28 फ़रवरी 2010

गुलजार रहे रंगों का त्योहार

सूर्य इस चराचर जगत के एकमात्र प्रत्यक्ष देव हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्य अपने सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं। अगर हम आज के वैज्ञानिक युग में सात घोड़ों की अवधारणा की व्याख्या करें तो पाएंगे कि सूर्य की किरणों पर सात रंगों का प्रभाव है। बरसात के मौसम में बनने वाला इंद्रधनुष भी इन्हीं सात रंगों को सामने लाने का काम करता है। इंद्रधनुष में बाहर से अंदर की ओर लाल से बैंगनी रंग समाहित हैं। ये सात रंग ही सात प्रत्यक्ष ग्रह हैं - सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि।

हमारे जीवन पर रंगों का गहरा प्रभाव पड़ता है। अलग-अलग रंग जीवन के अलग-अलग भावों को दर्शाते हैं। मसलन सफेद रंग शांति का, हरा खुशहाली का तो लाल रंग शक्ति का आभास कराता है। रंग जीवन में प्रेम और मिठास भी घोलते हैं। बगैर रंगों के जीवन नीरस हो जाता है। होली भी रंगों का त्योहार है। मकर संक्रांति पर उत्तरायण में सूर्य के आगमन के साथ ही हिंदुओं का पहला बड़ा त्योहार होली आता है। इस समय वसंत ऋतु अपने पूर्ण यौवन पर होती है। प्रकृति में उल्लास और उमंग का वातावरण होता है। सभी पेड़-पौधों पर विभिन्न रंगों के पुष्प खिले होते हैं।

वैसे भी जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए हमें सकारात्मक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। रंगों के माध्यम से हमें यह ऊर्जा प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए जीवन में अग्नि तत्व की भरपाई लाल और नारंगी रंग से, जल तत्व की भरपाई नीले रंग से, पृथ्वी तत्व की भरपाई हरे रंग से और आकाश तत्व की भरपाई पीले रंग से होती है। वैसे भी होली प्रेम, उत्साह और उमंग का त्योहार है, जो हमें भाई-चारे की सीख देता है। फिर भी किस राशि के जातक को कौन से रंग से होली खेलना अधिक लाभदायी साबित होगा, इसकी विवेचना ज्योतिषीय परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है।

मेष
इस राशि का स्वामी मंगल ग्रह है। ऐसे में इस राशि वालों को लाल रंग से होली खेलनी चाहिए, परंतु जो लोग उच्च रक्तचाप या हृदय रोग से पीड़ित हैं, उन्हें लाल रंग का त्याग करना चाहिए। ऐसे लोगों के लिए विकल्प स्वरूप हल्के रंगों से होली खेलना ज्यादा लाभदायक रहेगा।

वृष
इस राशि का स्वामी ग्रह शुक्र है। इस राशि वालों को गुलाबी रंग से होली खेलनी चाहिए। गुलाबी रंग से होली खेलने से इस राशि के जातकों को मानसिक स्थिरता और शांति प्राप्त होगी। इसके साथ ही इस राशि के जातकों को अपनों से बिछुड़ने से होने वाले संताप से भी राहत मिलेगी।

मिथुन
इस राशि का स्वामी ग्रह बुध है। इस राशि वालों को पीले रंग से होली खेलनी चाहिए। यह रंग उत्साह और ताजगी प्रदान करने में सहायक होगा। इससे आपकी बुद्धिमता और दूसरों को प्रोत्साहन देने वाली शक्तियों का भी विकास होगा। यह मानसिक दुर्बलता को भी दूर करने में सहायक सिद्ध होगा।

कर्क
इस राशि का स्वामी ग्रह चंद्रमा है। इस राशि वालों को सफेद, सिल्वर और हल्के रंगों से होली खेलनी चाहिए। इससे वैचारिक द्वंद्व से उबर मानसिक स्थिरता और शांति प्राप्त होगी। सिल्वर रंग से होली खेलने से आपको तरक्की में सहायक सिद्ध होने वाले अवसरों का भी लाभ मिलेगा।

सिंह
इस राशि का स्वामी ग्रह सूर्य है। इस राशि वालों को नारंगी रंग से होली खेलनी चाहिए। यह समृद्धि और खुशमिजाजी प्रदान करने में सहायक सिद्ध होगा। इस राशि के जातकों को यह रंग भावनात्मक पीड़ाओं से मुक्ति दिलाने में भी मददगार सिद्ध होगा।

कन्या
इस राशि का स्वामी ग्रह बुध है। इस राशि वालों को भूरे हरे अथवा नीले रंग से होली खेलनी चाहिए। इस राशि के जातकों को ये रंग मानसिक भय कम करने और आत्मविश्वास बढ़ाने में सहायक सिद्ध होंगे।
तुला
इस राशि का स्वामी ग्रह शुक्र है। इस राशि वालों को हल्के नीले या हल्के हरे रंग से होली खेलनी चाहिए। इससे आपको मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक क्षेत्र में लाभ देने वाली सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होगी। ये रंग मानसिक तनाव को कम करने में भी मदद देंगे।

वृश्चिक
इस राशि का स्वामी मंगल ग्रह है। इस राशि वालों को मरून रंग से होली खेलनी चाहिए। यह रंग वैचारिक शक्ति बढ़ाता है। इसके साथ ही इसकी मदद से सामाजिक व्यवहारकुशलता का गुण अर्जित करने में भी भारी सफलता प्राप्त होती है।

धनु
इस राशि का स्वामी ग्रह गुरु है। इस राशि वालों को बैंगनी और गहरे नीले रंग से होली खेलनी चाहिए। यह रंग गुस्सैल और अवसाद ग्रस्त लोगों के लिए आत्मविश्वास प्रदान करने में भी सहायक सिद्ध होगा। इसके साथ ही यह रंग आध्यात्मिकता और सृजनशीलता भी बढ़ाता है।

मकर
इस राशि का स्वामी ग्रह शनि है। इस राशि वालों को गहरे स्लेटी और चटख रंगों से होली खेलनी चाहिए। पुलिस और सेना जैसे क्षेत्र से जुड़े इस राशि के जातकों के लिए यह रंग वैचारिक बंधनों को तोड़ अपनी सृजनात्मक सीमाओं को विस्तार देने में मददगार साबित होगा।

कुंभ
इस राशि का स्वामी ग्रह भी शनि है। इस राशि वालों को फिरोजी रंग से होली खेलनी चाहिए। यह रंग उत्तम स्वास्थ्य और रिश्तों की मजबूती में भी सहायक सिद्ध होगा। इस राशि के जातकों को यह रंग मानसिक अवसाद से निजात दिलाने में मददगार होगा।

