15 जुलाई 2010

तुलसी माला का महत्व ( The importance of Tulsi Mala )

यूं तो मालाएं कई प्रकार की होती हैं। जैसे फूलों की, रत्नों की, बीजों की एवं धातुओं की आदि। कुछ को हम आभूषण के रूप में धारण करते हैं तो कुछ को  मन एवं एकाग्रता के लिये न केवल गले में धारण करते हैं बल्कि हाथों से जाप करने के प्रयोग में भी लाते हैं। ऐसे में अधिकतर लोग तुलसी या रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करते हैं। इसमें भी तुलसी की माला का प्रयोग अधिक होता है। क्यों?

तुलसी की ही माला क्यों ?
तुलसी वैष्णव का धर्म का प्रतीक है। श्री कृष्ण एवं विष्णु को प्रसन्न करने के लिये तुलसी की माला को जप व धारण किया जाता है। कहते हैं श्री कृष्ण की सोलाह हजार पटरानियाँ और आठ पत्निया थीं। उन आठ पत्नियों में से एक पत्नी तुलसी भी थीं। तुलसी कृष्ण को प्रिय थीं इसलिए उपासक, साधक या वैष्णव धर्म प्रेमी तुलसी की माला का प्रयोग करते हैं।

माला धारण करने से लाभ
होंठ व जीभ मिलाकर उपांशु जप करने वाले साधकों को कंठ की धमनियों का प्रयोग करना पड़ता, जिसके लिये अधिक श्रम करना पड़ता है। इस श्रम के चलते साधक को कंठ सम्बंधित रोगों की संभावना भी रहती है। तुलसी अपने गुणों से कंठ को दुरूस्त रखती है तथा इसका स्पर्श व दबाव गले, गर्दन और सीने में एक्यूप्रेशर का काम करता है।

धर्माचरण ( Dhermacharan )

प्राचीन काल में काशी राज्य पर ब्रह्मदत्त शासन करते थे। उसी काल में बोधिसत्व ने धनंजय के नाम से कुरु राजा के रूप में इन्द्रप्रस्थ में जन्म लिया। उनके राज्य में अकाल कभी पड़ता न था। प्रजा सुखी थी। सारे जंबू द्वीप में ख़बर फैल गयी कि धर्माचरण और दान करने में इंद्रप्रस्थ के राजा धनंजय की बराबरी करने वाला कोई नहीं हैं।

उन्हीं दिनों दंतपुर को अपनी राजधानी बनाकर कलिंग देश पर कालिंग नामक राजा राज्य करते थे। उस राज्य में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। जनता भूखों मरने लगी। कई बच्चे अपनी माताओं की गोद में ही मर गये। जनता में हाहाकार मच गया। देश की उस बुरी हालत देख राजा कालिंग का दिल पसीज उठा। उन्होंने अपने मंत्रियों को बुलाकर पूछा, ‘‘इस वर्ष हमारे देश में ऐसे भयंकर अकाल पड़ने का कारण क्या है? इस बुरे हाल से बचने का उपाय क्या है?’’
मंत्रियों ने जवाब दिया, ‘‘महाराज, देश में जब धर्म की हानि होती है, तभी ऐसी आपदाएं आती हैं। इंद्रप्रस्थ के राजा धनंजय अपने धर्म का पालन करते हैं! इसीलिए उस देश में कभी अकाल नहीं पड़ता। जनता सुखी है और देश समृद्ध है।’’

‘‘तब तो तुम लोग एक काम करो। आज ही इन्द्रप्रस्थ जाकर राजा धनंजय के दर्शन करो। उनके द्वारा सोने के पत्रों पर धर्म-सूत्र लिखवा कर ले आओ। हम भी उन सूत्रों पर अमल करके अपने देश को सुखी और संपन्न बना लेंगे।’’ राजा कालिंग ने समझाया। कलिंग देश के मंत्री स्वर्ण पत्र लेकर इंद्रप्रस्थ पहुँचे। राजा धनंजय के दर्शन करके बोले, ‘‘महाराज, हम कलिंग देश के निवासी हैं। हमारे देश की प्रजा भयंकर अकाल का शिकार हो गई है। आप तो धर्मात्मा हैं, धर्माचरण करते हुए प्रजा पर शासन करते हैं। इसीलिए आपकी प्रजा सुखी और संपन्न है। हमारे राजा को जिन धर्मसूत्रों का पालन करना चाहिए, उन्हें आप इन सोने के पत्रों पर लिख दीजिए। हमारे राजा उन धर्म-सूत्रों का पालन करके अकाल से प्रजा को मुक्त करेंगे।’’ इन शब्दों के साथ कलिंग देश के मंत्रियों ने सोने के पत्रों को धनंजय के सामने रखा।

