25 अप्रैल 2010

पहले ये समझें कि हम क्या हैं

दुनिया में ऐसे खो जाना कि फिर खुद की भी सुध नहीं रहे, ऐसा अधिकतर लोगों के साथ होता है। हम दुनिया की भागमभाग में खुद के लिए समय निकालना भूल जाते हैं। कई बार अकेले में बैठकर विचार भी करें कि हम क्या थे और अब क्या हो गए हैं। जब तक खुद को नहीं पहचानेंगे तब तक अपनी मंजिल पर नहीं पहुंच पाएंगे। फिर खोज अगर अध्यात्मिक जीवन की हो तो यह और ज्यादा जरूरी हो जाता है।

मनुष्य के मन की आदत हो जाती है कि वह उठापटक करता रहे, दौड़भाग में लगा रहे और आपाधापी में उलझ जाए। मन की सारी रुची भागने में है। इसीलिए जब हम मन के कहने पर चलते हैं तो संसार की वस्तुओं के पीछे भागते हैं। कुछ समय बाद जब संसार से ऊब जाते हैं तो भगवान की ओर भागने लगते हैं। मन के भागने की वृत्ति बनी ही रहती है। मन का काम दौड़ाना है और वह दौड़ाता रहता है भले ही दिशा बदल जाए, जबकि अध्यात्म कहता है रुक जाओ। जब तक थोड़ा ठहरेंगे नहीं ईश्वर से मुलाकात नहीं होगी। सुग्रीव ने श्रीराम से वादा किया था कि बाली का वध हो जाने के बाद तथा मेरे राजा बनने के बाद मैं सीताजी की खोज के लिए वानर भेजूंगा लेकिन वह यह काम भूल गया। तब हनुमानजी ने सुग्रीव को समझाया था कि आप थोड़ा भीतर उतर कर चिंतन करें। पहले आप राज्य पाने के लिए दौड़ रहे थे और अब आप उसी वृत्ति के कारण भगवान का काम नहीं करके डर रहे हैं। आपका मन कुल मिलाकर आपाधापी में है। दुनिया में यदि पाना है तो दौड़ना पड़ेगा और दुनिया बनाने वाले को यदि पाना है तो हो सकता है दौड़ते हुए उसे खो ही दें। दोनों के समीकरण अलग हैं। दौड़े तो ही संसार मिलेगा और अध्यात्म में दौड़े तो शायद ईश्वर को खो देंगे। इसलिए थोड़ा रुकना सीखें। रुकने का अर्थ है आप जैसे हैं वैसे ही परमात्मा को समर्पित हो जाएं। यह सोचना कि पहले साधु बन जाएं और फिर भगवान के पास जाएं तो हो सकता है हम भटक जाएंगे। सबसे पहले जैसे हो वैसे ही रुक जाओ। सुग्रीव को यह बात समझ में आई और वे दोबारा श्रीराम तक पहुंचे। हम जैसे हैं उसे जानने के लिए ध्यान, मेडिटेशन एक सही क्रिया है। सुग्रीव के जीवन में हनुमान की उपस्थिति का अर्थ ही मेडिटेशन था।

जिसकी आंखों का पानी सूख जाए, वह भक्त नहीं

भक्ति संवेदना और प्रेम का मामला है, इसमें कठोरता का कोई स्थान नहीं है। भक्ति अगर कठोर हो जाए तो फिर परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं है। भक्ति भी एक तरह की योग्यता है, गुण है, भक्ति उसी को मिल सकती है जिसके मन में संवेदनाएं जीवित हों, जिसकी आंखों में पानी हो। अगर आंखें सूख गई हैं तो फिर भक्ति भी चली जाती है।

