अभी तक आपने फ्रूट पैक्स और गोल्डन, सिल्वर, पर्ल और चॉकलेट फेशियल के बारे में ही सुना होगा, लेकिन अब महिलाएं ड्राईफ्रूट्स का भी अपने सौन्दर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल कर रही हैं। जड़ी-बूटियों और फलों की मदद से महिलाएं सदियों से अपनी सुंदरता में निखार ला रही हैं। आजकल ड्राई फ्रूट्स का उपयोग चेहरे की खूबसूरती बढ़ाने के लिए फेस पैक में किया जाने लगा है। मतलब, काजू-बादाम अब आपको अंदर से स्वस्थ बनाने के साथ ही बाहर से भी निखार प्रदान करेंगे। आयुर्वेदिक फेशियल में इन ड्राईफ्रूट्स का यूज हो रहा है। ये फ्रूट पैक्स स्किन को मुलायम तो बनाते ही हैं साथ ही इसके कोई साइड इफेक्ट्स भी नहीं हैं।
काजू है गुणकारी
काजू सभी तरह की स्किन के लिए गुणकारी है। अगर आपकी त्वचा ड्राई है, तो काजू को रात भर दूध में भिगो दें और सुबह बारीक पीसकर इसमें मुल्तानी मिट्टी और शहद की कुछ बूंदें मिलाकर स्क्रब करें। ऑयली स्किन वाले शहद की जगह नींबू अथवा दही का प्रयोग कर सकते हैं। काजू ऑयली स्किन के लिए ज्यादा फायदेमंद है। ये स्किन को मुलायम बनाता है।
त्वचा दमके अखरोट से
चेहरे की खूबसूरती बढ़ाने के लिए आप अखरोट का भी उपयोग कर सकती हैं। अखरोट के छिलके को बारीक पीसकर इसमें मुल्तानी मिट्टी, खस-खस और दही मिलाएं और इस मिश्रण का उपयोग स्क्रब के रूप में करें। अखरोट के ऑयल में तिल का तेल व लैवेंडर ऑयल मिलाकर मसाज करने से त्वचा में रौनक आ जाती है।
झुर्रियां और दाग धब्बे मिटाए नारियल
नारियल का सेवन भी शरीर के लिए स्वास्थ्य वर्धक है, लेकिन अगर इसका उपयोग स्किन को निखारने के लिए किया जाए, तो यह बहुत फायदेमंद साबित होता है। नारियल तेल त्वचा में समाकर त्वचा को कोमलता और मासूमियत प्रदान करते हैं। रूखी त्वचा, झुर्रियां एवं दाग-धब्बों को मिटाकर त्वचा में निखार लाने में कारगर है। नारियल तेल के नियमित प्रयोग से त्वचा में फ्री रैडिकल्स की समस्या नहीं होती, क्योंकि इसमें एंटी ऑक्सिडेंट के गुण पाए जाते हैं। एलोवेरा जेल में नारियल तेल मिलाकर त्वचा पर लगाने से त्वचा को सूर्य की हानिकारक किरणों से सुरक्षा मिलती है। नारियल का पानी भी खूबसूरती को बढ़ाता है। यदि आपके चेहरे पर झाइयां या दाग हैं, तो 1 चम्मच चंदन पाउडर, एक चम्मच केओलिन पाउडर, 1 चम्मच मुल्तानी मिट्टी पाउडर और चुटकी भर हल्दी को लेकर नारियल पानी में पेस्ट बनाएं। इसे त्वचा पर लगाकर 5-7 मिनट बाद साफ पानी से धो दें। इस पेस्ट के नियमित प्रयोग करने से निशान हल्के हो जाएंगे।
नारियल के फायदे
हिचकी और नकसीर में कच्चे नारियल का पानी पीना लाभ देता है।नारियल के पानी में खीरे का रस मिलाकर लगाने से मुंहासों से रक्षा होती है।
रूसी और सिरदर्द में नारियल का तेल बहुत फायदेमंद है।
नारियल के सेवन से रक्तविकार का नाश होता है।
खाज-खुजली में नारियल का तेल लाभकारी होता है।
नारियल पानी का नियमित सेवन मोटापे से बचाता है।
अगर आपको उल्टियों हो रही हैं, तो इसका पानी उल्टियों पर भी ब्रेक लगाता है।
नारियल पानी चिकनगुनिया की रोकथाम में भी सहायक है। यह स्वाद और सेहत का संगम है तथा कुदरत का अनमोल खजाना है।
15 अक्टूबर 2010
ब्यूटीफुल ड्राईफ्रूट्स पैक
Labels: आहार
Posted by Udit bhargava at 10/15/2010 06:39:00 am 1 comments
11 अक्टूबर 2010
कष्ट निवारण - उपाय - 10
कारोबारी सफलता के लिए
कारोबारी सफलता के लिए प्रत्येक अमावस्या के दिन अपने पूरे घर की सुंदर सफाई करें। तत्पश्चात परिवार के सभी सदस्य नहा धोकर शुद्ध वस्त्र धारण करके एक जगह एकत्रित होकर अपने बीच में चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछा दें। वस्त्र के ऊपर 11 मुट्ठी मसूर की दाने रखकर उसके ऊपर एक चौमुखा दीपक प्रज्ज्वलित कर रख दें। तत्पश्चात घर के सभी सदस्य सुंदर काण्ड का पाठ करें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।
