15 जनवरी 2011

शादी का पहला साल...

हनीमून के बाद विवाहित जोड़े धीरे-धीरे अपनी असली जिंदगी में लौटने लगते हैं। जब आप अपने साथी की आदतों को और करीब से जानने और समझने लगते हैं। आप पाते हैं आपका साथी ज्यादा समय तो स्पोर्ट्स चैनल से ही चिपका रहता है। या फिर पड़ोसियों के गॉसिप में ही वक्त बिताता है। ये छोटी-छोटी बातें भी आपके बीच दूरियाँ पैदा कर सकती हैं। ऐसी नौबत भी आ जाती है जब पति-पत्नी एक ही छत के नीचे किसी अनचाहे रूमेट की तरह रहने लगते हैं। जिनके बीच प्यार कम और झगड़े ज्यादा होते हैं।

नए जोड़ों के लिए शुरूआती एक साल काफी मुश्किल भरा होता है । जीवनभर साथ निभाने के उस वादे के बोझ तले उनका रिश्ता घुटने लगता है । ऐसे स्थिति में वो हमेशा गुस्से और परेशानी में नजर आते हैं। उनको लगने लगता है कि उनसे बहुत बड़ी गलती हो गई है। ऐसी स्थिति भी आती है जब दोनों का प्यार धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। जिस प्यार और विश्वास की नींव पर रिश्ते का महल खड़ा करते हैं वो भी चटकने लगता है।

ऐसी स्थिति न आएँ उसके लिए आप इन बातों का खास ध्यान रखें-
शादी के दिन अपने साथी से जो वादा करें उसे कभी न भूलें। परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत हों अपने साथी के प्रति प्यार कम नहीं होना चाहिए। आपका वचन विश्वास और सच्चाई पर टिका होना चाहिए। ध्यान रहे, कि आपके वचनों से जोश, आकर्षण और खुशी नदारद न हो।

परेशानी शुरू होने से पहले ही उसे सुलझा लें
जब आप अपनी नई जिंदगी शुरू कर रहे हैं उन सारे मुद्दों पर खुलकर बात करें जो विवाद का कारण बन सकते हैं। अपने जीवन के लक्ष्यों पर स्पष्ट रूप से बात करें। अपने बजट तय कर लें। इससे आप नई शादी-शुदा जिंदगी में उठने वाले 90 प्रतिशत तक विवादों को कम कर सकते हैं।

स्वतंत्रता के साथ करें बजटिंग
*जब आप अपनी नई जिंदगी की शुरूआत कर रहे हैं तो सबसे बड़ी परेशानी का कारण बनता है-बजट। पैसे के खर्चे को लेकर दोनों के बीच तनाव बना रहता है। कौन ज्यादा फिजूलखर्ची है, इसपर बहस होती रहती है। यहाँ सबसे अहम है आपसी समझ और संवाद का होना। यह देखना दोनों की जिम्मेदारी है कि कितना पैसा आ रहा है और उसे कैसे और कहाँ खर्च करना है?बजट बनाने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप महीनेभर की उन खास जरूरतों की एक लिस्ट बना लें। उन सामानों को जरूरी और गैरजरूरी हिस्सों में बाँट लें।

फिर से है चाहत की तलाश...
'दूध का जला छाछ को भी फूँक-फूँक कर पीता है' कहावत बहुत पुरानी है पर असरदार भी उतनी ही है। प्रेम में चोट खाने के बाद भी इसको 'फॉलो' करना उतना ही समझदारी भरा है। जी हाँ, एक बार टूटे दिल को बार-बार तोड़ने का मौका थोड़े ही ना देंगे आप! तो उठाइए कुछ समझदारी भरे कदम और दूध व छाछ दोनों का सही लुत्फ लीजिए।

ऐसे भाग्यशाली बहुत कम होते हैं जो कॉलेज लाइफ में कभी न कभी दिल की चोट नहीं खाते। लेकिन यह भी सच है कि ऐसी चोटों से इस उम्र में दिल नहीं टूटा करते। दिल के लिहाज से यह उम्र कच्ची भले होती है, लेकिन इसमें टूट-फूट से उठकर खड़े होने की क्षमता भी खूब होती है। सवाल है कि शीशा-ए-दिल की इस खूबी का कैसे इस्तेमाल किया जाए? आइए हम बताते हैं-

दूध से जले हैं तो...
जी हाँ! किसी की याद में दिल लगाकर बैठे रहना ठीक नहीं तो दूसरे के लिए इतना उतावलापन भी ठीक नहीं। अभी-अभी आपका ब्रेक-अप हुआ है। ...और अभी आप फिर से किसी के लिए बेकरार होने लगे। इसका मतलब है कि आपको फिर धक्का लग सकता है। ऐसे में यह धक्का आपको स्तब्ध करने वाला भी हो सकता है। इसलिए रीबाउंड रिलेशनशिप में जरा धीरे-धीरे आगे बढ़ें। जरूरत से ज्यादा जल्दबाजी न दिखाएँ। इसके लिए बहुत जरूरी है कि कुछ वक्त आप अपने साथ गुजारें। यह आपको मजबूत बनाएगा और किसी भी रिश्ते में आने वाली परेशानियों को आप झेल पाएँगे।