आप जीवन के किसी भी क्षेत्र में हों भक्त बनने की तैयारी जारी रखें। भक्त हो जाना कोई एक दिन की घटना नहीं है यह सतत् प्रयास है। भक्त होना कठिन नहीं है लेकिन सरल भी न मान लिया जाए। भक्त शिरोमणी नारद ने नारद-भक्ति सूत्र नाम रचना में विस्तार से वर्णन किया है।पहली बात है भक्त की आंखों में नमी बनी रहे। जिनकी आंखों की नमी सूख गई फिर वे भक्त नहीं हो सकते। जीवन की गहराई को केवल आंखें नहीं इसके भीतर के आंसू देख पाते हैं। इसका सीधा अर्थ है व्यक्तित्व में संवेदनशीलता हो। दूसरी बात है, थोड़ा असहाय बने रहें। सब कुछ मैं ही कर लूंगा यह भाव न रखें, कुछ उस ऊपर वाले को भी करने दें। यह अहसास बना रहे कि जीवन भगवान भरोसे भी चलता है। तीसरी बात है भक्त होने के लिए थोड़ी मतवाली हिम्मत भी हो। जब आप भक्त होने की तैयारी कर रहे होंगे तब दुनिया आपका उपहास भी कर सकती है। बिना मतवाले हुई भक्त की मस्ती नहीं पाई जा सकती। कुछ लोग संसारी होकर भक्ति को कमजोर लोगों का कर्म मानते हैं। दरअसल भक्ति है हिम्मत का काम। यह दिल का सौदा दमदारी से होता है।भक्त होने के लिए चौथी और अंतिम बात जरा दार्शनिक है। भक्ति बुद्धि का नहीं, हृदय का विषय है। भक्त अपनी बुद्धि को विश्राम देना जानता है। संसारी लोगों की बुद्धि की जब मृत्यु हो जाती है तो वे पागल माने जाते हैं, लेकिन भक्त की बुद्धि की मृत्यु नहीं होती। भक्त द्वारा उसे विशिष्ट विश्राम दे दिया जाता है। वह अपनी बुद्धि को सेवानिवृत्त भी नहीं करता है बस विश्राम दे देता है। जैसे हम पुन: तरोताजा होने के लिए विश्राम करते हैं वैसे ही भक्त अपनी बुद्धि को विश्राम करा देते हैं और बुद्धि के इस विश्राम में ही परमात्मा का प्रवेश होता है।

नामे नारायण नाही भेद

महाराष्ट्र के साथ पंजाब के संबंध बहुत पुराने हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी का विचरण स्थान मुख्य तौर पर पंजाब रहा, लेकिन अंतिम समय वह महाराष्ट्र में नंदेड़ में रहे। इससे उलट, उनसे कई सदियों पहले भगत नामदेव जी महाराष्ट्र में पैदा हुए, जो अंतिम समय पंजाब में रहे। इसी लिए उनकी बाणी की साध भाषा में पंजाबी के साथ-साथ मराठी शब्दावली की भरमार है।

प्रो. पूरन सिंह ने पंजाब को गुरुओं के नाम पर बसता कहा है, महाराष्ट्र को वहां के लोग नामदेव जी के नाम पर बसता महसूस करते हैं। लेकिन Êयादातर मराठी लोग इस गौरव से अनजान हैं कि गुरमति विचारधारा की जिस Êामीन पर गुरु नानक साहिब ने सिखी का पौधा लगाया और दूसरे गुरु साहिबान ने सींच-संभाल से बड़ा किया, उस Êामीन की तैयारी के लिए सबसे पहले अहम रोल भगत नामदेव जी ने निभाया था। गुरु गं्रथ साहिब में भगत नामदेव जी के 18 रागों में 61 शब्द मौजूद हैं, जिनके आधार पर उन्हें भक्ति लहर के आगुओं में सबसे महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।

जिस भक्ति परंपरा को गुरु नानक देव जी ने एक शक्तिशाली लहर में तब्दील किया, नामदेव जी को एक शब्द में उस परंपरा के महत्वपूर्ण निर्माणकर्ताओं में तसलीम किया गया। पन्ना 1207 पर एक अन्य शबद में गुरु अर्जन साहिब इन आगुओं की श्रेष्ठता का ध्यान करते हैं, अपने प्रेरणास्रोत मानते हैं और इन संतों-भक्तों को अपनी हस्ती के होने का आधार और कारण मानते हैं। स्वयं को उनके चरणों की धूलि मानते हैं—

