20 अप्रैल 2011
हर प्रयास आख़िरी मानो
समर्पण : आपको जितनी जिम्मेदारी दी गयी है, उससे कुछ ज्यादा नतीजे देने की। आपने क्रिकेट के खेल में देखा होगा जब गेंद बाउंड्री की और जा रही होती है तो कुछ खिलाड़ी ऐसे होते हैं, जो उसे रोकने के खुद को पूरी तरह से झोंक देते हैं। उसे देख कर लगता है जैसे उसने मान लिया हो की यही जिन्दगी का आख़िरी मौक़ा है। छलांग लगा कर, घिसटते हुए, पलटते हुए, लुढ़कते हुए, किसी भी तरह उसे रोकना जरूरी है। हर मौके पर अपना बेहतरीन प्रयास और पूरा समर्पण करना जरूरी है।
संतोष : हम संतोष नहीं करते और खुश रहना नहीं जानते। एक हो जाए तो चार क्यों नहीं, यह सोच कर निराश रहते हैं। उपलब्धियों को ले कर 'और और' की भावना तो अच्छी है लेकिन इन चीजों को ही उपलब्धि नहीं मान लेना चाहिए। इससे आपका तनाव बढेगा और कामयाबी आपसे दूर हो जाएगी।
लीडरशिप : मैं भी एक लीडर हूँ। मेरे परिवार के 22 हजार सदस्य हैं, जिनके साथ मैं काम करता हूँ। आप जब यह मानने लगेंगे की भगवान् ने जितने लोगों को बनाया है, उसमें अपना कुछ हिस्सा लगा दिया है, तो आप अपने साथ के लोगों का महत्व भी स्वीकार करने लगेंगे। फुटपाथ पर सोया आदमी भी अपने अन्दर एक बेशकीमती चीज छुपाए है। आपको जिन लोगों के साथ काम करना है, कम से कम उनके अन्दर की उस चीज को जरूर पहचान होगा।
एक्स्ट्रा स्ट्रोक : दुनिया आपको मुफ्त में कुछ नहीं देती। सफलता जैसी बेशकीमती चीज तो बिलकुल नहीं। जो लोग सफलता का पकवान चखना चाहते हैं, उन्हें कड़ी मेहनत के लिए तैयार रहना ही होगा। मैं दिन में 14 से 16 घंटे काम करता हूँ। 60 साल का हूँ और आज भी रात नौ बजे तक दफ्तर में काम करता हूँ।
मेरी सफलता = समर्पण + संतोष + लीडरशिप
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आर.ए. माशेलकर, वैज्ञानिक और सीएसआईआर के निदेशक
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Posted by Udit bhargava at 4/20/2011 07:38:00 pm 0 comments
साहसी बनो प्रयोग करो
डिश की तरह ही सफलता की रेसिपी में भी कुछ मसाले लगते हैं। इंसान के गुण यदि चावल हैं तो पानी हुनर है। कोइ भी इन्हें सीखने की आंच पर तपा कर बेहतर बना सकता है। फिर बेचने की कला मिलाओ 'स्वादिष्ट सफलता' तैयार।
प्रयोग : पुराने नियमों के आधार पर सिर्फ खोज की जा सकती है, आविष्कार नहीं होते। मैं हमेशा से नए-नए प्रयोग करता रहा हूँ। शायद मेरी सफलता का राज भी यही है। बस साहस करके आपको अपने खुद के प्रयोग करने होंगे। नए की तलाश करनी होगी। परम्परा से बांध कर आप साहसी नहीं बन सकते। मैं एक फिल्म निर्देशक के साथ सेट पर था, उसके काम को गौर से देख रहा था। एक कलाकार काफी कोशिश के बावजूद अपना किरदार ठीक नहीं कर पा रहा था। मैंने इजाजत ले कर उसे करने की कोशिश की। इस प्रयोग की सफलता के बाद मैं एक कलाकार भी हूँ और फिल में भी काम कर रहा हूँ।सोच : आम तौर पर हम तर्क और ज्ञान के आधार पर ही सभी चीजों को देखते हैं, लेकिन रचनात्मकता इन सबसे अलग और बेहतर चीज है। ज्ञान और तर्क का इस्तेमाल रचनात्मकता (नई सोच) के साथ करने से कामयाबी हासिल हो सकती है। आज दुनिया भर में लोग मेरे योगा को पसंद करते हैं, तो इस सफलता में रचनात्मकता प्रमुख वजह है। मैंने योग को भी एक ले दी. योग नृत्य शुरू किया। योग का अभ्यास करने की जगह को मैं स्टूडियो कहता हूँ।
खोज : अगर आप्मने कामयाबी हासिल करने की चाहत है तो इसके लिए खुद में खोज करनी होगी। एक हद तक खतरे उठाने के लिए भी तैयार रहना होगा। आम तौर पर हमें अपनी खूबियों का पता तब चलता है, जब उनका इस्तेमाल करना होता। इंसान भी कुछ हद तक कई आवरणों से घिरा होता है। आम आईने में जिसे देखते हैं, दरअसल आप वह हैं ही नहीं। अपनी खूबियों का पता लगाइए। आप और शानदार आदमी हैं।
एक्स्ट्रा स्ट्रोक : नई चीजें सीखने के क्रम में आप अपना ध्यान न भटकाएँ। जो सीख रहे हैं, उसका उपयोग अपने लक्ष्य को हासिल करने में करें। मैंने बताया की फिल्म की शूटिंग के दौरान मैं अभिनय का प्रयोग किया था। इसके बाद मुझे निर्देशक ई. निवासी की एक फिल्म में अभिनय के लिए कहा। मैं वह फिल्म कर रहा हूँ, किन्तु मुझे भटकना नहीं है। योग ही मेरा जीवन है और मुझे अपने इस अनुभव का इस्तेमाल भी उसी में करना है।
मेरी सफलता = प्रयोग + सोच + खोज
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भरत ठाकुर, योग गुरू
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Posted by Udit bhargava at 4/20/2011 07:19:00 pm 0 comments
कोशिश करते रहो
जब भी लक्ष्य तय करो, उसके लिए जुनूनी होना होगा। नाकामियों का आप पर नकारात्मक असर नहीं होना चाहिए। लक्ष्य को हासिल करने में कितना समय लग रहा है, उससे विचलित होने की जरूरत नहीं है।
