28 अक्टूबर 2010

संत मध्वाचार्य ( Sant madhvacharya )

संत मध्वाचार्य  जी का जन्म विक्रम संवत 1295 में माघ शुक्ल पक्ष सप्तमे के दिन माता वेदवती के गर्भ से हुआ. मतात्तर से आश्विन शुक्ल दशमी को इनका जन्मदिन माना जाता है. इनके पिता का नाम नारायण भट्ट था. कहा जाता है कि स्वयं भगवान नारायण की आज्ञा से वायुदेव ने भक्ति सिद्धांत की रक्षा के लिये आचार्य माधव के रूप में अवतार ग्रहण किया था. आचार्य मध्व बचपन से ही अलौकिक शक्ति से परिपूर्ण थे. इनका मन पढाई के प्रति कम था. यज्ञोपवीत होने पर भी ये दौड़ने, कूदने, तिरने और कुश्ती लड़ने में ही लगे रहते थे, अतः लोग इन्हें 'भीम' नाम से पुकारते थे. ये वायुदेव के अवतार थे. इसलिए यह नाम भी सार्थक ही था. भावत कृपा से इन्हें अल्पकाल में ही सम्पूर्ण विहा का ज्ञान अनायास ही प्राप्त हो गया था. इन्होने 11 वर्ष की अवस्था में अद्वैत मत के सन्यासी अच्युतपक्षाचार्य जी से संन्यास की दीक्षा ग्रहण की. इनकी बुद्धि इतनी तीव्र थी कि ये अपने गुरूजी से शास्त्रों पर प्रतिवाद किया करते थे. बहुत ही अल्प गुरू अनन्तेश्वर  जी से इनका इतना स्नेह था कि एक बार इन्होने गुरूजी से स्नान और दिग्विजय करने की आज्ञा माँगी, तो ऐसे सुयोग्य शिष्य के विरह की संभावना से उन्होंने कहा कि भक्तों के उद्धारार्थ गंगा जी को वहीं पर एक सरोवर में ला दिया. आज भी वर्तमान में हर 12वें वर्ष में एक बार इस स्थान पर गंगा जी का प्रादुर्भाव होता है मध्वाचार्य जी ने अनेक स्थानों पर विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ किये. इनके शास्त्रात का उद्देश्य भगवतभक्ति का प्रह्चार, वेदों की प्रामाणिकता का स्थापन, मायावाद का खंडन और मर्यादा का संरक्षण था. एक जगह पर तो इन्होने  और वेद, महाभारत और विष्णुसहस्त्रनाम के क्रमशः तीन, दस और सौ अर्थ बताकर और उनकी व्याख्या करके विद्वानों को आश्चर्यचकित कर दिया. इनकी बुद्धि इतनी कुशाग्र थी कि इन्होने गीता पर ही महाभाष्य लिख दिया और बद्रीनारायण पवित्र धाम की यात्रा की. वहां पर इन्होने महर्षि वेदव्यास को अपना लिखा हुआ भाष्य दिखाया. अनेक विद्वानों ने इनसे पराजित होकर इनके मत को स्वीकार किया. मध्वाचार्य जी बड़े ही चामत्कारिक थे. उन्होंने अनेक प्रकार की योग सिद्धियाँ प्राप्त कर रखी थीं. एक बार किसी व्यापारी का जहाज द्वारका से मालाबार तट को जा रहा था कि बीच रस्ते में वह डूब गया. उस जहाज में भगवान श्रीकृष्ण की सुन्दर मूर्ती राखी थी. मध्वाचार्य जी ने उस मूर्ती को जल से निकालकर उदूपी में स्थापित किया. ऐसे परमकल्याणी सम्पूर्ण मानव जाती का हित चाहने वाले मध्वाचार्य जी ने सरिदन्तर नामक स्थान पर अपनी देह का त्याग किया.

कैसे असर करता है तंत्र ?

अधिकांश तांत्रिक प्रयोगों में इसी कारण नाखून, बाल, पहने हुए वस्त्र या अन्य किसी प्रकार की वास्तु का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि ये भले ही कितनी ही दूर क्यों न हों, इनका संबंध शरीर में स्थित उस शक्ति से होता है और जब इनके साथ कुछ तांत्रिक क्रियाएं की जाती है, तो वह तांत्रिक प्रयोग उस वास्तु की अर्थवा शक्ति से जुड़कर सूक्ष्म रूप से सम्बंधित व्यक्ति तक पहुँच जाता है और उस पर असर करता है.

वर्तमान समय में देखा जाता है की जब दो व्यक्ति के मध्य शत्रुता बढ़ती है, तो एक दूसरे को किसी भी प्रकार से हानि पहुंचाने से पीछे नहीं रहते हैं. इसके लिये भौतिक साधनों का प्रयोग तो किया ही जाता है. इसके अतिरिक्त लोग एक दूसरे पर तंत्र प्रयोग करवाने से भी नहीं चूकते हैं. यह तंत्र फिर अनेक परेशानियों को जन्म देने वाला बन जाता है.

जिस पर तंत्र प्रयोग करवाया जाता है, उसका नजदीक होना आवश्यक नहीं होता. यदि वह मीलों दूर है, तो भी तांत्रिक की शक्ति सटीक रूप से उस पर कार्य करती है.

अब यहाँ प्रश्न यह उठता है की जो व्यक्ति सम्मुख नहीं है, कोसों डोर स्थित है, जिस पर सीधा वार नहीं किया जा सकता, वह भी किस प्रकार से पीड़ित हो सकता है. ऐसा कैसे सम्भव होता है?

वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति में एक विशिष्ट शक्ति पायी जाती है, जिसे 'अर्थवा' कहते हैं यह सभी प्राणियों के शरीर से बहने वाली प्राणतत्त्व की एक अदृश्य धारा या सूत्र है. जिस प्रकार मोबाइल फोन के माध्यम से हजारों मील दूर स्थित व्यक्ति तक भे आवाज तुरंत पहुँच जाती है. उसी प्रकार तंत्र शक्ति भी इस अर्थवा की धारा के सहारे कहीं भी पहुँच सकती है. जिस प्रकार गंध के सहारे हम घर घर में पहुँच सकते हैं, जैसे मछली की गंध बहुत दूर से ही महसूस हो जाती है और फिर उस गंध के द्वारा उस स्थान तक पहुंचा जा सकता है. यहाँ गंध कोई भौतिक वास्तु नहीं है, जिसे देखकर या पकड़कर हम वहां तक पहुँच रहे हैं. उसी प्रकार यह अर्थवा शक्ति भी अदृश्य शक्ति है, जो उस व्यक्ति से जुडी रहती है और तंत्र इसी अरिश्य अर्थवा शक्ति के सहारे सम्बंधित व्यक्ति तक पहुँच जाता है. कई बार दूर स्थित अपने किसी निकटतम व्यक्ति के दुःख या तकली को हम महसूस कर लेते हैं. परामनोविज्ञान में मीलों दूर स्थित व्यक्ति से टेलीपैथी के माध्यम से सन्देश पहुंचा दिया जाता है. यह सब भी अर्थवा शक्ति का ही कमाल है. इस अर्थवा शक्ति को महसूस करने की क्षमता कुत्तों, चीटियों, चिड़ियाओं या कुछ विशेष जंगली जंतुओं में अधिक होती है. इसी कारण खोजी कुत्ते अपराधी तक सूंघते हुए पहुँच जाते हैं. चीटियाँ दूर तक जाने के बाद भी शाम को अपने घर तक सकुशल पहुँच जाती हैं और पक्षी मीलों दूर उड़ने के बाद भी विशेष मौसम में सम्बंधित स्थान पर पहुँच जाते हैं. हमारे शरीर के प्रत्येक अंग में यह शक्ति समाहित होती है. यहाँ तक कि पहने हुए वस्त्रों में भी यह उपस्थित होती है. समस्त तांत्रिक क्रियाएं इसी विशिस्ट अर्थवा शक्ति का आश्रय लेकर संचालित की जाती हैं.

