सूतजी आगे बोले, मुनिवरों । जब सम्पूर्ण देवगण और भगवान विष्णु पृथ्वी पर अवतरित हो गये, तो नारद पृथ्वी पर आये । वह कंस से मिले । देवलोक से चलकर नारद मथुरा के एक उपवन में आये । वहाँ से उन्होंने अपना एक दूत उग्रसेन के पुत्र राजा कंस के पास भेजा । उसने कंस को नारद के आगमन की सूचना दी । समाचार पाकर कंस तुरन्त चल पड़ा । निद्रिष्ट स्थान पर उसने अत्यन्त तेजधारी और दिव्य नारद जी को देखा । उनको नमस्कार कर उनकी अभ्यर्थना की । तत्पश्चात कंस के दिए अग्नि सदृश रक्त वर्ण आसन पर नारद जी बैठ गये ।
नारद जी बोले, मैं स्वर्ग से प्रस्थान कर समेरु पर्वत पर गया था । वहां सम्पूर्ण देवलोक उपस्थित था । वहां पर कुछ निर्णय किया जा रहा था । बातचीत से मुझको पता चला कि तुम्हारे अनुयायियों सहित तुम्हारे वध की योजना बनाई गयी है । तुम्हारी बहन देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवी संतान तुम्हारा काल बनेगी । वह वास्तव में विष्णु का अवतार होगा । वह पूर्व जनमों में भी तुम्हारे विनाश का कारण बन चुके है यही बात मैं तुमसे कहने आया हूं । तुम सावधान हो जाओ और देवकी के समस्त गर्भ नष्ट करने का प्रयत्न करो । मेरा तुम पर विशेष स्नेह है । इस कारण यह गोपनीय रहस्य मैंने तुमको बतला दिया है । अब मैं वापस जाता हूँ तुम्हारा कल्याण हो ।
इतना कहकर देवर्षि नारद चले गये । उनके जाने के बाद कंस अट्टहास करने लगा । अपने साथ आये सेवकों से बोला, नारद मुझको डराने आया था । अभी उसको मेरी शक्ति का ज्ञान नहीं है । मुझे को ई भी परास्त नहीं कर सकता । इस पृथ्वी पर ऐसा कोई भी शक्तिशाली नहीं है । जो मेरा मुकाबला कर सके । मैं सम्पूर्ण भूलोक, देवलोक, यमलोक अपने बाहुबल पर नष्ट कर सकता हूँ । फिर भी हयग्रीव, केशी, प्रलम्ब, धेनुक, अरिष्ट, वृषयऋ पूतना, कालिया नाग को खबर दे दो कि वह स्वेच्छापूर्वक परिवर्तन कर भूमंजल में विचरण करें । जहां भी मेरा विपक्षी दिखलाई पड़े, उसका वध कर डालें । हयग्रीव और केशी गर्भस्थ बालकों पर निगरानी रखेंगे । नारद की यह बात सुनकर हमको भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है । नारद का तो काम ही है, इधर की उधर लगाना । भय उत्पन्न कर मन-मुटाव पैदा करना, अतएव सब निर्भय होकर रहे ।
इसप्रकार कंस हंसता हुआ अपने राजभवन की ओर चल पड़ा, पर उसका मन शंकाओं से भर गया था ।
उसने राजभवन आकर मंत्रीगणों को आदेश दिया कि वह सावधान रहे । तत्परतापूर्वक प्रारम्भ से ही देवकी के गर्भ नष्ट करते रहे । देवकी और वासुदेव की विशेष रुप से सावधानीपूर्वक देखभाल करें । देवकी के गर्भ की सावधानीपूर्वक गणना करें । उसके सभी गर्भ सावधानीपूर्वक नष्ट कर दिये जाएं । मुनिवरों कंस ने इस प्रकारी की व्यवस्था तो कर दी, पर मन ही मन नारद की बातों के कारण भयभीत हो गया था । उसने देवकी के सभी गर्भ नष्ट करने की उचित व्यव्स्था कर दी ।
यह बात योगबल से भगवान विष्णु को भी ज्ञात हो गयी उनको यह सोचना पड़ा कि कंस द्घारा सात गर्भ नष्ट करने पर आठवें गर्भ में वह किस प्रकार अवतार (जन्म) लेंगे । तभी भगवान विष्णु को कालनेमि के छह पुत्रों का ध्यान आ गया । हिरण्यकशिपु ने उनको शाप दिया था कि तुम सब देवकी के गर्भ में जाओगे और जन्म से ही पूर्व गर्भ के समय ही तुम सबकी मृत्यु होगी । हिरण्यकशिपु ने उनको यह शाप इसलिये दिया था कि उन्होंने बिना अनुमति के ब्रहृ की तपस्या कर वरदान पा लिया था । अतएव इस शाप को पूरा करना आवश्यक था । अतएव भगवान विष्णु तुरन्त भूतल लोक को गये । वहां पर छहों कालनेमिके पुत्र जल-शय्या पर निद्रामग्न थे । विष्णु भगवान अपनी योगमाया के बल