जुनून : जीवन में किसी भी काम के लिए जूनून होना बहुत जरूरी है। मैं अपने जीवन में इसे बहुत महत्व दिया है। जब भी लक्ष्य तय करो, उसके लिए जुनूनी होना होगा। नाकामियों का आप पर नकारात्मक असर नहीं होना चाहिए। लक्ष्य को हासिल करने में कितना समय लग रहा है, इससे विचलित नहीं होना चाहिए। वर्ष 1996 में मैंने मैनेजमेंट कंसल्टेंसी ग्रुप प्लानमैन शुरू किया था। पहले साल इसके जितने डिवीजन खोले, वे सब अगले साल बंद हो चुके थे। मैंने एक पत्रिका शुरू की थी, एक टीवी प्रोडक्शन सिवीजन था, एक मीडिया मार्केटिंग डिवीजन था, लेकिन उस विफलता से मैंने अपनी पहल रोकी नहीं। नाकामी के बाद आप तय करें की अब अगला कदम क्या हो सकता है। हमें खुद अपने अन्दर से प्रेरणा लेने की क्षमता विकसित करनी होगी। प्रेरणा के लिए दूसरों पर निर्भर हो कर कामयाबी कभी नहीं हासिल हो सकती। सभी कामयाब लोग Self motivated होते हैं। आम तौर पर हम सोचते हैं की जिनको सफलता की जरूरत ज्यादा होती है, वे ज्यादा बड़े खतरे मोल लेते हैं, लेकिन हकीकत ठीक उल्टी । जब आप बड़े खतरे मोल लेते हैं तो विफलता और फिर उससे Demotivated होने की आशंका भी बढ़ जाती है। मैंने अपनी शुरूआती गलतियों के बाद इस बात को और अच्छी तरह से समझ लिया है की हमने अगर कामयाबी हासिल करनी है तो हमेशा Calculated risk ही लेनी होगी। हालांकि लक्ष्य बहुत आसान भी नहीं हो और चुनौती बनी रहे।
रिश्ते : अपनी ही और से बनाए गए श्रेष्ठता के पैमाने से मुकाबले करते रहना चाहिए। नहीं तो आपको हमेसा अपनी जिन्दगी और अपने अस्तित्व पर दुःख होगा। खुशी की तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए। इससे आपके विफल होने की आशंका ज्यादा बढ़ जाएगी। मेरे लिए Excelence क्या हो यह खुद तय करना है। दूसरों को क्या हासिल हुआ है इससे मुझे प्रभावित नहीं होना । रिश्तों को दीर्घकालिक। दोस्तों, रिश्तेदारों के साथ बनाए ऐसे रिश्ते आपको बहुत मदद पहुंचा सकते । जिन लोगों के उपलब्धि की कामना होती है। उनके अन्दर एक ख़ास किस्म का स्पार्क होता है। ऐसा व्यक्ति टिकाऊ रिश्तों में भरोसा करेगा। आखिरकार हम सामाजिक प्राणी हैं। यह ठीक है की हम अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हैं और हमें प्रेरणा लेने के लिए भी किसी की जरूरत नहीं है लेकिन इसके बावजूद हम बिलकुल अकेले नहीं चल सकते। हमें एक भावनात्मक सहयोग की जरूरत होती है।
लीडरशिप : मैंने अपने संस्थान की पिछली सालाना बैठक में एक ही एजेंडा पेश किया। मैंने यहाँ काम करने वाले सभी लोगों से सिर्फ यही कहा की अगली मुलाक़ात में मुझे आप सब यह बताएं की आपने इस दौरान कितने लीडर बनाए। एक सफल लीडर वही है जो दूसरा सफल लीडर पैदा कर सकता है। अगर आप आगे बढना चाहते हैं तो आपको लीडर पैदा करने। ऐसे लोग पैदा करने होंगे, जो आपकी जगह ले। 1996 में जब मैंने प्लानमैन कंसल्टेंसी शुरू की थी, तब हम पांच लोग थे. आज हम 300 लोग हैं और यहाँ 15 डिवीजन हैं। अगर मैं चाहूं की सभी 15 डिवीजन के काम मैं खुद संभालूँगा, तो यह मुमकिन नहीं हो सकता। मुझे अपने साथ ऐसे लोग विकसित करने होंगे, जो अपने फैसले खुद ले सकें। मेरे साथ काम करने वाले बहुत-से लोग हैं और वे भी अपनी टीम का नेतृत्व कर रहे हैं।
एक्स्ट्रा स्ट्रोक : लोग सोचने लगते हैं की उनके पास जितने उत्पाद होंगे, वे उतनी ही खुश होंगे। आज पूरी मानवता इस समस्या से प्रभावित है। लोग ज्यादा से ज्यादा सामान हासिल करने को ही सफलता मानने लगे हैं। लेकिन उत्पादों से पैदा होने वाली खुशी और संतोष बहुत थोड़े समय के लिए होती है। आज अगर आप 29 इंच का कलर टीवी घर लाए हैं तो तीन दिन तक बहुत उत्साह रहेगा। चौथे दिन आप शायद टीवी चलाना भूल जाएंगे और फिर अगले साल आप सोचेंगे की होम थिएटर कैसे खरीदा जाए। उत्पाद का उपभोग उसकी कीमत घटाता है, वह उतनी ही कम पसंद आने लगेई है। इससे हमारा दिमाग अस्थिर होता है और कभी संतुष्टि नहीं मिलती. हम अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं। जबकि रिश्ते, किताबें, पेंटिंग, संगीत और प्रकृति जैसी चीजें ऐसी होती हैं, जिनसे आप जितना अधिक नजदीक जाएंगे, उतना अधिक प्यार करेंगे। अगर कल को इतना पैसा हो जाए की और बड़ा टीवी खरीदा जा सकता है तो मैं लें आउंगा, लेकिन उसको अपना लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता. अपने खुद के बनाए आदर्श को छूना है और फिर पीछे छोड़ना है। मेरा लक्ष्य नहीं होना चाहिए।
सफलता = जूनून + रिश्ते + लीडरशिप
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अरिंदम चौधरी, मैनेजमेंट गुरू, मोटिवेटर
Labels: वैचारिक मंथन