अधिकाँश तांत्रिक प्रयोगों में इसी कारण नाखून, बाल, पहने हुए वस्त्र या अन्य किसी प्रकार की वास्तु का प्रयोग किया जाता है, क्योंकी ये भले ही कितनी ही दूर क्यों न हों, इनका संबंध शरीर में स्थित उस शक्ति से होता है और जब इनके साथ कुछ तांत्रिक क्रियाएं की जाती हैं, तो वह तांत्रिक प्रयोग उस वास्तु की अर्थवा शक्ति में जुड़कर सूक्ष्म रूप से सम्बंधित व्यक्ति तक पहुँच जाता है और उस पर असर करता है.

23 अक्टूबर 2010

विवाह में मुहूर्त का महत्व

हिंदू धर्म में सोलह संस्कारों का विधान किया गया है। ये सारे संस्कार विज्ञानसम्मत हैं। हर संस्कार का संपादन उसके उपयुक्त समय और मुहूर्त पर किया जाता है। इस तरह हर संस्कार के मुहूर्त निर्धारित हैं। इन संस्कारों में विवाह एक अति महत्वपूर्ण संस्कार है। इसके भी अपने मुहूर्त हैं। सफल और सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए विवाह का उपयुक्त मुहूर्त में होना आवश्यक है। यहां ऐसे कुछ प्रमुख मुहूर्तों का उल्लेख और विवेचन प्रस्तुत है जिनके अपनुरूप विवाह करने से वैवाहिक जीवन की सफलता की संभावना प्रबल होती है।

विवाह मुहूर्त : मूल, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, हस्त, उत्तरा भाद्रपद, स्वाति, मघा और रोहिणी नक्षत्रों तथा ज्येष्ठ, माघ, फाल्गुन, वैशाख, मार्गशीर्ष और आषाढ़ महीनों में विवाह करना शुभ है।

विवाह में कन्या के लिए गुरुबल, वर के लिए सूर्यबल और दोनों के लिए चंद्रबल का विचार करना आवश्यक है।

गुरुबल विचार : बृहस्पति ग्रह कन्या की राशि से नवम, पंचम, एकादश, द्वितीय और सप्तम राशि से शुभ, दशम, तृतीय, षष्ठ और प्रथम राशि में दान देने से शुभ और चतुर्थ, अष्टम द्वादश में दान देने से अशुभ माना गया है।

सूर्यबल विचार : सूर्य ग्रह वर की राशि से तृतीय, षष्ठ, दशम, एकादश, पंचम, सप्तम और नवम राशि में दान देने से शुभ और चतुर्थ, अष्टम तथा द्वादश राशियों में अशुभ माना गया है।

चंद्रबल विचार : चंद्र ग्रह वर और कन्या की राशि से तृतीय, षष्ठ, सप्तम, दशम और एकादश शुभ, प्रथम, द्वितीय, पंचम और नवम दान देने से शुभ तथा चतुर्थ, अष्टम और द्वादश अशुभ होता है।

विवाह में अंधा लग्न : दिन में तुला और वृश्चिक लग्न, रात्रि में तुला लग्न और मकर लग्न बहरे होते हैं। दिन में सिंह, मेष तथा वृष और रात्रि में कन्या, मिथुन तथा कर्क अंधे लग्न होते हैं। दिन में कुंभ और रात्रि में मीन ये दो लग्न पंगु होते हैं। किसी-किसी आचार्य के मत से धनु लग्न तुला और वृश्चिक अपराह्न में वधिर होते हैं। मिथुन, कर्क और कन्या ये लग्न रात्रि में अंधे होते हैं। सिंह, मेष और वृष लग्न दिन में अंधे होते हैं और मकर, कुंभ तथा मीन ये लग्न प्रातः तथा सायंकाल कुबड़े होते हैं।

अंधादि लग्नों का फल : यदि विवाह बहरे लग्न में हो तो वर और वधू दरिद्र होते हैं। दिवांध लग्न में हो तो कन्या विधवा हो जाती है। रात्रांध लग्न में हो तो संतान की मृत्यु और पंगु लग्न में हो तो धन का नाश होता है।

विवाह में शुभ लग्न विचार : तुला, मिथुन, कन्या, वृष एवं धनु शुभ तथा अन्य लग्न मध्यम होते हैं।

विवाह में लग्न-शुद्धि : लग्न से द्वादश शनि, दशम मंगल, तृतीय शुक्र, लग्न में चंद्र और क्रूर ग्रह अच्छे नहीं होते हैं। लग्नेश शुक्र, चंद्र षष्ठ और अष्टम में अशुभ होते हैं। लग्नेश और सौम्य ग्रह अष्टम में अच्छे नहीं होते हैं और सप्तम स्थान में कोई भी ग्रह शुभ नहीं होता है।

जब सूर्य, चंद्र एवं गुरु इन तीनों महत्वपूर्ण ग्रहों की शुभ गोचर स्थिति को ध्यान में रखते हुए शुद्ध विवाह मुहूर्त दिन का विचार कहते हैं तो इसे त्रिबल-शुद्धि विचार कहा जाता है। वर की जन्म रात्रि से सूर्य व चंद्र का बल तथा कन्या की जन्म राशि से गुरु व चंद्र का बल विशेष रूप से देखा जाता है। सूर्य, चंद्र व गुरु के बलाबल के बिना विवाह-कार्य शुभ नहीं माना जाता। मुनि गर्गाचार्य के अनुसार-

स्त्रीणां गुरुबलं श्रेष्ठं पुरुषाणां रवेर्बलम्‌। तयोः चंद्रबलं श्रेष्ठमिति गर्गेण निश्चितम्‌॥

वर की जन्म राशि से विवाह मुहूर्त के समय गोचर में सूर्य भाव ३, ६, १० या ११ में हो, तो शुभ और भाव १, २, ५, ७ या ९ में किंचित्‌ अशुभ एवं पूज्य परंतु यदि ४, ८, या १२ में हो, तो अशुभ एवं त्याज्य होता है। कन्या की जन्म राशि से विवाह मुहूर्त के समय गोचर में गुरु यदि भाव २, ५, ७, ९ या ११ में हो, तो शुभ और १, ३, ६ या १० में हो तो सामान्य पूज्य होता है किंतु यदि ४, ८ या १२ में हो, तो अशुभ होता है। परंतु आजकल क्योंकि कन्याओं का विवाह प्रायः प्रौढ़ायु होने पर ही किया जाता है, अतएव आचार्यों के अनुसार कन्या के लिए भाव ४, ८ या १२ स्थित गुरु निंद्य एवं त्याज्य नहीं बल्कि पूज्य होता है।

