15 मई 2011

कर्म योगी संत थे मलूक दास जी महाराज

प्रख्यात संत, जगतगुरु मलूकदास महाराज का भक्तिकालीन निर्गुणवादी भक्त कवियों में प्रमुख स्थान है। वे रामानंदी संप्रदाय के ख्ख् वें आचार्य थे। उनमें जन्मसिद्‌ध चकत्कारिता व विलक्षण साधुता थी। उनके अंदर विश्व कल्याण की भावना कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं के द्‌वारा देशभर में सत्यम, शिवम, सुंदरम की अलग जगाई।

आजीवन संपूर्ण सृष्टि को भगवत स्वरूप मानकर संत प्रवर उसकी तन-मन से सेवा में वे जुटे रहे।

संत प्रवर मलूकदास जी महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले केग्राम कड़ा माणिकपुर में संवत क्म्फ्क् की वैशाख कृष्ण पंचमी (गुरुवार) को हुआ था। उन्होंने जो भी शिक्षा प्राप्त की, वह स्वाध्याय, सत्संग व भ्रमण के द्‌वारा प्राप्त की। उनमें बाल्यावस्था में ही कविता लिखने का गुण विकसित हो चुका था।

महाराजश्री को उनके पिता ने जीविकोपार्जन हेतु कंबल के व्यवसाय में लगाया, परंतु उसमें उनका मन नहीं रमा। वह संतों और निर्धनों को कंबल मुफ्त में ही दे दिया करते थे। उनके पास जो भी याचक आता था, उसे वे निराश वापस नहीं करते थे। वह अभ्यागतों की यथाशक्ति अन्न-वस्त्र से सेवा किया करते थे। वे जब संतों की सेवा करते थे, तो उनके प्रताप से पहले से ही मौजूद वस्तुएं शतगुणित हो जाती थीं। वह एक टिक्कर में से ही लाखों व्यक्तियों को प्रसाद दे दिया करते थे। उनके भंडार में कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होती थी। उन्होंने अनगिनत निर्धन कन्याओं के हाथ पीले करवाए। अनेक विधवाओं का पालन-पोषण किया। गांव में जब प्लेग फैला, तो प्लेग पीड़ितों की अहर्निश सेवा की। वह अपने आश्रम में कोढ़ी व्यक्तियों को भी प्रश्रय देकर उनके घावों की मरहम-पट्‌टी कर दिया करते थे। उन्होंने व्यापक जनहित में निजी खर्च से सड़कों का निर्माण कार्य तक कराया। वस्तुतः वह निष्काम भाव से परमार्थ में लगे रहे।

बाबा मलूकदास मूर्ति पूजा और आडंबरों के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि दूसरे व्यक्तियों की पीड़ा को जानना और उसे दूर करना ही सच्ची सेवा, सच्चा धर्म है। यही सच्चे संत व पीर की पहचान है। वह मोक्ष प्राप्ति का साधन भी दया भाव को ही मानते थे। वह कहा करते थे कि सेवा भाव के द्‌वारा नर और नारायण दोनों ही प्राप्त हो जाते हैं।

महाराजश्री कर्मयोगी संत थे। वह जाति-पांति के घोर विरोधी थे। उनकी वाणी अत्यंत सिद्‌ध थी। वे त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने समूचे देश में भ्रमण करते हुए वैष्णवता और रसोपासना का प्रचार-प्रसार किया। हिन्दू व मुसलिम दोनों ही उनके शिष्य थे। आचार्य मलूकदास के पास सत्संग हेतु लोगों का तांता लगा रहता था। संत तुलसीदास तक ने कई दिनों तक उनका आतिथ्य स्वीकार किया था। मुगल शासक औरंगजेब भी उनके सत्संग से अत्यंत प्रभावित था। उसने उनके आदेश पर गैर-मुसलिमों पर स्वयं लगा निर्धारित जाजिया कर वापस ले लिया था। किंवदंती है कि भगवान राम ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए थे।

