टर्म व सेफ़ निवेश योजना है। यह भी आप के लिए फ़ायदेमंद रहेगी।

प्रौपर्टी में निवेश
अपनी बचत के हिसाब से प्रौपर्टी में भी निवेश किया जा सकता है। अगर इक्विटी में आप को अच्छा प्रोफ़िट मिलता है तो उस हिस्से को डाइवर्ट कर के रीयल एस्टेट में ट्रांसफ़र कर देना चाहिए।
मान लीजिए आप ने इक्विटी में 15 हजार रूपय लगा रखे हैं और 2-3 साल में वह 15 गुना हो जाता है। यह राशि दोढाई लाख हो जाती है तो उसे रीयल एस्टेट में शिफ़्ट कर देना समझदारी है। अन्यथा क्या पता आप की यह राशि दोढाई लाख से कब 5-10 हजार रूपय पर आ लुढके।

म्यूचुअल फ़ंड

यह सिस्टेमैटिकल इनवेस्टमेंट प्लान है। इस में इनवेस्टर पैसा डायरेक्ट न लगा कर फ़ंड मैनेजर के माध्यम से लगाता है। इस में आप हर महीने अपनी सेविंग के हिसाब से धन लगा सकते हैं। इस में 15 से 20% रिटर्न मिल जाता है। यह मार्केट कंडीशन पर निर्भर करता है। यह भी रिस्की है।
इस के अलावा आर.डी. अकाउंट में भी निवेश किया जा सकता है।
एक खास बात और जरूरी है, वह है आप को कुछ प्रतिशत लिक्विडिटी के लिए सेविंग अकाउंट में इमरजेंसी के लिए रखना चाहिए, यह बचत आप किसी भी वक्त जरूरी काम पडने पर निकाल सकतें हैं।
इस तरह 3-4 या सुविधा के अनुसार ज्यादा योजनओं में डिवाइड कर के निवेश किया जा सकता है। आप को पोर्टफ़िलियो बना कर निवेश करना चाहिए।

24 सितंबर 2011

विश्वास आत्मा का धर्म है


वेदान्त आश्रम में प्रवचन सुनाते हुए स्वामी देवेंद्रानन्दगिरी ने कहा कि शिव साक्षात विश्वास का स्वरूप है और पार्वती श्रद्धा है। सवाल यह है कि श्रद्धा और विश्वास में क्या अंतर है।

सामान्य लोगों की नजर में दोनों शब्द समान है परन्तु संतों की नजर में दोनों शब्दों में अंतर है। विश्वास आत्मा का धर्म है और स्थिर रहता है। जबकि किसी व्यक्ति के कमरें को देखकर उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है जो की समय के साथ घटती-बढती रहती है।

स्वामी जी ने श्रद्धा व विश्वास के बारे में श्रद्धालुओं को विस्तार से समझाते हुए कहा कि कई बार हम कहते हैं कि मुझे इस व्यक्ति में श्रद्धा है और कई बार कहते हैं कि मुझे फलां व्यक्ति में विश्वास है। हमें इन दोनों बातों में कुछ फर्क महसूस नही होता है मगर असल में इनमें अंतर होता है। हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव अजन्मे हैं और विश्वास का भी जन्म नही होता है। इस प्रकार विश्वास व भगवान शंकर में एकरूपता है यानी विश्वास ही भगवान शंकर है। विश्वास आत्मा का धर्म है। परन्तु श्रद्धा पार्वती है।

पार्वती को हिमालय के यहां प्रकट होना था तो श्रद्धा को उत्पन्न करना पडता है। विश्वास सहज धर्म है। बालक जन्म से कुछ नहीं सीखता है फिर भी विश्वास है कि यह मेरी मां है जबकि श्रद्धा अनुभव से उत्पन्न होती है। विश्वास का एक रूप होता है यानी ये मेरे पिता हैं तो हैं यह विश्वास का एक निश्चित रूप है, जबकि श्रद्धा बढती-घटती रहती है अर्थात आज जिसे हम अपना हितैषी मानते है कल वह हमारा दुश्मन भी हो सकता है। उसके द्वारा किये गए कमरें से उसके प्रति हमारी श्रद्धा कम व ज्यादा हो सकती है, यानी किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा अनुभव से घट-बढ सकती है। विश्वास स्थिर होता है। जबकि श्रद्धा घूमती-फिरती रहती है।

