हमारे जीवन में मुहूर्तो का अत्यधिक महत्व माना जाता है। ऋषि-मुनियों ने अपने चिंतन के बाद जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, उनके संकलित स्वरूप का नाम मुहूर्त शास्त्र है। विवाह-मुहूर्त में रवि शुद्धि, गुरू शुद्धि एवं चंद्र शुद्धि का विशेष महžव है। देव गुरू बृहस्पति विवाहोपरांत आपसी समझ से गृहस्थी के दायित्व को निभाने की शक्ति प्रदान करते हैं। इसलिए विवाह में कन्या की राशि से गुरू शुद्धि (गुरूबल) का विचार किया जाता है।14 जुलाई 2010
विवाह-मुहूर्त ( Marriage - moment )
हमारे जीवन में मुहूर्तो का अत्यधिक महत्व माना जाता है। ऋषि-मुनियों ने अपने चिंतन के बाद जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, उनके संकलित स्वरूप का नाम मुहूर्त शास्त्र है। विवाह-मुहूर्त में रवि शुद्धि, गुरू शुद्धि एवं चंद्र शुद्धि का विशेष महžव है। देव गुरू बृहस्पति विवाहोपरांत आपसी समझ से गृहस्थी के दायित्व को निभाने की शक्ति प्रदान करते हैं। इसलिए विवाह में कन्या की राशि से गुरू शुद्धि (गुरूबल) का विचार किया जाता है।
Posted by Udit bhargava at 7/14/2010 06:01:00 am 1 comments
13 जुलाई 2010
महाभारत - पाण्डवों तथा कौरवों का जन्म ( Mahabharat - Pandavas and the Kauravas of Mahabharata birth stories )
एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों - कुन्ती तथा माद्री - के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्हें एक मृग का मैथुनरत जोड़ा दृष्टिगत हुआ। पाण्डु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया। मरते हुये मृग ने पाण्डु को शाप दिया, "राजन! तुम्हारे समान क्रूर पुरुष इस संसार में कोई भी नहीं होगा। तूने मुझे मैथुन के समय बाण मारा है अतः जब कभी भी तू मैथुनरत होगा तेरी मृत्यु हो जायेगी।"
इस शाप से पाण्डु अत्यन्त दुःखी हुये और अपनी रानियों से बोले, "हे देवियों! अब मैं अपनी समस्त वासनाओं का त्याग कर के इस वन में ही रहूँगा तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ़" उनके वचनों को सुन कर दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा, "नाथ! हम आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने साथ रखने की कृपा कीजिये।" पाण्डु ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर के उन्हें वन में अपने साथ रहने की अनुमति दे दी।
इसी दौरान राजा पाण्डु ने अमावस्या के दिन बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को ब्रह्मा जी के दर्शनों के लिये जाते हुये देखा। उन्होंने उन ऋषि-मुनियों से स्वयं को साथ ले जाने का आग्रह किया। उनके इस आग्रह पर ऋषि-मुनियों ने कहा, "राजन्! कोई भी निःसन्तान पुरुष ब्रह्मलोक जाने का अधिकारी नहीं हो सकता अतः हम आपको अपने साथ ले जाने में असमर्थ हैं।"
ऋषि-मुनियों की बात सुन कर पाण्डु अपनी पत्नी से बोले, "हे कुन्ती! मेरा जन्म लेना ही वृथा हो रहा है क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिये मेरी सहायता कर सकती हो?" कुन्ती बोली, "हे आर्यपुत्र! दुर्वासा ऋषि ने मुझे ऐसा मन्त्र प्रदान किया है जिससे मैं किसी भी देवता का आह्वान करके मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर सकती हूँ। आप आज्ञा करें मैं किस देवता को बुलाऊँ।" इस पर पाण्डु ने धर्म को आमन्त्रित करने का आदेश दिया। धर्म ने कुन्ती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया। कालान्तर में पाण्डु ने कुन्ती को पुनः दो बार वायुदेव तथा इन्द्रदेव को आमन्त्रित करने की आज्ञा दी। वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् पाण्डु की आज्ञा से कुन्ती ने माद्री को उस मन्त्र की दीक्षा दी। माद्री ने अश्वनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।
एक दिन राजा पाण्डु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वातावरण अत्यन्त रमणीक था और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु चल रही थी। सहसा वायु के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन मे प्रवृत हुये ही थे कि शापवश उनकी मृत्यु हो गई। माद्री उनके साथ सती हो गई किन्तु पुत्रों के पालन-पोषण के लिये कुन्ती हस्तिनापुर लौट आई।
