04 जनवरी 2010

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – कृष्णावतार



श्री शुकदेव जी बोले, “हे राजन्! जब कंस ने देवकी के छः बालकों मार डाला तब सातवें गर्भ में भगवान शेष जी देवकी के गर्भ में पधारे। इधर भगवान विष्णु ने अपनी योगमाया से कहा कि हे कल्याणी! तुम ब्रज में जाओ। वहाँ पर देवकी के गर्भ में मेरे अंशावतार शेष जी पहुँच चुके हैं। तुम उन्हें नन्द बाबा की पहली पत्नी रोहिणी के गर्भ में रख दो और स्वयं उनकी दूसरी पत्नी यशोदा के गर्भ में स्थित हो जाओ। तुम वहाँ दुर्गा, भद्रकाली, विजया, वैष्णवी, कुमुदा, चण्डिका, कृष्णा, माधवी, कन्या, माया, नारायणी, ईशायिनी, शारदा, अम्बिका आदि अनेक नामों से पूजी जाओगी। मैं भी अपने समस्त ज्ञान, बल तथा सम्पूर्ण कलाओं के साथ देवकी के गर्भ में आ रहा हूँ।


हे परीक्षित! इस तरह शेष भगवान के अवतार बलराम जी पहले देवकी के गर्भ में आये और फिर उनको योगमाया ने देवकी के गर्भ से निकाल कर रोहिणी के गर्भ में रख दिया। इसीलिये बलराम जी की दो माताएँ हुईं। इसके पश्चात् भगवान विष्णु स्वयं देवकी के गर्भ में आ पहुँचे।

भादों माह की अष्टमी तिथि थी। रोहिणी नक्षत्र था। अर्द्धरात्रि का समय था। बादल गरज रहे थे और घनघोर वर्षा हो रही थी। उसी काल में देवकी के गर्भ से भगवान प्रकट हुये। उनकी चार भुजाएँ थीं जिनमें वे शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किये हुये थे। वक्षस्थल पर श्री वत्स का चह्न था। कण्ठ में कौस्तुभ मणि जगमगा रही थी। उनका सुन्दर श्याम शरीर था जिस पर वे पीताम्बर धारण किये हुये थे। कमर में कर्धनी, भुजाओं में बाजूबन्द तथा कलाइयों में कंकण शोभायमान थे। अंग प्रत्यंग से अपूर्व छटा छलक रही थी जिसके प्रकाश से सम्पूर्ण बन्दीगृह जगमगा उठा। वसुदेव और देवकी विस्मय और हर्ष से ओत-प्रोत होने लगे। यह जान कर कि स्वयं भगवान उनके पुत्र के रूप में पधारे हैं उनके आनन्द की सीमा नहीं रही। बुद्धि को स्थिर कर दोनों ने भगवान को प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगे।

स्तुति करके देवकी बोलीं कि हे प्रभु! आपने अपने दर्शन देकर हमें कृतार्थ कर दिया। अब मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि आप अपने अलौकिक रूप को त्याग कर सामान्य बालक का रूप धारण कर लीजिये। भगवान ने देवकी से कहा, “हे देवि! अपने पूर्व जन्म में आप दोनों ने घोर तपस्या की थी और ब्रह्मा जी से वरदान में मुझे पुत्र रूप में माँगा था। अतः ब्रह्मा जी के वरदान को सत्य सिद्ध करने के लिये मैंने आप लोगों के पुत्र के रूप में अवतार लिया है।” फिर वे वसुदेव से बोले, “हे तात! मैं अब बालक रूप हो जाता हूँ। आप मुझे गोकुल में नन्द बाबा के यहाँ पहुँचा दीजिये। वहाँ पर मेरी योगमाया ने कन्या के रूप में यशोदा के गर्भ से जन्म लिया है। आप उसे यहाँ ले आइये। इतना कहकर उन्होंने बालक रूप धारण कर लिया।

भगवान की माया से वसुदेव की हथकड़ी-बेड़ी खुल गईं, पहरेदारों को गहन निद्रा व्याप्त गई, और कपाट भी खुल गये। वसुदेव बालक को लेकर गोकुल की ओर चले। बादल धीरे-धीरे गरज रहे थे। जल की फुहारें पड़ रहीं थीं। शेष जी अपना फन फैला कर छतरी बने हुये बालक को ढँके हुये थे। वसुदेव जी यमुना पार करने के लिये निर्भय होकर जल में घुस पड़े। भगवान के चरण को स्पर्श करने के लिये यमुना जी का जल चढ़ने लग गया। ज्यों-ज्यों वसुदेव बालक को ऊपर उठाते, त्यों-त्यों जल और भी ऊपर चढ़ता जाता। इस पर वसुदेव के कष्ट को जान कर भगवान ने अपने चरण बढ़ा कर यमुना जी को उसे छू लेने दिया और जलस्तर नीचे आ गया।

यशोदा जी अचेत होकर अपनी शैया पर सो रहीं थीं उन्हें नवजात कन्या के जन्म का कुछ भी पता नहीं था। वसुदेव ने अपने पुत्र को यशोदा की शैया पर सुला दिया और उनकी कन्या को अपने साथ बन्दीगृह ले आये। कन्या को देवकी की शैया पर सुलाते ही हथकड़ी-बेड़ी अपने आप लग गये, कपाट बन्द हो गये और पहरेदारों को चेत आ गया।

