
सूर्य, चंद्रमा एवं अन्य ग्रह नियमित रूप से चराचर जगत को प्रभावित करते हैं। इन्हीं से निर्देशित होकर नाड़ियां हमारे शरीर, मन एवं भविष्य में होने वाली तात्कालिक घटनाओं को प्रभावित करती हैं। इसी तरह वाम एवं दक्षिण स्वर क्रमश: मन एवं आत्मा के प्रतीक हैं।
कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है, लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है। ऐसे समय में स्वर की प्रतीक्षा करने पर उत्तम अवसर हाथों से निकल सकता है, अत: स्वर परिवर्तन के द्वारा अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए प्रस्थान करना चाहिए या कार्य प्रारंभ करना चाहिए। स्वर विज्ञान का सम्यक ज्ञान आपको सदैव अनुकूल परिणाम प्रदान करवा सकता है।
संकेत नाड़ियों के
मानव शरीर में स्थित लगभग सात हजार दो सौ नाड़ियां समस्त ब्रrांड के ग्रह-नक्षत्रों की प्रभाव क्षमता को स्पष्ट कर देती हैं। नाभि में एक नाड़ी कुंडली के आकार में है, जिसमें से इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गांधारी, हस्तजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलंगुषा, कुहू और शंखिनी नामक दस नाड़ियां निकलती हैं।
इनमें से प्रारंभिक तीन इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना प्रधान होती हैं। इड़ा को ही चंद्र कहते हैं और मन पर नियंत्रण एवं प्रिय-अप्रिय का बोध इसके कारण होता है। इसका परीक्षण बाएं नथुने से किया जाता है। पिंगला को सूर्य कहते हैं। यह दाएं नथुने में होती है।
सुषुम्ना को वायु कहते हैं जो दोनों नथुनों के मध्य में होती है। हमारी श्वास निर्बाध गति से जिस नथुने से आ रही हो तो चंद्र स्वर तथा दाहिना नथुना सही काम कर रहा हो तो सूर्य स्वर चलता हुआ होता है। जिस समय स्वर परिवर्तन होता है, उस समय वायु तत्व प्रभावी होता है तथा सुषुम्ना नाड़ी चलती है।
कब करें कौन सा काम
ग्रहों को देखे बिना स्वर विज्ञान के ज्ञान से अनेक समस्याओं, बाधाओं एवं शुभ परिणामों का बोध इन नाड़ियों से होने लगता है, जिससे अशुभ का निराकरण भी आसानी से किया जा सकता है।चंद्रमा एवं सूर्य की रश्मियों का प्रभाव स्वरों पर पड़ता है। चंद्रमा का गुण शीतल एवं सूर्य का उष्ण है।
शीतलता से स्थिरता, गंभीरता, विवेक आदि गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज, शौर्य, चंचलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुण पैदा होते हैं। किसी भी काम का अंतिम परिणाम उसके आरंभ पर निर्भर करता है। शरीर व मन की स्थिति, चंद्र व सूर्य या अन्य ग्रहों एवं नाड़ियों को भलीभांति पहचान कर यदि काम शुरु करें तो परिणाम अनुकूल निकलते हैं।
स्वर वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चंद्र स्वर में किए जाने चाहिए, जैसे विवाह, दान, मंदिर, जलाशय निर्माण, नया वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण खरीदना, शांति अनुष्ठान कर्म, व्यापार, बीज बोना, दूर प्रदेशों की यात्रा, विद्यारंभ, धर्म, यज्ञ, दीक्षा, मंत्र, योग क्रिया आदि ऐसे कार्य हैं कि जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता होती है।
इसीलिए चंद्र स्वर के चलते इन कार्यो का आरंभ शुभ परिणामदायक होता है। उत्तेजना, आवेश और जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनमें सूर्य स्वर उत्तम कहा जाता है। दाहिने नथुने से श्वास ठीक आ रही हो अर्थात सूर्य स्वर चल रहा हो तो परिणाम अनुकूल मिलने वाला होता है।
