18 जनवरी 2011

धर्म के साथ जुड़कर शांति चाहता है मनुष्य

प्रत्येक को शांति और अलौकिक आनंद की चाह होती है केवल इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह किसी किसी धार्मिक विश्वास के साथ स्वयं को जोड़ लेता है।

यह आचरण कई बार जातीय विषमता के कारण स्वार्थी लोग मानवता को दानवता द्वारा कुचलने की कोशिश कर रहे हैं। इस बात को सोचना होगा कि जब संसार में इंसान पैदा हुआ तो क्या वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, हिंदू , मुसलिम, सिख था। क्या जब बच्चे का जन्म होता है तो उसे कोई कहता है कि यह हिन्दु पैदा हुआ है या मुसलमान पैदा हुआ है। जहां सभी शांति चाहते हैं वहीं अशांति बढ़ती जा रही है। इंसान अपने ही भाई का खून बहा रहा है। अपनी पहचान को मिटाता जा रहा है। इसके पीछे एक ही कारण है, बचपन से गलत शिक्षा देकर कुछ मुट्ठी भर लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए भोले भाले प्रभु भक्तों को गुमराह कर दिया और धर्म के तवे पर अपने स्वार्थ की चपातियों को सेंकने लगे।
धर्म का प्रचार करने वाले धार्मिक लोग ही जब अधर्म करने लग जाएं तो धर्म के ऊपर से लोगों का विश्वास उठने लग जाएगा। चारों तरफ धर्म का प्रचार किया जा रहा है। लेकिन इसके साथ ही संप्रदायिकता का जहर कैंसर की तरह फैलता जा रहा है। पुराने रीति-रिवाज जो भी रहे हैं वे गलत नहीं रहे हैं, लेकिन कुछ लोगों ने धर्म ग्रंथों की शिक्षाओं के बीच से अपनी स्वार्थ पूर्ति का रास्ता बना लिया और लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया।
यह विश्वास हिंदु, मुसलिम,सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन आदि विभिन्न संप्रदायों के रूप में हमारे सामने है। इंसान जिस परिवार में जन्म लेता है। उसके संस्कार उसकी सभ्यता को स्वीकार करते हैं और अपने पूर्वजों के उत्तराधिकारी के रूप में खुद को आगे बढ़ाता है। इसका परिणाम कोई अच्छा नहीं रहा, क्योंकि विश्वास तक तो सब कुछ ठीक ठाक चलता है, लेकिन अंधविश्वास से द्वेष भावना, ईष्र्या, नफरत की चिंगारी, इंसान, परिवार और समाज को जलाकर राख कर देती है।

"राम के गुण गाओ, उसी के हो जाओ"

परमात्मा के चरणों में ही जीवन है, उसी की छाया में विश्व फल-फूल रहा है। यही परमात्मा यानी राम की कथा के श्रवण से कोटि-कोटि पापों का क्षय हो जाता है। जिसने भी रामकथा की सरिता में गोते लगाए, समझो उसने अपने उद्धारक सेतु का निर्माण कर लिया।
मानव जीवन में सात वस्तुएं मनुष्य को प्रभावित करती हैं जिनमें संशय, मोह, भ्रम, भय, अज्ञान, दुर्भाग्य और मानसिक रोग हैं।
राम कथा की मार्मिकता को जितना समझो, उतना कम है।
जीवन की सच्चाई इसमें समाहित है। इसी सच्चाई को दर्शाती है रामकथा। यह भौतिक संसार हमें कहां ले जा रहा है, इसका ज्ञान कराती है रामकथा। मोह का त्याग करना ही मोक्ष है, इसका संपूर्ण परिचय देती है रामकथा।
राम से बड़ा राम का नाम है। मिसाल के तौर पर, लंका में चढ़ाई से पहले समुद्र पर जो पुल बना, वह राम के नाम से ही संभव हो पाया। पत्थरों पर राम का नाम अंकित नहीं होता, राम के भक्त नल और नील उन पत्थरों को स्पर्श नहीं करते तो विशाल समुद्र पर बांध नहीं बनाया जा सकता था। इसके अलावा राम के परम भक्त हनुमान ने भी अपने हर साहसिक कार्य से पहले राम का नाम लिया और अपने उन कार्यों को सकुशल पूर्ण किया।
राम का नाम आज भी प्रासंगिक है। हनुमान का नाम लेने मात्र से भी उनके नाम की वंदना होती है। कलियुग में राम का नाम और अनन्यभक्त हनुमान का स्मरण, मानव जीवन का उद्धार करने वाला है। यही मानव जीवन का आधार है। अगर यह मानकर जीवन को जीया जाए तो मानो आप सब भौतिक वस्तुओं से उबर गए।
इसी राम नाम ने विश्व का निर्माण किया है। जिस भगवान ने मुझको बनाया है, उसी परमपिता परमात्मा ने बाकी लोगों को भी बनाया है। जब सभी का निर्माता वही ईश्वर है, जब सभी उसी ईश्वर की आराधना करते हैं तो फिर मैं कौन होता हूं ईश्वरीय कृति में विभेद करने वाला। जब मेरे ठाकुर के लिए सब समान हैं तो मेरे लिए भी सब समान हैं।
राम तो सभी के लिए समान भाव रखते हैं। सभी उनकी संतान हैं। वे तो सभी का भला चाहते हैं। फिर मनुष्य उन्हें कैसे भूल सकता है? राम नाम की जीवन में सार्थकता को समझाने केलिए किसी चीज को जटिल नहीं कर देना चाहिए। यह तो सीधी-सादे, मधुर वचनों में भक्तों के सामने व्याख्यायित होना चाहिए, बल्कि जो जटिल है उसे सरल बनाकर प्रस्तुत करना, राम नाम को हर मनुष्य तक पहुँचाना मेरा प्रयास है। वैसे मैं जन-जन तक राम की महत्ता को पहुंचाना चाहता हूं। इसको जटिल कर देने से क्या लाभ? फिर राम का नाम तो सभी लोगों के लिए समान है, तो क्यों इसको सुनने का पुण्य सभी को समान रूप से वितरित किया जाए।
इसलिए बहुत से लोग कथा सुनने आते हैं। उनमें हर आदमी तो बहुत विद्वान होता नहीं कि उनसे गूढ़ बातें की जाएं। जो भी आते हैं, वह गूढ़ बातों को समझने आते हैं, तो मैं हल्की-फुल्की बातों के जरिए आध्यात्म की गूढ़ बातें हर इंसान को समझाने की कोशिश करता हूं।
वास्तव में जीवन का लक्ष्य ही राम नाम का स्मरण मानकर चलें। मान लें कि राम का स्मरण करके जहां वह ले चलें, वहां चलते जाएं। वैसे भी मनुष्य व्यर्थ ही मन को अशांत कर लेता है और तुच्छ चीजों में फंसकर जीवन को नष्ट कर रहा है। वह जिस आनंद और शांति की प्राप्त चाहता है, उसको केवल राम के नाम में लीन रहकर ही प्राप्त कर सकता है। एक बार जरा इसी को अपना लक्ष्य मानकर चलें। अपनी मंजिल तक आप खुद--खुद ही प्राप्त कर लेंगे। अपने राम के पीछे हो लें, इससे ज्यादा सुखद मार्ग कोई है ही नहीं।
वह कब तुम्हारी उंगली पकड़कर तुम्हें मोक्ष दिला देगा, इसका आभास भी तुम्हें होने पाएगा। जीवन का सत्य तो यही है कि उसके बताए पथ पर बढ़ते रहो और सोचो कि जहां तक कदम साथ दे वहां तक चलते ही जाना है। फिर पता चलेगा कि वह परमपिता तुम्हें कभी हिम्मत हारने ही नहीं देगा।