धनंजय ने प्रणाम करके कहा, ‘‘महामंत्रियो ! क्षमा कीजिए। इन पत्रों पर धर्म-सूत्र लिखने की योग्यता मैं नहीं रखता, क्योंकि एक बार मेरे द्वारा धर्म का उल्लंघन हुआ है। हमारे देश में तीन सालों में एक बार कार्तिक उत्सव होता है। उस व़क्त राजा को एक तालाब के किनारे यज्ञ करके चारों तरफ़ चार बाण छोड़ने पड़ते हैं। एक बार मैंने जो चार बाण छोड़ दिये, उन में से तीन तो हाथ लगे, मगर चौथा बाण तालाब में गिर गया। उसके आघात से मछलियाँ और मेंढक मर गये होंगे।’’

ये बातें सुन मंत्री आश्चर्य में आ गये। इसके बाद वे राजमाता मायादेवी के पास पहुँचे। सारी बातें उन्हें सुनाकर बोले, ‘‘माताजी, आप कृपया हमारे वास्ते धर्म-सूत्र लिख दीजिए।’’ ‘‘बेटे, मैंने भी धर्म का अतिक्रमण किया है। एक बार मेरे बड़े बेटे ने मुझे सोने की एक माला भेंट की। मैंने अपनी बड़ी बहू को संपन्न परिवार की समझ कर वह माला छोटी बहू को दे दी। लेकिन दूसरे ही पल मेरे भीतर का पक्षपात मुझे मालूम हुआ और इस बात का मुझे बड़ा दुख हुआ। इसलिए दूसरों को धर्म-सूत्र लिख कर देने की योग्यता मैं नहीं रखती। आप लोग कृपया किसी योग्य व्यक्ति के पास जाइये।’’

इसके बाद कलिंग देश के मंत्री राजा के भाई नंद के पास पहुँचे। उन्होंने भी एक बार धर्म का अतिक्रमण करने की बात बताई, ‘‘मैं रोज शाम को अपने रथ पर अंतःपुर में जाता हूँ। अगर मैं अपना चाबुक रथ पर छोड़ जाता हूँ तो मैं रात को अंतःपुर में नहीं टिकता। ऐसी हालत में रथ का सारथी मेरे इन्तज़ार में बैठा रहता है। यदि मैं चाबुक अपने साथ ले जाता हूँ तो सारथी रथ हांक ले जाता है, और दूसरे दिन सवेरे रथ ले आता है। एक दिन मैं चाबुक को रथ पर छोड़ कर अंतःपुर में चला गया। उस दिन अंतःपुर से लौटने का मेरा विचार था। लेकिन एक दिन जब रथ में चाबुक छोड़ कर गया तो ज़ोर से पानी बरसा। राजा ने, जो मेरे बड़े भाई हैं, मुझे लौटने नहीं दिया; इस कारण मैं रात को अंतःपुर में ही रह गया। पानी में भीगते मेरा सारथी रात भर रथ पर बैठा ही रह गया। उसे इस प्रकार तक़लीफ़ पहुँचा कर मैंने धर्म का अतिक्रमण किया है।’’

इसके बाद कलिंग के मंत्री राजपुरोहित के पास पहुँचे । लेकिन उन्होंने भी धर्म का अतिक्रमण करने की घटना बताई, ‘‘एक दिन मैं राजमहल को जा रहा था। रास्ते में मुझे एक रथ दिखाई दिया। उस पर सोने का मुलम्मा चढ़ाया गया था। उसे देखते ही मेरे मन में लालच पैदा हो गया। मैं जब राजा के पास पहुँचा, तब वे मुझे देखकर बोले, ‘‘पुरोहितजी, यह रथ मैं आपको भेंट करता हूँ।’’ उसी व़क्त मुझे अपने लालच की याद हो आई और पछताते हुए मैंने उस रथ को लेने से इनकार किया। इसलिए मैं आपको धर्म-सूत्र लिखकर नहीं दे सकता।’’

कलिंग देश के मंत्रियों की समझ में कुछ नहीं आया। आख़िर वे इंद्रप्रस्थ के महामंत्री के पास पहुँचे। वे बोले, ‘‘मैं एक दिन एक किसान के खेत का माप लेने गया। माप के मुताबिक़ जहाँ मुझे लकड़ी गाड़नी थी, वहाँ पर एक बिल था। मेरे मन में शंका पैदा हो गई कि उस बिल में किसी प्राणी का निवास हो सकता है। लेकिन अगर थोड़ा हटकर लकड़ी गाड़ दूँ तो किसान का नुकसान होगा! उसके थोड़ा आगे गाड़ने पर राजा का नुकसान हो सकता है! इसलिए मैंने उस बिल में ही लकड़ी गाड़ने की आज्ञा दी। उसी व़क्त बिल में से एक केकड़ा बाहर निकलते हुए लकड़ी के आघात से मर गया। इसलिए मैंने भी धर्म का अतिक्रमण किया है। ऐसी हालत में मैं आप लोगों को धर्म-सूत्र लिखकर कैसे दे सकता हूँ?’’