संत शिरोमणि मलूकदास महाराज अपनी इच्छा से संवत क्स्त्रफ्ऽ में अपने जन्म के ही माह, तिथि, समय व वार को क्०त्त् वर्ष की आयु में भगवत धाम को गमन कर गए। बताया जाता है कि मलूकदास महाराज का पंच भौतिक शरीर उनके देहत्याग के उपरांत जगन्नाथपुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के समक्ष सच्चिदानंद स्वरूप में प्रकट हो गया था और उन्होंने उनसे उनकी सन्निधि में रहने की इच्छा प्रकट की थी। इस प्रार्थना को जगन्नाथ प्रभु ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था। तब से आजतक जगन्नाथ प्रभु के गर्भ गृह केपनाले के पास मलूकदास महाराज का स्थान विमान है और उनके नाम का रोट अभी भी वहां आनेवाले भक्तों को प्रसादस्वरूप दिया जाता है। वृंदावन में वंशीवट क्षेत्र स्थित मलूक पीठ में संत प्रवर मलूकदास जी महाराज की जाग्रत समाधि है।

गुरू तेग बहादुर : धर्म के लिए दी कुर्बानी

महज चार वर्ष की आयु में बालक तेग बहादुर ने अपने तन के बेशकीमती वस्त्र एक निर्वस्त्र गरीब बालक को पहनाकर उसकी गरीबी को ढांपा। उन्हीं तेग बहादुर जी ने करीब पचपन वर्ष की अवस्था में हिंदू धर्म की रक्षा के लिए दिल्ली के चांदनी चौक में अपनी अमर, अद्वितीय बलिदान रूपी चादर से हिंदुस्तान की अस्मिता को ढांपा।

धर्म की लाज बचाई। गुरुदेव की इस बेमिसाल कुरबानी पर भावविभोर होकर लिखा कवि सेनापति ने-
'प्रगट भए गुरु तेग बहादुर।
सगल सृष्टि पै ढापी चादर॥
करम धरम की जिनि पत राखी।
अटल करी कलजुग में साखी॥'
छठे गुरु श्री गुरु हरिगोबिंद जी के सबसे छोटे पुत्र और पांचवें गुरु तथा सिख धर्म के प्रथम शहीद श्री गुरु अर्जन देव जी के पौत्र गुरु तेग बहादुर जी बचपन से ही ईश्वर-भक्ति में तल्लीन रहते थे। शुरू से ही गंभीर स्वभाव, विचारशील साधु प्रवृत्ति और प्रकृति वाले तथा त्याग की भावना के मालिक थे तेग बहादुर। महज पांच वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने समाधि लगाना सीख लिया। बिना हिले-डुले वह घंटों ईश्वर के ध्यान में जुड़कर बैठे रहते। कई बार माता को पुत्र की साधु-वृत्ति पर चिंता होने लगती। पर उनके पिता गुरु हरगोविंद उन्हें मुस्करा कर समझाते, 'बहुत बड़ा काम करना है हमारे इस पुत्र को। उस कार्य की अभी से तैयारी कर रहा है।

परहित के लिए त्याग के उच्चतम आदर्श और करुणा के सागर गुरु तेग बहादुर जी का जीवन एक सिपाही के रूप में प्रारंभ हुआ और समापन एक गंभीर, शांत, सहिष्णु और लोकोपकारी शहीद के रूप में। खुद पिता गुरु हरिगोबिंद शस्त्र के महाबली थे। सो, उन्होंने पुत्र तेगबहादुर को शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दिलाई। बाल्यावस्था में तलवार से इस शस्त्रविा के खूब जौहर दिखाए तेग बहादुर ने करतारपुर की जंग में। मोह लिया पिता का मन। तेग के धनी होते हुए भी वे गुरु अर्जन देव जी की तरह शांत, उदात्त, बलिदानी पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हुए। परधर्म की रक्षा के लिए गुरुदेव ने अपना शीश दे दिया, लेकिन स्वाभिमान नहीं छोड़ा।

करीब साढ़े ग्यारह वर्ष की अवस्था में तेग बहादुर जी का विवाह करतारपुर निवासी श्री लालचंद खत्री की सुपुत्री नानकी जी के साथ हुआ। गृहस्थी में भी वे वैरागी रहे। एकदम सादा जीवन। सांसारिक मोहमाया, लालसा, तृष्णा से कोसों दूर। सर्वदा एकांत में रहते। जुड़े रहते उस हरि के साथ और करते अपने मन को दृढ़। गुरु तेग बहादुर ने सभी संसारी वृत्तियों को वश में कर लिया था। पिता गुरु हरिगोबिंद जी ने देहावसान से पूर्व तेग बहादुर की बजाय श्री हरिराय जी को गुरु गद्‌दी सौंपी, तो रंचमात्र भी विरोध-विवाद न किया शांति और सहिष्णुता के मसीहा, पुत्र तेग बहादुर ने। धार्मिक आजादी के परम मुद्‌दई गुरु तेग बहादुर जी के व्यक्तित्व और वाणी का मूल वाक्य था-
'भै काहू कउ देत नहि,
नहि भै मानत आनि॥'

