25 जून 2010
नया भारत, क्रांति शुरू हो गई है
यदि हम सौ वर्ष पहले की दुनिया को देखें, तो कोई दस हजार वर्ष के लंबे इतिहास में आदमी एक जैसा था, वैसा ही था। समाज के नियम वहीं थे, जीवन के मूल्य वहीं थे, नीति और धर्म का आधार वहीं था। दस हजार वर्षों में मनुष्य की जिंदगी के आधारों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इस सदी में आकर सारे आधार हिल गए हैं और सारी भूमि हिल गई है। जैसे एक ज्वालामुखी फूट पड़ा हो मनुष्य ने नीचे अरौ सब परिवर्तन हम समाप्त कर देंगे। यह परिवर्तन जारी रहेगा और रोज ज्यादा होता चला जायेगा।
अब तक हमने जिस मनुष्य को निर्मित किया था वह एक स्थायी, सुस्थिर समाज का नागरिक था। अब जिस मनुष्य को हमें निर्मित करना है, वह सतत क्रांति का नागरिक हो सके, इसका ध्यान रखना जरूरी है। भविष्य के मनुष्य की रूपरेखा, या नए मनुष्य के संबंध में सोचते समय पहली बात यह सोच लेनी जरूरी है कि परिर्वतन के जगत में जहाँ रोज सब बदल जायेगा- हम कैसे नीति विकसित करें, हम कैसा आचरण विकसित करें, मनुष्य को फिर से पुनर्विचार करना जरूरी हो गया है। महावीर ने, बुद्ध ने, मनु ने, कृष्ण ने और क्राइस्ट ने हमें मनुष्य की जो रूपरेखा दी थी, वह रूपरेखा आज आउट-ऑफ-डेट हो गयी है, समय के बाहर हो गयी है। उसी रूपरेखा को अगर लेकर हम चलते हैं तो अब जिंदगी ढंग की नहीं हो सकती।
इसलिए पहली बात जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह, कि अब तक के सारे आदर्श और सारे मूल्य जिस भांति जिस ढाँचे में विकसित किये गये थे, वे भविष्य के मनुष्य के काम के नहीं रह गये हैं। अब तक हमनें जिस मनुष्य को बनाने की कोशिश की थी वह भय के ऊपर खड़ा था। नर्क का भय, स्वर्ग का प्रलोभन था। और भय और प्रलोभन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
मनुष्य बुरा न करे, इसलिए नर्क के भय से हमने पीड़ित किया था और मनुष्य अच्छा कर सके, इसलिए स्वर्ग के प्रलोभन दिए थे। लेकिन आज अचानक इस सदी में आकर स्वर्ग और नर्क दोनों ही विलीन हो गये। उनके साथ ही वह नैतिकता भी विलीन हुई जा रही है जो भय और प्रलोभन पर खड़ी थी। आज जो अनैतिकता का सारे जगत में विस्फोट हुआ है, उसका कोई और कारण नहीं है। पुरानी नीति के आधार गिर गये हैं।
मैंने सुना है, एक चर्च के स्कूल में एक पादरी बच्चों को नीति की शिक्षा देने आता था। उसने बच्चों को नैतिक साहस के संबंध में छोटी-सी कहानी कहीं, मारल करेज के लिए। उसने बच्चों को समझाने के लिए कहा कि नैतिक साहस मनुष्य के जीवन में बड़ी जरूरी चीज है। वह कहानी बड़ी पुरानी थी।
उसने उन बच्चों से कहा कि मैं तुम्हें एक छोटी-सी-कहानी से समझाऊँ- तीस बच्चे किसी पर्वत पर घूमने के लिए गए। वे दिनभर में थक गये हैं। रात सोने के समय सर्द रात है, ठंड लग रही है, बिस्तर तैयार है। उन्तीस बच्चे सो गये, लेकिन एक बच्चा अपनी रात्रि की अंतिम प्रार्थना करने के लिए अंधेरे कोने में ठंड से सिकुड़ा हुआ बैठा है। तो उस पादरी ने बच्चों को कहा कि वह जो एक है, उसमें बड़ा नैतिक साहस है उन्तीस के विरोध में जाने का। जबकि ठंड बिस्तर में बुला रही हैं और दिनभर की थाकान है। और जब उन्तीस लोग सो गये हैं, तब भी एक बच्चा अपनी रात्रि की अंतिम प्रार्थना पूरा किये बिना नहीं सोता है, उसमें बड़ा नैतिक साहस है।
वह (पादरी) सात दिन बाद वापस आया। उसने बच्चों से पूछा, मैंने नैतिक साहस की तुम्हें कहानी सुनायी थी। मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ, तुम समझ सके मेरी बात? क्या तुम भी मुझे कोई घटना सुनाओगे जो नैतिक साहस को बताती हो? एक बच्चा खड़ा हुआ। यह बच्चा बीसवीं सदी के पहले कभी खड़ा नहीं हो सकता था। एक बच्चे ने खड़े होकर कहा कि हमने भी एक कहानी सोची है और आपकी बात से उसमें नैतिक साहस ज्यादा है। उस चर्च के पादरी ने कहा, 'मैं सुनना चाहूँगा।'