नया कारोबार करने से पहले
नया कारोबार, नई दुकान या कोई भी नया कार्य करने से पूर्व मिट्टी के पांच पात्र लें जिसमें सवाकिलो सामान आ जाएं। प्रत्येक पात्र में सवा किलो सफेद तिल, सवा किलो पीली सरसों, सवा किलो उड़द, सवा किलो जौ, सवा किलो साबुत मूंग भर दें। मिट्टी के ढक्कन से ढंक कर सभी पात्र को लाल कपड़े से मुंह बांध दें और अपने व्यवसायकि स्थल पर इन पांचों कलश को रख दें। वर्ष भर यह कलश अपनी दुकान में रखें ग्राहकों का आगमन बड़ी सरलता से बढ़ेगा और कारोबारी समस्या का निवारण भी होगा। एक वर्ष के बाद इन संपूर्ण पात्रों को अपने ऊपर से 11 बार उसार कर बहते पानी में प्रवाह कर दें। और नये पात्र भरकर रख दें।
कार्य में बार-बार आने वाली समस्या
यदि आपको अपने कार्य में अनावश्यक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। बार-बार कार्य में रूकावट आ रही हो तो आप अपने घर में शनिवार के दिन तुलसी का पौधा लगाएं और हर रोज सुबह-शाम घी का दीपक जलाने से कार्य में बार-बार आने वाली समस्या का निवारण बड़ी सरलता से हो जाएगा।
कारोबार में अनावश्यक परेशानी हेतु
अगर कारोबार में अनावश्यक परेशानी आ रही हो, लाभ मार्ग अवरोध हो रहा हो तो हर रोज शाम को गोधूलि वेला में यानि साढ़े पांच से छ: बजे के बीच में अपने पूजा स्थान में श्री महालक्ष्मी की तस्वीर स्थापित करके या तुलसी के पौधे के सामने में गो घृत का दीपक जलाएं। दीपक प्रज्ज्वलित करने के बाद उसक अंदर अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए एक इलायची डाल दें। ऐसा नियमित 186 दिन करने से व्यापार में लाभ होगा। दीपक और इलायची हमेशा नया प्रयोग में लाएं।
कारोबारी समस्या निवारण हेतु
कारोबार में समस्या आ रही हो, व्यवसाय चल नहीं रहा हो और कर्ज से परेशान हो रहे हो तो इस प्रयोग को करके देखें। यह प्रयोग किसी भी महीने शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार के दिन शुरू करें और नियमित 186 दिन करें। हर रोज स्नानोपरांत पीपल, बरगद या तुलसी के पेड़ के नीचे चौमुखा देसी घी का दीपक जलाएं। और शुद्ध कंबल का आसन बिछाकर एक पाठ विष्णु सहस्रनाम का करें तथा 11 माला ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र की जाप करें। मां लक्ष्मी की कृपा होगी और कारोबारी समस्या का निवारण हो जाएगा।
व्यवसाय में बाधाएं
यदि आपके व्यवसाय में बाधाएं चल रही हों तो आपको अपने कार्यस्थल पर पीले रंग की वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए तथा पूजाघर में हल्दी की माला लटकानी चाहिए। भगवान लक्ष्मी-नारायण के मंदिर में लड्डू का भोग लगाना चाहिए।
व्यवसाय में मनोनुकूल लाभ
व्यवसाय में मनोनुकूल लाभ की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो किसी भी शनिवार के दिन नीले कपड़े 21 दानें रक्त गुंजा के बांधकर तिजोरी में रख दें। हर रोज धूप, दीप अवश्य दिखाएं। अपने इष्टदेव का ध्यान करें। ऐसा नियमित करने से व्यापार में लाभ मिलेगा और सफलता भी प्राप्त होगी।
कारोबारी, पारिवारिक, कानूनी परेशानियों से छुटकारा दिलाने वाला अमोध प्रयोग
