ज्योतिष के मुताबिक धनेश का छठे, आठवें, बारहवें भाव में स्थित होना धन बाधा योग का निर्माण करता है। कुछ छोटे-छोटे उपाय अपनाकर इन बाधाओं को दूर किया जा सकता है। वर्ष भर आपके घर में सुख-समृद्धि बनी रहे इसलिए कुछ उपाय दिए जा रहे हैं, जो छोटे होते हुए बड़े काम के साबित होंगे।
मेष-मंगलवार के दिन लाल चंदन, लाल गुलाब के दो फूल, रोली का पैकेट लाल कपड़े में बांधें। प्रणाम करें और धूप-दीप दिखाकर तिजोरी में रख दें, इससे धन वृद्धि होगी।
चांदी का ‘श्री’ बनवाकर उसके चारों ओर सफेद तथा नीले जरकन जड़वा कर लॉकेट बनवाएं। शुद्ध कर शुक्रवार को श्रीमंत्र की तीन माला जाप के बाद गले में धारण करें।
श्रीगणोश यंत्र घर के पूजन स्थल पर रखकर नित्य दर्शन व पूजन करें। ओम गं गणपतये नम: का मूंगे की माला से तीन माला जाप करें, वर्ष भर दौलत कदम चूमेगी।
वृष-सोने या चांदी में श्री बनवा लें। हरा ऑनेक्स लगवाकर शुक्रवार को गले में धारण करें। श्री सूक्त का पाठ करें।
कमलगट्टे की माला पर श्रीयंत्र घर में स्थापित करें।
ओम गोपालाय उत्तरध्वजाय नम: का एक माला जाप करें। हरे रंग का रूमाल अपने पास रखें। गाय को प्रतिदिन तेल लगी रोटी दें।
वट वृक्ष के पत्ते पर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं। उस पर साबुत चावल व एक सुपारी रखकर माता लक्ष्मी के मंदिर में चढ़ा दें। इस उपाय से आर्थिक समृद्धि प्राप्त होगी।
मिथुन-धनदा यंत्र घर में स्थापित कर नित्य दर्शन करें तो आशातीत लाभ होगा।
भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर या मूर्ति के सम्मुख ú क्लीं कृष्णाय नम: का एक माला जाप तुलसी की माला से प्रतिदिन करें।
चांदी के पतरे पर चंद्र यंत्र तथा मंगल यंत्र बनवाकर क्रमश: मोती व मूंगा लगवाकर घर के मंदिर में बुधवार को स्थापित करें। जिनके ऊपर ऋण हो वह इस यंत्र के आगे ऋण्हर्ता मंगल स्तोत्र का पाठ करेंगे तो ऋण उतरने लगेगा।
पक्षियों को गुड़ के साथ सतनाजा डालें।
कर्क-चांदी की दो गायों की किसी विद्वान से प्राण प्रतिष्ठित कराकर एक गाय विद्वान को दक्षिणा सहित दान दें। दूसरी गाय कामधेनु दैव्ये की तरह घर के पूजन स्थल में रख कर नित्य दर्शन व पूजन करें, जो मांगेंगे वही प्राप्त होगा।
शिवयंत्र को घर के पूजन स्थल पर स्थापित करें व प्रतिदिन ú नम: शिवाय का एक रुद्राक्ष माला जप करें।
सुबह आजीविका संबंधी कार्य से पहले ú हिरण्यगर्भाय अव्यक्त रूपिणो नम: का मोती की माला से जाप करें।
ग्यारह रविवार दोपहर दही-भात का भोग लगाकर खाएं।
सिंह-दुर्गा मां की तस्वीर के आगे देवी के 108 नामों का नित्य स्मरण करें। यह कार्य वर्ष भर करें।
हरे गणपति (हकीक या ऑनेक्स के बने) घर के पूजन स्थल में स्थापित करें। ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र का पाठ करें। यदि ऋण है तो जल्द ही ऋण मुक्त हो जाएंगे।
ओम हीं घृणि सूर्य आदित्य श्री का नित्य सूर्य उदय के समय तीन माला जाप लाल चंदन की माला से करें।
मां लक्ष्मी को प्रतिदिन लाल पुष्प अर्पित करें। दूध से निर्मित नैवेद्य का भोग लगाएं। धन लाभ होगा।
कन्या-कूर्म पृष्ठ पर बने श्रीयंत्र या महालक्ष्मी यंत्र को घर के पूजा स्थल में स्थापित करें। श्री सूक्त का पाठ करें।
चांदी के पतरे पर गुरुमंत्र पर सुनहला लगवा कर शुद्ध करें। बुधवार को धूप-दीप दिखा कर गले में धारण करें।
सफेद गुंजा को लक्ष्मी मंत्रों से अभिमंत्रित कर चांदी की डिबिया में शहद में डुबो कर पूजा स्थल या तिजोरी में रखें।
तीन गोमती चक्र, तीन पीली कौड़ियां तथा तीन हल्दी की गांठें पीले कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें। घर में धन वृद्धि व बरकत होगी।
तुला-श्रीलक्ष्मी सिद्ध यंत्र घर में स्थापित करें। रोज दर्शन कर ú लक्ष्मीनारायणाय नम: का स्फटिक माला से जाप करें।
यदि अचानक धनहानि होती हो, तो किसी भी मंदिर में कम से कम 40 शनि व सरस्वती चालीसा रखवाएं।
गरीब सुहागिन स्त्री को अपनी पत्नी के द्वारा सुहाग सामग्री दिलवाएं। सामग्री में कोई भी इत्र अवश्य रखें।
महीने में एक बार मिट्टी के कुल्हड़ में मशरूम भरकर किसी भी धार्मिक स्थान में रख आएं। मिट्टी के कुल्हड़ पर मिट्टी का ढक्कन अवश्य लगाएं।
वृश्चिक-श्रीहनुमान जी का यंत्र स्थापित कर नित्य पूजन-दर्शन करें।
धनदा यंत्र भी स्थापित कर नित्य दर्शन करें। ú नमो नारायणाय का तीन माला जाप चमत्कार से कम नहीं रहेगा।
इष्टदेव का स्मरण कर केसर का तिलक प्रतिदिन नाभि, कंठ व माथे पर लगाएं।
छह-छह ग्राम की चार ठोस चांदी की गोलियां सफेद कपड़े में लपेटकर हमेशा पास रखें। इससे समृद्धि के साथ-साथ शांति भी बनी रहेगी।
धनु-लाजवर्त नग को चांदी की अंगूठी में जड़वा श्रीमंत्र के जाप के साथ शुक्रवार को मध्यमा अंगुली में धारण करें।
ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जाप स्फटिक माला से करें।
अशोक के वृक्ष की जड़ का पूजन कर तिजोरी में रखें। धन-संपत्ति की प्रचुरता वर्ष भर बनी रहेगी।
धन-संपदा के लिए तिजोरी के नीचे या तिजोरी के अंदर काली गुंजा के ग्यारह दाने रखें। नववर्ष के विशेष मुहूर्त में यह उपाय अवश्य करें।
मकर-सात पीपल के पत्ते लेकर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं। फिर कलावे से एक साथ सारे पत्तों को लपेटकर वीरान स्थान पर फेंक दें। आर्थिक संकट दूर हो जाएगा।