उस बच्चे ने कहा, 'आप जैसे तीस पादरी पहाड़ी पर गये हुए थे घूमने, भ्रमण करने। वे दिनभर थके-मांदे वापस लौटे। रात सर्द है, ठंडी है। बिस्तर उन्हें पुकार रहे हैं, लेकिन उन्तीस पादरी प्रार्थना करने बैठ गए हैं, और एक पादरी सोने चला गया है। और उस एक पादरी में बहुत नैतिक साहस है, उन्तीस पादरियों के विरोध में जाने का।'
यह बीसवीं सदी से पहले किसी बच्चे ने न सोचा होगा। और यह बात सच है। जब उन्तीस लोग प्रार्थना कर रहे हों और उनकी आँखे यह कह रही हों कि जो प्रार्थना नहीं करेगा वह नर्क भेज दिया जायेगा, और उनके सारे व्यक्तित्व का सुझाव यह कह रहा हो, उनके गैस्चर, उनकी मुद्राएँ यह कह रही हों कि नर्क में सड़ोगे, तब एक आदमी का प्रार्थना छोड़कर नींद के लिए बिस्तर पर चले जाना बहुत हिम्मत की बात है।
लेकिन यह हिम्मत आज की जा सकती है, क्योंकि नर्क और स्वर्ग हवाई कल्पनाओं से ज्यादा नहीं रह गये हैं। लेकिन आज से कुछ सदियों पूर्व वे बड़ी सच्चाइयाँ थीं। और आदमी उन्हीं से भयभीत होकर जी रहा था। तो हमने आदमी को कहा था कि झूठ बोलोगे तो नर्क में पड़ोगे, सत्य बोलोगे तो स्वर्ग में सुख मिलेगा। हमने बहुत प्रलोभन दिये थे। आदमी डरा हुआ था। तो वह नीति को मानकर जी रहा था। लेकिन आज सारे भय गिर गये हैं। आदमी निर्भय हुआ है। इस निर्भय आदमी पर पुरानी नीति लागू नहीं हो सकती। पुरानी नीति भी पुराने आदमी के साथ मर गयी है, मर रही है, मर जायेगी।
लेकिन क्या मनुष्य को अनीति में छोड़ देना है? क्या मनुष्य के अभय और निर्भय होने का अर्थ यह होगा कि वह अनैतिक हो? अगर यह होगा तो समाज निरंतर गहरे खतरों में पड़ जायेगा। क्योंकि नैतिक होने का एक ही अर्थ है कि मैं दूसरे व्यक्ति की भी चिंता करता हूँ, मैं अकेला नहीं हूँ। मैं अकेला नहीं हूँ! मैं इस पृथ्वी पर साथियों के साथ हूँ। कोई भी अकेला नहीं है। हमारे चारों तरफ पड़ोसियों का बड़ा जाल है और मैं पड़ोसी के लिए भी दायित्वपूर्ण हूँ। मैं उसके लिए भी विचार करता हूँ। उसे दुख न पहुँचे, इस भांति जीता हूँ। नैतिकता का आधार इतना है, लेकिन अब तक हमने भय के आधार पर इस बात को संभाले रखा था। कानून का भय था, पुलिस वाला खड़ा है चौराहे पर। आदालत में मजिस्ट्रेट बैठा है। ऊपर भगवान बैठा है। वह सुप्रीम कांस्टेबल का काम करता रहा है अब तक। बड़े से बड़ा पुलिस का हवलदार था। वह ऊपर से बैठकर नियंत्रण कर रहा है, लोगों को नर्क भेज रहा है, स्वर्ग भेज रहा है। लेकिन वह सब विदा हो गया है।
बीसवीं सदी की खोज ने बताया कि भगवान भी हमने अपने भय से निर्मित कर लिया था और उस भगवान का तो हमें कोई भी पता नहीं है, जो है। और जिस भगवान को हमने निर्मित कर लिया था, वह हमारे भय का ही आधार था। वह भगवान भी धीरे-धीरे फैड-आउट हो गया है। वह भी विलीन हो गया है। उसके साथ उसके नर्क-स्वर्ग भी विलीन हो गये हैं। उसके पुरोहित-पंडे, वे भी सब विलीन हो गये हैं। आदमी एकदम वैक्यूम में, खाली जगह खड़ा हो गया है। अब हम उसे डराकर नैतिक नहीं बना सकते।
पुराना आदमी नैतिक था बुद्धि खोकर। और बुद्धि को खोकर नैतिक होना अनैतिक होने से भी बदतर है। पुराना आदमी नैतिक था व्यक्तित्व खोकर। और व्यक्तित्व को खोकर नैतिक होना अनैतिक होने से भी बुरा है। पुराने आदमी के पास कोई व्यक्तित्व, कोई इंडीवीजुअलिटी न थी, यह भी ध्यान में रख लेना जरूरी है। पुराना आदमी समूह का एक अंग था, व्यक्ति नहीं। गाँव में एक आदमी था, वह समूह का एक अंग था, उसके पास कोई व्यक्तित्व न था। वह अलग से कुछ भी न था। वह भंगी था, ब्राह्मण था, चमार था, बनिया था, एक समूह का हिस्सा था और समूह के ऊपर जिंदा था। वह समूह के खिलाफ इंचभर चलता तो कुएँ पर पानी पीना बंद था, हुक्का बंद था, भोजन बंद था, विवाह बंद था। वह जिंदा नहीं रह सकता था।....