आप अपना काम कर रहे हो कठिन परिश्रम के बावजूद भी लोग आपका हक मार देते हैं। अनावश्यक कार्य अवरोध उत्पन्न करते हों। आपकी गलती न होने के बावजूद भी आपको हानि पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा हो तो यह प्रयोग आपके लिए बहुत ही लाभदायक सिध्द होगा। रात्रि में 10 बजे से 12 बजे के बीज में यह उपाय करना बहुत ही शुभ रहेगा। एक चौकी के ऊपर लाल कपड़ा बिछा कर उसके ऊपर 11 जटा वाले नारियल। प्रत्येक नारियल के ऊपर लाल कपड़ा लपेट कर कलावा बांध दें। इन सभी नारियल को चौकी के ऊपर रख दें। घी का दीपक जला करके धूप-दीप नेवैद्य पुष्प और अक्षत अर्पित कर। नारियल के ऊपर कुमकुम से स्वस्तिक बनाए और उन प्रत्येक स्वस्तिक के ऊपर पांच-पांच लौंग रखें और एक सुपारी रखें। माँ भगवती का ध्यान करें। माँ को प्रार्थना करें कष्टों की मुक्ति के लिए। कम्बल का आसन बिछा कर ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:11 माला करें, तत्पश्चात नारियल सहित समस्त सामग्री को सफेद कपड़े में बांध कर अपने ऊपर से 11 बार वार कर सोने वाले पलंग के नीचे रख दें। सुबह ब्रह्म मर्ुहूत्त में बिना किसी से बात किए यह सामग्री कुएं, तालाब या किसी बहते हुए पानी में प्रवाह कर दें। कानूनी कैसी भी समस्या होगी उससे छुटकारा मिल जाएगा।
ऋण मुक्ति और धन वापसी के उपाय
किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के मंगलवार के दिन प्रदोष काल में यह पूजा प्रारंभ करें। किसी भी प्राण प्रतिष्ठित शिव मंदिर में जाकर श्रद्धापूर्वक शिव की उपासना करें। शिव पूजन के उपरांत अपने सामने दो दोने रख दें। एक दोने में यानी बायें हाथ वाले दोनें में 108 बिल्वपत्र पीले चंदन से प्रत्येक बिल्व पत्र में ॐ नम:शिवाय लिखकर रख दें। तत्पश्चात शुद्ध आसन बिछाकर एक बिल्वपत्र अपने दाहिनी हाथ में लें और इस ॐ ऋणमुक्तेश्वर महादेवाय नम:। मंत्र का जाप करें। और दाहिने हाथ वाले दोने में बिल्व पत्र को रख दें। ऐसा 108 बार करें। जाप पूरा होने के उपरांत एक पाठ ऋणमोचन मंगल स्तोत्र का करें। साथ ही सर्वारिष्ट शान्त्यर्थ शनि स्तोत्र का पांच पाठ भी करें। ऐसा नियमित 40 दिन तक पूजा करने से ऋण से छुटकारा मिल जाएगा।
ऋण मुक्ति के लिये
आप अपने कारोबार में कर्जे से डूबे जा रहे है रात-दिन मेहनत करने के उपरांत भी कर्जा उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है तो यह प्रयोग आपके लिये बहुत ही अनुकूल व फायदेमंद रहेगा। किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथमा के दिन नित्यक्रम से निवृत्त होकर स्नानोपंरात स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने पूजा स्थान में यह पूजा प्रारंभ करें। 6 इंच लम्बी गूलर की पेड़ की जड़ ले उसके ऊपर 108 बार काले रंग का धागा ॐ गं गणपतये नम:मंत्र का जाप करते हुये लपेटे। भगवान गणेश जी से ऋण मुक्ति की प्रार्थना करें। 108 चक्र होने के बाद इस लकड़ी को स्वच्छ थाली में पीला वस्त्र बिछाकर रख दें। तत्पश्चात श्रद्धानुसार धूप,दीप, नैवद्य, पुष्प अर्पित करें। घी का दीपक प्रज्जवलित कर उसमें एक इलायची डाल दें। शुद्ध आसन बिछाकर अपने सामने हल्दी से रंगे हुये अक्षत रख लें। अपने हाथ में थोड़े से अक्षत लें ॐ गं गणपतये ऋण हरताये नम:मंत्र का जाप करके अक्षत गूलर की लकड़ी के ऊपर छोड़ दे। ऐसा 108 बार करें। अगले दिन यह प्रक्रिया पुन:दोहरायें। ऐसा नवमी तक पूजन करें। नवमी के दिन रात में सवा ग्यारह बजे पुन:एक बार पूजन करें। ऋण हरता गणपति की 11 माला जाप करें। तत्पश्चात इस लकड़ी को अपने ऊपर से 11 बार उसार कर के अपने घर के किसी कोने में गड्डा खेंद कर दबा दे। उसके ऊपर कोई भारी वस्तु रख दें। ऐसा करने से कर्ज से छुटकारा मिल जायेगा।
ऋण से छुटकारे हेतु
किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार के दिन गेहूं के सवा किलो आटा में सवा किलो गुड़ मिलाकर उसके गुलगुले या पूएं बनाएं। शाम के समय हनुमान जी को चमेली के तेल में सिंदूर घोलकर अभिषेक करने के उपरांत घी का दीपक जलाएं और वहीं बैठकर हनुमान चालीसा के 7 पाठ करें। तत्पश्चात हनुमान जी को इन गुलगुले और पूएं का भोग लगाएं और गरीब व जरूरतमंद व्यक्तियों को बांट दें। ऐसा 11 मंगलवार करें, ऋण से छुटकारा मिलेगा।