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – पूतना वध



शिशु के रोने की आवाज सुन कर पहरेदारों ने राजा कंस को देवकी के गर्भ से कन्या होने का समाचार दिया। कंस उसी क्षण अति व्याकुल होकर हाथ में नंगी तलवार लेकर बन्दीगृह की ओर दौड़ा। बन्दीगृह पहुँचते ही उसने तत्काल उस कन्या को देवकी के हाथ से छीन लिया। देवकी अति कातर होकर कंस के सामने गिड़गिड़ाने लगी, “हे भाई! तुमने मेरे छः बालकों का वध कर दिया है। इस बार तो कन्या का जन्म हुआ है। तुम्हारे काल की आकाशवाणी तो पुत्र के द्वारा होने की हुई थी। इस कन्या को मत मारो।”
देवकी के रोने गिड़गिड़ाने पर भी दुष्ट कंस का हृदय नहीं पिघला और उसने कन्या को भूमि पर पटक डालने के लिये ज्योंही ऊपर उछाला कि कन्या उसके हाथ से छूट कर आकाश में उड़ गई। वह आकाश में स्थित होकर अष्ट भुजा धारण कर के आयुधों से युक्त हो गई और बोली, “रे दुष्ट कंस! तुझे मारने वाला तेरा काल कहीं और उत्पन्न हो चुका है। तू व्यर्थ निर्दोष बालकों की हत्या न कर।” इतना कह कर योगमाया अन्तर्ध्यान हो गई। योगमाया की बातों को सुन कर कंस को अति आश्चर्य हुआ और उसने देवकी तथा वसुदेव को कारागार से मुक्त कर दिया।
तत्पश्चात् कंस ने अपने मन्त्रियों को बुला कर योगमाया द्वारा कही गयी बातों पर मन्त्रणा करने लगा। कंस के मूर्ख मन्त्रियों ने कहा, “हे राजन्! देवताओं ने यह धोखा दिया है इसलिये देवताओं का ही नाश करना चाहिये। ब्राह्मणों के यज्ञादि को बन्द करवा देना चाहिये। इन्द्र को तो आप कई बार परास्त कर ही चुके हैं इस बार आपके डर से छिपे हुये विष्णु को भी ढूंढ कर उससे युद्ध करना चाहिये और पिछले दस दिनों के भीतर उत्पन्न हुये सभी बालकों को भी मार डालना चाहिये।”
इधर गोकुल में नन्द बाबा ने पुत्र का जन्मोत्सव बड़े धूम-धाम से मनाया। ब्राह्मणों और याचकों को यथोचित गौओं तथा स्वर्ण, रत्न, धनादि का दान किया। कर्मकाण्डी ब्राह्मणों को बुला कर बालक का जाति कर्म संस्कार करवाया। पितरों और देवताओं की अनेक भाँति से पूजा-अर्चना की। पूरे गोकुल में उत्सव मनाया गया।
इधर कंस ढूंढ-ढूंढ कर नवजात शिशुओं का वध करवाने लगा। उसने पूतना नाम की एक क्रूर राक्षसी को ब्रज में भेजा। पूतना ने राक्षसी वेष तज कर अति मनोहर नारी का रूप धारण किया और आकाश मार्ग से गोकुल पहुँच गई। गोकुल में पहुँच कर वह सीधे नन्द बाबा के महल में गई और शिशु के रूप में सोते हुये श्री कृष्ण को गोद में उठा कर अपना दूध पिलाने लगी। उसकी मनोहरता और सुन्दरता ने यशोदा और रोहिणी को भी मोहित कर लिया इसलिये उन्होंने बालक को उठाने और दूध पिलाने से नहीं रोका। पूतना के स्तनों में हलाहल विष लगा हुआ था। अन्तर्यामी श्री कृष्ण सब जान गये और वे क्रोध करके अपने दोनों हाथों से उसका कुच थाम कर उसके प्राण सहित दुग्धपान करने लगे। उनके दुग्धपान से पूतना के मर्म स्थलों में अति पीड़ा होने लगी और उसके प्राण निकलने लगे। वह चीख-चीख कर कहने लगी, “अरे छोड़ दे! छोड़ दे! बस कर! बस कर!” वह बार-बार अपने हाथ पैर पटकने लगी और उसकी आँखें फट गईं। उसका सारा शरीर पसीने में लथपथ होकर व्याकुल हो गया। वह बड़े भयंकर स्वर में चिल्लाने लगी। उसकी भयंकर गर्जना से पृथ्वी, आकाश तथा अन्तरिक्ष गूँज उठे। बहुत से लोग बज्रपात समझ कर पृथ्वी पर गिर पड़े। पूतना अपने राक्षसी स्वरूप को प्रकट कर धड़ाम से भूमि पर बज्र के समान गिरी, उसका सिर फट गया और उसके प्राण निकल गये।
जब यशोदा, रोहिणी और गोपियों ने उसके गिरने की भयंकर आवाज को सुना तब वे दौड़ी-दौड़ी उसके पास गईं। उन्होंने देखा कि बालक कृष्ण पूतना की छाती पर लेटा हुआ स्तनपान कर रहा है तथा एक भयंकर राक्षसी मरी हुई पड़ी है। उन्होंने बालक को तत्काल उठा लिया और पुचकार कर छाती से लगा लिया। वे कहने लगीं, “भगवान चक्रधर ने तेरी रक्षा की। भगवान गदाधर तेरी आगे भी रक्षा करें।”
इसके पश्चात् गोप ग्वालों ने पूतना के अंगों को काट-काट कर गोकुल से बाहर ला कर लकड़ियों में रख कर जला दिया।