मीन
इस राशि का स्वामी ग्रह गुरु है। इस राशि वालों को हरे और आसमानी रंग से होली खेलनी चाहिए। यह आध्यात्मिक उन्नति और उत्साहवर्धन करने में सहायक सिद्ध होगा। इस राशि के जातकों को इन रंगों से होली खेलने से पूर्वाभास के क्षेत्र में उत्तम लाभ प्राप्त होगा।

निशागमे तु पूज्यते होलिका सर्वतोमुखे:

आज सायंकाल भद्रारहित काल में होलिका दहन किया जाएगा। भद्रा दिन में 12 बजे तक रहेगी। भद्रा के मुख का त्याग करके निशा मुख में होली का पूजन करना शुभफलदायक सिद्ध होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी पर्व-त्योहारों को मुहूर्त शुद्धि के अनुसार मनाना शुभ एवं कल्याणकारी है।

हिंदू धर्म में अनगिनत मान्यताएं, परंपराएं एवं रीतियां हैं। वैसे तो समय परिवर्तन के साथ-साथ लोगों के विचार व धारणाएं बदलीं, उनके सोचने-समझने का तरीका बदला, परंतु संस्कृति का आधार अपनी जगह आज भी कायम है। आज की युवा पीढ़ी में हमारी प्राचीन नीतियों को लेकर कई सवाल उठते हैं, परंतु भारतीय धर्म साधना के परिवेश में वर्ष भर में शायद ही ऐसा कोई त्योहार हो जिसे हमारे राज्य अपने-अपने रीति रिवाजों के अनुसार धूमधाम से न मनाते हों।

ये पर्व हमारे आचार-व्यवहार, रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा और लोक विश्वास के परिचायक हैं। ज्योतिष गणना के अनुसार इस वर्ष 22 फरवरी से 28 फरवरी होलाष्टक की अवधि में गृह प्रवेश, मुंडन आदि जैसे शुभ कार्यो के आरंभ का निषेध माना गया है। आज सायंकाल होलिका दहन के बाद होलाष्टक का प्रभाव समाप्त हो जाएगा। इसके बाद 1 मार्च के दिन प्यार और एकता के रंग से सराबोर होलिकोत्सव का यह रंग भरा त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाएगा।

हर राज्य की होली का अपना एक अलग रंग और मनाने का ढंग दिखाई पड़ता है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा, गोवा में होली का अलग अंदाज है। मनभावन और पावन होली का अनोखा स्वरूप हमें मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में देखने को मिलता है।

शरद ऋतु के पश्चात गर्मियों के स्वागत में होली का पर्व मनाते हैं। राजपूत आज के दिन कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्र की प्रतियोगिताएं भी करवाते हैं। तमिलनाडु में होली को कामविलास के नाम से मनाया जाता है। कामदेव की श्रद्धापूर्वक उपासना करके कई लोकगीतों के साथ इस दिन को मनाने की प्रथा है। पंजाब का तो कहना ही क्या, यहां होली को ‘होला मोहल्ला’ के नाम से मनाते हुए ढोलक की थाप पर भांगड़ा करते हैं। महाराष्ट्र में इसे ‘रंगपंचमी’ के नाम से मनाते हैं। जगह-जगह दूध और मक्खन की मटकी तोड़ने का प्रयास करते हुए कृष्ण स्वरूप का जीवंत रूप देखने को मिलता है। महाराष्ट्र की तरह ही इसे गुजरात में गोविंदा के नाम से मनाते हैं। रंग और अबीर की बरसात के साथ विभिन्न जगहों पर मटकियां फोड़ी जाती हैं।

होलिका दहन के समय लोग कच्चे आम, नारियल, भुट्टे, चीनी के बने खिलौने होली की आहुति के रूप में भेंट करते हैं। एक-दूसरे को गुलाल का तिलक लगाकर गले मिलते हैं। पौराणिक एवं धार्मिक आस्थानुसार कई सुंदर चित्रण दर्शाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश व बिहार में पुराने संवत्सर के जाने व नए के इंतजार में होलिका दहन द्वारा पिछले साल की बुरी यादें और पुरानी रंजिश व क्रोध को आग की भेंट चढ़ाते हुए आज के दिन नवीन सतरंगों से अपने मन को रंग देते हैं।

संपूर्ण भारतवर्ष के लोग विभिन्न रीति-रिवाजों के अनुसार होली के अवसर को मनाने में गौरव महसूस करते हैं। वेद-पुराणों से लेकर संपूर्ण साहित्य में भी होली के प्रचलन का पता चलता है। भगवान शिव से लेकर गुरु गोरखनाथजी ने भी इसे विशेष साधना पर्व कहा है। आज के दिन साधक, साधु, संन्यासी विशेष मुहूर्त में अपनी साधना संपन्न करते हैं। आज के दिन 28 फरवरी सायंकाल भद्रारहित काल में होलिका दहन किया जाएगा। भद्रा 12 बजे तक रहेगी। भद्रा के मुख का त्याग करके निशा मुख में होली का पूजन करना शुभफलदायक सिद्ध होता है। आज के दिन होलिका दहन, प्रहलाद का स्मरण और अन्याय पर न्याय की विजय का स्मरण तो होता है। इसके अलावा आज के दिन नवान्नेष्टि यज्ञ भी संपन्न किया जाता है।

होली के दिनों में किसानों की फसल भी कटकर आ जाती है। सभी किसान मिल-जुलकर होलिका दहन करके अपनी खुशहाली व समृद्धि के लिए अग्नि को अपनी फसल का पहला भाग अर्पित करते हैं। किसान अपनी धान की परख भी इस होली से करते हैं। होलिका दहन के विषय में कई गाथाएं सर्वाधिक प्रचलित हैं, जैसे होलिका का प्रहलाद को मारने के लिए गोद में लेकर आग में बैठना। दूसरी कथा के अनुसार पूतना का वध इसी दिन किया गया था। तीसरी कथा के अनुसार भगवान शिव ने कामदेव को इसी दिन श्राप देकर भस्म कर दिया था।

प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या पूर्णिमा फाल्गुनि सदा।
निशागमे तु पूज्यते होलिका सर्वतोमुखे:।।


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पर्व-त्योहारों को मुहूर्त शुद्धि के अनुसार मनाना शुभ एवं कल्याणकारी है। आज के दिन प्रात:काल स्नानादि करके शुद्ध वस्त्र पहनकर हनुमानजी व भैरव बाबा की पूजा करने का विधान है। सभी देवी-देवताओं का ध्यान करते हुए लाल रोली व चंदन से तिलक लगाकर प्रार्थनापूर्वक अपनी रक्षा के लिए आशीर्वाद प्राप्त करें। थोड़े से तेल को बच्चों से हाथ लगवाकर किसी चौराहे पर डाल दें। नजर तोड़ की यह प्राचीन प्रथा आज भी चली आ रही है। आज के दिन पकवान, मिठाइयां विशेषकर किसी ब्रह्मण को देना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।