Posted by Udit bhargava at 4/20/2011 06:55:00 pm 0 comments
सबसे पहले सपना पालो
सपने जरूर देखें और उन सपनों को साकार करने की तीव्र चाह अपने अन्दर पैदा करें। मेहनत व दिल से किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।
.सफलता, असफलता तो सभी के साथ लगी रहती है। पर आत्मविश्वास आपकी जिन्दगी में बहुत जरूरी है। मेरा यह सफ़र सपने और आशावादी की मजबूत बुनियाद पर खडा है।
अपनी चरम आशावादी प्रवृत्ति और उन्मुक्त वैचारिक श्रृंखलाओं के बीच वायुसेना में पायलेट बनने का एक मात्र लक्ष्य मैं कब निर्धारित कर लिया था इसका मुझे पता ही नहीं चला। खैर, अपनी पढाई के समाप्त होते ही अपने इस एक मात्र ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए मैं देहरादून में आयोजित वायुसेना की मौखिक परीक्षा में सम्मलित हो गया। मौखिक परीक्षा में अंतिम रूप से अपने चयन के प्रति मैं पूरी तरह से आश्वस्त था। लेकिन परिणाम के घोषित होने के साथ मानो मैं आसमान से गिरकर खजूर में अटक गया। मुझे असफल करार दे दिया गया था। इसके साथ ही मेरा एक मात्र खवाब भी बुरी तरह से टूटकर मिट्टी में मिल चुका था। मैं निराश था।
घनघोर निराशा के इसी दौर में ऋषिकेश में मेरी मुलाक़ात स्वामी शिवानन्द से हुई जिनके चेहरे से झलकती हुई निर्विकल्प शांति और बालसुलभ मुस्कराहट ने बरबस ही मुझे उनकी और आकर्षित कर दिया। मैंने अपनी सारी परेशानियाओं का उल्लेख स्वामी जी से किया। मेरी परेशानियों को ध्यानपूर्वक सुनाने के बाद स्वामी जी ने स्नेह से मेरे सर पर हाथ फेरा और मुस्कुराते हुए बोले - 'कलाम, तीव्र चाह हमेशा एक विशुद्ध ऊर्जा से भरी होती है और जो सूर्य की किरणों की भाँती ही अविराम, सत्य और शास्वत है अतः इस असफलता को भूलकर अपनी नियती और ऊर्जा को पहचानो। उसी पथ का निर्माण करो, जिसके लिए तुम बने हो, मंजिल तुम्हारे कदम चूमेगी।
स्वामी जी के इन वचनों के साथ ही मेरी सारी उलझनें, मेरे सारे गतिरोध, सारी परेशानियां काफूल होगी। मैं अपनी समस्त आतंरिक शक्तियों के साथ अपनी मंजिल के लिए जुट गया। लक्ष्य के प्रति समर्पित मेरी चाहतों ने मेरे कई सपनों को जन्म दिया...... और मैं अपने सार्थक प्रयासों तथा समर्पित कार्यों की बदौलत हर एक सपनो को साकार करता चला गया। मैं जब भी अपने अतीत में झांकता हूँ तो इस कथन को सौ फीसदी सच पाता हूँ। यह सच है की अपने समस्त जीवन में वास्तविक सपनों के निर्माण में मैंने कहीं कोइ कोताही नहीं बरती। जब भी कभी मेरी आशा, सपने या लक्ष्य अपारदर्शी होते दिखे मैंने हमेशा इसके पीछे छिपे लक्ष्य प्राप्ति के स्वर्णिम अवसर को ढून्ढ निकाला। एक राष्ट्रपति के रूप में भी मैं देश और जनता को शान्ति, सफलता और सम्रद्धि की सफलतम मंजिल तक पहुंचाने का एक मात्र ख्वाब ही देखता हूँ।
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देश के सभी युवाओं को मैं कहना चाहता हूँ की सपने जरूर देखें और उन सपनों को साकार करने की तीव्र चाह अपने अन्दर पैदा करें और जुट जाएं अपने ख़्वाबों को साकार करने में। मेहनत व दिल से किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। अतः सफलता के लिए सपने देखना बहुत जरूरी है क्योंकि सपने ही नहीं देखोगे तो उन्हें पूरा भी नहीं कर पाओगे।
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कामयाबी = सपने + आशावादी
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एपीजे अब्दुल कलाम, भूतपूर्व राष्ट्रपति
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एपीजे अब्दुल कलाम, भूतपूर्व राष्ट्रपति
Labels: वैचारिक मंथन
Posted by Udit bhargava at 4/20/2011 06:18:00 pm 0 comments
11 अप्रैल 2011
हस्त मुद्राओं द्वारा चिकित्सा
हमारा शरीर अनन्त रहस्यों से भरा हुआ है। शरीर को स्वस्थ बनाए रखने की शक्ति शरीर में निहित है। बस जरूरत है उसे जानकर अभ्यास करने की। शरीर पंचतत्वों-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से मिलकर बना है। जब तक शरीर में ये तत्व संतुलित रहते हैं, तब तक शरीर निरोगी रहता है। यदि इन तत्वों में असंतुलन हो जाए तो नानाप्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इन तत्वों को हम यदि पुन: संतुलित कर दें तो शरीर निरोगी हो जाता है।
हस्तमुद्रा चिकित्सा के अनुसार हाथ की पांचों अंगुलियां पांचों तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के माध्यम से इन तत्वों को बल देती रहती है। अंगूठे में अग्नि तत्व, तर्जनी में वायु तत्व, मध्यमा में आकाश तत्व, अनामिका में पृथ्वी तत्व व कनिष्ठा में जल तत्व की ऊर्जा का केन्द्र है। इस प्रकार अंगुलियों को आपस में मिलाकर मुद्राओं को बनाया जाता है। हमारे ऋषियों ने इस रहस्य को साधना के द्वारा जाना और इसका प्रचार-प्रसार किया जिसके प्रतिदिन अभ्यास से व्यक्ति रोगमुक्त होकर स्वस्थ रह सके।