इधर युधिष्ठिर के जन्म होने पर धृतराष्ट्र की पत्नी गान्धारी के हृदय में भी पुत्रवती होने की लालसा जागी। गान्धारी ने वेदव्यास जी से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर लिया। गर्भ धारण के पश्चात् दो वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी जब पुत्र का जन्म नही हुआ तो क्षोभवश गान्धारी ने अपने पेट में मुक्का मार कर अपना गर्भ गिरा दिया। योगबल से वेदव्यास को इस घटना को तत्काल जान लिया। वे गान्धारी के पास आकर बोले, "गान्धारी तूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र सौ कुण्ड तैयार कर के उनमें घृत भरवा दो।" गान्धारी ने उनकी आज्ञानुसार सौ कुण्ड बनवा दिये। वेदव्यास ने गान्धारी के गर्भ से निकले मांसपिण्ड पर अभिमन्त्रित जल छिड़का जिसे उस पिण्ड के अँगूठे के पोरुये के बराबर सौ टुकड़े हो गये। वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गान्धारी के बनवाये सौ कुण्डों में रखवा दिया और उन कुण्डों को दो वर्ष पश्चात् खोलने का आदेश दे अपने आश्रम चले गये। दो वर्ष बाद सबसे पहले कुण्ड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। दुर्योधन के जन्म के दिन ही कुन्ती का पुत्र भीम का भी जन्म हुआ। दुर्योधन जन्म लेते ही गधे की तरह रेंकने लगा। ज्योतिषियों से इसका लक्षण पूछे जाने पर उन लोगों ने धृतराष्ट्र को बताया, "राजन्! आपका यह पुत्र कुल का नाश करने वाला होगा। इसे त्याग देना ही उचित है। किन्तु पुत्रमोह के कारण धृतराष्ट्र उसका त्याग नहीं कर सके। फिर उन कुण्डों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं दुश्शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ। गान्धारी गर्भ के समय धृतराष्ट्र की सेवा में असमर्थ हो गयी थी अतएव उनकी सेवा के लिये एक दासी रखी गई। धृतराष्ट्र के सहवास से उस दासी का भी युयुत्स नामक एक पुत्र हुआ। युवा होने पर सभी राजकुमारों का विवाह यथायोग्य कन्याओं से कर दिया गया। दुश्शला का विवाह जयद्रथ के साथ हुआ।
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Posted by Udit bhargava at 7/13/2010 07:30:00 pm 0 comments
उपास्य देव जानें ( Learn Upasya Dev )
कुण्डली के पंचम और नवम भाव की राशियों और उनके स्वामी गृह की सात्विक प्रवत्ति के अनुसार ज्ञात होता है कि व्यक्ति किस देवता की उपासना करेगा। यदि इन भावों में कोई ग्रह बैठे हों तो उनके अनुसार उपास्य देव में अंतर आ सकता है। लग्नानुसार उपास्य देव जानें-
वृष -- वृष लग्न में पंचम और भाव में कन्या और मकर राशि होने से व्यक्ति शंकर, दुर्गा और हनुमानजी का उपासक होगा।
मिथुन -- मिथुन लग्न में पंचम और नवं भाव में तुला और कुम्भ राशि होने से व्यक्ति हनुमान, देवी माँ और शंकरजी का उपासक होगा।
कर्क -- कर्क लग्न में पंचम और नवं भाव वृश्चिक और मीन राशि होने से जातक सौम्य देव, राधाकृष्ण और सीताराम का उपासक होगा।
सिंह -- सिंह लग्न में पंचम और नवं भाव में धनु और मेष राशि होने से व्यक्ति हनुमानजी के उपासक होंगे। यदि गुरू बनवान है, तब व्यक्ति विष्णु भगवान् का भक्त होगा।
कन्या -- कन्या लग्न में पंचम और नवं भाव में मकर और वृष राशि होने से व्यक्ति देवी माँ का उपासक होगा।
तुला -- तुला लग्न में पंचम और नवं भाव में कुंभ और मिथुन राशि होने के कारण व्यक्ति हनुमान और शंकर-पार्वतीजी का उपासक होगा।
वृश्चिक -- वृश्चिक लग्न में पंचम और नवं भाव में मीन और कर्क राशि होने से व्यक्ति देवी माँ और शंकर भगवान् का उपासक होगा।
मकर -- मकर लग्न में पंचम उअर नवं भाव में वृष और कन्या राशि होने से व्यक्ति दुर्गा देवी और हनुमानजी का उपासक होगा तथा तंत्र-मंत्र में भी रुचि होगी।
कुंभ -- कुंभ लग्न में पंचम और नवं भाव में मिथुन और तुला राशि होने से व्यक्ति हनुमान और देवी माँ का उपासक होगा। तंत्र-मंत्र में भी उसकी रुचि होगी।
मीन -- मीन लग्न में पंचम और नवम भाव में मिथुन और तुला राशि होने से व्यक्ति विष्णु भक्त होगा। ऐसा जातक सात्विक भक्तिभाव से विश्वास रखता है।
Posted by Udit bhargava at 7/13/2010 06:53:00 pm 0 comments
बिना पंचांग जानें ( Learn Without calendar )
जीवन में हम प्रतिदिन कोई न कोई छोटा-बड़ा काम करते ही रहते हैं। इन कामों को करने के लिये पंचांग देखना और बार-बार पंडित/ज्योतिषियों के पास जाना सम्भव नहीं होता। फिर हम कैसे जान सकते हैं कि शुभ-अशुभ योग कौन से हैं।
मुहूर्त चिंतामणि में तिथि एवं वार से बनने वाले अशुभ योगों से क्रकच योग, मृत्यु योग, दग्ध योग, सर्वात योग, विष योग, अधम अग्नि जिव्हा योग और कुलिक योग होते हैं। ये योग कैसे बनते हैं विचार करें-
क्रकच योग: सप्ताह के प्रथम दिन रविवार को एक मानते हुए गणना करें।
रविवार-1, सोमवार-2, मंगलवार-3 ....।