दबाए मानसिक विकार
कुछ समय के लिए दोनों नाड़ियां चलती हैं अत: प्राय: शरीर संधि अवस्था में होता है। इस समय पारलौकिक भावनाएं जागृत होती हैं। संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता और अरुचि होने लगती है। इस समय में परमार्थ चिंतन, ईश्वर आराधना आदि की जाए, तो सफलता प्राप्त हो सकती है। यह काल सुषुम्ना नाड़ी का होता है, इसमें मानसिक विकार दब जाते हैं और आत्मिक भाव का उदय होता है।
अन्य उपाय
यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो जो स्वर नहीं चल रहा है, उस पैर को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए तथा अचलित स्वर की ओर उस पुरुष या महिला को लेकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करने से क्रोधी व्यक्ति के क्रोध को आपका अविचलित स्वर का शांत भाग शांत बना देगा और मनोरथ की सिद्धि होगी।
गुरु, मित्र, अधिकारी, राजा, मंत्री आदि से वाम स्वर से ही वार्ता करनी चाहिए। कई बार ऐसे अवसर भी आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है।ऐसे समय स्वर बदलने के प्रयास करने चाहिए।
स्वर को परिवर्तित कर अपने अनुकूल करने के लिए कुछ उपाय कर लेने चाहिए। जिस नथुने से श्वास नहीं आ रही हो, उससे दूसरे नथुने को दबाकर पहले नथुने से श्वास निकालें। इस तरह कुछ ही देर में स्वर परिवर्तित हो जाएगा। घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना प्रारंभ हो जाता है।
02 दिसंबर 2009
स्वर को पहचानें सिद्ध करें मनोरथ
Posted by Udit bhargava at 12/02/2009 09:23:00 pm 0 comments
ताकि सुखमय हो दांपत्य

हिंदू संस्कृति में सोलह संस्कार हैं जिसमें विवाह संस्कार मुख्य है। विवाह का सौभाग्य सभी को प्राप्त नहीं होता है। दांपत्य सुख के अभाव के कई कारण हो सकते हैं। इनमें से हम मुख्य ज्योतिष कारणों का ही वर्णन कर रहे हैं।
< स्त्री या पुरुष की जन्म कुंडली में सप्तम भाव और सप्तमेष का पापी ग्रहों जैसे- राहु, मंगल, शनि और केतु से युक्त।
< सप्तमेष का ६वें, ८वें या १२वें भाव में
< पुरुष की कुंडली में शुक्र और स्त्री की कुंडली में गुरु ग्रह का दूषित होना।
< मंगल दोष का निवारण न होना।
< गुण मिलान के अंतर्गत १८ गुण से कम होना।
< नाड़ी दोष, गण दोष, नुपूर दोष।
< हस्त रेखा के अंतर्गत बुध पर्वत के निकट सबसे लंबी रेखा को विवाह रेखा कहते हैं। इसका दूषित होना जैसे: विवाह रेखा आगे चलकर हृदय रेखा से मिल जाए तो संबंध विच्छेद हो सकता है।विवाह रेखा आगे चल द्विशाखीत हो जाए तो तलाक हो जाता है।विवाह रेखा बुध पर्वत के मूल में मुड़ जाए तो जातक का कभी विवाह नहीं होता।विवाह रेखा पर काला तिल, क्रॉस होना अशुभ लक्षण है।पूर्व जन्म में पत्नी पर किए गए अत्याचार भी दांपत्य दुख का कारण बनते हैं।सप्तम भाव में अकेला गुरु ग्रह हानिकारक होता है।
उपाय
< स्त्री जातक पुखराज और पुरुष जातक हीरा या ओपल रत्न धारण करें।
< सप्तमेष और सप्तम भाव में स्थित पापी ग्रहों की शांति करवाएं।
< पुरुष जातक निम्न मंत्र का जाप करें:-
पत्नीं मनोरमां देहि मनो वृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसार सागस्य कुलोद् भवाम
स्त्रियां भगवान शंकर और माता पार्वती की संयुक्त तस्वीर रखकर मंत्र का जाप करें।
हे गौरि! शंक्डरार्धाड्रि यथा त्वं शंकरप्रिया।