कुत्ते को पंद्रह दिन तक प्रतिदिन दूध पिलाएं। इन्हीं पंद्रह दिनों में मंदिर में भी दूध का दान दें।
प्रत्येक शुक्रवार को नियम से किसी भूखे को भोजन कराएं व रविवार को गाय को गुड़ खिलाएं।
घर में समृद्धि पोटली लगाएं। लाल रंग का रिबन, तांबे के सिक्के के साथ मुख्य द्वार पर बांधें।
कुंभ-सोने का गुरुयंत्र शुद्ध करके शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को गले में धारण करें। साथ ही चांदी की गाय घर के मंदिर में स्थापित करें व नित्य नियम से दर्शन करें।
ओम श्री उपेन्द्राय अच्युताय नम: का रुद्राक्ष की एक माला से नित्य जाप करें। धन की कोई समस्या नहीं रहेगी।
पंडितजी से पूर्णिमा को घर में सत्यनारायण कथा कराएं, उन्हें पांच वस्त्र, पांच फल, पांच मिठाई दक्षिणा सहित दें व आशीर्वाद पाएं।
कार्य सिद्धि यंत्र घर में स्थापित करें।
मीन-नववर्ष में मूंगे के गणपति स्थापित करें। ॐ एकदन्ताय विद्यमहे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात मंत्र का जाप मूंगे की माला से नियमित करें।
मत्स्य यंत्र अवश्य स्थापित करें। नित्य विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें, धन की कमी नहीं होगी।
ड्रॉईंग रूम में उत्तर या पूर्व दिशा में एक्वेरियम रखें।
काली मिर्च के 5 दाने अपने सिर से 7 बार उतारकर 4 दाने चारों दिशाओं में फेंक दें तथा पांचवे दाने को आकाश की ओर उछाल दें। इससे आकस्मिक धन लाभ होगा।
25 अप्रैल 2010
छोटे-छोटे उपाय सुख-समृद्धि लाएं
Labels: टोने-टोटके
Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 07:34:00 am 0 comments
बढ़ाएं अपना व्यवसाय ज्योतिष उपाय
व्यवसाय में उन्नति के लिए यहां कुछ विशिष्ट उपायों का विवरण दिया जा रहा है, जो अलग-अलग राशियों से संबंधित हैं। लोग अपने व्यापार वृद्धिकरण उपाय नवरात्र जैसे शुभ पर्व पर करके लाभ प्राप्त कर सकते हैं। जो किसी कारण नवरात्र पर न कर पाएं वे रामनवमी, हनुमान जयंती व अक्षय तृतीया पर उपाय कर लाभान्वित हो सकते हैं।
मेष- प्रथम नवरात्र को व्यवसाय स्थल पर कांच या मिट्टी के पात्र में जल भरकर रखें। लोहे, स्टील या अन्य धातु, वॉटर कूलर, जग में पीने का पानी भरकर नहीं रखना चाहिए। मीठा खाकर जल पीकर प्रस्थान करना शुभकारी है। कांच के बर्तन में थोड़ा पानी डालकर पांच सफेद फूल रखें। पानी बदलते रहें।
वृष- कार्यस्थल पर चमकीले एवं हल्के रंगों का प्रयोग कर साज-सज्जा करें। कार्यस्थल पर नवरात्र के किसी भी दिन एक दर्पण ऐसी दीवार पर लगाना चाहिए जो कि बाहर से दिखाई न दे, परंतु प्रवेश करते ही उस दर्पण पर दृष्टि पड़े। दरवाजे के सामने के बजाए किसी कोने में बैठने का स्थान होना चाहिए।
मिथुन- नवरात्र के दूसरे दिन हरे पत्तों सहित फूल लाकर अपनी दुकान या संस्था के ऑफिस में रखें। कार्यालय में आवाज करने वाला कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण न रखें। उत्तर या पूर्व की दीवार पर डॉल्फिन या पेंडुलम घड़ी अवश्य लगाएं। नवरात्र में दुकान या संस्थान के बाहर पांच हरे पौधे लगाएं।
कर्क- किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल कांच के पात्र में भरकर नवरात्र के किसी भी दिन दुकान के पूजाघर में रखना चाहिए। कार्यसिद्धि यंत्र नवरात्र में अपने पूजा घर में रख प्रतिदिन दर्शन करें। पूर्णिमा को अपनी दुकान के प्रवेश द्वार के दोनों ओर कुछ गंगाजल अवश्य छिड़कें।
सिंह- दुकान में इस प्रकार बैठना चाहिए कि बाहर से व्यक्ति का मुंह दिखाई न पड़े। नवरात्र में अष्टमी के दिन मिट्टी का शेर मंदिर में चढ़ाना चाहिए। लोहे या किसी भी धातु के फर्नीचर का प्रयोग बहुत कम करना चाहिए। प्रवेश द्वार पर रोली से जय मां दुर्गे अंकित करें। दुकान में प्रतिदिन भोग लगाएं ।
कन्या- प्रथम नवरात्र को मां दुर्गा का चित्र अपने दुकान या संस्थान के मंदिर में लगाएं। व्यापार शुरू करने से पहले पूरे नवरात्र दुर्गा चालीसा का पाठ करें। लकड़ी का फर्नीचर प्रयोग में लाएं। दूसरे नवरात्र को व्यवसाय स्थल के सम्मुख गाय को हरा चारा या पालक खिलाएं। अष्टमी को कन्या भोज करा उनका आशीर्वाद लें और हलवा-पूड़ी दक्षिणा में दें।
तुला- संस्थान के मध्य भाग में बैठना चाहिए। सात श्रीफल लाल वस्त्र में बांधकर कार्यस्थल की अलमारी में अष्टमी को रख दें। उस अलमारी में अन्य सामान नहीं होना चाहिए। शुक्रवार के दिन से शुरू कर सुगंधित पुष्प लाकर पूजा घर में चढ़ाने चाहिए। मां दुर्गा के दर्शन कर फिर दुकान खोलें। दुकान में सजावट व स्वच्छता का बहुत ध्यान रखें।
वृश्चिक- नवरात्र के प्रथम दिन मुख्य द्वार के दोनों ओर सिंदूर से स्वस्तिक बनाएं। दुकान के मंदिर में प्रथम मंगलवार, शनिवार को लाल पुष्प चढ़ाएं। नवरात्र के पहले दिन कार्यस्थल पर आते समय किसी पूज्य व्यक्ति के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेकर आएं। प्रत्येक मंगलवार गंगाजल लेकर दुकान के सभी कोनों में फूल द्वारा छिड़कें।
धनु- कोष स्थान पर सफेद चंदन की लकड़ी हल्के गुलाबी रंग के कपड़े में लपेटकर रखंे। तीसरे नवरात्र पर दुकान के मंदिर में गाय के दूध से बने घी में छोटी इलायची डालकर दीपक जलाएं। पीठ पीछे पूजा घर न बनाएं। मुख्य द्वार के सामने न बैठें। गुरुवार के दिन पीले फूल मंदिर में चढ़ाएं। गाय को रोटी-गुड़ खिलाएं। धनदा यंत्र व्यापार स्थल पर नवरात्र में स्थापित करें।