होलीः संतान कष्ट करें दूर

हंसी मजाक और रंग-गुलाल से प्रेम को जाहिर करने का त्योहार है होली। ज्योतिष और धर्मशास्त्र में होली का बड़ा महत्व है। होलिका दहन के एक माह पहले डंडा रोपण किया जाता है और आठ दिन पहले से होलाष्टक लग जाते हैं, जिनमें सारे मांगलिक कार्य बंद हो जाते हैं। फाल्गुन मास में प्राय: मीन का सूर्य रहता है तथा चंद्रमा पूर्णिमा को सूर्य की राशि सिंह के करीब रहता है और प्राय: समसप्तक योग बना करता है, जो आमजन में खुशियों का दरिया बहाने वाला होता है।

होली का त्योहार इंसान को धरातल पर रहते हुए खुशियां मनाने की प्रेरणा भी देता है। इसके साथ ही दिल में दबे बुरे विचारों एवं बुरे व्यवहार के कारण आई मानसिक परेशानियों को दूर कर समान भाव से समाज एवं परिवार में रहने की सीख देता है। यह त्योहार भीतर छिपे अहंकार को जलाकर प्यार में डुबकी लगाने की प्रेरणा भी देता है।

भक्त प्रहलाद की रक्षा प्रभु कृपा से हुई थी, इसीलिए छोटे बच्चों को नजर लगने, बीमार होने या अन्य समस्याओं से मुक्ति के लिए भी होलिका दहन काल एवं होली का त्योहार महत्वपूर्ण होता है। अक्सर बीमार रहने वाले छोटे बच्चों के अलावा ऐसे बच्चे, जिन्हें भूख नहीं लगती है, रोते बहुत हैं, उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए उन्हें होली दहन से दूर रखें। जब होली जलने लगे तो होली की तपन का स्पर्श कराना चाहिए। जलते बड़कूले घर लाकर अग्नि को लगातार रखने से घर से रोग एवं शोक दूर हो जाते हैं।

होली रंगों का त्योहार है और रंग विभिन्न ग्रहों से प्रभावित रहते हैं। एक के हाथ से दूसरे के चेहरे या शरीर पर किया जाने वाले प्रेम लेप आपस में ग्रहों से उत्पन्न बाधाओं को दूर करता है। यह मानसिक, शारीरिक एवं सामाजिक व्यवसाय में सकारात्मक परिणाम प्रदान करने वाला भी होता है। शनि की प्रधानता, अश्लीलता या मानसिक अस्थिरता के कारण चंद्रमा का सहयोग अंतमरुखी भी बना देता है। ऐसी स्थिति में अनेक लोग आनंद की अनुभूति से दूर होकर अपने आप को सबसे बचाने का प्रयास करते हैं। होली की शिखा का प्रवाह रात्रि में जिस दिशा में जाता है, उस दिशा में अनिष्ट एवं प्राकृतिक प्रकोप, राजदोष आदि की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।

वेद में विभिन्न यज्ञों का उल्लेख मिलता है, जिनमें चातुर्मास्य इष्टि भी प्रमुख है। यह यज्ञ चार-चार महीने के अंतर से किया जाता है। फाल्गुन मास में किया जाने वाला यज्ञ इस पूर्णिमा में किया जाता है। इसमें नवीन फसल की आहुति देकर शेष अन्न को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है। हम होली पर नए अन्न को भूनकर ग्रहण करते हैं। यही भुना अन्न होलका नाम से जाना जाता है और इसी के आधार पर यह पर्व होलिका कहलाता है।

होलिका के मध्य रोपा गया होलिका का डंडा प्रहलाद का सूचक है और यही वैदिक यज्ञस्तंभ का भी प्रतीक कहा गया है। होली के दिन प्रदीप्त अग्नि ऋतु संधि में उत्पन्न संक्रामक रोगों का नाश करती है। इस अवसर पर किए जाने वाले हास-परिहास व नृत्य गीत आदि के कार्यक्रम स्फूर्तिदायक होते हैं। इस दिन होलिका की अग्नि में दूध के छींटे देने, नारियल व अनार चढ़ाने का भी विधान है। दूसरे दिन चंडाल दर्शन कर स्नान करने से वर्ष भर शारीरिक व मानसिक पीड़ा से मुक्ति मिलती है। इस दिन देवपितृतर्पण करके दुष्टों के विनाश के लिए होलिका की भस्म को प्रणाम करना चाहिए।

होलिका दहन पूर्व ऐसे करें पूजा

होली का पर्व फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन भद्रा रहित समय में होलिका दहन किया जाता है। होलिका के दहन वाले स्थान को जल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकड़ी, सूखी घास होली का डंडा स्थापित करते हैं।

होलिका दहन से पूर्व पूजा की जाती है। पूजा करते समय होली के समीप जाकर पूर्व या उत्तर मुख होकर बैठें। इसके बाद अग्नि के द्वारा होली को दीप्तिमान करें। फिर एक थाली में निम्न पूजन सामग्री एकत्रित करें। एक लोटा जल, माला, रोली, चावल, गंध पुष्प, कच्च सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, नारियल, बड़कुले।

चैतन्य होली का गंध-पुष्पादि से पंचोपचार विधि से पूजन करें। फिर मंत्र का जाप करते हुए होली की तीन या सात परिक्रमा करें। फिर जल से अघ्र्य दें। पूजन के बाद नवीन धान्य जैसे जौं, गेहूं, और चने की खेतियों को ज्वाला में सेंक कर खाएं, तो शरीर निरोगी रहता है। होली की अग्नि और राख बहुत महत्व की होती है, जिसे घर में रखने से घर की सुरक्षा होती है। घर बुरी ताकतों से बचा रहता है।

जानिये क्या है शनि की साढ़ेसाती

शनि की साढ़ेसाती का आज सारे संसार में हौवा बना हुआ है। यदि किसी व्यक्ति को यह कह दिया जाये कि तुम पर शनिदेव की साढ़ेसाती चल रही है तो न जाने उस व्यक्ति के दिमाग में क्या-क्या भ्रान्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।

अभी थोड़े समय पहले की बात है। मेरी मुलाक़ात एक सज्जन से हुई। मैंने देखा कि वह बहुत ही चिंतित हैं। मैंने पुछा, "क्या बात है भाई?" तो उन्होंने मुझे बताया कि पिछले दिनों मैंने अपनी जन्मपत्री एक पंडित जी को दिखायी तो उन्होंने कहा कि आने वाले वर्ष में आपको शनिदेव की साढ़ेसाती का सामना करना पड़ेगा। कहते हैं कि साढ़ेसाती बहुत खराब होती है, वह संबंधित व्यक्ति और उसके परिवार वालों के लिए बहुत कष्टदायक होती है, कारोबार में घाटा होता है, किसी प्रियजन के बिछुड़ने का भी दु:ख होता है। परिवार में किसी को भयंकर बीमारी भी हो सकती है। .....