वर तथा कन्या दोनों की राशियों से विवाह मुहूर्त समय की राशि भाव १, ३, ६, ७, १० या ११ में चंद्र हो, तो शुभ और २, ५, ९ या १२ में हो, तो कुछ अशुभ एवं निंद्य होता है। यदि वर और कन्या की राशि से सूर्य, चंद्रादि गोचर ग्रह नीच या शत्रु राशिस्थ हों अथवा किसी शत्रु या अशुभ ग्रह से दृष्ट हों, तो ऐसा मुहूर्त शास्त्रानुसार ग्राह्य होते हुए भी पूज्य विवाह मुहूर्त माना जाएगा।

उदाहरण हेतु, मिथुन राशि के वर व कन्या का यदि वैशाख मास में मघा नक्षत्र में विवाह करना अभीष्ट हो, तो त्रिबल शुद्धि चक्र के अनुसार मिथुन राशि को वैशाख में सूर्य के भाव ११ में एवं मेष में उच्चराशिस्थ होने से यह महीना अत्यंत शुभ होगा। मघा नक्षत्र कालीन चंद्र के तृतीय स्थान में सिंह राशिस्थ होने से मिथुन राशि के लिए श्रेष्ठ एवं उत्तम मुहूर्त होगा। इसी भांति, कुंभ राशि के वर और कन्या का यदि मार्गशीर्ष (नवंबर) मास में एवं अनुराधा नक्षत्र (वृश्चिक राशि) कालीन विवाह करना अभीष्ट हो, तो मार्गशीर्ष मास में कुंभ जातक के लिए त्रिबल-शुद्धि के अनुसार, सूर्य के दशम होने से तथा वृश्चिक के चंद्र के भी गोचरवश दसवें में होने से विवाह ग्राह्य माना जाएगा। परंतु कुंभ राशि का स्वामी ग्रह शनि तथा सूर्य और चंद्र की राशि वृश्चिक के स्वामी ग्रह मंगल के शत्रु ग्रह होने से प्राप्त विवाह-मुहूर्त सामान्य एवं मध्यम कोटि का होगा। इसमें मंगल ग्रह की विशेष पूजा व उससे संबंधित ग्रह का दान आदि करना शुभ होगा।

विवाह में ग्राह्य शुभ लग्न : मुहूर्त ग्रंथों के अनुसार विवाह लग्न काल में भाव ३, ६, ८ या ११ में सूर्य तथा इन्हीं स्थानों में राहु, केतु और शनि शुभ होते हैं। भाव ३, ६ या ११ में मंगल, २, ३ या ११ में चंद्र तथा ३, ६, ७ और ८वें स्थानों को छोड़कर अन्य किसी भी भाव में स्थित शुक्र शुभ होता है। ११वें भाव में सूर्य तथ केंद्र त्रिकोण में गुरु लग्नगत अनेक दोषों का परिहार करते हैं।

लग्ने वर्गोत्तमे वेन्दौ घूनाथे लाभगेऽथवा।
केंद्र कोणे गुरौ दोषा नश्यन्ति सकलाऽपि॥

- मुहूर्त्तगणपति' के अनुसार विवाहादि शुभ कार्य के लग्न में, केंद्र त्रिकोण में गुरु, शुक्र एवं बुध तथा ११वें भाव में चंद्र या सूर्य अथवा सप्तमेश हो, तो अनेक दोषों का नाश हो जाता है।

क्रूर ग्रह युति, वेध, मृत्युबाण आदि दोषों की शुद्धि के उपरांत यदि वांछित मुहूर्त में शुद्ध विवाह-लग्न न निकलता हो, तो मुहूर्त ग्रंथाचार्यों ने गोधूलि का लग्न ग्रहण करने का निर्देश दिया है।

गोधूलि काल : जब सूर्यास्त होने वाला हो और गाय आदि चौपाये अपने-अपने घरों को लौटते हुए अपने खुरों से पथ की धूलि को आकाश में उड़ाकर जाने लगें, तो उस काल को गोधूलि की संज्ञा दी गई है। इसे विवाहादि सब मांगलिक कार्यों में प्रशस्त माना गया है। यह लग्न, मुहूर्त, अष्टम, जामित्रादि दोषों को प्रायः नष्टकर देता है।

नो वा योगो न मृतिभवनं नैव जामित्र दोषो।

गोधूलिः सा मुनिभिरुदिता सर्व कार्येषु शस्ता॥

पति और पत्नी का संबंध बहुत नाजुक एवं संवेदनशील होता है। भारतीय समाज में अब भी जाति, गोत्र, समाज, आदि के आधार पर संबंध स्थिर किए जाते हैं। पति और पत्नी के संबंध को सात जन्मों का संबंध माना जाता है। इसलिए विवाह पूरी तरह सोच-विचार कर करना चाहिए। ऊपर वर्णित तथ्यों पर यदि गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए और सही मुहूर्त में विवाह संपन्न हो तो दाम्पत्य सुखमय हो सकता है।

बिना तोड़-फोड़ के वास्तु दोष दूर करने के उपाय

एक सुंदर एवं दोषमुक्त घर हर व्यक्ति की कामना होती है। किंतु वास्तु विज्ञान के पर्याप्त ज्ञान के अभाव में भवन निर्माण में कुछ अशुभ तत्वों तथा वास्तु दोषों का समावेश हो जाता है। फलतः गृहस्वामी को विभिन्न आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। घर के निर्माण के बाद फिर से उसे तोड़कर दोषों को दूर करना कठिन होता है। ऐसे में हमारे ऋषि-मुनियों ने बिना तोड़-फोड़ किए इन दोषों को दूर करने के कुछ उपाय बताए हैं। उन्होंने प्रकृति की अनमोल देन सूर्य की किरणों, हवा और पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति आदि के उचित उपयोग की सलाह दी है। यहां वास्तु दोषों के निवारण के निमित्त कुछ उपाय प्रस्तुत हैं जिन्हें अपना कर विभिन्न दिशाओं से जुड़े दोषों को दूर किया जा सकता है।

ईशान दिशा

यदि ईशान क्षेत्र की उत्तरी या पूर्वी दीवार कटी हो, तो उस कटे हुए भाग पर एक बड़ा शीशा लगाएं। इससे भवन का ईशान क्षेत्र प्रतीकात्मक रूप से बढ़ जाता है।

यदि ईशान कटा हो अथवा किसी अन्य कोण की दिशा बढ़ी हो, तो किसी साधु पुरुष अथवा अपने गुरु या बृहस्पति ग्रह या फिर ब्रह्मा जी का कोई चित्र अथवा मूर्ति या कोई अन्य प्रतीक चिह्न ईशान में रखें। गुरु की सेवा करना सर्वोत्तम उपाय है। बृहस्पति ईशान के स्वामी और देवताओं के गुरु हैं। कटे ईशान के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए साधु पुरुषों को बेसन की बनी बर्फी या लड्डुओं का प्रसाद बांटना चाहिए।

यह क्षेत्र जलकुंड, कुआं अथवा पेयजल के किसी अन्य स्रोत हेतु सर्वोत्तम स्थान है। यदि यहां जल हो, तो चीनी मिट्टी के एक पात्र में जल और तुलसीदल या फिर गुलदस्ता अथवा एक पात्र में फूलों की पंखुड़ियां और जल रखें। शुभ फल की प्राप्ति के लिए इस जल और फूलों को नित्य प्रति बदलते रहें।

अपने शयन कक्ष की ईशान दिशा की दीवार पर भोजन की तलाश में उड़ते शुभ पक्षियों का एक सुंदर चित्र लगाएं। कमाने हेतु बाहर निकलने से हिचकने वाले लोगों पर इसका चमत्कारी प्रभाव होता है। यह अकर्मण्य लोगों में नवीन उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है।