पर उनके शरीर में प्रवेश कर गये और उनके प्राण हरण कर निद्रा को दे दिए । उसे आदेश दिया की वह एक-एक प्राण देवकी के गर्भ में स्थापित करे । सातवें गर्भ के समय गर्भ परिवर्तन कर दे । देवकी के गर्भ को रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दे । इस प्रकार के संकर्षण से उत्पन्न बालक मेरा बड़ा भाई होगा । आठवें गर्भ के समय मैं जन्म लूंगा और तब तुम भी जन्म लोगी । मैं यशोद के पास पहुंच जाऊंगा । तुम देवकी के पास रहोगी । इस प्रकार तुमको देवकी की आठवीं संतान मानकर कंस तुम्हारा वध करेगा, पर तुम त्यन्त दिव्यरुप में आकाश में तिरोहित हो जाना । इन्द्र तुम्हारा अभिषेक करेगा । वह तुमको अपनी बहन मानेगा । बाद में तुम देवी के रुप में पूजति होंगी । शुंभ-निशुंभ नामक दो दैत्यों का वध कर तुम मेरे अंश से उत्पन्न देवी के रुप में पूजी जाओगी । तुम्हारा जप करने वाला धन-सम्पत्ति, पुत्रादि का सुख पायेगा । उनके संकट तुम सदा दूर करने में समर्र्थ रहोगी ।
इस प्रकार भगवान विष्णु ने निद्रा को अपने कार्य में भागी बना लिया । वह वापस आ गये । सारी योजना बन गयी ।
15 सितंबर 2010
नारद कंस मिलन
Posted by Udit bhargava at 9/15/2010 09:12:00 am 0 comments
पृथ्वी का दुख वर्णन
सूत जी बोले, द्घापर युग के अन्त समय में पृथ्वी का भार बहुत बढ़ा गया । नाना प्रकार के अत्याचारोसे पीड़ित पृथ्वी तब दुखी होकर ब्रहृ की शरण में गयी । ब्रहृ से उसने अपने सम्पूर्ण दुखो का रो-रोकर निवेदन किया । तब ब्रहृजी उसे अपने साथ लेकर भगवान विष्णु शयन- काल में थे । उनको शयन करते हुए सतयुग और त्रेतायुग बीत गये थे । भगवान विष्णु के पास जाते समय ब्रह के पास देवादि एवं समस्त मुनिगण भी संग हो गये । सबने वहां जाकर सामूहिक प्रार्थना की । भगवान विष्णु की निंद्रा टूटी । उन्होंने सबके आने का कारण पूछा । तब ब्रहृ ने उनको पृथ्वी का सारा दुख बतलाया । इस पर विष्णु भगवान सबके साथ सुमेरु प्रवत पर आये । तब वहाँ पर दिव्य-सभा हुई । इस सभा में पृत्वी ने अपने सारे दुखों का वर्णन किया ।
परमपिता ब्रहृ ने तब भगान विष्णु से पृथ्वी के दुख हरण करने की प्रार्थना की । उनसे निवेदन किया कि पृथ्वी पर आकर अवतार ग्रहण करें ।
ब्रहृ की इस प्रार्थना पर विष्णु बोले, आज से काफी समय पहले मैंने पृथ्वी को भयमुक्त करने का निश्चय कर लिया है । मैंने समुद्र को राजा शान्तनु के रुप में पृथ्वी पर भेज दिया है । मैं पहले ही जानता था कि पृथ्वी का भार बढ़ेगा । इस कारण पूर्व में ही मैंने शान्तुन के वंश की उत्पत्ति कर दी है । गंगा के पुत्र भीष्म भी वसु ही है । वह मेरी आज्ञा से ही गये है । महाराज शान्तुन की द्घितीय पत्नी से विचित्रवीर्य नामक पुत्र उत्पन्न हुआ है । इस समय उनके दोनो पुत्र धृतराष्टर् और पांडु भूमि पर है । पांडु की दो पत्नियां है । कुन्ती और माद्री । धृतराष्ट्र की पत्नी है गांधारी । एतएव देवतागण शान्तुवंश में जन्म लें । तत्पश्चात् मैं भी जन्म लूंगा । भगवान विष्णु के इस कथन पर समस्त देवतागणों, वसुगणों, आदित्यों, अश्विनीकुमारों ने पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किये । सबने भरतवंश में जन्म लिया । सूतजी बोवे, मुनिवरों । इस प्रकार धर्म ने युधिष्ठिर, इन्द्र ने अर्जुन, वायु ने भीम, दोनों अश्विनी कुमारों ने नकुल, सहदेव, सूर्य ने कर्ण, वृहस्पति ने द्रोणाचार्य, वसुओं ने भीष्म, यमराज ने विदुर, कलि ने दुर्योधन, चन्द्रमा ने अभिमन्यु, भूरिश्रवा ने शुक्राचार्य, वरुण ने श्रृतायुध, शंकर ने अश्वत्थामा, कणिक ने मित्र, कुबेर ने धृतराष्ट्र और यक्षों ने गंधर्वों, सर्पों ने देवक, अश्वसेन, दुःशासन आदि के रुप में पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किये । इस प्रकार समस्त देवगण अवतार लेकर पृथ्वी पर आ गये । नारद जी को जब यह पता चला तो वह विष्णु जी के पास आये और कुपति होकर बोले, जब तक नर-नारायण जन्म न लेंगे, तब तक पृत्वी का भार कैसे हल्का होगा । नर तो अवतार लेकर पृथ्वी पर चले गये । नारायण रुपी भगवान विष्णु आप यहीं विराजमान है । आखिर आप क्या कर रहे है ।