साढ़ेसाती के संबंध में न जाने कितनी तरह की भ्रांतियां उस सज्जन के मन में उथल-पुथल मचायी हुई थीं। मैंने उस सज्जन से, जो बहुत बड़े अफसर और विद्वान भी थे, पूछा कि आपका इसके बारे में क्या विचार है? क्या ऐसा होगा? उस सज्जन के पास मेरे सवाल का कोई जवाब न था। उन्हें तो शनिदेव की साढ़ेसाती में मिलने वाले दुख व बाधाओं का दृश्य रातों दिन बार-बार नजर आ रहा था।

मैंने उन्हें बहुत समझाया कि शनिदेव की साढ़ेसाती हर व्यक्ति के लिए एक ही प्रकार की नहीं होती। इस विषय में कई बातों का विश्लेषण करने के बाद ही कोई निर्णय निकाला जा सकता है। लेकिन उन्हें मेरी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

मेरे मित्रो, यह हाल आज के विद्वान कहे जाने वाले मनुष्यों का है, शनिदेव की साढ़ेसाती के बारे में । वास्तव में सभी जातक-जातिकाओं पर साढ़ेसाती का प्रभाव एक जैसा नहीं होता। क्योंकि शनिदेव एक ऐसे ग्रह हैं जो संतुलन एवं न्याय का प्रतीक माने जाते हैं। ज्योतिष विद्या की शब्दावली में श्री शनिदेव तुला राशि में उच्च के होते हैं व मेष राशि में नीच के। यहाँ यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि कोई भी ग्रह उच्च या नीच नहीं होता। किसी राशि विशेष में उच्च का होने का तात्पर्य उत्तम फल देने वाला और नीच का तात्पर्य प्रतिकूल फल देने वाला होता है। किंतु नीच का होने के बावजूद शनिदेव कभी-कभी जातकों को अनुकूल फल भी उपलब्ध कराते हैं। शनिदेव के स्वभाव का एक महत्वपूर्ण गुण यह है कि ये अनुचित विषमता तथा अस्वाभाविक सक्षमता को पसन्द नहीं करते। जो जातक-जातिकाएं उपरोक्त व्यवहार अपनाते हैं, शनिदेव उन पर कुपित हो जाते हैं।

साढ़ेसाती का स्वानुभूत विशलेषण
शनिदेव के कुपित होने का अर्थ यह है कि संबंधित जातक अन्याय एवं अनावश्यक विषमताओं का साथ दे रहा है। ऐसे मनुष्यों को शनिदेव दंडित कर उनका शुध्दिकरण करते हैं। साथ ही उन्हें सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित भी करते हैं। ऐसी स्थिति में यह कहना कि शनिदेव की साढ़ेसाती की पूरी अवधि खराब है, एकदम गलत है। क्योंकि यदि एक बच्चा स्कूल से एक पेंसिल चुरा कर घर ले आये और मां उसे दंड देने के बजाय उसे प्रोत्साहन दे तो वह भविष्य में एक दिन बहुत बड़ा चोर बन जायेगा। यदि उसे पहले दिन ही पेंसिल चोरी के लिए दंडित कर दिया जाये तो वह दंड उसे हमेशा सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेगा। या यूं कह दीजिए कि सुनार सोने को गर्म आग में रखकर ही सुन्दर आभूषणों के लिए ढालता है, ठीक उसी प्रकार शनिदेव न्याय अधिकारी बनकर जातक-जातिकाओं के पापों की सजा देकर उन्हें पवित्र कर सुख-सम्पत्ति एवं धन देते हैं।

शनिदेव का एक विशेष गुण यह भी है कि वह दूध का दूध एवं पानी का पानी कर देते हैं। यानी वह सच्चे और झूठे का भेद भलीभांति समझते हैं। शनिदेव बहुत बड़े उपदेशक, शिक्षक एवं गुरु भी कहे जाते हैं, जो जातक को विपत्ति और कष्ट, अभाव व निर्धनता रूपी तापों से तपाकर मलहीन बनाते हुए उसे उन्नति के सोपान पर लाकर खड़ा कर देते हैं। यानी इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि साढ़ेसाती में यदि शनिदेव प्रतिकूल परिस्थितियों का संकेत देने वाले भाव में बैठे हैं तो हमारे प्रारब्ध या यिमाण कर्म में कहीं न कहीं त्रुटि जरूर रही है और उसका फल हमें साढ़ेसाती में अवश्य भुगतना होगा।
यदि हमें यह ज्ञात हो जाए कि साढ़े सात वर्ष में से कौन सा समय अच्छा जायेगा, या कौन सा समय बुरा जायेगा, तो संबंधित व्यक्ति तदनुसार कदम उठाकर हर हालत में अपने को खुशहाल रखने की युक्ति निकाल सकता है। उसे यह मालूम हो जाये कि आज मेरा समय खराब है, अत: मैं अच्छा कार्य करूं, कल शुभ समय भी आने वाला है तो वह दु:ख एवं मुसीबतों को सहते हुए भी उनको भुलाकर सुख व सुनहरे पल का इन्तजार करेगा। सुख के इंतजार में बड़ा से बड़ा दुख भी आसानी से कट जाता है। वैसे भी यह परंपरा है कि अंधेरी रात के बाद सदैव सुबह होती है। आज दुख है तो कभी सुख भी अवश्य आयेगा।

अत: शनिदेव की साढ़ेसाती को हौवा समझ उससे डरने के बजाय हम अपने यिमाण कर्म को सुधारें तो अच्छा रहेगा। याद रहे, शनिदेव की साढ़ेसाती का प्रभाव तीन चरणों में होता है और तीनों चरण एक समान नहीं होते, तीनों चरणों में संबंधित व्यक्ति को सुख-दुख के अलग अलग स्वाद चखने को मिलते हैं।