उन्होंने कहा कि विश्वास कभी अंधा नहीं होता पर श्रद्धा अंधी होती है। श्रद्धा टूटे तो दुख ज्यादा नहीं होता है विश्वास टूटे तो अधिक दुख होता है। इसलिए श्रद्धा और विश्वास के बीच में संतों के मतानुसार बुनियादी अंतर है। श्रद्धा न हो तो विश्वास व्यर्थ है। विश्वास न हो तो श्रद्धा को भटकना पडता है। अत:साधक को विश्वास और श्रद्धा का समन्वय बांधना होगा।

भय मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु


शिव मंदिर में पंडित जय भगवान कसारियाने प्रवचन करते हुए कहा कि भय मनुष्य का सबसे बडा शत्रु है। यदि इसे अधिक बढने दिया जाता है तो हमारी आत्म संरक्षण की मूल प्रवृति की ही आघात पहुंचाने लगता है।

किंतु यह भी सत्य है कि मनुष्य में कहीं न कहीं भय का तत्व रहता ही है जिसके कारण मनुष्य अपने जीवन की सुख सुविधाओं का पूर्णरूप से आनन्द नहीं ले पाता है।

पंडित जी ने कहा कि मनुष्य को स्वयं को भय मुक्त करने के लिए प्रभु की शरण में ध्यान लगाना चाहिए। जो इंसान सांसारिक व्यसनों में उलझा रहता है उसे अनेक प्रश्न परेशान करते हैं। ये प्रश्न उस समय उसके समक्ष गंभीर रूप से आते हैं जब वह अस्वस्थ होता है या सामान्य जीवन की सुख सुविधाओं से वंचित हो जाता है अथवा उसके साथ कोई वैयक्तिक दुर्घटना हो जाती है। ऐसी स्थितियों में वह स्वयं से पूछता है मैं यहां क्यों हूं मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है मैं कहां से आया हूं मैं कहां जाऊंगा ये सब सांस्कृतिक प्रश्न नहीं है। ये प्रत्येक मनुष्य के मन में स्वाभाविक रूप से उठने वाले प्रश्न है। ये प्रश्न उस समय विशेष रूप से उठते है जब मनुष्य अपने जीवन का विश्लेषण प्रारंभ करता है।

बिना इन प्रश्नों के उत्तर पाये केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के आधार पर जीवन का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है। उदाहरण के लिए सुख प्राप्ति के अनेक प्रयासों के बाद भी मनुष्य अपने दुख का कारण नही जान पाता है। जैसे पति-पत्‍ि‌न समाज में साथ रहते हैं, एक दूसरे को चाहते हैं परस्पर ईमानदार रहते है तथा अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते है फिर भी वे पूर्णरूप से संतुष्ट नहीं रहते है। इसका मुख्य कारण है कि वे जीवन के इस दुख का कारण अवश्य अनुभव कर लें, जिससे अचेतन मन समस्याएं न उत्पन्न करे यदि कोई व्यक्ति यह जान ले कि वह कहां से आया है क्यों आया है तथा उसे मृत्यु का कोई भय न हो तो वह इंद्रि के स्तर पर भी आनन्द लेगा। सामान्यता लोग आनन्द का वास्तविक उपभोग नहीं कर पाते हैं क्योंकि वे अनेक प्रकार के भयों से आक्रांत रहते हैं। यह भय ही इंसान का सबसे बडा शत्रु है। इस भय के कारण ही मनुष्य जीवन का वास्तविक आनन्द नही ले पाता है।

उन्होंने कहा कि यह भी सच्चाई है कि आंतरिक और वाह्य आनंद का उपभोग केवल भय मुक्त अवस्था में ही संभव है। भय मनुष्य जीवन के सुख में सबसे बडी बाधा है। केवल निर्भीक मनुष्य ही जीवन का वास्तविक आनन्द उठा सकता है। लेकिन यह निर्भीकता भावुकतापूर्ण या अज्ञानजन्यनहीं होनी चाहिए।