भलो कबीरु दासु दासन को ऊतमु सैनु जनु नाई।।
ऊच ते ऊच नामदेउ समदरसी रविदास ठाकुर बणि आई।।
जीउ पिंड तनु धनु साधन का इहु मनु संत रेनाई।
संत प्रतापि भरम सभि नासे नानक मिले गुसाई।।

गुरु अर्जन साहिब से पहले गुरु रामदास जी ने पन्ना 735 पर दर्ज शबद द्वारा इन संतों-भक्तों की श़िख्सयत को सबसे श्रेष्ठ कहा है—

अंडज जेरज सेतज उतभुज सभि वरन रूप जीउ जंत उपाईआ।।
साधू सरणि परै सो उभरै खत्री ब्राह्मण सूदु वेसु चंडालु चंडईआ।।
नामा जैदेउ कंबीरु त्रिलोचनु अउजाति रविदासु चमिआरु चमईया।

नामदेव पहले भक्त कवि थे, जिन्होंने रूढ़ीवादी परंपराओं को रद्द करके दोनों से स्वतंत्र ज्ञानी मनुष्य का मॉडल पेश किया—

हिंदू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीति।।
नामे सोई सेविआ जह देहुरा न मसीति

ऐसे ज्ञानी मनुष्य की धार्मिकता किसी धार्मिक स्थान के करमकांड या मर्यादा की मोहताज नहीं। ऐसी धार्मिकता के लिए उन्होंने पहले मन की शुद्धि को अनिवार्य माना—

काहे कउ कीजै धिआनु जपंना।।
जब ते सुधु नाही मनु अपना।

परमात्मा के साथ जुड़ने के लिए तीर्थो के भ्रमण या धार्मिक स्थानों के दर्शन दीदारों की जरुरत नहीं, बल्कि आत्मिक संयम चाहिए—

कहत नामदेउ बाहरि क्या भरमहु इह संजम हरि पाई।।

भगत नामदेव जी के अनुसार शुभ कर्मो और शुभ विचारों के धारणी होकर भक्ति करना ही परमात्मा की तरफ़ जाने वाला गुरमति मार्ग है—

भनति नामदेउ सुकिृत सुमति भए।।
गुरमति रामु कहि को को न बैकुंठ गए।।
गुरमति राम नाम गहु मीता।।
प्रणवै नामा इउ कहै गीता।

ऐसी आत्मिक मानसिक और व्यवहारिक शुद्धता व उच्चता की प्राप्ति के लिए भगत नामदेव जी साध-संगत के महत्व की उसतति करते हैं—

काम क्रोध त्रिसना अति जरै।।
साध संगति कबहू नहीं करै।।

भगत नामदेव ने जोग मत में बताई जाती हठसाधना को अर्थहीन बताया। उनके अनुसार गुरमति में मूर्ति पूजा के लिए कोई स्थान नहीं है। वह बहुत प्रभावशाली तर्क और दलील से समझाते हैं—

एकै पाथर कीजै भाउ।।
दूजै पाथर धरीऐ पाउ।।
जे ओहु देउ त ओहु भी देवा।।
 कहि नामदेउ हम हरि की सेवा।।

मूर्ति पूजा के अलावा अन्य धर्म-कांडों जैसे तीर्थ स्नान आदि व फोकट चिन्हों पर कटाक्ष किया। भगत नामदेव जी देवी-देवताओं के बजाए आपने एक सच्चे ईश्वर की आराधना के विश्वासी, मुदई और प्रचारक थे, जो पूरी सृष्टि में व्यापक है।