ऋण मुक्ति के लिए
ऋण मुक्ति के लिए उपाय सर्वप्रथम पांच गुलाब के फूल लाएं। ध्यान रहे कि उनकी पंखुड़ी टूटी हुई न हो। तत्पश्चात सवा मीटर सफेद कपड़ा, सामने रचो कर बिछाएं और गुलाब के वार फूलों को चारों कोनों पर बांध दें। फिर पांचवा गुलाब मध्य में डालकर गांठ लगा दें। इसे गंगा, यमुन और सरस्वती नदियों में प्रभावित करें। प्रभुकृपा से ऋण मुक्ति और घर में सुख समृध्दि की प्राप्ति होती है।
व्यवसायिक परेशानी का निवारण
दीवाली के दिन नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत अपने पूजा स्थान में लक्ष्मी बीसा यंत्र एवं कुबेर यंत्र की श्रद्धापर्वूक स्थापना करने के उपरांत धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प और अक्षत से पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात शुद्ध आसन बिछाकर स्फटिक की माला पर 11 माला इस ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्यादि पताये धन धान्य समृद्धि में देही दापय दापय स्वाहा मंत्र की जाप करें। संपूर्ण व्यावसायिक परेशानियों का निवारण होगा। हर रोज इस मंत्र की सुबह-शाम एक माला जाप करने से अवश्य धन में वृद्धि होगी।
घाटा दूर करने का उपाय
व्यापार में घाटा हो रहा हो या काम नहीं चल पा रहा हो, तो आप एक चुटकी आटा लेकर रविवार के दिन व्यापार स्थल या अपनी दुकान के मुख्य द्वार के दोनों ओर थोड़ा-थोड़ा छिड़क दें, साथ में कहें- जिसकी नजर लगी है उसको लग जाये। बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला। यह क्रिया शुक्ल पक्ष में ही करें। संभव हो तो प्रयत्न करें कि इस क्रिया को करते हुए आपको कोई न देखे। गुप्त रूप से यह क्रिया करने पर व्यापार का घाटा दूर होने लगता है। इसके अलावा व्यापार स्थल में मकडिय़ों के जाले व्यापार की वृद्घि को रोकते हैं। अत: व्यापार में बरकत के लिए प्रत्येक शनिवार को दुकान की सफाई आदि करते समय मकड़ी के जालों को अवश्य हटा देना चाहिए।
बिक्री बढ़ाने के व लाभ के उपाय
जिन उद्योगपतियों या व्यापारियों को काफी प्रयास और अथक परिश्रम करने के बावजूद बिक्री में वृध्दि नहीं हो पा रहा हो तो यह उपाय शुक्ल पक्ष में गुरुवार से प्रारम्भ करें और प्रत्येक गुरुवार को इस क्रिया को दोहराते रहें। घर के मुख्य द्वार के एक कोने को गंगाजल से शुध्द कर लें या धो लें। शुध्द किए गए स्थान पर स्वस्तिक का चिह्न बनाएं और उस पर थोड़ा दाल और गुड़ रख दें। साथ ही एक घी का दीपक जला दें। ध्यान रहे कि स्वस्तिक का चिह्न हल्दी से ही बनाएं। स्वास्तिक बनाने के बाद उसको बार-बार नहीं देखना चाहिए। यह उपाय बहुत ही सरल है और इसका प्रभाव शीघ्र ही परिलक्षित होने लगता है।
कारोबार में वृद्धि हेतु
हर रोज प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्नानोपरांत तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें थोड़ी सी रोली डालकर ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:॥ मंत्र का जाप करते हुए तुलसी के पौधे में जल चढ़ाएं। शाम को गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक जलांए और इसी मंत्र की पांच माला जाप करें।
व्यवसायिक समस्याओं का निवारण हेतु
कठिन परिश्रम व मेहनत करने के उपरांत लाभ की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो प्रत्येक गुरुवार के दिन शुभ घड़ी में पीले कपड़े में 9 जोड़े चने की दाल, 9 पीले गोपी चंदन की डलियां, 9 गोमती चक्र इन सबको पोटली बनाकर किसी भी मंदिर में केले के पेड़ के ऊपर शाम के समय टांग दें। साथ ही एक घी का दीपक भी प्रज्ज्वलित कर लें। ऐसा 11 गुरुवार करने से धन की प्राप्ति होगी और व्यवसायिक समस्याओं का निवारण भी होगा।
धन का न रूकना
किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार के दिन 1 तांबे का सिक्का, 6 लाल गुंजा लाल कपड़े में बांधकर प्रात: 11 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में किसी सुनसान जगह में अपने ऊपर से 11 बार उसार कर 11 इंच गहरा गङ्ढा खोदकर उसमें दबा दें। ऐसा 11 बुधवार करें। दबाने वाली जगह हमेशा नई होनी चाहिए। इस प्रयोग से कारोबार में बरकत होगी, घर में धन रूकेगा।
धन वृद्धि हेतु
किसी भी गुरु पुष्य नक्षत्र के दिन प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत शंख पुष्पी की जड़ अपने घर में लेकर आएं इस जड़ को गंगाजल से पवित्र कर दें। पवित्र करने के उपरांत चांदी की डिब्बी में पीले चावल भरकर उसके ऊपर रख दें। श्रद्धानुसार धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प, अक्षत अर्पित कर पंचोपचार पूजन करें। उसके बाद इस डिब्बी को अपनी तिजोरी में रख दें। धन में वृद्धि और कारोबारमें लाभ होगा। हर गुरु पुष्य के दिन शंख पुष्पी की जड़ व चांदी की डिब्बी बदल दें। पहले वाली बहते पानी में प्रवाह कर दें।
Labels: टोने-टोटके
Posted by Udit bhargava at 10/11/2010 06:43:00 pm 0 comments
09 अक्टूबर 2010
टोने-टोटके - कुछ उपाय - 6 ( Tonae - Totke - Some Tips - 6 )
आँखों के रोग से मुक्ति के लिए
- आँखों में यदि काला मोतिया हो जाए तो ताम्बे के पात्र में जल लेकर उसमें ताम्बे का सिक्का व गुड डालकर प्रतिदिन सूर्य को अर्ध्य दें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से शुरू कर चौदह रविवार करें। अर्ध्य देते समय रोग से मुक्ति की प्रार्थना करते रहें। इसके अतिरिक्त पांच प्रकार के फल लाल कपडे में बांधकर किसी भी मन्दिर में दें। यह उपाय निष्ठापूर्वक करें, लाभ होगा।
नौकरी की प्राप्ति के लिए
- नौकरी न मिल रही हो तो मन्दिर में बारह फल चढ़ाएं। यह उपाय नियमित रूप से करें और इश्वर से नौकरी मिलने की प्रार्थना करें।
शीघ्र विवाह के लिए
- विवाह योग्य वर या कन्या के शीघ्र विवाह के लिए घर के मन्दिर में नवग्रह यन्त्र स्थापित करें। जिनकी नई शादी हो, उन्हें घर बुलाएं, उनका सत्कार करें और लाल वस्त्र भेंट करें उन्हें भोजन या जलपान कराने के पश्चात सौंफ मिस्री जरूर दें। यह सब करते समय शीघ्र विवाह की कामना करें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के मंगलवार को करें, लाभ होगा।
मनोकामना पूर्ती के लिये
- व्यापार मंदा हो तथा पैसा टिकता न हो, तो नवग्रह यन्त्र और धन यन्त्र घर के मन्दिर में शुभ समय में स्थापित करें। इसके अतिरिक्त सोलह सोमवार तक पांच प्रकार की सब्जियां मन्दिर में दें और पंचमेवा की खीर भोलेनाथ को मन्दिर में अर्पित करें। सभी कामनाएं पूरी होंगी।
कुछ अन्य टोटके
- बच्चे पढ़ते न हों तो उनकी स्टडी टेबल पर शुभ समय में सरस्वती यन्त्र व कुबेर यन्त्र स्थापित करें। उनके पढने के लिये बैठने से पहले यंत्रों के आगे शुभ घी का दीपक तथा गुलाब की अगरबत्ती जलाएं। पढ़ते समय उनका मुंह पूर्व की ओर होना चाहिय। यह उपाय करने के बच्चों का मन पढ़ाई में लगने लगेगा और पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद उन्हें मनोवांछित काम भी मिल जायेगा।
- समाज में मान सम्मन की प्राप्ति के लिये कबूतरों को चावल मिश्रित डालें, बाजरा शुक्रवार को खरीदें व शनिवार से डालना शुरू करें।
- शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार या बुधवार को चमकीले पीले वस्त्र में शुद्ध कस्तूरी लपेटकर अपने धन रखने के स्थान पर रखें, घर में सुख-समृद्धी आयेगी।
- यदि मार्ग में कोई सफाई कर्मचारी सफाई करता दिखाई दे तो उसे यह कहकर की चाय-पानी पी लेना या कुछ खा लेना, कुछ दान अवश्य दें, परिवार में प्यार व सुख-समृद्धी बढ़ेगी। यदि सफाई कर्मचारी महिला हो तो शुभ फल अधिक मिलेगा।
