अष्टांग योग धर्म, अध्यात्म, मानवता एवं विज्ञान की प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरता है। इस दुनिया के खूनी संघर्ष को यदि किसी उपाय से रोका जा सकता है तो वह 'अष्टांग योग' ही है। अष्टांग योग में जीवन के सामान्य व्यवहार से लेकर ध्यान एवं समाधि सहित अध्यात्म की उच्चतम अवस्थाओं का अनुपम समावेश है।
संसार के सभी व्यक्ति सुख व शांति चाहते हैं। विश्व के सम्पूर्ण राष्ट्र भी इस बात पर सहमत हैं कि विश्व में शांति स्थापित होनी चाहिए। प्रतिवर्ष इसी उद्देश्य से ही एक व्यक्ति को जो शांति स्थापित करने के लिए समर्पित होता है, नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
वैसे, शांति कैसे स्थापित हो, इस बात को लेकर सभी असमंजस की स्थिति में हैं। सभी लोग अपने-अपने विवेक के अनुसार इसके लिए कुछ चिंतन करते हैं, परंतु एक सर्वसम्मत मार्ग नहीं निकल पाता। कोई कहता है जिस दिन इस धरती पर केवल अमुक धर्म होगा उस दिन सभी सुख हो जाएँगे। कोई कहता है यदि सब किसी भगवान की शरण में आ जाएँ तो सर्वत्रा सुख और शांति हो जाएगी।
भारत में तो कई सम्प्रदायों, मत-पंथों एवं गुरुओं की भरमार है और सभी यह दावा करते हैं कि उनके द्वारा निर्दिष्ट पथ पर चलकर ही विश्व में सुख और शांति संभव है। इन सब मत-पंथों एवं संप्रदायों में वह उदात्तता, व्यापकता व समग्रता नहीं है जिससे कि मानव मात्रा उनको अपना सके। इन सबकी अपनी-अपनी सीमाएँ हैं।
दुनिया में तथाकथित धर्मों की एकछत्र स्थापना हेतु खूनी संघर्ष भी हुए परन्तु परिणाम कुछ भी नहीं निकला। अशांति बढ़ती ही जा रही है। इसका अर्थ है दुनिया के लोग जिन उपायों पर विचार कर रहे हैं, उनमें सार्थकता तो है परंतु परिपूर्णता, समग्रता व व्यापकता नहीं।
इन प्रचलित मत-पंथों, संप्रदायों एवं तथाकथित धर्मों को अपनाने से जहाँ व्यक्ति को एक ओर थोड़ी शांति मिलती है, वहीं इन संप्रदायों के पचड़े में पड़कर व्यक्ति कुछ ऐसे झूठे अंधविश्वासों, कुरीतियों एवं मिथ्या आग्रहों में फँस जाता है, जिनसे निकलना मुश्किल हो जाता है।
क्या ऐसे कुछ नियम-मान्यताएँ व मर्यादाएँ हो सकती हैं, जिन पर पूरी दुनिया के सभी व्यक्ति चल सकें? जिससे किसी भी व्यक्ति व राष्ट्र की एकता व अखंडता खंडित नहीं होती हो और न ही किसी का व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध होता हो, जिसको प्रत्येक व्यक्ति अपना सकता हो और जीवन में पूर्ण सुख, शांति व आनंद प्राप्त कर सकता हो?