शनिदेव पूरे भच का 30 वर्ष में एक चक्कर लगा पाते हैं। अर्थात एक राशि में ढाई वर्ष रहते हैं। मनुष्य अपने स्वार्थवश अच्छा-बुरा कार्य करता रहता है। जब शनिदेव उसकी राशि में प्रवेश करता है तो पिछले 30 वर्षों में जो जातक ने अच्छे-बुरे कार्य किये हैं, उनका ऑडिट करते हैं। ऑडिट करने पर वह देखते हैं कि इस जातक का पिछले 30 वर्षों का कैसा व्यवहार रहा। यदि अच्छा रहा, मानवता के प्रति प्रेम भरा रहा तो साढ़ेसाती में सुख प्राप्त होता है और यदि मानवता के प्रति दर्ुव्यवहार रहा तो जितना दर्ुव्यवहार रहा उसके अनुसार उसे सजा देते हैं। इसलिए व्यक्ति का मानवता के प्रति अच्छा व्यवहार रहे। नेक कमाई करे तो उसे साढ़ेसाती ढैय्या में किसी भी प्रकार का कष्ट प्राप्त नहीं होता है। अनेक राजनीतिज्ञों को शनिदेव की साढ़ेसाती में ऊँचाइयों पर चढ़ते देखा गया है।

शनिदेव का नाम सुनकर अक्सर लोगों में भय का आतंक व्याप्त हो जाता है। शनिदेव की साढ़ेसाती का हौवा जनमानस में अति प्राचीनकाल से चला आ रहा है। जिससे जातकों के मन में भीषण भय एवं सघन संत्रास उत्पन्न करने वाली स्थिति पैदा हो जाती है। इस संबंध में लोगों के मन में अनेक भ्रांतियां बैठी हैं। लौकिक कथाओं में इसकी विनाशकारी स्थितियों को प्रस्तुत किया गया है। अत: इस दशा में व्यवस्थित विवेचन की अनिवार्यता स्वत: सिध्द है।

वैसे ज्योतिष शास्त्रो के अनुसार शनिदेव यदि जन्मराशि से द्वादश, लग्न व धन भाव में स्थित हों तो उसकी साढ़ेसाती शुरू हो जाती है और ढाई वर्ष तक शनि की दृष्टि प्रथम चरण में पड़ती है और संकेत देती है कि पूर्व कर्मों के फलस्वरूप जातक को आर्थिक कठिनाइयों, शारीरिक कष्ट, स्थान परिवर्तन, अधिकाधिक व्यय और आमदनी कम होने से मानसिक तनाव, वैवाहिक मामले में व्यवधान आदि फल प्राप्त होने वाले हैं। यदि शनि जन्म राशि में स्थित हो तो भी ढाई वर्ष तक भोग काल कहा जाता है। दूसरे चरण में पूर्वकृत निजकर्मों के फलस्वरूप जातकों को व्यावसायिक हानि, सम्बंधियों को कष्ट, यात्रा, मित्रों का अभाव, शत्रु, पीड़ा व कार्यों में अवरोध आदि फल मिलते हैं। तीसरे चरण में पूर्वकृत निजकर्मों के फलस्वरूप जातको को सुख का अभाव अधिकाधिक व्यय से मानसिक व्यग्रता, गलत आचरण रखने वालों से संबंध, विरोध, विवाद व संबंधियों से मतभेद तथा असहयोग का वातावरण बना रहता है। यह अक्सर नेत्रों, उदर और पैर में निवास करता है। वैसे इसे अच्छा भी मानते हैं। ढैया और अल्प-कल्याणकारी में ढाई वर्ष तक रहने वाली अन्य शनि दशा भी है।

कल्याणी प्रददाति वै रविसुता राशेश्चतुर्थाष्टमे।
वैसे शनिदेव मेषादि राशियों का चक्कर 30 वर्ष में पूरा कर लेते हैं। ज्योतिष गणना के अनुसार ये एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहते हैं। साढ़ेसाती का आरंभ तब होता है जब शनिदेव चन्द्र राशि से द्वादश भाव में संचार करते हैं। लग्न या द्वितीय भाव तक साढ़ेसाती का प्रभाव मवार चलता है। इन्हीं साढ़े सात वर्षों को साढ़ेसाती के नाम से जानते हैं।

शनिदेव की साढ़ेसाती क्या और किस पर?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनिदेव की साढ़ेसाती तब प्रारम्भ होती है जब शनिदेव जातक की जन्म राशि अर्थात् (वह राशि जिसमें चन्द्रमा बैठता है, उससे पहले वाली राशि चन्द्र कुण्डली से द्वादश भाव में प्रवेश करते हैं तो यहां ये ढाई वर्ष रहते हैं। उसके बाद शनिदेव प्रथम भाव जन्म राशि में प्रवेश करते हैं, फिर ढाई वर्ष का समय लेते हैं, इसके बाद वह अगली राशि द्वितीय भाव में प्रवेश कर फिर वहां ढाई वर्ष का समय लेते हैं। यानी शनिदेव जन्मराशि की पहली राशि में प्रवेश करते हैं तो शनिदेव की साढ़ेसाती प्रारम्भ होती है, पूरे साढ़े सात वर्ष के बाद शनिदेव जब जन्म से अगली राशि को पार कर जाते हैं तो शनिदेव की साढ़ेसाती समाप्त हो जाती है। अब मैं आपको जानकारी दे रहा हूं कि शनिदेव जब किसी राशि में होता है तो किस राशि के जातक को शनिदेव की साढ़ेसाती होती है।

• जब शनिदेव गोचर में भ्रमण करते हुए मीन, मेष और वृष राशियों पर भ्रमण करते हैं तो मेष राशि के व्यक्तियों को शनिदेव की साढ़ेसाती प्रारम्भ होती है।
• मेष, वृष और मिथुन राशि के भ्रमण काल में वृष राशि पर शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
• शनिदेव जब वृष, मिथुन और कर्क राशि में स्थित हों, तब मिथुन राशि वालों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
• शनिदेव जब मिथुन, कर्क और सिंह राशि पर भ्रमण करते हैं तो कर्क राशि वालों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
• शनिदेव जब कर्क, सिंह और कन्या राशि में स्थित हो तो सिंह राशि वालों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
• शनिदेव गोचर भ्रमण काल में सिंह, कन्या एवं तुला राशि में हों तो कन्या राशि के जातकों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
• शनिदेव कन्या, तुला व वृश्चिक राशि में भ्रमण करते हैं तो तुला राशि पर साढ़ेसाती रहती है।
• शनिदेव जब तुला, वृश्चिक एवं धनु राशि में स्थित हों तो वृश्चिक राशि वाले जातकों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
• जब गोचर में शनिदेव वृश्चिक, धनु व मकर राशि पर हों तो धनु राशि वालों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहेगी।
• जब शनिदेव धनु, मकर एवं कुंभ राशि में हो तो मकर राशि वालों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
• शनिदेव जब गोचर में मकर, कुंभ व मीन राशि में प्रवेश करते हैं तो कुंभ राशि के लोगों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
• शनिदेव जब कुंभ, मीन एवं मेष में आते हैं तो मीन राशि वाले जातक-जातिकाओं के लिए शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।

