'मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा यार कि राजेश ने सोनम के अलावा किसी और से शादी कर ली। आदमी इतना बदल कैसे जाता है?' सचिन के मुँह से यह वाक्य सुनकर अब तक चुपचाप बैठे मनीष ने कहा, 'हाँ यार, राजेश और सोनम को हम लोग दो जिस्म एक जान समझा करते थे। कॉलेज के दिनों में कैसे दोनों के चेहरे हमेशा फूल की तरह खिले रहते थे।
कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ उनके प्रेम को अपना आदर्श मानते थे। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि राजेश सोनम के अलावा किसी और से शादी करने के बारे में सोच तक सकता है। 'सोनम और राजेश की यह कहानी अकेले उनकी ही नहीं है। कॉलेज जाने वाला हर लड़का और लड़की प्रेम के इस दरिया में डुबकियाँ लगाना चाहते हैं। यह बात अलग है कि ज्यादातर की परिणति वही होती है, जो राजेश और सोनम के प्यार की हुई। कॉलेज के संबंध बेवफाई की एक अंतहीन दास्ताँ है। यह कोई नया ट्रेंड भी नहीं है। हमेशा से ऐसा होता रहा है।
यह बात अलग है कि कॉलेज जाने वाला हर लड़का और लड़की प्रेम करना चाहते हैं, लेकिन कुछ ही किस्मत वाले होते हैं जो तमाम बाधाओं के बावजूद कॉलेज के दिनों के कस्मे-वादों को उम्र भर हमसफर बनकर निभाते हैं। एक शायर ने भी कहा है- 'ये इश्क नहीं आसाँ इतना तो समझ लीजै, एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।' ये दो पंक्तियाँ प्यार की कठिन डगर को बयान करने के लिए काफी हैं। फिर भी सब कुछ जानते हुए भी लड़के-लड़कियाँ इस दरिया में कूद ही जाते हैं।
समाज में लैला-मजनू के किस्से बेशक ध्यान से सुने जाते हों, लेकिन समाज को यह कतई मंजूर नहीं कि इस तरह की प्रेम कहानी उसका हिस्सा भी बने। फिर भी गली-मोहल्लों से लेकर कॉलेजों तक प्यार में दिल लूटने-लुटाने वालों की कमी नहीं रहती। हर लड़के-लड़की का ख्वाब होता है कि उसके सपनों का हमसफर उसे कहीं जिंदगी की राहों पर टकरा जाए। इसी कामना के वशीभूत वे एक-दूसरे में अपने प्यार का प्रतिबिंब तलाशते हैं। जहाँ भी इस प्रतिंिंबब की झलक दिखाई देती है, वहीं नजदीकियाँ बढ़ने लगती हैं। ये नजदीकियाँ प्यार में बदलती हैं, जिसकी परिणति अक्सर बेवफाई के रूप में सामने आती है।
वास्तव में देखा जाए तो प्यार की अग्निपरीक्षा शादी ही है। पर देखा गया है कि प्रेम की गाड़ी में सवार होकर चलने वाले इस अग्निपरीक्षा में अक्सर असफल हो जाते हैं। कॉलेज के प्रेम संबंधों का अक्सर दुखांत होता है। ऐसा आखिर क्यों है? यह सवाल प्रेम संबंधों के समाजशास्त्र में एक फाँस की तरह अटका हुआ है? कॉलेज में जो लड़का-लड़की एक पल भी एक-दूसरे के बगैर चैन से नहीं रह पाते, कॉलेज छोड़ते ही अक्सर एक-दूसरे को यूँ भूल जाते हैं जैसे ट्रेन में सफर के यात्री अपने स्टेशन के प्लेटफार्म पर उतरते ही अजनबी हो जाते हैं। अगर किसी का प्यार किसी तरह से शादी की मंजिल तक पहुँचता भी है, तो देखने में आता है कि वह अक्सर टूट जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है?