यानी न किसी से डरो और न किसी को डराओ। डरा हुआ मनुष्य कायर होता है और डराने वाला अत्याचारी। गुरुजी अच्छी तरह जानते थे कि डरपोक व्यक्ति कोई भी सकारात्मक कार्य नहीं कर सकता, फिर उससे जुल्म के खिलाफ अड़ने और लड़ने की उम्मीद करना, तो बहुत दूर की बात है। अतः उक्त उपदेश के जरिए उन्होंने लोगों को न केवल सहृदय और सबल बनने का आह्‌वान किया, बल्कि खुद भी उस पर व्यावहारिक रूप से अमल करके दिखाया। उन्होंने अपने आदर्शों से भारत जन को नई राह दिखाई।

गुरू नानक की सीख

एक बार गुरु नानक साहिब और उनके साथी रबाबी भाई मरदाना भ्रमण करते हुए एक ऐसे नगर में चले गए जहां किसी ने उन्हें बैठने तक की जगह नहीं दी। गुरु साहिब के उदासीन साधुओं वाले वेश देखकर लोगों ने उनका अपमान किया और उन पर पत्थर फेंके। गालियां भी दीं।

भाई मरदाना ने गुरु साहिब की ओर देखा, 'साहिब जी ये कैसे लोग हैं?'
गुरु जी ने गंभीरता से कहा, 'सदा बसते रहें इस नगर के लोग, और यहीं बसते रहें।

' वहां गुरु जी ने एक शबद का गायन भी किया जिस का भाव कुछ इस तरह का है, 'अगर मैं बातें करूं तो लोग कहते हैं कि बक-बक करता है। चुप रहूं, तो कहते हैं कि इसे समझ नहीं है। झुक कर रहता हूं, तो कहते हैं कि भय के कारण भक्ति करता है। चला जाऊं तो कहते हैं कि भाग गया है। कहां समय व्यतीत करूं? इसलिए परमात्मा ही मेरे सम्मान की रक्षा करेगा।'

गुरु जी और भाई मरदाना चलते हुए आगे एक और नगर में पहुंचे। लोगों को गुरु जी के पहुंचने का पता चला तो उन्होंने उनका बहुत आदर-सम्मान किया। वहां कीर्तन होने लगा, प्रभु केनाम का गायन किया जाने लगा। लोगों ने गुरु जी को ईश्वर का रूप माना और उनसे आशीष मांगा।

गुुरु जी प्रसन्न हुए और मुस्करा दिए। वहां उन्होंने आराम से रात बिताई।
सुबह गुरु जी वहां से चलने लगे तो उन्होंने कहा, 'यह नगर उजाड़ हो जाए... कोई भी यहां न रहे...।'
लोगों ने शीश झुका दिए। गुरु जी की बात को सुनकर भाई मरदाना ने पूछा- 'साहिब जी आपका यह कैसा न्याय है? जहां बैठने के लिए भी जगह न मिली, उन लोगों को आपने बसते रहने के लिए कहा, जिन लोगों ने सेवा बंदगी की उनका नगर उजाड़ बना रहे हो?

गुरु जी ने मुस्करा कर कहा-'मरदाना! ऐसा ही होना चाहिए।'
'मगर क्यों गुरुजी?' भाई मरदाना ने आश्चर्य से पूछा। गुरु जी ने कहा, 'पहले नगर के लोग किसी और नगर में जाएंगे तो वहां के लोगों को भी बुरे व्यवहार में लगाएंगे। इस नगर के लोग जहां कहीं भी रहेंगे, लोगों को अपने सदाचरण से नेक बनाएंगे। इसलिए, ऐसे स्वभाव वाले भले लोग एक ही जगह पर नहीं रहने चाहिए।'
उस समय भाई मरदाना पहले नगर के लोगों की दीन-हीन दशा के बारे में सोच रहा था। गुरु जी की बातें सुनकर कहने लगा, 'तो क्या उनका कल्याण नहीं हो सकता?'
'हो सकता है।' गुरु साहिब ने विश्वास केसाथ कहा।
'इसके लिए उन्हें क्या करना होगा?'