हिंदुस्तान से एक आदमी जर्मनी लौटा- काउंट कैसरलिन, तो उसने अपनी डायरी में लिखा कि हिंदुस्तान में जाकर मुझे पहली दफा पता चला कि स्वास्थ्य एक अनैतिकता है, बीमार होना नैतिकता है। और हिंदुस्तान में जाकर मुझे पता चला कि अस्वच्छ रहना, गंदगी से रहना अध्यात्म है। स्वच्छ रहना और ताजे रहना, साफ-सुधरे रहना भौतिकवाद है, मैटीरियलिज्म है। नहीं, यह सब हमें बदल देना पड़ेगा। एक नयी नीति- स्वस्थ, सुखी आदमी को, मुस्कराते आदमी को स्वीकार करेगी। हमें बुद्ध और महावीर की नयी मूर्तियाँ ढालनी होंगी, जिनमें वे खिलखिलाकर हंस रहे हों। अब उदास महावीर और उदास बुद्ध नहीं चल सकते हैं। ईसाई तो कहते हैं कि जीसस कभी हँसे ही नहीं क्योंकि हँसने जैसी छोटी-ओछी चीज जीसस कर सकते थे! उनकी किताबें कहती हैं, 'जीसस नैवर लाफ्ड'- हँसे ही नहीं कभी जिंदगी में। तो उन्होंने जीसस को जैसा बनाया..देखा होगा सूली पर लटके हुए। अगर वे न भी लटकाते तो ईसाई उनको लटता देते, क्योंकि गंभीर आदमी को सूली पर लटका होना चाहिए। लेकिन अब हम जीसस को हँसाकर रहेंगे। हमें जीसस की नयी तस्वीरें बनानी पड़ेंगी, जिसमें वे हँस रहा हों, फूल के बगीचे में खड़े हों।
नये आदमी को सुखी और स्वस्थ्य और आनंदित- इस पृथ्वी पर, स्वर्ग में नहीं, इस पृथ्वी पर सुख और स्वास्थ्य को स्वीकार करना पड़ेगा तो हम एक विधायक नीति के आधार रख सकते हैं। मुझे कोई कारण नहीं दिखायी पड़ता कि ये आधार क्यों नहीं रखे जा सकते हैं। मैं आपसे इतनी ही प्रार्थना करूँगा, इन दिशाओं में सोचें। बड़ा सवाल है, जिंदगी के सामने बड़ी समस्या है कि नयी नीति को कैसे जन्म दें। इन दिशाओं में सोचें। शायद हम सब सोचें तो हम कुछ रास्ते खोज लें।
मैं कोई उपदेश देनेवाला नहीं हूँ कि आपको उपदेश दूँ और आप ग्रहण कर लें। वह मामला छोड़ें, वह गुरु-शिष्य का संबंध गया। अब कोई उपदेश देगा, कोई ग्रहण करेगा, यह सवाल नहीं है। हम सब इकट्ठे होकर सोच सकें, हम सब मित्र की तरह साथ सोच सकें, और नये मनुष्य की रूपरेखा निर्मित कर सकें, इस दिशा में मैंने कुछ बातें कहीं। मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उससे बहुत अनुग्रहीत हूँ और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूँ, मेरे प्रणाम स्वीकार करें!