17 जनवरी 2011

अतृप्त आत्माएं

क्या जीवन का अंत मृत्यु ही है? यह प्रश्न हर व्यक्ति के जीवन में मौजूद है और इसे जानने के लिये वह उत्सुक है। वैज्ञानिकों और परावैज्ञानिकों ने इसे खोजने में कोई कसर नहीं रखी। मृत्यु के बाद आत्मा इस संसार को छोड़कर चली जाती है। विज्ञान आत्मा के अस्तित्व को सही रूप से अभी भी समझ नहीं पाया है। विज्ञान आत्मा का रंग, रूप, आकार-प्रकार, वजन, माप, तौल आदि निश्चित कर नहीं पाया, मगर विज्ञान ने इतना अवश्य स्वीकार किया है की मनुष्य की मृत्यु होने ही आत्मा निकल जाती है। अमेरिकन फैडरेशन आफ साइंस ने दस साल पहले पुनर्जन्म के बारे में सम्मति दर्शाई है।

शरीर श्वसन क्रिया द्वारा वायुक्रिया से शरीर का संचालन कर्ता है। श्वास बंद होने से नश्वर शरीर निश्चेष्ट हो जाता है। प्राण शरीर को गतिशील रखता है और शरीर से प्राण निकल जाने से व्यक्ति को मृत घोषित करते हैं। आत्मा निर्मल, निष्कलंक एवं शुद्ध मानी जाती है और मनुष्य के भले और बुरे समस्त कर्मों और कुकर्मों का फल आत्मा को ही भुगतना पड़ता है। आत्मा से ही परमात्मा का संबंध है। आत्मा और प्राण के बीच का तत्व जीवन है। जीव और प्राण संयुक्त रूप से रहते हैं, मगर आत्मा निष्प्रभावित रहती है।


आत्मा अजर-अमर है और बार-बार जन्म लेती है। जन्म-कुण्डली के बारह भावों में दस दिशाएं, ग्यारहवां जीव और बारहवां शिव का विचार ऋषि-मुनियों ने किया है। युवावस्था में शारीरिक, प्रौद्धावास्था में मानसिक और वृद्धावस्था में आत्मा की तड़पन का शमन करना चाहिए।

जीवात्मा जब अपने स्थूल शरीर को छोड़कर दूसरे स्थूल शरीर में अपनी भोग, वासना, लालसा और इच्छाएं पूर्ण करने के लिये प्रवेश करती हैं, तब सूक्ष्म शरीर के साथ ही जाती हैं। मानव का सूक्ष्म शरीर, जिसमें अतः कारण रहता है, जो मृत्यु के पश्चात वैसा ही रहता है। सूक्ष्म शरीर काल तथा आकाश के बंधन से मुक्त होने से जहाँ ध्यान जाए, वहीं वह स्वयं। आत्मा प्रकाश की गति जैसी तीव्र है। प्रेतात्मा वायुरूप होने से पारदर्शी होती है। प्रेतात्मा किसी व्यक्ति की चेतना को प्रभावित कर उस पर अपना आधिपत्य भी जमा लेती है। भारत में प्रेतात्माओं के रहस्यमय जीवन पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अनुसंधान कार्य करना आवश्यक है।

भारतीय योगदर्शन एवं तंत्र विज्ञान अदृश्य-अतृप्त प्रेत योनियों को स्वीकार कर्ता ही नहीं, बल्कि उन्हें प्रत्यक्ष करने का मार्ग दिखलाता है। शकुनी, रेवती, पूतना, गंध्पूतना, शीत्पूतना, नाग्माई और स्कंध जैसे भूतों का उल्लेख शिव पुराण में दिया है। जातक के अंदर भूतों से भिन्न-भिन्न रोग एवं परिवर्तन उत्पन्न होते हैं। वासना देह की एक अदृश्य दुनिया है। इसमें उच्च कक्ष की आत्मा, माध्यम कक्षा तथा निम्न कक्षा का दुष्ट वर्ग; ऐसे तीन प्रकार की दिखाई देती है। भूत-प्रेत योनियों में वायु तत्व की प्रधानता के कारण अदृश्य होती है। वायु द्रव के देहधारी इच्छानुसार प्रकट या युप्त प्रकार का रूप से सकते हैं। भूत-पिशाच में स्त्री-पुरूष वर्ग भी है। दुष्ट वर्ग की अतिप्त आत्माएं खून, क्रोध, मोहमाया, वासना की तृप्ति के लिये परकाया प्रवेश करती हैं। अशांत और निर्बल मन वाले व्यक्ति, दूसरों से ईर्ष्या और वैर भाव रखता है (जिसके मन का कारक चन्द्र गृह राहू, केतु, शनि, मंगल से दूषित होता है, कालसर्प होता है) वैसे व्यक्ति में प्रवेश कर अपनी अतृप्त वासनाएं तृप्त करती हैं। दुर्बल चित्त मनुष्यों के अंदर प्रविष्ट कर तृप्त करने की चेष्टा करती हैं। गीता में कहा गया है की मनुष्य जीर्ण-पुराना कपड़ा उतारकर नया धारण करते हैं, वैसे ही आत्मा नश्वर देह का त्याग कर नया देह धारण करती हैं।