ऐसा पानी न बनें जो हर तरफ बह चले
किसी ने आपसे प्यार के दो बोल बोले नहीं कि आप फिसलने को तैयार। हालाँकि टूटा दिल रोके हुए बाँध की तरह होता है। जहाँ जरा-सी साँस मिली पानी बह चला। इसी तरह टूटे दिल के साथ आप किसी के साथ भी जुड़ जाते हैं। थोड़े से प्यार में ही आप एक लंबे रिश्ते की संभावनाएँ तलाशने लगते हैं, लेकिन यह जल्दबाजी ठीक नहीं। क्योंकि जिस शख्स में आप अचानक जन्म-जन्म का बंधन तलाशने लगते/लगती हैं कई बार तो यह ऐसा इंसान निकलता है, जिसकी तरफ सामान्य हालात में आप देखेंगे भी नहीं।

बरकरार रखें अपनी कसौटी
जिंदगी जीने के हर व्यक्ति के अनेक उसूल होते हैं। इन उसूलों पर कायम रहना जरूरी होता है। क्योंकि हमें खुशी तभी हासिल होती है जब हमें लगता है कि हम इस खुशहाली के लिए कोई समझौता नहीं कर रहे। इसलिए अगर खुश रहना है तो अपने उसूलों की कसौटी को हमेशा बरकरार रखें, लेकिन कई बार खासकर जब हम टूटे हुए होते हैं और ऐसे में हममें कोई जरा-सी दिलचस्पी दिखाने लगता है तो हम अपने सिद्धांतों, अपनी कसौटी की अनदेखी करने लगते हैं। उस समय हम किसी भी ऐसे इंसान के पास जाने को तैयार रहते हैं, जो इसमें दिलचस्पी दिखा रहा होता है। अगर आपके साथ ऐसा हो रहा हो तो समझिए कुछ गड़बड़ है। अपने पैमाने पर कायम रहें। उसे छोटा न होने दें, क्योंकि इस चक्कर में कई लोग ऐसे इंसान के साथ जिंदगी बिता देते हैं, जो उनके काबिल नहीं होता।

मुखौटे से बचें
आप पहले इतना ज्यादा स्मोक या ड्रिंक नहीं करते थे, जितना एक नए दोस्त के साथ करने लगे हैं। अगर ऐसा है तो बात खतरनाक है। दरअसल, आप जो असल में हैं, उसे बहुत देर तक तो छिपा नहीं सकते, लेकिन इस तरह अगर आपके व्यवहार में कुछ बदलाव आया है, तो यह आगे चलकर आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है।

फायदा भूलने में ही है
हम नहीं कहते हैं कि यह आसान है, लेकिन बेहतरी उसे भूलने में ही है। क्योंकि आपका रिश्ता टूट चुका है, लेकिन अब भी वो शख्स आपके दिलोदिमाग पर छाया रहता है। आप उसे भूल ही नहीं पा रहे हैं। आप किसी न किसी से उसके बारे में बात करना चाहते हैं। सिर्फ इसलिए आपको किसी का साथ चाहिए? ऐसी बेकरारी से सावधान रहें। ऐसे रिश्ते का कोई फायदा नहीं।

पलायन ठीक नहीं...
दिल टूटने के बाद कुछ लोग गम भुलाने के लिए बहुत बड़े फैसले ले लेते हैं मसलन कॉलेज छोड़कर चले जाते हैं, पढ़ाई छोड़ देते हैं वगैरह...। ऐसे अहम फैसले, जिनसे नुकसान भी हो सकता है, बिना सोचे-समझे कभी न लें। ऐसे जल्दबाजी में लिए गए फैसले काफी खतरनाक होते हैं। ब्रेकअप के कम से कम एक साल तक तो कोई अहम फैसला न लें।

तुम ही दुनिया नहीं
कई बार टूटे दिल आशिक किसी को भी गले से लगा लेते हैं तो कई बार इसके उलटा होता है। ऐसे लोगों के दिल-दिमाग में यह बात घर कर जाती है कि उनसे सुंदर, उनसे अच्छा दुनिया में कोई और है ही नहीं। ये दोनों अतियाँ खतरनाक होती हैं। इससे किसी और का नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ आपका नुकसान होता है। इसलिए जब किसी से ब्रेकअप हो तो अपने अहं के लिए नहीं बल्कि जिंदगी के लिए यह मानकर चलें कि तुम दुनिया नहीं हो। तुम्हारे बाद भी दुनिया है।

रिश्तों की उम्र को लगी नजर

 
इसे बदलते वक्त का चलन कहिए, 
धैर्य और सामंजस्य में कमी कहिए 
या फिर आधुनिकता का तकाजा अब 
रिश्तों की उम्र कम होने लगी है।

 
मोहब्बत अब तिजारत बन गई है... अपने समय का यह मशहूर गीत आज भी प्यार के परवानों के लिए खास बना हुआ है। मगर जैसे ही दोनों परवाने अग्नि के सात फेरे लेते हैं, उसके कुछ समय बाद इस रिश्ते पर ठंडा पानी पड़ना शुरू हो जाता है। कल तक जिसका कुछ देर का साथ पाने के लिए नौजवान भंवरे की तरह मंडराता नजर आता था, शादी के बाद वही मदहोश आंखें अंगारे बरसाती नजर आती हैं और प्यार की खुमारी झटके से उतरनी शुरू हो जाती है।