इस पर के मंत्रियों के मन में एक उपाय सूझा। उन लोगों ने जो कहानियाँ सुनी थीं उन्हें सोने के पत्रों पर लिख कर राजा को सुनाया। राजा कालिंग ने समझ लिया कि धर्म के प्रति ईमानदार रहना ही सबसे उत्तम धर्म है। इस प्रकार आत्म विमर्श करके उन्होंने शासन करना शुरू किया। कुछ ही दिनों में पानी बरसा और राज्य भर में अकाल दूर हो गया। कलिंग देश की प्रजा सुख पूर्वक अपनी जिंदगी बिताने लगी।

क्या है उपनिषद ? ( What is the Upanishads? )

उप, नि, षद - इनका विश्लेषण किया जाए तो उप अर्थात पास में, नि अर्थात निष्ठापूर्वक और सद अर्थात बैठना। इस प्रकार इसका शाब्दिक अर्थ हुआ - तत्वज्ञान के लिये गुरू के पास निष्ठावान होकर बैठना। ये वेद के अंतिम भाग हैं और इसी कारण से इन्हें वेदान्त भी कहा गया है। उपनिषदों को रहस्यमय ग्रन्थ भी कहा गया है। रहस्यात्मक तत्वज्ञान गुरू और शिष्यों के मध्य चर्चा का विषय रहा है। शिष्यों के तत्वज्ञान से सम्बंधित प्रशनों के उत्तर गुरू देते आए हैं और वे ही प्रश्नोत्तर, गुरू-शिष्य के मध्य के संवाद, इन ग्रंथों में संकलित हैं।

उपनिषदों में ज्ञान काण्ड की प्रधानता है इसलिए इनमें ब्रह्म के स्वरुप, जीव एवं ब्रह्म के आपसी सम्बन्ध और ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग आदि से सम्बंधित ज्ञान का विस्तृत वर्णन है। इसे अध्यात्मा विद्या अथवा ब्रह्म विद्या भी कहते हैं।

वेदों की जितनी शाखाएं हैं उतने ही उपनिषद थे. प्रत्येक का अपना-अपना उपनिषद था। परन्तु आज वे सभी उपनिषत उपलब्ध नहीं हैं। आज तक 108 उपनिषद मिले हैं जिनमें 10 उपनिषद ऋग्वेद से सम्बन्ध रखते हैं। 19 शुक्ल यजुर्वेद के, 32 कृष्ण यजुर्वेद के, 16 सामवेद के और 31 अथर्वेद के बतलाए जाते हैं। वास्तव में उपनिषदों की संख्या बहुत अधिक थी। ये 108 उपनिषद तो उपनिषद साहित्य के सार थे। इन 108 उपनिषदों में भी केवल 12 या 13 ही प्रामाणिक माने जाते हैं।

क्या हैं वेद? ( What are the Vedas? )

वेद ज्ञान का अनंत भण्डार है। ईश्वरीय ज्ञान है। ये कोई एतिहासिक पुस्तकें नहीं है की कोई घटना घटे और पुस्तकबद्ध हो गई। ईश्वर की अलौकिक वाणी जो ज्ञानरूप में वेदों में निहित है, उसे समझने के लिये वेद ही वे अलौकिक नेत्र हैं जिनकी सहायता से मनुष्य इश्वर के अलौकिक ज्ञान को समझ सकता है। वेद ही वे ज्ञान ग्रन्थ हैं जिनके समकक्ष विश्व का कोई भी ग्रन्थ नहीं है।

हमारे ऋषि-मुनियों ने युगों-युगों तक गहन चिंतन-मनन कर इस ब्रह्माण्ड में उपस्थित कण-कण के गूढ़ रहस्य का सत्यज्ञान वेदों में संग्रहीत किया।

सामान्य भाषा में वेद का अर्थ है - ज्ञान।
वस्तुतः ज्ञान वह प्रकाश है जो मनुष्य-मन के अज्ञानरूपी अन्धकार को नष्ट कर देता है। वेद शब्द संस्कृत के विद शब्द से निर्मित है।

वेदों में न केवल धर्म का उल्लेख मिलता है, बल्कि इनमें राजनीति, आचार-विचार, विज्ञान, ज्योतिश, औषधि, दर्शन आदि का भी विस्तृत उल्लेख मिलता है। वेदों में चारों वणों, उनके कार्यों कर्तव्यों और आचरणों का भी उल्लेख है। साथ ही सामाजिक आचार-विचार, शिष्टाचार, राष्ट्र रक्षा के उपाय, उस पर शासन करने के सिद्धांत उल्लिखित हैं।

वेदों की संख्या चार हैं - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद

स्वार्थ पर न टिके प्यार की नींव ( Love is not dependent on interest )