बर्फ से ढके कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ योगी की मुद्रा में बैठे महादेव शिव का ऐसा फोटो, चित्र अथवा मूर्ति स्थापित करें, जिसमें उनके भाल पर चंद्रमा हो और लंबी जटाओं से गंगा जी निकल रही हों।

ईशान में विधिपूर्वक बृहस्पति यंत्र की स्थापना करें।

पूर्व दिशा

यदि पूर्व की दिशा कटी हो, तो पूर्वी दीवार पर एक बड़ा शीशा लगाएं। इससे भवन के पूर्वी क्षेत्र में प्रतीकात्मक वृद्धि होती है।

पूर्व की दिशा के कटे होने की स्थिति में वहां सात घोड़ों के रथ पर सवार भगवान सूर्य देव की एक तस्वीर, मूर्ति अथवा चिह्न रखें।

सूर्योदय के समय सूर्य भगवान को जल का अर्य दें। अर्य देते समय गायत्री मंत्र का सात बार जप करें। पुरूष अपने पिता और स्त्री अपने स्वामी की सेवा करें।

प्रत्येक कक्ष के पूर्व में प्रातःकालीन सूर्य की प्रथम किरणों के प्रवेश हेतु एक खिड़की होनी चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं हो, तो उस भाग में सुनहरी या पीली रोशनी देने वाला बल्ब जलाएं।

पूर्व में लाल, सुनहरे और पीले रंग का प्रयोग करें। पूर्वी क्षेत्र में मिट्टी खोदकर जलकुंड बनाएं और उसमें लाल कमल उगाएं अथवा पूर्वी बगीचे में लाल गुलाब रोपें।

अपने शयन कक्ष की पूर्वी दीवार पर उदय होते हुए सूर्य की ओर पंक्तिबद्ध उड़ते हुए हंस, तोता, मोर आदि अथवा भोजन की तलाश में अपना घोंसला छोड़ने को तैयार शुभ पक्षियों का चित्र लगाएं। अकर्मण्य और कमाने हेतु बाहर जाने से हिचकने वाले व्यक्तियों के लिए यह जादुई छड़ी के समान काम करता है।

बंदरों को गुड़ और भुने चने खिलाएं।

पूर्व में सूर्य यंत्र की स्थापना विधि विधान पूर्वक करें।

आग्नेय दिशा

यदि आग्नेय कोण पूर्व दिशा में बढ़ा हो, तो इसे काटकर वर्गाकार या आयताकार बनाएं।

शुद्ध बालू और मिट्टी से आग्नेय क्षेत्र के सभी गड्ढे इस प्रकार भर दें कि यह क्षेत्र ईशान और वायव्य से ऊंचा लेकिन नैर्ऋत्य से नीचा रहे।

यदि आग्नेय किसी भी प्रकार से कटा हो अथवा पर्याप्त रूप से खुला न हो, तो इस दिशा में लाल रंग का एक दीपक या बल्ब अग्नि देवता के सम्मान में कार्य करते समय कम से कम एक प्रहर (तीन घंटे) तक जलाए रखें।

यदि आग्नेय कटा हो, तो इस दिशा में अग्नि देव की एक तस्वीर, मूर्ति या संकेत चिह्न रखें। गणेश जी की तस्वीर या मूर्ति रखने से भी उक्त दोष दूर होता है। अग्नि देव की स्तुति में ऋग्वेद में उल्लिखित पवित्र मंत्रों का उच्चारण करें।

आग्नेय कोण में दोष होने पर वहां भोजन में प्रयोग होने वाले फल, सब्जियां (सूर्यमुखी, पालक, तुलसी, गाजर आदि) और अदरक मिर्च, मेथी, हल्दी, पुदीना, कढ़+ी पत्ता आदि उगाएं अथवा मनीप्लांट लगाएं।

आग्नेय दिशा से आने वाली सूर्य किरणों को रोकने वाले सभी पेड़ों को हटाएं। इस दिशा में ऊंचे पेड़ न लगाएं

आग्नेय का स्वामी ग्रह शुक्र दाम्पत्य संबंधों का कारक है। अतः इस दिशा के दोषों को दूर करने के लिए अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम और आदर भाव रखें।

घर की स्त्रियों को नए रेश्मी परिधान, सौंदर्य प्रसाधन, सामग्री, सजावट के सामान और गहने आदि देकर हमेशा खुश रखें। यह सर्वोत्तम उपाय है।

प्रत्येक शुक्रवार को गाय को गेहूं का आटा, चीनी और दही से बने पेड़े खिलाएं। प्रतिदिन रसोई में बनने वाली पहली रोटी गाय को खिलाएं। दोषयुक्त आग्नेय में गाय-बछड़े की सफेद संगमरमर से बनी मूर्ति या तस्वीर इतनी ऊंचाई पर लगाएं कि वह आसानी से दिखाई दे।

आग्नेय में शुक्र यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें।

दक्षिण दिशा

यदि दक्षिणी क्षेत्र बढ़ा हो, तो उसे काटकर शेष क्षेत्र को वर्गाकार या आयताकार बनाएं। कटे भाग का विभिन्न प्रकार से उपयोग किया जा सकता है।

यदि दक्षिण में भवन की ऊंचाई के बराबर या उससे अधिक खुला क्षेत्र हो, तो ऊंचे पेड़ या घनी झाड़ियां उगाएं।

इस दिशा में कंक्रीट के बड़े और भारी गमलों में घर में रखने योग्य भारी प्रकृति के पौधे लगाएं।

यमराज अथवा मंगल ग्रह के मंत्रों का पाठ करें।

इस दिशा के स्वामी मंगल को प्रसन्न करने के लिए घर के बाहर लाल रंग का प्रयोग करें। दक्षिण दिशा के दोष अग्नि के सावधानीपूर्वक उपयोग और अग्नि तत्व प्रधान लोगों के प्रति उचित आदर भाव से दूर किए जा सकते हैंं।

इस क्षेत्र की दक्षिणी दीवार पर हनुमान जी का लाल रंग का चित्र लगाएं।

दक्षिण दिशा में विधिपूर्वक मंगल यंत्र की स्थापना करें।

नैर्ऋत्य दिशा

नैर्ऋत्य दिशा के बढ़े होने से असहनीय परेशानियां पैदा होती हैं। यदि यह क्षेत्र किसी भी प्रकार से बढ़ा हो, तो इसे वर्गाकार या आयताकार बनाएं।

रॉक गार्डन बनाने अथवा भारी मूर्तियां रखने हेतु नैर्ऋत्य सर्वोत्तम है। यदि यह क्षेत्र नैसर्गिक रूप से ऊंचा या टीलेनुमा हो या इस दिशा में ऊंचे भवन अथवा पर्वत हों, तो इस ऊंची उठी जगह को ज्यों का त्यों छोड़ दें।

यदि नैर्ऋत्य दिशा में भवन की ऊंचाई के बराबर अथवा अधिक खुला क्षेत्र हो, तो यहां ऊंचे पेड़ या घनी झाड़ियां लगाएं। इसके अतिरिक्त घर के भीतर कंक्रीट के गमलों में भारी पेड़ पौधे लगाएं।