तथा मां कुरू कल्याणि! कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्।।
या
ऊँ कात्यायनी देवीय नम:।
Posted by Udit bhargava at 12/02/2009 09:17:00 pm 0 comments
वैभव ऐश्वर्य की प्रतीक है लक्ष्मी

अमावस्या का गहन अंधकार लक्ष्मी के स्वरूप और प्रकृति से मेल नहीं खाता। लक्ष्मी सौंदर्य, वैभव, ऐश्वर्य, पुष्टि और प्रकाश का प्रतीक है। इसलिए उनकी उपासना के लिए माघ शुक्ल पंचमी अर्थात श्री पंचमी या आश्विन पूर्णिमा ही उपयुक्त तिथि हैं। जब प्रकृति शिशिर के o£थ व आलस्य से निवृत होकर वनस्पति और किसलयों का प्ररोहण करती है या जब आश्विन का पूर्ण इन्दु पृथ्वी और अमृत वर्षा करता तो कृतज्ञ पृथ्वीवासी जीवन की आधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी की उपासना कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। कार्तिक अमावस्या की प्रकृति ऐसी नहीं है।
अमावश्य का घोर अंधकार जब दृष्य जगत को अपने आगोश में समेट लेता है तो जीवन प्रकाश और सौंदर्य के लिए अवकाश नहीं बचता। यह रहस्यमयी रजनी महाकाली की उपासना के लिए अधिक उपयुक्त लगती है। जब दृष्यमान विश्व किसी रहस्यपूर्ण अज्ञात के अनन्त अवकाश में विलीन हुआ जाता हैं, अस्तित्व अनिस्तत्व हो जाते है तो मृन्यृरूपिणी, मुक्त कुंतला मां काली की आराधना ही उपयुक्त हो सकती है।
लेकिन जब समूचा उतर भारत इस रात महालक्ष्मी की पूजा करता है तो इसका कुछ न कुछ कारण होना ही चाहिए। दश महाविद्याओं की उपसना पद्धति के दो क्रम हैं। और षोडशी क्रम। काली क्रम में काली, तारा, भैरवी और छिन्न मस्ता की उपासना की जाती है और षोडशी क्रम में त्रिपुर संदुरी, बगलामुखी, धुमावती, मातंगी, त्रिपुर, भैरवी और लक्ष्मी की। लक्ष्मी इनमें सबसे छोटी है।
इसलिए इन्हें कनिष्ठा भी कहते हैं। ये दोनों साधना क्रम प्रकृति के विलास के दो विपरीत पद्धतियों के प्रतीक है। दृष्यमान जगत के निरंतर अज्ञात में विलीन हो जाने की प्रक्रिया की अधिष्ठात्री देवी महाकाली है। वे श्यामवर्णा है और अधंकार उनका रूप हैं। अज्ञात से निकलकर अस्तित्व के मूर्तिमान होने की प्रक्रिया की अधिष्ठात्री है महात्रिपुर सुंदरी। वे रक्त वर्णा है और उनका स्वरूप है प्रकाश।
चन्द्रमा की बढ़ती और क्षय होती कलाओं में तांत्रिकों ने इन्हीं परस्पर विरोधी प्रक्रियाओं की अभिव्यक्ति देखी है। चांदनी रातों में हर तिथि को चंद्रमा विकसित होता जाता है। इस क्रम में अंधकार का अंश कम होता जाता है। पूर्णिमा की रात में चंद्रमा पूर्ण विकसित होता है। उस रात अंधकार बिल्कुल नष्ट हुआ सा लगता है। शुक्ल पक्ष की 15 रातों में हर तिथि को अंधकार की एक कला क्षय होती जाती है। फिर भी पूर्णिमा की रात में सोलहवीं कला के रूप में अंधकार विद्यमान रहता है।
इसे कहते हैं अनुमति। यह महाकाली है। यह अज्ञात, अनन्त, अननुमेय, महाकाली की शक्ति है। वह इस प्रत्यक्ष शक्ति का लगातार विधवंश कर रही है। वह जीवन के व्यापार से श्रांत जीवों को मृत्यु के निस पंद लोक में विश्राम का अवसर देती है और रूप, गंध, महात्रिपुरसुंदरी की लीला इससे भिन्न है। वे सृजन की देवी है। अनसितत्व को शुन्य से निकाल कर ले आती है और उन्हें अस्तित्व को शुन्य से निकाल कर ले आती है और उन्हें अस्तित्व प्रदान कर अपना लीलसखा बना लेती है। जीवन उनकी लीला है। प्रकाश उनका स्वरूप है। वे रोचना है, रोचिष्मति है, शुभा है।