आत्मा का अस्तित्व होता है और मृत्यु के बाद तृप्त हो जाए तभी मोक्ष प्राप्त होता है, अन्यथा यहाँ-वहां अपनी वासना की पूर्ती हेतु भटकती रहती है। मोक्ष की प्राप्ति के पश्चात ही वे परलोक गमन करती हैं।

गरूड पुराण में अच्छे-बुरे कर्म के फल के बार में सविस्तार वर्णन किया है। असत्य बोलना, जुआ, रेस, सत्ता खेलना, क्रोध करना, धर्म स्थानों में पापाचार करना, माता-पिता को संताप देना, निंदा-टीका करना, रिश्वत लेना-देना, देव द्रव खुद के लिये वपरना, जीव-जंतु, पशु-पक्षी प्राणिमात्र पर हिंसा गुजारना, मघपान करना, खून करना, चोरी करना, गुंडागर्दी करना, नास्तिक बनकर देवी-देवता-ब्राह्मण की अवज्ञा करना, परस्त्रीगमन, परपुरुषगमन करना, व्यभिचार, सगोत्री के साथ शयन करना इत्यादि कार्यों को निषिद्ध किया है। रौरव, महारौरव, नामिसा, शामली, कुम्भीपाक नामक नरकों का गरूड पुराण में उल्लेख मिलता है। मृत्यु के बाद पुत्र पिण्डदान नहीं करे, तो मृतक की आत्मा अतृप्त रहती है, भूत-पिशाच बनती है।

घर में मृत्यु स्थान पर, घर के द्वार के नजदीक, चौराहे पर, शमशान में चिता की जगह पर छः पिण्ड प्रेत के लिये रखे जाते हैं।
भारतीय हिन्दू संस्कृति में आत्मा की शांति, तृप्ति और उसके मोक्ष हेतु भिन्न-भिन्न प्रकार से यत्न-प्रत्यन किये जाते हैं, जिनमें श्राद्ध, तर्पण इत्यादि प्रमुख हैं। इन कर्मकांडों के पश्चात आत्मा को शान्ति मिलती है। उसकी अतृप्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं और वह अपने परिजनों को जो उसके लिये कर्मकांड विधिपूर्वक करते हैं, उनको आशीर्वाद देकर जाती है। इसलिए आत्मा की शान्ति के लिये कर्मकांड न किये जाने से आत्मा सदैव सूक्ष्म शरीर में इधर-उधर विचरण करती रहती है और मोक्ष को प्राप्त नहीं होगी। नासिक, त्रयम्बक, चांदोद, कर्नाली, प्रभासपाटण, सिद्धपुर, गया, पुष्कर तीर्थस्थानों में नदी के तट पर, शंकर भगवान् के मन्दिर में पित्र तर्पण, नारायण, नागबली, त्रिपिंडी श्राद्ध करने से शुभफल प्राप्त होता है। यह फल 40 से 50 प्रतिशत मिलता है। 100 प्रतिशत फल नहीं मिलता, क्योंकि क्रियाकाण्ड श्रद्धापूर्वक सर्व परिवारजनों को साथ विधिवत शुद्ध मंत्रोच्चार के साथ करना आवश्यक है। राहु प्रधान व्यक्ति बहुधा नास्तिक दिखाई देता है।

जन्मकुंडली में केतु जहाँ हो उसी स्थान का व्यक्ति के प्रश्न रहते हैं। जन्म लग्न में चन्द्र, राहु, सूर्य, पंचम और नवम में पापग्रस्त शनि, द्वितीय में शनि, अष्टम में शनि, राहु लग्न में, केतु पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो, अष्टम में चन्द्र-शनि की युति, अष्टम में चन्द्र पाप गृह से निर्बल हो, साथ में सप्तम में राहु या केतु हो, तो व्यक्ति प्रेत बढ़ा से पीड़ित होता है। जिसका चन्द्र निर्बल हो, कालसर्प योग हो उसके ऊपर प्रेत बाधा, जादू-टोना होते हैं।

भूत-प्रेत के अस्तित्व को पाश्चात्य देशों में वैज्ञानिकों और परामनोवैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है। स्वामी अभयानंद ने अपने पुष्तक 'लाइफ बियोंड डेथ' में मृत आत्माओं के चित्र भी दिए हैं। पश्चिमी विद्वानों ने सूक्ष्म शरीर के तत्व को एकटोप्लाज्मा की संज्ञा दी है।

आज हम सब भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र को पाखण्ड-ढोंग कहते हैं। उनके बारे में जानने की ज़रा भी कोशिश नहीं करते कि क्या सत्य है। विश्व में अतृप्त आत्माएं, भूत-प्रेत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, ब्रह्म राक्षश, वैताल इत्यादि के अस्तित्व को फ्रांस के डोंक इयुजेन ओस्टली और केमीले फ्लेमरी योन; इटली के सीझट लोम्ब्रोस्वे, ब्रिटेन के सर आर्थर कानन डायल, सर विलियम बैरेट जैसे वैज्ञानिकों ने समर्थन दिया है।