इस दिशा में भूतल पर अथवा ऊंचाई पर पानी का फव्वारा बनाएं।

राहु के मंत्रों का जप स्वयं करें अथवा किसी योग्य ब्राह्मण से कराएं।

श्राद्धकर्म का विधिपूर्वक संपादन कर अपने पूर्वजों की आत्माओं को तुष्ट करें। इस क्षेत्र की दक्षिणी दीवार पर मृत सदस्यों की एक तस्वीर लगाएं जिस पर पुष्पदम टंगी हों।

मिथ्याचारी, अनैतिक, क्रोधी अथवा समाज विरोधी लोगों से मित्रता न करें। वाणी पर नियंत्रण रखें

तांबे, चांदी, सोने अथवा स्टील से निर्मित सिक्के या नाग-नागिन के जोड़े की प्रार्थना कर उसे नैर्ऋत्य दिशा में दबा दें।

नैर्ऋत्य दिशा में राहु यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें।

पश्चिम दिशा

यदि पश्चिम दिशा बढ़ी हुई हो, तो उसे काटकर वर्गाकार या आयताकार बनाएं।

यदि इस दिशा में भवन की ऊंचाई के बराबर या अधिक दूरी तक का क्षेत्र खुला हो, तो वहां ऊंचे वृक्ष या घनी झाड़ियां लगाएं। इसके अतिरिक्त इस दिशा में घर के पास बगीचे में लगाए जाने वाले सजावटी पेड़-पौधे जैसे इंडोर पाम, रबड़ प्लांट या अंबे्रला ट्री कंक्रीट के बड़े व भारी गमलों में लगा सकते हैं।

भूतल पर बहते पानी का स्रोत अथवा पानी का फव्वारा भी लगा सकते हैं।

पद्म पुराण में उल्लिखित नील शनि स्तोत्र अथवा शनि के किसी अन्य मंत्र का जप और दिशाधिपति वरुण की प्रार्थना करें।

सूर्यास्त के समय प्रार्थना के अलावा कोई भी अन्य शुभ कार्य न करें।

पश्चिम दिशा में शनि यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें।

वायव्य दिशा

यदि वायव्य दिशा का भाग बढ़ा हुआ हो, तो उसे वर्गाकार या आयताकार बनाएं अथवा ईशान को बढ़ाएं।

यदि यह भाग घटा हो तो वहां मारुतिदेव की एक तस्वीर, मूर्ति या संकेत चिह्न लगाएं। हनुमान जी की तस्वीर या मूर्ति भी लगाई जा सकती है। इसके अतिरिक्त पूर्णिमा के चंद्र की एक तस्वीर या चित्र भी लगाएं, दोषों से रक्षा होगी।

वायुदेव अथवा चंद्र के मंत्रों का जप तथा हनुमान चालीसा का पाठ श्रद्धापूर्वक करें।

पूर्णिमा की रात खाने की चीजों पर पहले चांद की किरणों को पड़ने दें और फिर उनका सवेन करें।

निर्मित भवन से बाहर खुला स्थान हो, तो वहां ऐसे वृक्ष लगाएं, जिनके मोटे चमचमाते पत्ते वायु में नृत्य करते हों।

वायव्य दिशा में बने कमरे में ताजे फूलों का गुलदस्ता रखें।

इस दिशा में एक छोटा फव्वारा या एक्वेरियम (मछलीघर) स्थापित करें।

अपनी मां का यथासंभव आदर करें, सुबह उठकर उनके चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें और शुभ अवसरों पर उन्हें खीर खिलाएं।

प्रतिदिन सुबह, खासकर सोमवार को, गंगाजल में कच्चा दूध मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं और शिव चालीसा का पाठ श्रद्धापूर्वक करें।

वायव्य दिशा में प्राण-प्रतिष्ठित मारुति यंत्र एवं चंद्र यंत्र की स्थापना करें।

उत्तर दिशा

यदि उत्तर दिशा का भाग कटा हो, तो उत्तरी दीवार पर एक बड़ा आदमकद शीशा लगाएं।

यदि उत्तर का भाग घटा हो, तो इस दिशा में देवी लक्ष्मी अथवा चंद्र का फोटो, मूर्ति अथवा कोई संकेत चिह्न लगाएं। लक्ष्मी देवी चित्र में कमलासन पर

विराजमान हों और स्वर्ण मुद्राएं गिरा रही हों।

विद्यार्थियों और संन्यासियों को उनके उपयुक्त अध्ययन सामग्री का दान देकर सहायता करें। उत्तर दिशा के स्वामी बुध से अध्ययन सामग्री का विचार किया जाता है।

दिशा में हल्के हरे रंग का पेंट करवाएं।

उत्तर क्षेत्र की उत्तरी दीवार पर तोतों का चित्र लगाएं। यह पढ़ाई में कमजोर बच्चों के लिए जादू का काम करता है।

इस दिशा में बुध यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें। इसके अतिरिक्त कुबेर यंत्र अथवा लक्ष्मी यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा कर स्थापित करें।

इस तरह ऊपर वर्णित ये सारे उपाय सहज व सरल हैं जिन्हें अपनाकर जीवन को सुखमय किया जा सकता है।

15 अक्टूबर 2010

ब्यूटीफुल ड्राईफ्रूट्स पैक

अभी तक आपने फ्रूट पैक्स और गोल्डन, सिल्वर, पर्ल और चॉकलेट फेशियल के बारे में ही सुना होगा, लेकिन अब महिलाएं ड्राईफ्रूट्स का भी अपने सौन्दर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल कर रही हैं। जड़ी-बूटियों और फलों की मदद से महिलाएं सदियों से अपनी सुंदरता में निखार ला रही हैं। आजकल ड्राई फ्रूट्स का उपयोग चेहरे की खूबसूरती बढ़ाने के लिए फेस पैक में किया जाने लगा है। मतलब, काजू-बादाम अब आपको अंदर से स्वस्थ बनाने के साथ ही बाहर से भी निखार प्रदान करेंगे। आयुर्वेदिक फेशियल में इन ड्राईफ्रूट्स का यूज हो रहा है। ये फ्रूट पैक्स स्किन को मुलायम तो बनाते ही हैं साथ ही इसके कोई साइड इफेक्ट्स भी नहीं हैं।

काजू है गुणकारी
काजू सभी तरह की स्किन के लिए गुणकारी है। अगर आपकी त्वचा ड्राई है, तो काजू को रात भर दूध में भिगो दें और सुबह बारीक पीसकर इसमें मुल्तानी मिट्टी और शहद की कुछ बूंदें मिलाकर स्क्रब करें। ऑयली स्किन वाले शहद की जगह नींबू अथवा दही का प्रयोग कर सकते हैं। काजू ऑयली स्किन के लिए ज्यादा फायदेमंद है। ये स्किन को मुलायम बनाता है।

त्वचा दमके अखरोट से
चेहरे की खूबसूरती बढ़ाने के लिए आप अखरोट का भी उपयोग कर सकती हैं। अखरोट के छिलके को बारीक पीसकर इसमें मुल्तानी मिट्टी, खस-खस और दही मिलाएं और इस मिश्रण का उपयोग स्क्रब के रूप में करें। अखरोट के ऑयल में तिल का तेल व लैवेंडर ऑयल मिलाकर मसाज करने से त्वचा में रौनक आ जाती है।