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ये अद्भुत मुद्राएं करते ही अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं। पद्मासन, स्वस्तिकासन, सुखासन, वज्रासन में करने से जिस रोग के लिए जो मुद्रा वर्णित है उसको इस भाव से करें कि मेरा रोग ठीक हो रहा है, तब ये मुद्राएं शीघ्रता से रोग को दूर करने में लग जाती हैं। बिना भाव के लाभ अधिक नहीं मिल पाता। दिन में 20-30 मिनट तक एक मुद्रा को किया जाए तो पूरा लाभ प्राप्त हो जाता है। एक बार में न हो सके तो दो-तीन बार में कर लें। किसी भी मुद्रा में जिन अंगुलियों का प्रयोग नहीं करते उन्हें सीधा करके रख लेते हैं और हथेली को थोड़ा टाइट रखते हैं। यों तो मुद्राओं की संख्या अनेक है, किन्तु यहां हम आपको कुछ उपयोगी मुद्राओं के बारे में बता रहे हैं-
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विधि: अंगूठे को तर्जनी अंगुली के सिरे पर लगाएं व बाकी तीनों अंगुलियाँ सीधी रहेंगी।
लाभ: मस्तिष्क के स्नायु को बल देकर यह स्मरण शक्ति, एकाग्रता शक्ति, संकल्प शक्ति को बढ़ाती है, बुद्धि का विकास करती है, पढ़ाई में मन लगने लगता है, सिर दर्द व नींद न आना दूर होता है, मन की चंचलता दूर होकर क्रोध, चिड़चिड़ापन, तनाव, चिंता को दूर कर व्यक्ति को आध्यात्मिक बना देती है।
नोट: सात्विक भोजन करने से शीघ्रता से लाभ देती है।
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विधि: अनामिका अंगुली को अंगूठे के अग्रभाग से लगाकर बाकी अंगुलियां सीधी रखें।
लाभ: दुबर्लता को दूर कर वजन को बढ़ाती है, शरीर में स्फूर्ति, कान्ति एवं तेज बढ़ाकर जीवनी शक्ति का विकास करती है, पाचन तन्त्र स्वस्थ बनाती है।
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विधि: कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर बाकी अंगुलियों को सीधा रखने से बनती है।
लाभ: चर्मरोग, रक्त विकार दूर करती है, शरीर में रूखापन दूर कर त्वचा को चमकीली व मुलायम बनाती है, चेहरे की सुन्दरता को बढ़ा देती है।
नोट: कफ प्रकृति वाले व्यक्ति इसका अभ्यास ज्यादा न करें।
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विधि: तर्जनी अंगुली को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगाकर हल्का सा दबाएं। बाकी अंगुलियां सीधी रहेंगी।
लाभ: वात रोगों में विशेष लाभकारी है। प्रकुपित वायु को शान्त कर देती है, साइटिका, कमर दर्द, गर्दन दर्द, पारकिंसन, गठिया, लकवा, जोड़ों का दर्द, घुटने का दर्द दूर करती है।
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विधि: मध्यमा अंगुली को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगाकर अंगूठे से दबाएं व बाकी अंगुलियां सीधी रखें।
लाभ: गले के रोग व थाइराइड में लाभकारी है, दांत मजबूत होते हैं, कर्ण रोगों में लाभकारी है।
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विधि: अनामिका अंगुली को अंगूठे के मूल में लगाकर अंगूठे से दबाकर बाकी अगुलियों को सीधा करके रखें।
लाभ: मोटापा कम करती है, वजन को घटाने वाली है, शरीर में उष्णता बढ़ाती है, शक्ति का विकास करती है, कोलेस्ट्राल का बढ़ना, मधुमेह व लीवर के रोग में लाभ पहुंचाती है, शरीर को संतुलित बना देती है।
नोट: कमजोर व्यक्ति इसका अभ्यास न करें। गर्मी में भी ज्यादा न करें।
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विधि: अनामिका तथा कनिष्ठा अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर बाकी दोनों अंगुलियों को सीधा रखें।
लाभ: मन को शान्त कर शरीर की दुर्बलता को दूर करती है, रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ा देती है, नेत्र ज्योति बढ़ाती है, थकान दूर कर शरीर में तरोताजगी देती है, त्वचा व आंखों को निर्मल बना देती है, विटामिन की कमी को दूर करती है।
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विधि: मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग से लगाकर बाकी अंगुलियों को सीधी रखें।
लाभ: कब्ज, मधुमेह, किडनी विकार, वायु विकार, बवासीर को दूर करती है, शरीर को शुद्ध कर नाड़ी दोषों को दूर कर देती है, मूत्र का अवरोध दूर कर दांतों को मजबूत करती है, पसीना भी लाती है।
नोट: यह मुद्रा मूत्र अधिक लाती है।
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विधि: यह मुद्रा तर्जनी अंगुली को अंगूठे के मूल में लगाकर मध्यमा व अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर छोटी अंगुली को सीधा करके बनती है।