एक ऐसा पथ जिस पर निर्भय होकर पूर्ण स्वतंत्रता के साथ दुनिया का प्रत्येक इंसान चल सकता है और जीवन में पूर्ण सुख, शांति व आनंद को प्राप्त कर सकता है। यह है महर्षि पतंजलि प्रतिपादित अष्टांग योग का पथ। यह कोई मत-पंथ या संप्रदाय नहीं अपितु जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति है। यदि संसार के लोग वास्तव में इस बात को लेकर गंभीर है कि विश्व में शांति स्थापित होनी ही चाहिए तो इसका एकमात्र समाधन है अष्टांग योग का पालन। अष्टांग योग के द्वारा ही वैयक्तिक व सामाजिक समरसता, शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति एवं आत्मिक आनंद की अनुभूति हो सकती है।
अष्टांग योग धर्म, अध्यात्म, मानवता एवं विज्ञान की प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरता है। इस दुनिया के खूनी संघर्ष को यदि किसी उपाय से रोका जा सकता है तो वह 'अष्टांग योग' ही है। अष्टांग योग में जीवन के सामान्य व्यवहार से लेकर ध्यान एवं समाधि सहित अध्यात्म की उच्चतम अवस्थाओं का अनुपम समावेश है।
योग का अर्थ है अपनी चेतना (अस्तित्व) का बोध। अपने अंदर निहित शक्तियों को विकसित करके परम चैतन्य आत्मा का साक्षात्कार एवं पूर्ण आनन्द की प्राप्ति। इस यौगिक प्रक्रिया में विविध प्रकार की क्रियाओं का विधन हमारे ऋषि-मुनियों ने किया है। योग क्रियाओं से हमारी सुप्त चेतना शक्ति का विकास होता है।
सुप्त (डैड) तंतुओं का पुनर्जागरण होता है एवं नए तंतुओं कोशिकाओं (सेल्स) का निर्माण होता है। योग की सूक्ष्म क्रियाओं द्वारा हमारे सूक्ष्म स्नायुतंत्रा को चुस्त किया जाता है जिससे उनमें ठीक प्रकार से रक्त परिभ्रमण होता है और नई और नई शक्ति का विकास होने लगता है। योग से रक्त परिभ्रमण पूर्णरूपेण सम्यक रीति से होने लगता है और शरीर विज्ञान का यह सिद्धांत है कि शरीर के संकोचन व विमोचन होने से उनकी शक्ति का
विकास होता है तथा रोगों की निवृत्ति होती है। योगासनों से यह प्रक्रिया सहज ही हो जाती है। आसन एवं प्राणायामों के द्वारा शरीर की ग्रन्थियों व माँसपेशियों में कर्षण-विकर्षण आकुंचन-प्रसारण तथा शिथिलीकरण की क्रियाओं द्वारा उनका आरोग्य बढ़ता है।
आसन एवं अन्य यौगिक क्रियाओं से पेंक्रियाज एक्टिव होकर इंसुलिन ठीक मात्रा में बनने लगती है, जिससे डायबिटीज आदि रोग दूर होते हैं। पाचनतंत्रा के स्वास्थ्य पर पूरे शरीर का स्वास्थ्य निर्भर करता है। सभी बीमारियों का मूल कारण पाचनतंत्रा की अस्वस्थता है। यहाँ तक कि हृदय रोग जैसे भयंकर बीमारी का कारण भी पाचनतंत्रात का अस्वस्थ होना पाया गया है।
योग से पाचनतंत्रा पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाता है जिससे संपूर्ण शरीर स्वस्थ, हल्का एवं स्पफूर्तिदायक बन जाता है। योग से हृदय रोग जैसी भयंकर बीमारी से भी छुटकारा पाया जा सकता है। इतना ही नहीं, इस स्थूल शरीर के साथ-साथ योग सूक्ष्म शरीर एवं मन के लिए भी अनिवार्य है।
योग से इंद्रियों एवं मन का निग्रह होता है, यम-नियमादि, अष्टांग योग के अभ्यास से साधक असत अविद्या के तमस् से हटकर अपने दिव्य स्वरूप ज्योतिर्मय, शांतिमय, परम चैतन्य आत्मा एवं परमात्मा तक पहुँचने में समर्थ हो जाता है।
हम योग पथ का अवलम्बन लेकर शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त करते हुए अपने लक्ष्य ईश्वर के साक्षात्कार और पूर्णानंद की अनुभूति कर लेते हैं। भारतीय दर्शन में योग एक अति महत्वपूर्ण शब्द है। आत्मदर्शन व समाधि से लेकर कर्मक्षेत्रा तक योग का व्यापक व्यवहार हमारे शास्त्रों में हुआ है।