शुरुआती दौर में प्यार का खुमार इस कदर सिर चढ़कर बोलने लगता है कि इनसान सब कुछ भूल मोहब्बत को जिंदगी का मकसद बना लेता है। प्यार के इस चढ़ते हुए खुमार में प्रेमिका की एक झलक पाने भर के लिए नौजवान घर से लेकर स्कूल, कॉलेज तथा दफ्तर तक के चक्कर लगाते नजर आते हैं। जिंदगी भर तारों की छाँव में रखकर हर एक आरजू पूरी करने का दावा ठोकते हैं।

मगर मोहब्बत के परवान चढ़ते ही प्यार की पूरी खुमारी ही काफुर होने लगती है। अग्नि के चारों ओर लगने वाले सात फेरे मोहब्बत की सारी आग ठंडी कर देते हैं। इसी के साथ शुरू हो जाती है वो हकीकत जिसमें आटे-दाल का भाव मोहब्बत का पूरा नशा उतार देता है। प्रेम के दौर में जिस प्रेमिका के लिए सब कुछ छोड़कर आस-पास मंडराने वाला नौजवान बिस्तर से उठने तक को तैयार नहीं होता।

मल्टीनेशनल फाइनेंस कंपनी में काम करने वाला आशीष मार्च के पूरे महीने इस कदर व्यस्त रहता था कि आराम करने का समय भी नहीं मिल रहा था। गुड़गाँव के दफ्तर से तिमारपुर के अपने घर तक का सफर भी उसे भारी लगता था। घरवालों के कहने पर तो किसी भी काम के लिए हिलने को तैयार नहीं होता था। इसी बीच प्रेमिका श्वेता ने बताया कि उसे रात में करनाल स्थित अपने घर जाना है। आशीष रात के नौ बजे ही घर से अपनी बाइक उठाकर सरायकाले खाँ बस अड्डे पहुँच गया। श्वेता को बाइक पर बैठा रात में करनाल तक छोड़ने भी चला गया। बिजी शेड्यूल और दिनभर की थकान के बावजूद करनाल तक जाने वाला ऐसा प्रेमी पाकर श्वेता भी निहाल हुए जा रही थी।

एक साल बाद घरवालों को मनाकर दोनों ने शादी कर ली। कुछ ही दिनों में प्यार का पुराना दौर खत्म होना शुरू हो गया। अब आशीष के पास श्वेता के लिए समय नहीं होता था। बेटा हुआ और कुछ साल के बाद स्कूल भी जाने लगा। अब सुबह के समय स्कूल बस आती है। तीसरी मंजिल पर रहने वाला आशीष अब श्वेता के लाख कहने पर भी बच्चे को स्कूल बस में बिठाने के लिए भी नीचे नहीं आता क्योंकि मोहब्बत की तिजारत अब काफुर हो चुकी है।

12 जनवरी 2011

बोझ से वरदान बनती आबादी

वक्त के साथ बदलाव का एक रोचक नमूना देखना हो तो भारत की आबादी पर नजर डाली जा सकती है। बीते कल के चश्मे से देखने पर जो आबादी महज एक बोझ और समस्या नजर आती थी आज उसे भारत के भविष्य की सबसे बड़ी ताकतों में से एक कहा जा रहा है। इसकी वजह है बाजार के नजिरये से इस आबादी में छिपी विशाल संभावनाएं।पिछले सौ साल के दौरान हमारी अर्थव्यवस्था ने तरक्की तो की लेकिन आबादी की तेज रफ्तार तरक्की के फायदे तेजी से हजम भी करती रही। यही वजह थी कि हाथों के लिए काम और खाने के लिए पर्याप्त भोजन की कमी ने आबादी को देश के लिए बोझ बना दिया।भारत के गांवों और शहरों में रहने वाले अरबों लोगों की जरूरतें संभावनाओं का एक महासागर पैदा कर रही हैं जिसका फायदा उठाने के लिए दुनिया की हर बड़ी कंपनी भारत की तरफ दौड़ रही है ।