लाभ: हृदय रोगों में विशेष रूप से लाभकारी है। प्रतिदिन 10-15 मिनट इसके अभ्यास से हृदय मजबूत होता है, दिल का दौरा पड़ते ही इसको करने से आराम मिलता है, गैस बनना, सिरदर्द, अस्थमा व उच्च रक्तचाप में लाभकारी है। सीढि़यों पर चढ़ने से पहले ही अगर इसको लगाकर चढ़ा जाए तो सांस नहीं फूलती।
विधि: दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर बांधकर बाएं हाथ के अंगूठे को खड़ा रखें।
लाभ: सर्दी, जुकाम, खांसी, साइनुसाइटिस, अस्थमा, निमन् रक्तचाप को दूर कर शरीर की गर्मी को बढ़ा देती है, कफ को सुखाने का कार्य करती है।
नोटः आवश्यकता होने पर ही करें, अनावश्यक न करें।
हस्तमुद्रा चिकित्सा के अनुसार हाथ की पांचों अंगुलियां पांचों तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के माध्यम से इन तत्वों को बल देती रहती है। अंगूठे में अग्नि तत्व, तर्जनी में वायु तत्व, मध्यमा में आकाश तत्व, अनामिका में पृथ्वी तत्व व कनिष्ठा में जल तत्व की ऊर्जा का केन्द्र है। इस प्रकार अंगुलियों को आपस में मिलाकर मुद्राओं को बनाया जाता है। हमारे ऋषियों ने इस रहस्य को साधना के द्वारा जाना और इसका प्रचार-प्रसार किया जिसके प्रतिदिन अभ्यास से व्यक्ति रोगमुक्त होकर स्वस्थ रह सके।
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ये अद्भुत मुद्राएं करते ही अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं। पद्मासन, स्वस्तिकासन, सुखासन, वज्रासन में करने से जिस रोग के लिए जो मुद्रा वर्णित है उसको इस भाव से करें कि मेरा रोग ठीक हो रहा है, तब ये मुद्राएं शीघ्रता से रोग को दूर करने में लग जाती हैं। बिना भाव के लाभ अधिक नहीं मिल पाता। दिन में 20-30 मिनट तक एक मुद्रा को किया जाए तो पूरा लाभ प्राप्त हो जाता है। एक बार में न हो सके तो दो-तीन बार में कर लें। किसी भी मुद्रा में जिन अंगुलियों का प्रयोग नहीं करते उन्हें सीधा करके रख लेते हैं और हथेली को थोड़ा टाइट रखते हैं। यों तो मुद्राओं की संख्या अनेक है, किन्तु यहां हम आपको कुछ उपयोगी मुद्राओं के बारे में बता रहे हैं-
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विधि: अंगूठे को तर्जनी अंगुली के सिरे पर लगाएं व बाकी तीनों अंगुलियाँ सीधी रहेंगी।
लाभ: मस्तिष्क के स्नायु को बल देकर यह स्मरण शक्ति, एकाग्रता शक्ति, संकल्प शक्ति को बढ़ाती है, बुद्धि का विकास करती है, पढ़ाई में मन लगने लगता है, सिर दर्द व नींद न आना दूर होता है, मन की चंचलता दूर होकर क्रोध, चिड़चिड़ापन, तनाव, चिंता को दूर कर व्यक्ति को आध्यात्मिक बना देती है।
नोट: सात्विक भोजन करने से शीघ्रता से लाभ देती है।
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विधि: अनामिका अंगुली को अंगूठे के अग्रभाग से लगाकर बाकी अंगुलियां सीधी रखें।
लाभ: दुबर्लता को दूर कर वजन को बढ़ाती है, शरीर में स्फूर्ति, कान्ति एवं तेज बढ़ाकर जीवनी शक्ति का विकास करती है, पाचन तन्त्र स्वस्थ बनाती है।
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विधि: कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर बाकी अंगुलियों को सीधा रखने से बनती है।
लाभ: चर्मरोग, रक्त विकार दूर करती है, शरीर में रूखापन दूर कर त्वचा को चमकीली व मुलायम बनाती है, चेहरे की सुन्दरता को बढ़ा देती है।
नोट: कफ प्रकृति वाले व्यक्ति इसका अभ्यास ज्यादा न करें।
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विधि: तर्जनी अंगुली को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगाकर हल्का सा दबाएं। बाकी अंगुलियां सीधी रहेंगी।
लाभ: वात रोगों में विशेष लाभकारी है। प्रकुपित वायु को शान्त कर देती है, साइटिका, कमर दर्द, गर्दन दर्द, पारकिंसन, गठिया, लकवा, जोड़ों का दर्द, घुटने का दर्द दूर करती है।
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विधि: मध्यमा अंगुली को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगाकर अंगूठे से दबाएं व बाकी अंगुलियां सीधी रखें।
लाभ: गले के रोग व थाइराइड में लाभकारी है, दांत मजबूत होते हैं, कर्ण रोगों में लाभकारी है।
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विधि: अनामिका अंगुली को अंगूठे के मूल में लगाकर अंगूठे से दबाकर बाकी अगुलियों को सीधा करके रखें।
लाभ: मोटापा कम करती है, वजन को घटाने वाली है, शरीर में उष्णता बढ़ाती है, शक्ति का विकास करती है, कोलेस्ट्राल का बढ़ना, मधुमेह व लीवर के रोग में लाभ पहुंचाती है, शरीर को संतुलित बना देती है।
नोट: कमजोर व्यक्ति इसका अभ्यास न करें। गर्मी में भी ज्यादा न करें।