वास्तव में इसकी प्रमुख वजह यही है कि ये रिश्ते केवल दिल की भावनाओं पर टिके होते हैं। भावनाएँ भी ऐसी, जो एक हल्की सी ठोकर में ही चकनाचूर हो जाएँ। अक्सर कहा जाता है कि भावनात्मक आदमी अपने जीवन में कभी खुश नहीं रह सकता। यह बात सोलह आने सच है। भावनाएँ सपनों की आधारशिला पर टिकी होती हैं।
दूसरी तरफ सपनों का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। जब एक लड़का और एक लड़की प्रेम के मोहपाश में बँधते हैं, तो उनकी दुनिया सिर्फ और सिर्फ अपने तक ही सीमित होकर रह जाती है। वे सुबह सोकर उठने से लेकर रात को सोने तक केवल एक-दूसरे के बारे में ही सोचते हैं। इतना ही नहीं, सोने से पूर्व भगवान से यह प्रार्थना करना नहीं भूलते कि रात को सपने में उसका प्रिय दिखाई दे। प्यार को अगर नशा कहा गया है तो यह सही ही कहा गया है। जिस तरीके से नशेड़ी को दुनियादारी से कोई लेना-देना नहीं होता ठीक उसी तरह प्रेमी युगल का समाज के बंधनों अथवा रीति-रिवाजों से कोई सरोकार नहीं होता। यह प्यार सिर्फ 'टाइमपास' के लिए होता है। कॉलेज के दिनों में प्रेमी-प्रेमिकोमिकाओं की मुहब्बत मंजिल नहीं पाती अगर कोई जोड़ा शादी कर भी लेता है, तो ज्यादातर की शादी टूट जाती है क्योंकि शादी के बाद वे एक-दूसरे का वास्तविक स्वरूप देखते हैं, जो अक्सर कल्पनाओं से भिन्न होता है।
यही वह चीज होती है जो दोनों को अलगाव की नींव तक ले जाती है। जो लोग वास्तविकता से समझौता कर लेते हैं, वे तो सफल हो जाते हैं। जो सिर्फ अपनी कल्पनाओं को ही साकार देखना चाहते हैं, उनके बीच दूरियाँ बढ़ने लगती हैं। यही दूरी आखिर में दोनों को अलगाव की दहलीज तक खींचकर ले जाती है। यह अलगाव कई बार सामान्य अलगाव से अलग और उलझन भरा होता है। कहते हैं कि प्यार जब नफरत में बदल जाए तो वह ज्यादा खतरनाक होता है। यही वजह है कि जब दो प्रेमियों के बीच शादी के बाद अलगाव होता है तो उसकी प्रक्रिया काफी कष्टदायी होती है।
इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हमारे सामने हैं। ये उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि सपनों का टूटना आदमी को पागलपन की हद तक पहुँचा देता है। कॉलेज के ऐसे प्रेम-संबंध जो शादी की परिणति तक पहुँचते हैं, उनमे से नब्बे फीसदी अलगाव की भेंट चढ़ जाते हैं। यह सारा खेल सपनों के बनने एवं उनके टूटने पर टिका है। सच कहा जाए तो प्यार की दुनिया स्वप्निल दुनिया है। जब तक जमीनी सच्चाई से इसका मेल-मिलाप नहीं होता, तब तक इस दुनिया पर खतरे के बादल मँडराते रहते हैं।
शादी से पूर्व लड़की ख्वाब देखती है कि मेरा प्रेमी मुझे राजकुमारी की तरह रखेगा। लड़का सोचता है कि प्रेमिका मेरे सारे दुःखों को एक ही झटके में समाप्त कर देगी। लेकिन शादी के बाद ठीक इसके विपरीत होता है। इस विपरीत परिस्थिति से वे सामंजस्य नहीं बिठा पाते और गंभीर परिणाम भुगतते हैं। अतः कितना अच्छा हो कि यदि कल्पनाओं पर आधारित प्रेम को हकीकत की तराजू पर पहले ही तौलकर देख लिया जाए।
14 फ़रवरी 2010
ये इश्क नहीं आसाँ...