आज के इस भौतिकवादी युग में प्यार ढूँढने जाएँ तो कोसों दूर नहीं मिलता, क्योंकि प्यार का स्थान स्वार्थ ने ले लिये है। आज प्रेम भी वहीं दिल लगाना चाहते हैं जहान पर उन्हें फायदा दिखाई देता है। जिस तरह कई शादियों की नीवं दहेज़ पर टिकी होती है, ठीक उसी तरह आज के जमाने में प्यार की नींव स्वार्थ पर टिकी है। आज के युग में 1-2 वर्ष पुराना प्रेम ओल्ड फैशन हो गया है। यो लोग भूले-भटके किसी के प्यार में अपनी जिन्दगी दांव पर लगाने को तैयार हो जाते हैं वे बेवक़ूफ़ वे पागलों में गिने जाते हैं।

यह सत्य है की आज प्रेम के बारे में उनका ज्ञान कच्चा है। इस जीवन के बारे में लोगों का ज्ञान केवल पारिवारिक अनुभवों या हिंदी फिल्मों में दिखाए गए दृश्यों तक ही सीमित रहता है।

प्रारंभ का प्रेम
प्यार के शुरूआती महीने में हर मौसम सुहान और जीवन का हर रंग खूबसूरत लगता है। इस दौरान गर्लफ्रेंड और ब्वायफ्रेंड एक-दूसरे के प्रति अत्यंत आकर्षित रहते हैं। वे एक- दूसरे के प्रति उदार, सहयोगी और हाथों-हाथ लेने का भाव प्रदर्शित करते हैं, ताकि जीवनसाथी को लगे की वह दुनिया का सर्वाधिक भाग्यशाली व्यक्ति है। इस दौरान कटु अनुभव होने की गुंजाइश बहुत कम होती है। यह सुहाना सफ़र कितना लंबा होगा यह तो अलग जोड़ों की अवस्था पर निर्भर करता है। कपल्स जो एक दूसरे से कम उमीदें रखते हैं उनका प्रेम अधिक समय तक टिकता है। लेकिन वे लोग जो यह सोचते हैं की प्यार में समझौता की कोई आवश्यकता नहीं है और सेक्स का मतलब सिर्फ प्यार है वे जल्द ही प्रेम से वंचित हो जाते हैं।

प्यार से पहले समझौता या अलगाव
प्यार अगर ताकत है तो प्यार कमजोरी भी है। अगर प्यार में इंसान अपनी भावनाओं के तहत कमजोर होता जाता है तो रिश्ता चाहे कोई भी हो सामने वाला इंसान उसका फायदा जरूर उठता है। फिर चाहे वह प्रेम माँ-बाप का बच्चों के प्रति हो या पति या पत्नी का अपने पार्टनर के प्रति हो।

प्रेमा बताती है, 'मेरा प्रेमी विवेक निहायत ही शरीफ और समझदार इंसान है। लड़कियों के साथ खासतौर से उसका व्यवहार शालीन भरा है। उसके किसी गुण के कारण ही उसकी तरफ आकर्षित हो गई। चूंकि में उसे मन ही मन चाहती थी। इसलिए विवेक की हर बात मानती थी। उसे भी इस बात की जानकारी थी की मैं उससे प्यार करती हूँ। इसलिए वह मुझे ऐसे रोब मारता था की मैं उसकी पत्नी हूँ। 'मेरे प्यार का फायदा उठाते हुए वह हमेशा मनमानी करता था। जब उसका दिल चाहता मुजस से मिलने आ जाता था लेकिन मेरे मिलने के लिये बुलाने पर वह कभी नहीं आता था। इस व्यवहार ने मुझे झकझोर कर रख दिया, फिर भी मैं चुप थी। लेकिन काफी वर्षों तक भी जब उसने मुझे शादी के लिये प्रपोज नहीं किया तो मैं भी उसे छोड़ने का फैसला कर लिया। दो महीने तक मैंने उससे बात तक नहीं की। मेरे इस व्यवहार ने उसका दिमाग खोल दिया। अब वह खुद मुझसे मिलने के लिये बेताब रहने लगा। एक दिन शाम को उसने मुझसे शादी के लिये प्रपोज कर दिया। इस समय हम दोनों पति-पत्नी के रूप में खुशी से जीवन का मजा ले रहें हैं।'

इस प्रकार हम देखते हैं की यह चारण जीवन के दोराहे पर लाकर खडा कर देता है, जहाँ से दो रास्ते दिखाई पड़ते हैं 'समझौता' या 'अलगाव'। जीवन की इस अवस्था में सभी जोड़ों को अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती है, क्योंकि एक भी गलत फैसला उन्हें हमेशा के लिये अलग कर सकता है। यहाँ दूसरे की गलतियों पर चीखने-चिल्लाने की जगह जीवनसाथी को उसकी कमियों के साथ स्वीकार करने की भावना जीवन को स्थायी बनाने का काम करती हैं, जबकि इसके विपरीत प्रतिक्रया सम्बन्ध विच्छेद या अलगाव की राह पर ले जाती है। जो कपल्स जीवन का आनंद उठाना चाहते हैं वे समझदारी से काम लेते हुए टकराव की परिस्थितियों को ढालने में रुचि दिखाते हैं। वे जीवन की इस वास्तविकता को समझ लेते हैं की परिवर्तन प्रकृति का नियम है और नई जिम्मेदारियां, नए अनुभवों को सहर्ष स्वीकार करते हैं। वे जीवनसाथी पर फैसलों को थोपने की जगह उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उससे कुछ सार्थक सीखने का प्रयास करते हैं।

