01 फ़रवरी 2011

सही निर्णय से बने सफल इंसान

 Too much planning is Bad

बिजनेस में एक अच्छी प्लानिंग की जरूरत होती है. परन्तु कई मैनेजमेंट विशेषज्ञों का यह मानना है कि 'You Can not Overestimate the need to plan and prepair. You can not overprepare in Business.' अर्थात पहले से प्लानिंग एवं तैयारी की जरूरत को बिजनेस में बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर बताने की आवश्यकता नहीं है. बिजनेस को बहुत ज्यादा Overprepare (जरूरत से अधिक एडवांस प्लानिंग) करके नहीं चलाया जा सकता है.'

बिजनेस करना एक तेज गेम खेलने के समान है, जिसमें आपको अपने उद्देश्य और प्रतिद्वंदी खिलाड़ियों की रणनीति के अनुसार अपना खेल खेलना पड़ता है. एक मंझे हुए खिलाड़ी को On the Spot कई ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ते है, जिनकी कोई एडवांस प्लानिंग नहीं की जा सकती है. इसका यह मतलब नहीं है कि एडवांस प्लानिंग और तैयारियों को नजरअंदाज किया जाना चाहिए. इनकी अपनी एक महत्ता है. परन्तु ये इतनी ज्यादा भी नहीं करनी चाहिए कि वर्तमान परिस्थितियों का आकलन ही ख़त्म हो जाए. बिजनेस की यात्रा में हर कदम पर नई से नई कठिनाइयां मुंह फाड़े खडी होती है, और साथ ही नए-नए लाभ के रास्ते भी नजर आने लगते हैं. इन सबका पहले से पूर्वानुमान लगाना सम्भव हैं. तीव्र सोच एवं समय रहते निर्णयों से एक कंपनी उन क्षेत्रों में तरक्की कर सकती है जिनके बारे में पहले कभी सोचा भी नहीं था.

उदहारण के लिये जापान की मित्शुबिशी कंपनी को ले सकते हैं. इसका प्रारम्भ 1870 में यातारो श्वासाकी द्वारा एक शिपिंग कंपनी के रूप में किया गया. मित्सुबिशी दो शब्दों से बना हुआ है. 'मित्सू' जिसका अर्थ है 'तीन' और 'बिशी' जिसका अर्थ है 'वाटर चैस्टनट (एक पानी का पौधा) इसने 1881 में परिस्थितियों को देखते हुए कोल माइनिंग के व्यापार में कदम रखा, इससे इनके शिपिंग व्यापार को भी काफी मदद मिली. थोड़े ही समय में मित्शुबिशी को इस कदर सफलता मिली कि इसने Banking, Insurance, Warehousing, Trade aur Technology Products आदि में सफल व्यापार स्थापित किये. इनके द्वारा बनाए गए 'जीरो' हवाई जहाज़ों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में अमरीका के पर्ल हार्बर पर जबरदस्त तबाही मचाई. द्वितीय विश्वयुद्ध में हार के बाद मित्सुबिशी पर प्रतिबन्ध लगा दिए गए और उनकी विकास यात्रा में जबरदस्त रूकावट पैदा हुई. परन्तु इन्होने हार नहीं मानी. नए रूल्स और रेगुलेशन के अंतर्गत मित्सुबिशी ने अपने आपको कई स्वतंत्र कंपनियों में विभाजित कर लिया. जिनके अपने बिजनेस माँडल थे, परन्तु सभी अपने प्रांडक्ट्स  के लिये मित्सुबिशी ब्रांड नेम उपयोग करती रही. इनमें से कुछ कंपनियों पर ये आरोप भी लगे कि ये अच्छी काँर्पोरेट प्रैक्टिस का पालन नहीं करती. उदहारण के लिये इनके पूर्व असंतुष्ट एग्जीक्यूटिव कमल सिन्हा ने एक वेबसाईट 'मित्सुबिशी वाच' के नाम से आरम्भ कर रखी है, जिसमें इस तरह की प्रैक्टिस पर ध्यान आकर्षित किया जाता है.