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विधि: अनामिका तथा कनिष्ठा अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर बाकी दोनों अंगुलियों को सीधा रखें।
लाभ: मन को शान्त कर शरीर की दुर्बलता को दूर करती है, रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ा देती है, नेत्र ज्योति बढ़ाती है, थकान दूर कर शरीर में तरोताजगी देती है, त्वचा व आंखों को निर्मल बना देती है, विटामिन की कमी को दूर करती है।
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विधि: मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग से लगाकर बाकी अंगुलियों को सीधी रखें।
लाभ: कब्ज, मधुमेह, किडनी विकार, वायु विकार, बवासीर को दूर करती है, शरीर को शुद्ध कर नाड़ी दोषों को दूर कर देती है, मूत्र का अवरोध दूर कर दांतों को मजबूत करती है, पसीना भी लाती है।
नोट: यह मुद्रा मूत्र अधिक लाती है।
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विधि: यह मुद्रा तर्जनी अंगुली को अंगूठे के मूल में लगाकर मध्यमा व अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर छोटी अंगुली को सीधा करके बनती है।
लाभ: हृदय रोगों में विशेष रूप से लाभकारी है। प्रतिदिन 10-15 मिनट इसके अभ्यास से हृदय मजबूत होता है, दिल का दौरा पड़ते ही इसको करने से आराम मिलता है, गैस बनना, सिरदर्द, अस्थमा व उच्च रक्तचाप में लाभकारी है। सीढि़यों पर चढ़ने से पहले ही अगर इसको लगाकर चढ़ा जाए तो सांस नहीं फूलती।
विधि: दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर बांधकर बाएं हाथ के अंगूठे को खड़ा रखें।
लाभ: सर्दी, जुकाम, खांसी, साइनुसाइटिस, अस्थमा, निमन् रक्तचाप को दूर कर शरीर की गर्मी को बढ़ा देती है, कफ को सुखाने का कार्य करती है।
नोटः आवश्यकता होने पर ही करें, अनावश्यक न करें।
Posted by Udit bhargava at 4/11/2011 11:15:00 pm 0 comments
06 अप्रैल 2011
पंडित जी के टोटके
प्रारब्ध की बात छोड़ दें, तो भी परमेश्वर द्वारा कुछ वस्तुओं में धनप्राप्ति के गुणधर्म किये गए हैं, यह बात निर्विवाद है। जिस प्रकार यज्ञादिक कर्मों द्वारा स्वर्ग की प्राप्ति होती है, बरसात होती है या देश पर आये महान संकट दूर होते हैं, उसी प्रकार कुछ ख़ास साधनाएं और टोटके किये जाएं, तो मनुष्य को धन की प्राप्ति अवश्य होती है और घर में सुख-सम्रद्धि आती है। ये टोटके बिलकुल सरल हैं और इसके लिए जरूरी चीजें भी, सहज ही में उपलब्ध की जा सकती हैं। इसमें आपको पूर्ण श्रद्धा अवश्य होनी चाहिए। तो आइये करें ये लाभदायक व कुछ ख़ास उपाय।
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------1. भर लें अपने भण्डार गृह
जिस स्थान पर होली जलाई जाती रही हो, वहां पर होली जलने से एक दिन पहले की रात्री में एक मटकी में गाय का घी, तिल का तेल, गेहूं और ज्वार तथा एक ताम्बे का पैसा रखकर मटकी का मुंह बंद करके गाड़ आएं। रात्रि में जब होली जल जाए, तब दूसरे दिन सुबह उसे उखाड़ लाएं। फिर इन सब वस्तुओं को पोटली में बांधकर जिस वास्तु में रख दिया जाएगा, वह वास्तु व्यय करने पर भी उसमें निरंतर वृद्धि होती रहेगी, और आपके भंडार भरे हुए रहेंगे।
2. अगर आप चाहते हैं की आपके प्रतिष्ठान में बिक्री ज्यादा हो तो यह करें
आप अपने व्यापार में अधिक पैसा प्राप्त करना चाहते हैं और चाहते हैं की आपके व्यापार की बिक्री बढ़ जाए तो आप वट वृक्ष की लता को शनिवार के दिन जाकर निमंत्रण दे आएं। (वृक्ष की जड़ के पास एक पान, सुपारी और एक पैसा रख आएं) रविवार के दिन प्रातः काल जाकर उसकी एक जटा तोड़ लाएं, पीछे मुड़कर न देखें। उस जटा को घर लाकर गुग्गल की धूनी दें तथा 101 बार इस मंत्र का जप करें-
ॐ नमो चण्ड अलसुर स्वाहा।
3. छोटे बच्चों को नजर लगने पर-
अगर आप चाहते हैं की छोटे बच्चों को नजर न लगे इसके लिए हाथ में चुटकी भर रक्षा लेकर ब्रहस्पतिवार के दिन 'ॐ चैतन्य गोरखनाथ नमः मंत्र का 108 बार जप करें। फिर इसे छोटी-सी पुडिया में डालकर काले रेशमी धागे से बच्चे के गले में बाँधने पर बुरी नजर नहीं लगती।
4. अपने व्यापार में करें मनोवांछित उन्नति-
अगर आप अपने व्यापार में मनोवांछित उन्नति करना चाहते हैं तो सोमवार को प्रातः नवनिर्मित अंगूठी को गंगाजल में धोकर गाय के दूध में डुबो दें, उसमें थोड़ी-सी शक्कर, तुलसी के पत्ते और कोई भी सफ़ेद फूल डाल दें। इसके पश्चात स्नान ध्यान से निवृत्त होकर अंगूठी को पहन लें। ऐसा करने से व्यापार में मनोवांछित उन्नति प्राप्त होगी।
5. कन्या के विवाह में विलम्ब होने पर-