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – रुक्मणी हरण



शिशु से बालक, तरुण एवं युवा होते कृष्ण ने अपनी बाल लीला करते हुये तृणावर्ण, अघासुर, अरिष्टासुर, केशी, व्योमासुर, चाणूर, मुष्टिक तथा कंस जैसे दुष्ट दैत्यों और राक्षसों का वध कर डाला। राधा तथा गोपियों के साथ रासलीला की। यमुना के भीतर घुसकर विषधर कालिया नाग को नाथा। गोवर्धन पर्वत को उठा कर इन्द्र के अभिमान को चूर-चूर किया। अपने बड़े भाई बलराम के द्वारा धेनुकासुर तथा प्रलंबसुर का वध करवा दिया। विश्वकर्मा के द्वारा द्वारिका नगरी का निर्माण करवाया। कालयवन को भस्म कर दिया। जरासंघ को सत्रह बार युद्ध में हराया। चूँकि जरासंघ के पाप का घड़ा अभी भरा नहीं था और उसे अभी जीवित रहना था, इसलिये अठारहवीं बार उससे युद्ध करते हुये रण को छोड़ कर द्वारिका चले गये। इसीलिये कृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा। इस प्रकार कृष्ण युवा हो गये।


कृष्ण के शील व पराक्रम का वृत्तान्त सुनकदर विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणी उन पर आसक्त हो गईं। विदर्भराज के रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली नामक पाँच पुत्र और एक पुत्री रुक्मणी थी। रुक्मणी सर्वगुण सम्पन्न तथा अति सुन्दरी थी। उसके माता-पिता उसका विवाह कृष्ण के साथ करना चाहते थे किन्तु रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो। अतः उसने रुक्मणी का टीका शिशुपाल के यहाँ भिजवा दिया। रुक्मणी कृष्ण पर आसक्त थी इसलिये उसने कृष्ण को एक ब्राह्मण के हाथों संदेशा भेजा। कृष्ण ने संदेश लाने वाले ब्राह्मण से कहा, “हे ब्राह्मण देवता! जैसा रुक्मणी मुझसे प्रेम करती हैं वैसे ही मैं भी उन्हीं से प्रेम करता हूँ। मैं जानता हूँ कि रुक्मणी के माता-पिता रुक्मणी का विवाह मुझसे ही करना चाहते हैं परन्तु उनका बड़ा भाई रुक्म मुझ से शत्रुता रखने के कारण उन्हें ऐसा करने से रोक रहा है। तुम जाकर राजकुमारी रुक्मणी से कह दो कि मैं अवश्य ही उनको ब्याह कर लाउँगा।”

केवल दो दिनों बाद ही रुक्मणी का शिशुपाल से विवाह होने वाला था। अतः कृष्ण ने अपने सारथी दारुक को तत्काल रथ लेकर आने की आज्ञा दी। आज्ञा पाकर दारुक रथ ले कर आ गया। उस रथ में शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहर्षक नाम के द्रुतगामी घोड़े जुते हुये थे। रथ में बैठकर कृष्ण विदर्भ देश के लिये प्रस्थान कर गये। सन्ध्या तक वे विदर्भ देश की राजधानी कुण्डिलपुर पहुँच गये। वहाँ पर शिशुपाल की बारात पहुँच चुकी थी। बारात में शाल्व, जरासंघ, दन्तवक्र, विदूरथ, पौन्ड्रक आदि सहस्त्रों नरपति सम्मिलित थे और ये सभी श्री कृष्ण तथा बलराम के विरोधी थे। उनको रुक्मणी को हर ले जाने लिये कृष्ण के आने की सूचना भी मिल चुकी थी इसलिये वे कृष्ण को रोकने के लिये अपनी पूरी सेना के साथ तैयार थे। इधर जब कृष्ण के अग्रज बलराम को जब सूचना मिली की रुक्मणी को लाने के लिये कृष्ण अकेले ही प्रस्थान कर चुके हैं और वहाँ विरोधी पक्ष के सारे लोग वहाँ उपस्थित हैं तो वे भी अपनी चतुरंगिणी सेना को लेकर द्रुतगति से चल पड़े और कुण्डिलपुर में पहुँच कर कृष्ण के साथ हो लिये।

रुक्मणी अपनी सहेलियों के साथ गौरी पूजन के लिये मन्दिर जा रही थीं। उनके साथ उनकी रक्षा के लिये शिशुपाल और जरासंघ के नियुक्त किये गये अनेक महाबली दैत्य भी थे। रुक्मणी की उस टोली को देखते ही सारथी दारुक ने रथ को उनकी ओर तीव्र गति से दौड़ा दिया और पलक झपकते ही रथ पहरे के लिये घेरा बना कर चलते हुये दैत्यों को रौंदते हुये रक्मणी के समीप पहुँच गया। कृष्ण ने रुक्मणी को उनका हाथ पकड़ कर रथ के भीतर खींच लिया। रुक्मणी के रथ के भीतर पहुँचते ही दारुक ने रथ को उस ओर दौड़ा दिया जिधर अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ बलराम उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। पहरेदार देखते ही रह गये।

