01 जनवरी 2010

इच्छाधारी नागिन...!

आज तक आपने इच्छाधारी नागिन या नागकन्या का रूप फिल्मों में ही देखा होगा, परंतु आज हम आपको ऐसी इच्छाधारी नागिन से रूबरू कराने जा रहे हैं, जो अपने नाग पति को पाने के लिए इस मृत्युलोक में साधना कर रही है।
स्वयं नागकन्या होने का दावा करने वाली माया का कहना है कि वह हर 24 घंटे में हवन के दौरान नागिन का रूप धारण कर अपनी तीन बहनों से मिलने जाती है जो उसे अपने नाग पति को पाने के लिए किस तरह साधना की जाए, यह निर्देश देती हैं। माया के मुताबिक ये तीनों बहनें भी इच्छाधारी नागिनें हैं।
खुद को बचपन से शादीशुदा समझने वाली माया नाग के नाम का सिंदूर भरती है और उसे पूरा विश्वास है कि जल्द ही उसके पति के साथ उसका मिलन होगा। माया कहती है कि फिलहाल उसका पति इस मृत्युलोक में उसके परिवार के मोह में फँसा हुआ है और उससे सारी शक्तियाँ छीनी जा चुकी हैं।अपने पूर्व जन्म की कहानी सुनाते हुए वह कहती है कि द्वापर युग के दौरान वह एक खाई में गिर गई थी तब किसी बाबा ने गोपाल नामक नाग को उसकी मदद के ‍लिए भेजा था, तभी से उन दोनों में प्रेम हो गया था। परंतु शादी न हो पाने की वजह से उसने आत्महत्या कर ली थी। ...और तब से आज तक अपने साथी को पाने के लिए भटक रही है।
नागलोक और मृत्युलोक की अजीबो-गरीब कहानियाँ सुनाने वाली यह इच्छाधारी नागिन माया मध्यप्रदेश के बड़नगर स्थित एक आश्रम में निवास करती है। इन कहानियों से प्रभावित वहाँ के निवासी इनकी महामाया माँ भगवती के रूप में आराधना करते हैं।लोगों द्वारा माया की पूजा करना आस्था का प्रतीक है या उसका इच्छाधारी नागिन होने के अंधविश्वास का प्रभाव है? आज के इस वैज्ञानिक युग में यह घटना कितनी प्रासंगिक है, अपनी राय से हमें जरूर अवगत कराएँ।

भटक रही है मुमताज!

यूँ तो विश्व प्रसिद्ध का ताजमहल बादशाह शाहजहाँ के अपनी बेगम मुमताज महल के प्रति बेपनाह मोहब्बत की कहानी को बयाँ करता है परंतु शायद बहुत कम लोग यह जानते होंगे की ताजमहल बनने तक मुमताज के मृत शरीर को बुरहानपुर के बुलारा महल में दफनाया गया था और लोगों की मानें तो इन खंडहरों में आज भी मुमताज की आत्मा भटकती है।
कहते हैं कि आज से 400 वर्ष पूर्व जब मुगलिया सल्तनत की बेगम मुमताज की मौत बुलारा महल में हुई थी, तब शाहजहाँ बुरहानपुर में ही ताजमहल का निर्माण कराने वाले थे। परंतु किसी कारणवश यह संभव न हो सका और जब आगरा में ताजमहल बनकर तैयार हुआ तो वहाँ मुमताज की देह को ले जाकर दफनाया गया। यहाँ के रहवासियों का मानना है कि मुमताज की देह तो यहाँ से निकाल ली गई पर आत्मा आज भी इसी महल में भटकती रहती है।
यहाँ के रहवासियों का कहना है कि महल से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आना तो आम बात है, परंतु आज तक यहाँ आने वाले किसी भी शख्स को मुमताज की आत्मा ने परेशान नहीं किया और न ही नुकसान पहुँचाया है।बालचंद प्रजापति का कहना है कि यहाँ मौजूद तथ्यों के आधार पर सन 1631 में यहाँ अपनी बेटी को जन्म देने के कुछ दिनों बाद ही मुमताज चल बसी थी। कहते हैं कि यही वजह है कि उनकी आत्मा इस महल में ही बस गई।
बुरहानपुर के इन खंडहरों में क्या वाकई मुमताज की आत्मा भटकती है या यह केवल असामाजिक तत्वों द्वारा लोगों को इस स्थान से दूर रखने की कोई चाल है, जिससे कि वे अपने गैर कानूनी कार्यों को चुपचाप अंजाम दे सकें। आप इस बारे में क्या सोचते हैं। यदि आप भी ऐसे किसी स्थान के बारे में जानते हैं तो मुझे जरूर बताएँ।