मकर- नवरात्र के शनिवार से शुरू करें। उस दिन दुकान पर आए हुए भिखारी को एक मुट्ठी काला तिल दें। घोड़े की नाल मुख्य द्वार पर शाम के समय पीपल वृक्ष को छुआकर लगाएं। व्यापार बहुत मंदा हो गया हो तो नवरात्र में पड़ने वाले शनिवार को मिट्टी के घड़े पर ढक्कन लगाकर, टेप से बंद कर दुकान में रख दें। बुधवार प्रात: काल उसे बहते जल में बगैर ढक्कन खोले प्रवाहित कर दें।
कुंभ- कार्यस्थल में इस प्रकार बैठें कि आगे का स्थान खुला हो। कोई कोना या बंद दरवाजा न हो। नवरात्र में पड़ने वाले शनिवार को मिट्टी के कुल्हड़ में मिट्टी का ढक्कन रखें। उस ढक्कन में 250 ग्राम काले तिल रखें तथा अगले दिन वह कुल्हड़ तिल सहित किसी को दान कर दें या पीपल पर रख आएं। सजावट में लाल व सफेद रंग का प्रयोग न करें। शनिवार को दुकान पर आए भिखारी को खाली हाथ न लौटाएं।
मीन- पहली नवरात्र को कार्यस्थल जाने से पूर्व पूज्य व्यक्ति के चरण स्पर्श व कार्यसिद्धि यंत्र के दर्शन कर घर से निकलना चाहिए। नवरात्र के गुरुवार को पीला फल लाकर कार्यस्थल के पूजाघर में रखें, दूसरे दिन उसे किसी भिखारी को दान दें। गुरुवार के दिन कार्यस्थल पर आए हुए साधु को दान अवश्य दें। सफेद चंदन को पीले वस्त्र में बांधकर नवरात्र की नवमी को दुकान की तिजोरी में रखें। बुधवार को पीला पपीता खिलाएं। पहली नवरात्र को सफेद कपड़े का झंडा बनाकर पीपल के वृक्ष पर लगाएं, फिर प्रतिदिन जल चढ़ाएं।
मेष- प्रथम नवरात्र को व्यवसाय स्थल पर कांच या मिट्टी के पात्र में जल भरकर रखें। लोहे, स्टील या अन्य धातु, वॉटर कूलर, जग में पीने का पानी भरकर नहीं रखना चाहिए। मीठा खाकर जल पीकर प्रस्थान करना शुभकारी है। कांच के बर्तन में थोड़ा पानी डालकर पांच सफेद फूल रखें। पानी बदलते रहें।
वृष- कार्यस्थल पर चमकीले एवं हल्के रंगों का प्रयोग कर साज-सज्जा करें। कार्यस्थल पर नवरात्र के किसी भी दिन एक दर्पण ऐसी दीवार पर लगाना चाहिए जो कि बाहर से दिखाई न दे, परंतु प्रवेश करते ही उस दर्पण पर दृष्टि पड़े। दरवाजे के सामने के बजाए किसी कोने में बैठने का स्थान होना चाहिए।
मिथुन- नवरात्र के दूसरे दिन हरे पत्तों सहित फूल लाकर अपनी दुकान या संस्था के ऑफिस में रखें। कार्यालय में आवाज करने वाला कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण न रखें। उत्तर या पूर्व की दीवार पर डॉल्फिन या पेंडुलम घड़ी अवश्य लगाएं। नवरात्र में दुकान या संस्थान के बाहर पांच हरे पौधे लगाएं।
कर्क- किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल कांच के पात्र में भरकर नवरात्र के किसी भी दिन दुकान के पूजाघर में रखना चाहिए। कार्यसिद्धि यंत्र नवरात्र में अपने पूजा घर में रख प्रतिदिन दर्शन करें। पूर्णिमा को अपनी दुकान के प्रवेश द्वार के दोनों ओर कुछ गंगाजल अवश्य छिड़कें।
सिंह- दुकान में इस प्रकार बैठना चाहिए कि बाहर से व्यक्ति का मुंह दिखाई न पड़े। नवरात्र में अष्टमी के दिन मिट्टी का शेर मंदिर में चढ़ाना चाहिए। लोहे या किसी भी धातु के फर्नीचर का प्रयोग बहुत कम करना चाहिए। प्रवेश द्वार पर रोली से जय मां दुर्गे अंकित करें। दुकान में प्रतिदिन भोग लगाएं ।
कन्या- प्रथम नवरात्र को मां दुर्गा का चित्र अपने दुकान या संस्थान के मंदिर में लगाएं। व्यापार शुरू करने से पहले पूरे नवरात्र दुर्गा चालीसा का पाठ करें। लकड़ी का फर्नीचर प्रयोग में लाएं। दूसरे नवरात्र को व्यवसाय स्थल के सम्मुख गाय को हरा चारा या पालक खिलाएं। अष्टमी को कन्या भोज करा उनका आशीर्वाद लें और हलवा-पूड़ी दक्षिणा में दें।
तुला- संस्थान के मध्य भाग में बैठना चाहिए। सात श्रीफल लाल वस्त्र में बांधकर कार्यस्थल की अलमारी में अष्टमी को रख दें। उस अलमारी में अन्य सामान नहीं होना चाहिए। शुक्रवार के दिन से शुरू कर सुगंधित पुष्प लाकर पूजा घर में चढ़ाने चाहिए। मां दुर्गा के दर्शन कर फिर दुकान खोलें। दुकान में सजावट व स्वच्छता का बहुत ध्यान रखें।
वृश्चिक- नवरात्र के प्रथम दिन मुख्य द्वार के दोनों ओर सिंदूर से स्वस्तिक बनाएं। दुकान के मंदिर में प्रथम मंगलवार, शनिवार को लाल पुष्प चढ़ाएं। नवरात्र के पहले दिन कार्यस्थल पर आते समय किसी पूज्य व्यक्ति के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेकर आएं। प्रत्येक मंगलवार गंगाजल लेकर दुकान के सभी कोनों में फूल द्वारा छिड़कें।
धनु- कोष स्थान पर सफेद चंदन की लकड़ी हल्के गुलाबी रंग के कपड़े में लपेटकर रखंे। तीसरे नवरात्र पर दुकान के मंदिर में गाय के दूध से बने घी में छोटी इलायची डालकर दीपक जलाएं। पीठ पीछे पूजा घर न बनाएं। मुख्य द्वार के सामने न बैठें। गुरुवार के दिन पीले फूल मंदिर में चढ़ाएं। गाय को रोटी-गुड़ खिलाएं। धनदा यंत्र व्यापार स्थल पर नवरात्र में स्थापित करें।
मकर- नवरात्र के शनिवार से शुरू करें। उस दिन दुकान पर आए हुए भिखारी को एक मुट्ठी काला तिल दें। घोड़े की नाल मुख्य द्वार पर शाम के समय पीपल वृक्ष को छुआकर लगाएं। व्यापार बहुत मंदा हो गया हो तो नवरात्र में पड़ने वाले शनिवार को मिट्टी के घड़े पर ढक्कन लगाकर, टेप से बंद कर दुकान में रख दें। बुधवार प्रात: काल उसे बहते जल में बगैर ढक्कन खोले प्रवाहित कर दें।