योग दर्शन के उपदेष्टा महर्षि पतंजलि योग शब्द का अर्थ वृत्तिनिरोध करते हैं। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा एवं स्मृति ये पंचविध वृत्तियाँ जब अभ्यास एवं वैराग्यादि साधनों से मन में लय को प्राप्त हो जाती हैं और मन द्रष्टा (आत्मा) के स्वरूप में अवस्थित हो जाता है, तब योग होता है।
गीता में योगेश्वर श्री कृष्ण योग को विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त करते हैं। अनुकूलता-प्रतिकूलता, सिद्धि-असिद्धि,सफलता-विफलता, जय-पराजय इन समस्त भावों में आत्मस्थ रहते हुए सम रहने को योग कहते हैं। जैनाचार्यों के अनुसार जिन साध्नों से आत्मा की सिद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है, वह योग है।
योग से आरोग्य का नारा देकर रोगमुक्त एवं स्वस्थ समाज के गुर सिखाने से कोहराम मच गया। मलेशिया में योग के विरुद्ध फतवा जारी कर दिया गया तो यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलम्बिया में किए गए कुछ शोधें का हवाला देकर साबित करने का प्रयास किया गया है कि योग से सेक्स शक्ति को बढ़ावा मिलता है।
भारतीय योग शरीर को स्वस्थ, संयमी एवं संस्कारवान बनाकर व्याधि से समाधि की ओर ले जाता है। ऐसा मैं मानता हूँ। हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलम्बिया के ऑथर लौरी ब्रोट्टो, साउर्थन कैलिपफोर्निया सेंटर ऑफ सेक्सुअल हेल्थ एंड सर्वाइवरशिप मेडिसिन के माइकल क्रीचमने और द हियलिंग सेन्चुरी इन टस्टिन की पामेला जेकोबसन के कथित शोधें का हवाला देते हुए यह प्रचारित किया जा रहा है कि पूरब का योग सेक्स की शक्ति को बढ़ावा देता है। इससे महिलाओं में एरोसल का लेवल बढ़ता है, वहीं पुरुषों में भी कामेच्छा बढ़ने के साथ सेक्स पावर बढ़ती है।
इस विषय में मेरा कहना है कि भारतीय योग एक ऐसी क्रिया है जो ध्यान के साथ श्वासों को शारीरिक अवयवों तक पहुँचाकर शरीर के भीतर प्राणवायु का संतुलित संचार करती है। इससे भीतरी और बाह्य शरीर सुंदर, सुडौल और शक्तिशाली बनता है। साथ ही ध्यान से मानव का मन और मस्तिष्क संयमित और विवेकशील बनता है। पश्चिम में एक्सरसाइज को योग की संज्ञा दी जा रही है।
एक्सरसाइज से केवल शरीर की शक्ति बढ़ती है। उसे नियंत्रित करने के लिए जिस आध्यात्मिक शक्ति के संग्रहण की आवश्यकता शरीर को होती है, वह नहीं मिलती। नतीजा शारीरिक शक्ति की दिशा नकारात्मक हो सकती है। वासनाएँ, और वर्जनाएँ जागकर इंसान की शक्ति को विध्वंस की ओर ले जा सकती हैं, जबकि भारतीय योग का आधर ही यौगिक विधियों से अलौकिक शक्तियों का विकास करना है।
योग से चित्त की चंचल वृत्तियाँ नियंत्रित होती हैं और एकाग्रता आती है, जिससे सकारात्मकता का भाव बढ़ता है और व्यक्ति सही दिशा में कार्य करके अपनी श्रेष्ठ उत्पादकता से राष्ट्र और समाज के लिए अच्छे और सकारात्मक कार्य करता है। भारतीय योग, विश्व समुदाय को विध्वंस के मार्ग पर जाने से रोकने का काम कर रहा है। धर्म या सम्प्रदाय से ऊपर उठकर समस्त मानव जाति को शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ बनाना मेरा उद्देश्य है ताकि पूरी दुनिया सर्वे भवन्तु सुखिनः के भारतीय सूत्र में बंध सके।
21 मार्च 2010
योग से शांति संभव
Posted by Udit bhargava at 3/21/2010 03:34:00 pm 0 comments
योग से यौवन का आनंद
