21 अप्रैल 2011

अनुशासन ही जीत है

मंगल और ब्रहस्पति के बीच स्थित एक छोटे से ग्रह का नाम मेरे नाम पर '(12599) सिंघल' रखा गया। यह पुरस्कार मैसाच्युस्टेट  इंस्टीटयूट आँफ टेक्नोलांजी (एमआईटी) की लिंकन लेबोरेट्री (अमेरिका) की तरफ से दिया गया। मुझे 14 साल की उम्र में सबसे कम उम्र का (भारत में) माइक्रोसाफ्ट सर्टिफाइड सिस्टम इंजीनियर (एमसीएसई) घोषित किया गया। इसके बाद सर्टिफाइड लोटस प्रोफेशनल (सीएलपी) और सर्टिफाइड लोटस स्पेशलिस्ट (सीएलएस) भी बना।

अनुशासन : मेरी सफलता का सचमुच कोई रहस्या नहीं है। मैंने जीवन में सिर्फ दो चीजें मानीं-पहली जो सीमाएं हैं उसी में सपने साकार करून और दूसरी, उत्साह के साथ अनुशासन को निभाऊं।

लक्ष्य : मैंने कम्प्यूटर के बारे में सुना था, लेकिन यह क्या बला है, जानता नहीं था। आठ साल की उम्र में एक महीने का बेसिक कम्प्यूटर कोर्स ज्वाइन किया। इसके तीन साल बाद एक दोस्त के घर जाना हुआ। उसका पीसी एडवांस था, उसकी मल्टीमीडिया कित ने मुझे अपनी और खींचा। पहली बार कम्प्यूटर पर गेम्स देखे। फिर गर्मियों की छुट्टियों में दूसरी बार एक इंस्टीटयूट जाना शुरू किया। मेरे मन में एक पीसी खरीदने की बात आई और इस सपने को पापा ने पूरा किया। अब मेरी बारी थी बस लक्ष्य तय किया और लग गया उसे पाने में।

एक्स्ट्रा स्ट्रोक : बेहतर विकल्प के लिए समस्याओं से मुकाबला करना चाहिए। तभी आप में 'स्किल' आते हैं। परेशानियों से डरकर किसी दूसरे का सहारा लेने की आदत न पालें तो बेहतर हो।

मेरी जीत = अनुशासन + लक्ष्य
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अक्षत सिंघल, सिस्टम इंजीनियर

अपनी दुनिया खोजो


आप अपनी आँख बंद करके ध्यान लगाएं और खुद से पूछें की कौन सा काम करते समय आपको आनंद आता है। ऐसी कौन-सी दुनिया है जो आपको बुलाती है। तभी आप सही फैसला कर पाएंगे।

नजरिया : मैं मानता हूँ की यदि कोइ युवा अपने जीवन में करियर का सही चुनाव कर लेता है, तो समझो उसने अपनी सफलता का आधा रास्ता पार कर लिया है। आपकी मंजिल कहाँ हैं? आप क्या बनाना चाहते हैं? अपने जीवन को क्या दिशा देना चाहते हैं? आदि सवालों को लेकर नजरिया साफ़ होना चाहिए। मैं अपने नजरिया को हमेशा साफ़ रखा है। शायद यही कारण है की मैं अपने काम और अपने क्षेत्र से बेहतर न्याय कर पाया और सफलता की सीधे चढ़ता गया।

काम : मेरा मानना है की इंसान का अपना-अपना टेस्ट होता है और वह टेस्ट ही उसे एक-दूसरे से अलग व्यक्तित्व प्रदान करता है। जहाँ तक मेरी सफलता है तो मैंने फोटोग्राफी के क्षेत्र को अपने रुचि से चुना। मुझे मालूम था की मैं फोटोग्राफी बहुत अच्छी कर सकता हूँ। युवाओं से मेरा कहना यही है की यदि उन्हें सफलता का स्वाद चखना है तो अपने व्यक्तित्व से मेल खाते करियर को ही चुनें। जो व्यक्ति ऐसा करते हैं वे लम्बी पारी खेलते हैं नहीं तो कुछ दूर जाने के बाद ही थक जाते हैं।