इस एक परमात्मा को उन्होंने अपनी बाणी में लगभग 40 नामों से याद किया है, जैसे देवा, स्वामी, प्रभु, मुरारी, करीमां, रहीमां, अल्लाह, गनी, गोपाल, श्रीरंग, पातिशाह, असपति, गजपति, नरिंद, मीर, मुकंद, गोबिंद, सियाम, राम, केसव, माधो, बीठल, रमइया, हरि, हरी, ठाकुर, जगजीवन, नारायण, निरंकार, सावलिया, नरहरी, कलंदर, साहिब, भगवान, ईशर, जगतगुरु, गोसाई, पुरखोतम आदि। एक परमात्मा सृष्टि की मूल शक्ति है, जो स्वयं प्रकाशमान है, उससे किसी ने पैदा नहीं किया। स्वयं ही पूरी सृष्टि को बनाने और संचालित करने वला है।

उनकी श्रम से संबंधित शब्दावली उनकी बाणी में बिंबों व दृष्टांतों में बार-बार प्रकट होती है। यह शब्दावली श्रम के गौरव को उजागर करती है, जो गुरमति का एक बुनियादी सिद्धांत है। इसके साथ ही उनकी बाणी में विनम्रता का अहसास है। आप उनकी बाणी पढ़ते जाएंगे, मन अपने आप विनम्रता के अहसास से भरता जाएगा।

यह जादू उनकी बाणी के शब्दों में भरा पड़ा है। जिस रस और लय से उनकी बाणी की ओत-पोत है, उन्हें अनूठा आभामंडल प्रदान करती है। एक ऐसा आभामंडल, जो पढ़ने-सुनने वाले को पुनीत कर देता है। गुरमति में भक्त नामदेव जी का जो सम्मान है, हम सब के लिए बहुत ही गर्व वाली बात है।

माथे पर लिखा आपका भविष्य

माथे के अग्रभाग जिसे ललाट भी कहते हैं, पर बनी रेखाओं से जातक का भविष्य जाना जा सकता है। शिव भक्त रावण मस्तक रेखाओं का अध्ययन करने वाला महान प्रकांड पंडित था। प्राच्य मत के अनुसार मनुष्य के ललाट पर शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चंद्र सात ग्रहों की सात रेखाएं होती हैं।

यदि मनुष्य के मस्तक पर तीन स्पष्ट अखंडित रेखाएं हों, तो मनुष्य धनवान और संपन्न होता है। यदि मनुष्य का ललाट ऊंचा-नीचा हो, तो जातक दरिद्रता के साए में जीवन गुजारता है। हंसते समय दोनों भृकुटियों के मध्य खड़ी रेखाएं बनती हों, तो ऐसा जातक दयावान, धर्मात्मा एवं सात्विक गुण वाला होता है। ललाट में त्रिशूल, उध्र्व रेखाएं, स्वस्तिक आदि का होना सर्वगुण संपन्न, धन, पुत्र और स्त्री सुख देता है।

आयु का निर्धारण
माथे पर उभरी रेखाओं द्वारा आयु का निर्धारण भी कर सकते हैं। यदि ललाट पर चार अखंडित रेखाएं हैं, तो जातक की आयु 95 वर्ष तक होती है।

ललाट पर अखंडित और कानों तक लंबी रेखाएं होने पर जातक की आयु १क्क् वर्ष तक होती है। यह रेखाएं योगीजन में ज्यादा देखने को मिलती हैं।

यदि ललाट पर पांच स्पष्ट रेखाएं हैं, तो जातक की आयु 70 वर्ष तक होती है। इसके अलावा यदि मस्तक में बहुत छोटी और छिन्न-भिन्न असंख्य रेखाएं हों, तो जातक अनेक प्रकार के दु:खों को भोगने वाला होता है। यदि जातक के ललाट पर मात्र एक गहरी धनुषाकार रेखा हो, तो जातक पर्यटनशील रहता है।