झुर्रियां और दाग धब्बे मिटाए नारियल
नारियल का सेवन भी शरीर के लिए स्वास्थ्य वर्धक है, लेकिन अगर इसका उपयोग स्किन को निखारने के लिए किया जाए, तो यह बहुत फायदेमंद साबित होता है। नारियल तेल त्वचा में समाकर त्वचा को कोमलता और मासूमियत प्रदान करते हैं। रूखी त्वचा, झुर्रियां एवं दाग-धब्बों को मिटाकर त्वचा में निखार लाने में कारगर है। नारियल तेल के नियमित प्रयोग से त्वचा में फ्री रैडिकल्स की समस्या नहीं होती, क्योंकि इसमें एंटी ऑक्सिडेंट के गुण पाए जाते हैं। एलोवेरा जेल में नारियल तेल मिलाकर त्वचा पर लगाने से त्वचा को सूर्य की हानिकारक किरणों से सुरक्षा मिलती है। नारियल का पानी भी खूबसूरती को बढ़ाता है। यदि आपके चेहरे पर झाइयां या दाग हैं, तो 1 चम्मच चंदन पाउडर, एक चम्मच केओलिन पाउडर, 1 चम्मच मुल्तानी मिट्टी पाउडर और चुटकी भर हल्दी को लेकर नारियल पानी में पेस्ट बनाएं। इसे त्वचा पर लगाकर 5-7 मिनट बाद साफ पानी से धो दें। इस पेस्ट के नियमित प्रयोग करने से निशान हल्के हो जाएंगे।

नारियल के फायदे
हिचकी और नकसीर में कच्चे नारियल का पानी पीना लाभ देता है।नारियल के पानी में खीरे का रस मिलाकर लगाने से मुंहासों से रक्षा होती है।
रूसी और सिरदर्द में नारियल का तेल बहुत फायदेमंद है।
नारियल के सेवन से रक्तविकार का नाश होता है।
खाज-खुजली में नारियल का तेल लाभकारी होता है।
नारियल पानी का नियमित सेवन मोटापे से बचाता है।
अगर आपको उल्टियों हो रही हैं, तो इसका पानी उल्टियों पर भी ब्रेक लगाता है।
नारियल पानी चिकनगुनिया की रोकथाम में भी सहायक है। यह स्वाद और सेहत का संगम है तथा कुदरत का अनमोल खजाना है।

11 अक्टूबर 2010

कष्ट निवारण - उपाय - 10

कारोबारी समस्या

कारोबारी सफलता के लिए
कारोबारी सफलता के लिए प्रत्येक अमावस्या के दिन अपने पूरे घर की सुंदर सफाई करें। तत्पश्चात परिवार के सभी सदस्य नहा धोकर शुद्ध वस्त्र धारण करके एक जगह एकत्रित होकर अपने बीच में चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछा दें। वस्त्र के ऊपर 11 मुट्ठी मसूर की दाने रखकर उसके ऊपर एक चौमुखा दीपक प्रज्ज्वलित कर रख दें। तत्पश्चात घर के सभी सदस्य सुंदर काण्ड का पाठ करें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

नया कारोबार करने से पहले
नया कारोबार, नई दुकान या कोई भी नया कार्य करने से पूर्व मिट्टी के पांच पात्र लें जिसमें सवाकिलो सामान आ जाएं। प्रत्येक पात्र में सवा किलो सफेद तिल, सवा किलो पीली सरसों, सवा किलो उड़द, सवा किलो जौ, सवा किलो साबुत मूंग भर दें। मिट्टी के ढक्कन से ढंक कर सभी पात्र को लाल कपड़े से मुंह बांध दें और अपने व्यवसायकि स्थल पर इन पांचों कलश को रख दें। वर्ष भर यह कलश अपनी दुकान में रखें ग्राहकों का आगमन बड़ी सरलता से बढ़ेगा और कारोबारी समस्या का निवारण भी होगा। एक वर्ष के बाद इन संपूर्ण पात्रों को अपने ऊपर से 11 बार उसार कर बहते पानी में प्रवाह कर दें। और नये पात्र भरकर रख दें।

कार्य में बार-बार आने वाली समस्या
यदि आपको अपने कार्य में अनावश्यक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। बार-बार कार्य में रूकावट आ रही हो तो आप अपने घर में शनिवार के दिन तुलसी का पौधा लगाएं और हर रोज सुबह-शाम घी का दीपक जलाने से कार्य में बार-बार आने वाली समस्या का निवारण बड़ी सरलता से हो जाएगा।

कारोबार में अनावश्यक परेशानी हेतु
अगर कारोबार में अनावश्यक परेशानी आ रही हो, लाभ मार्ग अवरोध हो रहा हो तो हर रोज शाम को गोधूलि वेला में यानि साढ़े पांच से छ: बजे के बीच में अपने पूजा स्थान में श्री महालक्ष्मी की तस्वीर स्थापित करके या तुलसी के पौधे के सामने में गो घृत का दीपक जलाएं। दीपक प्रज्ज्वलित करने के बाद उसक अंदर अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए एक इलायची डाल दें। ऐसा नियमित 186 दिन करने से व्यापार में लाभ होगा। दीपक और इलायची हमेशा नया प्रयोग में लाएं।

कारोबारी समस्या निवारण हेतु
कारोबार में समस्या आ रही हो, व्यवसाय चल नहीं रहा हो और कर्ज से परेशान हो रहे हो तो इस प्रयोग को करके देखें। यह प्रयोग किसी भी महीने शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार के दिन शुरू करें और नियमित 186 दिन करें। हर रोज स्नानोपरांत पीपल, बरगद या तुलसी के पेड़ के नीचे चौमुखा देसी घी का दीपक जलाएं। और शुद्ध कंबल का आसन बिछाकर एक पाठ विष्णु सहस्रनाम का करें तथा 11 माला ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र की जाप करें। मां लक्ष्मी की कृपा होगी और कारोबारी समस्या का निवारण हो जाएगा।

व्यवसाय में बाधाएं
यदि आपके व्यवसाय में बाधाएं चल रही हों तो आपको अपने कार्यस्थल पर पीले रंग की वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए तथा पूजाघर में हल्दी की माला लटकानी चाहिए। भगवान लक्ष्मी-नारायण के मंदिर में लड्डू का भोग लगाना चाहिए।

व्यवसाय में मनोनुकूल लाभ
व्यवसाय में मनोनुकूल लाभ की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो किसी भी शनिवार के दिन नीले कपड़े 21 दानें रक्त गुंजा के बांधकर तिजोरी में रख दें। हर रोज धूप, दीप अवश्य दिखाएं। अपने इष्टदेव का ध्यान करें। ऐसा नियमित करने से व्यापार में लाभ मिलेगा और सफलता भी प्राप्त होगी।

कारोबारी, पारिवारिक, कानूनी परेशानियों से छुटकारा दिलाने वाला अमोध प्रयोग
आप अपना काम कर रहे हो कठिन परिश्रम के बावजूद भी लोग आपका हक मार देते हैं। अनावश्यक कार्य अवरोध उत्पन्न करते हों। आपकी गलती न होने के बावजूद भी आपको हानि पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा हो तो यह प्रयोग आपके लिए बहुत ही लाभदायक सिध्द होगा। रात्रि में 10 बजे से 12 बजे के बीज में यह उपाय करना बहुत ही शुभ रहेगा। एक चौकी के ऊपर लाल कपड़ा बिछा कर उसके ऊपर 11 जटा वाले नारियल। प्रत्येक नारियल के ऊपर लाल कपड़ा लपेट कर कलावा बांध दें। इन सभी नारियल को चौकी के ऊपर रख दें। घी का दीपक जला करके धूप-दीप नेवैद्य पुष्प और अक्षत अर्पित कर। नारियल के ऊपर कुमकुम से स्वस्तिक बनाए और उन प्रत्येक स्वस्तिक के ऊपर पांच-पांच लौंग रखें और एक सुपारी रखें। माँ भगवती का ध्यान करें। माँ को प्रार्थना करें कष्टों की मुक्ति के लिए। कम्बल का आसन बिछा कर ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:11 माला करें, तत्पश्चात नारियल सहित समस्त सामग्री को सफेद कपड़े में बांध कर अपने ऊपर से 11 बार वार कर सोने वाले पलंग के नीचे रख दें। सुबह ब्रह्म मर्ुहूत्त में बिना किसी से बात किए यह सामग्री कुएं, तालाब या किसी बहते हुए पानी में प्रवाह कर दें। कानूनी कैसी भी समस्या होगी उससे छुटकारा मिल जाएगा।