नो शार्टकट : मैंने कभी अपने करियर में शार्टकट नहीं अपनाया और न ही इस बात की चिंता की की मैं कब सफल हो पाउँगा? बस मेहनत करता गया। दिन-रात काम किया। न्यूजपेपर में बेहतर काम करने की कोशिश की। हमेशा कुछ नया करने का जज्बा मन में बनाए रखा। आज युवाओं में शार्टकट प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। वे हर चेज का फल तुरंत चाहते हैं। युवा इस बात का हमेशा ध्यान रखें की जिस तरह फास्ट फ़ूड खाने में तो स्वादिस्ट होता है, लेकिन सेहत के लिहाज से वह ठीक नहीं है। फास्ट फ़ूड एटीटयूट  अपनाकर आप शार्ट पीरियड में सफलता तो पा लेंगे, लेकिन वह सफलता भी मात्र शार्ट पीरियड के लिए ही होगी। इसलिए युवाओं को मेरी सलाह है की वे अपने जीवन के कार्यक्षेत्र में शार्टकट कभी न अपनाएं।

एक्स्ट्रा स्ट्रोक :  मैं इंसान में ईमानदारी  का होना बहुत जरूरी मानता हूँ। यह ईमानदारी खुद को नहीं जानेगा, वह कुछ नहीं कर पाएगा। जब तक आप अपने काम के प्रति इमानदार नहीं रहेंगे तब तक कभी आगे नहीं पहुँच पाएंगे। लोग आप पर विश्वास नहीं करेंगे और जब लोगों को आप पर, आपके काम पर विश्वास नहीं होगा तब तक तरक्की संभव नहीं है।

मंजिल = नजरिया + काम + नो शार्टकट
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रघु राय, प्रसिद्ध फोटोग्राफर

20 अप्रैल 2011

हर प्रयास आख़िरी मानो

समर्पण : आपको जितनी जिम्मेदारी दी गयी है, उससे कुछ ज्यादा नतीजे देने की। आपने क्रिकेट के खेल में देखा होगा जब गेंद बाउंड्री की और जा रही होती है तो कुछ खिलाड़ी ऐसे होते हैं, जो उसे रोकने के खुद को पूरी तरह से झोंक देते हैं। उसे देख कर लगता है जैसे उसने मान लिया हो की यही जिन्दगी का आख़िरी मौक़ा है। छलांग लगा कर, घिसटते हुए, पलटते हुए, लुढ़कते हुए, किसी भी तरह उसे रोकना जरूरी है। हर मौके पर अपना बेहतरीन प्रयास और पूरा समर्पण करना जरूरी है।

संतोष : हम संतोष नहीं करते और खुश रहना नहीं जानते। एक हो जाए तो चार क्यों नहीं, यह सोच कर निराश रहते हैं। उपलब्धियों को ले कर 'और और' की भावना तो अच्छी है लेकिन इन चीजों को ही उपलब्धि नहीं मान लेना चाहिए। इससे आपका तनाव बढेगा और कामयाबी आपसे दूर हो जाएगी।

लीडरशिप : मैं भी एक लीडर हूँ। मेरे परिवार के 22 हजार सदस्य हैं, जिनके साथ मैं काम करता हूँ। आप जब यह मानने लगेंगे की भगवान् ने जितने लोगों को बनाया है, उसमें अपना कुछ हिस्सा लगा दिया है, तो आप अपने साथ के लोगों का महत्व भी स्वीकार करने लगेंगे। फुटपाथ पर सोया आदमी भी अपने अन्दर एक बेशकीमती चीज छुपाए है। आपको जिन लोगों के साथ काम करना है, कम से कम उनके अन्दर की उस चीज को जरूर पहचान होगा।

एक्स्ट्रा स्ट्रोक : दुनिया आपको मुफ्त में कुछ नहीं देती। सफलता जैसी बेशकीमती चीज तो बिलकुल नहीं। जो लोग सफलता का पकवान चखना चाहते हैं, उन्हें कड़ी मेहनत के लिए तैयार रहना ही होगा। मैं दिन में 14 से 16 घंटे काम करता हूँ। 60 साल का हूँ और आज भी रात नौ बजे तक दफ्तर में काम करता हूँ।

मेरी सफलता = समर्पण + संतोष + लीडरशिप 
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आर.ए. माशेलकर, वैज्ञानिक और सीएसआईआर के निदेशक