लेकिन अब ये बोझ हमारी ताकत में बदल रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के गांवों और शहरों में रहने वाले अरबों लोगों की जरूरतें संभावनाओं का एक महासागर पैदा कर रही हैं जिसका फायदा उठाने के लिए दुनिया की हर बड़ी कंपनी भारत की तरफ दौड़ रही है । इसलिए बाजार के नजरिये से देखा जाए तो भारत का भविष्य उज्ज्वल है।लेकिन लोगों की संख्या ही काफी नहीं। जरूरतों को पूरा करने के लिए उन के हाथ में पैसा भी होना चाहिए। पैसा जितना ज्यादा होगा, जरूरतें उतनी ही अधिक और फलस्वरूप खपत उतनी ही ज्यादा। निराशावादी लोग कह सकते हैं कि जिस देश में अभी भी करोड़ों लोग गरीबी की रेखा से नीचे जिंदगी बिता रहे हों वहां भविष्य के उज्ज्वल होने की बात कहना जल्दबाजी होगा। लेकिन ये सच है कि गरीबी के बावजूद आबादी बढ़ी है और अभावों के बावजूद लोगों ने जिंदगी में आगे बढ़ना सीखा है। इसके अलावा आबादी के हर वर्ग की अपनी जरूरतें हैं और यही वजह है कि बाजार के पास भी विकल्पों की कमी नहीं । बड़े ब्रांड्स के लिए भी कंज्यूमर्स हैं और छोटे ब्रांड्स के लिए भी। अतीत हमें बताता है कि वक्त के साथ जरूरतों के समाधान निकल आते हैं। लोगों की बुनियादी जरूरतें जब हल हो जाती हैं तो इसके बाद वे बड़ी जरूरतें पैदा कर लेते हैं। इसलिए भारत में हर तरह के ब्रांड के लिए खपत की संभावना मौजूद है।


कहा जा सकता है कि आबादी का ये आंकड़ा वर्तमान और भविष्य के भारत के लिए एक बड़ी ताकत साबित होने जा रहा है। एक ऐसी ताकत जिसके चलते दुनिया की हर बड़ी कंपनी इस तरफ दौड़ेगी। परंपरागत बाजारों की गर्मी अब ठंडी पड़ रही है और इसलिए मार्केटिंग कंपनियों का भविष्य भारत जैसे उभरते बाजार ही तय करेंगे।

मंत्र-जप का चमत्कारी प्रभाव

जिस शब्द में बीजाक्षर है, उसी को `मंत्र´ कहते है। किसी मंत्र का बार-बार उच्चारण करना ही `मंत्र जप´ कहलाता है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि वास्तव में मंत्र जप क्या है? जप से क्या परिणाम निकलता है?

हमारे मन को दो भागों में बांटा जा सकता है- १। व्यक्त चेतना (Conscious Mind) तथा २. अव्यक्त चेतना (Unconscious Mind)। हमारा जो जाग्रत मन है, उसी को व्यक्त चेतना कहते हैं। अव्यक्त चेतना में हमारी अतृप्त इच्छाएँ, गुप्त भावनाएँ इत्यादि विद्यमान हैं। व्यक्त चेतना की अपेक्षा अव्यक्त चेतना अत्यन्त शक्तिशाली हैं। हमारे संस्कार, वासनाएँ - यह सब अव्यक्त चेतना में ही स्थित होते हैं। किसी मंत्र का जब जप होता है, तब अव्यक्त चेतना पर उसका प्रभाव पड़ता है। मंत्र में एक लय होती है, उस मंत्र ध्वनि का प्रभाव अव्यक्त चेतना को स्पन्दित करता है। मंत्र जप से मस्तिष्क की सभी नसों में चैतन्यता का प्रादुर्भाव होने लगता है और मन की चंचलता कम होने लगती है। मंत्र जप के माध्यम से दो तरह के प्रभाव उत्पन्न होते हैं। १. मनोवैज्ञानिक प्रभाव (Psychological Effect) और २. ध्वनि प्रभाव (Sound Effect) - मनोवैज्ञानिक प्रभाव तथा ध्वनि प्रभाव के समन्वय से एकाग्रता बढ़ती है और एकाग्रता बढ़ते से इष्ट सिद्धि का फल मिलता ही है। मंत्र जप का मतलब है इच्छा शक्ति को तीव्र बनाना। इच्छा शक्ति की तीव्रता से क्रिया-शक्ति भी तीव्र बन जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप इष्ट का दर्शन या मनोवांछित फल प्राप्त होता ही है। मंत्र अचूक होते हैं तथा शीघ्र फलदायक भी होते है।

मंत्र जप और स्वास्थ्य
लगातार मंत्र जप करने से उच्च रक्तचाप, ग़लत धारणाएँ, गंदे विचार आदि समाप्त हो जाते हैं। मंत्र जप का साइड इफेक्ट यही है। मंत्र में विद्यमान हर एक बीजाक्षर शरीर की नसों को उद्दीप्त करता है, इससे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से गतिशील रहता है। `क्लीं´, `ह्रीं´ इत्यादि बीजाक्षरों को एक लयात्मक पद्धति से उच्चारण करने पर हृदय तथा फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व उनके विकार नष्ट होते हैं। जप के लिए ब्रहा मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय परा वातावरण शान्ति पूर्ण होता रहता है, किसी भी प्रकार का कोलाहल या शोर नहीं होता। कुछ विशिष्ठ साधनाओं के लिए रात्रि का समय अत्यन्त प्रशस्त होता है। गुरू के निर्देशानुसार निर्दिष्ट समय में ही साधक को जप करना चाहिए। सही समय पर सही ढंग से किया हुआ जप अवश्य ही फलप्रद होता है।

मंत्र जप करने वाले साधक के चेहरे पर एक अपूर्व तेज छलकने लगता है, चेहरे पर एक अपूर्व आभा आ जाती है। आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो जब शरीर शुद्ध और स्वस्थ होगा, शरीर स्थित सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करेंगें, तो इसके परिणाम स्वरूप मुखमण्डल में नवीन कांति का प्रादुर्भाव होगा ही।