मास्टर जी


मास्टर जी का असली नाम क्या था वे कहां के रहने वाले थे वे कब उस गांव में आये यह बहुत कम ही लोग जानते थे, सारा गांव उन्हें मास्टर जी के नाम से ही जानता था। कारण यह था कि मास्टर जी ने उस गांव की दो तीन पीढियों को पढाया था, इसलिये वे बच्चों से लेकर उनके पिताओं तक के लिये भी मास्टर जी ही थे। उनके विषय में गांव में लोगों के अलग-अलग विचार थे कोई उन्हें पागल कहता था तो कोई जीनियस, लेकिन उससे मास्टर जी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पडता था। छठवें दशक में नौकरी के प्रारंभिक दिनों में जब मास्टर जी अवध के उस पिछडे गांव में प्रायमरी स्कूल के प्रधान अध्यापक बनकर पहुंचे तो वह गांव उन्हें इतना भाया कि वे वहीं के होकर रह गये। लेकिन पहले दिन जब वे स्कूल पढाने पहुंचे तो वहां की दशा देखकर उनका दिल भर आया, एक मडैया के सामने महुये के पेड के नीचे बिछी बोरियों पर आडे तिरछे बस्ते पडे हुए थे और बच्चों का एक झुंड कुछ दूर पर मनोयोग से कबड्डी खेलने में लीन था। मास्टर जी को देखकर झुंड में हलचल मच गई और सब चिडियों की तरह फुर्र से उड कर अपनी सीट पर आ डटे। सरकारी टाटपट्टी और मेज कुर्सी के बारे में पूछने पर पता चला वो सब परधान के घर की शोभा बढा रही थीं। मास्टर जी ने पढाई कराने से पहले बच्चों को लगाकर महुये के पेड से गिरी पत्तियां बिनवाई और मडैया के सामने की सफाई कराई। स्कूल के इतिहास में पहली बार प्रार्थना जैसी दुर्लभ चीज गाई गई- हे प्रभो आनन्द दाता, और फिर मास्टर जी ने खटिया पर बैठकर पढाना शुरू किया।

   कुछ दिन तो मास्टर जी खामोश रहे फिर वे धीरे-धीरे अपने रंग में आने लगे बच्चों को सख्त हिदायत दी गई कि खडिया से तख्ती पोतकर स्याही से लिखने के बजाय घर के दिये में जो कालिख होती है उससे तख्ती पोती जाय और दावात में खडिया घोलकर लिखा जाये तो खडिया की बरबादी नहीं होगी। पढने में कमजोर बच्चों को फैशन में देखकर मास्टर जी फौरन दहाड लगाते, क्यों रे जितना टाइम बाल की पाटी बनाने में लगाया उतनी देर में तो एक हिसाब हल हो सकता था। हिसाब की बात पर ध्यान आया कि हिसाब में मास्टर जी का कोई जोड नहीं था पाइथागोरस की तरह गणित सिखाने के उनके अपने सिद्धांत थे। उनके अनुसार गणित बिना मार खाये आ ही नहीं सकती। इसलिए वे बच्चों को गणित में पारंगत करने के लिये एक गीली नीम का गोदा हमेशा अपने साथ रखते थे, जिसका नाम उन्होंने रख छोडा था समझावनदास। समझावनदास मास्टर जी को बहुत प्रिय थे और उनका इस्तेमाल बच्चों का दिमाग तेज करने के लिये दिन में कई बार अक्सर किया जाता था। मास्टर जी के छात्र उनसे बाघ की तरह डरते थे जिसमें निर्विवाद रूप से उनके सोटे का खासा योगदान था। लेकिन वे उनकी इज्जत भी करते थे क्योंकि मास्टर जी धुनाई और पढाई दोनों ही निष्काम भाव से करते थे।