भूत से परेशान एक गाँव

अभी तक हमने आपको ऐसे कई लोगों के बारे में बताया जिन पर भूत, प्रेत, जिन्न का प्रकोप रहा हो, परंतु आज हम आपको एक ऐसी जगह ले जा रहे हैं, जहाँ एक-दो व्यक्तियों पर नहीं, वरन पूरे गाँव पर भूत का प्रकोप होने का दावा किया जा रहा है।मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के गायबैड़ा ग्राम के पाँच ग्रामवासी अचानक किसी अज्ञात बीमारी का शिकार होकर मौत के मुँह में चले गए। जब ग्रामीणों को मौत का कुछ कारण समझ में नहीं आया तो वे घबराकर वहीं पास के एक तांत्रिक के पास पहुँचे। तांत्रिक ने मौत का कारण गाँव पर एक भूत का साया होना बताया। यह भी बताया कि वह भूत और लोगों को भी मार सकता है। ग्रामीणों के आग्रह पर तांत्रिक ने भूत को भगाने की एक योजना बनाई।तांत्रिक के कहने पर घोषणा की गई कि गाँव के बाहर से आए लोग तुरंत गाँव छोड़कर चले जाएँ और केवल यहाँ के रहवासी ही गाँव में ठहरें और अनिवार्य रूप से पूजा-पाठ और हवन कर्म में हिस्सा लें, तभी गाँव भूतों के साए से मुक्त हो पाएगा। इस आदेश का शब्दश: पालन किया गया और भजन, हवन आदि धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन कर भूत को शांत किया गया।इस दौरान भूत का साया होने का दावा करने वाला तांत्रिक भी बनावटी वेशभूषा कर भूत भगाने का प्रयत्न करता रहा और अंत में जाकर पूरे गाँव की सीमा को दूध की धार गिराते हुए बाँध दिया गया। इसके पश्चात उसने गाँववालों को यकीन दिलाया कि पूजन-हवन के बाद अब गाँव भूत के साए से मुक्त हो चुका है।आमतौर यह देखा गया है कि इनसान जिस चीज को समझ नहीं पाता है उसे या तो वह देवता मान लेता है या फिर भूत-प्रेत का नाम दे देता है और इसी अज्ञानता का फायदा कुछ लोग उठाते हैं और लोगों की भावनाओं के खिलवाड़ कर पैसा कमाने की राह खोजते हैं। आज के ‍इस कथित शिक्षित समाज में भी भूत-प्रेत का साया पड़ने जैसी बातों पर विश्वास करना किस हद तक उचित है? आप इस बारे में क्या सोचते हैं? हमें अवश्य बताइए।

...तो भस्म हो जाएगा पूरा गाँव

आस्था और अंधविश्वास की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं उज्जैन जिले के चिखली ग्राम में जहाँ ऐसी मान्यता है कि यदि रावण को पूजा नहीं गया तो पूरा गाँव जलकर भस्म हो जाएगा।