जो व्यक्ति प्रथम बार साढ़ेसाती से गुजर जाता है, उसे पुन: 30 वर्ष पश्चात शनिदेव की साढ़ेसाती से प्रभावित होना पड़ता है। अगर अपवाद को छोड़ दिया जाये तो जातक को अपने जीवन में तीन बार साढ़ेसाती का सामना करना पड़ता है। साढ़ेसाती से अक्सर लोग भयाांत हो जाते हैं। लेकिन सब साढ़ेसाती अनिष्टकारक नहीं होती। शनिदेव जन्मांक के अनुसार फल प्रस्तुत करते हैं। कुछ ज्योतिर्विदों के कथनानुसार - शनिदेव जन्म-राशि के अनुसार परिणाम को प्रस्तुत करते हैं।

ढैय्या का विचार
शनिदेव चंद्र कुंडली अर्थात जन्म राशि के अनुसार चतुर्थ व अष्टम से गोचर करते हैं तो जातक को ढैय्या देते हैं। ढैय्या का मतलब होता है ढाई वर्ष। वैसे तो शनिदेव प्रत्येक राशि में ही ढाई वर्ष रहता हैं। परन्तु ढैय्या का विचार और कहीं से नहीं होता है। फिर चतुर्थ और अष्टम से ही क्यों ? क्योंकि शनिदेव प्रत्येक भाव में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के अनुसार फल देते हैं। चतुर्थ और अष्टम भाव मोक्ष के भाव हैं। आज दुनिया में ज्यादातर व्यक्ति धर्म की तरफ कम और भौतिक सुखों की तरफ ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। परन्तु ज्योतिष का नियम है कि शनिदेव जिस भाव से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के लिए गोचर करे, उसी के अनुरूप व्यक्ति को कार्य करना चाहिए। जो व्यक्ति ढैय्या में तीर्थ यात्रा, समुद्र स्नान और धर्म के कार्य दान-पुण्य इत्यादि करते हैं, उन्हें ढैय्या में भी शुभ फल की प्राप्ति होती है। लेकिन जो उस अवधि में इन कामों से दूर रहते हैं, उन्हें अपने ही पूर्वकृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप शारीरिक-मानसिक परेशानी और कारोबार में हानि होती है।

चतुर्थ भाव की ढैय्या
ढैय्या का फल जानने के लिए सर्वप्रथम यह देखा जाता है कि शनिदेव किस भाव में बैठे हैं और कहां-कहां उनकी तीसरी, सातवीं व दसवीं पूर्ण दृष्टि पड़ रही है क्योंकि उन भावों से संबंधित बातों में जातक को पूर्वकर्मवश अशुभ फल की प्राप्ति होती है। चतुर्थ भाव से शनिदेव छठे भाव को, दशम भाव को तथा लग्न को देखते हैं। अर्थात् जब शनिदेव चतुर्थ भाव से गोचर करते हैं तो जातक के निजकृत पूर्व के अशुभ कर्मों के फलस्वरूप उसके भौतिक सुखों यानी मकान व वाहन आदि में परेशानी पैदा होती है जिसका संकेत कुण्डली में शनिदेव की स्थिति दिया करती है। जिसकी वजह से उसके कारोबार में फर्क पड़ता है। उसकी परेशानी बढ़ जाती है। परेशानियों के बढ़ने से जातक को शारीरिक कष्ट की भी प्राप्ति होती है। अर्थात् चतुर्थ भाव की ढैय्या में मकान खरीदना या बेचना नहीं चाहिए। साथ ही अपने व्यवसाय में भी कोई विशेष परिवर्तन नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति अधिकतर शांत रहते हैं और धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं, ऐसे व्यक्तियों को चतुर्थ ढैय्या में किसी भी प्रकार की परेशानी पैदा नहीं होती है। और जो व्यक्ति नया कार्य करते हैं, उन्हें परेशानी पैदा होती है।

अष्टम भाव की ढैय्या
जब शनिदेव चंद्र कुंडली अर्थात जन्म राशि के अनुसार अष्टम भाव से गोचर करते हैं तो ढैय्या देते हैं, अष्टम ढैय्या चतुर्थ की ढैय्या से ज्यादा अशुभ फलों का संकेत देती है। मेरे अनुभव के अनुसार जब यह ढैय्या शुरू होती है तो जातक को शुभ फल की प्राप्ति होती है और वह नया कार्य करने लगता है। परन्तु अष्टम ढैय्या नया कार्य शुरू कराकर बीच में ही धोखा दे जाती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अष्टम ढैय्या में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। क्योंकि अष्टम भाव से शनिदेव तीसरी दृष्टि से दशम भाव को सप्तम दृष्टि से द्वितीय भाव को और दशम दृष्टि से पंचम भाव को देखता है। अष्टम ढैय्या सबसे पहले कारोबार में परेशानी पैदा करती है। जिसकी वजह से जातक के निजी कुटुंब और धन पर बुरा असर पड़ता हैं तथा धन की वजह से जातक के संतान के ऊपर भी कुप्रभाव पड़ता है। अष्टम ढैय्या में देश, काल व पात्र के अनुसार संतान को कष्ट अथवा संतान से कष्ट प्राप्त होता है। अत: जातक को अष्टम ढैय्या में कोई भी नया कार्य, यानी बैंक आदि से कर्ज या जमीन-जायदाद का खरीदना-बेचना या पिता की संपत्ति को बांटना नुकसानदायक होता है। अत: इस ढैय्या के दौरान ये कार्य नहीं करने चाहिए। अष्टम ढैय्या में जो व्यक्ति धार्मिक कार्य, समुद्र स्नान व तीर्थ यात्रा आदि करता है और परमात्मा को हाजिर-नाजिर रखता है तो उस व्यक्ति को अष्टम ढैय्या में किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होती है। जो व्यक्ति परमात्मा में विश्वास नहीं करते हैं, उन्हें शनिदेव लालच देकर ऐसा फंसा देता है कि वे जीवन भर परेशान रहते हैं। फिर भी याद रहे, इस प्रतिकूल परिस्थिति के पीछे भी संबंधित जातक के पूर्वकृत अशुभ कर्म ही रहते हैं।