गुरु जी ने कहा- 'अभी तो वे लोग जीवन को खाने-पीने और मौज-मस्ती का साधन मात्र समझते हैं। जीवन केवल खाने-पीने तक सीमित नहीं है। जीवन जन कल्याण के लिए है। उन्हें चाहिए, दूसरे नगर के लोगों से प्रेरणा लें। जीवन को केवल उदर पूर्ति के लिए न समझें। भले कामों में लगें। तभी उनका भला हो सकता है।'

धर्म और राष्ट्र एक दूसरे के प्रेरक हैं: स्वामी सत्यमित्रानंदगिरी जी महाराज

धर्माचार्य, साधु-संत तथा मठ-मंदिर नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए प्रयास क्यों नहीं करते?
मैं स्वंय यह अनुग्रह करता हूं। आज धर्माचार्यों व साधु-संतो को जगदगुरू शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ आदि की तरह धर्म व संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। मगर धर्माचार्यों की कथनी-करनी के अंतर ने उन्हें प्रभावहीन व तेजहीन बना डाला है, इसी कारण उनका प्रभाव नहीं पड़ता।

इसके बावजूद अभी भी देश में बहुत से आचार्य हैं, मठ-मंदिर हैं जो धर्म-संस्कृति के प्रचार में लगे हैं और सेवा, परोपकार आदि पुनीत कार्यों में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। अनेक धर्माचार्य तथा कथा-व्यास अपने कार्यक्रमों से प्राप्त धन को अस्पतालों, वनवासी क्षेत्रों में चलाए जा रहे सेवा प्रकल्पों, संस्कृत के अध्ययन, गोसेवा आदि कार्यो पर व्यय करे हैं।
ह्नआपके धार्मिक पुनर्जागरण के इतने प्रयासों के बावजूद दुनिया नैतिक मूल्यों के संकट से ग्रस्त है, क्यों?

अतिभौतिकता के कारण धार्मिक व नैतिक मर्यादाओं का हनन होता है। पहले लोग अपनी महान संस्कृति व परंपराओं के अनुरूप सरल व सात्विक जीवन बिताते थे। धार्मिक संस्कारों के कारण पाप कर्म करने, अन्याय व बेइमानी करने से डरते थे। उन्हें विश्वास था कि परमात्मा उनके कर्मो को देखता है। अच्छे कर्म करने से लोक-परलोक में सुख मिलेगा, पाप कर्म करने से नरक की यातनाएं भोगनी पड़ेंगी। दूसरी बात यह है कि स्वाधीनता के बाद हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बच्चों और युवा पीढ़ी को धार्मिक संस्कार देने बंद कर दिए गए।

कुछ बुद्धिजीवी आरोप लगाते हैं कि एक ओर देश में करोड़ों लोगों को भूखे पेट सोना पड़ता है, दूसरी ओर भव्य धार्मिक कार्यक्रमों पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इसे अपव्यय बताते हुए वे इसे रोकने की मांग करते हैं।
ऐसी सोच उन लोगों की होती है जिनकी दृष्टि में नैतिक मूल्य व धर्म-संस्कृति का कोई महत्व नहीं होता। यदि अपव्यय रोकने की बात है तो ये सेकुलर सोच के बुद्धिजीवी उन कार्यक्रमों का विरोध क्यों नहीं करते जिनके जरिए करोड़ों रुपये खर्च करके बच्चों, युवाओं व महिलाओं के सामने प्रदूषित विचार, प्रदूषित दृश्य परोसे जा रहे हैं। मीडिया द्वारा प्रसारित इन विकृतियों व अश्लील दृश्यों को रोकने के लिए क्या उन्होंने कोई आवाज उठाई है? यदि धर्म प्रचार व मठ-मंदिरों पर व्यय से चिंतित इन बुद्धिजीवियों को वास्तव में गरीबों की चिंता है तो सबसे पहले शराबखानों को बंद कराने की मांग करनी चाहिए। नवधनाढ्य वर्ग लाखों रुपये अपने दुर्व्यसनों पर व्यय कर देता है। क्या ये बुद्धिजीवी कभी उन्हें इनसे मुक्त होने की प्रेरणा देते हैं?