योग वाशिष्ठ ग्रन्थ में अनुमोदन किया है कि अतृप्त आत्माएँ नया जीवन धारण करती हैं। जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं हो पाता, तब तक जीवात्मा अपनी स्मृति के कारण मृत्यु का अनुभव करती रहती हैं। अच्छी आत्माएं सदैव शुभ कार्य करती हैं। वे परलोक में भी प्रसन्नचित रहती हैं। जो मृत्युलोक में स्वभाव वाले अशुभ कार्य करते हैं, उनकी आत्माएं परलोक में भी क्लेश का अनुभव करती हैं।

कैसे पहुँचती है भोजन सामग्री पितरों तक?
श्राद्धपक्ष में पितरों की शांति के लिये ब्रह्मणों को भोजन कराया जाता है और यह माना जाता है कि इस कार्य से पितर तृप्त होते हैं। इस संबंध में दो प्रश्न उठाना स्वाभाविक है - प्रथम, ब्रह्मण को भोजन कराकर पितर की तृप्ति कैसे हो पाती है, द्वितीय यह आवश्यक नहीं है कि पितर मानव योनि में हो और विभिन्न योनियों में पैदा होने वाली व्यक्ति का आहार  भिन्न-भिन्न होता है, तो मानवयोनी के आहार से अन्य योनियों के जीव किस प्रकार संतुष्ट होंगे.। शास्त्रों में इन दोनों प्रशनों का उत्तर बहुत ही स्पष्ट तरीके से दिया गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि मृतक व्यक्ति का वंशज श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक अपने पितरों को याद करता है, तो वे किसी भी लोक में क्यों न हों अथवा किसी भी योनि में क्यों न हों, श्राद्धकर्ता के पास आ जाते हैं और श्राद्धकर्ता  द्वारा निमंत्रित ब्राह्मणों के माध्यम से भोजन प्राप्त कर लेते हैं, क्योंकि वे सूक्ष्म ग्राही होते हैं, तो भोजन के सूक्ष्म कणों के आघ्राण से उनका भोजन हो जाता है और वे तृप्त हो जाते हैं देवयोनि में गए हुए पितर को वह भोजन अमृत के रूप में प्राप्त होता है. मनुष्य योनि में गए हुए पितर को अन्न रूप में प्राप्त होता है, पशु योने में गए हुए पितर को चारे के रूप में, नाग योनि में गए हुए पितर को वायु रूप में, यक्ष योनि में गए हुए पितर को पान रूप में भोजन प्राप्त होता हैवायुपुराण में कहा गया है कि नाम, गोत्र, ह्रदय की श्रद्धा एवं उचित संकल्पपूर्वक दिए हुए पदार्थों को भक्तिपूर्वक उच्चारित मंत्र पितरों के पास पहुंचा देता है जीव चाहे सैकड़ों योनियों को भेए पार क्यों न कर गया हो तृप्ति तो उसके पास पहुँच जाती है मनुस्मृति में कहा गया है कि श्राद्ध के निमंत्रित ब्राह्मणों में पितर गुप्त रूप से निवास करते हैं प्राणवायु की भांति उनके चलते समय चलते हैं और बैठते समय बैठते हैं श्राद्धकाल में निमंत्रित ब्राह्मणों के साथ ही प्राणरूप में या वायुरूप में पितर आते हैं और उन ब्राह्मणों के साथ ही बैठकर भोजन करते हैं. मृत्यु के पश्चात पितर सूक्ष्म शरीरधारी होते हैं, इसलिए उनको कोई देख नहीं पाता और उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान, एक लोक से दूसरे लोक जाने में किसी भी प्रकार की रूकावट नहीं आती है

ज्ञान का सागर - अनमोल वचन ( 151 - 175 )