   मास्टर जी के पढाने का ढंग भी निराला था एक बार किसी की खोपडी में सोंटे के बल पर जो विद्या वे घुसा देते थे वह जिंदगी भर शिव की जटा में गिरने वाली गंगा की तरह बाहर निकलने का रास्ता भूल जाती थी और कुंडली मारकर वहीं पडी रहती थी। मास्टर जी को अपने बारह तेरह साल पहले आजाद हुये देश पर भी बहुत गर्व था। उनका एक प्रिय तकिया कलाम था चूंकि अब देश आजाद है जिसका वे बात-बात में इस्तेमाल करते थे। हिंदी भाषा के सूर, तुलसी, कबीर के पद उन्हें मुंहजबानी कंठस्थ रहते थे किंतु अंग्रेजी के वे प्रबल आलोचक थे। उनके हिसाब से यह एक अवैज्ञानिक भाषा थी जिसका वे खुलकर मजाक उडाते थे। सायकोलॉजी की स्पेलिंग बताते थे पिसाई का लोगी, नालेज की स्पेलिंग टिप्स देते कनउ लदिगे। इतिहास के बारे में भी उनकी सूझ नितांत मौलिक थी, कभी-कभी वे बच्चों से पूछते, बच्चों बताओ कौन महान था, राणाप्रताप या अकबर? तो बच्चे चकरा जाते। मन राणा प्रताप को महान मानता लेकिन इतिहास अकबर को महान बताता था। कोई बच्चा बहुत दिमाग लगाकर अगर जवाब देता, मास्टर जी, दोनों। तो तड से उसकी पीठ पर डंडा पडता क्यों बे, दोनों एक साथ कैसे महान हो सकते हैं! मास्टर जी विदेशी जीवन शैली के घोर विरोधी थे। अपने देश की परंपरा और संस्कृति एवं अपने देशीपन पर उन्हें हद तक प्यार था।

   क्रिकेट, हॉकी उनके अनुसार पैसे की बरबादी थी। वे बच्चों को समझाते कबड्डी खेलो, दौड लगाओ, खो खो खेलो, इससे फेफडों का व्यायाम होगा और मां बाप का पैसा बचेगा। सत्तू को वे दुनिया का सबसे पौष्टिक फास्ट फूड मानते थे, उनके अनुसार गर्मी में घोल कर पीने पर सत्तू तरावट देता है और सर्दी में लिट्टी में भर कर खाने पर शरीर में गर्मी रहती है। मास्टर जी सिर्फ सलाह ही नहीं देते थे अपने ऊपर उसका एक्सपेरीमेंट भी करते थे। अपनी पुरानी घिसी धोतियों से वह मुलायम कथरियां बनवाते थे। उनके अनुसार गर्मियों में जो सुख कथरी पर लेटने में मिलता था वह रुई के गद्दे में कहां और बेकार धोतियों का उपयोग भी होता है। फूलों से उन्हें विशेष लगाव था उन्होंने मडैया के अगल-बगल क्यारियां बनवाई। उनमें गेंदा, गुलमेंहदी के फूल लगवाये जिसमें एक घंटे बच्चों को श्रमदान करना अनिवार्य था। उस ग्रामीण स्कूल में पढाते हुए मास्टर जी ने कैसे अपने छात्रों के शिक्षक के साथ-साथ गांव वालों के अभिभावक का भी दर्जा प्राप्त कर लिया यह कहना मुश्किल है। किन्तु देखा यही जाता था कि छात्रों के माता पिता शिक्षा के अलावा शादी ब्याह, खेती-बारी, हारी- बीमारी, दवा दारू के बारे में भी मास्टर जी से सलाह मांगने आते जिसका वे खुशी-खुशी निदान करते।