गणना करते समय जब तिथि और वार का योग '13' हो जाए तो क्रकच योग बन जायेगा. इसे निम्न सारणी से भी समझें-
वार रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
अंक 1 2 3 4 5 6 7
तिथि 12 11 10 9 8 7 6
अर्थात रविवार को द्वादशी तिथि हो तो क्रकच नामक अशुभ योग बनता है।
कुलिक योग: यदि वार व तिथि का योग आठ हो जाए तो कुलिक योग होता है।
वार रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
अंक 1 2 3 4 5 6 7
तिथि 7 6 5 4 3 2 1
यदि सोमवार को षष्ठी तिथि या मंगलवार को पंचमी तिथि हो तो कुलिक योग होगा।
अग्नि जिव्हा योग: इसमें कोई शुभ कार्य नन्हीं करें तथा नाम तथा गुण के नुसार यह अशुभ फलदायक है। रविवार को अंक व तिथि का योग 13 व शेष वार में 4 जोड़ने से जो तिथि आए वह जिव्हा योग कहलाती है। तालिका में देखें
वार रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
अंक 1 2 3 4 5 6 7
तिथि 1 2 6 7 8 9 10 11
उदाहरण सोमवार को दो अंक प्रदान किये हैं। इसमें 4 जोड़ने से 6 आता ही। अतः सोमवार को यदि छठ है तो यह योग बनता है।
अधम योग: क्रकच योग की भांति वार व तिथि का योग 13 हो जाए तो यह योग बनता है।
मृत्यु योग: तिथि में 5 का भाग दो जो शेष बचे वह क्रमानुसार अशुभ संज्ञय होगा।
वार रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
तिथि 1 2 3 4 5 व 0
उक्त अशुभ योग शुभ कार्यों में सर्वदा टालना हितकर रहता है।
Posted by Udit bhargava at 7/13/2010 05:59:00 pm 0 comments
12 जुलाई 2010
सांची में अंकित हैं भगवान बुद्ध के पूर्वभव ( Sanchi is reflected in Buddha's Puarvha )
समय चक्र का प्रवाह अनवरत चलता रहता है। समय के कारण प्रत्येक द्रव्य में परिवर्तन होता है। क्षण-क्षण बदलते पर्यायों के स्वरूप को इस विश्व में भगवान बुद्ध ने जितना अधिक बल देकर व्याख्यायित किया, उतना अन्य कोई नहीं कर सका। उनका मानना था कि सभी वस्तुएं परिवर्तनशील हैं। जीव भी परिवर्तनशील है। जैनदर्शन भी परिवर्तन को मानता है किंतु वह नित्यता को भी स्वीकार करता है। शरीर या पर्याय बदलता है, किंतु आत्मा नित्य है, अजर-अमर है। प्रतीत्यसमुत्पाद के कारण बुद्ध परिवर्तनशील दृष्ट धर्मो के अतिरिक्त किसी अदृष्ट स्थायी द्रव्य को नहीं मानते थे। अत: उन्होंने आत्मा को नहीं माना, यही अनात्मवाद बौद्ध धर्म का बहुत बडा सिद्धान्त बन गया। पुनर्जन्म का सिद्धान्त भारतीय दर्शन की एक प्रमुख विशेषता है। आत्मा की नित्यता स्वीकार किए बिना पुनर्जन्म को सिद्ध करना कठिन हो जाता है। स्थिर आत्मा का अस्तित्व अस्वीकार करते हुए भी भगवान बुद्ध यह स्वीकार करते थे कि जीवन विभिन्न क्रमबद्ध और अव्यवस्थित अवस्थाओं का प्रवाह या संतान है। विभिन्न अवस्थाओं की संतति को ही जीवन कहते हैं। इस संतति के अंदर किसी अवस्था की उत्पत्ति उसकी पूर्ववर्ती अवस्था से होती है। इसी तरह वर्तमान अवस्था आगामी अवस्था को उत्पन्न करती है। अनित्यता में भी निरन्तरता की स्वीकृति का यह अलग अंदाज था। शायद यही कारण था कि जातक कथाओं में भगवान बुद्ध के ही पूर्वजन्मों के बहुत रोमांचक वृत्तान्त लिखे हैं। सांचीके स्तूपों में जातक कथाओं के माध्यम से अद्भुत शिल्प सौन्दर्य द्वारा भगवान बुद्ध के पूर्वजन्मों के वृत्तान्तों को बखूबी दर्शाया गया है। सांचीमध्य प्रदेश के रायसेन जिले में बेतवा और बेसनदी के तट पर, विदिशानगरी से लगभग दस कि।मी की दूरी पर स्थित है। सांचीस्थित पहाडी को पुरातन काल में बेदिसगिरी, चेतियागिरी, काकनायआदि नामों से पुकारा जाता था। सांची के इन मनोरम स्तूपों का निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था। सांची में स्थित स्तूप, स्तंभ, विहारों, मंदिरों तथा चैत्यालयों का निर्माण तीसरी शती से बारहवीं शती तक हुआ। सम्राट अशोक ने विदिशा के एक व्यापारी की कन्या के साथ विवाह किया था। हृदय परिवर्तन के बाद उसने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और धर्म का भरपूर प्रचार-प्रसार किया। सम्राट अशोक ने विदिशा निवासी पत्नी के कहने पर ही सांची को बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार का केंद्र बनाया। उनका मानना था कि धर्म की शिक्षा के लिए एकान्त स्थल जरूरी है। विश्व में बौद्ध धर्म का सबसे पहले प्रचार सांची से ही शुरू हुआ। अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा सांची से ही बोधिवृक्ष की शाखा लेकर श्रीलंका गए थे। वे मां के साथ सांची में निर्मित विहार में ठहरे भी थे। ऐसी मान्यता है कि यहां के स्तूपों में भगवान बुद्ध की अस्थियां रखी हैं। जिन दिनों बौद्ध धर्म में मूर्ति पूजा निषेध थी उन दिनों ये स्तूप बौद्ध धर्मानुयायियों के लिए आस्था के प्रतीक थे और आज भी हैं।