नारद की इस बात पर भगवान विष्णु बोले, हे नारद, इस समय में मैं विचार कर रहा हूँ कि कहां और किस वंश में जन्म लूँ । अभी तक मैं इसका निर्णय नहीं कर सका हूँ । मुनिवरों । भगवान विष्णु के इस कथन पर नारदजी ने उनको कश्यप का वर्णन करते हुए कहा कि वह महात्मा वरुम से गायें मांगकर ले गये, बाद में वापस नहीं की । इस पर वरुण मेरे पास आया । तब मैनें कश्यप को ग्वाला हो जाने का शाप दे दिया । इस समय कश्यप वासुदेव के रुप मे मेराश्राप भोग रहे है । उनकी दोनों पत्नियां देवकी और रोहिणी के रुप में उनके साथ है । वह पापी कंस के अधीन रह कर बड़ा दुख पा रहे है । वरुण के साथ विश्वासघात करने और मेरे श्राप का फल पा रहे है । मेरा तो यह सुझाव है कि आप उनके यहां ही अवतार लें । नारद का यह प्रस्ताव भगवान विष्णु ने स्वीकार कर लिया । व श्रीर सागर में स्थित उत्तर दिशा में अपने निवास में चले गए । फिर मेरु पर्वत की पार्वती गुफा में प्रवेश कर अपनी दिव्य देह त्यागकर वासुदेव के यहां जन्म ग्रहण करने के लिये चले गये ।
Posted by Udit bhargava at 9/15/2010 09:10:00 am 0 comments
नैमिषारण्य का सत्संग ( Naimisharanya's Satsang )
इस पर सूतजी अत्यन्त प्रसन्नता के साथ बोले, मुनिवरो, व्यास जी के शिष्य धर्मात्मा जनमेजय ने जो प्रश्न वृष्णि वंश के बारे में किये थे, उन्हीं के अनुसार वृष्णि वंश की कथा मैं आप सबको सुनाता हूँ । अत्यन्त मेधावी तेजस्वी भरतंवशी राजा जनमेजय ने भरतवंश के इतिहास को पूर्णरुप से श्रवण कर वैशम्पायन से ज्ञान प्राप्त किया था, वही वृतान्त आप लोगों को सुनाता हूँ ।
पुराणों को श्रवण करने से प्रतीत होता है, पांडव और वृष्णि वंशियों का कुल एक ही था । वंशावलि वर्णन में निपुण तथा प्रत्यक्षदर्शी वैशम्पायन ने राजा जनमेजय को बतलाया, जो अव्यक्त कारण, नित्य सदस दामक एवं प्रधान पुरुष है, उसी से इस ईश्वरमय जगत की उत्पत्ति हुई है । उसी अव्यक्त पुरुष को अभि्न तेज सम्पन्न, सब जीवों का सृष्टा और नारायण-परायण समझो । उसी महान ब्रहृ से अहंकार उत्पन्न हुआ । सूक्ष्म जीवों से पंचतत्व और जरायुज आदि चार प्रकार के जीवों की उत्पत्ति हुई । इसी को सनातन सृष्टि कहते है ।
भगवान ने सूक्ष्म भूतों को प्रकट कर अनेक प्रकार की भौतिक प्रजा उत्पन्न करने के विचार से, सबसे पहले जल का निर्माण किया । फिर उसमें अपना वीर्य डाला । जल को नीर कहा गया है, यह जल नीर की उत्पत्ति का कारण है, इसी कारण नर के जनक भगवान को नारायण कहा गया है । भगवान द्वारा जल में डाला गया वीर्य हिरण्य वर्ण का अंड हो गया । इस अंड से स्वंयभू ब्रह- की उत्पत्ति हुई । अण्ड में एक वर्ष रहकर ब्रहृ ने उसके दो खंड कर दिये । एक खंड पृख्वी और दूसरा खंड देवलोक ।
दोनों खंड़ो के अंतराल में आकाश की रचना कर पृथ्वी को जल पर स्थापित किया । तब सूर्य और दस दिशाएं बनायी गयी । उसी अंड से उन्होंने काल, मन, वचन, काम, क्रोध एवं अनुराग की सृष्टि की । सप्तऋषियों को प्रकट किया । परम क्रोधी रुद्र को उत्पन्न कर मारीचि आदि के पूर्वज सनत कुमार को जन्म दिया । विघुत, वज्रमेघ रोहित, इन्द्रधनुष तथा गगनचर खगों का निर्माण किया । वेदों की रचना की ।