Posted by Udit bhargava at 6/25/2010 05:20:00 pm 0 comments
बांसुरी वाले की कहानी और जिंदगी के वायदे
संत राजिंदर सिंह जी महाराज
हरेक इंसान की जिंदगी में ऊँच-नीच आता है। हर एक की जिंदगी में कुछ ऐसे मौके आते हैं, जिनमें की तकलीफें बढ़ जाती हैं। महापुरुष हमें समझाते हैं कि हर मौके पर धैर्य रखना है, प्रेम से काम करना है। ध्यान रखना है कि हम अपने छोटे से फायदे के लिए सिद्धांतों को न छोड़ दें।
एक बाँसुरी वाले की रोचक कहानी है। एक शहर में चूहे बहुत हो गए। लोग सड़कों पर जाएँ, तो वहाँ चूहे देखें और घरों में भी चूहे धमाचौकड़ी मचाते दिखें। जिधर देखो, चूहे ही चूहे। वहाँ बीमारी शुरू हो गई। एक दिन शहर के लोग मिल कर मेयर के पास गए और उससे कहा कि आप कुछ करिए। उसने भी अपनी तरफ से बड़ी तरकीबें कीं, पर चूहों की संख्या बढ़ती चली गई।
फिर मेयर ने घोषणा करवाई कि अगर कोई आदमी हमें वह नुस्खा बताए, जिससे चूहे यहाँ से चले जाएँ, तो हम उसे एक हजार फ्लोरेंस देंगे। वहाँ की मुदा का नाम फ्लोरेंस था। ऐलान के अगले ही दिन वहाँ एक आदमी कहीं बाहर से आया। उसने अजीब से कपड़े पहने हुए थे। उसने मेयर से पूछा कि अगर मैं इन चूहों को यहाँ से बाहर ले जाऊँगा, तो घोषणा के अनुसार क्या आप मुझे एक हजार फ्लोरेंस देंगे? मेयर ने कहा, हाँ, अगर सब चूहे चले गए, तो तुझे हजार फ्लोरेंस जरूर दे देंगे।
अगले दिन सुबह, वह आदमी पूरे शहर में घूम-घूम कर बाँसुरी बजाने लगा। उसकी आवाज चूहों को ऐसी लगी, जैसे खाने के डिब्बे खुल रहे हों। तो सारे चूहे उस आवाज के पीछे-पीछे जाने लगे। चलता-चलता वह शहर के बाहर आ गया। बाहर एक नदी बहती थी। बाँसुरी बजाता हुआ वह नदी के अंदर चला गया। तो उसके पीछे-पीछे सारे के सारे चूहे भी नदी के अंदर चले गए और डूब गए।
जब सारे चूहे डूब गए, तो वह वापस शहर आया और अपना मेहनताना माँगा। मेयर ने कहा, तुमने तो कुछ किया ही नहीं, सिर्फ बाँसुरी बजाई है। बाँसुरी बजाने के लिए हजार फ्लोरेंस कौन देता है?
बाँसुरी वाले ने कहा, देखो, अभी मुझे उस शहर में जाना है, वहाँ पर बिल्लियों को हटाना है। उसके बाद एक अन्य शहर में जा कर वहाँ से बिच्छुओं को हटाना है। तो आप जल्दी से मुझे पूरे पैसे दे दीजिए। पर मेयर ने कहा कि ये 50 फ्लोरेंस ले जाओ, तुमने तो खाली बाँसुरी बजाई है, और कुछ किया नहीं। हम तो मजाक में बोल रहे थे कि हजार फ्लोरेंस देंगे। यह सुनकर बाँसुरी वाला बड़ा दुखी हुआ।
अगले दिन उसने फिर से बाँसुरी बजानी शुरू की, किसी अलग तरह से और ऐसी बाँसुरी बजाई कि शहर में जितने भी बच्चे थे, सब खुश हो कर उसके पीछे-पीछे चलने लगे। फिर वह शहर से बाहर निकला और एक पहाड़ की गुफा में चला गया और सारे बच्चे उसके पीछे चले गए और उसके बाद गुफा का दरवाजा बंद हो गया।
इस कहानी से हमें कई चीजें समझने को मिलती हैं। एक तो यह है कि जब हम किसी से कुछ वादा करें, तो वह हमें अवश्य पूरा करना चाहिए, उसे निभाना चाहिए। हम सोचते हैं, हमारा काम हो गया, हम चालाकी कर लेते हैं। पर प्रभु की निगाह में किसी की कोई चालाकी नहीं चलती। हरेक बोल, हरेक कार्य, हरेक सोच का हमें भुगतान करना है। हम लोग काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार से घिरे हुए हैं; हमारी आत्मा सिकुड़ती जाती है और हम असलियत को नहीं जान पाते हैं। काल के दायरे में इतने फँस चुके हैं कि उसमें धँसते चले जाते हैं। वे लोग, जो अपनी जिंदगी में सदगुणों को ढालते हैं, वे अपनी मंजिल तक पहुँच जाते हैं।
जैसे बाँसुरी वाले ने बाँसुरी बजाई, ऐसे ही महापुरुष हमारे अंदर शब्द को शुरू कर देते हैं। प्रभु का 'शब्द' हम सबके अंदर चल रहा है, उसे सुन कर ,उसका प्रसाद ग्रहण कर हम आनंदित तो होते हैं, लेकिन उस आनंद को भोगने के लिए किया गया वाद नहीं निभाते।
स्वामी विवेकानंद जी कहते है -
बोध वाक्य "तुम्हारे भविष्य को निश्चित करने का यही समय है। इस लिये मै कहता हूँ, कि तभी इस भरी जवानी मे, नये जोश के जमाने मे ही काम करों। काम करने का यही समय है इसलिये अभी अपने भाग्य का निर्णय कर लो और काम में जुट जाओं क्योकिं जो फूल बिल्कुल ताजा है, जो हाथों से मसला भी नही गया और जिसे सूँघा ही नहीं गया, वही भगवान के चरणों मे चढ़ाया जाता है, उसे ही भगवान ग्रहण करते हैं। इसलिये आओं ! एक महान ध्येय कों अपनाएँ और उसके लिये अपना जीवन समर्पित कर दें "
Posted by Udit bhargava at 6/25/2010 04:59:00 pm 0 comments
दुख के समय भगवान और धर्म क्यों याद आता है?