कुंभ- कार्यस्थल में इस प्रकार बैठें कि आगे का स्थान खुला हो। कोई कोना या बंद दरवाजा न हो। नवरात्र में पड़ने वाले शनिवार को मिट्टी के कुल्हड़ में मिट्टी का ढक्कन रखें। उस ढक्कन में 250 ग्राम काले तिल रखें तथा अगले दिन वह कुल्हड़ तिल सहित किसी को दान कर दें या पीपल पर रख आएं। सजावट में लाल व सफेद रंग का प्रयोग न करें। शनिवार को दुकान पर आए भिखारी को खाली हाथ न लौटाएं।
मीन- पहली नवरात्र को कार्यस्थल जाने से पूर्व पूज्य व्यक्ति के चरण स्पर्श व कार्यसिद्धि यंत्र के दर्शन कर घर से निकलना चाहिए। नवरात्र के गुरुवार को पीला फल लाकर कार्यस्थल के पूजाघर में रखें, दूसरे दिन उसे किसी भिखारी को दान दें। गुरुवार के दिन कार्यस्थल पर आए हुए साधु को दान अवश्य दें। सफेद चंदन को पीले वस्त्र में बांधकर नवरात्र की नवमी को दुकान की तिजोरी में रखें। बुधवार को पीला पपीता खिलाएं। पहली नवरात्र को सफेद कपड़े का झंडा बनाकर पीपल के वृक्ष पर लगाएं, फिर प्रतिदिन जल चढ़ाएं।
Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 07:12:00 am 0 comments
अध्ययन कक्ष हो वास्तु अनुरूप
वास्तु नियम सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और पढ़ाई में रुचि को बढ़ावा देते हैं।
जीवन को सफल बनाने की दिशा में शिक्षा ही एक उच्च सोपान है, जो जीवन में अंधकार के बंधनों से मुक्ति दिलाने का सामथ्र्य रखती है। शिक्षा के बल पर ही मानव ने आकाश की ऊंचाइयों, समुद्र की गहराइयों, भू-गर्भ और ब्रrांड में छिपे कई रहस्यों को खोज निकाला है। शिक्षा की अनिवार्यता प्राचीन ग्रंथों में भी मिलती हैं, जिनमें शिक्षा पर जोर देते हुए कहा गया है - माता बैरी पिता शत्रु येन बालों न पाठित:। न शोभते सभा मध्ये हंस मध्ये बको यथा।। अर्थात ऐसे माता-पिता बच्चों के शत्रु के समान हैं, जो उन्हें शिक्षित नहीं करते और वे विद्वानों के मध्य कभी सुशोभित नहीं होते।
शैक्षिक सफलता अध्ययन कक्ष की बनावट पर भी निर्भर करती है। वास्तु ऊर्जा भवन की आत्मा है, जिसके सहारे भवन में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीवन संवर उठता है चाहे वह अध्ययन का क्षेत्र हो या कोई अन्य। कई होनहार विद्यार्थी मेहनत के बाद भी अपेक्षित फल नहीं प्राप्त कर पाते तथा फेल होने के भय से आत्महत्या जैसे कदम उठाने लगते हैं।
ऐसे मामलों मे कहीं न कहीं नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव देखा जाता है, जिससे विद्यार्थियों के सामने कई विकट समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं जैसे-पढ़ने में रुचि न होना, मन का उलझना, अकारण चिंता, तनाव, असफलता का भय, आत्मग्लानि, मंद बुद्धि, स्मरण शक्ति का अभाव आदि। ऐसे में वास्तु नियमों के अनुरूप सुसज्जित अध्ययन कक्ष में सकारात्मक ऊर्जा की बयार बहती रहती है, जिससे विद्यार्थियों को अच्छी सफलता मिलती है।
सकारात्मक ऊर्जा के नियम
* उत्तर-पूर्व या पूर्व में अध्ययन कक्ष शुभ, प्रेरणाप्रद व पश्चिम में अशुभ और तनाव युक्त रहेगा।
* अध्ययन कक्ष के दरवाजे उत्तर-पूर्व में ही ज्यादा उत्तम माने गए हैं। दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में दरवाजे न रखें। इससे संदेह या भ्रम उत्पन्न होते हैं।
* पढ़ने की मेज चौकोर होनी चाहिए, जो अध्ययन शक्ति व एकाग्रता को बढ़ाती है। दो छोटे-बड़े पाएं, मोटे, टेढ़े व तिकोनी व कटावदार मेज का प्रयोग न करें।
* मेज को दरवाजे या दीवार से न सटाएं। दीवार से मेज का फासला कम से कम चौथाई फुट जरूरी है। इससे विषय याद रहेगा और पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी। लाइट के नीचे या उसकी छाया में मेज सेट न करें, इससे अध्ययन प्रभावित होगा।
* मेज के ऊपर अनावश्यक किताबें न रखें। लैंप को मेज के दक्षिणी कोने में रखें।
* उत्तर-पूर्व में मां सरस्वती, गणोशजी की प्रतिमा और हरे रंग की चित्राकृतियां लगाएं। अध्ययन कक्ष में शांति और सकारात्मक वातावरण होना चाहिए। शोरगुल आदि बिल्कुल भी न हो।
* स्मरण व निर्णय शक्ति के लिए दक्षिण में मेज सेट कर उत्तर या पूर्व की ओर मुंह करके अध्ययन करें। उत्तर-पूर्व दिशा विद्यार्थी को योग्य बनाने में सहायक होती है।
* ट्यूशन के दौरान विद्यार्थी का मुंह पूर्व दिशा में हो। इससे आपसी तालमेल व रुचि बनी रहेगी।
* अध्ययन कक्ष में भारी किताबें, फाइलें और सोफे को दक्षिण या पश्चिम में रखें। कंप्यूटर, म्यूजिक सिस्टम को दक्षिण-पूर्व दिशा में रखें। अध्ययन कक्ष में टीवी कदापि न रखें।
* अध्ययन कक्ष के मध्य भाग को साफ व खाली रखें, जिससे ऊर्जा का संचार होता रहेगा।
* जिनका मन उचटता हो, उन्हें बगुले का चित्र लगाना चाहिए, जो ध्यान की मुद्रा में हो।
* लक्ष्य प्राप्ति हेतु एकलव्य या अजरुन की चित्राकृतियां लगानी चाहिए।
* मेज पर सफेद रंग की चादर बिछाएं। विद्या की देवी मां सरस्वती को प्रणाम कर अध्ययन शुरू करें। जिन विद्यार्थियों को अधिक नींद आती हो, उन्हें श्वान का चित्र लगाना चाहिए।
* दरवाजे के सामने या पीठ करके न बैठें।
* बीम के नीचे बैठकर न पढ़ें। अध्ययन कक्ष की दीवारों के रंग गहरे नहीं होने चाहिए। हरे, क्रीम, सफेद व हल्के गुलाबी रंग स्मरण शक्ति बढ़ाते हैं व एकाग्रता प्रदान करते हैं।
* अध्ययन कक्ष के पर्दे भी हल्के हरे रंग, विशेषकर हल्के पीले रंग के उत्तम माने जाते हैं।