संबंधों में दरार तर्क से पड़ती है
हर सम्बन्ध में मतभेद होते हैं और इन पर बहस होती है। इश्क होने का मतलब यह नहीं होता की कपल्स के दिमाग भी एक हो गए हैं। हर व्यक्ति की अपनी सोच होती है और कोई भी कपल्स हर समय हर बात पर सहमत नहीं हो सकते हैं।
तर्क से बचने के लिये चुप्पी साधना कोई हल नहीं हैं, लेकिन बहस को कटु होने से जरूर बचना चाहिए। देखा जाए तो स्वस्थ बहस की तुलना में चुप रहकर मन में घुटते रहना दाम्पत्य जीवन को अधिक नुक्सान पहुंचाता है।
आप जितनी अधिक गलतियाँ निकालेंगे जीवनसाथी खुद को न बदलने के लिये उतना ही दृढ प्रतिज्ञ होता जायेगा।
अगर आप अपने जीवनसाथी को वाकई बदलना चाहते हैं तो उसके सकारात्मक पहलुओं की इमादारी से प्रशंसा कीजिये। आप पायेंगे की कुछ समय बाद नकारात्मक पहलुओं में स्वतः कमी आनी शुरू हो गई है।
जीवन में जीवनसाथी से कोई भी बात न छिपाना निःसंदेह एक आदर्श विचार है, लेकिन सच यह है की हर बात बता देना आप दोनों को करीब लाने की गारंटी नहीं है।

सही जानकारी का पता न चलना
अब तो अधिकतर प्यार इन्टरनेट के जरिये हो रहा है। अब पहले जमाने की तरह खानदान का विस्तार तो रहा नहीं, परिवार सिमटकर पति-पत्नी और दो बच्चों तक रह गया है। ऐसे में प्यार के लिये जांच-पडतान करवा पाना भी मुश्किल होता जा रहा है। इन्टरनेट में बहुत बातें छिपा दी जाती हैं, इसलिए शादी के लिये जल्दबाजी न करें जब तक सामनेवाले पक्ष के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त न कर लें, तब तक रिश्ता तय न करें।

उमा बी.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा थी। उसने जल्दबाजी में रेलवे में नौकरी करते लड़के से शादी कर ली। लड़का तुषार देखने में काफी स्मार्ट था। उमा भी सुंदर जीवनसाथी पाकर खुश थी। जब तीन साल गुजर गए और संतान पैदा नहीं हुआ तो सास ने ताना मारना शुरू कर दिया। उमा ने डाँक्टर को दिखाया लेकिन डाँक्टर डीपी राय ने उमा में कोई कमी नहीं पायी। यह सुनकर उमा की चिंता तो दूर हो गई, लेकिन उसने रात को एक दिन तुषार को भी चेकअप  कराने को कहा। इस पर तुषार तुनक गया. उल्टी-सीधी बातें करने लगा। वह तो उलटे उमा को ही खरी-खोटी सुनाने लगा।

समय बीतता गया। उमा कुंठित सी हो गई। आखिरकार एक दिन सच सामने आ ही गया। तुषार के एक पुराने फ़ाइल में उमा को उसका मेडिकल चेकअप मिल गया। उसकी रिपोर्ट के अनुसार तुषार नपुंसक था। उमा के तो होश ही उड़ गए। अब उसको पिछले दिनों की सारी बातें याद आने लगी। उसका पति एक-एक बहाना बना कर उससे दूर क्यों रहता था, तब बात उसको समझ में आ गई।

ऐसा नहीं है की किसी में कमी नहीं होती, लेकिन यदि इन कमियों को सही रूप में पहले ही सामने रख दिया जाए तो शायद बाद में सब ठीक हो जाएगा। आजकर थोड़ा बहुत झूठ बोलना तो आम बात हो गई है, लेकिन झूठ ऐसा न हो की वह रिश्तों को बिगाड़ दे, या मन में हमेशा के लिये गाँठ पड़ जाए। झूठ और अविश्वास की नींव पर रचे गए संबंधों में न तो स्थिरता होती है और न ही मधुरता।

14 जुलाई 2010

अठारह की पहेली ( Eighteen of the puzzle )