गीता में कृष्ण कहते हैं- 'चार प्रकार से व्यक्ति मेरी भक्ति करते हैं- आर्त, जिज्ञासु, ज्ञानी और अर्थार्थी। मनुष्य जब
दुखी होता है, तब मेरी भक्ति करता है। जब तक उसे कोई पीड़ा नहीं सताती, वह मुझे कभी याद नहीं करता।
आम्रपाली अपने समय की प्रसिद्ध नर्तकी थी। उसने एक बार बुद्ध से कहा- 'भंते! आप मेरे पास कभी नहीं आते।' बुद्ध बोले- 'अभी जरूरत नहीं है, जिस दिन जरूरत होगी, मैं अवश्य आऊंगा।' वह बूढ़ी हो गई। उसका शारीरिक लावण्य मिट गया। अब उसके पास कोई नहीं आता था। तब बुद्ध पहुंचे और बोले- 'प्रिय! मैं आ गया।' आम्रपाली ने कहा- 'भंते! अब समय बीत गया। अब मुझ में बचा ही क्या है? वह शारीरिक सौंदर्य अब नहीं रहा। आप आज क्यों आए?' बुद्ध ने कहा- 'प्रिये! यही तो समय है आने का। पहले तुझे मेरी आवश्यकता भी नहीं थी। धर्म की आवश्यकता तुझे अब महसूस हो रही है। मैं उसकी पूर्ति करने आया हूं।'
पीड़ा और दुख के समय भगवान और धर्म को याद किया जाता है। जब व्यक्ति महसूस करता है कि उसकी उपेक्षा हो रही है, सब उसको सता रहे हैं, वह बूढ़ा और शिथिल हो गया है, व्याकुलता बढ़ गई है, मन बेचैन है- तब उसे भगवान याद आते हैं, धर्म की बात याद आ जाती है।
पर ज्यादा श्रेयस्कर यह होगा कि व्यक्ति भगवान और धर्म की याद जिज्ञासु होकर, ज्ञानी होकर या अर्थार्थी होकर करे। जिज्ञासु होकर मनुष्य ईश्वर को तब याद करता है, जब उसके मन में यह जिज्ञासा जाग जाती है कि मैं सत्य का साक्षात्कार करूं। मैं यह जानूं कि आत्मा क्या है? चैतन्य क्या है? मोक्ष क्या है? उस जिज्ञासु अवस्था में व्यक्ति की जिज्ञासा की उपासना कर अपने को समाहित करना चाहता है। जिज्ञासा सत्य तक पहुंचाने वाला मार्ग है।
तीसरी अवस्था ज्ञानी की है। यह वह अवस्था है, जिसमें ज्ञानी व्यक्ति परम की उपासना करता है, ईश्वर और सत्य के प्रति समर्पित हो जाता है। ज्ञान की आराधना सत्य की आराधना है। ज्ञानी जान जाता है कि संसार में सार क्या है और निस्सार क्या है। वह जानता है कि सत्य का मार्ग कौन-सा है।
चौथी स्थिति में अर्थार्थी व्यक्ति भगवान की उपासना करता है। जब व्यक्ति के मन में पदार्थ की आकांक्षा उभर जाती है, वह उसकी पूर्ति के लिए भगवान की उपासना करता है, धर्म की आराधना करता है।
ध्यान रहे कि धार्मिकता का एक अर्थ अंत:करण की पवित्रता से है। वह धर्म की रुचि होने मात्र से प्राप्त नहीं होती, बल्कि उसकी साधना से प्राप्त होती है। संसार में साधना करने वाले धार्मिक बहुत कम है। ज्यादातर तो धार्मिक सिद्धि चाहने वाले लोग हैं। वे धर्म को इसलिए नहीं चाहते कि उससे जीवन पवित्र बने, किंतु वे उसे इसलिए चाहते हैं कि उससे भोग मिलें। आज का धर्म भोग से इतना आच्छन्न है कि त्याग और भोग के बीच कोई विभाजक रेखा ही नहीं जान पड़ती। धर्म का क्रांतिकारी रूप तब होता है, जब वह जन-मानस को भोग-त्याग की ओर अग्रसर करे।