इन सारी कठिनाइयों के बावजूद मित्सुबिशी द्वारा समय रहते किये हुए निर्णयों के कारण अपनी लोकप्रियता कायम रखी.

मंत्र:  एडवांस प्लानिंग से हर वक्त काम नहीं बनता. मौके पर ले मूल्यवान निर्णय.

सही समय पर लो सही निर्णय

फोर्ड मस्टांग कार के चीफ प्रजेक्ट अधिकारी और अमरीका की क्राइसलर कार कंपनी के पूर्व C.E.O श्री ली आयाकोका के अनुसार 'Even a correct decision is wrong when it was taken too late.' अर्थात बहुत देरी से लिया गया सही निर्णय भी कई बार गलत साबित हो सकता है. यदि यह सही निर्णय पूर्ण रूप से गलत नहीं होते तो उनके सुखद परिणाम नहीं मिलते जो सही वक्त पर निर्णय लेते वक्त मिल जाते. उदहारण के लिये वर्तमान में यदि दुनिया के देशों के बीच यदि Armed Conflicts में कमी आई है तो साथ की इनके बीच व्यापारिक युद्ध बहुत बढ़ गए हैं. अब इस बात की बहुत प्रतिस्पर्धा हो गई है कि किस देश की आर्थिक प्रगति की दर अधिक है और किस देश ने विश्व बाजार के निर्यात पर अपना कब्जा बढाया है. अक्सर लोग भारत की तुलना चीन से करते हैं जिसमें वह बार-बार कहा जाता है कि भारत सरकार द्वारा नहीं लिये जाने वाले सही निर्णयों के कारण चीन से पिछड़ रहा है. पिछले दिनों जयपुर में इनफ़ोसिस कंपनी के संस्थापक नारायण मूर्ती ने यही बात बार-बार दोहराई.

उन्हों कहा की भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 26 प्रतिशत कृषि पर आधारित है. उसकी तुलना में भारत तकरीबन 60 प्रतिशत लोग अपना रोजगार कृषि से प्राप्त करते हैं. इतनी बड़ी मात्रा में लोग यदि कृषि पर निर्भर रहेंगे, तो उनकी उत्पादकता बहुत कम होती. मूर्ती ने चीन का उद्धरण देते हुए कहा कि वहां सरकार ने Policy निर्णय लेते हुए वहां की काफी बड़ी कृषि पर आधारित जनसंख्या को लाँटेक (सरल टेक्नोलांजी पर आधारित) उद्योग धंधो पर हस्तान्तरित कर दिया. इससे चीन के लोगों की इनकम बढी और वहां के एक्सपर्ट में भी इजाफा हुआ और चीन एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर कर आया. भारत को भी इसी चीज की जरूरत है. उन्होंने जोर देकर कहा, भारत के Policy Maker समय पर निर्णय नहीं ले पाते और यदि देर से निर्णय लेते भी हैं तो उसका पालन तुरंत नहीं कर पाते. उन्होंने कई लोगों की इस बात को गलत कहा कि भारत एक प्रजातंत्र है, अतः यहाँ निर्णय देर से ही होते हैं. उन्होंने कहा कि यूरोप के कई देशों में भी प्रजातंत्र है, परन्तु वहां पर निर्णय बहुत फास्ट लिये जाते हैं. अपने दिए गए भाषण में उन्होंने यह मंत्र बार-बार दोहराया कि तुरंत निर्णय कीजिये, अन्यथा देरी से लिये गए सही निर्णय भी आपको विश्व प्रतिस्पर्धा में अधिक हैल्प नहीं कर पायेंगे.

मंत्र:   निर्णय तुरंत कीजिये, देरी से लिये गए निर्णय के कारण आप प्रतिस्पर्धा में पीछे हो सकते हैं.

दुश्मनी क्यों होती है?

यूं तो प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से प्यार व दोस्ती करना चाहता है, परन्तु उसमें दुश्मनी की भावना आने में भी एक क्षण लगता है.