अन्यान्य अंगों से अनेक प्रकार के प्राणी उत्पन्न किए । वशिष्ठ नामक प्रजापति भी बनाया, पर यह सब मन से उत्पन्न होने के कारण उनकी प्रजा में वृद्वि नहीं हो रही थी । अतएव तब ब्रहृ ने अपनी देव के दो भाग किए । एक को पुरुष बनाया, दूसरे को स्त्री । इस प्रकार भगवान ने विराट रचना की । विराट ने पुरुष को रचा । यह पुरुष मनु था । मनु ने मनवंतर का क्रम चलाया । योनिज सृष्टि में स्त्री संज्ञक द्वारा दूसरा अंतर उपस्थित हो गया । इसी कारण मनवंतर शब्द चल पड़ा । इस प्रकार योनिज अनोयिज दोनों प्रकार की सृष्टि हुई । शतरुपा अयोनिजा कन्या विराट की पत्नी बनी । शतरुपा ने विराट पुरुष के द्वारा वीर नामक पुत्र उत्पन्न किया ।
उससे विप्रवत् और उत्तानपाद नामक दो पुत्र, काम्या नामक एक पुत्री उत्पन्न हुई । काम्या के चार पुत्र सम्राट, रुक्षि, विराट और प्रभु हुए । उत्तानपाद ने चार पुत्र उत्पपन्न किए । ध्रुव, कीर्तिमान, शिव और अस्वपति । ध्रुव ने घोर तपस्या की । ब्रहृ ने उन्हें उच्च लोक प्रदान किया । धुव्र के तीन पुत्र हुए । कालान्तर में इसी वंश में वेन हुआ । वह देवताओं का द्रोही निकला । तब मुनियों ने उसकी दक्षिण भुजा कर मंथन का पृथृ नामक पुत्र को जन्म दिया । पृथू राजसूय यज्ञ का अनुष्टान करने वाला पहला राजा हुआ । पृथू राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला पहला राजा हुआ । पृथू ने प्राणियों को, जीवन दान देने के उद्देश्य से देवता, दानव, गंंधर्व, अप्सरा, सर्प, यज्ञ, लता, पर्वतादि से मिलकर सबको बछड़ा बनाकर पृथ्वी का दोहन किया । तब पृथ्वी ने अन्नादि दुग्ध प्रदान किया, तो सबकी जीविका का साधन बनी । आगे चलकर इसी पृथू वंश के प्रचेता की उदासीनता के कारण पृथ्वी वृक्ष-विहीन हो गई । तब वृक्षों के अधिपति सोम ने प्रजापति का सहारा लिया । तब चन्द्रमा के अंश से दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए । दक्ष प्रजापति ने चन्द्रवंश का विस्तार किया ।
मुनिवरों दक्ष प्रजापति के समय से मैथुनी सृष्टि प्रारम्भ हो गयी । इसमें नारद ने बाधा डाली । दक्ष प्रजापति ने उनको शाप देकर भस्म कर दिया । तब देवताओं के अनुरोध पर ब्रहृ ने दक्ष प्रजापति से एक कन्या लेकर नारद को पुनर्जन्म दिया । दक्ष प्रजापति का वंश बढ़ता गया । बहुत काल बाद दिति के गर्भ से कश्यप ने अत्यन्त बलवान पुत्र उत्पन्न किए । उनके नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष थे । प्रहलाद हिरण्यकशिपु का ही पुत्र था ।
सूतजी बोले, आगे चलकर ब्रहृ ने चन्द्रमा को ब्राहणो, नक्षत्रो, ग्रहो, यज्ञों और तपस्याओं का अधिपति बनाया । वरुण को जल का, कुबेर को धन का, वृहस्पति को सम्पूर्ण विश्वका अधिपति नियुक्त किया । भृगुवंशियों के अधिपति शुक्राचार्य बने । आदित्यों के विष्णु, वसुओं के अधिपति अग्नि बनाये गये । प्रजापतियों के दक्ष, दैत्यों के प्रहलाद, मरुतों के इन्द्र, पितरों के सूर्यपुत्र यम, रुद्रों के भगवान शिव और षोडष मात्रिकाओं, व्रती, मंत्री, गौत्रों, यक्षो, राक्षसों, राजाओ, साध्यों के अधिपति भगवान विष्णु बनाये गये ।
मुनिवरों, इसी प3कार विप्रचित दानवों के, शिव भूत-प्रेत, पिशाचों के, हिमवान पर्वतों के, समुद्र नदियों के, अशरीरी प्राणियों के और शब्दों के वायु, गंधर्वों के चित्ररथ, नागों के वासुकि, सर्पों के तक्षक, हाथियों के ऐरावत, घोड़ों के उच्चैक्षवा, पक्षियों के गरुड़, मृगों के सिंह, गौवों के वृषभ, वृत्रों के पीपल, गंधर्वों, अप्सराओं के कामदेव और ऋतु, मास, पक्ष, दिन, रात, मुहूर्त, कला, काष्ण, ऋतु, अयन, योग, गणित का अधिपति संवत्सर को बनाया । इस प्रकार का कार्य विभाजन कर तब ब्रहजी ने दिगपालों की नियुक्ति की । सूतजी बोले, मुनिवरों तब ब्रहृ ने सुधन्वा को पूर्व का, शंखपदम् को दक्षिण का, अच्युत केतुमान को पश्चिम का, हिरण्यरोमा को उत्तर का दिग्पाल बनाकर सबको पृथु के अधीन कर दिया । तब शौनक जी बोले, सूतजी, वेन तो महादुरात्मा था, तब उसका पुत्र पृथृ क्योंकर इतना प्रतापी हुआ ।