ऋण मुक्ति और धन वापसी के उपाय
किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के मंगलवार के दिन प्रदोष काल में यह पूजा प्रारंभ करें। किसी भी प्राण प्रतिष्ठित शिव मंदिर में जाकर श्रद्धापूर्वक शिव की उपासना करें। शिव पूजन के उपरांत अपने सामने दो दोने रख दें। एक दोने में यानी बायें हाथ वाले दोनें में 108 बिल्वपत्र पीले चंदन से प्रत्येक बिल्व पत्र में ॐ नम:शिवाय लिखकर रख दें। तत्पश्चात शुद्ध आसन बिछाकर एक बिल्वपत्र अपने दाहिनी हाथ में लें और इस ॐ ऋणमुक्तेश्वर महादेवाय नम:। मंत्र का जाप करें। और दाहिने हाथ वाले दोने में बिल्व पत्र को रख दें। ऐसा 108 बार करें। जाप पूरा होने के उपरांत एक पाठ ऋणमोचन मंगल स्तोत्र का करें। साथ ही सर्वारिष्ट शान्त्यर्थ शनि स्तोत्र का पांच पाठ भी करें। ऐसा नियमित 40 दिन तक पूजा करने से ऋण से छुटकारा मिल जाएगा।

ऋण मुक्ति के लिये
आप अपने कारोबार में कर्जे से डूबे जा रहे है रात-दिन मेहनत करने के उपरांत भी कर्जा उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है तो यह प्रयोग आपके लिये बहुत ही अनुकूल व फायदेमंद रहेगा। किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथमा के दिन नित्यक्रम से निवृत्त होकर स्नानोपंरात स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने पूजा स्थान में यह पूजा प्रारंभ करें। 6 इंच लम्बी गूलर की पेड़ की जड़ ले उसके ऊपर 108 बार काले रंग का धागा ॐ गं गणपतये नम:मंत्र का जाप करते हुये लपेटे। भगवान गणेश जी से ऋण मुक्ति की प्रार्थना करें। 108 चक्र होने के बाद इस लकड़ी को स्वच्छ थाली में पीला वस्त्र बिछाकर रख दें। तत्पश्चात श्रद्धानुसार धूप,दीप, नैवद्य, पुष्प अर्पित करें। घी का दीपक प्रज्जवलित कर उसमें एक इलायची डाल दें। शुद्ध आसन बिछाकर अपने सामने हल्दी से रंगे हुये अक्षत रख लें। अपने हाथ में थोड़े से अक्षत लें ॐ गं गणपतये ऋण हरताये नम:मंत्र का जाप करके अक्षत गूलर की लकड़ी के ऊपर छोड़ दे। ऐसा 108 बार करें। अगले दिन यह प्रक्रिया पुन:दोहरायें। ऐसा नवमी तक पूजन करें। नवमी के दिन रात में सवा ग्यारह बजे पुन:एक बार पूजन करें। ऋण हरता गणपति की 11 माला जाप करें। तत्पश्चात इस लकड़ी को अपने ऊपर से 11 बार उसार कर के अपने घर के किसी कोने में गड्डा खेंद कर दबा दे। उसके ऊपर कोई भारी वस्तु रख दें। ऐसा करने से कर्ज से छुटकारा मिल जायेगा।

ऋण से छुटकारे हेतु
किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार के दिन गेहूं के सवा किलो आटा में सवा किलो गुड़ मिलाकर उसके गुलगुले या पूएं बनाएं। शाम के समय हनुमान जी को चमेली के तेल में सिंदूर घोलकर अभिषेक करने के उपरांत घी का दीपक जलाएं और वहीं बैठकर हनुमान चालीसा के 7 पाठ करें। तत्पश्चात हनुमान जी को इन गुलगुले और पूएं का भोग लगाएं और गरीब व जरूरतमंद व्यक्तियों को बांट दें। ऐसा 11 मंगलवार करें, ऋण से छुटकारा मिलेगा।

ऋण मुक्ति के लिए
ऋण मुक्ति के लिए उपाय सर्वप्रथम पांच गुलाब के फूल लाएं। ध्यान रहे कि उनकी पंखुड़ी टूटी हुई न हो। तत्पश्चात सवा मीटर सफेद कपड़ा, सामने रचो कर बिछाएं और गुलाब के वार फूलों को चारों कोनों पर बांध दें। फिर पांचवा गुलाब मध्य में डालकर गांठ लगा दें। इसे गंगा, यमुन और सरस्वती नदियों में प्रभावित करें। प्रभुकृपा से ऋण मुक्ति और घर में सुख समृध्दि की प्राप्ति होती है।

व्यवसायिक परेशानी का निवारण
दीवाली के दिन नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत अपने पूजा स्थान में लक्ष्मी बीसा यंत्र एवं कुबेर यंत्र की श्रद्धापर्वूक स्थापना करने के उपरांत धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प और अक्षत से पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात शुद्ध आसन बिछाकर स्फटिक की माला पर 11 माला इस ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्यादि पताये धन धान्य समृद्धि में देही दापय दापय स्वाहा मंत्र की जाप करें। संपूर्ण व्यावसायिक परेशानियों का निवारण होगा। हर रोज इस मंत्र की सुबह-शाम एक माला जाप करने से अवश्य धन में वृद्धि होगी।

घाटा दूर करने का उपाय
व्यापार में घाटा हो रहा हो या काम नहीं चल पा रहा हो, तो आप एक चुटकी आटा लेकर रविवार के दिन व्यापार स्थल या अपनी दुकान के मुख्य द्वार के दोनों ओर थोड़ा-थोड़ा छिड़क दें, साथ में कहें- जिसकी नजर लगी है उसको लग जाये। बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला। यह क्रिया शुक्ल पक्ष में ही करें। संभव हो तो प्रयत्न करें कि इस क्रिया को करते हुए आपको कोई न देखे। गुप्त रूप से यह क्रिया करने पर व्यापार का घाटा दूर होने लगता है। इसके अलावा व्यापार स्थल में मकडिय़ों के जाले व्यापार की वृद्घि को रोकते हैं। अत: व्यापार में बरकत के लिए प्रत्येक शनिवार को दुकान की सफाई आदि करते समय मकड़ी के जालों को अवश्य हटा देना चाहिए।