योग आपको हर पल शरीर और मन से युवा बनाए रखने की ताकत रखता है। बशर्ते कि आप इसे नियमित करते हैं। कुछ आसनों का चयन किया जा सकता है उनके लाभ को देखते हुए। आसनों के अलावा योग के अन्य उपाय करना भी युवा बने रहने के लिए आवश्यक है। यहाँ प्रस्तुत हैं यौन जीवन को स्वस्थ बनाए रखकर यौवन को बरकरार रखने के कुछ टिप्स।
सेक्स से पहले योग :
सेक्स से पहले योग करने से भरपूर ऊर्जा शक्ति का संचार होता है। यह ऊर्जा सेक्स के दौरान काफी लाभदायक सिद्ध हो सकती है। स्वस्थ और आनंददायक सेक्स के लिए सेक्स से पूर्व योग आपके दिमाग और माँसपेशियों को तरोताजा कर देता है। योगासन करने के बाद योग स्नान शरीर को ताजगी से भर देता है जो आपके आनंद को स्वस्थ और सुगंधित बनाए रखने के लिए जरूरी है।
रेचक का झंझावात :
तेज, गहरी तथा अराजकपूर्ण भस्रिका से भी अधिक तीव्रता से श्वास लें। इसमें श्वास लेने से ज्यादा जोर छोड़ने पर। श्वास का झंझावात खड़ा कर दें जो आपके तन-मन को झकझोर दे ऐसा। चीखें, चिल्लाएँ, नाचें, गाएँ, रोएँ, कूदें, हँसें या फिर शरीर को इस कदर हिलाएँ-डुलाएँ कि जैसे कोई भूत आ गया हो। पूरी तरह से पागल हो जाएँ। सिर्फ 10 मिनट के लिए और फिर 10 मिनट का ध्यान करें। लेकिन यह सब योग चिकित्सक की देखरेख में ही करें।
बारह आसनों का जादू :
बारह आसनों को आप नियमित करें। इन्हें आपके जीवन का हिस्सा बना लें। इनके करने से किसी भी प्रकार का यौन रोग नहीं होगा। इससे आपका यौवन बरकरार रहेगा। यह बारह आसन निम्न हैं- पद्मासन, अर्धमत्स्येंद्रासन, सर्वांगासन, हलासन, धनुरासन, पश्चिमोत्तनासन, मयुरासन, भद्रासन, मुद्रासन, भुजंगासन, चंद्रासन और शीर्षासन।
योगा मसाज :
आप स्वयं चेहरे पर हलका-सा क्रीम या तेल लगाकर धीरे-धीरे उसकी मालिश करें। इसी तरह हाथों और पैरों की अँगुलियाँ, सिर, पैर, कंधे, कान, पिंडलियाँ, जंघाएँ, पीठ और पेट की मालिश करें। अच्छे से शरीर के सभी अंगों को हलके-हलके दबाएँ जिससे रुकी हुई ऊर्जा मुक्त होकर उन अंगों के स्नायु में पहुँचे तथा रक्त का पुन: संचार हो।
योगा स्नान :
सुगंध, स्पर्श, प्रकाश और तेल का औषधीय मेल सभी शारीरिक व मानसिक विकारों को दूर करता है। इसे आयुर्वेदिक या स्पा स्नान भी कहते हैं। इस स्नान के कई चरण होते हैं। इन चरणों में अभ्यंगम, शिरोधारा, नास्यम, स्वेदम और लेपन आदि अनेक तरीके अपनाए जाते हैं। इसके पूर्व आप चाहें तो पंचकर्म को भी अपना सकते हैं। पंचकर्म अर्थात पाँच तरह के कार्य से शरीर की शुद्धि करना। ये पाँच कार्य हैं- वमन, विरेचन, बस्ति-अनुवासन, बस्ति-आस्थापन और नस्य।
यौगिक आहार :
यह बहुत आवश्यक है। यदि आप कुछ तो भी खाते रहते हैं तो फिर शरीर भी कुछ तो भी आकार लेने लगेगा। यह रोगग्रस्त भी हो सकता है और इससे वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ जाता है, इसीलिए जरूरी है यौगिक आहार।
प्रतिबंध :
जितना भोजन लेने की क्षमता रखते हैं उससे कुछ कम ही लें। भोजन मसालेदार, माँसाहार और मिर्च वाला न हो। कड़वा, खट्टा, तीखा, नमकीन, गरम, खट्टी भाजी, तेल, तिल, सरसों, मद्य, मछली, बकरे आदि का माँस, दही, छाछ, बेर, खल्ली, हींग, लहसुन और बासी भोजन का त्याग करें।
ये अपनाएँ :
भोजन में घी, रस और रेशों की मात्रा ज्यादा हो। चावल, ज्वार, जौ, दूध, घी, खाण्ड, मक्खन, मिश्री, मधु, हरी सब्जी, मूँग, हरा चना और फल का सेवन करें। भोजन पुष्टिकारक, सुमधुर, सुपाच्य हो।
अंतत:
यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि यदि उपरोक्त उल्लेखित बातों का आप अनुसरण करते रहते हैं तो जीवनभर स्वस्थ और युवा बने रहेंगे।
Posted by Udit bhargava at 3/21/2010 03:21:00 pm 0 comments
योगसूत्र की भाष्य परम्परा
योग पर लिखा गया सर्वप्रथम सुव्यव्यवस्थित ग्रंथ है-योगसूत्र। योगसूत्र को पांतजलि ने 200 ई.पूर्व लिखा था। इसे योग पर लिखी पहली सुव्यवस्थित लिखित कृति मानते हैं। पातंजलि ने इस ग्रंथ में भारत में अनंत काल से प्रचलित तपस्या और ध्यान-क्रियाओं का एक स्थान पर संकलन किया और उसका तर्क सम्मत सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत किया। यही संपूर्ण धर्म का सुव्यवस्थित केटेग्राइजेशन है। इस ग्रंथ पर अब तक हजारों भाष्य लिए गए हैं, लेकिन कुछ खास भाष्यों को जानना जरूरी है।
व्यास भाष्य : व्यास भाष्य का रचना काल 200-400 ईसा पूर्व का माना जाता है। महर्षि पतंजलि का ग्रंथ योग सूत्र योग की सभी विद्याओं का ठीक-ठीक संग्रह माना जाता है। इसी रचना पर व्यासजी के 'व्यास भाष्य' को योग सूत्र पर लिखा प्रथम प्रामाणिक भाष्य माना जाता है। व्यास द्वारा महर्षि पतंजलि के योग सूत्र पर दी गई विस्तृत लेकिन सुव्यवस्थित व्याख्या।
तत्त्ववैशारदी : पतंजलि योगसूत्र के व्यास भाष्य के प्रामाणिक व्याख्याकार के रूप में वाचस्पति मिश्र का 'तत्त्ववैशारदी' प्रमुख ग्रंथ माना जाता है। वाचस्पति मिश्र ने योगसूत्र एवं व्यास भाष्य दोनों पर ही अपनी व्याख्या दी है। तत्त्ववैशारदी का रचना काल 841 ईसा पश्चात माना जाता है।
योगवार्तिक : विज्ञानभिक्षु का समय विद्वानों के द्वारा 16वीं शताब्दी के मध्य में माना जाता है। योगसूत्र पर महत्वपूर्ण व्याख्या विज्ञानभिक्षु की प्राप्त होती है जिसका नाम ‘योगवार्तिक’ है।
भोजवृत्ति : भोज के राज्य का समय 1075-1110 विक्रम संवत माना जाता है। धरेश्वर भोज के नाम से प्रसिद्ध व्यक्ति ने योग सूत्र पर जो 'भोजवृत्ति नामक ग्रंथ लिखा है वह भोजवृत्ति योगविद्वजनों के बीच समादरणीय एवं प्रसिद्ध माना जाता है। कुछ इतिहासकार इसे 16वीं सदी का ग्रंथ मानते हैं।
Posted by Udit bhargava at 3/21/2010 03:12:00 pm 0 comments
यौगिक आहार को जानें
यदि आप योग करते हों या न करते हों, दोनों ही स्थिति में यौगिक आहार को जानना आवश्यक है। हिंदू धर्मग्रंथ वेद में कहा गया है कि अन्न ही ब्रह्म अर्थात ईश्वर है। अन्न को अच्छी भावदशा, ऊर्जावान, साफ-सुथरी तथा शांतिमय जगह पर ग्रहण किया जाए तो वह अमृत समान होता है।
अन्न में कई तरह के रोग उत्पन्न करने की शक्ति है और यही हर तरह के रोग और शोक मिटा भी सकता है। योग में अन्न के कुछ प्रकार बताते हुए कहा गया है कि क्या खाना चाहिए और क्या नहीं। मूलत: इसके तीन प्रकार हैं- मिताहार, पथ्यकारक और अपथ्यकारक।
मिताहार : मिताहार का अर्थ सीमित आहार। जितना भोजन लेने की क्षमता है, उससे कुछ कम ही भोजन लेना और साथ ही भोजन में इस्तेमाल किए जाने वाले तत्व भी सीमित हैं तो यह मिताहार है।
मिताहार के अंतर्गत भोजन अच्छी प्रकार से घी आदि से चुपड़ा हुआ होना चाहिए। मसाले आदि का प्रयोग इतना हो कि भोजन की स्वाभाविक मधुरता बनी रहे।
भोजन करते समय ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करें। इस प्रकार के मिताहार से योगाभ्यास में स्फूर्ति बनी रहती है। साधक शीघ्र ही अपने अभ्यास में सफलता पाने लगता है।
अपथ्यकारक भोजन : यदि आप योगाभ्यास कर रहे हैं तो निम्नलिखित प्रकार के भोजन का सेवन नहीं करें। यदि करते हैं तो इससे अभ्यास में बाधा उत्पन्न होती है।