ज्ञातव्य है कि बौद्ध स्मारक उन्हीं स्थलों पर निर्मित हुए जो भगवान बुद्ध के जीवन की घटना से संबंध रखते हैं। जैसे- लुम्बिनी, यहां भगवान बुद्ध का जन्म हुआ। बोधगया यहां उन्हें सम्यक् बोधि प्राप्त हुई। सारनाथ, यहां उनका प्रथमोपदेश हुआ। श्रावस्ती, यहां उन्होंने चमत्कार दिखाया। कुशीनगर, यहां उनका परिनिर्वाण हुआ। इसके अलावा राजगृह संकाश्य तथा वैशाली इत्यादि स्थान इस कारण श्रद्धा के केंद्र हैं, क्योंकि यहां भगवान बुद्ध का कई बार आगमन हुआ। सांचीके प्रथम स्तूप की चारों दिशाओं के तोरणद्वारों पर छद्दन्त, महाकपि, वेस्सन्तर, अलम्बुस और साम जातक कथाएं उत्कीर्ण हैं, ये सभी बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबंधित हैं।
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Posted by Udit bhargava at 7/12/2010 07:14:00 pm 0 comments
विकास के लिए अभ्यास जरूरी: गोपालदास ( Practise Required for development: Gopaldas discourse )
बाला जी मंदिर में प्रवचन सुनाते हुए महंत गोपालदास ने कहा कि मानव शरीर अनगढ है और वृत्तियांअसंयमित। इन्हें सुगढ एवं सुसंयमित करना ही अभ्यास का लक्ष्य है। अनगढ काया एवं मन अभ्यस्त होने के कारण सामान्यता किसी भी नए कार्य को करने के लिए तैयार नहीं होते। उल्टे अवरोध खडा करते है उन्हें व्यवस्थित करने के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पडती है।
उन्होंने कहा कि लगातार अभ्यास द्वारा शरीर एवं मन को इच्छानुवर्ती अर्थात इच्छा अनुसार कार्य करने लायक बनाया जा सकता है। साथ ही उन अंगों को असामान्य कार्यो के कर सकने के लिए भी सहमत किया जा सकता है। परोक्ष रूप से अभ्यास की यह प्रक्रिया ही व्यक्तित्व का निर्माण करती है। प्रतिभा योग्यता के विकास में बुद्धि आवश्यक तो है सर्व समर्थ नहीं। बुद्धिमान होते हुए भी विद्यार्थी यदि पाठ याद न करे, पहलवान व्यायाम छोड दे, संगीतज्ञ, क्रिकेटर अभ्यास करना छोड दें, चित्रकार तूलिका का प्रयोग न करे, कवि भाव संवेदनाओं को संजोना छोड बैठे, तो उसे प्राप्त क्षमता भी क्षीण होती जाएगी। जबकि बुद्धि की दृष्टि से कर्म पर सतत अभ्यास में मनोयोग पूर्वक लगे, व्यक्ति अपने अंदर असामान्य क्षमताएं विकसित कर लेते है। निश्चित समय एवं निर्धारित क्रम में किया गया प्रयास मनुष्य को किसी भी प्रतिभा का स्वामी बना सकता है। जबकि अभ्यास के अभाव में प्रतिभाएं कुंठित हो जाती है, उनमें व्यक्ति अथवा समाज को कोई लाभ नहीं मिल पाता। अभ्यास से ही आदतें बनती है और अंतत: संस्कार का रूप लेती है। कितने ही व्यक्ति किसी भी कार्य को करने में अपने को असमर्थ मानते है, उन्हें असंभव जानकर प्रयास नहीं करते है। फलस्वरूप कुछ विशेष कार्य नहीं कर पाते। जबकि किसी भी कार्य को करने का संकल्प कर लेने एवं आत्मविश्वास जुटा लेने वाले व्यक्ति उसमें अवश्य सफल होते है। आत्मविश्वास की कमी एवं प्रयास का अभाव ही मनुष्य को आगे बढने से रोकता तथा महत्वपूर्ण सफलताओं को पाने से वंचित रहता है। मानवीय काया परमात्मा का विलक्षण संरचना है। उसे जैसा चाहे बनाया जा सकता है। सामान्यता लोग कुछ दिनों तक तो बडे उत्साह के साथ किसी भी कार्य को करने का प्रयास करते है पर अभीष्ट सफलता तुरन्त न मिलने पर प्रयत्न छोड देते है। जबकि धैर्य एवं मनोयोग पूर्वक सतत अभ्यास में लगे व्यक्ति असामान्य क्षमताएं तक विकसित कर लेते हैं।
उन्होंने कहा कि अभ्यास की प्रक्रिया द्वारा शारीरिक-मानसिक क्षमताओं का विकास ही नहीं रोगों का निवारण भी किया जा सकता है। मानवीय काया एवं मन में शक्ति भंडारे छिपे पडे है। विकास की असीम संभावनाएं है। निर्धारित लक्ष्य की ओर प्रयास चल पडे और उसमें धैर्य एवं क्रम-बद्धता का समावेश हो जाए तो असंभव समझे जाने वाले कार्य भी संभव हो सकते हैं।
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Posted by Udit bhargava at 7/12/2010 06:37:00 pm 0 comments
हिमाचल प्रदेश की ग्ददी जनजाति ( Gaddi Tribes of Himachal Pradesh )
हिमाचल प्रदेश मे गद्दी एक विशिष्ट जनजाति है जो शारीरिक सरंचना, संस्कृतनिष्ठ भाषा, विशिष्ट वेशभूषा के कारण अपना अलग अस्तित्व रखती है। इस जनजाति का मूल क्या रहा होगा, यह निश्चित तौर से नहीं कहा जा सकता।