आज त्याग भोग के लिए अग्रसर हो रहा है। यह वह कीटाणु है जो धर्म के स्वरूप को विकृत बना डालता है। धर्म तो जीवन की अनिवार्य जरूरत है। जब धर्म की पूर्ति नहीं होगी, तो जीवन में मानसिक संतुलन का अभाव तो अवश्य पैदा होगा। मानसिक संतुलन का अभाव अर्थात शांति का अभाव। शांति का अभाव अर्थात सुखानुभूति का अभाव। पदार्थ सुख के कारण तो जरूर हैं, पर उनसे सुख की अनुभूति नहीं होती। सुख की अनुभूति तो मन और मन से जुड़ी हुई इंद्रियों को होती है। वह तभी होती है, जब मन संतुलित और शांत होता है।
जहां त्याग और भोग की रेखाएं आस-पास आती हैं, धर्म अर्थ से संयुक्त होता है, वहां धर्म अधर्म से अधिक भयंकर बन जाता है। यदि हम चाहते हैं कि धर्म पुन: प्रतिष्ठित हो तो हम उसके विशुद्ध रूप का अध्ययन करें। आज ऐसे धर्म की आवश्यकता है, जो बुद्धि से प्रताड़ित न हो और शक्ति से हीन न हो।
Posted by Udit bhargava at 6/25/2010 08:02:00 am 1 comments
छोटा सा अंतर ( Little difference )
Posted by Udit bhargava at 6/25/2010 07:59:00 am 0 comments
23 जून 2010
शंखनाद की औषधीय विशेषता
शंख मुख्यतः दो प्रकार के होते ह्रैं : वामावर्ती और दक्षिणावर्ती। इन दोनों की पूजा का विशेष महत्व है। दैनिक पूजा-पाठ एवं कर्मकांड अनुष्ठानों के आरंभ में तथा अंत में वामावर्ती शंख का नाद किया जाता है। इसका मुख ऊपर से खुला होता है। इसका नाद प्रभु के आवाहन के लिए किया जाता है। इसकी ध्वनि से क्क शब्द निकलता है। यह ध्वनि जहां तक जाती है, वहां तक की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है। वैज्ञानिक भी इस बात पर एकमत हैं कि शंख की ध्वनि से होने वाले वायु-वेग से वायुमंडल में फैले वे अति सूक्ष्म किटाणु नष्ट हो जाते हैं, जो मानव जीवन के लिए घातक होते हैं।
उक्त अवसरों के अतिरिक्त अन्य मांगलिक उत्सवों के अवसर पर भी शंख वादन किया जाता है। महाभारत के युद्ध के अवसर पर भगवान कृष्ण ने पांचजन्य निनाद किया था। कोई भी शुभ कार्य करते समय शंख ध्वनि से शुभता का अत्यधिक संचार होता है। शंख की आवाज को सुन कर लोगों को ईश्वर का स्मरण हो आता है।
शंख वादन के अन्य लाभ भी हैं। इसे बजाने से सांस की बीमारियों से छुटकारा मिलता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से शंख बजाना विशेष लाभदायक है। शंख बजाने से पूरक, कुंभक और प्राणायाम एक ही साथ हो जाते हैं। पूरक सांस लेने, कुंभक सांस रोकने और रेचक सांस छोड़ने की प्रक्रिया है। आज की सबसे घातक बीमारी हृदयाघात, उच्च रक्त चाप, सांस से संबंधित रोग, मंदाग्नि आदि शंख बजाने से ठीक हो जाते हैं।
घर में शंख वादन से घर के बाहर की आसुरी शक्तियां भीतर नहीं आ सकतीं। यही नहीं, घर में शंख रखने और बजाने से वास्तु दोष दूर हो जाते हैं।
दक्षिणावर्ती शंख सुख-समृद्धि का प्रतीक है। इसका मुख ऊपर से बंद होता है। घर के मंदिर में इसकी स्थापना करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति और व्यवसाय में लाभ होता है। दक्षिणावर्ती शंख से भगवान सूर्य को जल का अर्य देने से मानसिक तथा शारीरिक कष्टों का निवारण होता है और नेत्र विकार से मुक्ति मिलती है।
Posted by Udit bhargava at 6/23/2010 02:10:00 pm 1 comments
प्रभु मिलन की आकांक्षा