साहसी बनो प्रयोग करो

डिश की तरह ही सफलता की रेसिपी में भी कुछ मसाले लगते हैं। इंसान के गुण यदि चावल हैं तो पानी हुनर है। कोइ भी इन्हें सीखने की आंच पर तपा कर बेहतर बना सकता है। फिर बेचने की कला मिलाओ 'स्वादिष्ट सफलता' तैयार। 
 
प्रयोग : पुराने नियमों के आधार पर सिर्फ खोज की जा सकती है, आविष्कार नहीं होते। मैं हमेशा से नए-नए प्रयोग करता रहा हूँ। शायद मेरी सफलता का राज भी यही है। बस साहस करके आपको अपने खुद के प्रयोग करने होंगे। नए की तलाश करनी होगी। परम्परा से बांध कर आप साहसी नहीं बन सकते। मैं एक फिल्म निर्देशक के साथ सेट पर था, उसके काम को गौर से देख रहा था। एक कलाकार काफी कोशिश के बावजूद अपना किरदार ठीक नहीं कर पा रहा था। मैंने इजाजत ले कर उसे करने की कोशिश की। इस प्रयोग की सफलता के बाद मैं एक कलाकार भी हूँ और फिल में भी काम कर रहा हूँ।

सोच : आम तौर पर हम तर्क और ज्ञान के आधार पर ही सभी चीजों को देखते हैं, लेकिन रचनात्मकता इन सबसे अलग और बेहतर चीज है। ज्ञान और तर्क का इस्तेमाल रचनात्मकता (नई सोच) के साथ करने से कामयाबी हासिल हो सकती है। आज दुनिया भर में लोग मेरे योगा को पसंद करते हैं, तो इस सफलता में रचनात्मकता प्रमुख वजह है। मैंने योग को भी एक ले दी. योग नृत्य शुरू किया। योग का अभ्यास करने की जगह को मैं स्टूडियो कहता हूँ।

खोज : अगर आप्मने कामयाबी हासिल करने की चाहत है तो इसके लिए खुद में खोज करनी होगी। एक हद तक खतरे उठाने के लिए भी तैयार रहना होगा। आम तौर पर हमें अपनी खूबियों का पता तब चलता है, जब उनका इस्तेमाल करना होता। इंसान भी कुछ हद तक कई आवरणों से घिरा होता है। आम आईने में जिसे देखते हैं, दरअसल आप वह हैं ही नहीं। अपनी खूबियों का पता लगाइए। आप और शानदार आदमी हैं।

एक्स्ट्रा स्ट्रोक : नई चीजें सीखने के क्रम में आप अपना ध्यान न भटकाएँ। जो सीख रहे हैं, उसका उपयोग अपने लक्ष्य को हासिल करने में करें। मैंने बताया की फिल्म की शूटिंग के दौरान मैं अभिनय का प्रयोग किया था। इसके बाद मुझे निर्देशक ई. निवासी की एक फिल्म में अभिनय के लिए कहा। मैं वह फिल्म कर रहा हूँ, किन्तु मुझे भटकना नहीं है। योग ही मेरा जीवन है और मुझे अपने इस अनुभव का इस्तेमाल भी उसी में करना है।

मेरी सफलता = प्रयोग + सोच + खोज
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भरत ठाकुर, योग गुरू


कोशिश करते रहो


जब भी लक्ष्य तय करो, उसके लिए जुनूनी होना होगा। नाकामियों का आप पर नकारात्मक असर नहीं होना चाहिए। लक्ष्य को हासिल करने में कितना समय लग रहा है, उससे विचलित होने की जरूरत नहीं है।