ढैय्या किसको और कब
• शनिदेव जब कर्क एवं वृश्चिक राशि में भ्रमण करते हैं तो मेष राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
• शनिदेव सिंह व धनु राशि में गोचर में भ्रमण करते हैं, तब वृष राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
• कन्या व मकर राशि में शनिदेव के भ्रमणकाल में मिथुन राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
ढैय्या का विचार
• तुला एवं कुम्भ राशि में गोचर में शनिदेव जब भ्रमण करते हैं तब कर्क राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
• गोचर भ्रमणकाल में शनिदेव जब वृश्चिक और मीन राशि में आते हैं तो सिंह राशि वालों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
• शनिदेव जब धनु और मेष राशि में स्थित होते हैं तो कन्या राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
• शनिदेव जब मकर एवं वृष राशि में गोचर में स्थित रहते हैं तब तुला राशि के जातकों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
• गोचर में शनिदेव जब कुंभ और मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं तो वृश्चिक राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
• शनिदेव जब गोचर में मीन तथा कर्क राशि में स्थित रहते हैं तब धनु राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
• जब शनिदेव मेष और सिंह राशि से गोचर करते हैं तब मकर राशि वालों को शनिदेव की ढैय्या प्रारम्भ होती है।
• गोचर में शनिदेव जब वृष और कन्या राशि में आते हैं तब कुम्भ राशि वालों को शनिदेव की ढैय्या प्रारम्भ होती है।
• शनिदेव जब गोचर में मिथुन व तुला राशि में गोचर करते हैं तब मीन राशि वाले लोगों को शनिदेव की ढैय्या प्रारम्भ होती है।

ढैय्या में व्यक्ति को धैर्य से काम लेना चाहिए क्योंकि ढैय्या में व्यक्ति को अपने सगे संबंधियों की भी मदद कम से कम मिलती है। इसलिए स्वयं सभी कार्य करने पड़ते हैं। इसलिए प्रतिदिन प्रात:काल चिड़ियों को दाना डालें, उनके लिए पानी रखें। चींटियों को आटा शक्कर डालें और स्नान आदि से निवृत होकर सूर्य को प्रतिदिन जल दें। बुरे कार्यों से बचें। ढैय्या में सफलता प्राप्त होगी। वैसे आगे उपाय विस्तार से लिखे हुए हैं परंतु उपरोक्त बातें दैनिक जीवन में जरूरी हैं।

मानवता के संदेश वाहक श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

दिव्य आत्माओं द्वारा रचित एवं उच्चरित गुरु ग्रन्थ साहिब आध्यात्मिक काव्य का एक ऐसा देदीप्यमान संग्रह है, जो न केवल अध्यात्म वरन् जीवन संघर्ष के हर क्षेत्र में मानवीय आदर्शो को अक्षुण्ण रखने का संदेशवाहक है। एक ऐसा संदेशवाहक जिसके संदेश किसी खास धर्म,जाति या देश के लिए न होकर समूची मानवजाति के लिए है। ऐसे बहुलवादीधर्मग्रन्थ का संपादन पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने किया। गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पहला प्रकाश 16अगस्त 1604को हरिमंदिरसाहिब अमृतसर में हुआ। पंथ की बुजुर्ग और महान शख्सियत बाबा बुढ्ढाजी को पहला ग्रन्थी नियुक्त किया गया। मगर 1705में दमदमा साहिब में दशमेशपिता गुरुगोविंदसिंह जी ने गुरु तेगबहादुरजी के 116शबदजोडकर इसको पूर्ण किया। इस वर्ष हम गुरुग्रन्थ साहिब के समापनाकी 300वींवर्षगांठ मना रहे हैं।


गुरु ग्रन्थ साहिब का संकलन गुरु अर्जुन देव जी की मानव जाति की बडी देन थी। उस वक्त सामाजिक, धार्मिक, नैतिक मूल्यों का निरन्तर क्षरण हो रहा था। मानव हृदय नित अशांत व चिंतातुर हो रहा था। धर्मान्ध मुगल सत्ता से पीडित हर कोई प्रतिक्रिया, प्रतिहिंसा और प्रतिकार की आग में जल रहा था। कथित रचनाकार स्वलिखित आडंबर प्रेरित रचनाओं को गुरुओं की रचना बताकर पेश कर रहे थे। ऐसे में गुरु उपदेशों में अपने जीवन की सार्थकता ढूंढ रहे असंख्य लोगों में भ्रम उत्पन्न हो रहा था। साथ ही तत्कालीन सामाजिक परिवेश में जरूरत थी, ऐसे ग्रंथ की जो आत्म-संशय से जूझ रहे अल्पशिक्षितलोगों को भी अध्यात्मिक मार्गदर्शन दे सके। गुरु अर्जुन देव जी ने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए अपने पूर्ववर्ती गुरुओं की वाणी को संकलित किया। उनको राग के अनुसार बांट कर परिष्कृत किया। अन्य किसी धर्म के पावन ग्रन्थ में, वे चाहे कितने भी पूजित-वदित क्यों न हो, अन्य वाणियों को स्थान नहीं मिला। मगर गुरु ग्रन्थ साहिब में सर्वधर्म सद्भाव का ऐसा स्फुरण है, जिसके लिए जाति-पाति, धर्म के तमाम भेद गौण है। गौरतलब है कि गुरुग्रन्थ साहिब में मात्र सिख गुरुओं के ही उपदेश नहीं हैं, वरन् 30अन्य हिंदू और मुस्लिम भक्तों की वाणी भी सम्मिलित है। जहां जयदेवजीऔर परमानंदजीजैसे ब्राह्मण भक्तों की वाणी है, वहीं जाति-पांति के आत्महंताभेदभाव से ग्रस्त तत्कालीन समाज में हेय समझे जाने वाली जातियों के प्रतिनिधि दिव्य आत्माओं जैसे कबीर जी, रविदासजी,नामदेव जी, सैणजी, सघनाजी, छीवाजी,धन्नाकी वाणी भी सम्मिलित है। पांचों वक्त नमाज पढने में विश्वास रखने वाले शेख फरीद के श्लोक भी गुरुग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। अपनी भाषायी अभिव्यक्ति, दार्शनिकता,संदेश की दृष्टि से गुरु ग्रन्थ साहिब अद्वितीय है। इसकी भाषा की सरलता, सुबोधता,सटीकताजहां जनमानस को आकर्षित करती है। वहीं संगीत के सुरों व 31रागों के प्रयोग ने आत्मविषयकगूढ आध्यात्मिक उपदेशों को भी मधुर व सारग्राही बना दिया है। गुरु ग्रन्थ साहिब जाति, मत, पाखंड और परिपाटी से ऊपर उठने का संदेशवाहक है। यह ग्रन्थ समूची मानवजाति को एक पिता ऐकसके हम बारिक समझ कर साम्प्रदायिक सौहार्द और भाईचारे का सन्देश देता है। इस दिव्य संकलन के सारगर्भित उपदेश धार्मिक सद्भावना की ज्योति जलाते हैं और मानव मात्र में अ‌र्न्तनिहितएकता की ओर हमारा ध्यान खींचते हैं। खत्री ब्राह्मण सूद वैस,उपदेश चहुवरना को साझा, गुरमुखनाम जपैउघरेसै,कल महिघटिघटिनानक माझा।