Management Expert के सामने यह एक अध्ययन का विषय है कि एक व्यक्ति दूसरे का दुश्मन क्यों बन जाता है. दुशमन होने का यहाँ तात्पर्य यह है कि एक व्यक्ति दूसरे से घृणा करता है और वह दूसरे को अपने मन, वचन और कर्म से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जबर्दस्त हानि पहुंचाने का मजबूत प्रयास एक रणनीति या आवेश के तहत करता है.

मैनेजमेंट विशेषज्ञों के अनुसार किसी दुश्मनी के पीछे वैसे तो अनगिनत कारणों का योगदान रहता है. परन्तु सबसे मुख्य कारण एक व्यक्ति द्वारा दूसरे के अहमको किसी तीसरे के सामने चोट पहुंचाना होता है. एक व्यक्ति की अतिमहत्वपूर्ण संपत्ति उसका अहम होता है. उसको बचाने के लिये एक समझदार व्यक्ति भी अजीबों गरीब हरकतें करने से बाज नहीं आता है.

कुछ वर्ष पहले, एक Executive को उसके पांच साल की शानदार सर्विस के बाद एकदम से कंपनी से बाहर निकाल दिया गया. उसने अपने परिवार को इसके बारे में कुछ नहीं बताया. हर सुबह वह रोज की तरह अपने घर से ऐसे तैयार होकर निकलता था जैसे कि वह आँफिस जा रहा है. उसके बाद वह अपना सारा दिन सिनेमा हाँल और यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में निकालता था और शाम को थका हारा अपने घर पहुंचता था. इस तरह से दो-तीन महीने निकलने के बाद वह तो अच्छा हुआ कि उसकी पत्नी ने किसी कारणवश आँफिस फोन कर लिया और तब जाकर पूरी बात समझ में आई. उपरोक्त उदाहरण वास्तव में बहुत ट्रैजिक है, परन्तु यह इस बात को तो दर्शाता ही है कि एक व्यक्ति अपना Face loss बचाने के लिये किसी भी स्तर पर जाकर नाटक खेल सकता है.

इसी तरह के अन्य उदहारण में एक बेहद सुलझा हुआ, समझदार विनम्र आँफिसर एक सफेदपोश दरिन्दे के रूप में उभर कर आया. हुआ ये कि उसके नीचे कार्य करने वाला एक Executive के सामने रूटीन में बताई. इस पर उस एग्जीक्यूटिव को शाबासी मिली. उसको शाबासी देने में यह आँफिसर स्वयं भी था. परन्तु इस एपीसोड एक बाद यह आँफिसर उस Executive के पीछे अप्रत्यक्ष रूप से हाथ धोकर पड़ गया. अब वह उसका प्रतिदिन आने-जाने का रिकार्ड रखने लगा. छोटी-छोटी गलतियों पर उसको नोटिस इश्यू करने लगा. और कई मौकों पर उसकी पब्लिक में आलोचना भी करने लगा. उसको वार्षिक वेतन वृद्धि भी अधिक नहीं मिली. अंत में उसको त्यागपत्र देना पडा.

इसलिए मंत्र यही है कि जहाँ तक हो सके एक Executive को दूसरे का पब्लिक में अहम कम करने के जाने अनजाने प्रयासों से बचना चाहिए. उसको दूसरे तरीकों से अपने उद्देश्य हासिल करने चाहिए.

मंत्र:  किसी भी फील्ड में आप क्यों न हो? हमेशा जूनियर और सीनियर के अहम का ध्यान रखें.  