* बिस्तर पर बैठकर न पढ़ें। कमरे में किताबों या अन्य वस्तुओं को अव्यवस्थित नहीं होना चाहिए।
* रात को सोते समय विद्यार्थी पूर्व की तरफ सिर करके सोएं। पूर्वी दीवारों पर उगते हुए सूर्य की फोटो लगाना उत्तम है।
* बेड के सामने वाली दीवार पर हरियाली वाली फोटो उत्तम मानी गई है।
उक्त वास्तु नियमों को अपनाकर प्रतिभाशाली व प्रखर बुद्धि वाले विद्यार्थी तैयार किए जा सकते हैं। विद्यार्थी अपने अध्ययन कक्ष को वास्तु अनुकूल बनाकर सफलता के सर्वोच्च शिखर को छूने का गौरव हासिल कर सकते हैं।
जीवन को सफल बनाने की दिशा में शिक्षा ही एक उच्च सोपान है, जो जीवन में अंधकार के बंधनों से मुक्ति दिलाने का सामथ्र्य रखती है। शिक्षा के बल पर ही मानव ने आकाश की ऊंचाइयों, समुद्र की गहराइयों, भू-गर्भ और ब्रrांड में छिपे कई रहस्यों को खोज निकाला है। शिक्षा की अनिवार्यता प्राचीन ग्रंथों में भी मिलती हैं, जिनमें शिक्षा पर जोर देते हुए कहा गया है - माता बैरी पिता शत्रु येन बालों न पाठित:। न शोभते सभा मध्ये हंस मध्ये बको यथा।। अर्थात ऐसे माता-पिता बच्चों के शत्रु के समान हैं, जो उन्हें शिक्षित नहीं करते और वे विद्वानों के मध्य कभी सुशोभित नहीं होते।
शैक्षिक सफलता अध्ययन कक्ष की बनावट पर भी निर्भर करती है। वास्तु ऊर्जा भवन की आत्मा है, जिसके सहारे भवन में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीवन संवर उठता है चाहे वह अध्ययन का क्षेत्र हो या कोई अन्य। कई होनहार विद्यार्थी मेहनत के बाद भी अपेक्षित फल नहीं प्राप्त कर पाते तथा फेल होने के भय से आत्महत्या जैसे कदम उठाने लगते हैं।
ऐसे मामलों मे कहीं न कहीं नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव देखा जाता है, जिससे विद्यार्थियों के सामने कई विकट समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं जैसे-पढ़ने में रुचि न होना, मन का उलझना, अकारण चिंता, तनाव, असफलता का भय, आत्मग्लानि, मंद बुद्धि, स्मरण शक्ति का अभाव आदि। ऐसे में वास्तु नियमों के अनुरूप सुसज्जित अध्ययन कक्ष में सकारात्मक ऊर्जा की बयार बहती रहती है, जिससे विद्यार्थियों को अच्छी सफलता मिलती है।
सकारात्मक ऊर्जा के नियम
* उत्तर-पूर्व या पूर्व में अध्ययन कक्ष शुभ, प्रेरणाप्रद व पश्चिम में अशुभ और तनाव युक्त रहेगा।
* अध्ययन कक्ष के दरवाजे उत्तर-पूर्व में ही ज्यादा उत्तम माने गए हैं। दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में दरवाजे न रखें। इससे संदेह या भ्रम उत्पन्न होते हैं।
* पढ़ने की मेज चौकोर होनी चाहिए, जो अध्ययन शक्ति व एकाग्रता को बढ़ाती है। दो छोटे-बड़े पाएं, मोटे, टेढ़े व तिकोनी व कटावदार मेज का प्रयोग न करें।
* मेज को दरवाजे या दीवार से न सटाएं। दीवार से मेज का फासला कम से कम चौथाई फुट जरूरी है। इससे विषय याद रहेगा और पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी। लाइट के नीचे या उसकी छाया में मेज सेट न करें, इससे अध्ययन प्रभावित होगा।
* मेज के ऊपर अनावश्यक किताबें न रखें। लैंप को मेज के दक्षिणी कोने में रखें।
* उत्तर-पूर्व में मां सरस्वती, गणोशजी की प्रतिमा और हरे रंग की चित्राकृतियां लगाएं। अध्ययन कक्ष में शांति और सकारात्मक वातावरण होना चाहिए। शोरगुल आदि बिल्कुल भी न हो।
* स्मरण व निर्णय शक्ति के लिए दक्षिण में मेज सेट कर उत्तर या पूर्व की ओर मुंह करके अध्ययन करें। उत्तर-पूर्व दिशा विद्यार्थी को योग्य बनाने में सहायक होती है।
* ट्यूशन के दौरान विद्यार्थी का मुंह पूर्व दिशा में हो। इससे आपसी तालमेल व रुचि बनी रहेगी।
* अध्ययन कक्ष में भारी किताबें, फाइलें और सोफे को दक्षिण या पश्चिम में रखें। कंप्यूटर, म्यूजिक सिस्टम को दक्षिण-पूर्व दिशा में रखें। अध्ययन कक्ष में टीवी कदापि न रखें।
* अध्ययन कक्ष के मध्य भाग को साफ व खाली रखें, जिससे ऊर्जा का संचार होता रहेगा।
* जिनका मन उचटता हो, उन्हें बगुले का चित्र लगाना चाहिए, जो ध्यान की मुद्रा में हो।
* लक्ष्य प्राप्ति हेतु एकलव्य या अजरुन की चित्राकृतियां लगानी चाहिए।
* मेज पर सफेद रंग की चादर बिछाएं। विद्या की देवी मां सरस्वती को प्रणाम कर अध्ययन शुरू करें। जिन विद्यार्थियों को अधिक नींद आती हो, उन्हें श्वान का चित्र लगाना चाहिए।
* दरवाजे के सामने या पीठ करके न बैठें।
* बीम के नीचे बैठकर न पढ़ें। अध्ययन कक्ष की दीवारों के रंग गहरे नहीं होने चाहिए। हरे, क्रीम, सफेद व हल्के गुलाबी रंग स्मरण शक्ति बढ़ाते हैं व एकाग्रता प्रदान करते हैं।
* अध्ययन कक्ष के पर्दे भी हल्के हरे रंग, विशेषकर हल्के पीले रंग के उत्तम माने जाते हैं।
* बिस्तर पर बैठकर न पढ़ें। कमरे में किताबों या अन्य वस्तुओं को अव्यवस्थित नहीं होना चाहिए।
* रात को सोते समय विद्यार्थी पूर्व की तरफ सिर करके सोएं। पूर्वी दीवारों पर उगते हुए सूर्य की फोटो लगाना उत्तम है।
* बेड के सामने वाली दीवार पर हरियाली वाली फोटो उत्तम मानी गई है।
उक्त वास्तु नियमों को अपनाकर प्रतिभाशाली व प्रखर बुद्धि वाले विद्यार्थी तैयार किए जा सकते हैं। विद्यार्थी अपने अध्ययन कक्ष को वास्तु अनुकूल बनाकर सफलता के सर्वोच्च शिखर को छूने का गौरव हासिल कर सकते हैं।
Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 07:09:00 am 0 comments