गद्दी अपने को मैदानों से आया हुआ बताते हैं। ’ए ग्लोरी आंफ़ द ट्राईब्स एण्ड कास्टस’ में उल्लेख है कि राजा अजय वर्मन के समय में कुछ चौहान राजपूत गद्दी ब्राह्मण, मैदानों से पलायन कर यहां आए। कुछ राजपूत और खत्री औरंगजेब के समय मैदानों से यहां आए। अजय वर्मन का समय सन 850-70 माना गया है जो सही प्रतीत नहीं होता। ’हिस्ट्री आंफ़ पंजाब हिल्ज स्टेट’ में अजय वर्मन का कार्यकाल सन 760 दिया गया है, जो सही प्रतीत होता है, जिसमें गद्दी ब्राह्मणों तथा राजपूतों के दिल्ली आने का उल्लेख है।
यह मान्यता कि भरमौर (पुरातन ब्रह्मपुर) गद्दियों की वास्तविक भूमि थी, इतिहास से मेल नही खाती। ब्रह्मपुर एक सम्पन्न राज्य था जो यहां के मंदिरों, वास्तुकला, मूर्तिकला को देखकर प्रमाणित होता है। ब्रह्मपुर का इतिहास आदित्य वर्मन (सन 620 ) तक और उसके भी पहले मारू तक जाता है।
ब्रह्मपुर का पुरातन राज्य राजा साहिल वर्मन (सन 920 ) के समय राजधानी चम्बा स्थानांतरित होने से उपेक्षित हो गया था। बाद में गद्दियों की प्रवासी प्रकृति के कारण सूना-सूना रहने लगा। सम्भवत: तभी गजेटियर में (1904) भरमौर की जनसँख्या 1901 की जनगणना के अनुसार मात्रा 4,343 बताई गयी है। हो सकता है कि जनगणना सर्दियों के मौसम में हुई हो और अधिकाँश गद्दी अपनी भेड़-बकरियों के साथ कांगड़ा या मैदानों में चले गए हों। घरों में बूढ़े लोग ही बचे होंगे। अन्या स्त्रोंतों के अनुसार वास्तविक जनसँख्या 33,907 थी।
क्या गद्दी लोग पहले से ही प्रवासी थे और भेड़-बकरी पालन के कारण मात्रा गर्मियों में ही भरमौर आते थे? इनके व्यवसाय, रहन सहन तथा परम्पराओं और देवी देवताओं के अस्तित्व से ऐसा ही प्रतीत होता है। गर्मियों में अपनी भेड़-बकरियों 'धण' के साथ कुछ धौलाधार से कांगड़ा की ओर आते हैं, तो कुछ 'साच' दर्रे, 'कुगति' दर्रे या अन्य मार्गों से पांगी तथा लाहौल की ओर से। अतः गद्दियों का पंगावालों और विशेषकर लाहुलों से सम्बन्ध रहा है।
गद्दी लोग आज भी आग जलाने के लिये चमकदार पत्थर का इतेमाल करते हैं। कुल्लू, किन्नौर तथा लाहौल के लोगों की भांति बलि देते हैं और कई प्रकार के विश्वासों (या अंधविश्वासों) मान्यताओं से ग्रसित हैं। उनकी अपनी अलग वेशभूषा और भाषा है। अतः यह जनजाति भी यहाँ की मूल जानाति है। यदि ये दिल्ली या मैदानों से आए होते तो इनमें इतना कुछ अलग नहीं होता। अलबत्ता बाद में बहुत से लोग मुस्लिम काल में धौलाधार की ओर पलायन करते रहे, जो चंबा या आसपास के लोगों में घुल-मिल गए।
गद्दियों में प्रमुख चार जातियां है- ब्रह्मण, खत्री, ठाकुर या राठी तथा अन्य। ब्रह्मण तथा खत्री राजपूत यज्ञोपवीत धारण करते हैं। ठाकुर या राठी यज्ञोपवीत नहीं पहनते। अन्य जातियों में कोली, रिहाडे, लोहार, बाढी, सिप्पी तथा हाली आते हैं, जिन्हें गद्दी लोग अपनी तरह गद्दी नहीं मानते।
हर वर्ग कई गोत्रों में विभक्त है। ब्रह्मण, खत्री आपस में विवाह सम्बन्ध कर लेते हैं। विवाह के लिये यज्ञोपवीत धारण करने वाली या न करने वाले भी कोई शर्त नहीं है।
अन्य जातियां या तो खेती करती हैं या वे शिल्पी हैं। कोली तथा सिप्पी को एक ही समझा जाता है। कपडे बुनना इनका कार्य है। रिहाड़े पीतल के बर्तन या जेवर बनाते हैं, लोहार लोहे का काम करते हैं, बाढी लकड़ी का, हाली हल जोतते हैं। ये जातियां सम्भवतः इस ओर बाद में आईं, अतः अछूत मानी जाने लगीं। गद्दी वर्ग में इन्हें अपना हिस्सा नहीं माना।
ब्रह्मण, खत्री, ठाकुर या राठी ब्राह्मणों के समान अपने गोत्र रखते हैं। कुछ स्थानों के नाम तथा शारीरिक विकलांगता के नामों पर भी गोत्र बने जैसे बतियाल के ब्रह्मण भाट हुए, एक हाथ वाला डण्डू हुआ। घुलने अर्थात पहलवाने करने से कोई घुलेटू हुआ तो लूण या नमक का काम करने वाला लूणेसर।
ब्रह्मण, राजपूत, राठी ये उच्च बने क्योंकि ये लोग यहाँ पहले से रह रहे थे। हल जोतने वाले या शिल्पी जो बहार से आए, निम्न हो गए। हल जोतने वालों पर राजपूतों या राजाओं का अधिकार रहा, इसलिए निम्न कोटि के, कामगार किस्म के कहलाये।
भरमौर में या कांगड़ा के ऊपरी भाग, पालमपुर की धौलाधार के नीचे रहने वाले सभी व्यक्तियों को गद्दी ही कहा जाता है। वे चाहे ब्रह्मण हों, राजपूत या राठी हों या खत्री। खत्री और महाजन अब एक व्यापारी जाती है, जो दुकानदारी करते हैं, पुरातन खत्री राजपूत बने। यह सम्भवतः खत्री की क्षत्रिय से व्युत्पति के कारण रहा होगा। गद्दी खत्री, मैदानों से आए खत्री महाजनों से, जो व्यापारी हैं, भिन्न हो सकते हैं।