जातक के ललाट पर सर्पाकृति रेखा या दोनों आंखों के मध्य सीधी खड़ी रेखाएं होने पर जातक वक्ता, बलवान और सुंदर होता है। यदि शनि और गुरु की रेखाएं ललाट के ऊपरी भाग में अर्ध चंद्राकर की आकृति होने पर और सूर्य और चंद्र रेखाओं के परस्पर संयोग कर रही हों, तो जातक परम सौभाग्यशाली होता है।

ललाट पर रेखाओं के फल
शानि रेखा-मनुष्य के ललाट पर सबसे पहली रेखा शनि की होती है। यह रेखा यदि स्पष्ट, सीधी, अखंडित है, तो जातक चतुर और बुद्धिमान होता है। यह रेखा यदि टूटी-फूटी हो, तो जातक मूर्ख और चिड़चिड़े स्वभाव का हो जाता है। यदि शनि रेखा टेढ़ी-मेढ़ी और मंगल रेखा धनुषाकार हो, तो जातक गलत आदतों का शिकार होता है और उसका दांपत्य जीवन दु:खभरा होता है।

गुरु रेखा-यह रेखा शनि रेखा के नीचे होती है। यदि यह रेखा स्पष्ट सीधी और अखंडित है, तो जातक धार्मिक, ईमानदार और ज्ञानी होता है। इस रेखा के खंडित होने पर जातक बुद्धिहीन होता है और उसकी स्मरण शक्ति में कमी आ जाती है। गुरु रेखा वृत्ताकार हो, तो जातक सांसारिक कष्टों को भोगता है।

मंगल रेखा-यह रेखा गुरु रेखा के नीचे तीसरी रेखा होती है। अगर यह स्पष्ट सीधी और अखंडित है, तो जातक वीर और साहसी होता है। यदि मंगल रेखा खंडित है, तो जातक कायर होता है और उसमें आत्मविश्वास की बेहद कमी होती है।

बुध रेखा-यदि बुध रेखा अस्पष्ट और अखंडित हो, तो जातक विद्वान, चतुर व्यापारी और श्रेष्ठ वक्ता होता है। दोषपूर्ण होने पर बातूनी और स्वार्थी होता है।

शुक्र रेखा-यदि यह रेखा स्पष्ट और पूर्ण लंबाई वाली हो, तो जातक को पूर्ण दांपत्य सुख प्राप्त होता है। वह सच्च प्रेमी भी होता है। यदि रेखा दूषित है, तो वह प्रेम में धोखा खा सकता है या फिर उसका तलाक हो सकता है।

सूर्य रेखा-दाईं भौंह पर जो रेखा होती है, उसे सूर्य रेखा कहते है। यह रेखा स्पष्ट हो, तो जातक उच्च प्रशासनिक अधिकारी, कूटनीतिज्ञ, राजनेता हो सकता है। यदि यह रेखा टूटी-फूटी हो, तो व्यक्ति को असफलताएं मिलती रहती हैं। साथ ही वह कृपण भी होता है।

चंद्र रेखा-बाईं भौंह पर जो रेखा होती है, उसे चंद्र रेखा कहते हैं। यदि यह रेखा पूर्ण और स्पष्ट हो, तो जातक की खूब यात्राएं होती हैं। जातक कलाप्रेमी, कल्पनाशील हाता है। यदि यह रेखा खंडित हो, तो जातक कठोर हृदय वाला और मंदबुद्धि होता है।

जीवन में नकारात्मक मनोभावों से दूर रहें

जीवन में कई तरह के मनोभाव मनुष्य को प्रभावित करते हैं। इनमें से कुछ तो व्यक्ति पर इतने हावी हो जाते हैं कि एक तरह से उस पर सवारी ही करने लगते हैं। क्रोध, निराशा और ईष्र्या जैसे मनोभाव अगर मनुष्य के चरित्न पर हावी हो गए जो उसकी दिशा ही बदल जाती है।