रुक्मणी के हरण का समचार सुनते ही जरासंघ और शिशुपाल अपने समस्त सहायक नरपतियों और उनकी सेनाओं के साथ कृष्ण के पास पहुँच गये। बलराम और उनकी चतुरंगिणी सेना पहले से ही तैयार खड़ी थी। दोनों ओर से बाणों की वर्षा होने लगी और घोर संग्राम छिड़ गया। बलराम जी ने अपने हल और मूसल से हाथियों की सेना को इस प्रकार छिन्न-भिन्न कर दिया जैसे घनघोर बादलों को वायु छिन्न-भिन्न कर देती है। कृष्ण के सुदर्शन चक्र ने विरोधियों की सेना में तहलका मचा दिया। किसी के हाथ किसी के पैर तो किसी के सिर कट कट कर गिरने लगे। शिशुपाल की पराजय हो गई।

शिशुपाल की पराजय होने पर रुक्मणी का बड़ा भाई रुक्म अत्यन्त क्रोधित होकर कृष्ण के सामने आ डटा। उसने प्रतिज्ञा की थी कि यदि मैं कृष्ण को मार कर अपनी बहन को न लौटा सका तो लौट कर नगर में नहीँ आउँगा। उसने कृष्ण पर तीन बाण छोड़े जिन्हें कृष्ण के बाणों ने वायु में ही काट दिया। फिर कृष्ण ने अपनी बाणों से रुक्म के सारथी, रथ, घोड़े, धनुष और ध्वजा को काट डाला। रुक्म एक दूसरे रथ में फिर आया तो कृष्ण ने पुनः दूसरे रथ का भी वैसा ही हाल कर दिया। रुक्म ने गुलू, पट्टिस, परिध, ढाल, तलवार, तोमर तथा शक्ति आदि अनेक अस्त्र शस्त्रों का प्रहार किया पर कृष्ण ने उन समस्त शस्त्रास्त्रों को तत्काल काट डाला। रुक्म क्रोध से उन्मत्त होकर रथ से कूद पड़ा और तलवार लेकर कृष्ण की ओर दौड़ा। कृष्ण ने एक बाण मार कर उसके तलवार को काट डाला और एक लात मार कर उसे नीचे गिरा दिया। फिर उसकी उसकी छाती अपना पैर पर रख दिया और उसे मारने के लिये अपनी तीक्ष्ण तलवार उठा ली। रुक्मणी व्याकुल होकर कृष्ण के चरणों पर गिर गई और अपने भाई के प्राण दान हेतु प्रार्थना करने लगी। रुक्मणी की प्रार्थना पर कृष्ण ने अपनी तलवार नीचे कर ली और रुक्म को मारने का विचार त्याग दिया। इतना होने पर भी रुक्म कृष्ण का अनिष्ट करने का प्रयत्न कर रहा था। उसके इस कृत्य पर कृष्ण ने उसको उसी के दुपट्टे से बाँध दिया तथा उसके दाढ़ी-मूछ तथा केश तलवार से मूँड़ कर उसको रथ के पीछे बाँध दिया। बलराम ने रुक्म पर तरस खाकर उसे कृष्ण से छुड़वाया। अपनी पराजय पर दुःखी होता हुआ वह अपमानित तथा कान्तिहीन होकर वहाँ से चला गया। उसने अपनी प्रतिज्ञानुसार कुण्डलपुर में प्रवेश न करके भोजपुर नामक नगर बसाया।

इस भाँति भगवान श्री कृष्ण रुक्मणी को लेकर द्वारिकापुरी आये जहाँ पर वसुदेव तथा उग्रसेन ने कुल पुरोहित बुला कर बड़ी धूमधाम के साथ राक्षस विधि से दोनों का पाणिग्रहण संस्कार करवाया।

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – कृष्ण जाम्बवन्त युद्ध



एक बार सत्राजित ने भगवान सूर्य की उपासना करके उनसे स्यमन्तक नाम की मणि प्राप्त की। उस मणि का प्रकाश भगवान सूर्य के समान ही था। एक दिन भगवान कृष्ण जब चौसर खेल रहे थे तभी सत्राजित उस मणि को पहन कर उनके पास आया। दूर से उसे आते देख कर यादवों ने कहा, “हे कृष्ण! आपके दर्शनों के लिये साक्षात् सूर्य भगवान या अग्निदेव चले आ रहे हैं।” इस पर श्री कृष्ण हँस कर बोले, “हे यादवों! यह सत्राजित है, उसने सूर्य भगवान से प्राप्त स्यमन्तक मणि को पहन रखा है इसी लिये वह तेजोमय हो रहा है।” उसी समय सत्राजित वहाँ पर आ पहुँचा। सत्राजित को देखकर उन यादवों ने कहा, “अरे सत्राजित! तेरे पास यह अलौकिक दिव्य मणि है। अलौकिक सुन्दर वस्तु का अधिकारी तो राजा होता है। इसलिये तू इस मणि को हमारे राजा उग्रसेन को दे दे।” किन्तु सत्राजित यह बात सुन कर बिना कुछ उत्तर दिये ही वहाँ से उठ कर चला गया। सत्राजित ने स्यमन्तक मणि को अपने घर के एक देव मन्दिर में स्थापित कर दिया। वह मणि नित्य उसे आठ भार सोना देती थी। जिस स्थान में वह मणि होती थी वहाँ के सारे कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते थे।


एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेनजित उस मणि को पहन कर घोड़े पर सवार हो आखेट के लिये गया। वन में प्रसेनजित तथा उसके घोड़े को एक सिंह ने मार डाला और वह मणि छीन ली। उस सिंह को ऋक्षराज जाम्बवन्त ने मारकर वह मणि प्राप्त कर ली और अपनी गुफा में चला गया। जाम्बवन्त ने उस मणि को अपने बालक का खिलौना बना दिया।

जब प्रसेनजित लौट कर नहीं आया तो सत्राजित ने समझा कि मेरे भाई को श्री कृष्ण ने मारकर मणि छीन ली है। श्री कृष्ण जी पर चोरी के सन्देह की बात पूरे द्वारिकापुरी में फैल गई। जब श्री कृष्णचन्द्र ने सुना कि मुझ पर व्यर्थ में चोरी का कलंक लगा है तो वे इस कलंक को धोने के उद्देश्य से नगर के प्रमुख यादवों का साथ ले कर रथ पर सवार हो स्यमन्तक मणि की खोज में निकले। वन में उन्होंने घोड़ा सहित प्रसेनजित को मरा हुआ देखा पर मणि का कहीं अता-पता नहीं था। वहाँ निकट ही सिंह के पंजों के चिन्ह थे। वे सिंह के पदचिन्हों के सहारे आगे बढ़े तो उन्हें सिंह भी मरा हुआ मिला और वहाँ पर रीछ के पैरों के चिन्ह मिले जो कि एक गुफा तक गये थे। जब वे उस भयंकर गुफा के निकट पहुँचे तब श्री कृष्ण ने यादवों से कहा कि तुम लोग यहीं रुको। मैं इस गुफा में प्रवेश कर मणि ले जाने वाले का पता लगाता हूँ। इतना कहकर वे सभी यादवों को गुफा के मुख पर छोड़ कर उस गुफा के भीतर चले गये। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि उस प्रकाशवान मणि को रीछ का एक बालक लिये हुये खेल रहा है। श्री कृष्ण ने उस मणि को वहाँ से उठा लिया। यह देख कर जाम्बवन्त अत्यन्त क्रोधित होकर श्री कृष्ण को मारने के लिये झपटा। जाम्बवन्त और श्री कृष्ण में भयंकर युद्ध होने लगा।

जब श्री कृष्ण जी गुफा से वापस नहीं लौटे तो सारे यादव उन्हें मरा हुआ समझ कर बारह दिन के उपरान्त वहाँ से द्वारिका पुरी वापस आ गये तथा समस्त वत्तान्त वसुदेव और देवकी से कहा। वसुदेव और देवकी व्याकुल होकर महामाया दुर्गा की उपासना करने लगे। उनकी उपासना से प्रसन्न होकर दुर्गा देवी ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम्हारा पुत्र तुम्हें अवश्य मिलेगा।

श्री कृष्ण और जाम्बवन्त दोनों ही पराक्रमी थे। युद्ध करते हुये गुफा में अट्ठाइस दिन व्यतीत हो गये। भगवान श्री कृष्ण की मार से महाबली जाम्बवन्त की नस टूट गई। वह अति व्याकुल हो उठा और अपने स्वामी श्री रामचन्द्र जी का स्मरण करने लगा। जाम्बवन्त के द्वारा श्री राम के स्मरण करते ही भगवान श्री कृष्ण ने श्री रामचन्द्र के रूप में उसे दर्शन दिये। जाम्बवन्त उनके चरणों में गिर गया और बोला, “हे भगवान! अब मैंने जाना कि आपने यदुवंश में अवतार लिया है।” श्री कृष्ण ने कहा, “हे जाम्बवन्त! तुमने मेरे राम अवतार के समय रावण के वध हो जाने के पश्चात् मुझसे युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की थी और मैंने तुमसे कहा था कि मैं तुम्हारी इच्छा अपने अगले अवतार में अवश्य पूरी करूँगा। अपना वचन सत्य सिद्ध करने के लिये ही मैंने तुमसे यह युद्ध किया है।” जाम्बवन्त ने भगवान श्री कृष्ण की अनेक प्रकार से स्तुति की और अपनी कन्या जाम्बवन्ती का विवाह उनसे कर दिया।

श्री कृष्ण जाम्बवन्ती को साथ लेकर द्वारिका पुरी पहुँचे। उनके वापस आने से द्वारिका पुरी में चहुँ ओर प्रसन्नता व्याप्त हो गई। श्री कृष्ण ने सत्राजित को बुलवाकर उसकी मणि उसे वापस कर दी। सत्राजित अपने द्वारा श्री कृष्ण पर लगाये गये झूठे कलंक के कारण अति लज्जित हुआ और पश्चाताप करने लगा। प्रायश्चित के रूप में उसने अपनी कन्या सत्यभामा का विवाह श्री कृष्ण के साथ कर दिया और वह मणि भी उन्हें दहेज में दे दी। किन्तु शरनागत वत्सल श्री कृष्ण ने उस मणि को स्वीकार न करके पुनः सत्राजित को वापस कर दिया।