आप इसे आस्था मानें या अंधविश्वास लेकिन यहाँ परम्परा अनुसार प्रत्येक वर्ष चैत्र नवरात्र में दशमी के दिन पूरा गाँव रावण की पूजा में लीन हो जाता है। इस दौरान यहाँ रावण का मेला लगता है और दशमी के दिन राम और रावण युद्ध का भव्य आयोजन होता है। पहले गाँव के प्रमुख द्वार के समक्ष रावण का एक स्थान ही हुआ करता था, जहाँ प्रत्येक वर्ष गोबर से रावण बनाकर उसकी पूजा की जाती थी लेकिन अब यहाँ रावण की एक विशाल मूर्ति है।
बाबूभाई रावण यहाँ के पुजारी हैं। रावण की पूजा-पाठ करने के कारण ही उनका नाम बाबूभाई रावण पड़ा है। इनका कहना है कि मुझ पर रावण की कृपा है। गाँव में जो भी विपत्ति आती है तो मुझे रावण के सामने अनशन पर बैठना होता है। जैसे यदि गाँव में पानी नहीं गिरता है तो मैं अनशन पर बैठ जाता हूँ तो तीन दिन में जोरदार झमाझम बारिश हो जाती है।यहाँ के सरपंच कैलाशनारायण व्यास का कहना है कि यहाँ रावण की ही पूजा होती है। पूजा करने की परम्परा वर्षों पुरानी है। एक वर्ष किसी कारणवश रावण की पूजा नहीं की गई थी और न ही मेला लगाया गया था तो पूरे गाँव में अकस्मात आग लग गई थी, मुश्किल से सिर्फ एक घर ही बच सका।
एक स्थानीय महिला पद्मा जैन ने कहा कि दशमी के दिन यहाँ राम-रावण युद्ध का आयोजन होता है। पूजा नहीं किए जाने के कारण गाँव में एक बार नहीं दो बार आग लग चुकी है। एक बार तो यहाँ वीडियो लगाकर यह देखने का प्रयास किया गया था कि मेला नहीं लगाने पर आग लगती है कि नहीं। उस दौरान इतनी तेज आँधी चली कि सब कुछ उड़ गया। यह मैंने मेरी आँखों से देखा है।जहाँ बुराई के प्रतीक रावण के पुतले को प्रत्येक वर्ष जलाया जाता है, वहीं देखने में आया है कि श्रीलंका के रानागिर इलाके के अलावा भारत में भी रावण की कहीं-कहीं पूजा-अर्चना किए जाने का प्रचलन बढ़ रहा है। रावण के प्रति उक्त गाँव के समर्पण को आप क्या मानते हैं- आस्था या अंधविश्वास मुझे जरूर बताएँ।