151   हमारे शरीर को नियमितता भाती है, लेकिन मन सदैव परिवर्तन चाहता है.
152   मनुष्य अपने अंदर की बुराई पर ध्यान नहीं देता और दूसरों की उतनी ही बुराई की आलोचना करता है. अपने तो पाप का बड़ा नगर बसाता है और दूसरे को छोटा गाँव भी ज़रा-सा सहन नहीं कर सकता है.
153   सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय, माँ-अपमान, निंदा-स्तुति ये द्वन्द निरंतर एक साथ जगत में रहते हैं और ये हमारे जीवन का एक हिस्सा होते हैं, दोनों में भगवान् को देखें.
154   मन-बुद्धि की भाषा है - मैं, मेरी. इसके बिना बाहर के जगत का कोई व्यवहार नहीं चलेगा. अगर अंदर स्वयं को जगा लिया तो भीतर तेरा-तेरा शुरू होने से व्यक्ति परम शांति प्राप्त कर लेता है.
155   न तो किसी तरह का कर्म करने से नष्ट हुई वास्तु मिल सकती है, न चिंता से कोई ऐसा दाता भी नहीं है, जो मनुष्य को विनष्ट वास्तु दे दे. विधाता के विधान के अनुसार मनुष्य बारी-बारी से समय पर सब कुछ पा लेता है.
156   जिस राष्ट्र में विद्वान् सताए जाते हैं, वह विपत्तिग्रस्त होकर वैसे ही नष्ट हो जाता है, जैसे टूटी नौका जल में डूबकर नष्ट हो जाती है.
157   पूरी दुनिया में 350 धर्म हैं. हर धर्म का मूल तत्व एक ही है, परन्तु आज लोगों का धर्म की उपेक्षा अपने-अपने भजन व पंथ से अधिक लगाव है.
158   तीनों लोगों में प्रत्येक व्यक्ति सुख के लिये दौड़ता फिरता है, दुखों के लिये बिलकुल नहीं. किन्तु दुःख के दो स्त्रोत हैं- एक है देह के प्रति मैं का भाव और दूसरा संसार की वस्तुओं के प्रति मेरेपन का भाव.
159   सारे काम अपने आप होते रहेंगे, फिर भी आप कार्य करते रहें. निरंतर कार्य करते रहें, पर उसमें ज़रा भी आसक्त न हों. आप बस कार्य करते, यह सोचकर कि अब हम जाए रहें बस, अब जा रहे हैं.
160   आप बच्चों के साथ कितना समय बिताते हैं, वह इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कैसे बिताते हैं.
161   पिता सिखाते हैं पैरो पर संतुलन बनाकर व ऊंगली थाम कर चलना, पर माँ सिखाती है सभी के साथ संतुलन बनाकर दुनिया के साथ चलना. तभी वह अलग है, महान है.
162   माँ-बेटी का रिश्ता इतना अनूठा - इतना अलग होता है कि उसकी व्याख्या करना मुश्किल है. इस रिश्ते से सदैव पहली बारिश की फुहारों- सी ताजगी रहती है, तभी तो माँ के साथ बिताया हर क्षण होता है अमिट, अलग. उनके साथ गुजारा हर पल शानदार होता है.
163   जो संसार से ग्रसित रहता है, वह बुद्धू तो हो सकता; लेकिन बुद्ध नहीं हो सकता.
164   विपरीत दिशा में कभी न घबराएं, बल्कि पक्की ईंट की तरह मजबूत बनाना चाहिय और जीवन की हर चुनौती को परीक्षा एवं तपस्या समझकर निरंतर आगे बढना चाहिए.
165   सत्य बोलते समय हमारे शरीर पर कोई दबाव नहीं पड़ता, लेकिन झूठ बोलने पर हमारे शरीर पर अनेक प्रकार का दबाव पड़ता है. इसलिए खा जाता है कि सत्य के लिये एक हाँ और झूठ के लिये हजारों बहाने ढूँढने पड़ते हैं.
166   अखण्ड ज्योति ही प्रभु का प्रसाद है. वह मिल जाए तो जीवन में चार चाँद लग जाएँ.
167   दो प्रकार की प्रेरणा होती है - एक बाहरी व दूसरी अंतर प्रेरणा. आतंरिक प्रेरणा बहुत महत्वपूर्ण होती है; क्योंकि वह स्वयं की निर्मार्त्री होती है.
168   अपने आप को को बचाने के लिये तर्क-वितर्क करना हर व्यक्ति की आदत है. जैसे क्रोधी व लोभी आदमी भी अपने बचाव में कहता मिलेगा कि यह सब मैंने तुम्हारे कारण किया है.
169   जब-जब ह्रदय की विशालता बढ़ती है तो मन प्रफुल्लित होकर आनंद की प्राप्ति कर्ता है और जब संकीर्ण मन होता है तो व्यक्ति दुःख भोगता है.
170   जैसे बाहरी जीवन में युक्ति व शक्ति जरूरी है, वैसे ही आतंरिक जीवन के लिये मुक्ति व भक्ति आवश्यक है.
171   तर्क से विज्ञान में वृद्धि होती है, कुतर्क से अज्ञान बढ़ता है और वितर्क से अध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है.
172   जिसकी मुस्कराहट कोई चीन न सके, वही असल सफा व्यक्ति है.
173   मनुष्य का जीवन तीन मुख्य तत्वों का समागम है - शरीर, विचार एवं मन.
174   प्रेम करने का मतलब सम-व्यवहार जरूरी नहीं, बल्कि समभाव होना चाहिए. जिसके लिये घोड़े की लगाम की भांति व्यवहार में ढील देना पड़ती है और कभी खींचना भी जरूरी हो जाता है.
175   इस दुनिया में ना कोई जिन्दगी जीता है, ना कोई मरता है. सभे सिर्फ अपना-अपना कर्ज चुकाते हैं.

विपश्यना से क्रोध का उपचार

क्रोध एक तरंग है-क्रोध मनुष्य के स्वभाव का एक भाग है। प्राय: सभी प्राणियों को कमोबेश क्रोध आता है। प्रत्येक व्यक्ति इससे छुटकारा पाना चाहता है। छुटकारा पाने के लिए मनुष्य ने कई तरीके ढूंढ निकाले हैं जैसे क्रोध के समय पानी पीना, गिनती गिनना, जिस इष्ट को मानता है, उस इष्ट देव को याद करना, मन्त्र जाप या किसी गुरु महाराज का नाम लेना इत्यादि-इत्यादि। इन प्रचलित तरीकों से क्रोध तो कम होता है, किन्तु समाप्त नहीं होता। उस समय तो क्रोध कम होता है किन्तु जब वही परिस्थिति दुबारा पैदा होती हैं, तब क्रोध उसी प्रकार उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि ये प्रचलित उपाय हमारे मन के ऊपरी सतह पर कार्य करते हैं। जबकि क्रोध मन की गहराइयों से उत्पन्न होता है। क्रोध को मन की गहराइयों से समाप्त करने के लिए हमें क्रोध की उत्पत्ति को समझना चाहिए। भगवान बुद्ध ने क्रोध व अन्य विकारों की उत्पत्ति तथा उसका निदान कैसे हो उसका तरीका बहुत ही सरल एवं वैज्ञानिक ढंग से समझाया है। भगवान बुद्ध बताते हैं कि हमारे मस्तिष्क के चार भाग हैं। पहला भाग है, संज्ञान। कोई भी तरंग पहले हमारी इन्द्रियों तक पहुंचती है। आवाज की तरंग हमारे कान में पहुंचती है, दृश्य की तरंग हमारी आंख के पट पर पहुंचती है, सुगंध की तरंग हमारी नाक तक पहुंचती है, स्वाद की तरंग हमारी जिह्वा पर पहुंचती है तथा स्पर्श की तरंग हमारी त्वचा पर पहुंचती है। जैसे ही इनमें से कोई एक तरंग हमारी किसी इंद्रिय पर पहुंचती है, तो उस इंद्रिय को इसकी जानकारी होती है। यह जानना हमारे मस्तिष्क का पहला भाग है। हमारे मस्तिष्क का दूसरा भाग इस तरंग को पहचानता है। जिह्वा पहचानती है कि यह तरंग स्वाद है। कान पहचानता है कि यह शब्द है, नाक पहचानती है कि यह गन्ध है, आंख पहचानती है कि यह वस्तु है, त्वचा पहचानती है कि यह स्पर्श है। इस तरह मस्तिष्क का दूसरा भाग पहचानने का काम करता है। यह तरंग मस्तिष्क के दूसरे भाग से तीसरे भाग पर पहुंचती है। हमारे मस्तिष्क का तीसरा भाग इस तरंग का विश्लेषण करता है। कान द्वारा शब्द को पहचानने के बाद हमारा मस्तिष्क इस तरंग का विश्लेषण करके हमें बताता है कि यह शब्द अच्छा है या बुरा, मधुर है या तीखा। शब्द के विश्लेषण के बाद यह तरंग मस्तिष्क के तीसरे भाग से चौथे भाग के पास पहुंचती है। यह भाग विश्लेषण के आधार शब्द के अच्छे या बुरे का निर्धारण करता है। शब्द यदि अच्छा है, तो मन उसे और सुनना चाहता है और शब्द यदि बुरा है, तो मन उसे सुनना नहीं चाहता। अच्छे शब्द के और सुनने की चाहत को तृष्णा या राग कहते हैं। अप्रिय शब्द के न सुनने की इच्छा को द्वेष कहते हैं। इस प्रकार राग और द्वेष की उत्पत्ति होती है। जब इस द्वेष की मात्रा बढ जाती है, तो हम उसे क्रोध कहते हैं। क्रोध की उत्पत्ति का यह विज्ञान है, जो तथागत गौतम बुद्ध ने ढूंढा था। उन्होंने कहा कि क्रोध भी एक तरंग है, जो हमारे मस्तिष्क के पट पर प्रतिबिम्बित होती है, जिसे हम अपने शरीर के किसी न किसी अंग पर संवेदना के रूप में महसूस कर सकते हैं। भगवान ने यह नियम ढूंढ निकाला कि शरीर पर संवेदन के उत्पन्न हुए बिना मस्तिष्क में कुछ भी उत्पन्न नहीं हो सकता।