हरिद्वार में भारत माता मंदिर की स्थापना की प्रेरणा आपको कैसे मिली?
मैं प्रारम्भ से ही धर्म और राष्ट्र को एक दूसरे का प्रेरक मानता रहा हूं। धर्म संस्कारों को बनाता है। राष्ट्रभाव राष्ट्र और स्वधर्म पर बलिदान की प्रेरणा देता है, ऐसा मेरा स्पष्ट मत है। मैंने अनुभव किया कि स्वाधीनता के बाद बच्चों को राष्ट्रभक्ति तथा धर्म-संस्कृति के संस्कारों से वंचित करने के कारण राष्ट्रभक्ति की भावना शिथिल पड़ी है। मेरा सपना था कि देश में पुनः राष्ट्रभक्ति की भावना पनपे तथा देश की महान विभूतियों की स्मृति में एक अनूठे भारत माता मंदिर की स्थापना की जाए। मंदिर में जहां भारत माता की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है, वहीं देश भक्त राष्ट्र सेनानियों की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मातृ मंदिर में वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक की महान माताओं की मूर्तियां हैं। संत मंदिर में विभिन्न संप्रदायों के धर्माचार्यों, संत-महात्माओं, ऋषि-मुनियों की प्रतिमाएं हैं तो शक्ति मंदिर, विष्णु मंदिर तथा शिव मंदिर में अवतारों व देवी-देवताओं को श्रद्धा-भक्ति के साथ प्रतिष्ठापित किया गया है। मेरी इच्छा थी कि पूरे देश के श्रद्धालु जब तीर्थयात्रा करते हुए हरिद्वार पहुंचे तो उन्हें वहां भारत माता मंदिर में अनेकता मे एकता की अनुभूति हो।

युवा पीढ़ी को पुनः संस्कारित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
सबसे पहले पाठ्य पुस्तकों में महापुरुषों के प्रेरक प्रसंग, इतिहास की प्रेरक घटनाओं का समावेश किया जाना चाहिए जिससे युवा पीढ़ी को धर्म-संस्कृति व राष्ट्रभक्ति के महत्व से परिचित कराया जा सके। दूरदर्शन तथा मीडिया के जरिए दर्शकों को अश्लील सामग्री पहुंचाई जा रही है। इसे प्रभावी ढंग से रोका जाना चाहिए। युवा पीढ़ी को वृद्धों, माता-पिता तथा राष्ट्र के प्रहरियों का सम्मान करने की प्रेरणा दी जानी चाहिए। ये सारे काम शिक्षा व्यवस्था में सुधार से ही हो सकते हैं।

भारतीय आत्मा का विदेशी संत

लम्बी दाढ़ी, आंखों में गहरी शांति और चेहरे पर अद्‌भुत तेज। लगभग ५० वर्ष की आयु के अमरीकी डेविड फ्रॉली को देखकर लगता है जैसे प्राचीन भारत के किसी ऋषि से मिल रहे हों। अमेरिका स्थित 'अमेरिकन इंस्टीट्‌यूट ऍाफ वैदिक स्टडीज' के डाइरेक्टर डेविड फ्रॉली का झुकाव भारतीय धर्म, दर्शन के प्रति झुकाव १९ साल की उम्र से ही हो गया था।

साठ के दशक में उन्होंने योग के ऊपर कुछ किताबें पढ़ीं। धीरे-धीरे डेविड का मन उनमें इतना रमने लगा कि उन्होंने भारतीय धर्म, दर्शन, अध्यात्म, वेद, पुराण और उपनिषद आदि का एक सिरे से अध्ययन कर डाला। वह भारतीयता में ऐसे डूबे कि अपना नाम तक वामादेव शास्त्री रख लिया।

उनकी भारतीय धर्म, दर्शन पर लगभग २० से अधिक किताबें आ चुकी हैं। जहां भारत में वेद, ज्योतिष तंत्र-योग आदि का नाम लेना 'सांप्रदायिकता' और 'पिछड़ेपन' की निशानी माना जाता है। वहीं अमेरिका स्थित इस संस्थान में वेद, आयुर्वेद, ज्योतिष, योग, तंत्र और वेदांत आदि पर निरंतर शोध प्रकाशित होते रहते हैं। डेविड फ्रॉली को 'वेदांत' में आत्मिक रुचि है।