ये भोजन हैं : कड़वा, खट्टा, तीखा, नमकीन, गरम, खट्टी भाजी, तेल, तिल, सरसों, दही, छाछ, कुलथी, बेर, खल्ली, हींग, लहसुन और मद्य, मछली, बकरे आदि का माँस। ये सभी वस्तुएँ अपथ्यकारक हैं।
इसके अलावा बने हुए खाने को पुन: गरम करके भी नहीं खाना चाहिए। अधिक नमक, खटाई आदि भी नहीं खाना चाहिए।
पथ्यकारक भोजन : योग साधकों द्वारा योगाभ्यास में शीघ्र सफलता प्राप्त करने के लिए कहा गया है कि भोजन पुष्टिकारक हो, सुमधुर हो, स्निग्ध हो, गाय के दूध से बनी चीजें हों, सुपाच्य हो तथा मन को अनुकूल लगने वाला हो। इस प्रकार के भोजन योग के अभ्यास को आगे बढ़ाने में सहायक तत्व होते हैं। योगियों ने निम्नलिखित प्रकार के भोजन बताए हैं-
ये भोजन हैं- गेहूँ, चावल, जौ जैसे सुंदर अन्न। दूध, घी, खाण्ड, मक्खन, मिसरी, मधु जैसे फल-दूध। जीवन्ती, बथुआ, चौलाई, मेघनाद एवं पुनर्नवा जैसे पाँच प्रकार के शाक। मूँग, हरा चना आदि।
ध्यान रखने योग्य : ध्यान में रखना चाहिए कि भोजन तरल, सुपाच्य, पुष्टिकारक और सुमधुर हो। गाय के दूध से बनी चीजें हों। इस प्रकार के भोजन से योग के अभ्यास में सहायता मिलती है तथा व्यक्ति आजीवन निरोगी बना रहता है।
Posted by Udit bhargava at 3/21/2010 03:06:00 pm 0 comments
युवतियों के लिए योग
यदि प्राकृतिक सौंदर्य और कोमल देह की अभिलाषा है तो योग से बेहतर विकल्प नहीं। युवतियों के लिए योग बहुत ही लाभप्रद है। यह आपको सुंदर और सेक्सी बना सकता है। इससे चेहरे पर चमक और बदन में दमक बनी रहेगी।
चेहरे की चमक :चेहरा का रंग कुछ भी हो लेकिन यदि चेहरे पर लावण्य या चमक है तो आप सभी को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम हैं। चेहरे की चमक का संबंध हमारे पेट और मुँह की पवित्रता से होता है। दोनों की शुद्धि के लिए चार उपाय हैं। यह तीनों करना आवश्यक है।
1. पहला शंख प्रक्षालन 2. मुँह संबंधी सूक्ष्म व्यायाम और ब्रह्ममुद्रा 3. सर्वांग आसन एवं शीर्षासन और 4. जलनेति तथा कपालभाँति प्राणायाम। इसके बाद आप सिर्फ पाँच मिनट का ध्यान करें।
बदन की सुंदरता :बदन झरहरा हो तो आकर्षण और बढ़ जाता है। इससे शरीर स्वस्थ और सुंदर बना रहता है। बदन की सुंदरता या दमक का संबंध हमारी रीढ़ और माँस से होता है। यदि अनावश्यक चर्बी है तो माँस और रीढ़ दोनों के लिए घातक है। यदि चर्बी बिलकुल भी नहीं है तो भी घातक है। इसलिए बेलेंस जरूरी है। बेलेंस आता है हड्डियों के लचीला और मजबूत होने से। इसके लिए भी चार उपाय जानें।
1. सूक्ष्म व्यायाम करें 2. छह आसन नियमित करें- ताड़ासन, त्रिकोणासन, पश्चिमोत्तनासन, उष्ट्रासन, धनुरासन और नौकासन। 3. प्राणायाम 4. मालिश।
योगा पैकेज : चाहें तो उपरोक्त आसनों में कुंजल, सूत्रनेति, जलनेति, दुग्धनेति, वस्त्र धौति कर्म को भी जोड़ सकते हैं। कपोल शक्ति विकासक, सर्वांग पुष्टि, सूर्य नमस्कार और योग स्नान करना भी लाभप्रद है। हाँ भोजन का अवश्य ध्यान रखें। भोजन सुपाच्य और हलका-फुलका हो अन्यथा योग करने का क्या महत्व।
Posted by Udit bhargava at 3/21/2010 02:52:00 pm 0 comments
इस्लाम धर्म - इतिहास
हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