यह तो हुआ क्रोध को बुद्धि के स्तर पर समझने का विज्ञान, किन्तु मात्र समझने से क्रोध दूर नहीं होता। भगवान ने क्रोध के विज्ञान को समझाने के साथ साथ इसे समूल नष्ट करने का तरीका भी बताया है। दबाने से नहीं अपितु मात्र देखने से क्रोध उत्पन्न नहीं होता यहां देखने से अभिप्राय है, महसूस करने से या अनुभव करने से। भगवान के इस विशेष तौर से देखने की विद्या को विपश्यना कहते हैं। क्रोध को सीधे-सीधे तो हम देख नहीं सकते, किन्तु जब आदमी क्रोधित होता है तो उसके हाथ पैर कांपने लगते हैं या ठंडे होने लगते हैं। उसकी सांस तेज हो जाती हैं। उसके दिल की धडकन बढ जाती है। ये सब क्रोधित मनुष्य के शरीर के ऊपर घटता है जिसे वह महसूस कर सकता है, देख सकता है। यह अनुभव प्रिय होगा या अप्रिय होगा। विपश्यनाहमें बुद्धि के विश्लेषण करने वाले भाग के स्तर पर हमें प्रिय या अप्रिय अच्छे या बुरे के रूप में विश्लेषण करने से बचा लेती है। एक साधक बार-बार अभ्यास करके बुद्धि के उस स्वभाव को बदल लेता है, जो कि प्रतिक्रिया करता है। यह स्वभाव का बदलाव मात्र बुद्धि के स्तर पर नहीं होता अपितु संवेदना के स्वभाव को जानने के आधार पर होता है। एक साधक उस सत्य को जान लेता है कि प्रत्येक संवेदना अनित्य है। अनित्यताके इस अनुभव पर वह अपने स्वभाव को भोक्ता-भाव से निकाल कर दृष्टा भाव में प्रस्थापित कर लेता है और प्रतिक्रियावादीस्वभाव से मुक्त होकर मात्र क्रियावादी बन जाता है। मन की गहराइयों में छुपे क्रोध के स्वभाव से धीरे-धीरे अभ्यास करते करते मुक्त हो जाता है। इसके अभ्यास के लिए साधक को दस का विपश्यनाका शिविर करना चाहिए। तब वह क्रोध को देखकर क्रोध से मुक्त होने का विज्ञान सीख सकता है। और अपने जीवन को सुखी बना सकता है तथा वातावरण को भी क्रोध के दुष्प्रभाव से मुक्त कर सकता है। क्रोध की तरंग से सचेत होकर कोई भी मनुष्य इस प्रकार क्रोध का उपचार कर सकता है।

विद्या की देवी माँ सरस्वती

'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभवस्त्रावृता 

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिदैवै सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती
निःशेषजाड्यापहा॥'
'जो कुन्द पुष्प, चँद्र, तुषार और मुक्ताहार जैसी धवल है, जो शुभ्र वस्त्रों से आवृत्त है, जिसके हाथ वीणारूपी वरदंड से शोभित हैं, जो श्वेत पद्म के आसन पर विरजित है, जिसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे मुख्य देव वंदन करते हैं, ऐसी निःशेष जड़ता को दूर करने वाली भगवती सरस्वती! मेरा रक्षण करे।'

सरस्वती के स्वरूप वर्णन में ही सच्चे सारस्वत के लिए मार्गदर्शन है। सरस्वती कुन्द, इन्दु, तुषार और मुक्तहार जैसी धवल हैं, सच्चा सारस्वत भी वैसा ही होना चाहिए। कुन्द पुष्प सौरभ फैलाता है, चँद्र शीतलता देता है, तुषारबिन्दु, सृष्टिका सौंदर्य बढ़ाता है और मुक्ताहार व्यवस्था का वैभव प्रकट करता है। सच्चे सारस्वत का जीवन सौरभयुक्त होना चाहिए।
पुष्प की सुगंध जिस तरह सहज फैलती है, उसी तरह उसके ज्ञान की सुगंध शांति प्रदान करती है उसी तरह सरस्वती का सच्चा उपासक अनेक लोगों के संतप्त जीवन में शांति का स्त्रोत बहाता है। वृक्ष के पत्ते पर पड़ा हुआ ओसबिन्दु मोती की शोभा धारण करके वृक्ष के सौंदर्य को बढ़ाता है, उसी तरह सरस्वती के सच्चे उपासक के अस्तित्व से संसार वृक्ष की शोभा बढ़ती है। 