   इसी प्रकार समय का चक्र चलता रहा। कितने ही बसन्त, पतझड आए और चले गए। धीरे-धीरे मास्टर जी के पढाये हुए बच्चे बडे होकर जीवन की राहों में जूझने के लिए बिखर गए और मास्टर जी के पास पढने वाले बच्चों की नई-नई खेपें आती गई। मास्टर जी ने अब प्राइवेट परीक्षा देकर इंटर और बी.ए. कर लिया था। पुराना प्रायमरी स्कूल हाई स्कूल हो गया था जिसे वे हमेशा उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कहा करते थे। अब वे बूढे हो रहे थे और स्कूल में उनका वह जलवा नहीं रह गया था। गांव में अब कबड्डी, खो-खो नहीं खेला जाता था, बल्कि जमीन में डंडियों का विकेट गाड कर बच्चे क्रिकेट खेलते। स्कूल के छात्रों में अब अधिक संख्या ऐसे उद्दंड बच्चों की थी जिनके लिये अब बूढे मास्टर आउटडेटेड हो चुके थे। उनकी डांट सुनकर वे व्यंग्य से हंसते थे और मास्टर जी बिना विष के ढोंढवा सांप जैसे फुफकारते रहते थे। किन्तु एक दिन जब मास्टर जी ने सुना स्कूल के ऊंची क्लास के कुछ लडकों ने साप्ताहिक बाजार में माल बेचने जा रहे एक सीधे साधे व्यापारी का गल्ला लूटने की योजना बनाई है तो उनके सब्र का बांध टूट गया और वे अपनी उम्र और सहकर्मियों की चेतावनियों को नजरअंदाज कर घटनास्थल पर पहुंच गए। वहां अपने स्कूल के आधा दर्जन लडकों को देख मास्टर जी क्रोध से आग बबूला हो गए। उन्होंने रौद्र रूप धारण कर सबको रेस्टीकेट करने की धमकी दी, तो अभियुक्तों के चेहरे भय आशंका और क्रोध से विवर्ण हो गये। उन्होंने एक दूसरे को कनखियों से देखा, यह बुढ्डा यहां क्यों मरने चला आया? आंखों ही आंखों में इशारे हुए इसे छोडना नहीं है। इन इशारेबाजियों से अनभिज्ञ बुजुर्ग मास्टर ने जब छात्रों को सजा देने के लिए हाथ उठाया तो छात्रों के हाथ मार खाने के लिये आगे बढने के बजाय ऊपर उठे और उनका सोंटा बीच में ही पकडकर उन्हें नीचे गिरा दिया और उन पर हाकियों की बौछार होने लगी। नीचे गिरते हुए मास्टर जी ने धुंधली आंखों से देखा और आंखें मूंद लीं। बाद में जब लोग उधर पहुँचे तो देखा मास्टर लहूलुहान अर्धनग्न अवस्था में जमीन पर पडे थे, आंखें सदमें से फैली हुई थीं, नाक मुंह से बहा हुआ खून चेहरे पर सूखकर ऐसा लग रहा था जैसे भारत के मानचित्र पर लाल रंग से गंगा जमुना उकेरी गई हो। लोगों को देख कर उनके होंठों में हरकत सी हुई और फुसफुसाहट जैसी धीमी किन्तु स्पष्ट आवाज सुनाई दी, अब देश आजाद है उसके बाद वे बेहोश हो गए।

21 सितंबर 2011

रहमान की म्यूजिकल राह...

अल्लाह रखा रहमान एक ऐसी शख्सीयत, जिसने संगीत की दुनिया की राह में अपने कदमों को इस तरह बढ़ाया कि आज विश्वस्तर पर उसने एक अमिट पहचान कायम की है।
5 जनवरी 1966 को मद्रास में जन्मे रहमान का पहले नाम ए. एस. दिलीप कुमार था, लेकिन 1988 में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया। इसके पीछे का रहस्य यह माना जाता है कि एक बार रहमान की बहन गंभीर रूप से बीमार पड़ीं, तब वह एक पीर बाबा की मजार पर गए और उनकी दुआ का इतना असर पड़ा कि उनकी बहन को एक नया जीवन मिल गया, इसी से प्रभावित होकर रहमान के पूरे परिवार ने इस्लाम कबूल कर लिया। 'मोजार्ट ऑफ मद्रास' के नाम से पहचाने जाने वाले रहमान ने संगीत प्रेमी परिवार में जन्म लिया, उनके पिता आर. के. शेखर मलयालम सिनेमा के जाने-माने म्यूजिक कंपोजर थे। रहमान ने सिर्फ 4 वर्ष की आयु में पियानो बजाने का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था। बचपन से ही मुसीबतों ने रहमान की राह का रोड़ा बनना चाहा, पर करना है, तो करना है... के मार्ग पर चलने वाले रहमान हमेशा आगे बढ़ते रहे।