जुनून : जीवन में किसी भी काम के लिए जूनून होना बहुत जरूरी है। मैं अपने जीवन में इसे बहुत महत्व दिया है। जब भी लक्ष्य तय करो, उसके लिए जुनूनी होना होगा। नाकामियों का आप पर नकारात्मक असर नहीं होना चाहिए। लक्ष्य को हासिल करने में कितना समय लग रहा है, इससे विचलित नहीं होना चाहिए। वर्ष 1996 में मैंने मैनेजमेंट कंसल्टेंसी ग्रुप प्लानमैन शुरू किया था। पहले साल इसके जितने डिवीजन खोले, वे सब अगले साल बंद हो चुके थे। मैंने एक पत्रिका शुरू की थी, एक टीवी प्रोडक्शन सिवीजन था, एक मीडिया मार्केटिंग डिवीजन था, लेकिन उस विफलता से मैंने अपनी पहल रोकी नहीं। नाकामी के बाद आप तय करें की अब अगला कदम क्या हो सकता है। हमें खुद अपने अन्दर से प्रेरणा लेने की क्षमता विकसित करनी होगी। प्रेरणा के लिए दूसरों पर निर्भर हो कर कामयाबी कभी नहीं हासिल हो सकती। सभी कामयाब लोग Self motivated होते हैं। आम तौर पर हम सोचते हैं की जिनको सफलता की जरूरत ज्यादा होती है, वे ज्यादा बड़े खतरे मोल लेते हैं, लेकिन हकीकत ठीक उल्टी । जब आप बड़े खतरे मोल लेते हैं तो विफलता और फिर उससे Demotivated होने की आशंका भी बढ़ जाती है। मैंने अपनी शुरूआती गलतियों के बाद इस बात को और अच्छी तरह से समझ लिया है की हमने अगर कामयाबी हासिल करनी है तो हमेशा Calculated risk ही लेनी होगी। हालांकि लक्ष्य बहुत आसान भी नहीं हो और चुनौती बनी रहे।

रिश्ते : अपनी ही और से बनाए गए श्रेष्ठता के पैमाने से मुकाबले करते रहना चाहिए। नहीं तो आपको हमेसा अपनी जिन्दगी और अपने अस्तित्व पर दुःख होगा। खुशी की तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए। इससे आपके विफल होने की आशंका ज्यादा बढ़ जाएगी। मेरे लिए Excelence क्या हो यह खुद तय करना है। दूसरों को क्या हासिल हुआ है इससे मुझे प्रभावित नहीं होना । रिश्तों को दीर्घकालिक। दोस्तों, रिश्तेदारों के साथ बनाए ऐसे रिश्ते आपको बहुत मदद पहुंचा सकते । जिन लोगों के उपलब्धि की कामना होती है। उनके अन्दर एक ख़ास किस्म का स्पार्क होता है। ऐसा व्यक्ति टिकाऊ रिश्तों में भरोसा करेगा। आखिरकार हम सामाजिक प्राणी हैं। यह ठीक है की हम अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हैं और हमें प्रेरणा लेने के लिए भी किसी की जरूरत नहीं है लेकिन इसके बावजूद हम बिलकुल अकेले नहीं चल सकते। हमें एक भावनात्मक सहयोग की जरूरत होती है।

लीडरशिप : मैंने अपने संस्थान की पिछली सालाना बैठक में एक ही एजेंडा पेश किया। मैंने यहाँ काम करने वाले सभी लोगों से सिर्फ यही कहा की अगली मुलाक़ात में मुझे आप सब यह बताएं की आपने इस दौरान कितने लीडर बनाए। एक सफल लीडर वही है जो दूसरा सफल लीडर पैदा कर सकता है। अगर आप आगे बढना चाहते हैं तो आपको लीडर पैदा करने। ऐसे लोग पैदा करने होंगे, जो आपकी जगह ले। 1996 में जब मैंने प्लानमैन कंसल्टेंसी शुरू की थी, तब हम पांच लोग थे. आज हम 300 लोग हैं और यहाँ 15 डिवीजन हैं। अगर मैं चाहूं की सभी 15 डिवीजन के काम मैं खुद संभालूँगा, तो यह मुमकिन नहीं हो सकता। मुझे अपने साथ ऐसे लोग विकसित करने होंगे, जो अपने फैसले खुद ले सकें। मेरे साथ काम करने वाले बहुत-से लोग हैं और वे भी अपनी टीम का नेतृत्व कर रहे हैं।