ऐसे मानव के लिए कहना पड़ता है कि 'जयति तेऽधिकं जन्मना जगत्‌।' हार याने कुक्ताहार। अकेले मोती से मोतियों का हार ज्यादा सुंदर लगता है। सरस्वती के उपासकों को भी इस तरह एक साथ, एक सूत्र में बँधकर काम करने की तैयारी रखनी चाहिए। विद्वानों की शक्ति का ऐसा योग किसी भी महान कार्य को सुसाध्य बनाता है।

माँ सरस्वती ने धवल वस्त्र धारण किए हैं। सरस्वती का उपासक भी मन, वाणी और कर्म से शुभ्र होना चाहिए। सरस्वती के हाथ वीणा के वरदंड से शोभित हैं। वीणा संगीत का प्रतीक है। संगीत एक कला है। इस दृष्टि से देखने पर सरस्वती का उपासक संगीत का प्रेमी और जीवन का कलाकार होना चाहिए। संगीत यानी सम्यक्‌ गीत। 

वाणी के सुर जिस तरह सुसंवादित होते हैं, उसी तरह हमारे कार्य भी यदि सुसंवादित हों तभी हमारे जीवन में संगीत प्रकटेगा। वीणा को वरदण्ड यानी श्रेष्ण दण्ड कहा है। दंड यदि सजा का प्रतीक हो तो उससे श्रेष्ठ सजा दूसरी क्या हो सकती है? जिसकी सजा में भी संगीत है ऐसा सरस्वत ही दूसरे मानव का हृदय परिवर्तन कर सकता है। मानव को बदलने वाला दंड निश्चित ही श्रेष्ठ है, उसका दर्शन माँ सरस्वती हमें वीणा का वरदण्ड हाथ में रखकर कराती है।

सरस्वती श्वेत पद्म के आसन पर विराजमान है। सरस्वती उपासक श्वेत अर्थात्‌ विशुद्ध चरित्र का होना चाहिए। उसका आसन पद्म का होना चाहिए, यह बात बहुत ही सूचक है। पद्म आसपास के वातावरण से अलिप्त रहता है। कीचड़ में रहकर भी वह भ्रष्ट नहीं होता। सरस्वती के उपासकों को भी अपने आसपास के समाज में प्रवर्तमान भ्रष्टाचार से इसी तरह मुक्त रहना है।

ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे मुख्य देव माँ शारदा को वंदन करते हैं, उसमें भी रहस्य है। माँ सरस्वती ज्ञान और भाव का प्रतीक है, यह बात उनके हाथ में की पुस्तक और माला से समझ में आती है। पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है और माला भक्ति प्रतीक है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश अनुक्रम में सर्जन, पालन और संहार के देव हैं। इन तीनों को ज्ञान और भाव की जरूरत है। 

बिना भाव का सृजन, बिना ज्ञान का पालन और बुद्धिहीन संहार अनर्थ करता है। इसलिए किसी भी कार्य के सृजन में, उस कार्य को टिकाने में और उस कार्य में घुसी हुई बुराई को दूर करने के लिए ज्ञान और भाव दोनों जरूरी है और इसीलिए किसी भी महान कार्य करने वाले महापुरुष को सरस्वती वंदना करनी ही चाहिए।
माँ सरस्वती हमारे जीवन की जड़ता को दूर करती है, सिर्फ हमें उसकी योग्य अर्थ में उपासना करनी चाहिए। सरस्वती का उपासक भोगों का गुलाम नहीं होना चाहिए। दूसरों की संपत्ति देखकर मन में अस्वस्थता निर्माण नहीं होना चाहिए। उसे निष्ठापूर्वक अपनी ज्ञानसाधना अखंड करते रहना चाहिए।

विद्वान मानव को धन का अभाव कभी भी नहीं सालना चाहिए। धनिक मानव केवल भोग में ही आनंद को खोजने में भटकता रहता है, जब कि विद्वान को वह आनंद निसर्ग-दर्शन से, जीवन के भाव प्रसंगों और साहित्य के सृजन या आस्वादन से सहज प्राप्त होता है।

सरस्वती का वाहन मयूर है। मोर कला का प्रतीक है। सरस्वती काल की भी देवी है। चौदह विद्या और चौसठ कला ये सभी सरस्वती की उपासना में आती है। कला जीविका प्रदान करती है और विद्या जीवन देती है। इस तरह सरस्वती हमारे समग्र अस्तित्व को आवृत्त करती है। सरस्वती के उपासक की प्रतिष्ठा समाज करे या न करें, परन्तु ज्ञान के वाहक के रूप में सम्मान करके भगवान अवश्य उसे अपने मस्तिष्क पर चढ़ाएँगे।
इस बात की प्रतीति भगवान कृष्ण ने मोरपंख को अपने माथे पर चढ़ाकर दी है। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य गोपालकृष्ण को 'सुपिच्छगुच्छ मस्तकम्‌' कहकर उसकी विरुदावली गाते हैं। समाज में मेरा योग्य सम्मान नहीं होता ऐसा जिस विद्वान को लगता हो उसे इस संदर्भ में मोर और मोरपंख के बीच हुए संवाद स्वरूप नीचे का श्लोक हमेशा याद रखना चाहिए-
'अस्मान्विचित्रवपुषस्तव पृष्ठलग्नात्‌
कस्माद्विमुञ्चसि भवान यदि वा विमुञ्च।
रे नीलकण्ठ गुरुहानिरियं ततैव
गोपालसू नु मुकुटे भवति स्थितिर्नः॥'
मोरपंख मोर से कहता है कि, 'दीर्घकाल तक तेरी पीठ पर रहकर मैंने तेरी शोभा बढ़ाई है। मुझे तू अब क्यों झटक देता है? अथवा तू मुझे भले ही छोड़ दें, परन्तु उसमें तेरा ही नुकसान होने वाला है, तेरी शोभा नष्ट होने वाली है, मेरा स्थान तो भगवान गोपालकृष्ण मुकुट में है।'