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 2/14/2010 09:03:00 am 1 comments
'ये मेरा जीवन तेरे लिए है'
'मेरे पति एक पत्रकार हैं। मैं उनसे बहुत प्यार करती हूँ। जब भी मैं उनकी बाँहों में होती हूँ तब मुझे एक अजीब सी अनुभूति होती है। आज हमारी शादी के तीन साल हो गए हैं लेकिन मैं देख रही हूँ कि अब हमारे बीच में वह प्यार नहीं रहा जो पहले था। आजकल आलोक मुझसे ज्यादा अपने काम पर ध्यान देने लगे हैं। कभी-कभी लगता है वह मुझे बिल्कुल ही भूल गए हैं।
मेरे से बात करने के बजाय उन्हें अकेले में बातें करना ज्यादा अच्छा लगता है। बैठे-बैठे कुछ भी सोचा ही करेंगे, भले ही मैं उनके पास बैठकर उन्हें निहारा करूँ, उनका ध्यान इस ओर नहीं जाता। आखिर मैं थक गई हूँ।
अब मुझे तलाक चाहिए। यह बात जब मैंने उनको बताई तो वह मेरे सामने देखते ही रह गए। उन्होंने पूछा तुम क्यों मुझसे अलग होना चाहती हो। मैंने सिर्फ इतना कहा 'दुनिया में कुछ चीजें ऎसी भी होती हैं जिनका कोई कारण नहीं होता।'
उस दिन वह पूरी रात सोए नहीं। बस हर बार सिगरेट जलाकर कुछ ना कुछ सोचते रहे। मैंने सोचा कि शायद वह सुबह मुझसे कहेंगे कि 'मुझे माफ कर दो। अब मैं तुम्हें कभी कोई शिकायत का मौका नहीं दूँगा' लेकिन ऎसा कुछ भी नहीं हुआ। वह वैसी ही मुद्रा में थे जैसे वह रोज दिखते थे।
फिर भी उन्होंने मेरा दिल रखने के लिए कहा कि 'आखिर मैं क्या करूँ तुम्हारे लिए? मैं उनके जवाब से संतुष्ट नहीं थी फिर भी मैंने कहा क्या आप मेरे लिए वह कर सकते हैं जो मैं चाहती हूँ।क्या?
'मान लो कि हम दोनों एक ऊँची पहाड़ी पर हैं। वहाँ पर एक बहुत बड़ा लाल गुलाब का फूल है। जो मुझे बहुत पसंद है लेकिन वहाँ पर सिर्फ वही शख्स पहुँच सकता है जो मौत को गले लगाना चाहता है तो क्या तुम मेरे लिए वह फूल लाकर दे सकते हो?
'मेरी प्रिया'
मुझे माफ कर देना क्योंकि मैं तुम्हारे लिए वह पहाड़ी गुलाब नहीं ला सकता। तुम उसे मेरी कमजोरी कहो या और कुछ लेकिन उस पहाड़ी पर पहुँचने पर या तो मेरी मृत्यु हो सकती है या मेरे शरीर का कोई अंग मुझसे अलग हो सकता है जिसकी मुझे बहुत बहुत जरूरत है।
इतना पढ़कर मेरे दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए फिर भी हिम्मत जोड़कर आगे पढ़ने लगी। तुम उसे मेरी कमजोरी समझ सकती हो लेकिन यह बात सही है कि मैं मेरे शरीर के हर एक हिस्से से बहुत प्यार करता हूँ क्योंकि मेरा हर एक अंग तुम्हारे लिए काम करता है। उसके बिना तुम भी बिल्कुल अधूरी हो।