अपने साधक को भोग और मोक्ष देती है। उनका यह रूप कृष्ण पक्ष की रातों में अभिव्यक्त होता है। कृष्ण पक्ष में हर तिथि को प्रकाश की एक कला कम होती जाती है। अमावस्या की रात तक प्रकाश की 15 कलाएं समाप्त हो चुकी होती है। उस रात अशेष प्रकाश की सोलहवीं कला शेष रहती है। इसे सिनीवाली कहते हैं। यह षोडशी कला है। यही महालक्ष्मी है। जिनकी महात्रिपुर सुंदरी के क्रम में अराधना होती है। यह जीवन, प्रकाश उत्कर्ष और पुष्टि का प्रतीक है।
कार्तिक अमावस्या के घोर अंधकार में जब सारी सृष्टि विलीन हो रही होती है, तो हिंदू प्रकाश की इसी षोडशी कला सिनीवाली की उपासना कहते हैं। यही महालक्ष्मी का रूप है। यह मृत्यु को भीषण दाढ़ों से जीवन को छीन लाने सरीखा है। जीवन का चरम उल्लास जैसे घोरतम निराशा में ही प्रकट हो सकता है। यही दीपावली की रात में महालक्ष्मी की उपासना का रहस्य। जो हिन्दुओं के परम उल्लास, महान शैर्य और अटल इच्छा शक्ति का प्रतीक है। यही हिन्दुत्व की अजेय जीवन शक्ति है।
Posted by Udit bhargava at 12/02/2009 09:10:00 pm 0 comments
04 नवंबर 2009
वेद
- भारतीय संस्कृति" href="http://hi.wikipedia.org/wiki/à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯_संसà¥à¤•ृति">भारतीय संस्कृति के मूल वेद हैं। ये हमारे सबसे पुराने धर्म-ग्रन्थ हैं और हिन्दू धर्म" href="http://hi.wikipedia.org/wiki/हिनà¥à¤¦à¥‚_धरà¥à¤®">हिन्दू धर्म का मुख्य आधार हैं।
- न केवल धार्मिक किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से भी वेदों का असाधारण महत्त्व है। वैदिक युग के आर्यों की संस्कृति और सभ्यता जानने का एकमात्र साधन यही है।
- मानव-जाति और विशेषतः आर्य जाति ने अपने शैशव में धर्म और समाज का किस प्रकार विकास किया इसका ज्ञान वेदों से ही मिलता है।
- विश्व के वाङ्मय में इनसे प्राचीनतम कोई पुस्तक नहीं है।
- आर्य-भाषाओं का मूलस्वरूप निर्धारित करने में वैदिक भाषा बहुत अधिक सहायक सिद्ध हुई है।
- वेद हिन्दुओं के प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथ हैं।
- संस्कृत शब्द “वेद” का अर्थ है “ज्ञान”। “विद्” शब्द इसका मूल है।
- प्राचीनकाल में वेदों को लिखने की प्रथा नहीं थी वरन उनमें निहित श्लोकों को गुरु से सुनकर शिष्य उन्हें याद रखा करते थे।
- सर्वमान्य विश्वास के अनुसार वेदों की रचना ईसा पूर्व लगभग1500-500 में हुई थी।
- वेदों की कुल संख्या चार है – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
- वेदों को संहिता के नाम से भी जाना जाता है।
- ऋग्वेद में 1,028 श्लोक हैं।
- ऋग्वेद के श्लोकों का होत्रि ब्राह्मणों के द्वारा सस्वर पाठ किया जाता था।
- वेद के श्लोकों में देवताओं की स्तुति की गई है।
- देवताओं में युद्ध तथा ऋतओं के देवता इन्द्र का सर्वाधिक वर्णन पाया जाता है।
द्वितीय स्थान अग्नि देवता का है।
Posted by Udit bhargava at 11/04/2009 10:58:00 pm 1 comments
भारतीय इतिहास – झलकियाँ
- निस्सन्देह भारत की सभ्यता विश्व के प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है।
- सिन्धु घाटी में ईसा पूर्व 2300 से 1750 तक जगमगाते रहने वाली उच्च सभ्यता के अवशेष आज भी विद्यमान हैं।
- ऐसा माना जाता है कि ईसा पूर्व 2000 से 1500 के मध्य इन्डो-यूरोपियन भाषाई परिवार से सम्बन्ध रखने वाले आर्यों ने हिमालय के उत्तर-पश्चिम दर्रों से भारत में प्रवेश किया और सिन्धु घाटी की सभ्यता को नष्ट कर दिया।