विज्ञापनों में उलझ न जाएं बच्चे

युवराज की उम्र महज दस साल है, लेकिन जब पिज्जा या बर्गर की बात आती है, तो उसके माता-पिता के लिये उसे मनाना काफी मुश्किल होता है. इस दस वर्षीय बालक के पिता सुब्रमण्यम को काफी मान-मनुहार के बाद आखिरकार बेमन से ही सही, लेकिन उसे हफ्ते में एक दिन पिज्जा या बर्गर खिलाने की मंजूरी देनी ही पडी, इस वादे के साथ कि बाकी छः दिन वह अपनी माँ के द्वारा पकाया हुआ खाना खाएगा. हमारे ज्यादातर घरों में कुछ ऐसे ही हालात हो सकते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो डायबिटीज फाउंडेशन आँफ इंडिया जैसे संस्थानों को आँन रिकाँर्ड यह कहना नहीं पड़ता कि 'जंक फ़ूड के विज्ञापनों का बच्चों की आदतों पर गहरा प्रभाव पड़ता है.' विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O) के मुताबिक़ दुनिया में कम से कम 4 करोड़ 30 लाख प्री-स्कूली बच्चे ( जिनकी उम्र पांच साल से कम है ) मोटापे का शिकार हैं और इनमें से 3 करोड़ 50 लाख बच्चे भारत जैसे विकासशील देशों में रहते हैं. एक सर्वे के अंतर्गत कम से कम 54 फीसदी बच्चों का कहना था कि वे घर में पकाए गए खाने के बजाय विज्ञापनों में दिखाए गए खाघ उत्पादों को लेना ज्यादा पसंद करेंगे.

W.H.O ने दुनिया के तमाम देशों से अपील की है कि वे अपने बच्चों को इस तरह के विज्ञापनों से दूर रखें. इस सन्दर्भ में उसने कुछ अंतरराष्टीय अनुशंसाओं को लागू करने का सुझाव भी दिया है. गौरतलब है कि पिछले साल मई में W.H.O ने बच्चों के लिये खाघ पर्दार्थों की मार्केटिंग के सन्दर्भ में अंतरराष्टीय अनुशंसाओं का एक सेट तैयार किया था, लेकिन हमारे जैसे देश में इनका क्रियान्वयन नहीं के बराबर देखने में आता है. जहाँ कई देशों ने अपने यहाँ अस्वास्थ्यकर उत्पादों की मार्केटिन को नियंत्रित करते हुए इनके विज्ञापनों को टेलीविजन या रेडियो पर प्रसारित करना बंद कर दिया है, वहीं भारत समेत ऐसे कई देश हैं, जिन्हों अब इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया है. इस तरह का नियंत्रण भारत के लिये बहुत अहम है, क्योंकि हम एक ऐसे देश हैं, जहाँ युवाओं की काफी तादाद है और यदि आज इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो आज से छह या सात साल बाद हमार्रे यहाँ मोटे लोगों की विशाल आबादी होगी.

फंडा यह है कि...
बच्चे विज्ञापनों का सबसे आसान लक्ष्य हैं. अभिभावकों को देखना होगा कि कोई भी उनके बच्चों का इस्तेमाल (वह भी उनकी सेहत की कीमत पर) न कर सके.

30 जनवरी 2011

तांत्रिक क्रियाओं तथा आत्माओं का सपनों पर प्रभाव

आदमी के मन को तथा आत्मा को जानना एक अध्यात्मिक विषय है। अभी विज्ञानिकों ने मात्र शरीर के बारे में ही जाना है। इस लिए बहूदा यह भ्राँति बनी रहती है कि क्या जो हमारे वेद शास्त्र या धर्म-ग्रंथ कहते हैं, वह अकारण ही कहा गया है? इस वि्षय पर आज का आधुनिक कहे जानें वाला समाज विश्वास क्यूँ नही कर पाता? उसे क्यों लगता है कि यह अंधविश्वास है? हम आयुर्वेद में कही बातों को तो मान लेते हैं, लेकिन अध्यात्मिक विषय पर कही बातों को स्वीकारनें से हम क्यों इंन्कार करते हैं?...इस विषय पर किसी अन्य पोस्ट पर चर्चा करेगें। पहले हम तांत्रिक क्रियाओं तथा आत्माओं का सपनों पर क्या प्रभाव पड़ता है इसके बारे में जानें।