मीरा कहै प्रभु हरि अविनासी, तन मन ताहि पटै रे।' मीरा कहती है कि मैं तुम्हें यह कह दूं कि मुझे जबसे यह अविनाशी मिला है, जबसे यह शाश्वत मिला है, तब से मेरा तन-मन, आत्मा सब एक हो गए हैं। वे द्वंद्व भीतर के गए; मैं निर्द्वंद्व हो गई हूं। वे जो भीतर खंड-खंड थे मेरे, वे सब समाप्त हो गए हैं; मैं अखंड हो गई हूं।
अखंड से जुड़ो तो अखंड हो जाओगे।
साधारणतः आदमी संसार में जीता है तो खंड-खंड रहता है, क्योंकि कितने खंडों से तुम जुड़े हो। एक हाथ पश्चिम जा रहा है, एक हाथ पूरब जा रहा है। एक पैर दक्षिण जा रहा है, एक पैर उत्तर जा रहा है। तुम कट गए। एक इच्छा कहती है - धन कमा लो; एक इच्छा कहती है - पद बना लो; एक इच्छा कहती है कि ज्ञान अर्जित कर लो; एक इच्छा कहती है यहीं संसार की चिंता में पडे+, थोड़ा स्वर्ग में भी इंतजाम कर लो, कभी कुछ दान-पुण्य भी कर लो। ऐसी हजार इच्छाएं हैं - और तुम हजार हो गए हजार इच्छाओं के कारण। और इन सबमें कलह है। ये इच्छाएं एक दिशा में भी नहीं जा रही हैं, क्योंकि अगर धन कमाना है तो पद न कमा पाओगे। अगर पद कमाना है तो धन गंवाना पड़ेगा। चुनाव लड़ना हो तो धन गंवाना ही पड़ेगा। और धन कमाना हो तो फिर चुनाव लड़ने से जरा बचना पड़ेगा। अगर स्वर्ग में कुछ पद-प्रतिष्ठा पानी हो, वहां सोने के महलों में वास करना और चांदी के रास्तों पर चलना हो, तो फिर आदमी को यहां भूखे मरना पड़े, उपवास करना पड़े - इत्यादि।
आकांक्षाएं विपरीत हैं। शरीर कहता है- भोजन करो। मन की आकांक्षाएं लोभ से भरी हैं; वह कहता है कि यहां क्या करना भोजन, स्वर्ग में ही कर लेंगे इकट्ठा। अभी कुछ दिन की बात है, गुजार लो; वहां शराब के चश्मे बह रहे हैं। मन कहता है - सुंदर स्त्री जा रही है, क्यों छोड़ दे रहे हो? एक मन कहता - इस स्त्री में उलझे तो फिर अप्सराएं नहीं मिलेंगी और खयाल रखना, फिर पछताओगे। अरे, यह तो दो दिन की बात है; एक दफा पहुंच गए स्वर्ग, तो अप्सराएं मिलेंगी। फिर भोगना सुख-ही-सुख अनंतकाल तक।
ऐसा मन अनेक-अनेक खंडों में बंटा है। इन खंडों के कारण तुम भी खंडित हो गए हो; तुम्हारी एकता टूट गई है।
सारे शास्त्रों का शास्त्र एक ही है कि तुम एक हो जाओ। लेकिन तुम एक कैसे होओगे; जब एक ही आकांक्षा रह जाए। उस एक आकांक्षा को ही हम राम कहते हैं। उस एक आकांक्षा का अर्थ ही यह है कि राम के सिवा कुछ भी नहीं पाना है। बाकी सब पाना उसी पर चढ़ा देना है; बस एक परमात्मा को पा लेना है।
जब एक ही आकांक्षा रह जाएगी तो तुम एक ही हो जाओगे। और कोई उपाय नहीं है। तुम्हारे भीतर योग साधने का और कोई उपाय नहीं है। जितनी आकांक्षाएं, उतने टुकड़े। यह बात तो तुम्हारी समझ में आ जाएगी कि जितनी आकांक्षाएं उतने टुकड़े हो जाते हैं। हर आकांक्षा एक टुकड़ा लेकर भागने लगती है। जब एक ही आकांक्षा रह जाएगी तो तुम अखंड हुए। वही है अर्थ - ÷मेरो मन रामहि राम रटै रे।' एक ही आकांक्षा बची है। बस एक ही को पाने की धुन सवार हुई है। सब धुनें खो गईं। सभी धुनें उसी में लीन हो गईं। जैसे सब छोटे-छोटे नदी-नाले आकर गंगा में सम्मिलित हो गए हैं, और गंगा सागर की तरफ - ऐसे ही सब छोटी-छोटी इच्छाएं एक विराट इच्छा बन गई हैं प्रभु को पाने की और सारी आकांक्षाएं उसी में सम्मिलित हो गई हैं। एक ही लक्ष्य बचा।