प्रिया, तुम जब भी कम्प्यूटर का उपयोग करती हो तब तुम्हें समय का ख्याल नहीं रहता और फिर तुम्हारा सिर दुखने लगता है। मैं अपनी अँगुलियों को बचाना चाहता हूँ ताकि उस वक्त मैं तुम्हारा सिर और तुम्हारी थकी हुई अँगुलियों को दबाकर तुम्हें कुछ आराम दे सकूँ।
तुम कई बार ऑफिस जाते वक्त अपना लंच ले जाना भूल जाती हो या लंच में देर हो जाती है तो उसे तुम्हारे ऑफिस तक पहुँचाने की जिम्मेदारी मेरी होती है। इसलिए मैं अपने इन पैरों को भी बचाना चाहता हूँ ताकि में दौड़कर तुम्हारे लिए लंच सही समय पर पहुँचा सकूँ।
कभी-कभी चलते-चलते तुम रास्ते के पत्थरों को लात मार देती हो जिससे कई बार तुम्हारे पैरों में चोट लगी है। इसलिए मैं अपनी आँखों को सलामत रखना चाहता हूँ ताकि जब भी तुम चलो मेरी आँखें हमेशा तुम्हें रास्ता दिखाएँ।
तुम हमेशा कम्प्यूटर के नजदीक रहती हो जो आँखो के लिए अच्छी बात नहीं है। मैं अपनी आँखें भी इसलिए सलामत रखना चाहता हूँ कि मेरी इन्हीं आँखों की मदद से तुम्हारे बड़े-बड़े नाखून काट सकूँ जो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं और तुम्हारे सफेद बालों को छाँट सकूँ। तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हें मंदिर ले जा सकूँ।
तुम हमेशा घर में रहना पसंद करती हो और कभी-कभी तनावग्रस्त हो जाती हो इसलिए मैं अपने मुँह और जुबान को बचाना चाहता हूँ ताकि जब भी तुम तनावग्रस्त हो तब मैं मिमिक्री कर और चुटकुले सुनाकर तुम्हारा मन बहला सकूँ।
तुम्हें गुलाब बहुत पसंद है लेकिन बाग में गुलाब के फूल तोड़ते समय कभी-कभी तुम्हारे हाथों में काँटा चुभ जाता है और खून निकल आता है मैं अपने हाथों को इसलिए बचाना चाहता हूँ कि जब भी तुम्हें फूल की जरूरत हो मैं खुद अपने हाथों से गुलाब तोड़कर तुम्हारे बालों में लगा सकूँ।
इसलिए मेरी प्रिया, मैं वह पहाड़ वाला गुलाब तोड़ने की भूल कभी नहीं करूँगा। क्योंकि मैं जीना चाहता हूँ सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ। 'आई लव यू व्हेरी मच।' यह पढ़कर मेरी आँखें भर आईं। आगे लिखा था अगर तुमने पत्र का मजमून पढ़ लिया हो तो दरवाजा खोलना मत भूलना।
तुम्हारा आलोक
मैंने दरवाजा खोला। सामने देखा तो वह अपने दोनों हाथों में दूध की बोतल और ब्रेड के पैकेट लिए खड़े थे। उन्हें मालूम था कि अब तक न तो मैंने कुछ खाया होगा और ना ही कुछ बनाया होगा। अब मुझे पूरा यकीन हो गया था कि वह मुझे बहुत-बहुत प्यार करते हैं और मुझे जिस तरह के हसबैंड की जरूरत थी, उससे कहीं अधिक अच्छे हैं।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 2/14/2010 08:32:00 am 0 comments
आ तुझे चूम लूँ मैं...