जो लोग धर्म-कर्म पर विश्वास रखते हैं वह जानते हैं कि हम जैसे धर्म भीरू कहे जाने वाले लोग जरा -सी परेशानी आ जाने पर झट से किसी भी देवी-देवता या अपनें इष्ट देव के प्रति मन्नत मान लेते हैं, कि यदि हम इस से निजात पा गए तो आप को प्रसाद चड़ाएंगें। या फिर किसी कार्य के पूरा होनें पर जागरण, कीर्तन, या भोजन आदि करवाएंगें।

लेकिन इस भाग -दोड़ की जिन्दगी में कई बार,जो मन्नत हम मानते हैं वह भूल जाते हैं। उस समय हम में से कुछ लोगों को सपनें आनें लगते हैं। हमारे पूर्वज सपनों में आ आ कर किसी चीज की माँग करते हैं। या फिर डरावनें सपनें आनें लगते हैं। कुछ लोग यह कह सकते हैं कि यह इस लिए होता है की हमारे अचेतन मन में वह बात बैठी रहती है, जो अवसर पा कर सपनों के रूप में हमें दिखाई देनें लगती है।यह बात भी सही हो सकती है,लेकिन अध्यात्मिक विज्ञान बहुत जटिल है इस लिए कुछ भी दावे के साथ नही कहा जा सकता।

एक दूसरा कारण किसी तांत्रिक द्वारा किया गया कोई टोना-टोटका जो की अकसर आप चौराहों पर या किसी अंधेरी जगह, पीपल के या किसी अन्य पेड़ के नीचे,किया हुआ देखते हैं। उन किए हुए टोटकों पर गलती से पैर पड़ जानें या किसी प्रकार से निरादर हो जानें के कारण उस टोट्के के प्रभाव के कारण भी रात को डरावनें या अजीबों गरीब सपनें आनें लगतें हैं।

तीसरा कारण यह भी हो सकता है कि किसी द्वारा आप पर कोई तांत्रिक क्रिया की गई हो तो ऐसे में भी आप को इस तरह के सपनें आ सकते हैं। तथा अतृप्त आत्माओं के आस-पास होनें पर भी ऐसे सपनें आते हैं।


कई बार पूर्व जन्म के किए कृत्यों के कारण भी ऐसे सपनें आते हैं। बहुत से लोग इस बात को भी मानते हैं। ज्यादा तर देखा गया है कि अध्यात्मिक व बहुत अधिक संवेदनशील व्यक्तियों को ही अधिकतर ऐसे सपनें आते हैं। इस तरह से और भी बहुत कारण हो सकते हैं जिस का अभी हमें बिल्कुल भी पता नही है, जो हमारी नींद मे सपनॆ बन कर आते हैं।

स्वप्न-विचारः सपने क्यूँ आते हैं?

इन्सान मे यह गुण है कि वह सपनों को सजाता रहता है या यूँ कहे कि भीतर उठने वाली हमारी भावनाएं ही सपनो का रूप धारण कर लेती हैं। इन उठती भावनाओं पर किसी का नियंत्रण नही होता। हम लाख चाहे, लेकिन जब भी कोई परिस्थिति या समस्या हमारे समक्ष खड़ी होती है, हमारे भीतर भावनाओं का जन्म होनें लगता है। ठीक उसी तरह जैसे कोई झीळ के ठहरे पानी में पत्थर फैंकता है तो पानी के गोल-गोल दायरे बननें लगते हैं। यह दायरे प्रत्येक इन्सान में उस के स्वाभावानुसार होते हैं। इन्हीं दायरों को पकड़ कर हम सभी सपने बुननें लगते हैं। यह हमारी आखरी साँस तक ऐसे ही चलता रहता है।