- वे आर्य सिन्धु घाटी एवं पंजाब में बस गये। कालान्तर में वे भारत के पूर्व तथा दक्षिण दिशाओं में स्थित स्थानों में फैल गये।
- आर्यों ने ही भारतीय सभ्यता से संस्कृत भाषा तथा जाति प्रणाली का परिचय करवाया।
- ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में उत्तर-भारत फारसी साम्राज्य का अंग बन गया।
- ईसा पूर्व 326 में मेकेडोनिया के अलेक्जेंडर महान ने फारसियों राज्यों को विजित किया। यद्यपि मेकेडोनियन्स का नियन्त्रण अधिक समय तक नहीं रहा किन्तु उनके अल्पकाल के नियन्त्रण के फलस्वरूप भारत एवं भूमध्यरेखीय देशों के मध्य व्यापारिक सम्बंध अवश्य स्थापित हो गया। रोमन संसार भारत को एक मसालों, औषधियों और कपास के कपड़ों से परिपूर्ण देश के रूप में जानने लगा।
- मेकेडोनियन शासनकाल के पश्चात् भारत पर मूल राजवंशों और सुदूर पहाड़ों पर बसने वाले जनजातियों का नियन्त्रण हो गया। मूल राजवंशों में मौर्य तथा गुप्त वँश सर्वाधिक प्रसिद्ध हुये।
- मौर्य साम्राज्य प्रथम सम्राज्य था जिसने लगभग सम्पूर्ण भारत को एक शासन के नियन्त्रण में अधीन बनाया।
- मौर्य साम्राज्य का काल ईसा पूर्व लगभग 324 से 185 तक रहा।
- चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने शासनकाल, जो कि ईसा पूर्व लगभग 298 तक चला, में उत्तर-भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अधिकतम स्थानों को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।
- चन्द्रगुप्त के पुत्र बिन्दुसार और बिन्दुसार के पुत्र अशोक ने अपने साम्राज्य का विस्तार सुदूर दक्षिण भारत तक कर लिया।
- पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) उनकी राजधानी थी।
Labels: भारतीय संस्कृति और इतिहास
Posted by Udit bhargava at 11/04/2009 10:49:00 pm 0 comments
कृष्ण और राम – असमानता में समानता

श्री कृष्ण और श्री राम दोनों ही भगवान विष्णु के अवतार हैं किन्तु यदि देखा जाए तो दोनों एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत प्रतीत होते हैं। दोनों के जन्म से ही क्रमों का उलटा हो जाना आरम्भ हो जाता है जो कि दोनों के जीवनपर्यन्त चलते जाता है।
श्री राम का जन्म त्रेता युग में चैत्र शुक्ल नवमी को दिन के ठीक बारह बजे हुआ था जबकि श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में भादों के कृष्णपक्ष अष्टमी को रात्रि के बारह बजे हुआ। जहाँ राम के जन्म के समय चारों ओर उजाला ही उजाला है वहीं कृष्ण के जन्म के समय घटाटोप अंधेरा है, मूसलाधार वर्षा होने के कारण अंधेरे की कालिमा अत्यधिक बढ़ गई है। सिर्फ रात और दिन तथा उजाला और अंधेरा का ही अन्तर नहीं है बल्कि पंचांग के हिसाब से तिथि भी एकदम विपरीत है। हिन्दू वर्ष बारह चन्द्रमासों का होता है और चैत्र माह से ठीक छः माह बीतने के बाद भादों माह आता है। जहाँ राम का जन्म शुक्लपक्ष में हुआ है वहीं कृष्ण का जन्म कृष्णपक्ष में हुआ है।