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – भौमासुर वध



पाण्डवों के लाक्षागृह से कुशलतापूर्वक बच निकलने पर सात्यिकी आदि यदुवंशियों के साथ लेकर श्री कृष्ण उनसे मिलने के लिये इन्द्रप्रस्थ गये। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी और कुन्ती ने उनका यथेष्ठ आदर सत्कार कर के उन्हें अपना अतिथि बना लिया। एक दिन अर्जुन को साथ लेकर श्री कृष्ण आखेट के लिये गये। जिस वन में वे शिकार के लिये गये थे वहाँ पर भगवान सूर्य की पुत्री कालिन्दी, श्री कृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थी। कालिन्दी की मनोरथ पूर्ण करने के लिये श्री कृष्ण ने उसके साथ विवाह कर लिया। फिर वे उज्जयिनी की राजकुमारी मित्रबिन्दा को स्वयंवर से वर लाये। उसके बाद कौशल के राजा नग्नजित के सात बैलों को एक साथ नाथ उनकी कन्या सत्या से पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात् कैकेय की राजकुमारी भद्रा से श्री कृष्ण का विवाह हुआ। भद्रदेश की राजकुमारी लक्ष्मणा का मनोरथ भी श्री कृष्ण को पतिरूप में प्राप्त करने की थी अतः लक्ष्मणा को भी श्री कृष्ण अकेले ही हर कर ले आये।


श्री कृष्ण अपनी आठों रानियों – रुक्मणी, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा – के साथ द्वारिका में सुखपूर्वक रहे थे कि एक दिन उनके पास देवराज इन्द्र ने आकर प्रार्थना की, “हे कृष्ण! प्रागज्योतिषपुर के दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। वह भौमासुर भयंकर क्रूर तथा महा अहंकारी है और वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीनकर वह त्रिलोक विजयी हो गया है। उसने पृथ्वी के समस्त राजाओं की अति सुन्दरी कन्यायें हरकर अपने यहाँ बन्दीगृह में डाल रखा है। उसका वध आपके सिवाय और कोई नहीं कर सकता। अतः आप तत्काल उससे युद्ध करके उसका वध करें।” इन्द्र की प्रार्थना स्वीकार कर के श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ ले कर गरुड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुँचे। वहाँ पहुँच कर श्री कृष्ण ने अपने पाञ्चजन्य शंख को बजाया। उसकी भयंकर ध्वनि सुन मुर दैत्य श्री कृष्ण से युद्ध करने आ पहुँचा। उसने अपना त्रिशूल गरुड़ पर चलाया। श्री कृष्ण ने तत्काल दो बाण चला कर उस त्रिशूल के हवा में ही तीन टुकड़े दिया। इस पर उस दैत्य ने क्रोधित होकर अपनी गदा चलाई किन्तु श्री कृष्ण ने अपनी गदा से उसकी गदा तो भी तोड़ दिया। घोर युद्ध करते करते श्री कृष्ण ने मुर दैत्य सहित मुर दैत्य छः पुत्र – ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण – का वध कर डाला। मुर दैत्य के वध हो जाने पर भौमासुर अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर युद्ध के लिये निकला। गरुड़ अपने पंजों और चोंच से दैत्यों का संहार करने लगे। श्री कृष्ण ने बाणों की वर्षा कर दी और अन्ततः अपने सुदर्शन चक्र से भौमासुर के सिर को काट डाला।

इस प्रकार भौमासुर को मारकर श्री कृष्ण ने उसके पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर प्रागज्योतिष का राजा बनाया। भौमासुर के द्वारा हर कर लाई गईं सोलह हजार एक सौ राजकन्यायों को श्री कृष्ण ने मुक्त कर दिया। उन सभी राज कन्याओं ने श्री कृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। उन सभी को श्री कृष्ण अपने साथ द्वारिका पुरी ले आये।

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – प्रद्युम्न का जन्म

श्री शुकदेव मुनि बोले, “हे परीक्षित! भगवान शंकर के शाप से जब कामदेव भस्म हो गया तो उसकी पत्नी रति अति व्याकुल होकर पति वियोग में उन्मत्त सी हो गई। उसने अपने पति की पुनः प्रापत्ति के लिये देवी पार्वती और भगवान शंकर को तपस्या करके प्रसन्न किया। पार्वती जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तेरा पति यदुकुल में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेगा और तुझे वह शम्बासुर के यहाँ मिलेगा। इसीलिये रति शम्बासुर के घर मायावती के नाम से दासी का कार्य करने लगी।


“इधर कामदेव रुक्मणी के गर्भ में स्थित हो गये। समय आने पर रुक्मणी ने एक अति सुन्दर बालक को जन्म दिया। उस बालक के सौन्दर्य, शील, सद्गुण आदि सभी श्री कृष्ण के ही समान थे। जब शम्बासुर को पता चला कि मेरा शत्रु यदुकुल में जन्म ले चुका है तो वह वेश बदल कर प्रसूतिकागृह से उस दस दिन के शिशु को हर लाया और समुद्र में डाल दिया। समुद्र में उस शिशु को एक मछली निगल गई और उस मछली को एक मगरमच्छ ने निगल लिया। वह मगरमच्छ एक मछुआरे के जाल में आ फँसा जिसे कि मछुआरे ने शम्बासुर की रसोई में भेज दिया। जब उस मगरमच्छ का पेट फाड़ा गया तो उसमें से अति सुन्दर बालक निकला। उसको देख कर शम्बासुर की दासी मायावती के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह उस बालक को पालने लगी। उसी समय देवर्षि नारद मायावती के पास पहुँचे और बोले कि हे मायावती! यह तेरा ही पति कामदेव है। इसने यदुकुल में जन्म लिया है और इसे शम्बासुर समुद्र में डाल आया था। तू इसका यत्न से लालन-पालन कर। इतना कह कर नारद जी वहाँ से चले गये। उस बालक का नाम प्रद्युम्न रखा गया। थोड़े ही काल में प्रद्युम्न यवा हो गया। प्रद्युम्न का रूप लावण्य इतना अद्भुत था कि वे साक्षात् श्री कृष्णचन्द्र ही प्रतीत होते थे। रति उन्हें बड़े भाव और लजीली दृष्टि से देखती थी। तब प्रद्युम्न जी बोले कि तुमने माता जैसा मेरा लालन-पालन किया है फिर तुममें ऐसा परिवर्तन क्यों देख रहा हूँ? तब रति ने कहा -