इसीलिए हम सभी सपने दॆखते हैं। शायद ही ऐसा कोई इंसान हो जिसे रात को सोने के बाद सपनें ना आते होगें। जो लोग यह कहते हैं कि उन्हें सपनें नही आते, या तो वह झूठ बोल रहे होते हैं या फिर उन्हें सुबह उठने के बाद सपना भूल जाता होगा। हो सकता है उन की यादाश्त कमजोर हो। या फिर उनकी नींद बहुत गहरी होती होगी। जैसे छोटे बच्चों की होती है। उन्हें आप सोते समय अकसर हँसता-रोता हुआ देखते रहे होगें, ऐसी गहरी नींद मे सोने वाले भी सपनों को भूल जाते हैं और दावा करते हैं कि उन्हें सपनें नही आते। लेकिन सपनों का दिखना एक स्वाभाविक घटना है। इसलिए यह सभी को आते हैं।

लेकिन हमें सपने आते क्यूँ हैं ?
इस बारे में सभी स्वप्न विचारकों के अपने-अपने मत है। कुछ विचारक मानते हैं कि सपनॊं का दिखना इस बात का प्रमाण है कि आप के भीतर कुछ ऐसा है जो दबाया गया है। वहीं सपना बन कर दिखाई देता है। हम कुछ ऐसे कार्य जो समाज के भय से या अपनी पहुँच से बाहर होने के कारण नही कर पाते, वही भावनाएं हमारे अचेतन मन में चले जाती हैं और अवसर पाते ही सपनों के रूप में हमे दिखाई देती हैं। यह स्वाभाविक सपनों की पहली स्थिति होती है।

एक दूसरा कारण जो सपनों के आने का है, वह है किसी रोग का होना। प्राचीन आचार्य इसे रोगी की "स्वप्न-परिक्षा" करना कहते थे।

हम जब भी बिमार पड़ते हैं तो मानसिक व शरीरिक पीड़ा के कारण हमारी नींद या तो कम हो जाती है या फिर झँपकियों का रूप ले लेती है। ऐसे में हम बहुत विचित्र-विचित्र सपने देखते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि बहुत डरावनें सपने आने लगते हैं। जिस कारण रात को कई-कई बार हमारी नींद खुल जाती है और फिर भय के कारण हमे सहज अवस्था मे आने में काफी समय लग जाता है। 

इस बारे में प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों का मानना है कि रोगी अवस्था मे आने वाले सपनें अकसर रोग की स्थिति की ओर संकेत करते हैं। वे आचार्य रोगी के देखे गए सपनों के आधार पर रोग की जटिलता या सहजता का विचार करने में समर्थ थे। वह इन का संम्बध, उन रोगीयों की मानसिक दशाओ की खोज का विषय मानते थे और उसी के परिणाम स्वरूप जो निष्कर्ष निकलते थे, उसी के अनुसार अपनी चिकित्सा का प्रयोग उस रोग का निदान करने मे करते थे। उन आचार्यों के स्वप्न विचार करने के कुछ उदाहरण देखें-
1.  यदि रोगी सिर मुंडाएं, लाल या काले वस्त्र धारण किए किसी स्त्री या पुरूश को सपने में देखता है या अंग भंग व्यक्ति को देखता है तो रोगी की दशा अच्छी नही है।
2. यदि रोगी सपने मे किसी ऊँचे स्थान से गिरे या पानी में डूबे या गिर जाए तो समझे कि रोगी का रोग अभी और बड़ सकता है।
3. यदि सपने में ऊठ, शेर या किसी जंगली जानवर की सवारी करे या उस से भयभीत हो तो समझे कि रोगी अभी किसी और रोग से भी ग्र्स्त हो सकता है।
4. यदि रोगी सपने मे किसी ब्राह्मण, देवता राजा गाय, याचक या मित्र को देखे तो समझे कि रोगी जल्दी ही ठीक हो जाएगा।
5. यदि कोई सपने मे उड़ता है तो इस का अभिप्राय यह लगाया जाता है कि रोगी या सपना देखने वाला चिन्ताओं से मुक्त हो गया है।
6. यदि सपने मे कोई मास या अपनी प्राकृति के विरूध भोजन करता है तो ऐसा निरोगी व्यक्ति भी रोगी हो सकता है।
7. यदि कोई सपने में साँप देखता है तो ऐसा व्यक्ति आने वाले समय मे परेशानी में पड़ सकता है। या फिर मनौती आदि के पूरा ना करने पर ऐसे सपनें आ सकते हैं।