जीवन के लिए जरूरी है दु:ख भी
दु:ख को आता देखकर विचलित होना मानव स्वभाव है। सभी जीवन में केवल सुख ही सुख चाहते हैं। कोई भी दु:ख की कल्पना नहीं करना चाहता है। लेकिन सच यह है कि जैसे खाने का स्वाद मीठे और तीखे दोनों को मिलाकर ही पूरा होता है वैसे ही जीवन का मजा सुख और दु:ख दोनों के साथ ही मिलता है।
सुख और दुख जीवन में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सिक्का उछलेगा भी, गिरेगा भी और चित या पट में हमारा सुख-दुख प्रदर्शित होगा। च्च्नानक दुखिया सब संसारज्ज इसका अर्थ यह नहीं है कि नानक कह रहे हैं कि सारा संसार दुखी है। दरअसल नानक कह रहे हैं दुख सांसारिक जीवन का अनिवार्य पहलू है। यह बहुत बारीक बात है। सभी दुखी हैं ऐसा नहीं कह सकते पर दुख आएगा ही नहीं यह भी नहीं कहा जा सकता। महापुरुषों ने इसके भी रास्ते बताए हैं कि दुख से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है। महावीर ने कहा है भाव विरक्ति दुख मुक्ति का एक सरल तरीका है। च्च्भावे विरत्तो मणुओ, विसोगो, एएण दुक्खोह परम्परेणज्ज इस सूत्र में महावीर स्वामी ने कहा है-भाव विरक्त पुरुष संसार में रहकर भी अनेक दुखों में लिप्त नहीं होता। भाव विरक्त का सीधा सा अर्थ है हर हाल में मस्ती। हमसे ही संबंधित जो घट रहा है उसे हम ही देखने लगें। इस साक्षी भाव में शुरुआत होती है भाव विरक्ति की। इसका सीधा सा अर्थ है काम सारे करना, छोड़ना कुछ भी नहीं है लेकिन संतुलन बनाए रखना है। हम क्रिया तो योग की करते हैं लेकिन इरादा भोग का होता है और फिर उलझ जाते हैं। जिसके भीतर भाव विरक्ति आ जाती है वह यह कभी नहीं सोचता कि सारी स्थितियां मेरे कारण बन रही है और मेरे करने से ही सबकुछ हो रहा है। आसक्त व्यक्ति ऐसा मानता है और अशांत हो जाता है। इसलिए जो लोग शांति की खोज में हैं वे साक्षी भाव का अर्थ समझें और उसके माध्यम से अपने व्यक्तित्व में भाव विरक्ति उतारें। चूंकि भाव विरक्त स्थिति को विचार प्रभावित करते हैं इसलिए विचारों का नियंत्रण करते रहना चाहिए। विचार नियंत्रित रहने की स्थिति का नाम ध्यान है।
सुख और दुख जीवन में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सिक्का उछलेगा भी, गिरेगा भी और चित या पट में हमारा सुख-दुख प्रदर्शित होगा। च्च्नानक दुखिया सब संसारज्ज इसका अर्थ यह नहीं है कि नानक कह रहे हैं कि सारा संसार दुखी है। दरअसल नानक कह रहे हैं दुख सांसारिक जीवन का अनिवार्य पहलू है। यह बहुत बारीक बात है। सभी दुखी हैं ऐसा नहीं कह सकते पर दुख आएगा ही नहीं यह भी नहीं कहा जा सकता। महापुरुषों ने इसके भी रास्ते बताए हैं कि दुख से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है। महावीर ने कहा है भाव विरक्ति दुख मुक्ति का एक सरल तरीका है। च्च्भावे विरत्तो मणुओ, विसोगो, एएण दुक्खोह परम्परेणज्ज इस सूत्र में महावीर स्वामी ने कहा है-भाव विरक्त पुरुष संसार में रहकर भी अनेक दुखों में लिप्त नहीं होता। भाव विरक्त का सीधा सा अर्थ है हर हाल में मस्ती। हमसे ही संबंधित जो घट रहा है उसे हम ही देखने लगें। इस साक्षी भाव में शुरुआत होती है भाव विरक्ति की। इसका सीधा सा अर्थ है काम सारे करना, छोड़ना कुछ भी नहीं है लेकिन संतुलन बनाए रखना है। हम क्रिया तो योग की करते हैं लेकिन इरादा भोग का होता है और फिर उलझ जाते हैं। जिसके भीतर भाव विरक्ति आ जाती है वह यह कभी नहीं सोचता कि सारी स्थितियां मेरे कारण बन रही है और मेरे करने से ही सबकुछ हो रहा है। आसक्त व्यक्ति ऐसा मानता है और अशांत हो जाता है। इसलिए जो लोग शांति की खोज में हैं वे साक्षी भाव का अर्थ समझें और उसके माध्यम से अपने व्यक्तित्व में भाव विरक्ति उतारें। चूंकि भाव विरक्त स्थिति को विचार प्रभावित करते हैं इसलिए विचारों का नियंत्रण करते रहना चाहिए। विचार नियंत्रित रहने की स्थिति का नाम ध्यान है।
Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 06:44:00 am 0 comments
हड़बड़ाहट में न बदल जाए शार्टकट
दौर जल्दबाजी का है, हर कोई थोड़े प्रयास में बहुत कुछ पाना चाहता है। दरअसल कलयुग का व्यवहार ही है, थोड़ी मेहनत और अधिक फल। कलयुग में भक्ति भी ऐसी ही है लेकिन भक्ति के शार्टकट में बहुत एकाग्रता की जरूरत है। अगर ज्यादा जल्दबाजी में हड़बड़ा गए तो सारे समीकरण उलटे हो जाते हैं।
समय के सद्पयोग का एक तरीका यह भी है कि कम समय में दक्षता के साथ काम पूरा हो जाए। यदि हम हमारे समय का आंकलन करें तो पाएंगे हर पल बिखरा हुआ है। ऐसा कोई धागा नहीं होता जो इन्हें जोड़ दे। इसलिए बहुत सारे लोग अपने जीवन में समय के छोटे-छोटे टुकड़ों का ढेर बना लेते हैं, वक्त को बिखरे-बिखरे क्षण, बेतरतीब समय के खंड में बांट देते हैं। जो संत होते हैं उनके जीवन का हर पल एक-दूसरे से जीवनधारा से जुड़ा होता है, गुथा रहता है। हर क्षण इन्टर-कनेक्टेड है, एक-दूसरे से पृथक नहीं। जन्म से मृत्यु तक ऐसी महान हस्तियों ने अपने समय को पूरा जीया है।श्रीसत्यनारायण कथा में नारद ने विष्णुजी से जो उपाय पूछा था उसमें आग्रह किया था कि छोटा उपाय बताएं। तत्कथं शमयेन्नाथ लघूपायेन तद्वदा-(किस लघु उपाय से कष्टों का निवारण होगा) नारद जानते थे, आगे आने वाला युग संक्षेप का समय होगा। यह शार्टकट नहीं कट टू कट का दौर है।नारद ने भगवान से लघु उपाय पूछा था। विष्णुजी भी सावधान थे। उन्होंने घोषणा कर दी कि विशेषत: कलियुगे लघुपायोस्ति भूतले-(विशेष रूप से कलयुग में पृथ्वी लोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है) आज के युग में सफलता का एक फंडा है शॉर्ट, क्विक और परफैक्ट। इस कथा ने इसकी घोषणा प्राचीनकाल में ही कर दी थी, लेकिन ऐसा करते समय ध्यान रखा जाए कि यह शीघ्रता कहीं हड़बड़ाहट में न बदल जाए। वरना फिर समय के छोटे-छोटे क्षण बिखर जाएंगे। समय का सद्पयोग फूलों की माला की तरह है और दुरुपयोग फूल के बिखरे हुए ढेर की तरह हैं। फूलों का जब संयोजन होता है तब माला बनती है। बस, समय का भी ऐसे ही संयोजन किया जाए।