शौनक जी की इस जिज्ञासा पर सूतजी बोले, हां मुनिवरों । मृत्यु सुता सुनीता के गर्भ से उत्पन्न वेन दुराचारी था । उसने यज्ञ-हवन बन्द कराकर देवताओं के सारे कार्य रोक दिये । उसने अपने को ही एकमात्र देवता बतलाया । उसे मरीचि आदि मुनियों ने भी समझाया । वेन न माना, वह अपनी जिद पर था । तब मुनियों ने उसे पकड़कर उसकी जांघ का मंथन किया । वेन बहुत छटपटाया । उसकी जांघ से एक बौना और काले रंग का पुरुष उत्पन्न हुआ । वह खड़ा ही रहा । तब मुनि ने उसे निषीद कहा (बैठ जाओ) इसी निषीद शब्द के कारण यह निषादवंश का आदिपुरुष बना । तब मुनियों ने वेन की दक्षिण भुजा को मथा । उससे पृथृ का जन्म हुआ । तब वेन नरक में चला गया । पृथू अत्यन्त धर्मात्मा और प्रतापी राजा बना । उसके यज्ञ कुंड से सूत, मागध उत्पन्न हुए । तब पृथू ने सूत को अनूप प्रदेश और मागधा को मगध प्रदेश का शासक बनाया । इतना सब करने के उपरान्त पृथु ने पृथ्वी को रहने योग्य बनाया । राजा पुथु के इसी कार्य के कारण यह भूमंडल उनके नाम पर ही पृथ्वी कहलाता था । हे मुनिवरों राजा पृथ ने भूमि समतल की । पर्वतों को जन्म दिया । उन्होंने पृथ्वी का दोहन कर उसे रहने योग्य बनाया । इसके बाद असुरों, नागों, यक्षो, राक्षसों, गंधर्वो, अप्सराओं, पर्वतों, वृक्षों ने पृथ्वी का दोहन किया । पृथ्वी का विस्तार समुद्र तक हो गया । एक समय वह मधुकैटभ के मद में व्याप्त हो गयी थी । अतएव पृथ्वी का नाम मेदिनी भी हो गया । इस प्रकार दोहन के हो जाने के उपरान्त पृथ्वी योग्य हो गयी ।
सूतजी इतना कहकर मौन हो गए । तब शौनक जी ने उससे मन्वन्तर के विषय में प्रश्न किया । सूतजी ने सम्पूर्ण मनुओं और मन्वन्तर की कथा सुनायी । फिर सूर्य, संन्ध्या की छाया, यज्ञ के जन्म का विवरण दिया । सूत जी बोले, मुनिवरो । वैवस्वत मनु के वंशजों ने महाविशालकाय दानव धुन्ध का वध कर पृथ्वी का उद्वार कियग । राजा कुशलाश्व के जन्म में महर्ष गालब का जन्म हुआ । विश्वामित्र की भार्या ने इनको जन्म दिया था । सत्यव्रत ने गालब को विश्वामित्र की भार्या से खरीद लिया था । बाद में सत्यव्रत महर्ष वशिष्ठ के शाप के कारण त्रिशंकु कहलाये । विश्वामित्र को जब यह ज्ञात हुआ, तब उन्होंने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया । कंकय नरेश की कन्या सत्यरथा त्रिशंकु की पत्नी थी । उसने हरिश्चन्द्र को जन्म दिया और हरिशचन्द्र से रोहित उत्पन्न हुए । तत्पश्चात राजा सगर का आगमन हुआ । पर्याप्त अन्तराल के बाद सूर्यवंश ने विकास पाया । यशस्वी भागीरथ पवित्र गंगा को पृथ्वी पर ले आये । इस प्रकार हे मुनिवरों, परम-पिता व्रहृ के द्वारा निर्मित सृष्टि बराबर बढ़ती गयी । धर्म, अधर्म का संघर्ष होता रहा । समय-समय पर ब्रहृ के आदेश से भगवान विष्णु अवतार लेकर पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करते रहे । मुनिवरों । इन अवतारों की कथा बड़ी रोचकहै । परम पिता परमात्मा ब्रहृ ने सदा पृथ्वी पर कृपादृष्टि रखी है । इस कारण मुनिवरों, हम उन्हीं के अंश है । उनकी ही कृपा से हम इस नैमिषारण्य में समागम कर रहे है ।