“पुत्र नहीं तुम पति हो मेरे। मिले कन्त शम्बासुर प्रेरे॥

मारौ नाथ शत्रु यह तुम्हरौ। मेटौ दुःख देवन कौ सिगरौ॥

“इतना कह कर मायावती रति ने उन्हें महा विद्या प्रदान किया तथा धनुष बाण, अस्त्र-शस्त्र आदि सभी विद्याओं में निपुण कर दिया। युद्ध विद्या में प्रवीण हो जाने पर प्रद्युम्न अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होकर शम्बासुर की सभा में गये। शम्बासुर उन्हें देखकर प्रसन्न हुआ और सभासदों से कहा कि इस बालक को मैंनें पाल पोष कर बड़ा किया है। इस पर प्रद्युम्न बोले कि अरे दुष्ट! मैं तेरा बालक नहीं वरन् तेरा वही शत्रु हूँ जिसको तूने समुद्र में डाल दिया था। अब तू मुझसे युद्ध कर।

“प्रद्युम्न के इन वचनों को सुनकर शम्बासुर ने अति क्रोधित होकर उन पर अपने बज्र के समान भारी गदे का प्रहार किया। प्रद्युम्न ने उस गदे को अपने गदे से काट दिया। तब वह असुर अनेक प्रकार की माया रच कर युद्ध करने लगा किन्तु प्रद्युम्न ने महा विद्या के प्रयोग से उसकी माया को नष्ट कर दिया और अपने तीक्ष्ण तलवार से शम्बासुर का सिर काट कर पृथ्वी पर डाल दिया। उनके इस पराक्रम को देख कर देवतागणों ने उनकी स्तुति कर आकाश से पुष्प वर्षा की। फिर मायावती रति प्रद्युम्न को आकाश मार्ग से द्वारिकापुरी ले आई। गौरवर्ण पत्नी के साथ साँवले प्रद्यम्न जी की शोभा अवर्णनीय थी।”

वे नव-दम्पति श्री कृष्ण के अन्तःपुर में पहुँचे। रुक्मणी सहित वहाँ की समस्त स्त्रियाँ साक्षात् श्री कृष्ण के प्रतिरूप प्रद्युम्न को देखकर आश्चर्यचकित रह गये। वे सोचने लगीं कि यह नर श्रेष्ठ किसका पुत्र है? न जाने क्यों इसे देख कर मेरा वात्सल्य उमड़ रहा है। मेरा बालक भी बड़ा होकर इसी के समान होता किन्तु उसे तो न जाने कौन प्रसूतिकागृह से ही उठा कर ले गया था। उसी समय श्री कृष्ण भी अपने माता-पिता देवकी और वसुदेव तथा भाई बलराम के साथ वहाँ आ पहुँचे। श्री कृष्ण तो अन्तर्यामी थे किन्तु उन्हें नर लीला करनी थी इसलिये वे बालक के विषय में अनजान बने रहे। तब देवर्षि नारद ने वहाँ आकर सभी को प्रद्युम्न की आद्योपान्त कथा सुनाई और वहाँ उपस्थित समस्त जनों के हृदय में हर्ष व्याप्त गया।

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – कृष्ण शंकर युद्ध



दानवीर दैत्यराज बलि के सौ प्रतापी पुत्र थे, उनमें सबसे बड़ा वाणासुर था। वाणासुर ने भगवान शंकर की बड़ी कठिन तपस्या की। शंकर जी ने उसके तप से प्रसन्न होकर उसे सहस्त्र बाहु तथा अपार बल दे दिया। उसके सहस्त्र बाहु और अपार बल के भय से कोई भी उससे युद्ध नहीं करता था। इसी कारण से वाणासुर अति अहंकारी हो गया। बहुत काल व्यतीत हो जाने के पश्चात् भी जब उससे किसी ने युद्ध नहीं किया तो वह एक दिन शंकर भगवान के पास आकर बोला, “हे चराचर जगत के ईश्वर! मुझे युद्ध करने की प्रबल इच्छा हो रही है किन्तु कोई भी मुझसे युद्ध नहीं करता। अतः कृपा करके आप ही मुझसे युद्ध करिये।” उसकी अहंकारपूर्ण बात को सुन कर भगवान शंकर को क्रोध आया किन्तु वाणासुर उनका परमभक्त था इसलिये अपने क्रोध का शमन कर उन्होंने कहा, “रे मूर्ख! तुझसे युद्ध करके तेरे अहंकार को चूर-चूर करने वाला उत्पन्न हो चुका है। जब तेरे महल की ध्वजा गिर जावे तभी समझ लेना कि तेरा शत्रु आ चुका है।”