- किसी भी विशेष मनोरथ की पूर्ती के लिये शुक्ल पक्ष में जटावाला नारियल नए लाल सूती कपडे में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें। यह उपाय निष्ठापूर्वक करें।
- शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से नित्य प्रातः में अर्पित करें। फूल हनुमानजी को मन्दिर में अर्पित करें। फूल अर्पित करते समय हनुमान जी से मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते रहें। ध्यान रहे यह उपाय करते समय कोई आपको टोके नहीं और टोके तो आप उसका उत्तर न दें।
- जन्म पत्रिका में 12वें भाव में मंगल हो और खर्च बहुत होता हो, तो बेलपत्र पर चन्दन से 'भौमाय नमः' लिखकर सोमवार को शिवलिंग पर चढ़ाएं, उक्त सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।
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Posted by Udit bhargava at 10/09/2010 03:00:00 pm 0 comments
06 अक्टूबर 2010
सालासर के बालाजी ( Salasar Balaji )
राजस्थान के चुरू जिले में स्थित है सालासर बलाजी का मंदिर। जयपुर बीकानेर सडक मार्ग पर स्थित सालासर धाम हनुमान भक्तों के बीच शक्ति स्थल के रूप में जाना जाता है। इस मंदिर में अगाध आस्था है भक्तों की। आपको यहां हर दिन हजारों की संख्या में देशी-विदेशी भक्त मत्था टेकने के लिए कतारबद्ध खडे दिखाई देंगे।
जयपुर से लगभग 2घंटे के सफर के बाद यहां पहुंचा जा सकता है। यहां हनुमानजी की वयस्क मूर्ति स्थापित है, इसलिए भक्तगण इसे बडे हनुमान जी पुकारते हैं। एक कथा के अनुसार, राजस्थान के नागौर जिले के एक छोटे से गांव असोता में संवत 1811में शनिवार के दिन एक किसान का हल खेत की जुताई करते समय रुक गया। दरअसल, हल किसी शिला से टकरा गया था। वह तिथि श्रावण शुक्ल नवमी थी।
उसने उस स्थान की खुदाई की, तो मिट्टी और बालू से ढंकी हनुमान जी की प्रतिमा निकली। किसान और उसकी पत्नी ने इसे साफ किया और घटना की जानकारी गांव के लोगों को दी। माना जाता है कि उस रात असोता के जमींदार ने रात में स्वप्न देखा कि हनुमानजी कह रहे हैं कि मुझे असोता से ले जाकर सालासर में स्थापित कर दो। ठीक उसी रात सालासर के एक हनुमान भक्त मोहनदास को भी हनुमान जी ने स्वप्न दिया कि मैं असोता में हूं, मुझे सालासर लाकर स्थापित करो। अगली सुबह मोहनदास ने अपना सपना असोता के जमींदार को बताया। यह सुनकर जमींदार को आश्चर्य हुआ और उसने बालाजी[हनुमान जी] का आदेश मानकर प्रतिमा को सालासर में स्थापित करा दिया। धीरे-धीरे यह छोटा सा कस्बा सालासर धाम के नाम से विख्यात हो गया।
मंदिर परिसर में हनुमान भक्त मोहनदास और कानी दादी की समाधि है। यहां मोहनदास जी के जलाए गए अग्नि कुंड की धूनी आज भी जल रही है। भक्त इस अग्नि कुंड की विभूति अपने साथ ले जाते हैं। मान्यता है कि विभूति सारे कष्टों को हर लेती है। पिछले बीस वर्षो से यहां पवित्र रामायण का अखंड कीर्तन हो रहा है, जिसमें यहां आने वाला हर भक्त शामिल होता है और बालाजी के प्रति अपनी आस्था प्रकट करता है। चैत्र पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा के दिन प्रतिवर्ष यहां बहुत बडा मेला लगता है।
Labels: धार्मिक स्थल
Posted by Udit bhargava at 10/06/2010 08:17:00 am 1 comments
03 अक्टूबर 2010
पानी को खोजने की अनोखी विद्या
क्या लकड़ी या नारियल की सहायता से भू-जलस्तर का पता लगाया जा सकता है? आस्था और अंधविश्वास की इस कढ़ी में हम ढूँढ रहे है इसी सवाल का जवाब। जब हमें पता चला कि इंदौर में एक शख्स के पास ऐसी अनोखी विद्या है, जिससे वह जमीन में पानी के स्तर का पता लगा सकता है तो हम चल पड़े उसकी खोज में......