"रुखसार पर है रंगे हया का फरोग
बोसे का नाम मैंने लिया वो निखर गए"
प्यार का इजहार, इकरार और फिर रोजाना की मुलाकातें, एक-दूसरे को जानने-समझने की कोशिश, कभी रूठना, कभी मनाना और भी न जाने क्या-क्या...! लेकिन इसी राह में कुछ अनकही बातें ऐसी भी होती हैं, जो बार-बार दिल में कसक पैदा करती हैं। दिल कहता है बस उनके साथ, उनके हाथों में हाथ लेकर, उनकी आँखों में आँखें डालकर देखते रहें और समझते रहें अनकहे शब्दों की जुबाँ।
सिर्फ उनके पास बैठने और निगाहों की जुबाँ समझने तक ही आपका दिल नहीं रुकता। जैसे-जैसे प्यार परवान चढ़ने लगता है आपकी अपेक्षाएँ बढ़ने लगती हैं। अब आप सिर्फ निगाहों में ही बातें नहीं करते आपके दिल में उठ रही लहर आपको इससे आगे बढ़ने के लिए उत्तेजित करती है। अब आप उन्हें अपनी बाँहों में भर लेना चाहते हैं, उन्हें चूमना चाहते हैं। लेकिन ये क्या? थोड़ा ठहरिए। क्या आप ठीक से चुंबन लेना जानते हैं?
हुंह... इसमें कौनसी बड़ी बात है?' यही सोच रहे हैं न आप। लेकिन जनाब आपको बता दूँ कि चुंबन लेना भी एक कला है और यदि आप इस कला में माहिर हैं तो इससे न सिर्फ आप संतुष्ट होंगे बल्कि आपके पार्टनर को भी अच्छा लगेगा।
अच्छा तो अब जरा आपको बता दें कि ये कला कैसे सीखी जाए लेकिन इसे सीखने के पहले एक बात का जरूर ध्यान रखें कि किसी भी प्रकार की जबर्दस्ती आपके प्यार में दरार डाल सकती है। अपनी उत्तेजना को काबू में रखें और प्रेम की मर्यादा बनाए रखें अन्यथा बाद में पछताने के सिवा कुछ नहीं रह जाएगा।
लीजिए सबसे पहली टिप्स। जब आप उनके साथ किसी रोमांटिक सी जगह पर बैठे हैं और आपका दिल बार-बार उन्हें चूमने के लिए कह रहा है लेकिन आप शायद इसलिए हिचक महसूस कर रहे हैं कि कहीं वो आपको गलत न समझ लें।
ना-ना इसमें इतना हिचकने वाली बात नहीं है। हो सकता है शायद उनके मन में भी यही हो बस इसे कम्प्लीट रूप देने की जरूरत है। क्या करें इसके लिए? उन्हें अपने करीब लाएँ और उनके कंधे या कमर में हाथ डालकर बैठे रहें। कुछ देर इस स्थिति में बैठे रहने के बाद उनका चेहरा अपने हाथों में लेकर उन्हें लगातार देखते रहें। एक्शन का रिएक्शन होगा। यानी उनकी भावनाएँ भी उभरकर सामने आने लगेंगी। अब फिर होना क्या है? वैसे भी जब आप इतने रोमांटिक तरीके से बैठे हैं तो चुंबन तो स्वाभाविक है।
जब आप उन्हें चूम रहे हैं तो आपके होंठों की क्या स्थिति हो, अब जरा इस पर बात कर ली जाए। उनके होंठों पर चुंबन लेते समय आप दोनों के होंठ कुछ इस तरह से हों कि दोनों कम्फर्टेबल हों तो आप इसे अच्छे से अंजाम दे पाएँगे। यानी आपका ऊपरी होंठ उनके ऊपरी होंठ के ऊपर हो और निचला उनके निचले होंठ के अंदर। हाँ थोड़ा इस बात का भी ध्यान रखें कि आपके सिर विपरीत दिशाओं में थोड़े झुके हों और आपकी नाक एक-दूसरे से नहीं टकराए।
अपने होंठों को बिलकुल वैसी ही गति दें जैसे आप किसी च्यूइंगम को चबा रहे हों या फिर किसी गोली को चूस रहे हों। अं.... वैसे ये कोई बताने वाली बात नहीं है क्योंकि ये अपने आप ही हो जाएगा।
कुछ और रोमांटिक बनाने के लिए उन्हें अपने से थोड़ा दूर करें और फिर करीब खींचकर चूमें। अपनी जीभ उनके होंठों पर फिराएँ। उनके गालों पर, ठोढ़ी पर और गर्दन पर चुंबन लें। ये कुछ ऐसे करें कि आपकी भावनाएँ स्पष्ट रूप से नजर आएँ। और हाँ इस बात का ध्यान जरूर रखें कि आपकी भावनाएँ पवित्र हों, किसी प्रकार का गलत विचार आपके मन में न हो। यदि ऐसा हुआ तो यह आपके चेहरे पर साफ तौर से झलकेगा और ये बात आपका साथी जरूर समझ जाएगा।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 2/14/2010 08:30:00 am 0 comments