अली के बाद हालांकि मुआविया खलीफा बन गया लेकिन मुसलमानों का एक वर्ग रह गया जिसका मानना था कि मुसलमानों का खलीफा हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमके परिवार का ही हो सकता है। उनका मानना था कि यह खलीफा (जिसे वह ईमाम भी कहते थे) स्वयँ भगवान के द्वारा आध्यात्मिक मार्गदर्शन पाता है। इनके अनुसार अली पहले ईमाम थे। यह वर्ग शिया वर्ग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाकी मुसलमान, जो की यह नहीं मानते हैं कि हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमका परिवारजन ही खलीफा हो सकता है, सुन्नी कहलाये। सुन्नी पहले चारों खलीफाओं को राशिदून खलीफा कहते हैं जिसका अर्थ है सही मार्ग पे चलने वाले खलीफा।
मुआविया के खलीफा बनने के बाद खिलाफत वंशानुगत हो गयी। इससे उम्मयद वंश का आरंभ हुआ। मुआविया के बेटे यज़ीद की वैधता को जब अली के बेटे हुसैन ने चुनौती दी तो दोनों के बीच में 680 में जंग हूई जिसे जंग-ए-करबला कहते हैं। यह इस्लाम का दूसरा गृहयुद्ध था। इस जंग में हुसैनको शहादत प्राप्ति हो गयी। शिया लोग 10 मुहर्रम के दिन इसी का शोक मनाते हैं।
Posted by Udit bhargava at 3/21/2010 09:03:00 am 0 comments
रामायण – लंकाकाण्ड - राम लक्ष्मण बन्धन में
जब दोनों सेनाओं के भयंकर युद्ध को देखकर भगवान सूर्य अस्ताचल की ओर चल दिये और चारों ओर अन्धकार छा गया तो इस अन्धकार का लाभ उठाकर राक्षस दूने उत्साह से वानरों पर पिल पड़े। उनके आकार को देखकर वानर भी राक्षस को पहचानकर 'यह राक्षस है' 'यह राक्षस है' कहते उन पर प्रतिघात करने लगे। दोनों ओर से ही भयंकर संग्राम मचा हुआ था। ऐसा प्रतीत होता था कि प्रत्येक वीर आज ही सम्पूर्ण शत्रु सेना का विनाश कर डालना चाहता था। अन्धकार का जितना लाभ राक्षस उठा सकते थे, उतना लाभ वानरों के लिये उठाना सम्भव नहीं था। अपनी सेना की यह स्थिति देख कर राम ने स्वयं धनुष बाण उठाकर शत्रु सेना का संहार करना प्रारम्भ किया। उनके बाणों की मार से रजनीचरों के समूह के समूह कट-कट कर धराशायी होने लगे। इस प्रकार अपने साथियों को मरते देख बहुत से सैनिक अपने प्राणों को लेकर भाग चले। राक्षस सेना की यह दुर्दशा देखकर रावण के पुत्र मेघनाद के तन-बदन में आग लग गई। उसने शीघ्र ही नाग बाणों की फाँस बना कर राम-लक्ष्मण दोनों को उसमें बाँध लिया। नाग फाँस में बँधने पर दोनों भाई मूर्छित हो गये।
श्री राम के मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिरते ही मेघनाद ने हर्षोन्मत्त होकर दसों दिशाओं को गुँजाने वाली गर्जना की। राक्षस सेना में फिर से नवजीवन आ गया और वह मेघनाद की जयजयकार करती हुई बड़े उत्साह से वानर सेना पर टूट पड़ी। मेघनाद उनके उत्साह को बढ़ाते हुये कह रहा था, "जिनके कारण आज शोणित की सरिता बह रही है, वे ही दोनों भाई नागपाश कें बँधे पृथ्वी पर मूर्छित पड़े हैं। अब देव, नर, किन्नर किसी में इतनी सामर्थ्य नहीं है जो इन्हें नापाश से मुक्त कर सके। अब युद्ध समाप्त हो गया, लंकापति की विजय हुई।" इस प्रकार विजयघोष करता हुआ मेघनाद लंका को लौट गया। "
राम-लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने से सम्पूर्ण वानर सेना में शोक छा गया। सुग्रीव, अंगद, हनुमान, जाम्बवन्त आदि सभी सेनध्यक्ष किंकर्तव्यविमूढ़ होकर दोनों भाइयों को घेर कर खड़े हो गये और इस विपत्ति से त्राण पाने का उपाय खोजने लगे। तभी विभीषण ने उन्हें धैर्य बँधाते हुये कहा, "हे वीरों! भयभीत होने की आवश्कता नहीं है। यह नागपाश इन दोनों भाइयों का कुछ नहीं बिगाड़ सकती और न वे मर ही सकते हैं। इसलिये तुम इनकी चिन्ता छोड़कर अपने-अपने मोर्चों पर जाकर युद्ध करो। इन दोनों भाइयों को तुम मेरे ऊपर छोड़ दो।"