एक्स्ट्रा स्ट्रोक : लोग सोचने लगते हैं की उनके पास जितने उत्पाद होंगे, वे उतनी ही खुश होंगे। आज पूरी मानवता इस समस्या से प्रभावित है। लोग ज्यादा से ज्यादा सामान हासिल करने को ही सफलता मानने लगे हैं। लेकिन उत्पादों से पैदा होने वाली खुशी और संतोष बहुत थोड़े समय के लिए होती है। आज अगर आप 29 इंच का कलर टीवी घर लाए हैं तो तीन दिन तक बहुत उत्साह रहेगा। चौथे दिन आप शायद टीवी चलाना भूल जाएंगे और फिर अगले साल आप सोचेंगे की होम थिएटर कैसे खरीदा जाए। उत्पाद का उपभोग उसकी कीमत घटाता है, वह उतनी ही कम पसंद आने लगेई है। इससे हमारा दिमाग अस्थिर होता है और कभी संतुष्टि नहीं मिलती. हम अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं। जबकि रिश्ते, किताबें, पेंटिंग, संगीत और प्रकृति जैसी चीजें ऐसी होती हैं, जिनसे आप जितना अधिक नजदीक जाएंगे, उतना अधिक प्यार करेंगे। अगर कल को इतना पैसा हो जाए की और बड़ा टीवी खरीदा जा सकता है तो मैं लें आउंगा, लेकिन उसको अपना लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता. अपने खुद के बनाए आदर्श को छूना है और फिर पीछे छोड़ना है। मेरा लक्ष्य नहीं होना चाहिए।

सफलता  =  जूनून + रिश्ते + लीडरशिप 
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अरिंदम चौधरी, मैनेजमेंट गुरू, मोटिवेटर

सबसे पहले सपना पालो


सपने जरूर देखें और उन सपनों को साकार करने की तीव्र चाह अपने अन्दर पैदा करें। मेहनत व दिल से किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।
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सफलता, असफलता तो सभी के साथ लगी रहती है। पर आत्मविश्वास आपकी जिन्दगी में बहुत जरूरी है। मेरा यह सफ़र सपने और आशावादी की मजबूत बुनियाद पर खडा है।
अपनी चरम आशावादी प्रवृत्ति और उन्मुक्त वैचारिक श्रृंखलाओं के बीच वायुसेना में पायलेट बनने का एक मात्र लक्ष्य मैं कब निर्धारित कर लिया था इसका मुझे पता ही नहीं चला। खैर, अपनी पढाई के समाप्त होते ही अपने इस एक मात्र ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए मैं देहरादून में आयोजित वायुसेना की मौखिक परीक्षा में सम्मलित हो गया। मौखिक परीक्षा में अंतिम रूप से अपने चयन के प्रति मैं पूरी तरह से आश्वस्त था। लेकिन परिणाम के घोषित होने के साथ मानो मैं आसमान से गिरकर खजूर में अटक गया। मुझे असफल करार दे दिया गया था। इसके साथ ही मेरा एक मात्र खवाब भी बुरी तरह से टूटकर मिट्टी में मिल चुका था। मैं निराश था।

घनघोर निराशा के इसी दौर में ऋषिकेश में मेरी मुलाक़ात स्वामी शिवानन्द से हुई जिनके चेहरे से झलकती हुई निर्विकल्प शांति और बालसुलभ मुस्कराहट ने बरबस ही मुझे उनकी और आकर्षित कर दिया। मैंने अपनी सारी परेशानियाओं का उल्लेख स्वामी जी से किया। मेरी परेशानियों को ध्यानपूर्वक सुनाने के बाद स्वामी जी ने स्नेह से मेरे सर पर हाथ फेरा और मुस्कुराते हुए बोले - 'कलाम, तीव्र चाह हमेशा एक विशुद्ध ऊर्जा से भरी होती है और जो सूर्य की किरणों की भाँती ही अविराम, सत्य और शास्वत है अतः इस असफलता को भूलकर अपनी नियती और ऊर्जा को पहचानो। उसी पथ का निर्माण करो, जिसके लिए तुम बने हो, मंजिल तुम्हारे कदम चूमेगी।