वे कहते हैं, 'आत्मा ही परमात्मा है। यानि भगवान हमारे अंदर है। उन्हें कहीं बाहर ढूंढ़ने की जरूरत नहीं है। ऐसी गहरी शिक्षा केवल मुझे वेदांत में पढ़ने को मिली। अन्य किसी धर्मग्रंथ में ऐसी उदारता नहीं हो सकती। राम मंदिर मसले पर वह अपनी निर्भीक राय देते हैं हिंदुओं के लिए उस जगह का खास महत्व है। इसलिए मुसलमानों को वह जगह छोड़ देनी चाहिए। क्योंकि उनके लिए इसकी कोई खास अहमियत नहीं है। एक मस्जिद के टूटने को इतना बड़ा मसला बनाना नहीं चाहिए। भारत में पहले हिंदुओं के बहुत से पूजा स्थल तोड़े जा चुके हैं। इतिहास इस बात का गवाह है। इस मसले के इतना बढ़ जाने के लिए वह कोर्ट को जिम्मेदार मानते है, जहां यह पिछले ५० सालों से अटका हुआ है। उनका कहना है अगर अमेरिका की कोर्ट में यह मसला होता, तो कब का सुलझ चुका होता है।

हाल ही में शिक्षा पर लगाए जा रहे भगवाकरण के आरोपों के बारे में वह कहते हैं, अगर इसे इतिहास बदलना कहा जा रहा है, तो यही सही है। विदेशियों ने अगर आपकी पाठ्‌य पुस्तकों में इतिहास के नाम पर कुछ भी लिख दिया वह कैसे अंतिम शब्द हो सकता है। भारतवासियों को बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए, उनका इतिहास जिसे वह पढ़ रहे हैं, उसे विदेशियों ने औपनिवेशिक काल में केवल अपने फायदे के लिए लिखा था। जिन मैक्समूलर को यहां के लोग महाविद्वान मानकर उन्हें पूजते हैं, उन्हें जर्मनी में कोई नहीं जानता। मैं भारतीयों से यही कहना चाहता हूं कि अपने ऊपर भरोसा करना सीखें। अपने अतीत को अपनी नजरों से देखें और परखें। इस पर गर्व करना सीखें। जितने भी देश औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत रहे, सबने अपने इतिहास को बदला है। जिनमें से चीन एक है। यहां तक कि ब्रिटेन ने खुद अपने इतिहास में बदलाव किया है। हमारी बात ले लीजिए जब मैं छोटा था, तो मैंने इतिहास की किताबों में पढ़ा था कि रेड इंडियन बहुत बुरे होते हैं। वे लोगों को मारते हैं। जबकि आज नयी पीढ़ी पढ़ती है कि सफेद रंग के यूरोपियन रेड इंडियन को परेशान करते थे। इसलिए मैं भारतीयों से यही कहना चाहता हूं कि अपने अतीत को अपनी नजरों से तौलें और उस पर गर्व करना सीखें।

भारत जन के नायक हैं श्रीकृष्ण

भगवान श्रीकृष्ण ज्ञानातीत होने के साथ-साथ कालातीत भी हैं। वह भारतीय इतिहास को प्रभावित करनेवाले युगनायक रहे हैं। वह भारतीय जन के नायक हैं। मथुरा के कारागार में वासुदेव व देवकी की आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म तथा वृंदावन में उनका लालन-पालन हुआ, ऐसा शास्त्रों-ग्रंथों में वर्णित है।