ब्राह्मणों में विशिष्ठ, गौतम, अत्री, भार्द्वाद आदि, खत्रियों में रतनपाल, अत्री, भारद्वाज आदि जातियां हैं। किन्तु गोत्रों में 'अलों' से वर्गीकरण हुआ और इन्हीं को वे अपनी जातियां समझ बैठे। जैसे जारी 'जुक', चुप रहने वाले 'चुपेटु ', नाक में बोलने वाले 'गुत्रा', अफीमची 'अमलेतु', काले रंग वाले 'कपूर', मुक्केबाज 'मकरातु' कहलाए।
जालंधर खण्ड में किन्नौर, स्पिति दोनों लाहुल, पांगी और धेरन के लोगों को उनके निवास स्थान और जातीय-विशेषता के कारण हम सीमांती या जनयुगीन जातियां कह सकते हैं। इनमें से कुछ के बारे में विशेष रूप से राहुल जी ने लिखा है: गद्दी वस्तुतः एक जाती का नहीं, बल्कि एक इलाके के रहने वाले ब्राह्मणों, राजपूतों, क्षत्रियों, ठाकुरों और राठियों का नाम है, जिनमें सबसे अधिक संख्या खत्रियों की है। पंजाब में भी खत्री शब्द क्षत्रिय से वैसे ही बिगड़कर बना है, जैसे नेपाल में खत्री। इसलिये गधेरन के क्षत्रियों के उद्गम के लिये हमें पंजाबी खत्रियों की ओर निगाह डालने की जरूरत नहीं। बाहर के लोगों ने गद्दी का जो अर्थ लगा रखा है अर्थात एक भेड़ चुराने वाली हीन जाती, उसके कारण गधेरन के लोग अपने को गद्दी न कहकर ब्रह्मण, राजपूत, खत्री आदि कहते हैं और जनगणना में उसी तरह लिखवाते हैं। ये गद्दी मुख्यतः चंबा जिले के ब्रह्मौर वजारत (तहसील) में मिलते हैं, लेकिन, उनमें से कितने ही अपनी दक्षिणी सीमा धौलाधार के घाटों को पार कर कांगड़ा जिले के गाइरों बुकियालों) के लिये उधर भी चले गए हैं। गधेरन (चंबा) के रहने वाली जातियों के गोत्र फकरू, घोरू (राजवंशी), घलेटू (पहलवान), भजरेटू (भारवाहक), गाहरी (चरवाहें), अदापी, लुनेसर (नमक-रोजगारी), काहनघेरू (कंघी रोजगारी), पालनू आदि होते हैं। गद्दी लोग शरीर से बहुत स्वस्थ, रंग में बहुत गोरे और स्वभाव में सीधे-सादे आत्मसम्मान के पुतले होते हैं। वे उत्सवप्रिय होते हैं, गाना-नाचना उन्हें पसंद है।
भेड़ों को लेकर वे धौलाधार, पांगीधार या जांस्करधार की ऊंची चरागाहों (गाहरों) में साल के बहुत-से महीने बिताते हैं। उनकी आजीविका का साधन खेती और भेड़-बकरी पालना दोनों हैं। जाड़ों के दिनों में वे अपनी भेड़-बकरियों को लेकर नीचे की ओर चले जाते हैं। घर के पुरुष बारी-बारी से भेड़-बकरियों के साथ बाहर रहते हैं, बाकी लोग गाँव में रहकर खेती और ढोरों को देखते हैं। गद्दी धौलाधार के दोनों तरफ बसे हुए हैं, इसलिए उनके खेत भी चंबा और कांगडे दोनों जिलों में है। कांगड़ा में जाड़े की फसल काटकर ब्रह्मौर (गदेरन) जाकर अपनी गर्मियों की फसल काटते हैं। वे अक्टूबर-नवम्बर में कांगड़ा की ओर जाते हैं और अप्रैल-मई में ब्रह्मौर लौटते हैं। गद्दियों की ईमानदारी के लिये कहावत मशहूर है 'गद्दी मित्तर भोला, दिन्दा टोप तो मंगदा चोला।'
भरमौर में कन्या के जन्म पर पांचवे दिन और पुत्र के जन्म पर दसवें दिन शुद्धि की जाती है जिसे गंतूर या गोंत्राला कहा जाता है। इस अवसर पर माता के कपड़ों को धोने के साथ-साथ पूरे घर की सफाई की जाती है। पूरे घर तथा कपड़ों की शुद्धि के लिये गौमूत्र, दूध तथा गंगाजल का छिडकाव किया जाता है। घर के सभी छोटे-बड़े सदस्य इस का पान भी करते हैं। पुरोहित के पास जाकर शिशु के भविष्य के बारे में पूछा जाता है। यदि शिशु का जन्म शुभ मूहर्त या नक्षत्र में हुआ हो या अपने या दूसरों के लिये कष्ट्कारी हो तो पुरोहित के बताए अनुसार अष्टधातु, रत्ती आदि के साथ कंगन बांधा जाता है। दूसरे उपाय भी किये जाते हैं। सामान्यतः बालक की जन्मपत्री नहीं बनवाई जाती। कुछ खाते-पीते घर के लोग ही जन्मपत्री बनवाते हैं।
गंतूर या गोंत्राला होने तक जिस कमरे में शिशु का जन्म हुआ हो, वहां किसी व्यक्ति द्वारा अन्न ग्रहण नहीं किया जाता। शुद्धिकरण तक शिशु की माँ को नहलाया भी नहीं जाता। छः महीने का होने पर नामकरण किया जाता है। कुछ लोग स्वयं ही नाम रख देते हैं तो कुछ पुरोहित से पूछकर नाम रखते हैं। नामकरण के समय गुड बांटा जाता है।
बालक को पहली बार अन्न खिलाने के समय भी कुछ संस्कार किये जाते हैं। बालक को जमीन पर बैठाया जाता है और उसके सामने दाराट, कुदाल, कागज़, खीर, रखी जाती है। यदि वह खीर को पहले छुए तो पेटू होगा, कागज़ छुए तो विद्वान्, दराट-कुदाल छुए तो अच्छा कृषक या पुहाल होगा। इस अवसर पर पुरोहित तथा कन्याओं को खीर खिलाई जाती है।
शिशु के जन्म के कपड़ों के संभाल कर रखा जाता है। विवाह के समय माँ द्वार ये कपडे उसे दिखाए जाते हैं और यह एहसास करवाया जाता है कि वह युवक इतना-सा था। पुराने समय में वर माँ को इसके लिये एक से चार रूपए तक देता था।