हमारी तलाश खत्म हुई गंगा नारायण शर्मा के पास जाकर...शर्माजी का दावा है कि वह अपने यंत्रों, लकड़ी और नारियल की सहायता से जमीन के किस भाग में अधिक पानी है और किस भाग में कम इसका पता लगा सकते हैं। जमीन में कम से कम गहराई पर पानी की उपलब्धता ढूँढने के लिए शर्मा एक अँगरेजी के Y अक्षर के आकार की लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं।
लकड़ी के दोनों छोरों को हथेली के बीच रखकर वह उस स्थान के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। जिस स्थान पर लकड़ी खुद-ब-खुद जोर-जोर से घूमने लगती है वह उस स्थान पर वह पानी होने का दावा करते हैं। शर्मा इसे डाउजिंग टेकनिक कहते हैं। और इसके जरिए वे 80 प्रतिशत सफलता प्राप्त होने का दावा भी करते हैं।
भू-जल वैज्ञानिक गंगा नारायण शर्मा कहते हैं कि इसका इस्तेमाल चिकित्सा के क्षेत्र में, भूकंप से भूमिगत हुई नदियों का पता लगाने और लैंड माइन का पता लगाने में भी किया जा सकता है। उनका कहना है कि वर्तमान स्थिति में भू-जल स्तर करीब 700 फुट गहराई तक चला गया है। जिसके चलते जल स्त्रोतों का पता लगाने के लिए यह तकनीक कारगर साबित होती है।
लकड़ी की स्टीक के अलावा इस कार्य को अंजाम देने के लिए वे नारियल का भी इस्तेमाल किया करते हैं। इस विधि में नारियल को हथेली पर सीधा रखा जाता है और जहाँ जमीन में पानी होने के संभावना हो वहाँ नारियल अपने आप खड़ा हो जाता है। और फिर उसी स्थल को जल प्राप्ति का पर्याप्त स्त्रोत मान लिया जाता है।
यहाँ के बिल्डर शर्मा की इस विद्या का उपयोग कर ही बोरवेल खुदवाने के कार्य की शुरुवात करते हैं, और उनका विश्वास है कि इस विद्या का उपयोग कर बोरवेल खोदने से समय और पैसे दोनों की बचत होती है। हालाँकी शर्मा जी का दावा हमेशा सही ही निकलता है यह कहना भी कठिन होगा। कई बार 150-200 फीट पर पानी निकलने का दावा 400 फीट तक भी पूरा होता नहीं दिखता है। फिर भी लोगों की इस विद्या से जुड़ी आस्था उन्हें बार-बार शर्मा तक ले आती है।
शर्मा की इस तकनीकी विद्या का इस्तेमाल कर बोरिंग खुदवा रहे रोहित खत्री का कहना है कि इसमें अंधविश्वास की कोई बात नहीं है। दावा सही साबित न होने पर भी उनका मानना है कि अत्यधिक गर्मी के चलते जल स्तर नीचे चला गया है। बावजूद इसके वे इस तकनीक को अयोग्य नहीं मानते।
दिनोदिन पानी की हो रही कमी और बोरवेल खुदवाने में लगने वाली भारी रकम के चलते लोग इस तरह की बातों पर विश्वास करने के लिए मजबूर हो जाते हैं? हर कोई अपना समय और पैसा बचाने के चक्कर में गंगा नारायण शर्मा जैसे लोगों की तलाश में रहता है।
Labels: आस्था या अन्धविश्वास
Posted by Udit bhargava at 10/03/2010 08:50:00 pm 0 comments
17 सालों से जल रहा है एक दीया !
छत्तीसगढ़ का एक छोटा-सा गाँव लेन्ध्रा। चाहे आप इसे मान्यता कहें या फिर अन्धविश्वास, इस गाँव के लोगों ने असमय मृत्यु से बचने के लिये सत्रह सालों से एक दीये को प्रज्ज्वलित कर रखा है।
इस गाँव के मुख्य मन्दिर राधा-माधव संकीर्तन आश्रम (जो रायगढ़ से पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित है) में यह दीया पिछले सत्रह सालों से लगातार जल रहा है। लोगों की मान्यता है कि इस दीये के जलने से किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा इस गाँव पर नहीं पड़ेगी।
इस गाँव के एक श्रद्धालु भारत पाण्डेय का कहना है कि वे हर साल यहाँ आते हैं और अपने परिवार को भी साथ लाने की कोशिश करते हैं। वे चौदह साल पहले यहाँ आए थे और तब से आज तक लगातार यहाँ आ रहे हैं। उन्हें यहाँ आना काफी अच्छा लगता है।
इस दीये को जलाए रखने के लिए जो खर्च होता है, उसे पूरा गाँव मिलकर उठाता है।
इस मन्दिर के पुजारी मुकेश कुमार के अनुसार, इस दीये को जलाने के लिए पूरे छत्तीसगढ़ से श्रद्धालु यहाँ आते हैं और मन्दिर में काफी मात्रा में दान-दक्षिणा भी देते हैं। उनके लिए इस पैसे से मुफ्त भोजन का भी इंतजाम किया जाता है। इस दीये को जलाए रखने के लिये दो व्यक्तियों को भी नियुक्त किया गया है।