करोड़ों हिन्दुओं के आस्थापुरुष श्रीकृष्ण के बारे में ऋगवेद के आठवें मंडल में मंत्रद्रष्टा ऋषि के रूप में हमें उल्लेख मिलता है, लेकिन उससे यह नहीं लगता कि वह देवकीपुत्र श्रीकृष्ण ही हैं। वे कोई और ऋषि भी हो सकते हैं। देवकीपुत्र श्रीकृष्ण की चर्चा छांदोग्योपनिषद में मिलती है, जहां उन्हें घोर आंगिरस का शिष्य बताया गया है। यहां भी उनके पिता का उल्लेख नहीं है। हालांकि ऋगवेद में आए उल्लेख के अतिरिक्त कुछ अन्य स्थानों पर श्रीकृष्ण का नाम आया है, जहां उन्हें यमुना के किनारे इंद्र से युद्‌ध करते हुए बतलाया गया है। उल्लेखनीय है कि वासुदेव कृ ष्ण की इंद्र से युद्‌ध की स्थिति बन गयी थी और तब उन्होंने गोवद्‌र्धन की सहायता से ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इससे कुछ विद्‌वानों का मत है कि वासुदेव कृष्ण का वैदिक कृष्ण से संबंध हो सकता है।

देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में वासुदेव कृष्ण का स्पष्ट उल्लेख महर्षि पाणिनी कीअष्टाध्यायी में है। इसी ग्रंथ में कृष्ण, अर्जुन और बलराम का भी उल्लेख मिलता है। अष्टाध्यायी में भगवान श्रीकृष्ण के दैवी और मानवीय दोनों ही रूपों के उल्लेख मिलते हैं। सबसे विस्तृत चर्चा उनकी महाभारत ग्रंथ में है। भारत के जन-जन की आस्था में बसे श्रीकृष्ण का वर्णन विदेशों में भी मिलता है। यूनानी शासक अगाथोलिक्स द्‌वारा जारी किये गये सिक्के में एक ओर सुदर्शन चक्रधारी श्रीकृष्ण और दूसरी ओर हलधर बलराम की आकृतियां खुदी हुई मिलती हैं। श्रीकृष्ण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अभिलेख चित्तौड़ के निकट नागरी के घोसुंडी से प्राप्त हुआ है, जिसके अनुसार सर्वताक नामक एक व्यक्ति अपने को वासुदेव (कृष्ण) और संकर्षण (बलराम) का भक्त बतलाता है। इस वर्णन से लगता है कि सर्वातक कोई ब्राह्मण राजा था, जो अपने को अश्वमेधयाजी भी कहता था।

विभिन्न विद्‌वानों के मत को आधार मानें तो कृ ष्ण का जन्म द्‌वापर के उत्तराद्‌र्ध में हुआ था। पिछले ५१०० वर्ष से भी अधिक समय से कलियुग चल रहा है। इससे लगता है कि उनका जन्म लगभग छह हजार वर्ष पूर्व हुआ होगा। वैदिक कृष्ण को ही अगर हम वासुदेव कृष्ण मान लें, तो वह भारतीय काल गणना के अनुरूप बन जाएगा।


श्रीकृष्ण के जन्म को लेकर भारतीय इतिहास और वेदों की व्याख्या करनेवाले विद्‌वानों का चाहे जो मत हो, पर यथार्थ यही है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस भारतीय धरा पर अपनी लीलाएं कीं, जीवन का दर्शन भारतवासियों को अमूल्य धरोहर के रूप में दिया और आज भी वह भारतीय जन के नायक हैं।

भक्ति ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी

भारत ऋषि-मुनियों, ज्ञानी-ध्यानियों तथा विरक्त संत महात्माओं के कारण ही संसार भर में जगद्‌गुरु के रूप में विख्यात रहा है। शंकराचार्यजी द्वारा स्थापित चार पीठों गोवर्धनमठ (पुरी), ज्योर्तिमठ (बद्रीकाश्रम), श्रंगेरी मठ तथा शारदा पीठ (द्वारिका) में त्यागी, तपस्वी तथा विद्वान आचार्यों की गौरवपूर्ण परंपरा रही है।

इन्हीं आचार्यों में ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती का अग्रणी स्थान रहा है।
स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी उन शंकराचार्यों में हैं, जिनसे दीक्षा ग्रहण कर स्वामी करपात्री जी महाराज, स्वामी अखंडानंद सरस्वती, शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती, स्वामी परमानंद सरस्वती जैसी विभूतियां अपने को गौरवान्वित अनुभव करती थीं। संसार में योग का परचम फैलाने वाले महर्षि महेश योगी भी स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज के ही शिष्य थे।