अगर आपकी कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो या कन्या के लिए योग्य वर की तलाश पूरी नहीं हो रही हो तो किसी भी गुरूवार के दिन प्रातःकाल नहा धोकर बेसन के लड्डू स्वयं बनाएं। उनकी गिनती 109 होनी चाहिए। फिर पीले रंग की टोकरी में पीले रंग का कपड़ा बिछाकर उन लड्डूओं को उसमें रख दें तथा अपनी श्रद्धानुसार कुछ दक्षिणा रख दें। पास के किसी शिव मंदिर में जाकर विवाह हेतु प्रार्थना कर घर आ जाएं।
6. आपके ज्यादातर कार्य असफल हो रहे हैं तो यह करें-
आप चाहते हैं की आपके द्वारा किये गए कार्य सफल हो लेकिन कार्य के प्रारम्भ होते ही उसमें विध्न आ जाते हैं और वह असफल हो जाते हैं इसके लिए आप यह करें: प्रातःकाल कच्चा सूत लेकर सूर्य के सामने मुंह करके खड़े हो जाएं। फिर सूर्य देव को नमस्कार करके 'ॐ हीं घ्रणि सूर्य आदित्य श्रीम' मंत्र बोलते हुए सूर्य देव को जल चढ़ाएं। जल में रोली, चावल, चीनी तथा लाल पुष्प दाल लें। इसके पश्चात कच्चे सूत को सूर्य देव की तरफ करते हुए गणेशजी का स्मरण करते हुए सात गाँठ लगाएं। इसके पश्चात इस सूत को किसी खोल में रखकर अपनी कमीज की जेब में रख लें, आपके बिगड़े कार्य बनाने लगेंगे।
7. गर्भ धारण करने के लिए-
अगर आपको किसी कारणवश गर्भ धारण नहीं हो रहा हो तो मंगलवार के दिन कुम्हार के घर आएं और उसमें प्रार्थना कर मिट्टी के बर्तन वाला डोरा ले आएं। उसे किसी गिलास में जल भरकर दाल दें। कुछ समय पश्चात डोरे को निकाल लें और वह पानी पति-पत्नी दोनों पी लें। यह क्रिया केवल मंगलवार को ही करनी है अगर संभव हो तो उस दिन पति-पत्नी अवश्य ही रमण करें। गर्भ की स्थिति बनते ही उस डोरे को हनुमानजी के चरणों में रख दें।
8. अपने घर-गृहस्थी को बनाएं सुखी-
अक्सर हम गृहस्थ जीवन में देखते हैं तो गृहस्थ का सामान टूट-फूट जाता है या सामान चोरी हो जाता है। जो भी आता है असमय ही ख़त्म हो जाता है। रसोई में बरकत नहीं रहती है तो ऐसी स्त्रियाँ भोजन बनाने के बाद शेष अग्नि को न बुझाएं और जब सब जलकर राख हो जाए तो राख को गोबर में मिलाकर रसोई को लीप दें। फर्श हो तो उस राख को पानी में घोलकर उसी पानी से फर्श डालें। यह क्रिया कई बार करें। घर-गृहस्थी का छोटा-मोटा सामान, गिलास, कटोरी, चम्मच आदि सदैव बने रहेंगे।
9. इच्छा के विरूद्ध कार्य करना पड़ रहा हो तो-
अगर आपको किसी कारणवश कोइ कार्य अपनी इच्छा के विपरीत करना पड़ रहा हो तो आप कपूर और एक फूल वाली लौंग एक साथ जलाकर दो-तीन दिन में थोड़ी-थोड़ी खा लें। आपकी इच्छा के विपरीत कार्य होना बंद हो जाएगा।
10. दाम्पत्य जीवन से झगड़े दूर करें ऐसे-
अगर आपका दाम्पत्य जीवन अशांत है तो आप रात्री में शय न करते समय पत्नी अपने पलंग पर देशी कपूर तथा पति के पलंग पर कामिया सिन्दूर रखें. प्रातः सूर्यदे के समय पति देशी कपूर को जला दें और पत्नी सिन्दूर को भवन में छिटका दें। इस टोटके से कुछ ही दिनों में कलह समाप्त हो जाती है।
11. बेरोजगारी दूर करने हेतु-
अगर आपको नौकरी या काम नहीं मिल रहा है और आप मारे-मारे फिर रहे हैं तो एक दागरहित बड़ा नीबूं लें और चौराहे पर बारह बजे से पहले जाकर उसके चार हिस्से कर लें और चारों दिशाओं में दूर-दूर फेंक दें। फलस्वरूप बेरोजगारी की समस्या समाप्त हो जाएगी।
12. भाग्योदय करने के लिए करें यह उपाय-
अपने सोए भाग्य को जगाने के लिए आप प्रात सुबह उठकर जो भी स्वर चल रहा हो, वही हाथ देखकर तीन बार चूमें, तत्पश्चात वही पांव धरती पर रखें और वही कदम आगे बाधाएं। ऐसा नित्य-प्रतिदिन करने से निश्चित रूप से भाग्योदय होगा।
13. त्वचा रोग होने पर यह करें-
त्वचा संबंधी रोग केतु के दुष्प्रभाव से बढ़ते हैं। यदि त्वचा संबंधी घाव ठीक न हो रहा हो तो सायंकाल मिट्टी के नए पात्र में पानी रखकर उसमें सोने की अंगूठी या एनी कोइ आभूषण दाल दें। कुछ देर बाद उसी पानी से घाव को धोने के बाद अंगूठी निकालकर रख लें तथा पाने किसी चौराहे पर फेंक आएं। ऐसा तीन दिन करें तो रोग शीघ्र ठीक हो जाएगा।
14. मंदी से छुटकारा पाएं ऐसे-
अगर आपके व्यापार में मंदी आ गयी है या नौकरी में मंदी आ गयी है तो यह करें। किसी साफ़ शीशी में सरसों का तेल भरकर उस शीशी को किसी तालाब या बहती नदी के जल में डाल दें। शीघ्र ही मंदी का असर जाता रहेगा और आपके व्यापार में जान आ जाएगी।
15. भय को दूर करें ऐसे-
अगर आपको बिना कारण भय रहता हो या सांप-बिच्छू या वन्य पशुओं का भय रहता हो तो यह करें : बांस की जड़ जलाकर उसे कान पर धारण करने से भय मिट जाता है। निर्गुन्डी की जड़ अथवा मोर पंख घर में रख देने से सर्प कभी भी घर में प्रवेश नहीं करता। रवि-पुष्य योग में प्राप्त सफ़ेद चादर की जड़ लाकर दाईं भुजा पर बाँधने से वन्य पशुओं का भय नहीं रहता है साथ ही अग्नि भय से भी छुटकारा मिल जाता है। केवड़े की जड़ कान पर धारण करने से शत्रु भय मिट जाता है।
16. अगर आपके परिवार में कोई रोगग्रस्त हो तो यह करें.