स्वामी जी के इन वचनों के साथ ही मेरी सारी उलझनें, मेरे सारे गतिरोध, सारी परेशानियां काफूल होगी। मैं अपनी समस्त आतंरिक शक्तियों के साथ अपनी मंजिल के लिए जुट गया। लक्ष्य के प्रति समर्पित मेरी चाहतों ने मेरे कई सपनों को जन्म दिया...... और मैं अपने सार्थक प्रयासों तथा समर्पित कार्यों की बदौलत हर एक सपनो को साकार करता चला गया। मैं जब भी अपने अतीत में झांकता हूँ तो इस कथन को सौ फीसदी सच पाता हूँ। यह सच है की अपने समस्त जीवन में वास्तविक सपनों के निर्माण में मैंने कहीं कोइ कोताही नहीं बरती। जब भी कभी मेरी आशा, सपने या लक्ष्य अपारदर्शी होते दिखे मैंने हमेशा इसके पीछे छिपे लक्ष्य प्राप्ति के स्वर्णिम अवसर को ढून्ढ निकाला। एक राष्ट्रपति के रूप में भी मैं देश और जनता को शान्ति, सफलता और सम्रद्धि की सफलतम मंजिल तक पहुंचाने का एक मात्र ख्वाब ही देखता हूँ।
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देश के सभी युवाओं को मैं कहना चाहता हूँ की सपने जरूर देखें और उन सपनों को साकार करने की तीव्र चाह अपने अन्दर पैदा करें और जुट जाएं अपने ख़्वाबों को साकार करने में। मेहनत व दिल से किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। अतः सफलता के लिए सपने देखना बहुत जरूरी है क्योंकि सपने ही नहीं देखोगे तो उन्हें पूरा भी नहीं कर पाओगे।
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कामयाबी = सपने + आशावादी  
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एपीजे अब्दुल कलाम, भूतपूर्व राष्ट्रपति

11 अप्रैल 2011

हस्त मुद्राओं द्वारा चिकित्सा

हमारा शरीर अनन्त रहस्यों से भरा हुआ है। शरीर को स्वस्थ बनाए रखने की शक्ति शरीर में निहित है। बस जरूरत है उसे जानकर अभ्यास करने की। शरीर पंचतत्वों-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से मिलकर बना है। जब तक शरीर में ये तत्व संतुलित रहते हैं, तब तक शरीर निरोगी रहता है। यदि इन तत्वों में असंतुलन हो जाए तो नानाप्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इन तत्वों को हम यदि पुन: संतुलित कर दें तो शरीर निरोगी हो जाता है।

हस्तमुद्रा चिकित्सा के अनुसार हाथ की पांचों अंगुलियां पांचों तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के माध्यम से इन तत्वों को बल देती रहती है। अंगूठे में अग्नि तत्व, तर्जनी में वायु तत्व, मध्यमा में आकाश तत्व, अनामिका में पृथ्वी तत्व व कनिष्ठा में जल तत्व की ऊर्जा का केन्द्र है। इस प्रकार अंगुलियों को आपस में मिलाकर मुद्राओं को बनाया जाता है। हमारे ऋषियों ने इस रहस्य को साधना के द्वारा जाना और इसका प्रचार-प्रसार किया जिसके प्रतिदिन अभ्यास से व्यक्ति रोगमुक्त होकर स्वस्थ रह सके।

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ये अद्भुत मुद्राएं करते ही अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं। पद्मासन, स्वस्तिकासन, सुखासन, वज्रासन में करने से जिस रोग के लिए जो मुद्रा वर्णित है उसको इस भाव से करें कि मेरा रोग ठीक हो रहा है, तब ये मुद्राएं शीघ्रता से रोग को दूर करने में लग जाती हैं। बिना भाव के लाभ अधिक नहीं मिल पाता। दिन में 20-30 मिनट तक एक मुद्रा को किया जाए तो पूरा लाभ प्राप्त हो जाता है। एक बार में न हो सके तो दो-तीन बार में कर लें। किसी भी मुद्रा में जिन अंगुलियों का प्रयोग नहीं करते उन्हें सीधा करके रख लेते हैं और हथेली को थोड़ा टाइट रखते हैं। यों तो मुद्राओं की संख्या अनेक है, किन्तु यहां हम आपको कुछ उपयोगी मुद्राओं के बारे में बता रहे हैं-

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विधि: अंगूठे को तर्जनी अंगुली के सिरे पर लगाएं व बाकी तीनों अंगुलियाँ सीधी रहेंगी।

लाभ: मस्तिष्क के स्नायु को बल देकर यह स्मरण शक्ति, एकाग्रता शक्ति, संकल्प शक्ति को बढ़ाती है, बुद्धि का विकास करती है, पढ़ाई में मन लगने लगता है, सिर दर्द व नींद न आना दूर होता है, मन की चंचलता दूर होकर क्रोध, चिड़चिड़ापन, तनाव, चिंता को दूर कर व्यक्ति को आध्यात्मिक बना देती है।