रामायण – उत्तरकाण्ड - च्यवन ऋषि का आगमन
एक दिन जब श्रीराम अपने दरबार में बैठे थे तो यमुना तट निवासी कुछ ऋषि-महर्षि च्यवन जी के साथ दरबार में पधारे। कुशल क्षेम के पश्चात् उन्होंने बताया, "महाराज! इस समय हम बड़े दुःखी हैं। लवण नामक एक भयंकर राक्षस ने यमुना तट पर भयंकर उत्पात मचा रखा है। उसके अत्याचारों से त्राण पाने के लिये हम बड़े-बड़े राजाओं के पास गये परन्तु कोई भी हमारी रक्षा न कर सका। आपकी यशोगाथा सुनकर अब हम आपकी शरण आये हैं। हमें आशा है आप निश्चय ही हमारा भय दूर करेंगे।"
ऋषियों के यह वचन सुनकर सत्यप्रतिज्ञ श्री राम बोले, "हे महर्षियों! यह समस्त राज्य और मेरे प्राण भी आपके लिये ही हैं। मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं उस दुष्ट के वध का उपाय शीघ्र ही करूँगा। आप मुझे उसके विषय में विस्तार से बतायें।" च्यवन ऋषि बोले, "हे राजन्! सतयुग में लीला नामक दैत्य का पुत्र मधु बड़ा शक्तिशाली और बुद्धिमान राक्षस था। उसने भगवान शंकर की तपस्या करके उनसे अपने तथा अपने वंश के लिये एक ऐसा शूल प्राप्त किये था जो शत्रु का विनाश करके वापस उसके पास आ जाता था। उन्होंने यह भी वर दिया कि जिसके हाथ में जब तक यह शूल रहेगा, तब तक वह अवध्य रहेगा। उसी मधु का पुत्र लवण है जो अत्यन्त दुष्टात्मा है और उस शूल के बल पर निरन्तर हमें कष्ट देता है। वह प्रायः किसी न किसी ऋषि, मुनि, तपस्वी को अपने आहार बनाता है। वन के प्राणियों, मनुष्यादि किसी को भी वह नहीं छोड़ता।"
यह सुनकर राम ने सब भाइयों को बुलाकर पूछा, "इस राक्षस को मारने का भार कौन अपने ऊपर लेना चाहता है?" यह सुनकर शत्रुघ्न बोले, "प्रभो! लक्ष्मण ने आपके साथ रहते हुये बहुत से राक्षसों का संहार किया है। भैया भरत ने भी आपकी अनुपस्थिति में नन्दीग्राम में रहते हुये अनेक दैत्यों को मौत के घाट उतारा है। इसलिये लवणासुर से निपटने का कार्य मुझे सौंपने की कृपा करें।"
श्री राम बोले, "ठीक है, तुम ही लवणासुर का संहार करो और उसे मारके मधुपुर में अपना राज्य सथापित करो। मैं तुम्हें वहाँ का राजसिंहासन सौंपता हूँ।" फिर उन्होंने शत्रुघ्न को एक अद्भुत अमोघ बाण देकर कहा, "इस अद्भुत बाण से ही मधु और कैटभ नामक राक्षसों का विष्णु ने वध किया था। इससे लवणासुर अवश्य मारा जायेगा। एक बात का ध्यान रखना कि वह अपने शूल को महल के अन्दर एक प्रकोष्ठ में रखकर नित्य उसका पूजन करता है। जब वह तुम्हें अपने महल के बाहर दिखाई दे तभि तुम उसे युद्ध के लिये ललकारना। अभिमान के कारण वह तुमसे युद्ध करने लगेगा और शूल के लिये महल के अन्दर जाना भूल जायेगा। इस प्रकार वह रणभूमि में तुम्हारे हाथ से मारा जायेगा।"
बड़े भअई की आज्ञा पाकर शत्रुघ्न ने विशाल सेना लेकर श्रीराम द्वारा दिय गये निर्देशों के अनुसार लवणासुर को मारने की योजना बराई। उन्होंने सेना को ऋषियों के साथ आगे भेज दिया। एक माह पश्चात् उन्होंने अपनी माताओं, गुरुओं और भाइयों की परिक्रमा एवं प्रणाम कर अकेले ही प्रस्थान किया।
Posted by Udit bhargava at 2/14/2010 08:20:00 am 0 comments
कैसे बनाएँ रोबोटिक्स में करियर?