अपना तिरस्कार करने वाले समाज को कोई भी सच्चा विद्वान उपरोक्त बात कह सकता है। समाज योग्य विद्वानों का सम्मान नहीं करेगा तो उसमें नुकसान समाज का ही है। विद्वानों को तो भगवान अपने सर पर
चढ़ाने के लिए तैयार ही हैं।

इस बात को ध्यान में रखकर सच्चे विद्वान को बड़प्पन प्राप्त करने के लिए कभी भी किसी की भी खुशामत नहीं करनी चाहिए। लाचार या निस्तेज मानव को शारदा के मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता।
जीवन में तेजस्विता लाने के लिए सरस्वती की उपासना करनी चाहिए। सच्चे सारस्वत को माँ शारदा के मंदिर का पावित्र्य टिकाना चाहिए।

शारदा के मंदिर में कला होनी चाहिए, परन्तु कला के स्वागत में विलासिता ने प्रवेश नहीं करना चाहिए। शारदा के मंदिर में विद्या होनी चाहिए, परन्तु विद्या के नाम पर अविद्या नहीं बेचनी चाहिए। शारदा के मंदिर में प्रेम होना चाहिए, परन्तु प्रेम के नाम पर मोह नहीं उत्पन्न होना चाहिए। शारदा के मंदिर में दिव्यता होनी चाहिए, परन्तु उन्मत्तता देखने को नहीं मिलनी चाहिए।

शारदा के मंदिर में नम्रता होनी चाहिए, परन्तु नम्रता का स्वांग धारण करके लाचारी नहीं घुसनी चाहिए। शारदा के मंदिर में प्राणों का प्रस्फुरण होना चाहिए, लेकिन निराशा के निश्वास नहीं निकलने चाहिए।
शारदा नित्य यौवन, स्तन्यदायिनी माता के समान है। वह अपने उपासक को जीवन देती है, उसके जीवन में कवन (काव्य) सर्जती है और उसे अपनी शक्तियों का सच्चा अनुभव समझाती है।
माँ शारदा को लाख-लाख वंदन!

16 जनवरी 2011

फोरप्लेः सबसे सही शुरुआत

क्या आपको लगता है कि सेक्स आपके जीवन का बस एक नीरस हिस्सा बनकर रह गया है। इसके प्रति न तो आपके मन में कोई उत्सुकता है और न रोमांच... बल्कि आप इसे जैसे-तैसे रोजमर्रा के किसी काम की तरह निपटाना चाहते हैं। यदि हां, तो शायद आपको फोरप्ले के बारे में गंभीरता से सोचना होगा।

सेक्स महज रूटीन वर्क नहीं
फोरप्ले... यानी कि सेक्सुअल एक्ट अथवा संभोग से पहले की एक लंबी भूमिका और शायद हमारे सेक्स जीवन का सबसे अहम हिस्सा। विशेषज्ञों का मानना है कि सेक्स अथवा प्यार आपके जीवन में रोजमर्रा की किसी क्रिया से कहीं ज्यादा है। और दरअसल फोरप्ले ही सेक्स को एक रुटीन वर्क से अलग करता है और उसे स्त्री और पुरुष दोनों के लिए एक आनंददायक अनुभव में बदल देता है।

स्त्री-पुरुषः अलग-अलग मानसिकता
फोरप्ले की अहम भूमिका दरअसल स्त्री और पुरुष की भिन्न मानसिकता के चलते भी है। यह सच है कि पुरुष पलक झपकते सेक्स के लिए मूड में आ जाते हैं और तैयार भी हो जाते हैं। मगर यह स्त्रियों के संदर्भ में सच नहीं है। उनके भीतर प्यार की चिनगारी भड़कने में समय लगता है। फोरप्ले दरअसल सेक्स में दोनों को बराबर का भागीदार बनाने में मदद करता है। लिहाजा, इसके लिए जरूरी है कि अपने साथी में भी वैसी ही कामुकता और उत्तेजना पैदा करें जैसी कि आपके भीतर है।

सेक्स लाइफ में कुछ नया जोड़ें
फोरप्ले सिर्फ बेडरूम पर आपके बिस्तर का हिस्सा नहीं... बल्कि वह किसी भी प्रेमी जोड़े या दंपति के जीवन का अहम हिस्सा है। अपने पहले चुंबन को याद करिए। किस तरह वह आपके और आपके साथी में सिहरन भर देता था। अगली बार उसके जादू को महसूस करते हुए अपने होठों को साथी के होठों, गरदन या कानों के पास घुमाइये... और बस उसका असर देखिए।अपने पार्टनर के लिए सेक्सी से संदेश छोड़ें। उसके पर्स में, रात को ड्रेसिंग टेबल के शीशे पर या फिर चुपके से जेब में। मोबाइल पर कुछ गुदगुदाने वाले सेक्सी संदेशों का आदान-प्रदान करें... देखें किस तरह से सेक्स आपके लिए एक उबाऊ सी चीज़ नहीं बल्कि रिश्तों को नई तरो-ताज़गी से भर देता है।

कल्पनाशील और शरारती बनें
स्पर्श का प्यार से गहरा रिश्ता है। अपने स्पर्श के जादू से साथी को भी परिचित होने दें। उसमें कुछ नया जोड़ें। सुगंधित तेल से मसाज़, तेज शावर के नीचे साथ खड़े होना या फिर अंधेरे कमरे में सिर्फ हाथों से एक-दूसरे के होने को महसूस करना...कल्पनाशील बनिए। शरारती बनिए। कुछ नया करने की सोचिए। देखिए आपकी जिंदगी किस तरह से उमंगों से भर जाती है और आपके साथी में आपके लिए कैसी दीवानगी और कैसा जुनून पैदा करती है।