पीलिया का अनोखा इलाज

असाध्य बीमारियों के इलाज के लिए लोगों का झाड़-फूँक, टोने-टोटके तथा देवी-देवताओं का सहारा लेना एक आम बात है। आज हम आपको आस्था और अंधविश्वास की कड़ी में एक ऐसी जगह ले चलते हैं, जहाँ पीलिया का इलाज करने का एक अनूठा तरीका अपनाया जाता पीलिया से ग्रस्त मरीजों की भीड़ का यह नजारा किसी डॉक्टर के क्लिनिक का नहीं बल्कि एक मंजीत पाल सलूजा की दुकान का है जो अपनी अनूठी विद्या से पीलिया दूर करने का दावा करते हैं। वे मरीजों के कान पर कागज का कोन बनाकर लगाते हैं और मोमबत्ती के सहारे कागज को जलाते हैं और साथ-साथ गुरुवाणी का उच्चारण करते जाते हैं। मंजीत जी इलाज के पहले गणेशजी की पूजा करना नहीं भूलते। जला हुआ कोन जब कान से हटाया जाता है तो कान के आसपास पीले रंग का पदार्थ इकट्‍ठा हो जाता है। मंजीत पाल के अनुसार यह पीलिया है, जो मरीज के शरीर से बाहर निकलता है।उपचार हेतु पहले दिन आने वाले मरीज को साथ में हार-फूल, अगरबत्ती और नारियल लाना आवश्यक होता है। साथ ही यहाँ आने वाले लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार यहाँ चढ़ावा रखकर जाते हैं। मंजीत का कहना है कि वे मरीजों को नि:शुल्क सेवा प्रदान करते हैं। चढ़ावा तो मरीजों की श्रद्धा का प्रतीक मात्र है।यहाँ आने वाले मरीजों को भी डॉक्टरी इलाज से ज्यादा इस विद्या पर अधिक विश्वास है। उनका मानना है कि दवा के साथ दुआ के असर से ही इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है।
WDगुरुवाणी का उच्चारण करते हुए मरीजों का इलाज करने वाले मंजीत का कहना है कि हमारे परिवार को इस विद्या का ज्ञान भगवान की देन है। उनके पिता व दादाजी भी इस अनूठी विद्या से लोगों के दर्द को दूर किया करते थे। वे यहाँ आने वाले मरीजों को एक विशेष दवा, जो कि आयुर्वेदिक और होम्योपैथी दवा का मिश्रण होती है, के ड्राप्स भी पिलाते हैं। वे रोजाना करीब 80 से 90 लोगों का इलाज करने का दावा करते हैं। उनका यह भी कहना है कि वे मरीज को केवल देखकर ही यह अनुमान लगा लेते हैं कि पीलिया उतरने में कितना समय लगेगा।मंजीत पाल सलूजा के अनुसार यहाँ डॉक्टरों द्वारा भेजे गए मरीजों के अलावा कई डॉक्टर्स स्वयं यहाँ आकर खुद को व परिजनों का भी इलाज कराते हैं। पीलिया जैसी असाध्य बीमारी के इलाज हेतु इस तरह की विद्या पर विश्वास करना लोगों के अंधविश्वास को प्रकट करता है या इस विद्या के पीछे किसी वैज्ञानिक तरीका होने का अंदाज लगाया जा सकता है। आप अपनी राय से मुझे
जरूर अवगत कराएँ ।

कुतिया ने बनाया बिल्ली को बेटी

आस्था या अंधविश्वास में अब तक हम आपके समक्ष जितनी भी घटनाएँ लाए उन सबसे यह घटना कुछ अनोखी है। मनुष्य का पशु प्रेम किसी से छुपा नहीं है। लाखों सालों से मनुष्य और पशु एक दूसरे के साथ रहते आए हैं। परंतु यह लगाव कभी-कभी अपनी चरम सीमा तक पह़ँच जाता है और मनुष्य का पशु प्रेम आडंबर लगने लगता है।सामान्य तौर पर देखा जाता है कि बिल्ली को दिखते ही कुत्ता उसकी जान के पीछे लग जाता है। परंतु 'बिल्लू' नाम की एक कुतिया ने 'नेन्सी' बिल्ली को अपने बच्चे की तरह पाला। इन्दौर के परिवार ने करीब चार सालों से बिल्लू को पाल रखा है। तभी उन्हें अपने पड़ोस में एक नन्ही लावारिस बिल्ली पड़ी मिली जो शक्ल-सूरत में बिल्लू की तरह ही दिखती थी। उसे वे अपने घर तो ले आए पर उन्हें डर था कि बिल्ली को कुतिया से कैसे बचाकर पालें।परंतु उनका यह डर उनकी कुतिया ने दूर कर दिया। थोड़े ही दिनों में वो नेन्सी बिल्ली को अपने बच्चे की तरह प्यार देने लगी। यहाँ तक की उसके खुद के बच्चे न होने के बावजूद नेन्सी के लिए उमड़े ममत्व की वजह से वह उसे स्तनपान करवाने लगी। डोलेकर परिवार ने जब यह अनूठी घटना पशु चिकित्सक को बताई तो उन्होंने इसे सॉयकोलॉजी प्रभाव बताया।परंतु यह प्रेम कहानी अधिक समय तक चल न सकी और 10 महिनों के भीतर ही बिल्ली का देहांत हो गया। सब कुछ एक आम घटना की तरह था। परंतु यही से शुरुआत हुई आडंबर की, परिवार के लोगों ने बिल्ली को घर के सदस्य की तरह अंतिम यात्रा निकालकर उसका अंतिम संस्कार किया और वे सारे संस्कार ‍‍किए जो किसी पारिवारिक सदस्य के देहांत पर किए जाते हैं। कहा तो यह भी गया कि बिल्ली की मौत पर बिल्लू कुतिया ने भी खूब आँसू बहाए।पशु के प्रति दया और प्रेम रखना वाकई एक सराहनीय काम है परंतु प्रेम का यह अजीबोगरीब तरीके का दिखावा करना कहाँ तक जायज है। आप अपनी राय से मुझे जरूर अवगत कराएँ।