स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती का जन्म अयोध्या नगरी के ग्राम गाना में मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी, २१ दिसम्बर सन्‌ १८९० को एक विद्वान मिश्र ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आठ वर्ष की अवस्था में ही यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न होते ही बालक ब्रह्मानंद को काशी भेजकर संस्कृत विघालय में प्रवेश दिला दिया गया। संस्कृत और हिंदी का अध्ययन करते समय मन में सांसरिक मोहजाल में न फंसकर सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के पुनीत कार्य में समर्पित होने का संकल्प ले लिया। इसके लिये साधना और तपस्या को आवश्यक मानकर वे हिमालय जा पहुंचे।

ब्रह्मानंद के परिवार वालों को जब पता चला कि वह काशी में विालय छोड़कर हिमालय की ओर चले गए हैं तो उनकी खोज की गई। एक बार तो उन्हें पकड़कर गांव ले जाया गया। किंतु उन्होंने स्पष्ट कह दिया-'मैं सांसारिक प्रपंचों में न पड़कर तत्व ज्ञान पाने का संकल्प ले चुका हूं।' माता स्वयं धर्म शास्त्रों की ज्ञाता थी। उन्होंने ब्रह्मानंद को विदा करते हुए कहा-'जाओ, साधना करो तत्व ज्ञान अर्जित करो भगवान का भजन करो किंतु दर-दर भिक्षा मांग कर पेट भरने वाले साधु न बन जाना।'

वे पुनः हिमालय की ओर चल पड़े श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य जी के दीक्षित शिष्य दंडी स्वामी कृष्णानंद सरस्वती उन दिनों उत्तरकाशी में साधनारत थे। उन्होंने इन्हें अनेक शास्त्रों का अध्ययन कराया। योगाभ्यास के साथ-साथ भगवद्भक्ति और साधना का मार्ग दिखाया। २५ वर्ष की आयु में उत्तरकाशी से ऋषिकेश पहुंचे। स्वामी कृष्णानंदजी से उनका ब्रह्म चैतन्य ब्रह्मचारी नामकरण कर दीक्षा दी। प्रयाग में कुंभ पर्व पर स्वामी कृष्णानंद ने ३६ वर्ष की आयु में उन्हें संन्यास की दीक्षा देकर स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती नामकरण किया।

उनके विरक्त जीवन, तेजस्वी व्यक्तित्व तथा प्रभावशाली प्रवचनों ने कुछ ही समय में उन्हें देश व्यापी ख्याति दिला दी। काशी, हरिद्वार, प्रयाग, पुरी व रामेश्र्वरम्‌ आदि स्थानों की यात्रा कर जब वे उपस्थित जनसमूह को सनातन धर्म के सिद्धांतों से अवगत कराते तो श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो उठते।

शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योर्तिमठ बद्रीनाथ पर १६५ वर्षों से कोई शंकराचार्य पद पर आरूढ़ नहीं थे। पर तीनों पीठ के शंकराचार्यों के विचार-विमर्श के बाद १ अप्रैेल १९४१ को उनका अभिषेक कर वहां के शंकराचार्य पद पर अधिष्ठित किया गया।

स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने जोशी मठ में ज्योतिर्मठ आश्रम की स्थापना कराई। सन्‌ १९५३ में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्रयाग पहुंचकर शंकराचार्यजी से आर्शीवाद लिया तथा धर्म प्रचार की योजना के प्रति सहमति व्यक्त की। राष्ट्रपति ने कहा था-श्री शंकराचार्य भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी हैं।

शंकराचार्य जी ने कलकत्ता में आयोजित एक महायज्ञ समारोह में प्रवचन में संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा था-संस्कार ही कर्म का बीज है और वही सृष्टि का कारण है। जीव संस्कारों से दीक्षित होकर ही मानव जीवन को सफल बना सकता है। यदि कोई देश अपने देश के आध्यात्म विचारों तथा संस्कारों को त्याग देता है तो वह निष्प्राण हो जाता है। शंकराचार्यजी वेदों की सभी शाखाओं के पठन-पाठन संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार तथा धर्म और संस्कृति के संवर्धन के लिए पूरी कर्मठता से सक्रिय रहे।

२० मई १९५३ को उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। उनके द्वारा लिखित अनेक ग्रंथ आज भी धर्म और संस्कृति की अजस्र प्रेरणा देने में सक्षम हैं।