गुरु ग्रन्थ साहिब के अंदर सभी शब्दों में परमपिता परमेश्वर की सर्वव्यापकता,अनेक रूपता को चित्रित किया गया है। गुरुवाणीअनुसार परमात्मा किसी एक धर्म, देश, मत या भाषा से बंधा नहीं है। वास्तव में जब हम परमेश्वर की अनंतता को सीमाओं में बांध देते है,तभी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब में उल्लेखितदार्शनिकताकर्मवाद को मान्यता देती है। गुरुवाणीके अनुसार व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार ही महत्व पाता है। समाज की मुख्य धारा से कटकर संन्यास में ईश्वर प्राप्ति का साधन ढूंढ रहे साधकों को गुरुग्रन्थ साहिब सबक देता है। हालांकि गुरु ग्रन्थ साहिब में आत्मनिरीक्षण,ध्यान का महत्व स्वीकारा गया है, मगर साधना के नाम पर परित्याग, अकर्मण्यता, निश्चेष्टताका गुरुवाणीविरोध करती है। गुरुवाणीके अनुसार ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख होकर जंगलों में भटकने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर हमारे हृदय में ही है, उसे अपने आन्तरिक हृदय में ही खोजने व अनुभव करने की आवश्यकता है।


फरीदाजंगल-जंगल किया भवहिवणिकंडा मोडेहिवरनीरब हि आलीअे,जंगल निआठुठेहि॥ईश्वरीय प्रेम के दिव्य संदेश के साथ-साथ गुरुग्रन्थ साहिब हमें अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति भी उत्तरदायी होने की सीख देता है। गुरुवाणीब्रह्मज्ञान से उपजी आत्मिक शक्ति को लोककल्याण के लिए प्रयोग करने की प्रेरणा देती है। मधुर व्यवहार और विनम्र शब्दों के प्रयोग द्वारा हर हृदय को जीतने की सीख दी गई है। मिठत नीवी नानकागुण चंगिआईयातत गुरु ग्रंथसाहिबके अंदर धर्म के नाम पर आडंबरों आधार विहीन रीतिरिवाजों और अंधविश्वासों पर कडा प्रहार किया गया है। साथ ही सामाजिक बुराइयों के खिलाफ चेतना भी कायम की गई है।


इस प्रकार गुरु ग्रन्थ साहिब जहां तत्कालीन सामाजिक धार्मिक राजनैतिक परिस्थितियों का आइना है, गुलामी और अत्याचार सहने को अपनी नियति मान चुके लोगों के सोए हुए स्वाभिमान व आत्मबल को जगाने की कोशिश थी। वहीं आधुनिक संदर्भ में इनके सारगर्भित उपदेश उतने ही प्रासंगिक हैं। जीवन क्षेत्र में आने वाली किसी कठिनाई,निराशा या संशय की स्थिति में हम गुरुग्रंथ साहिब से मार्गदर्शन ले सकते हैं।

रामायण – उत्तरकाण्ड - अभ्यागतों की विदाई

अब श्री रघुनाथ जी नियमपूर्क प्रतिदिन राजसभा में बैठकर राजकाज संभालकर शासन चलाने लगे। कुछ दिन पश्‍चात् राजा जनक विदा होकर मिथिला के लिये रवाना हो गये। इसके पश्‍चात् कैकेय नरेश युधाजित, काशिराज प्रतर्दन तथा अन्य आगत राजा महाराजा भी विनयपूर्वक अयोध्या से विदा हुये। फिर उन्होंने सुग्रीव, हनुमान, अंगद, नील, नल, केसरी कुमुद, गन्धमादन, सुषेण, पनस, वीरमैन्द, द्विविद, जाम्बवन्त, गवाक्ष, विनत, धूम्र, बलीमुख, प्रजंघ, सन्नाद, दरीमुख, दधिमुख, इन्द्रजानु तथा अन्य वानर यूथपतियों को नाना प्रकार के वस्त्राभूषण-रत्‍नादि देकर सम्मानित किया। फिर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके उन्हें विदा किया।

फिर वे विभीषण को विदा करते हुये उनसे बोले, "राक्षसराज! तुम धर्मपूर्वक लंका पर शासन करना। तुम धर्मात्मा हो। मुझे विश्‍वास है कि तुम कभी धर्म विरुद्ध कोई कार्य नहीं करोगे। अपनी प्रजा का पुत्रवत् पालन करना।"

विदा होने से पहले हनुमान बोले, "प्रभो! मुझे ऐसा वर दीजिये कि आपके प्रति मेरी अटूट भक्‍ति सदा बनी रहे। आपके सिवा कहीं और मेरा आन्तरिक अनुराग न हो। इस पृथ्वी पर जब तक राम कथा प्रचलित रहे, तब तक मेरे प्राण इस शरीर में ही बसे रहें।" हनुमान की बात सुनकर श्रीराम ने उन्हें हृदय से लगा लिया और बोले, "ऐसा ही होगा।" संसार में जब तक मेरी कथा प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारे प्राण भी तुम्हारे शरीर में बने रहेंगे। तुमने जो उपकार किये हैं, उनके लिये मैं सदा तुम्हारा ऋणी रहूँगा।" फिर वे सब लोग श्रीराम का गुणगान करते हुये वहाँ से विदा हुये।

विभीषण, सुग्रीव, हनुमान आदि के विदा हो जाने पर भरत बोले, "राघव! आपको राजसिंहासन पर बैठे एक मास हुआ है। इस अवधि में सभी लोग स्वस्थ और निरोग दिखाई देते हैं। बूढ़े आदमियों के पास भी मृत्यु फटकने में हिचकती है। सभी बाल-युवा नर-नारियों के शरीर हृष्ट-पुष्ट और कान्तिमय प्रतीत होते हैं। पुरवासियों में ैनन्च की लगर दौड़ रही है। मेघ समय पर अमृत के समान जल बरसाते हैं। हवा ऐसी चलती है कि उसका स्पर्श सुखद और शीतल जान पड़ता है।" भरत की ये बातें सुनकर श्रीराम अत्यन्त प्रसन्न हुये।