अगर स्वास्थ्य में सुधर न होता हो तो यह उपाय करें: एक देशी अखंडित पान, गुलाब का फूल और कुछ बताशे रोगी के ऊपर से 31 बार उतारें तथा अंतोक चौराहे पर रख दें। इसके प्रभाव से रोगी की दशा में शीघ्रता से सुधार होगा।
17. पारिवारिक सुख-शांति के लिए-
अगर आपके परिवार में अशांति रहती है और सुख-चैन का अभाव है तो प्रतिदिन प्रथम रोगी के चार भाग करें, जिसका एक गाय को, दूसरा काले कुत्ते को, तीसरा कौवे को तथा चौथा टुकड़ा किसी चौराहे पर रखवा दें तो इसके प्रभाव से समस्त दोष समाप्त होकर परिवार की शांति तथा सम्रद्धि बढ़ जाती है।
18. अपनाएं सुखी रहने के कुछ नुस्खे-
ब्रहस्पतिवार या मंगलवार को सात गाँठ हल्दी तथा थोड़ा-सा गुड इसके साथ पीतल का एक टुकड़ा इन सबको मिलाकर पोटली में बांधें तथा ससुराल की दिशा में फेंक दें तो वहां हर प्रकार से शांति व सुख रहता है।
कन्या अपनी ससुराल में रहते हुए यह करें। मेहँदी तथा साबुत उरद जिस दिशा में वधु का घर हो, उसी दिशा में फेंकने से वर-वधु में प्रेम बढ़ता है।
किसी विशेष कार्य के लिए घर के निकलते समय एक साबुत नीबू लेकर गाय के गोबर में दबा दें तथा उसके ऊपर थोड़ा-सा कामिया सिन्दूर छिड़क दें तथा कार्य बोलकर चले जाएं तो कार्य निश्चित ही बन जाता है।
सावन के महीने में जब पहली बरसात हो तो बहते पानी में विवाह करने से दुर्भाग्य दूर हो जाता है।
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19. अविवाहित व अधिक उम्र की कन्या के विवाह के लिए-
अगर आपकी लडकी अविवाहित है या उसकी उम्र बहुत ज्यादा हो चुकी है इसके कारण विवाह होने में रूकावटें आ रही हो तो इसके लिए एक उपाय है: देवोत्थान एकादशी कच और देवयानी की मिट्टी की मूरतें बनाकर उन मूर्तियों में हल्दी, चावल, आते का घोल लगाकर उनकी पूजा करके उन्हें एक लकड़ी के फट्टे से ढक लेते हैं. फिर उस फट्टे पर कुमारी कन्या को बिठा दिया जाता है तो उसका विवाह हो जाता है।
20 राई से करें दरिद्रता निवारण-
पैसों का कोइ जुगाड़ न बन रहा हो तथा घर में दरिद्रता का वाश हो तो यह करें: एक पानी भरे घड़े में राई के पत्ते डालकर इस जल को अभिमंत्रित करके जिस भी किसी व्यक्ति को स्नान कराया जाएगा उसकी दरिद्रता रोग नष्ट हो जाते हैं।
21. स्वप्न में भविष्य जानें इस तरह भी-
अगर आप स्वप्न में भविष्य की बात मालूम करना चाहते हैं तो जंगल में जाकर जिस वृक्ष पर अमर बेल हो, उसकी सात परिक्रमा कर अमर बेल्युक्त एक लकड़ी को तोड़ लाएं। फिर उस लकड़ी को धुप देकर जला दें तथा लता को सिरहाने रखकर विचार करते हुए सो जाएं तो स्वप्न में भविष्य की बात मालूम हो जाती है।
Labels: टोने-टोटके
Posted by Udit bhargava at 4/06/2011 07:28:00 pm 0 comments
01 अप्रैल 2011
भूलना भूल जाएं
कुछ छात्र ऐसे होते हैं जो प्रश्नों को ध्यान से न तो पढ़ते हैं और न ही विषय को समझने की कोशिश करते हैं। ऐसे छात्र रट्टा लगा कर विषय सामग्री को याद करते हैं, लेकिन जैसे ही परीक्षा होती है और प्रश्न आ जाते हैं जो की नहीं रटे गए हैं ऐसी स्थिति में वह छात्र रटा हुआ भी भूल जाता है। भूलने का कारण यह होता है की छात्र ने विषय को ध्यान से नहीं पढ़ा, बल्कि उसका रट्टा लगाया है। बहुत से छात्र ऐसे भी होते हैं, जिनकी समस्या कुछ-कुछ भूलने से सम्बंधित होती है। उनका दसवीं या बारहवीं तक तो परीक्षा परिणाम अच्छा आता है परन्तु काँलेज में आते ही अंकों का स्तर गिरने लगता है। इसका मुख्य कारण यह है की स्कूल के दिनों में छात्र अनुशासन में रहते हैं परन्तु काँलेज में आते ही वह स्वतंत्र हो जाते हैं और इसका सारा असर उनके परीक्षा परिणाम पर पड़ता है और छात्रों को लगता है की अब उन्हें ठीक से चीजें याद नहीं हो पा रही हैं। अच्छी याददाश्त का होना बहुत ही महत्वपूर्ण है अतः जरूरी है की आप अपनी भूलने की आदत को सुधारें। अभ्यास एवं कुछ सरल तकनीकों को अगर आप अपनाएं तो भूलने की बीमारी को सुधारा जा सकता है।
० एकाग्रचित होकर पढ़ें इससे आप सामान्य की उपेक्षा दस गुना अधिक याद रख पाएंगे।
० बेहतर स्मृति के लिए आवश्यक है की आप याद की गयी पाठ्य सामग्री को दोहराएं। हालांकि इससे बुद्धि में कोइ सीधा इजाफा नहीं होता, किन्तु बार-बार दोहराव आपके लिए कुछ ऐसा अवश्य छोड़ जाता है, जिससे स्मृति में बढ़ोतरी होती है। जो भी याद करना हो उसे बोलकर याद कीजिये और अंत में याद किये हुए को लिख डालिए।
० एकाग्रचित होकर पढ़ें इससे आप सामान्य की उपेक्षा दस गुना अधिक याद रख पाएंगे।
० बेहतर स्मृति के लिए आवश्यक है की आप याद की गयी पाठ्य सामग्री को दोहराएं। हालांकि इससे बुद्धि में कोइ सीधा इजाफा नहीं होता, किन्तु बार-बार दोहराव आपके लिए कुछ ऐसा अवश्य छोड़ जाता है, जिससे स्मृति में बढ़ोतरी होती है। जो भी याद करना हो उसे बोलकर याद कीजिये और अंत में याद किये हुए को लिख डालिए।
० किसी नई चीज को सीखने के लिए यह आवश्यक है कि आप तनाव मुक्त एवं थकान रहित रहें। भूलने की बीमारी से छुटकारा पाने के लिए आप रोजाना सुबह-शाम 10 से 15 मिनट तक यह व्यायाम अवश्य करें। सबसे पहले आप बिस्तर पर सीधा लेट जाए। उसके पश्चात अपने दिमाग से सब कुछ निकाल दें और पूरी ताकत से अपने शरीर को कास लें। फिर धीरे-धीरे अपने शरीर को ढीला छोड़ दें।
Posted by Udit bhargava at 4/01/2011 08:55:00 am 1 comments
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