दूसरा बहुत बड़ा अन्तर है दोनों के वैवाहिक जीवन में। राम एकपत्नी व्रत रखते हैं तो कृष्ण की सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ हैं। राम स्वयं को सद् गृहस्थ दर्शाते हैं जबकि देखा जाये तो गृहस्थी का सुख उन्हें नहीं के बराबर ही मिला है। विवाह के कुछ दिनों पश्चात ही वनवास हो जाता है। वन में भी रावण उनकी पत्नी को हर कर ले जाता है। रावण का वध कर के पत्नी को जब वे वापस लाते हैं तो लोकापवाद के भय से उन्हें पत्नी का त्याग करना पड़ जाता है। तात्पर्य यह कि गृहस्थी का सुख उन्हें मिला ही नहीं फिर भी वे स्वयं को सद् गृहस्थ कहते हैं। इसके ठीक विपरीत कृष्ण को सदैव ही गृहस्थी का सुख मिला है, रुक्मणी; जाम्बवन्ती; सत्यभामा; कालिन्दी; मित्रबिन्दा; सत्या; भद्रा; लक्ष्मणा आठ पटरानियों के साथ ही साथ उनकी शेष सभी रानियाँ सदैव उनकी सेवा में प्रस्तुत रहती हैं किन्तु वे स्वयं को ब्रह्मचारी कहते हैं। जी हाँ अभिमन्यु के वध के पश्चात् जब सुभद्रा को मोह हो जाता है तो वे स्वयं के ब्रह्मचर्य शक्ति से ही सुभद्रा से अभिमन्यु की आत्मा का मिलाप करा के उनका मोह भंग करते हैं।
श्री राम मर्यादापुरषोत्तम कहलाते हैं क्योंकि उन्होंने सभी कार्य मर्यादा में रह कर ही किया किन्तु श्री कृष्ण ने मर्यादा को कभी बहुत अधिक महत्व नहीं दिया, अर्जुन की सहायता करने के लिये अपना वचन भंग करके शस्त्र धारण कर लिया, द्रोणाचार्य के वध के लिये धर्मराज युधिष्ठिर को असत्य का सहारा लेने के लिये प्रेरित कर दिया।
राम अपने मित्रों को बिना माँगे ही उनकी वांछित वस्तु दे देते हैं जैसे कि सुग्रीव और विभीषण को उन्होंने बिना माँगे ही क्रमशः बालि और रावण का राज्य प्रदान कर दिया। इसके विपरीत कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को उसके याचना करने के बाद ही वैभव प्रदान किया।
देखा जाये तो बहुत सारी विपरीतियाँ हैं दोनों अवतारों में किन्तु सभी विपरीतियों के बावजूद भी सबसे बड़ी समानता है कि दोनों अवतारों ने अपने काल में लोगों को त्रास, अन्याय, अधर्म आदि से मुक्ति दिलाई।
Labels: देवी-देवता
Posted by Udit bhargava at 11/04/2009 10:40:00 pm 0 comments
भारतीय संस्कृति – एक नजर में

भारतीय संस्कृति के ढाँचे में अलग-अलग युगों में समय, काल और परिस्थितियों के अनुसार तथा उन युगों की परंपरा, रीति-रिवाज और लोगों के विचारों एवं मान्यताओं के अनुसार अनेकों बार परिवर्तन हुआ है। इसी कारण से आज भी भारतवर्ष के अलग-अलग क्षेत्रों में अनेक प्रकार की संस्कृतियाँ, भाषायें,
परंपराएँ, रीति रिवाज और मान्यताएँ पाई जाती हैं।
भारत में हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख जैसे अनेक धर्मों और संप्रदायों का आविर्भाव हुआ जिनका प्रभाव न केवल भारत के वरन विश्व के अनेकों देशों के निवासियों पर आज भी देखने को मिलता है। दसवीं शताब्दी के बाद से भारत में पारसी, तुर्क, मुस्लिम आदि विदेशी संस्कृतियों का प्रभाव पड़ना आरम्भ हो गया
जिसके कारण यहाँ की संस्कृति में विभिन्नता और अधिक हो गई।
मार्क ट्वेन का मत है कि भारत मानव वंश का उद्गम, अनेक भाषाओं तथा बोलियों की जन्म-स्थली, इतिहास की माता, पौराणिक एवं अपूर्व कथाओं की मातामह (दादी) और अनेक परम्पराओं की प्रमातामह (परदादी) है। मानव इतिहास की अत्यंत बहुमूल्य उपलब्धियाँ भारत के खजाने की ही देन है। (India is the cradle of the human race, the birthplace of human speech, the mother of history, the grandmother of legend, and the great grand mother of tradition। Our most valuable and most astrictive materials in the history of man are treasured up in India only!) भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित भारतीय संस्कृति को अनेक भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। भारत पर विश्व के अनेकों धर्मों तथा संप्रदायों का भी प्रभाव रहा है जिसके परिणामस्वरूप यहाँ पर विभिन्न धार्मिक-सांप्रदायिक भावनाओं के मिश्रण से परिपूर्ण संस्कृतियों का भी प्रादुर्भाव भी हुआ। जहाँ भारत के ग्रामीण तथा कस्बाई क्षेत्रो में आज भी प्राचीन संस्कृतियों का प्रभाव बना हुआ है वहीं देश के बड़े नगरों में इन संस्कृतियों का विलोप होता जा रहा है और वैश्वीकरण का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