उधर जब रावण ने मेघनाद के मुख से राम-लक्ष्मण के नागपाश में बँधकर मूर्छित होने का समाचार सुना तो उसके हर्ष का पारावार न रहा। उसने सीता की रक्षा पर नियुक्त राक्षस नारियों को बुलाकर आदेश दिया, "तुम लोग सीता को पुष्पक विमान पर चढ़ाकर युद्ध भूमि में ले जाओ और उन्हें ले जाकर राम-लक्ष्मण को दिखाओ जो पृथ्वी पर मरे पड़े हैं।" रावण की आज्ञा पाते ही राक्षसनियाँ जानकी को विमान में चढ़ाकर युद्धभूमि में ले गईं जहाँ राम-लक्ष्मण मूर्छित अवस्था में पड़े थे। सीता ने देखा राक्षस सेना जयजयनाद कर रही है और वानर सेना शोक में डूबी हुई निराश खड़ी है। दोनों भाइयों को इस प्रकार पृथ्वी पर पड़ा देखकर सीता के धैर्य का बाँध टूट गया और वे फूट-फूट कर रोने लगी, "हाय! आज मैं विधवा हो गई। बड़े-बड़े ज्योतिषियों की यह भविष्वाणी मिथ्या हो गई कि मैं आजीवन सधवा रहूँगी, सपूती बनूँगी। हे नाथ! आपने तो कहा था कि मैं अयोध्या लौटकर अश्वमेघ यज्ञ करूँगा। अब उस कथन का क्या होगा! जो विश्व को जीतने की शक्ति रखते थे, आज वे कैसे मौन पड़े हैं! हा विधाता! तेरी यह क्या लीला है! हे त्रिजटे! तू मेरे सती होने का प्रबन्ध करा दे। अब मैं इस संसार में अपने प्रय राम के बिना नहीं रहूँगी। अब मेरा जीना व्यर्थ है।"
सीता को इस प्रकार विलाप करते देख त्रिजटा ने कहा, "हे जानकी! तुम व्यर्थ में विलाप करके जी छोटा मत करो। मेरा विश्वास है, राम-लक्ष्मण दोनों जीवित हैं, केवल मूर्छित हो गये हैं। यह देखो वानर सेना फिर युद्ध के लिये लौट रही है। सुग्रीव और विभीषण उनके चेतन होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मेरा अनुमान मिथ्या नहीं है। वे उठकर फिर युद्ध करेंगे और रावण का वध करके तुम्हें अवश्य ले जायेंगे, तुम धैर्य धारण करो।" इस प्रकार सीता को समझा-बुझा कर त्रिजटा सीता सहित विमान को पुनः अशोकवाटिका में ले आई।
नागपाश में बँधे राम और लक्ष्मण काफी देर तक भूमि पर पड़े रहे। तभी अकस्मात् जोर से आँधी चलने लगी, आकाश में घने बादल छा गये। इतने में ही आकाशमार्ग से विनता का पुत्र गरुड़ उड़ता हुआ आया। उसने दोनों भाइयों के पास बैठकर उनके शरीर का स्पर्श किया। गरुड़ के स्पर्श करते ही समस्त नाग भयभीत होकर पृथ्वी में छिप गये। नागों के बन्धन से मुक्त होने पर राम और लक्ष्मण ने अपने नेत्र खोले। उनके पीले पड़े हुये मुखमण्डल फर नवीन आभा से चमकने लगे। चैतन्य होकर राम ने गरुड़ को धन्यवाद देते हुये कहा, "हे वैनतेश! तुम्हारे अनुग्रह से हम दोनों भाई इस बन्धन से मुक्त हुये हैं। हम तुम्हारा कैसे आभार प्रदर्शन कर लकते हैं?" राम की यह विनम्र वाणी सुनकर गरुड़ ने उत्तर दिया, "हे राघव! मैं तुम्हारा मित्र हूँ। वन में विचरण करते हुये मैंने सुना था कि मेघनाद ने तुम्हें इस नागपाश में बाँध लिया है जिसे देवता, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व कोई भी नहीं खोल सकते। इसलिये मैं मित्र धर्म के नाते यहाँ आ पहुँचा और मैंने तुम्हें नागपाश से मुक्त करा दिया। भविष्य में अधिक सतर्क रहकर युद्ध करना क्योंकि ये राक्षस बड़े कपटी तथा मायावी हैं।" यह कहकर गरुड़ ने उनसे विदा ली।
राम और लक्ष्मण को पूर्णतया स्वस्थ पाकर वानर सेना के आनन्द का पारावार न रहा। वे रघुवीर की जयजयकार करके बाजे-नगाड़े, रणभेरी आदि बजाकर राक्षसों को भयभीत करने लगे।
Posted by Udit bhargava at 3/21/2010 05:49:00 am 0 comments

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