10 जनवरी 2011

पुण्यप्रदायिनी माघी पूर्णिमा

माघी पूर्णिमा को स्नान, दान, जप, हवन आदि करने से अनंत फल की प्राप्ति के साथ ही नवग्रह जनित दोष समाप्त हो जाते हैं।
माघ का महीना अन्य महीनों में विशिष्ट स्थान रखता है। मकर के सूर्य में अमृतकण धरती के जल से निकलते हैं। कुंभ के गुरु में मकर से मेष तक का सूर्य पुण्यदायी है, इसीलिए महाकुंभ का पावनकाल हरिद्वार में माना गया है। माघ मास की पूर्णिमा को ही कलियुग का आरंभ हुआ था। ऐसे में माघी पूर्णिमा को स्नान, दान, जप, हवन आदि करने से अनंत फल की प्राप्ति के साथ ही नवग्रह जनित दोष समाप्त हो जाते हैं। माघी पूर्णिमा का स्नान सारे पापों को नष्ट करता है, साथ ही दान अनंत पुण्यदायी होता है। मकर राशि का संबंध राशिपति होने के कारण शनि से तथा उच्च राशि होने के कारण मंगल से है। सूर्य की गर्मी इस माह में कम रहती है, अत: चंद्रमा बलवान होता है।

बुध, गुरु एवं शुक्र भी माघ मास में क्रमश
युवा विद्यार्थी, बौद्धिक कार्य करने वाले पुरुष एवं महिला वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। राहु-केतु भी माघी पूर्णिमा से धरती पर उत्पन्न होने वाली ऋत अग्नि एवं ऋत सोम का संचालन करते हैं। कह सकते हैं कि सारे नवग्रहों का संबंध माघ मास एवं माघी पूर्णिमा से बना रहता है। माघी पूर्णिमा का अनंत फल प्राप्त करने के लिए अरुणोदयकाल में सूर्योदय से डेढ़ घंटा पहले स्नान करना सवरेत्तम माना जाता है। तारों की छांव में स्नान करने पर अनंत फल, तारे छिपने पर मध्यम फल तथा सूर्योदय होने पर स्नान सामान्य फलदायी होता है। पद्मपुराण के अनुसार माघी पूर्णिमा या त्रयोदशी से पूर्णिमा तक तीन दिन भी लगातार स्नान, दान, जप, हवन-पूजन, कीर्तन किया जाता है तो पूरे मास जितना फल प्राप्त होता है।

सूर्य यदि हीन बली हो तो हृदयरोग, चंद्रमा निर्बल हो तो मनोरोग, मंगल क्षीण स्थिति में हो तो रक्तचाप, बुध कमजोर हो तो उदर व्याधि एवं आयरन की कमी, गुरु क्षीण बली होने पर लीवर से जुड़े विकार एवं मधुमेह, शुक्र तेज की कमी, शनि वातरोग, चर्मरोग, कमरदर्द, राहु जोड़ों में दर्द तथा केतु अस्थि विकार आदि करवाते हैं। माघी पूर्णिमा को प्रात: स्नान करके यदि सूर्य को अघ्र्य दें तथा सात अनाजों का दान करें तो सूर्य का दोष समाप्त हो जाता है। चंद्रमा के निमित्त मिश्री, शक्कर एवं चावल का दान करें। मंगल के निमित्त चने की दाल एवं गुड़ का। बुध के निमित्त केला, आंवला एवं आंवले के तेल का।

गुरु के निमित्त सरसों के तेल, सिकी मक्का, एक रत्ती सोना आदि का। शुक्र के लिए घी, मक्खन, सफेद तिल, गजक आदि। शनि के लिए काले तिल, तिल्ली का तेल, लोहपात्र, काला वस्त्र आदि। राहु के लिए जूते-चप्पल, भोजन अधोवस्त्र आदि तथा केतु के निमित्त स्कार्फ, टोपी, पगड़ी, विकलांग लोगों की सहायता, कंबल आदि का दान इन सभी ग्रहों के कारण होने वाले विकारों को दूर करते हैं। माघी पूर्णिमा के दिन पितरों को तर्पण करने का विशेष महत्व होता है। इस बार माघी शुक्ल पूर्णिमा शनिवार को है तथा पुष्य नक्षत्र का संयोग है, जो एक अद्भुत योग बना रहा है। इसी दिन होलिकारोपण भी है जो पापों पर पुण्य की विजय का प्रत्यक्ष संकेत देता है। माघी पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी अमृतमयी रश्मियों से पृथ्वी के जल में एक विशिष्ट तत्व का संचार करता है, जो आमजन का कष्ट निवारक बन जाता है।

04 जनवरी 2011

कैसे करें महिलाएं आत्मरक्षा ?