सन् 1945 में 30 जुलाई को हॉलीवुड में अभी सूर्योदय हुआ ही था कि अचानक एक झाड़ी से दो व्यक्ति निकले और एकान्त सड़क पर जाती हुई एक छोटी वैन को उन्होंने ऐक लिया । एक व्यक्ति लम्बा, दुबला और घबराया हुआ था, दूसरा नाटा, हट्टा-कट्टा और शान्त था । उन्होंने वाहन के दोनों सवारियों को बन्दूक की नोक पर बाहर निकाला, उनकी आँखों और मुख पर पट्टी बॉंधी और पास के एक वृक्ष के साथ उन्हें बॉंध दिया ।

वे कौन थे और क्या करना चाहते थे? उन्होंने वैन से जल्दी-जल्दी सामान उतारा - चॉंदी के सिक्कों की छः बोरियॉं और ताजे डॉलर के नोट्स से भरा गत्ते का एक बक्सा । फिर थोड़ी दूर पर खड़ी एक कार में उन्हें लादा और तेजी से जाते हुए सुबह के कुहासे में खो गये । दिन के उजाले में यह एक दुस्साहस पूर्ण डकैती थी । वैन हॉलीवुड स्टेट बैंक की थी । शीघ्र ही वे दोनों कुछ राहगीरों की मदद से किसी तरह बन्धन से मुक्त हो गये । वे चकित और किंकर्त्तव्यविमूढ़ थे । सब कुछ इतनी जल्दी हो गया कि वे अपनी रक्षा नहीं कर सके । वे बहुत दुखी थे, क्योंकि वे लॉक हीड कम्पनी को अपने कर्मियों को वेतन देने के लिए पैसा सौंपने के अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर सके ।

डाकुओं ने गंभीर अपराध किया था । उन पर अपहरण और चोरी का आरोप था । चोरी का माल बरामद करने के लिए मुकदमे को जल्दी से जल्दी सुलझाने की आवश्यकता थी । यह पुलिस और जासूसों के लिए एक भारी चुनौती थी । क्या अपराधियों ने अपने पीछे कोई संकेत छोड़ा था? दर्जनों लोगों से पूछताछ की गई । बैंक के दोनों कर्मचारियों के सवाल किये गये । आँख पर पट्टी बॉंधते समय एक नाटे हट्टे-कट्टे डाकू की कमीज़ पर एक ने बैज देखा था ।

यह लॉकहीड कम्पनी का चिह्न या । स्पष्ट है कि उसने यह दिखाने के लिए पहना था कि वह उस कम्पनी में काम करता है । एक दिन एक पुलिस अधिकारी को एक फेंकी हुई कार मिली । कार के अन्दर फटे कागज का एक टुकड़ा मिला जिस पर एक नाम और पता लिखा था । शीघ्र ही पुलिस को वह पता मिल गया और पुलिस ने उसका दरवाजा खटखटाया । एक औरत ने दरवाजा खोला जो अपने घर पर पुलिस को देख कर हैरान थी ।

‘‘हम लोग कुछ जॉंच-पड़ताल करने आये हैं,’’ उन लोगों ने कहा ।‘‘शौक से करें । आप का स्वागत है’’, अधेड़ उम्र की महिला ने कहा जिसका नाम श्रीमती एबलार्द था । घर की तलाशी के बाद जासूसों ने बाग में देखा जहॉं एबलार्द के बच्चे गेंद खेल रहे थे । अचानक गेंद कम्पाउण्ड के अन्त में एक शेड के दरवाजे के नीचे से लुढ़क कर चली गई । बच्चे पीछे-पीछे दौड़े किन्तु दरवाजे पर ताला लगा था । एक अधिकारी ने पूछा, ‘‘गैरेज में क्या है?’’ ‘‘उसे पिछले कुछ सप्ताहों से दो युवकों को किराये पर दिया गया है ।’’ श्रीमती एबलार्द ने बताया।

‘‘लेकिन वे कई दिनों से लौट कर नहीं आये हैं । उत्सुक अधिकारियों ने शेड का दरवाजा तोड़ कर खोला । बच्चे अपनी गेंद पाकर बड़े खुश हुए। लेकिन जासूसों को और ज्यादा खुशी हुई । क्योंकि उनके सामने जमीन पर एक कमीज़ पड़ी थी जिस पर लौकहीड का बैज, एक स्वचालित राइफल और बैंक के दोनों कर्मचारियों के रिवाल्वर्स पड़े थे । पुलिस अधिकारी बैज को लौकहीड कारखाने में ले गये । लेकिन जॉंच के बाद पता चला कि उस पर अंकित नम्बर जाली है और कर्मचारियों के नाम से मेल नहीं खाता । डाकुओं ने बड़ी चतुराई से असली नम्बर को मिटा दिया था और उस पर खास कलम से जाली नम्बर लिख दिया था । लेकिन वैज्ञानिक प्रयोगशाला में पराबैंगनी प्रकाश के नीचे बैज में कुछ चित्र दिखाई पड़े । वे असली मुद्रित अंकों के अवशेष थे ।