ऊपर दिए गए उदाहरणों के बारे मे एक बात कहना चाहूँगा कि इन सपनों के फल अलग- अलग ग्रंथों मे कई बार परस्पर मेल नही खाते। लेकिन यहाँ जो उदाहरण दिए गए हैं वे अधिकतर मेल खाते हुए हो, इस बात को ध्यान मे रख कर ही दिए हैं।

ऐसे अनेकों सपनों के मापक विचारों का संग्रह हमारे प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने जन कल्याण की भावना से प्रेरित हो, हमारे लिए रख छोड़ा है। यह अलग तथ्य है कि आज उन पर लोग विश्वास कम ही करते हैं।

यहाँ सपनों के आने का तीसरा कारण भी है। वह है सपनों के जरीए भविष्य-दर्शन करना।

हम मे से बहुत से ऐसे व्यक्ति भी होगें जिन्होंने सपनें मे अपने जीवन मे घटने वाली घटनाओं को, पहले ही देख लिया होगा। ऐसा कई बार देखने मे आता है कि हम कोई सपना देखते हैं और कुछ समय बाद वही सपना साकार हो कर हमारे सामने घटित हो जाता है। यदि ऐसे व्यक्ति जो इस तरह के सपने अकसर देखते रहते हैं और उन्हें पहले बता देते हैं, ऐसे व्यक्ति को लोग स्वप्न द्रष्टा कहते हैं।

हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी कई जगह ऐसे सपने देखनें का जिक्र भी आया है, जैसे तृजटा नामक राक्षसी का उस समय सपना देखना, जब सीता माता रावण की कैद मे थी और वह सपनें मे एक बड़े वानर द्वारा लंका को जलाए जाने की बात अपनी साथियों को बताती है। यह भी एक सपने मे भविष्य-दर्शन करना ही है।

कहा जाता है कि ईसा मसीह सपनों को पढना जानते थे। वह अकसर लोगो द्वारा देखे सपनों की सांकेतिक भाषा को सही-सही बता देते थे। जो सदैव सत्य होते थे।

आज की प्रचलित सम्मोहन विधा भी भावनाऒं को प्रभावित कर, व्यक्ति को सपने की अवस्था मे ले जाकर, रोगी की मानसिक रोग का निदान करने में प्रयोग आती है। वास्तव मे इस विधा का संम्बध भी सपनों से ही है। इस मे भावनाओं द्वारा रोगी को कत्रिम नींद की अवस्था मे ले जाया जाता है।

कई बार ऐसा होता है कि हम जहाँ सो रहे होते है, वहाँ आप-पास जो घटित हो रहा होता है वही हमारे सपने में जुड़ जाता है। या जैसे कभी हमे लघुशंका की तलब लग रही होती है तो हम सपने भी जगह ढूंढते रहते हैं। हमारा सपना उसी से संबंधित हो जाता है।

पुरानी मान्यताओं के अनुसार कईं बार अतृप्त आत्माएं भी सपनों मे आ-आ कर परेशान करती हैं...ऐसे में अक्सर रात को सोते में शरीर का भारी हो जाना...और सपने मॆ भय से चिल्लानें में आवाज का ना निकल पाना, महसूस होता है। दूसरों द्वारा किए गए तंत्र-मंत्र या जादू टोनों के प्रभाव के कारण भी रात को डरावने सपनें आते हैं।