"कहते हैं, नारी की खूबसूरती उसकी नजाकत है. माना कि यह सच है, 
लेकिन इसके साथ-साथ यह भी कडवा सच है कि कदम-कदम पर 
आज भी आए दिन नारी के साथ छेड़छाड़, बलात्कार, दोयम दर्जें का, 
उपेक्षित तो कभी-कभी पाशविक व्यवहार होता है. 
लेकिन अब वक्त भी काफी बदल गया है. 
आज की नारी पहले से जागरूक और अपनी सुरक्षा के प्रति 
अधिक सचेत हो गई है. अब वह अपने अस्तित्व, आत्मनिर्भरता 
और आत्मसम्मान को लेकर खुलकर बोलने और प्रतिवाद करने लगी है. 
अब वह अपनी सुरक्षा स्वयं करने के लिये भी प्रतिबद्ध है."





आइए, ऐसे कई पहलुओं पर गौर करते हैं, जहाँ पर महिलाओं को एहतियात बरतनी चाहिए.

आपके बात करने का ढंग काफी मायने रखता है. अजनबियों से घुल-मिलकर बातें न करें. बातचीत संक्षेप में और शालीनता के साथ करें.
 महिलाओं को अपने कपड़ों पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए. छोटे-छोटे कपडे या बदन दिखाऊ कपडे पहनना उचित नहीं है. अक्सर मिनी स्कर्ट के नाम पर कम व खुले कपडे पहन कर लडकियां खुद मुसीबत मोल लेती हैं.
यदि कोई लड़का छेड़े तो घबराएं नहीं, बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ उस स्थिति का सामना करें. उसे डांट-फटकार लगा दें. यदि आस-पास पुलिस है तो उनकी भी मदद ले सकती हैं.
अपना रोज का शेड्यूल फिक्स न रखें, जिसे निश्चित समय पर उसी रास्ते से आना-जाना, कभी-कभी रास्ता और वक्त बदल दें.
आँफिस जाते समय अधिक ज्वेलरी खासकर सोने-हीरे की न पहनें. कभी-कभी इनकी वजह से भी मुसीबत आन पड़ती है.
भीड-भाड वाली जगहों से चलने की कोशिश करें. अकेले सुनसान जगह पर न चलें.
यदि बहुत बड़ी बिल्डिंग और रात का समय है तो सीढ़ियों की जगह लिफ्ट से जाएं. दरअसल, सीढ़ियों पर चहल-पहल कम होती है, जिससे वहां क्राइम अधिक होते हैं.
कोशिश करें आँटो रिक्शा  व टैक्सी की जगह बस, ट्रेन आदि पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें.
यदि बस स्टांप सुनसान हो तो किसी पास की सुनसान दुकान के पास खडी होकर बस का इंतज़ार करें.
ट्रेन में भीडभाड वाले कम्पार्टमेंट में बैठें.
जब कभी कार ड्राइव करें तो खिड़की के शीशे चढ़े हुए तथा दरवाजे अच्छे तरह लांक हों, इस बात का ध्यान रखें.
कभी भी अपनी गाडी को सुनसान जगहों पर पार्क न करें. जब भी कार से बाहर निकालें तो आसपास के माहौल पर एक सजग सरसरी निगाह जरूर डालें.
यदि कोई हथियार यानी चाकू, बन्दूक आदि दिखाकर कोई अचानक हमला करे तो हिम्मत न हारें. मुसीबत का डटकर मुकाबला करें और हो सके तो भागने की पूरी कोशिश करें.
टैक्सी लेनी हो तो टैक्सी स्टैंड से लें और टैक्सी काए नंबर जरूर नोट करें.
यदि कहीं लंबी दूरी के लिये तक्सी लेने है तो ट्रेवल एजेंसे से मंगवाएं, ताकि कुछ प्राब्लम होने पर दरैवर का पता आसानी से मालूम हो सके.
यदि कार में कोई खराबी हो जाए और मदद की जरूरत पड़े तो हमेशा ट्रैफिक से विपरीत दिशा में चलें, जिससे आप देख सकें कि सामने से क्या आ रहा है?
यदि कोई आपका कार से पीछा कर रहा हो तो जिस दिशा से आप आयी हैं, हमेशा उसी दिशा में भागें. विपरीत दिशा में दौड़ने से पीछा करने वाले के लिये आपको ट्रेस करना आसान हो जायेगा.
यदि आप सुनसान इलाके से गुजर रही हैं तो अधिक एहतियात बरतें. मोबाइल पर एफएम म्यूजिक या I-Pod आदि न सुनें.
घर और आँफिस से अक्सर जिन रास्तों से जाती हों, उनके बीच के स्थानों पर दोस्त-सहेलियों आदि के घर, परिचितों के घर का प्रबंध जरूर करें, ताकि कभी मुसीबत पड़ने पर तुरंत उनसे सहायता ली जा सके.
जब कभी पब्लिक बूथ से फोन पर बात करें तो पीठ फोन की तरफ कर लें, जिससे आप सामने की तरफ देख सकें और कोई मुसीबत आने पर फोन पर मौजूद सामने वाले को बता सकें.
बेहद महत्वपूर्ण और कारगर उपाय - मुसीबत में फसने पर शोर जरूर मचाएं.


 नारी को अपनी सुरक्षा के लिये किन-किन बातों पर ध्यान देना चाहिए. इस सन्दर्भ में विभिन्न क्षेत्र से जुडी महिलाओं के विचार इस प्रकार हैं.