सूत जी का यह कथन सुनकर उपस्थित मुनिगण गदगद हो गये । सूतजी का कथन सर्वथा सत्य था । तब शौनक जी बोले, हे मुनि श्रेष्ठ, हमारे ज्ञान वर्धन के लिये कृपापूर्वक आपने ब्रहृ द्वारा हरि (विष्णु) के अवतारों की बात कही है । अतएव विष्णु के यह सब अवतार हरिवंश कहलाये । आप हमें हरिवंश-पुराण सुनाने की कृपा करें ।
शौनक जी के इस प्रश्न पर सूतजी अत्यन्त प्रसन्नता के साथ बोले, मुनिवरों आपकी यह जिज्ञासा मेरा उत्साहवर्द्वन करती है । हरिवंश (विष्णु अवतारों) में सबसे प्रिय श्रीकृष्ण है । मैं इनका ही दिव्य चरित्र आप सबको सुनाना चाहता हूँ । हे मुनिवरों इस कथा का नाम ही हरिवंश पुराण है । हरिवंश पुराण के श्रवण से उसी प्रकार के पुत्र की प्राप्ति होती है, जिस प्रकार का पुत्र देवकी और वासुदेव को प्राप्त हुआ था । विधिपूर्वक इस कथा के श्रवण और बाद में संतान के लिये प्रार्थना करने पर याचक को पुत्ररत्न की प्राप्ति अवश्य होती है । हरिवंश पुराण के श्रवण की यह महिमा है । अतएव प्रथम मैं हरिवंश पुराण की कथा कहता हूँ । तत्पश्चात उसके श्रवण की विधि और सन्तान हेतु की गयी प्रार्थना का विवरण दूंगा, आप सब ध्यानपूर्वक सुनें । सूतजी के इस कथन पर सब मुनिगण गदगद हो गये और आगे का विवरण सुनने के लिये अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक सावधान होकर बैठ गये ।
Posted by Udit bhargava at 9/15/2010 09:09:00 am 0 comments
14 सितंबर 2010
सक्सेस की यूएसपी ( USP of Success )
अर्थात संसार में ऐसा कोई नहीं जिसने बिना unique selling proposition के सफलता पाई। आखिर यह unique selling proposition क्या है?
इसका मतलब है कि किसी चीज या व्यक्ति में सफल होने के लिये एक ऐसी विशेषता होनी चाहिए। जो न केवल उसको दूसरों से अलग करे और साथ ही दूसरे व्यक्तियों को उस विशेषता से अच्छा लाभ होता हुआ भी लगे।
उदहारण के लिये एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने भारत के ग्रामीण इलाकों के लिये एक ऐसा रेडियो चालू। इसी तरह से एक शेविंग क्रीम निर्माता ने क्वालिटी को बिना गिराए ऐसी क्रीम मार्केट में उतारी, जो बेहद सस्ती थी। इसका सबसे बड़ा फायदा बार्बर शाँप [नई की दुकानों] हो हुआ। यही कारण है कि देश के अधिकाँश छोटे एवं माध्यम साइज की नई की दुकानें इसी शेविंग क्रीम का इस्तेमाल ग्राहक की शेव बनाने के लिये करते हैं। ऐसा करने से उनकी बचत अधिक होती है। वे अधिक पैसा कमाते हैं। इसी तरह यदि आप किसी संसथान के लिये कार्य कर रहे हैं तो आपको इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि आप में ऐसी क्या विशेषता है जो आपको दूसरे कर्मचारियों से अलग करती है। आप में हजारों अवगुण हो सकते हैं, जिसके बारे में सारी संस्था gossip करती है, परन्तु एक ऐसा गुण या विशेषता भी होनी जरूरी है, जिससे संस्था को लाभ हो। क्या आप में सोचने की शक्तिक अच्छे है, क्या आप अच्छे रिपोर्ट लिख सकते हैं या आप में भाग-दौड़ करने की क्षमता है या आपका दिमाग बहुत analytical है या आप में networking करने की काबलियत है अर्थात आप दोसरों से अच्छे Relation [संबंध] आसानी से बना सकते हैं इत्यादि। आकार यह देखा जाता है कि कर्मचारी या एग्जीक्यूटिव अपने अवगुणों पर होने वाली Gossip को राजनीति की संज्ञा देकर उससे परशान होते रहते हैं और अपनी energy व्यर्थ ही waste करते हैं। उनको अपना सारा ध्यान अपने उन गुणों का विकास करने में लगा देना चाहिए। जिससे संस्थान को लाभ हो और वह दूसरों से अलग नजर आएं।
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Posted by Udit bhargava at 9/14/2010 09:00:00 am 0 comments
12 सितंबर 2010