समय के सद्पयोग का एक तरीका यह भी है कि कम समय में दक्षता के साथ काम पूरा हो जाए। यदि हम हमारे समय का आंकलन करें तो पाएंगे हर पल बिखरा हुआ है। ऐसा कोई धागा नहीं होता जो इन्हें जोड़ दे। इसलिए बहुत सारे लोग अपने जीवन में समय के छोटे-छोटे टुकड़ों का ढेर बना लेते हैं, वक्त को बिखरे-बिखरे क्षण, बेतरतीब समय के खंड में बांट देते हैं। जो संत होते हैं उनके जीवन का हर पल एक-दूसरे से जीवनधारा से जुड़ा होता है, गुथा रहता है। हर क्षण इन्टर-कनेक्टेड है, एक-दूसरे से पृथक नहीं। जन्म से मृत्यु तक ऐसी महान हस्तियों ने अपने समय को पूरा जीया है।श्रीसत्यनारायण कथा में नारद ने विष्णुजी से जो उपाय पूछा था उसमें आग्रह किया था कि छोटा उपाय बताएं। तत्कथं शमयेन्नाथ लघूपायेन तद्वदा-(किस लघु उपाय से कष्टों का निवारण होगा) नारद जानते थे, आगे आने वाला युग संक्षेप का समय होगा। यह शार्टकट नहीं कट टू कट का दौर है।नारद ने भगवान से लघु उपाय पूछा था। विष्णुजी भी सावधान थे। उन्होंने घोषणा कर दी कि विशेषत: कलियुगे लघुपायोस्ति भूतले-(विशेष रूप से कलयुग में पृथ्वी लोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है) आज के युग में सफलता का एक फंडा है शॉर्ट, क्विक और परफैक्ट। इस कथा ने इसकी घोषणा प्राचीनकाल में ही कर दी थी, लेकिन ऐसा करते समय ध्यान रखा जाए कि यह शीघ्रता कहीं हड़बड़ाहट में न बदल जाए। वरना फिर समय के छोटे-छोटे क्षण बिखर जाएंगे। समय का सद्पयोग फूलों की माला की तरह है और दुरुपयोग फूल के बिखरे हुए ढेर की तरह हैं। फूलों का जब संयोजन होता है तब माला बनती है। बस, समय का भी ऐसे ही संयोजन किया जाए।
Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 06:42:00 am 0 comments
भक्ति है बुद्धि को प्रज्ञा तक ले जाने का सफर
केवल बुद्धिमान होना हमें प्रतियोगी दुनिया की ओर ले जाता है जबकि बुद्धि को अगर भक्ति अपनी ओर खींचती है तो व्यक्ति धीरे-धीरे प्रज्ञावान होता है। यह बुद्धिमान होने का परिष्कृत रूप है। बुद्धिमान की बुद्धि भी कभी न कभी, कहीं न कहीं धोखा खा सकती है लेकिन प्रज्ञावान इस धोखे के फेर में नहीं आ सकता। बुद्धि को बहुत मांजा जाए तो वह प्रज्ञा की स्थिति में आती है और इसके लिए अध्यात्म की राह पकड़नी होगी।
धर्म के अनेक नाम रख दिए जाएं परन्तु उसके भीतर का सत्य एक ही रहेगा। इस सत्य को केवल बुद्धिमान होकर नहीं पाया जा सकता। हां संसार को आसानी से पाया जा सकता है, यदि हम बुद्धिमान हैं तो। अफसोस है कि आज के दौर में बुद्धिमानी का उपयोग स्वयं को आगे बढ़ाने और दूसरों को पछाड़ने में ही किया जा रहा है। इस काल में बुद्धिमान लोग षडयंत्र, भ्रष्टाचार, शौषण, दमन और सांप्रदायिकता की ओर बढ़े पर सत्य की ओर नहीं चले। वास्तव में सत्य की खोज तब शुरू होती है तब बुद्धि प्रज्ञा में बदलती है। बुद्धि जब परिष्कृत रिफाइन्ड हो जाए तब प्रज्ञा कहलाती है। आत्म ज्ञान की ओर बढ़ती हुई बुद्धि को प्रज्ञा कहते हैं। इसलिए प्रयास हो कि बुद्धि से प्रज्ञा और प्रज्ञा से सत्य हाथ में आए। हिन्दू शास्त्रों ने इस घोषणा को बार-बार किया है। इसी बात को इस्लाम ने भी कबूल किया है।हजरत मुहम्मद पर रोशन किताब कुरान में यह आयत उतरी है। जरा इस अजीम दुआ को पढ़ें-व कुरब्बी जिदनी इल्मन-ऐ-परवर दिगार मेरा इल्म और बढ़ा। इल्म बढ़ाने की बात वही है कि बुद्धि से प्रज्ञा की ओर जाना। वरना सत्य हाथ कैसे लगेगा। इबादत के दूसरे मायने यही है कि सच को पकड़ लेना। सत्य पाने के दो तरीके हैं। शास्त्र पढ़े या सत्संग सुनें।बात केवल पढ़ने पर ही खत्म नहीं होती। जब सुने तो भी गहराई से सुनें। बौद्ध और जैन धर्म ने एक शब्द दिया है श्रावक। इसका सीधा सा अर्थ है जिन्होंने संतों को श्रवण किया है। ध्यान रखें श्रोता और श्रावक होने में फर्क है जिन्होंने कान से सुना वे श्रोता और जो प्राण से सुनते है वे श्रावक। इस स्थिति में बुद्धि प्रज्ञा की ओर बढ़ती है।