बातचीत का तरीका शालीन हो
किरण गणत्रा जो कि सायकोलाँजिकल काउंसलर हैं, उनका कहना है, "नारी के बात करने का ढंग काफी मायने रखता है. आपकी बातचीत में शालीनता बेहद जरूरी है, नहीं तो सामने वाले को रंग सिग्नल मिलता है. इसके अलावा आपका ड्रेसिंग सेन्स भी सही होना चाहिए. फैशन के नाम पर कुछ भी पहन लेना, खासकर खुले, बदन दिखाऊ कपडे पहनना ठीक नहीं है. ऐसे में अप्रत्यक्ष रूप से आप खतरे को न्यौता देते हैं. साथ ही आप अकेले-अनजानी जगह पर जाने से बचें. यदि बहुत जरूरी हो तो किसी को साथ जरूर लें. अपनी आत्मरक्षा के लिये कोई-न-कोई विघा जरूर सीखें."

सबसे जरूरी सेल्फ कान्फिडेंस
ग्राफिक डिजाइनर भावना शाह के विचार थोड़े क्रांतिकारी हैं. वे कहती हैं, "आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, छेड़छाड़ करने वाले, बदतमीज किस्म के लोग आपको मिलेंगे ही. इसलिए सबसे महत्वपूर्ण है अपना सेल्फ कान्फिडेंस. यदि आप आत्मविश्वास से भरपूर रहेंगी तो बहुत-सी समस्या यूं ही हल हो जाती हैं. फिर आपका बाँडी लैंग्वेज और लोगों से बात करने का तरीका कैसा है, इस पर गौर करें. हर पल सजग रहना चाहिए. दुकान, सब्जी वाले से लेकर अन्य बाहरी लोगों से संक्षेप में और आदरपूर्वक बात करना चाहिए."

वक्त के पाबंद हों
महाराष्ट्र स्टेट वूमंस काउंसलिंग की हेड मोहिनी माथुरजी स्त्री आत्मरक्षा के संबंध में अपना अनुभवी लेखा-जोखा देते हुए कहती हैं, "समाज में हर तरह के लोग होते हैं. मैं स्त्री के पहनावे पर अधिक कमेन्ट नहीं करूंगी. दरअसल, हर स्त्री को आकर्षित दिखने के लिये खूबसूरत ड्रेसेस पहनने का अधिकार है. हाँ, आप वक्त के पाबन्द हों. कोशिश करें कि देर रात तक घर के बाहर न रहें. यदि आपका आचरण, पहनावा और हावभाव संतुलित रहेगा, तो किसी को आपके साथ कुछ करने की हिम्मत ही नहीं होगी. स्त्री को खुद में आत्मविश्वास और मजबूती लानी होगी, ताकि मुसीबत का सामना कर सकें. सेल्फ डिफेन्स के लिये कराते, जूडो सीख सकती हैं, लेकिन फिर भी मेरा तो यह मानना है कि पुरुष तो पुरुष ही है. आदमी की ताकत और क्षमता का मुकाबला भला स्त्री कहाँ कर सकती है. लेकिन आपकी पर्सनैलिटी सौम्य और शालीन है, तो मुसीबत में पड़ने की संभावना कम ही रहेगी."

बेटियों को एज्युकेटेड बनाएं
स्टांक मार्केट में टेक्निकल एनिमिस्ट अनु जैन के विचार परिपाटी से हटकर हैं, वे नारी को कमजोर कतई नहीं मानती. "आज की महिलाओं में इतनी कूबत है कि वे हर स्थिति का सामना सूझबूझ से कर सकें. वे बेहद मजबूत हैं. वक्त के साथ बहुत कुछ बदला है, पहले की बात और थे जब लडकियां घबराती-शर्माती थीं. लेकिन आज अपनी आत्मरक्षा के लिये स्त्री हाथ उठाने से लेकर जूता तक मार देती हैं. दरअसल, भारतीय पुरूष की संकीर्ण सोच ही के कारण अधिक समस्या पैदा होती है.

हर माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटियों को एज्युकेटेड बनाएं, साथ ही उन्हें मानसिक तौर पर भी इतना मजोबूत बनाएं कि कभी भी किसी भी परिस्थिति में वे मुसीबत का सामना पूरी बहादुरी से कर सकें, फिटनेस लेवल पर ध्यान दें यानी कि फिजिकली फिट रहें. अब स्कूलों में बच्चों को कराते, मार्शल आर्ट आदि सेल्फ प्रोटेक्शन के क्लासेस चलाए जाते हैं, इसे सीखने के लिये लड़कियों को जरूर प्रोत्साहित करें."