बालक की मृत्यु हो जाने की स्थिति में जहां बालक दफनाया गया हो वहां उसे नहलाया जाता है। इसे 'घाट न्हौण' कहते हैं। कई बार तीर्थ या शमशान न्हौण भी करवाया जाता है। इस अवसर पर चेले को कपडे तथा पैसे दिए जाते हैं। गर्भ ठहरने के बाद महिला गर्भपात के देवता कैठू के नाम अपना हार तथा चार चकलियां (पुराने ताम्बे के रूपए) रखती थी। शिशु जन्म के तीन चार महीने बाद पुरोहित तथा महिला इस देवता की पूजा अखरोट या कैंथ के पेड़ के नीचे करते हैं। एक सफ़ेद बकरा या काले सिर वाला सफ़ेद बकरा प्रस्तुत कर उसके दाएं कान में काति से काट एक कपडे के ऊपर खून गिराया जाता है। देवता को चार चकलियां तथा रोटी दी जाती है। महिला द्वारा गुड खाने के बाद कपडे में रख लिया जाता है। यह कपड़ा तब तक रखा जाता है जब तक फटे नहीं।
गद्दी समाज में विवाह संस्कार एक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। हर्षोल्लास के इस अवसर पर सभी सम्बंधित मिलकर खाते-पीते हैं। सुरा पी जाती है, बकरे कटते हैं, डंडारस नाच किया जाता है, दूसरा विवाह पहली पत्नी की मृत्यु होने पर या नि-संतान होने पर पहली पत्नी की अनुमति से किया जाता है।
वर-वधु के माता पिता की आपसी रजामंदी से विधिवत किया गया विवाह 'धर्म पुत्र' कहलाता है। सगाई पक्की होने पर वर पक्ष के कुछ लोग एक सेर शुद्ध घी लेकर वधू पक्ष के यहाँ जाते हैं। यहाँ पुरोहित दोनों पक्षों की सुविधानुसार तिथि निश्चित करता है। पुरोहित पूरा कार्यक्रम बनाकर देता है। जिसे 'लखणोतरी' कहा जाता है।
विवाह की सभी रस्में लगभग कांगड़ा की रस्मों की भांति हैं। यद्यपि स्थानीय परम्परा के अनुसार कुछ अतिरिक्त संस्कार भी जुड़े हैं।
विवाह का आरम्भ समूहत से होता है जिनमें वर को बूटणा (उबटन) लगा कर आँगन में नहलाया जाता है। क्योंकि यज्ञोपवीत पहले नहीं होता। अतः इसी दिन मंजुमाला, म्रगछाला, मुद्रा पहना कर ब्रह्मचारी बनाने के साथ याग्योपवीत पहनाया जाता है। पुरोहित वर से पूछता है वह 'जतेरा जीवन' (सांसारिक जीवन) जीएगा या मतेरा जीवन (सन्यासी जीवन) ? वर जतेरा जीवन जीने के लिये कहता है।
तेल संस्कार मामा द्वारा एक कटोरी में तेल डाल कर वर के सिर पर रख हरी डूब से हिलाने के साथ होता है। डूब से तेल का छिडकाव किया जाता है। सभी संबंधी भी ऐसा करते हैं। मामा द्वारा दिया सेहरा वर द्वारा पहना जाता है। मामी आँखों में सुरमा डालती है। माँ वर को तमोल लगाती है। वर को पालकी में बिठा अन्य लोगों के साथ वधु पक्ष के यहाँ ले जाया जाता है। बरात को 'जनेत' कहा जाता है। बरात बाजे-गाजे के साथ जाती है। वर की पालकी हाली उठाते हैं।
बरात को ठहरने के लिये अलग मकान दिया जाता है। वर के पिता, मामा तथा पुरोहित लुचियों का टोकरा लेकर जाते हैं। वे रात में तथा अगले दिनों होने वाले संस्कारों पर बातचीत करते हैं।
बरात को भोजन के लिये निमंत्रण दिया जाता है। वर की ओर से कन्या को 'बरासूही' दी जाती है जो एक पिटारी या ट्रंक में होती है। इसमें वधु के लिये कपडे, श्रृंगार की सामग्री, गुड, नारियल, बादाम, लड्डू, केसर, न्हाणी (सुगंधित जडी) आदि होते हैं।
बरात के भोजन के बाद मूहर्त के अनुसार पुरोहित वर को कन्या के घर ले जाता है हां सास आरती उतारती है। ससुर वर के पैर धुलाता है। कन्या को बाहर लाया जाता है। वर तथा वधु के सिर तीन बार एक दूसरे से लगाए जाते हैं। चीरी संस्कार में मालती की लकड़ी के सात टुकडे कन्या वर को देती है जिसे वह पाँव के नीचे रख कर तोड़ता है।
कन्यादान तथा लग्न संस्कार कांगड़ा की भांति किये जाते हैं। कन्या का भाई कन्या का दुपट्टा फैलाता है जिस पर वर केसर के छींटे फेंकता है। कन्या भी वर के पटके पर केसर छिडकती है। पुरोहित कन्या के हातों में फल, फूल तथा कुछ पैसे रखता है। वर अपने हाथ कन्या के हातों पर रखता है। पिता भी हाथ लगाकर पुरोहित द्वारा मन्त्रोच्चारण के साथ कन्या दान करता है। कन्यादान के बाद कन्या को घर के भीतर ले जाते हैं। वर कुछ संस्कार अकेला पूरे करता है जिन्हें मनिहार कहते हैं। फिर वर को भीतर ले जाते हैं जहां कामदेव की प्रतिमा बनी होती है। कन्या को वहां लाकर उसके बाल सँवारे जाते हैं।
'खिलां खलाणी' संस्कार में एक छाज में जौ की खीलें राखी जाती हैं। वर ये खीलें तीन दिशाओं में रखता है, कन्या की बहनें इन्हें पुनः जल्दी से छाज में डालती हैं। यह बार-बार किया जाता है।
वर-वधु द्वारा अग्नि के फेरे लिये जाते हैं जो चार या सात हो सकते हैं। गोत्राचार में वर कन्या को अपने गोत्र में सम्मलित करता है।