शीघ्र ही पुलिस लॉकहीड कारखाने के कर्मचारियों के रिकाडर्‌स की जॉंच-पड़वाल करने लगे । उन्हें पता चला कि पुराना नम्बर एक लम्बे, पतले, विचलित स्वभाववाले कर्मचारी का था जिसका नाम जॉनसन था । ऐसा लगता था जैसे हार्डी से उसकी अच्छी दोस्ती थी जो नाटा, गठीला और शान्त स्वभाव का था । वह भी कम्पनी का एक कर्मचारी था । आखिरकार भेद खुल गया । अपराधियों का पता चल गया ।

लेकिन चोर-मित्र बहुत पहले कम्पनी छोड़ चुके थे । अब वे कहॉं हो सकते हैं? कारखाने के रेकाडर्‌स के फोटो के साथ एक दिन दोपहर के बाद सड़क के किनारे की एक छोटी सराय में पुलिस ने जॉनसन को धर दबोचा । उसी शाम को उसी होटल के आस पास हार्डी मंडराता पाया गया । दोनों को, अपने को निर्दोष बताने के बावजूद, जेल में डाल दिया गया ।

डकैती के पैसों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने पहले बताया कि उन्हें कुछ नहीं मालूम है । बाद में उन्होंने कहा कि वे जान दे देंगे लेकिन यह नहीं बतायेंगे कि धन कहॉं छिपाया गया है । लेकिन एक रात को पुलिस को जॉनसन के पलंग के नीचे पानी भरा एक पात्र मिला । इसमें एक पुराना भीगा हुआ डॉलर का नोट तैर रहा था । इस बेढंगे प्रयोग का क्या अर्थ हो सकता है? क्या यह धन के रहस्य का संकेत है? शायद चोरी का माल किसी नम स्थान पर छिपाया गया है । इसलिए अपराधी यह जानना चाहते थे कि नोट को सड़ने में कितने दिन लगेंगे।

दोनों डाकुओं को अलग-अलग सेल में रखा गया । लेकिन वे अक्सर एक गार्ड की सहायता से अपनी कुछ टिप्पणियों का आदान-प्रदान किया करते थे । किसी प्रकार इनके अधिकांश सन्देश जासूसों के हाथ लग गये । इनके कुछ सन्देशों में संख्या ‘18’ और ‘पेपर’ शब्द की चर्चा थी । एक सन्देश में लिखा थाः ‘‘यदि हम लोग अधिक दिनों तक जेल में बन्द रहे तो पेपर सड़ जायेगा । दूसरा सन्देश इस प्रकार थाः ‘‘मेरी छोटी बहन उसे ला सकती है, लेकिन वह कैसे....तक पहुँच पायेगी ।’’
क्या ‘‘पेपर’’ शब्द का अर्थ धन था? यदि हॉं तो धन उस लड़की की पहुँच से परे बहुत नम स्थान में छिपाया गया था । लेकिन अंक ‘18’ का अर्थ क्या हो सकता था? क्या रास्ते की पहचान के लिए यह संख्या दी गई थी? पुलिस तथा जासूस अधिकारी गणों को शीघ्र ही एक ऐसे मार्ग का पता चला जिस पर चिह्न के रूप में एक पत्थर रखा हुआ था और उस पर ‘18’ लिखा हुआ था । वहॉं से एक तंग पगडंडी तार के 10 फुट ऊँचे एक घेरे तक जाती थी जो एक पुराने कब्रगाह के चारों ओर लगा हुआ था ।

एक अधिकारी ने अपना मनोभाव प्रकट किया, ‘‘सचमुच! कब्र के पत्थर को याद रखना एक आसान चिह्न है!’’ ‘‘तुम ठीक कहते हो! एक छोटी लड़की के लिए इतना ऊँचा घेरा पार करना बड़ा कठिन होगा ।’’ दूसरे ने अपना विचार प्रकट किया । पहेली के बिखरे टुकड़े अब एक जगह पर एकत्र होने लगे । अधिकारियों ने समय नष्ट नहीं किया औ कब्र की अनन्त पंक्तियों के बीच कोई संकेत की तलाश करने लगे और शीघ्र ही उनकी नजर एक पर पड़ ही गई । एक सिपाही की कब्र शिला के पीछे, जो 1898 में मरा था, मिट्टी, टहनियों तथा पत्तों का एक ढेर था!