फिर ज्यादा देर तुम रुक न सकोगे। बहोगे अपने-आप, सागर तक पहुंच जाओगे। छोटे-छोटे नाले सागर तक नहीं पहुंच सकते; रास्ते में खो जाएंगे, मरुस्थलों में उड़ जाएंगे। लेकिन सब इच्छाएं मिल जाएं और एक अभीप्सा बन जाए... । अभीप्सा शब्द का यही अर्थ है। अभीप्सा का अर्थ होता है - सारी इच्छाएं एक इच्छा में निमज्जित हो गईं। छोटी-छोटी लपटें सब एक विराट लपट में खो गईं। तुम एक मशाल बन गए।
अब इस अविनाशी से लगन लग गई; अब तन और मन के बीच जो फासला था वह पट गया। अब कोई फासले नहीं रहे। अब कोई भेद नहीं रहे। अब कोई खंड नहीं रहे। मैं अखंड हो गई हूं।
Labels: अध्यात्म
Posted by Udit bhargava at 6/23/2010 02:09:00 pm 0 comments
22 जून 2010
सुख देकर दुख लेना महापुरुषों का स्वभाव
वेदान्त आश्रम में प्रवचन सुनाते हुए स्वामी देवेंद्रानन्दगिरी ने कहा कि सुख देकर दुख लेना महापुरुषों का स्वभाव है। अपने दुख से तो पशु-पक्षी भी दुखी होते हैं, पर सत्पुरुषों का कोमल हृदय पर पीडा से पीडित होता है जिससे जीवन में त्याग और प्रेम की अभिव्यक्ति होती है। मगर यह सब तभी संभव है जब मानव का अपनी इंद्रियों पर पूर्ण काबू होता है।
पंडित जी ने कहा कि इंद्रियों के अधीन रहने वाला मनुष्य बार-बार जन्मता और मरता है। विष को खाने से तो एक बार ही मृत्यु होती है परन्तु विषयों के भोगी को तो अनेकों बार मरना पडता है। विष को खाकर मनुष्य बच भी जाता है पर विषय-भोगी तो भोगते-भोगते स्वयं ही भुगत जाता है।
आश्चर्यजनक है कि यह सब जानते हुए भी मनुष्य भोगों से नहीं हटता। इस दृष्टि से हर वस्तु, व्यक्ति, अवस्था और परिस्थिति निरंतर हमारा त्याग कर रहे हैं। यदि अपनी ओर से उनकी ममता और कामना का त्याग कर दिया जाए तो हमें उनकी याद नहीं आएगी। हमें दुख भले ही अरुचिकर लगें मगर ये सुख आने की सुचना के प्रतीक माने जाते हैं।
मनुष्य के विकास के लिए जीवन में दुखों का आना जरूरी होता है क्योंकि दुखों के समय ही मनुष्य के मन में उनसे लडकर तरक्की करने की इच्छा पैदा होती है। हम सब इतना साधन जानते हैं जितना इस जीवन में कर ही नहीं सकते और जितना करने की आवश्यकता भी नहीं है। हमारी जो रुचि साधक संबंधी चर्चा सुनने में है वह रुचि साधन करने में नहीं है। हमारी शक्ति तो सीमित ही है। यदि इस सीमित शक्ति को हमने साधन की चर्चा में ही व्यय कर दिया तो फिर साधन करने के लिए सामर्थ्य कहां से आयेगा।
मन की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। अपनी पसन्द के प्रभाव का समूह ही मन है जिसे हम पसन्द करते हैं उसके साथ हमारा मन लग जाता है और जिसको नापसन्द करते हैं वहां से मन हट जाता है। उन्होंने कहा कि कमी होते हुए कमी का अनुभव न करना परम भूल है क्योंकि इस भूल से ही सभी भूलें उत्पन्न होती है। सच्चा साधक जो सुनता है उसे अपने जीवन में उतार लेता है। चिंता रहित होते ही साधक इंद्रियां अविषय हो जाती है। मन निर्विकल्प हो जाता है और बुद्धि सम हो जाती है।
Labels: प्रवचन
Posted by Udit bhargava at 6/22/2010 09:47:00 pm 0 comments




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