सतत जागरूक रहें
राधिका शेख जो कि पिछले 10 सालों से लड़कियों को सेल्फ डिफें की विद्या सिखा रहीं है, अब तक करीब 3000 लड़कियों को वे आत्मरक्षा के गुर सीखा चुकी हैं. वे खुद थर्ड डिग्री की ब्लैक बेल्ट हैं. राधिका जी ने अपने पति आरिफ शेख के साथ आत्मरक्षा सिखाने का अभियान शुरू किया था. वे स्कूल की लड़कियों के लिये कैम्प वगैरह भी लगाती हैं. कई महिलाएं उनके क्लासेस में सीखने के लिये आते हैं. वे हथियार बगैर, स्टिक यानी कि डंडे से आत्मरक्षा कैसे की जाए सिखाती हैं, इसके अलावा फिलीपिन्यो मार्शल आर्ट एक्स्क्रैमा भी वे सिखाती हैं. स्त्री की आत्मरक्षा के संबंध में राधिका जी अपने विचार कुछ इस प्रकार रखती हैं, "लड़कियों को सतत जागरूक रहना चाहिए. अक्सर लडकियां अपनी धुनकी में या फिर सहेलियों के साथ गप्पे लड़ाते हुए चलती हैं. ऐसा नहीं करना चाहिए. उन्हें अपने अगल-बगल में क्या हो रहा है, इसके प्रति सजग रहना चाहिए. साथ ही अपने आने-जाने का वक्त फिक्स न रखें, न जाने कौन ताक लगाएं बैठा हो. कोशिश करें कि सहेलियों के साथ या फिर ग्रुप में स्कूल, काँलेज, क्लासेस, घर, घूमने-फिरने आदि जगह जाएं, जब कभी मुसीबत में पड़ें तो मदद के लिये गुहार लगाएं या फिर जोर से 'फायर' चिलाएं. यह एक तरह से अटेंशन कैचिंग लाइन है. अपने साथ छोटा-मोटा कोई हथियार यानी चाबी, बाँडी स्प्रे आदि जरूर रखें, ताकि कोई अचानक हमला करे तो उसकी आँखों में स्प्रे मार सकें. देखिये, मेरा तो यह सोचना है कि लड़कियों को खतरे के समय काँमनसेन्स दिखाकर सबसे पहले अपने आपको बचाना भी बेहद जरूरी है यानी मैं भागने में अधिक यकीन रखती हूँ. आप भले ही जूडो-कराते, मार्शल आर्ट या फिर खुद को बचाने की कोई भी विद्या जानती हों. लेकिन लड़ने से बेहतर है कि खुद को बचाना, जान है तो जहान है."

02 जनवरी 2011

जीवन में लाएं प्यार की ऊर्जा

प्यार शायद दुनिया के सभी प्राणियों को कुदरत की तरफ से दिया गया सबसे बेहतरीन तोहफा है। यही जीवन में रंग भरता है और जीवन तथा इस सृष्टि की निरंतरता को बनाए रखता है। शायद इसी वजह से प्राचीन हिन्दू परंपराओं में इसे जीवन के चार अहम उद्देश्य धर्म, अर्थ और मोक्ष के साथ काम के रूप में अहमियत दी गई है। प्राचीन हिन्दू धर्म जीवन में आने वाले इस आनंद की अनुभूति को उतना ही अहम मानता है, जितना कि ज्ञान की तलाश को।


प्यार यानी शरीर, मन और आत्मा
सेक्स को हम महज यौन क्रिया से नहीं जोड़ सके। यह दोनों लोगों के बीच गहरी आत्मीयता से पैदा होता है। जब दो लोग एक-दूसरे की परवाह करते हैं। जब हमारा शरीर, मन और आत्मा एक हो जाते हैं। यह तभी संभव होता है जब हम सामने वाले की भावनाओं की कद्र करना सीखते हैं।

सेक्स में प्यार की अहम भूमिका है। सबसे पहले एक शारीरिक क्रिया होने के नाते इसका हमारे शरीर से गहरा नाता है। महिलाओं में यौन क्रिया आक्सीटॉनिक को शरीर में प्रवाहित करती है। यह आक्सीटॉनिक उनके भीतर स्नेह और सेवा की भावना को मजबूत करता है। इतना ही नहीं यौन क्रिया हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है।

मन से गहरा रिश्ता है सेक्स का
सिर्फ शरीर नहीं मन से भी सेक्स का गहरा रिश्ता है। एक स्वस्थ सेक्स जीवन किसी भी स्त्री अथवा पुरुष के भीतर शांति और प्रसन्नता की भावना पैदा करता है। यह उनके आपसी रिश्तों को मजबूत करता है। यह प्रसन्नता की भावना उनके लिए लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन का सबब भी बनती है।

प्यार किसी भी दंपति के लिए आनंद का सबब बनते हैं। मगर दांपत्य जीवन में प्यार का मतलब सिर्फ सेक्स से नहीं जोड़ना चाहिए। कई बार विभिन्न वजहों से आपके साथी में सेक्स के प्रति अनिच्छा भी पैदा हो सकती है। ऐसी स्थिति में हमें उसकी वजह को जानने और उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए। यदि पार्टनर की इच्छा न हो तो सेक्स को कभी उस पर थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी दिक्कतों को शेयर करते हुए उससे सहानुभूति का बर्ताव करना चाहिए।

तो याद रखिए... सेक्स आपके जीवन का एक अहम हिस्सा तभी बनेगा जब आप उसे प्यार की ऊर्जा से सराबोर रखेंगे। तभी आप एक स्वस्थ सेक्स जीवन, बेहतर संबंधों और मजबूत होते रिश्तों की तरफ बढ़ सकेंगे।