मदिरापान करने वाली देवी!

सातरूंडा स्थित कवलका माता मंदिर
आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं एक ऐसे मंदिर में जहाँ माता को प्रसाद के रूप में मदिरा चढ़ाई जाती है। 'माता कवलका' नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर रतलाम शहर से लगभग 32 किमी की दूरी पर ग्राम सातरूंडा की ऊँची टेकरी पर स्थित है।
माँ की यह चमत्कारी मूर्ति ग्राम सातरूंडा की ऊँची टेकरी पर 'माँ कवलका' के रूप में विराजमान हैं। सालों से यह मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र रहा है। दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ माँ के चमत्कारी रूप के दर्शन करने और माँ से अपनी मुरादें माँगने आते हैं। मंदिर में माँ कवलका, माँ काली, काल भैरव और भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा विराजित हैं।
यहाँ के पुजारी पंडित अमृतगिरी गोस्वामी का कहना है कि यह मंदिर लगभग 300 वर्ष पुराना है। यहाँ स्थित माता की मूर्ति बड़ी ही चमत्कारी है। पुजारी का दावा है कि यह मूर्ति मदिरापान करती है। दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ माँ के चमत्कारी रूप के दर्शन करने और माँ से अपनी मुराद माँगने आते हैं। पुत्र प्राप्ति होने पर देवी माँ के दर्शन करने आए रमेश ने बताया कि उन्होंने माता को प्रसन्न करने के लिए बकरे की बलि और बच्चे के बाल देकर उसकी मानता उतारी है।मंदिर के ऊँची टेकरी पर स्थित होने के कारण यहाँ तक पहुँचने के लिए भक्तों को पैदल ही चढ़ाई करनी पड़ती है। भक्तों की सुविधा के लिए हाल ही में मंदिर मार्ग पर पक्की सीढ़ियाँ बनाई गई हैं, जिनके माध्यम से आसानी से चढ़ाई की जा सकती है।इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ स्थित माँ कवलका, माँ काली और काल भैरव की मूर्तियाँ मदिरापान करती हैं। भक्तजन माँ को प्रसन्न करने के लिए मदिरा का भोग लगाते हैं। इन मूर्तियों के होठों से मदिरा का प्याला लगते ही प्याले में से मदिरा गायब हो जाती है और यह सब कुछ भक्तों के सामने ही होता है।
माता के प्रसाद के रूप में भक्तों को बोतल में शेष रह गई मदिरा दी जाती है। अपनी मनोवांछित मन्नत के पूरी होने पर कुछ भक्त माता की टेकरी पर नंगे पैर चढ़ाई करते हैं तो कुछ पशुबलि देते हैं। हरियाली अमावस्या और नवरात्रि में यहाँ भक्तों की अपार भीड़ माता के दर्शन के लिए जुट जाती है। कुछ लोग बाहरी हवा या भूत-प्रेत से छुटकारा पाने के लिए भी माता के दरबार पर अर्जी लगाते हैं।सोचिए क्या कोई मूर्ति मदिरा पान कर सकती है या यह लोगों का महज वहम है? आखिर इसमें कितनी सच्चाई है, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। आस्था या अंधविश्वास की यह यात्रा आपको कैसी लगी मुझे जरूर बताएँ।