मैं रोबोटिक्स के क्षेत्र में करियर बनाना चाहता हूँ। कृपया मार्गदर्शन दें।
- रोबोटिक्स कम्प्यूटर विज्ञान की वह शाखा है जिसमें यह सीखा जाता है कि कम्प्यूटर में आदमी जैसी बुद्धि कैसे आए। रोबोटिक्स का उद्देश्य ऐसे रोबोट्स बनाना है, जो समस्याओं को हल कर सके। रोबोट तकनीक के अध्ययन के लिए इंजीनियरी डिग्री आवश्यक है। यदि आप रोबोटिक्स में डिजाइनिंग तथा कंट्रोल में विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करना होगी।
कंट्रोल तथा हार्डवेयर में डिजाइनिंग के लिए इलेक्ट्रिकल या इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की बी-टेक डिग्री जरूरी है। रोबोटिक्स में दिलचस्पी रखने वाले छात्र गणित में अच्छे होने चाहिए। उनमें सृजनात्मक योग्यता की भी आवश्यकता होती है। रोबोटिक्स से संबंधित पाठ्यक्रम इन संस्थानों में उपलब्ध हैं- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बंगलुरु/ इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, दिल्ली/ कानपुर/मुंबई/ चेन्नई/ खड़गपुर/ गुवाहाटी तथा रुड़की। यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद/ बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस, पिलानी।
Labels: मनपसंद करियर
Posted by Udit bhargava at 2/14/2010 07:46:00 am 0 comments
पेट दर्द के घरेलू नुस्खे
1। अजवायन को तवे पर सेंक कर फाँकने से पेट दर्द में फायदा होता है।
2। अजवायन के चूर्ण में पिसा काला नमक मिला कर गर्म पानी के साथ लेने से पेट की तकलीफ दूर होती है।
3। सूखा अदरक चूसने से भी पेट दर्द में आराम होता है।
4। जीरा भूनकर चबाने से भी पेट दर्द में आराम मिलता है।
5। हींग को आधी कटोरी पानी में गला कर यह पानी पेट पर लगाने से आराम मिलता है।
6। बिना दूध की चाय पीने से पेट दर्द ठीक होता है।
Posted by Udit bhargava at 2/14/2010 07:03:00 am 0 comments
थाईलैंड की 'अतिथि देवो भवः' परंपरा
थाईलैंड में धार्मिक आस्था ज्यादा नजर आती है। वहाँ पर घरों और दुकानों के सामने छोटे-छोटे मंदिर दिखते हैं। भारत में जैसे घरों में तुलसी-चौरा होते हैं, वैसे ही वहाँ बुद्ध की प्रतिमा वाले छोटे-छोटे मंदिर होते हैं। वहाँ की पूजा परंपरा भारतीय परंपरा से मिलती-जुलती है। लोग कपड़े, फल, अगरबत्ती आदि चढ़ावे के साथ मंदिर जाते हैं। वहाँ करीब पैंतीस हजार बौद्ध मंदिर हैं।
फूकेट में पर्वत पर भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा है, जहाँ पहुँचने के लिए ऊँची पहाड़ी चढ़नी पड़ती है। फूकेट में ही बुद्ध की तीन मंजिला मंदिर है। वहाँ पर आस्था व्यक्त करने के लिए श्रद्धालु पटाखा चलाते हैं। पटाखा चलाने के लिए एक गुम्बद बना हुआ है। अतिथि सत्कार भी वहाँ सैलानियों को आकर्षित करता है। 'अतिथि देवो भवः' की परंपरा वहाँ भी है।