भाषा
प्रारम्भ से ही भारत में मूलतः दो प्रकार की भाषाएँ रही हैं – आर्य (उत्तर भारतीय) और द्रविड़ (दक्षिण भारतीय)। किंतु भारत का विस्तार अत्यंत विशाल होने के कारण यहाँ के विभिन्न क्षेत्रों में अनेकों प्रकार की भाषाओं तथा बोलियों का प्रचलन है तथा इन सभी भाषाओं और बोलियों पर भारत की मूल दो भाषाओं में से किसी न किसी का प्रभाव रहा है।
वेष-भूषा
जिस प्रकार से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार की भाषाएँ एवं बोलियों का प्रचलन है उसी प्रकार उन क्षेत्रों की वेश-भूषाएँ भी अलग-अलग प्रकार की हैं।
साहित्य
यद्यपि आज भारतीय साहित्य में विदेशी साहित्य का प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है किंतु प्राचीन काल में भारतीय साहित्य पर शुद्धतः धार्मिक भावनाओं का ही प्रभाव था। प्राचीन काल में विचारों को लिपिबद्ध करने का प्रचलन नहीं था। इस देश में प्रथा यह थी कि गुरु अपने शिष्य से अपना अर्जित ज्ञान को कहते थे और शिष्य उसे स्मरण के द्वारा संचित रखते थे। इसीलिये भारत में एक लंबे अंतराल तक श्रुतियों (सुना गया) और स्मृतियों (स्मृत रखा गया) की प्रथा चलती रही। चूंकि गद्य को याद रखना कठिन होता है और पद्य आसानी के साथ याद हो जाते हैं, इस देश में पद्यों की ही रचनाएँ होती रहीं जिसके परिणामस्वरूप अनेकों महाकाव्य बने।
दर्शन
वास्तव में वैदिक एवं पौराणिक साहित्य भारतीय दर्शन को ही प्रकट करते हैं। दर्शन का भारत पर सर्वाधिक प्रभाव रहा है। जहाँ एक ओर इस देश के ऋषि-मुनि पूर्णतः आध्यत्मिकता की शिक्षा देते हैं वहीं चार्वाक पूर्णतः सांसारिकता पर ही जोर देते हैं और दोनों ही सार्वजनिक रूप से मान्य हैं।
नृत्य एवं संगीत
भारत के निवासियों पर प्राचीन काल से ही नृत्य एवं संगीत का बहुत अधिक प्रभाव रहा है इसी कारण से संस्कृत में अनेकों नाटकों की रचनाएँ हुई जिनका नृत्य एवं संगीत के माध्यम से रसास्वादन किया जा सकता था। कालान्तर में नृत्य एवं संगीत भी दो मुख्य वर्गों में विभाजित हो गईं – उत्तर भारतीय और कर्णाटक।
चित्रकला
हमारे देश में यद्यपि विचारों को लिपबद्ध करने का प्रचलन नहीं था किंतु प्राचीन काल से अपने विचारों की अभिव्यक्ति चित्रकला के रुप में करने में लोगों की रुचि अवश्य ही रही है। यहाँ पाये जाने वाली अनेकों भित्तिचित्र इसी बात के उदाहरण हैं।
शिल्पकला
अजंता, एलोरा आदि गुफाओं में बनीं मूर्तियाँ इंगित करती हैं कि भारत के लोगों में प्राचीन काल से ही शिल्प कला के प्रति अत्यंत ही रुचि रही है।
वास्तुकला
उत्तर तथा दक्षिण भारत के अनेकों मंदिर, दुर्ग आदि इस देश की वास्तुकला की प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
संक्षेप में कहा जाये तो भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
Labels: भारतीय संस्कृति और इतिहास
Posted by Udit bhargava at 11/04/2009 10:29:00 pm 0 comments



एक टिप्पणी भेजें