बेहतर सेक्स के लिए बेहतर भोजन

जिस तरह अच्छा भोजन आपको शरीर और मन से स्वस्थ रखता है, ठीक उसी तरह अच्छा भोजन आपको सेक्स लाइफ में भी फिट रखता है। सारी दुनिया में खानपान से जुड़ी ऐसी तमाम मान्यताएं हैं, जिन्हें मनुष्य के यौन जीवन में प्रभावी माना जाता था। आज भी यह माना जाता है कि अपने खाने में थोड़ा सा परिवर्तन करके आप अपनी सेक्स लाइफ को बेहतर बना सकते हैं और यहां तक कि बहुत सी यौन दुर्बलताओं पर काबू पा सकते हैं। आइए एक नजर डालें कुछ इसी तरह की खानपान परंपराओं पर जो कि अनुभव की कसौटी पर भी खरी साबित हुई हैं।

शहदः फारसी कहावत के मुताबिक कोई भी जोड़ा लगातार तीस दिनों तक शहद और पानी का सेवन करता है तो उनकी वैवाहिक जीवन बहुत सुखमय और स्वर्गिक आनंद से भरा हुआ होता है। दरअसल इस मान्यता के पीछे वैज्ञानिक आधार यह है कि शहद में उच्च गुणवत्ता वाले अमीनो-एसिड और कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं जो दंपति को लंबी यौनक्रिया के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करते हैं।

गाजरः इसे पुरुषों में यौन शक्ति बढ़ाने वाला माना जाता है। लंबे समय से गाजर का इस्तेमाल पु्रुषों की यौन क्षमता को मजबूती प्रदान करने में होता आया है। माना जाता है कि गाजर में मौजूद विटामिन्स का सामंजस्य व्यक्ति के स्नायु तंत्र को मजबूत बनाता है और व्यक्ति के जीवन में यौन सक्रियता लाता है।

सरसों: वर्षों से सरसों को सेक्सुअल ग्लैंड्स के लिए लाभकारी माना जाता है। मान्यता है कि सरसों के इस्तेमाल से स्त्री-पुरुष में यौन भावना को बढ़ाता है।

अदरकः इसकी तीखी खुशबू और स्वाद का यौन भावना से सीधा रिश्ता है। इसमें मौजूद तत्व व्यक्ति के भीतर रक्त संचार को तेज करते हैं। इसीलिए इसे हर लिहाज से एक बेहतर सेक्स उत्प्रेरक माना जाता है।

चाकलेटः इसमें मौजूद तत्व मस्तिष्क से एक खास तरह के हारमोन के रिसाव को प्रेरित करते हैं। इस हारमोन की मौजूदगी व्यक्ति में शांति और आनंद की भावना को लाता है, जो कि सेक्स उत्प्रेरक का काम करता है। आम तौर पर डार्क चाकलेट एक बेहतर सेक्स उत्प्रेरक का काम करती है।

समुद्री भोजन: यह लिस्ट काफी लंबी हो सकती है। बहुत सी खाने-पीने की चीजें सीधे यौन शक्तिवर्धन से जुड़ी हुई मानी जाती हैं। आम तौर पर समुद्री भोजन को एक बेहतर सेक्स उत्प्रेरक माना जाता है। जहां एक तरफ सेक्स क्षमता को बढ़ाने में इस तरह की बहुत सी खानपान से जुड़ी मान्यताएं काफी कारगर साबित हुई हैं वहीं दूसरी तरफ इस बारे में किसी तरह की वैज्ञानिक जागरुकता के अभाव में भ्रामक धारणाएं भी कम नहीं हैं।

कुछ भ्रामक धारणाएं
इन भ्रामक धारणाओं में बाघ व कछुए का मांस तथा स्पेनिश फ्लाई को यौन शक्तिवर्धक मान लिया गया है। इन धारणाओं से जहां बाघ और कछुए जैसी खतरे में मानी जाने वाली प्रजातियों को मारकर उनका मांस चोरी-छिपे बेचा जाता है, वहीं स्पेनिश फ्लाई में मौजूद जहरीले तत्व थोड़ी देर के लिए यौन उत्तेजना तो देते हैं मगर वे शरीर तथा मनुष्य की सेक्स क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि बेहतर सेक्स के लिए स्वास्थ्यवर्धक खाने की आदत डालें। बेहतर स्वास्थ्य बेहतर सेक्स की कुंजी है।