धर्म के अनेक नाम रख दिए जाएं परन्तु उसके भीतर का सत्य एक ही रहेगा। इस सत्य को केवल बुद्धिमान होकर नहीं पाया जा सकता। हां संसार को आसानी से पाया जा सकता है, यदि हम बुद्धिमान हैं तो। अफसोस है कि आज के दौर में बुद्धिमानी का उपयोग स्वयं को आगे बढ़ाने और दूसरों को पछाड़ने में ही किया जा रहा है। इस काल में बुद्धिमान लोग षडयंत्र, भ्रष्टाचार, शौषण, दमन और सांप्रदायिकता की ओर बढ़े पर सत्य की ओर नहीं चले। वास्तव में सत्य की खोज तब शुरू होती है तब बुद्धि प्रज्ञा में बदलती है। बुद्धि जब परिष्कृत रिफाइन्ड हो जाए तब प्रज्ञा कहलाती है। आत्म ज्ञान की ओर बढ़ती हुई बुद्धि को प्रज्ञा कहते हैं। इसलिए प्रयास हो कि बुद्धि से प्रज्ञा और प्रज्ञा से सत्य हाथ में आए। हिन्दू शास्त्रों ने इस घोषणा को बार-बार किया है। इसी बात को इस्लाम ने भी कबूल किया है।हजरत मुहम्मद पर रोशन किताब कुरान में यह आयत उतरी है। जरा इस अजीम दुआ को पढ़ें-व कुरब्बी जिदनी इल्मन-ऐ-परवर दिगार मेरा इल्म और बढ़ा। इल्म बढ़ाने की बात वही है कि बुद्धि से प्रज्ञा की ओर जाना। वरना सत्य हाथ कैसे लगेगा। इबादत के दूसरे मायने यही है कि सच को पकड़ लेना। सत्य पाने के दो तरीके हैं। शास्त्र पढ़े या सत्संग सुनें।बात केवल पढ़ने पर ही खत्म नहीं होती। जब सुने तो भी गहराई से सुनें। बौद्ध और जैन धर्म ने एक शब्द दिया है श्रावक। इसका सीधा सा अर्थ है जिन्होंने संतों को श्रवण किया है। ध्यान रखें श्रोता और श्रावक होने में फर्क है जिन्होंने कान से सुना वे श्रोता और जो प्राण से सुनते है वे श्रावक। इस स्थिति में बुद्धि प्रज्ञा की ओर बढ़ती है।
Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 06:42:00 am 0 comments
अपने भीतर की योग्यता और संभावनाओं को जगाएं
दुनिया उसके पीछे भाग रही है जिसके पास पॉवर है, जो बड़ी हस्ती है, कुछ परिवर्तन का माद्दा रखता है। उगते सूरज को सभी नमस्कार करते हैं। हमारे मन में हमेशा लालसा रहती है कि कोई बड़ा आदमी हमें अपना नजदीकी बना ले। नजदीकियां बनाना है तो पहले खुद के भीतर इतनी योग्यता और संभावनाओं को जगाना पड़ेगा। आध्यात्मिक जीवन में भी परमात्मा की निकटता पाने के लिए अपने भीतर की संभावनाओं को जगाना पड़ेगा।
दुनिया में रहते हुए अनेक लोगों को कई बार ऐसा लगता है कि किसी बड़ी हस्ती की निकटता प्राप्त हो जाए। कोई दिव्यात्मा हमें स्पर्श कर ले और यदि ऐसा होता है तो कभी-कभी हमें एक नई ऊर्जा प्राप्त होती है। इसे अध्यात्म ने सान्निध्य ऊर्जा कहा है एनर्जी ऑफ प्रॉक्सीमिटी और जब ऐसी ऊर्जा मिले तो उसका उपयोग करना हमें आना चाहिए।
श्री हनुमानजी के जीवन में एक अवसर ऐसा आया था। राजा सुग्रीव के आदेश पर जब वानर चारों दिशाओं में सीताजी की खोज के लिए भेजे गए तो कहते हैं हनुमानजी सबसे पीछे थे। श्रीराम सबको बिदाई दे रहे थे तो लिखा गया है च्च्पाछें पवन तनय सिरु नावा, जानि काज प्रभु निकट बोलावाज्ज जो व्यक्ति सबसे पीछे आया है राम ने उन्हें काम का विचार कर अपने निकट बुलाया। श्रीराम को सीताजी के पास दूत के रूप में भेजने के लिए किसी का तो चयन करना ही था। ये सारी संभावना उन्हें हनुमानजी महाराज में दिख गई। हर बीज वृक्ष नहीं बनता लेकिन चैतन्य लोग उस एक बीज को पकड़ लेते हैं जिसमें वृक्ष बनने की संभावना है।राम चैतन्य थे और हनुमान, बीज में भरी हुई संभावना थे। बात यहीं समाप्त नहीं हुई च्च्परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।ज्ज अपने हाथों से श्रीरामजी ने हनुमानजी को स्पर्श किया और अंगुठी सौंप दी। यहां हनुमानजी को एक दिव्य सत्ता की निकटता और स्पर्श दोनों मिल गए। इस सान्निध्य ऊर्जा का उपयोग उन्होंने लंका में जाकर किया। हमें यही सीखना है। अच्छे, समझदार सक्षम और बड़े लोगों का साथ मिले ऐसा प्रयास करें किंतु उस संग से जो ऊर्जा मिले उसका भरपूर सद्उपयोग किया जाए। साथ देने के लिए इस समय सर्वाधिक सुलभ देवता हनुमानजी महाराज हैं। वे आपके पास कभी भी आ जाएंगे।
दुनिया में रहते हुए अनेक लोगों को कई बार ऐसा लगता है कि किसी बड़ी हस्ती की निकटता प्राप्त हो जाए। कोई दिव्यात्मा हमें स्पर्श कर ले और यदि ऐसा होता है तो कभी-कभी हमें एक नई ऊर्जा प्राप्त होती है। इसे अध्यात्म ने सान्निध्य ऊर्जा कहा है एनर्जी ऑफ प्रॉक्सीमिटी और जब ऐसी ऊर्जा मिले तो उसका उपयोग करना हमें आना चाहिए।
श्री हनुमानजी के जीवन में एक अवसर ऐसा आया था। राजा सुग्रीव के आदेश पर जब वानर चारों दिशाओं में सीताजी की खोज के लिए भेजे गए तो कहते हैं हनुमानजी सबसे पीछे थे। श्रीराम सबको बिदाई दे रहे थे तो लिखा गया है च्च्पाछें पवन तनय सिरु नावा, जानि काज प्रभु निकट बोलावाज्ज जो व्यक्ति सबसे पीछे आया है राम ने उन्हें काम का विचार कर अपने निकट बुलाया। श्रीराम को सीताजी के पास दूत के रूप में भेजने के लिए किसी का तो चयन करना ही था। ये सारी संभावना उन्हें हनुमानजी महाराज में दिख गई। हर बीज वृक्ष नहीं बनता लेकिन चैतन्य लोग उस एक बीज को पकड़ लेते हैं जिसमें वृक्ष बनने की संभावना है।राम चैतन्य थे और हनुमान, बीज में भरी हुई संभावना थे। बात यहीं समाप्त नहीं हुई च्च्परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।ज्ज अपने हाथों से श्रीरामजी ने हनुमानजी को स्पर्श किया और अंगुठी सौंप दी। यहां हनुमानजी को एक दिव्य सत्ता की निकटता और स्पर्श दोनों मिल गए। इस सान्निध्य ऊर्जा का उपयोग उन्होंने लंका में जाकर किया। हमें यही सीखना है। अच्छे, समझदार सक्षम और बड़े लोगों का साथ मिले ऐसा प्रयास करें किंतु उस संग से जो ऊर्जा मिले उसका भरपूर सद्उपयोग किया जाए। साथ देने के लिए इस समय सर्वाधिक सुलभ देवता हनुमानजी महाराज हैं। वे आपके पास कभी भी आ जाएंगे।
Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 06:41:00 am 0 comments
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