नोट: सात्विक भोजन करने से शीघ्रता से लाभ देती है।
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विधि: अनामिका अंगुली को अंगूठे के अग्रभाग से लगाकर बाकी अंगुलियां सीधी रखें।

लाभ: दुबर्लता को दूर कर वजन को बढ़ाती है, शरीर में स्फूर्ति, कान्ति एवं तेज बढ़ाकर जीवनी शक्ति का विकास करती है, पाचन तन्त्र स्वस्थ बनाती है।

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विधि: कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर बाकी अंगुलियों को सीधा रखने से बनती है।

लाभ: चर्मरोग, रक्त विकार दूर करती है, शरीर में रूखापन दूर कर त्वचा को चमकीली व मुलायम बनाती है, चेहरे की सुन्दरता को बढ़ा देती है।

नोट: कफ प्रकृति वाले व्यक्ति इसका अभ्यास ज्यादा न करें।

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विधि: तर्जनी अंगुली को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगाकर हल्का सा दबाएं। बाकी अंगुलियां सीधी रहेंगी।

लाभ: वात रोगों में विशेष लाभकारी है। प्रकुपित वायु को शान्त कर देती है, साइटिका, कमर दर्द, गर्दन दर्द, पारकिंसन, गठिया, लकवा, जोड़ों का दर्द, घुटने का दर्द दूर करती है।
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विधि: मध्यमा अंगुली को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगाकर अंगूठे से दबाएं व बाकी अंगुलियां सीधी रखें।

लाभ: गले के रोग व थाइराइड में लाभकारी है, दांत मजबूत होते हैं, कर्ण रोगों में लाभकारी है।
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विधि: अनामिका अंगुली को अंगूठे के मूल में लगाकर अंगूठे से दबाकर बाकी अगुलियों को सीधा करके रखें।

लाभ: मोटापा कम करती है, वजन को घटाने वाली है, शरीर में उष्णता बढ़ाती है, शक्ति का विकास करती है, कोलेस्ट्राल का बढ़ना, मधुमेह व लीवर के रोग में लाभ पहुंचाती है, शरीर को संतुलित बना देती है।

नोट: कमजोर व्यक्ति इसका अभ्यास न करें। गर्मी में भी ज्यादा न करें।
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विधि: अनामिका तथा कनिष्ठा अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर बाकी दोनों अंगुलियों को सीधा रखें।

लाभ: मन को शान्त कर शरीर की दुर्बलता को दूर करती है, रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ा देती है, नेत्र ज्योति बढ़ाती है, थकान दूर कर शरीर में तरोताजगी देती है, त्वचा व आंखों को निर्मल बना देती है, विटामिन की कमी को दूर करती है।
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विधि: मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग से लगाकर बाकी अंगुलियों को सीधी रखें।

लाभ: कब्ज, मधुमेह, किडनी विकार, वायु विकार, बवासीर को दूर करती है, शरीर को शुद्ध कर नाड़ी दोषों को दूर कर देती है, मूत्र का अवरोध दूर कर दांतों को मजबूत करती है, पसीना भी लाती है।

नोट: यह मुद्रा मूत्र अधिक लाती है।
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विधि: यह मुद्रा तर्जनी अंगुली को अंगूठे के मूल में लगाकर मध्यमा व अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर छोटी अंगुली को सीधा करके बनती है।

लाभ: हृदय रोगों में विशेष रूप से लाभकारी है। प्रतिदिन 10-15 मिनट इसके अभ्यास से हृदय मजबूत होता है, दिल का दौरा पड़ते ही इसको करने से आराम मिलता है, गैस बनना, सिरदर्द, अस्थमा व उच्च रक्तचाप में लाभकारी है। सीढि़यों पर चढ़ने से पहले ही अगर इसको लगाकर चढ़ा जाए तो सांस नहीं फूलती।

विधि: दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर बांधकर बाएं हाथ के अंगूठे को खड़ा रखें।

लाभ: सर्दी, जुकाम, खांसी, साइनुसाइटिस, अस्थमा, निमन् रक्तचाप को दूर कर शरीर की गर्मी को बढ़ा देती है, कफ को सुखाने का कार्य करती है।

नोटः आवश्यकता होने पर ही करें, अनावश्यक न करें।