उस स्थान को उन्होंने तुरन्त खुदवाया । काफी गहराई में कब्र शिला के नीचे चोरी का सारा धन गड़ा था - चॉंदी के सिक्कों की छः बोरियॉं तथा डॉलर के ताजे नोटों से भरा गत्ते का एक बक्सा ! जेल में दोनों दोस्तों को इस बड़ी खोज के बारे में बताया गया । पहले तो उन्होंने विश्वास करने से इनकार कर दिया, किन्तु अन्त में उन्होंने न केवल विश्वास कर लिया, बल्कि अपने अपराध को स्वीकार भी कर लिया ।

अच्छे उपभोगता बनने के 15 तरीके ( 15 Ways to be a good checkbox )



जब बात आती है खरीदारी की तो उसके लिये अभी कोई महिला मना नहीं करती है। चाहे वो घरेलू महिला हो या कामकाजी महिला। खरीदारी करना सभी को अच्छा लगता है। कई बार महिलाओं को खरीदारी करने की इतनी ज्यादा आदत पड़ जाती है कि वो शाँपिंग मेनिया की भी शिकार हो जाती हैं। एक तरफ से देखा जाए तो खरीदारी महिला करे या पुरुष हर किसी के मन को भाति है, पर पुरुषों की उपेक्षा महिलाओं में खरीदारी का सबसे ज्यादा उत्साह होता है, जिसके कारण वो खरीदारी के दौरान कई बार गलतियाँ भी कर जाती हैं।

अगर देखा जाए तो बहुत कम ऐसी महिलाएं होती हैं जिनमें सही ढंग से खरीदारी करने का गुण होता है यानी मजा उठाने के साथ-साथ सही कीमत से लेकर सही वास्तु को पहचाने का गुण, क्योंकि अक्सर यही देखने में आता है कि जब कोई महिला खरीदारी के लिये जाती है तो वह उस सामान की बाहरी बनावट व ब्रांड की तरफ आकर्षित होकर उत्पाद को खरीदती हैं बजाय इस बात के ध्यान दिए कि उसकी गुणवत्ता कैसी है, जो कीमत आप उसकी चुका रहे हैं वो उसके अनुरूप है कि नहीं। इस तरह की कई छोटी-मोटी गलतियाँ हो जाती है। इस गलती की एक वजह आप में खरीदारी करने के सही तरीके की जानकारी का न होना है। इसलिए जानें अच्छे उपभोगता बनने के कुछ उपाय -

सबसे पहले तो आप अच्छे उपभोगता बनने के लिये खरीदारी करने से पहले आप अपना बजट और क्या सामान खरीदना है यह तय कर लें। यानी पूरी सूची तैयार कर लें ताकि वहां समय व्यर्थ न हो।
खरीदारी करने से पहले आप एक बार पूरे बाजार का निरीक्षण कर लें। हो सकता है जो आप खरीदना चाहते  हैं उसमें और भी कुछ नया आया हो।
समय-समय पर आने वाली योजनाओं से अवगत होते रहें और उसका पूरा लाभ भी उठाने की कोशिश करें।
समय-समय पर आने वाली योग्जानों के साथ-साथ आप छूट का भी पूरा-पूरा फायदा उठाएं। छूट का सामान खरीदने से पहले आप सामान के बारे में अच्छे से पता कर लें, तभी खरीदारी करें और साथ में कितने दिनों के लिये छूट है इसकी भी पूरी जानकारी कर लें।
खरीदारी में आप चुनिन्दा चीजों की ही खरीदारी करें। अनावश्यक चीजों की खरीदारी पर अपना समय और पैसा दोनों व्यर्थ न करें।
उत्पाद खरीदने से पहले आप उत्पाद की एक्स डेट व सही कीमत की जांच कर लें। यदि वास्तु के खराब होने की तिथि नजदीक है तो वह सामान खरीदने से बचें।
बिल का करते समय आप एक बार सामान पूरी तरह से जांच लें। साथ में सामान में पड़े मूल्यों को रसीद मिला लें और जितना एमआरपी है उतना ही दें उससे अधिक नहीं।
आप माँल की जगह किसी साधारण दुकान में भी खरीदारी कर सकते हैं, इससे आपका बजट भी नहीं बिगड़ेगा।
आप समय बचाने के लिये ऑनलाइन शौपिंग भी कर सकते हैं।
अगर आप ब्रांड चूजी हैं और आपको किसी दूसरे सस्ते ब्रांड में कोई चीज पसंद आ रही है तो आप उसे भी जरूर ट्राई करें। इस तरह से आप पैसे बचाने के साथ दूसरे ब्रांड के बारे में जान सकते हैं। हो सकता है वो आपको  ज्यादा पसंद आए।
फैशन में हर रोज ज्यादा कुछ न कुछ नया बदलाव आता रहता है। इसलिए आप एक्सेसरीज लेकर आउट फिट तक में ऐआ कलेक्शन पसंद करें, जिसमें इन और आउट फैशन का झंझट न रहे। नहीं तो रोज आप फैशन के हिसाब से खरीदारी ही करते रह जाएंगे।
आप खरीदारी जल्दी-जल्दी न करें। एक खरीदारी से दूसरी खरीदारी के बीच में कम से कम 20 से 25 दिनों का अंतर जरूर रखें।
खरीदारी के दौरान बिल का भुगतान नकद रूप से करें। डेबिट और क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल से बचने की कोशिश करें।
खरीदारी करते वक्त अगर आप किसी उत्पाद को लेकर संशय में है तो उसे ना ही खरीदें।