बरात वापित आने पर दुल्हा-दुल्हन की आरती उतारी जाती है। सास बहु को कुछ भेंट देती है। वर-वधु से गणपति पूजन करवाया जाता है। दो परिवारों के पुरुष तथा महिला वर-वधु का कंगणा खोलते हैं। पुरुष वर का तथा महिला वधु का कंगणा खोल कर कंगण भाई या बहन बनते हैं। महिलाएं वधु का मुंह देखकर कुछ भेंट देती हैं।
एक विवाह में कम से कम चार धामें (भोज) दी जाती हैं। पहली समूहत के दिन, दूसरी बरात जाने के समय, तीसरी बरात वापसी पर तथा एक अगले दिन। धाम में बकरे कटने के साथ सुरा पान भी आवश्यक है।
गद्दी जनजाति में बाल-विवाह की प्रथा थी। जब बच्चे अभी गोद में ही होते थे तो उनका रिश्ता तय कर दिया जाता था। खेलने के दिनों में विवाह हो जाता था। यदि बचपन में विवाह हो जाए तो कन्या के युवा होने पर वर अपने सम्बन्धियों सहित वधु को लेने आता था। यह 'सदनोज' कहलाता है। यह कन्या के युवा होने पर होता है। इस बरात को वधु के घर तीन भोज दिए जाते हैं। यदि ये लोग शाम को आएं तो अगले दिन दोपहर का खाना खा कर जाते हैं। खाने में बकरे कटना आवश्यक है, सुरा भी पी जाती है। वर पक्ष की ओर भी धाम दी जाती है।
पुराने समय में कन्या की विदाई के समय बीस सेर आटे के बबरू, दो चोलू, दो लुआंचडियां, दस-पन्द्रह चुंडू, एक चादर तथा चार सेर गेहूं दिए जाते थे। दहेज में चांदी के आभूषण, भांडे-बरतन दिए जाते थ।
'बट्टा- सट्टा' एक लोकप्रिय विवाह पद्वति है। वर किसी कन्या से विवाह करने के बदले अपनी सगी बहन, ममेरी, फुफेरी या ताऊ चाचा की लड़की को अपनी भावी पत्नी के भाई को प्रस्तावित करता है। अतः एक परिवार की कन्या या पुत्र का विवाह दूसरे परिवार के पुत्र या कन्या से होता है। इस प्रकार से विवाह भी सुगम रहता है और सम्बन्ध भी प्रगाढ़ होते हैं।
'झांझराडा' पद्वति को गुदानी या चोली डोरी भी कहते हैं। पति की मृत्यु के बाद विधवा अपने पति के भाई से विवाह करती थी। किन्हीं स्थानों में विधवा किसी भी पुरुष से विवाह कर सकती है। विधवा स्त्री तथा पुरुष को कुम्भ तथा दीपक से पास बिठा दिया जाता है। स्त्री के बाल बनाई जाते हैं। पुरुष की ओर से स्त्री को नथ पहनने के लिये दी जाती है। विवाह के बाद भोज दिया जाता है। ऐसे विवाह में पुरोहित का होना आवश्यक नहीं है। कोई भी पुरुष किसी विधवा स्त्री से झांझराडा कर सकता है।
'घर जवांतरी' विवाह या घर जंवाई विवाह की प्रथा भी गद्दियों में कुछ अनोखे ढंग से प्रचलित है। वर को विवाह की खातिर अपने होने वाली ससुराल में सात से दस वर्ष तक रहना पड़ता है। वह नौकर की भांति काम करता है। उसे लगातार वहीँ रहना पड़ता है। यदि बीच में वह कही चला जाए तो रहने की अवधि बढ़ा दी जाती है। उसे अपने ससुर का हर कार्य करना पड़ता है। ससुर के प्रसन्न होने पर विवाह होता है। अवधि पूरी होने पर जब दूल्हा अपने घर वापस जाता है तो विवाह कर दिया जाता है।
'रीत' की भांति खेवत विवाह गद्दी जनजाति में प्रचलित है। यदि कोई पुरुष स्त्री के पहले पति को विवाह का पूरा खर्चा हर्जाने सहित अदा कर दे तो वह उस पुरुष से विवाह कर सकती है। प्रथम पुरुष यदि मान जाए तो स्त्री द्वारा ऐसा दूसरा विवाह किया जाना सम्भव है। किन्नौर की ओर से 'इज्जत' कहते हैं। यह विवाह स्त्री को पति गृह में मान-सम्मान न मिलने, पति का किसी अन्य स्त्री से प्रेम सम्बन्ध होने आदि के कारण होता है।
इस विवाह पद्वति में कन्या का पिता, वर या वर के माता-पिता से कन्या के बदले रूपए लेता है। यह राशि पांच सौ रूपये से लेकर हजार तक हो सकती है। राशि के भुगतान पर कन्या का विवाह कर दिया जाता है।
यदि माता-पिता कन्या का मनचाहे युवक से विवाह न करें तो वह अपने प्रेमी युवक के साथ भाग जाती है। दोनों झिंड अर्थात झाड़ियाँ जलाकर अग्नि के फेरे लेकर विवाह कर लेते हैं। बाद में इस विवाह को मान्यता तो मिल जाती है किन्तु कन्या का घर से भागना एक ग्लानी उत्पन्न कर जाता है। यदि कभी विवाह से पूर्व लड़की मिल जाए तो उसे जबरदस्ती घर भी वापिस लाया जाता है।
गद्दी जनजाति में विवाह एक पवित्र बंधन माना जाता है अतः सामान्यता विवाह-विच्छेद की नौबत नहीं आती। यदि कोई झगड़ा हो जाए तो पंचायत के हस्तक्षेप से दहेज़ की वस्तुएँ या नकदी पति को वापिस देनी पड़ती हैं। विच्छेद होने पर बच्चे पिता के घर रहते हैं। यदि गर्भ में शिशु हो तो वह भी जन्म के बाद पिता हो सौंप दिया जाता है। स्त्री अकेली दूसरे पति के घर चली जाती है।
Labels: भारतीय सभ्यता/कला/संस्कृति/विरासत
Posted by Udit bhargava at 7/12/2010 03:24:00 pm 0 comments


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