रणनीति का क्रियान्वयन जरूरी ( Implementation of strategy needed )
जब वे टैंट में आराम कर रहे होते हैं, तो अचानक से उनके सामने के टाइगर आ जाता है। दोनों घबरा जाते हैं। एक दोस्त टाइगर को देखकर अपने स्पोर्ट्स शूज बिजली की गति से पहनने लगता हो। जिसको देखकर दूसरा दोस्त remark करता है कि तुम टाइगर से तेज नहीं भाग सकते। क्यों अपनी एनर्जी व्यर्थ गँवा रहे हो।' इसको सुनकर पहला दोस्त कहता है कि 'दोस्त! मुझे टाइगर से तेज नहीं दौड़ना है, मुझे तुझसे तेज दौड़ना है।'
उपरोक्त उदहारण में पहले वाले दोस्त को उद्देश्य उसके दिमाग में बिलकुल स्पष्ट है, उसको प्राप्त करने की रणनीति भी उसने पलक झपकते ही बना ली, और उस रणनीति को implement करने के लिये उसने जूते भी पहल लिये। अब तो वह टाइगर के आक्रमण का इंतज़ार कर रहा है। जैसे ही तिगर उन पर झाप्तेगा, दोनों इधर-उधर भागने के अलावा कुछ नहीं कर पायेंगे। इस भाग-दौड़ में जो पीछे रह जाएगा, वह टाइगर के हत्थे चढ़ जायेगा। दूसरे दोस्त ने खतरे के समय अपने दिमाग को भय के आवेश में जाम कर लिया और बिलकुल अकर्मण्य होकर बैठ गया।
उपरोक्त दोनों योग्यताओं के अनुसार काँरपोरेट वर्ल्ड में चार प्रकार के एक्जीक्यूटिव मिलते हैं। पहले, वे जो ना तो सोचना अच्छा जानते हैं और ना ही वे अपनी सोच को क्रियान्वित कर सकते हैं। अवे अपने भाग्य से काँरपोरेट वर्ल्ड में एंट्री ले लेते हैं, परन्तु अधिक चल नहीं पाते। दूसरे, वे एक्जीयूतिव जिनकी सोचने की शक्ति बहुत अच्छे होती है, परन्तु आलसी प्रवृत्ति के कारण उसको क्रियावान्ति करने में असफल होते हैं। ऐसे लोग बात करने में बहुत अच्छे होते हिं, बहुत जल्दी इंप्रेस करते हैं, परन्तु कार्य नहीं कर पाते हैं। ये बहुत जल्दी frustrate होते हैं और कंपनी छोड़ने में जल्दबाजी करते हैं। तीसरे प्रकार के वे एक्जीक्यूटिव हैं जो सोच नहीं सकते, परन्तु एक्टिव होने के कारण कार्य अच्छा करते हैं। ये फील्ड फ़ोर्स के लिये उत्तम हैं।
चौथे प्रकार के वे एक्जीक्यूटिव हैं, जो सोचते भी अच्छा हैं और एक्टिव भी बहुत हैं। ये लोग काँरपोरेट वर्ल्ड में top positions पर होते हैं।
इस लेख में दिए गए diagram के अनुसार प्रथम प्रकार के एक्जीक्यूटिव को Losers की संज्ञा दी है, दूसरे प्रकार को frustrator की संज्ञा दी है, तीसरे प्रकार को Gambler और चौथे को Expander कहा गया है। कुल मिलाकर मंत्र यही है कि हमें एक्स्पंदर बनाना है।
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Posted by Udit bhargava at 9/12/2010 02:37:00 pm 0 comments
पारंपरिक बाजारों में मार्केटिंग की जरूरत ( Marketing have to be in traditional markets )
सी ने ठीक ही कहा है 'इस संसार में कोई भी चीज permanent नहीं है। सफलता या असफलता सभी एक timeperiod से बंधी हुई हैं। कुछ समय के पश्चात उसमें बदलाव जरूर होता है।
जो चीज आज सफल दिख रही है, कुछ समय के पश्चात उसको कोई पूछने वाला भी नहीं होगा, इसी तरह जो आज असफल दिख रही है, वह भविष्य में सफलता की गगनचुम्बी ऊंचाइयों पर होगी।
उदहारण के लिये जयपुर-इंदौर आदि शहरों में यदि हम नजर दौडाएं तो पायेंगे कि यहाँ पर अन्य बड़े शहरों की तरह शाँपिंग माल और कांरपोरेट वर्ल्ड के big रिटेल आउटलैट खुल रहे हैं। ये अपनी आकर्षक मार्केटिंग योजनाओं के माध्यम से ग्राहकों को [खासतौर पर युवा वर्ग को ] अपनी तरफ झुका रहे हैं। अच्छे वातावरण, एयरकंडीशंड सुविधाएं, स्मार्ट सेल्समैन एवं सेल्सवुमैन, good product collection, बेहद बढ़िया विज्ञापनों एवं अच्छे इवेंट मार्केटिंग की बदौलत इन्होने वो कर दिखाया, जो जयपुर जैसे शहरों के परम्परागत बाजार पिछले पचास वर्षों में नहीं कर सके। अभी तो परिस्थितियाँ ऐसी हो चुकी हैं कि परम्परागत बाजारों के लोग अपनी दुकान सुपरमाल आदि में खोलने लगे हैं। सवाल यह उठाता है कि इन पारंपरिक बाजारों का भविष्य में क्या होगा? अभी हाल ही में पता चला है कि सन 2001-2002 में जो दुकानदार बड़े थे, जो अखवारों में फुल पेज के साइज के अनेकों बार विज्ञापन देते थे, आज 2010 में उनकी हैसियत यह हो गई है कि वे बहुत ही छोटे विज्ञापन देने में हांफ जाते हैं।