भगवान बुद्ध के अनुयायी वाले देश में हिन्दू मंदिर भी काफी हैं। वहीं गणेश जी, शंकर-पार्वती और गरूड़ की प्रतिमाएँ घरों और होटलों में दिखती हैं। बैंकाक में एक विशाल मॉल के सामने गणेश जी की प्रतिमा के सामने हिन्दुओं के साथ-साथ बौद्ध भी शीश नवाते दिखे। वहाँ भगवान की प्रतिमा के सामने दीये की जगह मोमबत्ती जलाने का चलन है।
भारत की तरह वहाँ भी भगवान की प्रतिमा पर फूल-माला चढ़ाने की परंपरा है। गेंदे के फूल की माला, सेवंती और गुलाब फूल चढ़ाए जाते हैं। अतिथि सत्कार की भी वहाँ विशेष परंपरा दिखी। एक रंग-बिरंगे फूल से अतिथियों का स्वागत किया जाता है। इस फूल की बेल नारियल के वृक्ष पर परजीवी होती है।
बैंकाक में बुद्ध की विशाल प्रतिमा भी लोगों को आकर्षित करती है। यह प्रतिमा पूरी तरह सोने की बनी है। थाईलैंड में सोने की पॉलिश वाली कई बौद्ध प्रतिमाएँ भी हैं। थाईलैंड गए साहित्यकारों व पत्रकारों का दल बैंकाक के जिस होटल में ठहरा था, वहाँ शंकर जी और पार्वती की प्रतिमा स्थापित थी। बैंकाक के सिलोम इलाके में कई हिन्दू मंदिर भी हैं, जहाँ शंख और घंटे की आवाज पूजा के दौरान गूंजती है। कुछ जगहों पर चर्च और मस्जिद भी दिखे। वहाँ सबसे उल्लेखनीय बात यह दिखी कि सड़क किनारे कोई भी मंदिर नहीं दिखा। मंदिरों में पार्किंग और शेड की व्यवस्था भी दिखी।
धर्म के प्रति आस्था के चलते यहाँ दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करने की परंपरा है। दुकानों में सामान की खरीदी के बाद दुकानदार ग्राहक को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता है। थाई में सुबह-सुबह अभिनंदन के लिए महिलाएँ सबातीखा और पुरुष सबातीक्राप शब्द का इस्तेमाल करते हैं। थाईलैंड में हाथी का विशेष महत्व है। घरों की दीवारों पर हाथी की आकृतियाँ देखने को मिलती हैं। पेंटिंग और वस्त्रों पर भी हाथी का चित्रांकन दिखता है। पटाया से करीब 20 किमी दूर नूनचुंग विलेज में हाथियों की प्रतियोगिता रोजाना आयोजित होती है।
वे पर्यटकों को विशेष मेहमान मानते हैं। यह प्रतियोगिता पर्यटकों को काफी आकर्षित करती है। पर्यटकों के मनोरंजन के लिए पटाया में टिफनी शो का आयोजन होता है। यह शो थाई, भारतीय और यूरोपीय देशों का मिलाजुला सांस्कृतिक समागम होता है। इसमें कलाकार तरह-तरह के रूप धारण कर नृत्य करते हैं। पटाया में पर्यटकों के मनोरंजन के लिए और भी कई तरह के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इन कार्यक्रमों के लिए टिकट के रूप में 500 से 1500 बाथ तक देना होता है।
Posted by Udit bhargava at 2/14/2010 06:23:00 am 0 comments


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