उनके कठिन समय की कहानी तो उस वक्त ही शुरू हो गई थी, जब नौ साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने अपने पिता को खो दिया था। इस विषम परिस्थिति में परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी मासूम रहमान के नाजुक कंधों पर आ गई। रहमान ने म्यूजिक की ओर अपना रुझान किया और इलयाराजा के ट्रच्प को जॉइन किया। रहमान को इसके चलते अपनी स्कूली एजुकेशन छोड़नी पड़ी। अतीत के उन दिनों के बारेे में रहमान बताते हैं कि वह मेरी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट था, मैंने हमेशा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने का सपना देखा था, पर उस स्थिति में मां ने कहा कि मुझे म्यूजिक को कैरियर ऑप्शन के रूप में अपनाना चाहिए। स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं किसी विकल्प के बारे में सोचता, मैने वैसा ही किया, जैसा मां चाहती थीं। रहमान कहते हैं कि शुक्र है डैड का, जिन्होंने म्यूजिक इंस्ट्रुमेंट्स का बेहतरीन कलेक्शन किया था, जो मेरे बहुत काम आया।

जब रहमान सोलह साल के थे, तभी से वह काम में इतने व्यस्त हो गए कि वह मात्र तीन घंटे ही सोते थे। अपने उन दिनों के शेड्यूल के बारे में रहमान बताते हैं कि मेरी लाइफ उसी समय से काफी सीरियस हो गई थी। मैं सुबह ९ से रात दस बजे तक जिंगल, सॉन्ग रिकॉर्डिंग आदि में व्यस्त रहता था, एक स्टूडियो से दूसरे, फिर तीसरे। फिर रात को घर आता था और जैसा कि कहावत है कि रात अपनी होती है, बस उसी तर्ज पर रात ग्यारह बजे नई धुनों की कंपोजिंग करना शुरू करता था और बस कब सुबह हो जाती थी, पता ही नहीं चलता था। फिर सुबह 6 से 9 बजे तक सोता था।

एजुकेशन के विषय पर रहमान कहते हैं कि मुझे अफसोस होता है कि मुझे कॉलेज छोड़ना पड़ा था और तभी से किताबें और क्लासेज मुझसे दूर हो गई थीं। अपनी इसी इच्छा के चलते मैंने ट्रिनिटी कॉलेज, ऑक्सफोर्ड से वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक में डिग्री लेने की ठानी और फिर डिग्री हासिल की। मैंने यह कोर्स लंदन न जाकर पत्राचार से चेन्नई से ही किया है।

रोजा से अपनी एक सशक्त पहचान बनाने वाले रहमान इस फिल्म से कैसे जुड़े, इसका जवाब देते हुए बताते हैं कि एक एडवरटाइजिंग अवॉर्ड समारोह के दौरान उनकी मुलाकात डायरेक्टर मणिरत्नम से हुई, रहमान ने उन्हें अपने बनाए कुछ म्यूजिकल सैंपल सुनाए, जिससे वे इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने रहमान को अपनी आने वाली फिल्म रोजा के लिए म्यूजिक कंपोज करने की जिम्मेदारी दे दी। रहमान अपनी पत्नी सारया के बारे में कहते हैं कि वह म्यूजिक के बारे में मेरी मां की तरह ज्यादा नहीं जानती हैं, पर कंपोजिंग के वक्त यह जरूर बता देती हैं कि सुनने में वह कर्णप्रिय है या नहीं, पर तीनो बच्चों खतीजा, राहिमा और अमीन का संगीत में काफी इंटरेस्ट है। आजकल रहमान अपनी आगामी फिल्मों एलिजाबेथ- द गोल्डन एज (हॉलीवुड), गुरु, अकबर-जोधा, चमकी, रॉकस्टार आदि पर कार्य कर रहे हैं।