मैनेजमेंट विशेषज्ञों के अनुसार 'यदि किसी शहर का बहुत तेजी से विकास हो रहा है, तो शाँपिंग माल इत्यादि traditional बाजारों को पीछे जरूर छोड़ेगी। उनके अनुसार भविष्य के 10-15 वर्षों में पारंपरिक बाजारों में ग्राहकों की अत्यधिक कमी आयेगी। वे सिंगापुर का उदहारण देते हैं, जहाँ पर भीड़-भरे छोटी-छोटी दुकानों वाले बाजारों को आधुनिक सुपर माल आदि के कारण बहुत दिक्कतों का सामना करना पडा। अतः मैनेजमेंट विशेषज्ञ ये सल्लाह देने से नहीं चूकते कि पारंपरिक बाजारों को अपने आपको संगठित कर लेना चाहिए। अपना एक USP विकसित कर लेना चाहिए। सिंगापुर की तर्ज पर सरकार से सहयोग लेना चाहिए और अपने एक-एक ग्राहक के लिये fight करनी चाहिए। अन्यथा शहर तो बड़ा हो जायेगा पर ये दुकानदार छोटे होकर भीड़ में गम जायेंगे।
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Posted by Udit bhargava at 9/12/2010 07:57:00 am 0 comments
गलत आदतों का फायदा उठाना जानो ( Know the wrong habits to take advantage )
मैनेजमेंट की दुनिया में ऐसे अनेक उदहारण मिलेंगे। ऐसे ही एक उदहारण दो दुकानों के competition का है। ये दोनों दुकाने एक ही बाजार में एक दूसरे के आमने-सामने की ओर दोनों एक ही प्रकार के प्रोडक्ट ग्राहकों को बेचती थी। इसलिए दोनों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा भी जबरदस्त थी। जो भी दुकान ग्राहकों के लिये कोई भी स्कीम लेकर आती, उसको दूसरा दुकान वाला अगले ही दिन लागू करके ग्राहकों को अपनी ओर खींचने की कोशिश करने लगता था। मैनों तक चली इस तरह की परिस्थितियों से परेशान होकर एक दुकान वाले ने एक नायाब तरीका ग्राहकों को रिझाने का सोचा। उसने पहले हिसाब लगाकर यह पता किया कि वह प्रतिदिन ग्राहकों से bargain के समय वास्तु का price कम करके कितने पैसे क नुक्सान उठाता है। माना कि यह नुक्सान प्रतिदिन का 2000 रूपये आता है। इतने हे रूपये उसने छोटे-मोटे आइटम उदहारण के लिये पेंसिल, पेन, जियोमैत्रिक बाँक्स, स्माल डेकोरेटिव आइटम्स को खरीद कर एक बड़ी टोकरी में डालकर अपनी दुकान के निकासी द्वार (Exitdoor) पर रखवा लिया। उसने अपने कर्मचारियों को हिदायत डि कि यदि की ग्राहक इसमें चीजें निकालकर अपने साथ ले जाए, तो वे उसको Ignore करें। दूसरे शब्दों में वे ग्राहकों की चोरियों को नजरंदाज करें। ऐसा करने से धीरे-धीरे ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी और साथ ही वह टोकरी भी शाम तक खाली होने लगी।
अब ग्राहक को shopping करने का मजा आने लगा और वे अपने साथ नए-नए दोस्त भी लाने लगे, ताकि वे भी इस adventure में भागीदार बन सके।
इसका सुखद परिणाम यह रहा कि दुकान की बिक्री भी बहुत बढी और दूसरी दुकान वाले को यह समझ में नहीं आया कि ग्राहक उसकी दुकान पर क्यों नहीं आते। सारांश यही है कि हर चीज का फायदा उठाना जानों।
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Posted by Udit bhargava at 9/12/2010 07:36:00 am 0 comments










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