ईष्र्या ऐसा ही एक मनोभाव है जो मनुष्य को दीमक की तरह न सिर्फ कुतरता है बल्कि उसकी मनुष्यता को भी समाप्त करता है। किसी ने कहा है कि प्रतिशोध या ईष्र्या की भावना के चलते न जाने कितने लोग हमारे मन मस्तिष्क में विचार बना लेते हैं और बिना किराए दिए वहां वर्षो तक बने रहते हैं।

बात बिलकुल दुरूस्त है। हममें से न जाने कितने लोग हैं जो सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक कुछ ऐसे व्यक्तियों को लेकर खीजते और बड़बड़ाते रहते हैं जो ईष्र्या या प्रतिशोध की भावना के चलते हमारे मन-मस्तिष्क में विचार कर जाते हैं। जिस तरह अपने विचार की सफाई पर हमारा ध्यान होता है उसी तरह मन और मस्तिष्क की सफाई भी बहुत जरूरी है।

पुराना कचडा अगर साफ न किए जाए तो वह बीमारी का कारण बन जाता है, उसी तरह अगर हमारे भीतर कोई नकारात्मक मनोभाव विचार कर जाता है तो वह हमें अस्वस्थ्य कर देता है। ईष्र्या, निराशा और प्रतिशोध ऐसे मनोभाव है जो व्यक्ति को नकारात्मकता की तरफ ही ले जाते हैं।

किसी से बदला लेने की भावना मन में जबर्दस्त तरीके से विचार कर गई हो तो जीना मुश्किल हो जाता है। बस यही भाव मन में बना रहता है कि कैसे अपने शत्नु का अनिष्ट किया जाए। जीवन का फलक बहुत विस्तृत है और अगर कोई व्यक्ति सीखना चाहे तो उसके आसपास के परिवेश में ऐसा बहुत कुछ है जिससे सीखा जा सकता है।

हम लोगों ने अक्सर ट्रकों के पीछे बहुत दिलचस्प और चुटीले वाक्य लिखे देखे हैं। ऐसा ही वाक्य मुझे ध्यान आ रहा है, जलो मत बराबरी करो। वास्तव में बहुत सुंदर बात है। ईष्र्या की जगह प्रतिस्पर्धा मनोभाव है। प्रतिशोध पर हमेशा क्षमा का पलड़ा भारी होता है और निराशा का कोहरा आशा का सूरज न निकलने पर ही मनुष्य के मन में छा जाता है।

इसलिए सूर्य को देते हैं अघ्र्य

सूर्य जो जीवन का दाता है, ऊर्जा का केंद्र है। मानव जीवन को भी प्रभावित करता है। एक छोटे से पौधे को भी पेड़ बनने के लिए जल के साथ-साथ सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है। सूर्य के प्रकाश में विटामीन-ई प्रचुरता से विद्यमान होता है। जो त्वचा के लिए उत्तम होता है। प्रात: काल सूर्योदय के समय सूर्य की जो रश्मियां निकलती हैं वह स्वास्थ्यवर्धक होती है। उनसे त्वचा, सांस, कफ, पित्त, वात, अनिद्रा, हृदय आदि रोगों में रक्षा होती है। धर्म शास्त्रों में इसलिए ही प्रात: सूर्य को जल चढ़ाने का विधान किया गया है। उसमें यह भी बताया गया है कि सूर्य से कभी सीधे नजरें नहीं मिलाना चाहिए। इससे आंखे की रेटिना पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है तथा ज्यादा देर तक सूर्य की ओर देखने से नेत्र भी खो सकता है। सूर्यास्त के समय भी सूर्य के दर्शन नहीं करने चाहिए। वह भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। सूर्य अपनी प्रचण्ड गर्मी से समुद्र, तालाब, झीलों के पानी को वाष्प बनाकर उड़ाता है जो बादल के रूप में वर्षा करते हैं। जिससे सभी प्राणियों को अन्न एवं जल मिलता है। यही जल नदियों के द्वारा कई प्राणियों का पोषण करता है। इसी से सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है। जो समुद्र के खारे जल को भी मीठे में परिणीत कर सभी का पोषण करता है। अपने स्वयं के प्रकाश एवं प्रभाव से भी जगत को संचारित करता है।

हनुमानजी की पूजा वानर रूप में क्यों?

हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों में हनुमान को परम तेजस्वी बताया गया है। साथ ही वे अष्ट सिद्धियां व नव निधियों से परिपूर्ण हैं.. उनमें असामान्य बल हैं.. वे इच्छानुसार रूप बना लेते हैं.. वे हवा में अति तीव्रता से गमन कर लेते हैं.. विभिन्न दिव्य अस्त्रों-शस्त्रों वाले अविजित योद्धा हैं.. ऐसी कई दुर्लभ और असामान्य शक्तियां के स्वामी है हनुमानजी। साथ ही हनुमानजी कई भाषाएं जानते हैं। वे सभी शास्त्रों के ज्ञाता, परम विद्वान और अति सभ्य हैं।

इतनी अद्भुत बातों के देखते हुए एक प्रश्न प्राय: उठता है कि क्या इतनी शक्तियां किसी वानर के पास हो सकती है? क्या हनुमानजी वानर है? सामान्यत: सभी मानते है कि वे वानर ही है, वानर यानि बंदर। परंतु ऐसी दुर्लभ शक्तियों को देखते हुए हनुमानजी का वानर होना निश्चित ही एक रहस्य ही है। 30 मार्च को हनुमान जयंती है, भगवान रुद्र ने हनुमान के रूप में अवतार लिया था। आइए जानते हैं हनुमान वानर थे या इंसान।

इस रहस्य को समझने के लिए हमें वानर शब्द के अर्थ को समझना पड़ेगा। वानर यानि वह प्राणी जो वन में रहता हो, जो वन में उत्पन्न आहार से ही अपने उदर की पूर्ति करता हो, जो गुफाओं में रहता हो, जो वन में रहने वाले अन्य प्राणी की ही तरह आचरण करता हो, जिसका स्वभाव वन्य जीवों के जैसा हो आदि ऐसे ही सभी गुण वाले प्राणी को वानर कहा जाना चाहिए। हमारे कई प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि बाली, सुग्रीव, हनुमान सहित सभी वानर, वानर बताए गए हैं। परंतु हनुमान के महान व्यक्तित्व को देखते हुए उन्हें बंदर मान लेना समझ से परे हैं। कुछ विद्वानों का मत यह भी है कि वानर समुदाय या जाति या आदिवासी समूह के आराध्य देव बंदर रहे हो जिससे उन्हें भी वानर ही समझा जाने लगा जाने लगा जैसे नाग की पूजा करने वाले समुदाय को नागलोकवासी कहा जाता है। परंतु जिस तरह नागलोक के रहने वाले प्राणियों को सर्प की भांति नहीं समझा जाता उसी तरह चमत्कारी और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हनुमान को वानर कैसे समझा जाएं? भगवान हनुनाम शिव यानी रुद्र के अवतार हैं, उन्हें सामान्य वानर मान लेना ठीक नहीं है। वे मनुष्य जाति के लिए आदर्श हैं। मनुष्य में छिपी प्रतिभा और संभावनाओं के साक्षात प्रतिनिधि है।

जिन्ह केंरही भावना जैसी..

भगवान के लिए कहा जाता है:

जिन्ह केंरही भावना जैसी..

प्रभु मूरति तिन देखी तैसी।

अर्थात् जिसकी जैसी भावना होगी, जो भगवान को जिस रूप में देखना चाहेगा उसे भगवान उसी रूप में दर्शन देंगे.. दिखाई देंगे। उसी तरह हम हनुमान को वानर के रूप मानते हैं, पूजते हैं तो वे वानररूप ही दिखाई देते हैं। भगवान के कई रूप है, वे हर जीव में, हर रूप में सर्वत्र विराजमान हैं। अत: वानर रूप में भी वे विराजमान हैं।