वाणासुर की उषा नाम की एक कन्या थी। एक बार उषा ने स्वप्न में श्री कृष्ण के पौत्र तथा प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध को देखा और उसपर मोहित हो गई। उसने अपने स्वप्न की बात अपनी सखी चित्रलेखा को बताया। चित्रलेखा ने अपने योगबल से अनिरुद्ध का चित्र बनाया और उषा को दिखाया और पूछा, “क्या तुमने इसी को स्वप्न में देखा था?” इस पर उषा बोली, “हाँ, यही मेरा चितचोर है। अब मैं इनके बिना नहीं रह सकती।” चित्रलेखा ने द्वारिका जाकर सोते हुये अनिरुद्ध को पलंग सहित उषा के महल में पहुँचा दिया। नींद खुलने पर अनिरुद्ध ने स्वयं को एक नये स्थान पर पाया और देखा कि उसके पास एक अनिंद्य सुन्दरी बैठी हुई है। अनिरुद्ध के पूछने पर उषा ने बताया कि वह वाणासुर की पुत्री है और अनिरुद्ध को पति रूप में पाने की कामना रखती है। अनिरुद्ध भी उषा पर मोहित हो गये और वहीं उसके साथ महल में ही रहने लगे।

पहरेदारों को सन्देह हो गया कि उषा के महल में अवश्य कोई बाहरी मनुष्य आ पहुँचा है। उन्होंने जाकर वाणासुर से अपने सन्देह के विषय में बताया। उसी समय वाणासुर ने अपने महल की ध्वजा को गिरी हुई देखा। उसे निश्चय हो गया कि कोई मेरा शत्रु ही उषा के महल में प्रवेश कर गया है। वह अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित होकर उषा के महल में पहुँचा। उसने देखा कि उसकी पुत्री उषा के समीप पीताम्बर वस्त्र पहने बड़े बड़े नेत्रों वाला एक साँवला सलोना पुरुष बैठा हुआ है। वाणासुर ने क्रोधित हो कर अनिरुद्ध को युद्ध के लिये ललकारा। उसकी ललकार सुनकर अनिरुद्ध भी युद्ध के लिये प्रस्तुत हो गये और उन्होंने लोहे के एक भयंकर मुद्गर को उठा कर उसी के द्वारा वाणासुर के समस्त अंगरक्षकों को मार डाला। वाणासुर और अनिरुद्ध में घोर युद्ध होने लगा। जब वाणासुर ने देखा कि अनिरुद्ध किसी भी प्रकार से उसके काबू में नहीं आ रहा है तो उसने नागपाश से उन्हें बाँधकर बन्दी बना लिया।

इधर द्वारिका पुरी में अनिरुद्ध की खोज होने लगी और उनके न मिलने पर वहाँ पर शोक और रंज छा गया। तब देवर्षि नारद ने वहाँ पहुँच कर अनिरुद्ध का सारा वृत्तांत कहा। इस पर श्री कृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न, सात्यिकी, गद, साम्ब आदि सभी वीर चतुरंगिणी सेना के साथ लेकर वाणासुर के नगर शोणितपुर पहुँचे और आक्रमण करके वहाँ के उद्यान, परकोटे, बुर्ज आदि को नष्ट कर दिया। आक्रमण का समाचार सुन वाणासुर भी अपनी सेना को साथ लेकर आ गया। वाणासुर की सहायता के लिये भगवान शंकर भी कार्तिकेय तथा भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष राक्षस आदि की सेना को लेकर रणभूमि में आ गये। श्री बलराम जी कुम्भाण्ड तथा कूपकर्ण राक्षसों से जा भिड़े, अनिरुद्ध कार्तिकेय के साथ युद्ध करने लगे और श्री कृष्ण वाणासुर और भगवान शंकर के सामने आ डटे। घनघोर संग्राम होने लगा। चहुँओर बाणों की बौछार हो रही थी। श्री कृष्ण के तीक्ष्ण बाणों से आहत हो भगवान शंकर की सेना भाग निकली। बलराम ने कुम्भाण्ड और कूपकर्ण को मार डाला।

भगवान शंकर के समस्त अस्त्रों को श्री कृष्ण ने ब्रह्मास्त्र से काट डाला इस पर भगवान शंकर ने अपना ब्रह्मास्त्र चला दिया। श्री कृष्ण ने उनके ब्रह्मा्त्र को वायव्यास्त्र से, पर्वतास्त्र को आग्नेयास्त्र से, परिजन्यास्त्र तथा पशुपत्यास्त्र को नारायणास्त्र से नष्ट कर दिया। श्री कृष्ण ने वाणासुर के सहस्त्र हाथों में से केवल चार हाथों को छोड़कर शेष सभी को काट दिया। अन्ततः भगवान शंकर ने वाणासुर से कहा, “अरे मूढ़! ये ईश्वर के भी ईश्वर हैं। ये मेरे भी ईश्वर हैं। तू इनकी शरण में चला जा।” भगवान शंकर की बात सुनकर वाणासुर श्री कृष्ण के चरणों में गिर पड़ा और उनकी स्तुति कर क्षमाप्रार्थना करने लगा। वाणासुर को अपनी शरण में आया जा शरणागतवत्सल श्री कृष्ण ने उसे अभयदान दे दिया। वाणासुर ने अपनी कन्या उषा का अनिरुद्ध के साथ पाणिग्रहण संस्कार कर दिया।