बिक्री बढ़ाने के व लाभ के उपाय
जिन उद्योगपतियों या व्यापारियों को काफी प्रयास और अथक परिश्रम करने के बावजूद बिक्री में वृध्दि नहीं हो पा रहा हो तो यह उपाय शुक्ल पक्ष में गुरुवार से प्रारम्भ करें और प्रत्येक गुरुवार को इस क्रिया को दोहराते रहें। घर के मुख्य द्वार के एक कोने को गंगाजल से शुध्द कर लें या धो लें। शुध्द किए गए स्थान पर स्वस्तिक का चिह्न बनाएं और उस पर थोड़ा दाल और गुड़ रख दें। साथ ही एक घी का दीपक जला दें। ध्यान रहे कि स्वस्तिक का चिह्न हल्दी से ही बनाएं। स्वास्तिक बनाने के बाद उसको बार-बार नहीं देखना चाहिए। यह उपाय बहुत ही सरल है और इसका प्रभाव शीघ्र ही परिलक्षित होने लगता है।

कारोबार में वृद्धि हेतु
हर रोज प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्नानोपरांत तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें थोड़ी सी रोली डालकर ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:॥ मंत्र का जाप करते हुए तुलसी के पौधे में जल चढ़ाएं। शाम को गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक जलांए और इसी मंत्र की पांच माला जाप करें।

व्यवसायिक समस्याओं का निवारण हेतु
कठिन परिश्रम व मेहनत करने के उपरांत लाभ की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो प्रत्येक गुरुवार के दिन शुभ घड़ी में पीले कपड़े में 9 जोड़े चने की दाल, 9 पीले गोपी चंदन की डलियां, 9 गोमती चक्र इन सबको पोटली बनाकर किसी भी मंदिर में केले के पेड़ के ऊपर शाम के समय टांग दें। साथ ही एक घी का दीपक भी प्रज्ज्वलित कर लें। ऐसा 11 गुरुवार करने से धन की प्राप्ति होगी और व्यवसायिक समस्याओं का निवारण भी होगा।

धन का न रूकना
किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार के दिन 1 तांबे का सिक्का, 6 लाल गुंजा लाल कपड़े में बांधकर प्रात: 11 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में किसी सुनसान जगह में अपने ऊपर से 11 बार उसार कर 11 इंच गहरा गङ्ढा खोदकर उसमें दबा दें। ऐसा 11 बुधवार करें। दबाने वाली जगह हमेशा नई होनी चाहिए। इस प्रयोग से कारोबार में बरकत होगी, घर में धन रूकेगा।

धन वृद्धि हेतु
किसी भी गुरु पुष्य नक्षत्र के दिन प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत शंख पुष्पी की जड़ अपने घर में लेकर आएं इस जड़ को गंगाजल से पवित्र कर दें। पवित्र करने के उपरांत चांदी की डिब्बी में पीले चावल भरकर उसके ऊपर रख दें। श्रद्धानुसार धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प, अक्षत अर्पित कर पंचोपचार पूजन करें। उसके बाद इस डिब्बी को अपनी तिजोरी में रख दें। धन में वृद्धि और कारोबारमें लाभ होगा। हर गुरु पुष्य के दिन शंख पुष्पी की जड़ व चांदी की डिब्बी बदल दें। पहले वाली बहते पानी में प्रवाह कर दें।

09 अक्टूबर 2010

टोने-टोटके - कुछ उपाय - 6 ( Tonae - Totke - Some Tips - 6 )

छोटे-छोटे उपाय हर घर में लोग जानते हैं, पर उनकी विधिवत् जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं। इस लोकप्रिय स्तंभ में उपयोगी टोटकों की विधिवत् जानकारी दी जा रही है।

आँखों के रोग से मुक्ति के लिए
  • आँखों में यदि काला मोतिया हो जाए तो ताम्बे के पात्र में जल लेकर उसमें ताम्बे का सिक्का व गुड डालकर प्रतिदिन सूर्य को अर्ध्य दें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से शुरू कर चौदह रविवार करें। अर्ध्य देते समय रोग से मुक्ति की प्रार्थना करते रहें। इसके अतिरिक्त पांच प्रकार के फल लाल कपडे में बांधकर किसी भी मन्दिर में दें। यह उपाय निष्ठापूर्वक करें, लाभ होगा।

नौकरी की प्राप्ति के लिए
  • नौकरी न मिल रही हो तो मन्दिर में बारह फल चढ़ाएं। यह उपाय नियमित रूप से करें और इश्वर से नौकरी मिलने की प्रार्थना करें।

शीघ्र विवाह के लिए
  • विवाह योग्य वर या कन्या के शीघ्र विवाह के लिए घर के मन्दिर में नवग्रह यन्त्र स्थापित करें। जिनकी नई शादी हो, उन्हें घर बुलाएं, उनका सत्कार करें और लाल वस्त्र भेंट करें उन्हें भोजन या जलपान कराने के पश्चात सौंफ मिस्री जरूर दें। यह सब करते समय शीघ्र विवाह की कामना करें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के मंगलवार को करें, लाभ होगा।

मनोकामना पूर्ती के लिये
  • व्यापार मंदा हो तथा पैसा टिकता न हो, तो नवग्रह यन्त्र और धन यन्त्र घर के मन्दिर में शुभ समय में स्थापित करें। इसके अतिरिक्त सोलह सोमवार तक पांच प्रकार की सब्जियां मन्दिर में दें और पंचमेवा की खीर भोलेनाथ को मन्दिर में अर्पित करें। सभी कामनाएं पूरी होंगी।

कुछ अन्य टोटके
  • बच्चे पढ़ते न हों तो उनकी स्टडी टेबल पर शुभ समय में सरस्वती यन्त्र व कुबेर यन्त्र स्थापित करें। उनके पढने के लिये बैठने से पहले यंत्रों के आगे शुभ घी का दीपक तथा गुलाब की अगरबत्ती जलाएं। पढ़ते समय उनका मुंह पूर्व की ओर होना चाहिय। यह उपाय करने के बच्चों का मन पढ़ाई में लगने लगेगा और पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद उन्हें मनोवांछित काम भी मिल जायेगा।
  • समाज में मान सम्मन की प्राप्ति के लिये कबूतरों को चावल मिश्रित डालें, बाजरा शुक्रवार को खरीदें व शनिवार से डालना शुरू करें।
  • शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार या बुधवार को चमकीले पीले वस्त्र में शुद्ध कस्तूरी लपेटकर अपने धन रखने के स्थान पर रखें, घर में सुख-समृद्धी आयेगी।
  • यदि मार्ग में कोई सफाई कर्मचारी सफाई करता दिखाई दे तो उसे यह कहकर की चाय-पानी पी लेना या कुछ खा लेना, कुछ दान अवश्य दें, परिवार में प्यार व सुख-समृद्धी बढ़ेगी। यदि सफाई कर्मचारी महिला हो तो शुभ फल अधिक मिलेगा।
  • किसी भी विशेष मनोरथ की पूर्ती के लिये शुक्ल पक्ष में जटावाला नारियल नए लाल सूती कपडे में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें। यह उपाय निष्ठापूर्वक करें।
  • शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से नित्य प्रातः में अर्पित करें। फूल हनुमानजी को मन्दिर में अर्पित करें। फूल अर्पित करते समय हनुमान जी से मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते रहें। ध्यान रहे यह उपाय करते समय कोई आपको टोके नहीं और टोके तो आप उसका उत्तर न दें।
  • जन्म पत्रिका में 12वें भाव में मंगल हो और खर्च बहुत होता हो, तो बेलपत्र पर चन्दन से 'भौमाय नमः' लिखकर सोमवार को शिवलिंग पर चढ़ाएं, उक्त सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।