अधिकतर ग्रामीण मानते हैं कि इस दीये के प्रज्ज्वलित रहने से सत्रह सालों से इस गाँव पर किसी तरह की प्राकृतिक आपदा नहीं आई है। करीब 3,500 लोगों की आबादी वाला यह गाँव आसपास के क्षेत्रों में भी श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। (एएनआई)
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Posted by Udit bhargava at 10/03/2010 08:46:00 pm 1 comments
राजा पृथु ( Raja Prithu )
चीन समय की बात है, विष्णु-भक्त ध्रुव के वंश में अंग नामक एक राजा हुए। वे बड़े धर्मात्मा और प्रजा-प्रिय थे। वृद्धावस्था में वे राजपाट त्याग कर तपस्या करने वन में चले गए। भृगु आदि मुनियों ने जब देखा कि उनके जाने के बड पृथ्वी की रक्षा करने वाला कोई नहीं बचा है, तब उन्होंने उनके पुत्र वे का राज्याभिषेक कर दिया। राजा बनते ही वें अपने बल और ऐश्वर्या के मद में चूर हो गया। उसने राज्य में घोषणा करवा दी कि रिशनी-मुनि किसी भी प्रकार का य्गाग्य और हवन न करें। जो राजाज्ञा का उल्लंघन करेंगे उन्हें दण्डित किया जायेगा। उसके भय से चारों ओर धर्म-कर्म बंद हो गए।
धर्म-संबंधी कार्य में विध्न उत्पन्न होने पर सभी ऋषि-मुनि एकत्रित होकर राजा वें के पास गए और उनसे विनम्र स्वर में बोले - "राजन ! कृपा हमारी बात ध्यानपूर्वक सुनें। इससे आपकी आयु, बल और यश में वृद्धि होगी। राजन ! यदि मनुष्य मन, वाणी, शरीर और बुद्धि से धर्म का पालन करे तो उसे स्वर्ग आदि लोकों की प्राप्ति होती है और यदि वह निष्काम भाव से धर्म का पालन करे तो मोक्ष का अधिकारी बनता है। अतः प्रजा का धर्म आप द्वारा नष्ट नहीं होना चाहिए। धर्म नष्ट होने पर राजा भी नष्ट हो जाता है। राजन ! आपके राज्य में जो यज्ञ और हवन आदि होंगे, उनसे देवता भी प्रसन्न होकर आपको इच्छित वर प्रदान करेंगे। अतेव आपको य्गयादी अनुष्ठान बंद करके देवताओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।"
दुष्ट वें अहंकार भरे स्वर में बोला - "मुनियों ! तुम बड़े मूर्ख हो। तुमने सारा ज्ञान त्यागकर अधर्म में अपनी बुद्धि लिप्त कर रखी है। तभी तो तुम अपने पालन करने वाले मुख प्रत्यक्ष इश्वर को छोड़कर किसी दूसरे इश्वर की पूजा अर्चना करना चाहते हो, जो तुम्हारे लिये कल्पित है। जो लोग मूर्खतावश अपने राजा-रूपी परमेश्वर क अपमान करते हैं, उन्हें न तो इस लोक में सुख मिलता है और न ही परलोक में। देवगन राजा के शरीर में ही वास करते हैं। इसलिए तुम मेरा ही पुजन करो और मुझे ही यज्ञ का भाग अर्पित करो।" अहंकार के कारण वें की बुद्धि पूर्णतः भ्रष्ट हो गई थी। वह अत्यंत क्रूर, अन्यायी, अधर्मी और कुमार्गी हो गया था, इसलिए उसने ऋषि-मुनियों की विनती प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं दिया।
उसके पापयुक्त शब्द सुनकर मुनिगण क्रोधित होकर बोले - "वेन ! तू बड़ा अधर्मी और पापी है। यदि तू जीवित रहा तो कुछ ही दिनों में इस सृष्टि को नष्ट कर देना। जिन भगवान् विष्णु की कृपा से तुझे पृथ्वी का राज्य प्राप्त हुआ है, तू उन्हीं परब्रह्म का अपमान कर रहा है। जगत के कल्याण के लिये तेरा मरना ही उचित है।"
इस प्रकार उन्होंने दुष्ट वेन को मारने का निश्चय कर उस पर प्रहार करने आरम्भ कर दिए। फिर शीघ्र हे उन्ह्होने उसका काम तमाम कर दिया और अपने आश्रमों को लौट गए। इधर वेन की माता मोहवश अपने पुत्र के मृत शरीर की रक्षा करने लगी। वेन की मृत्यु के पश्चान राज्य में चोरों-डाकुओं का आतंक बढ़ गया।
एक दिन सरस्वती नदी के तट पर कुछ मुनिगण बैठे धर्म-चर्चा कर रहे थे। तबभी डाकुओं क एक दल इधर से निकला। उन्हें देखकर मुनिगण सोच में पद गए। उनके मन में एक ही विचार उत्पन्न होने लगा - 'वेन के मरते ही राज्य में अराजकता फ़ैल गई है। राज्य में चोर और डाकू बढ़ गए हैं, जो निर्दोष प्रजा को लूट रहे हैं। यघपि रिशनी-मुनि शांत स्वभाव के होते हैं, तथापि दीनों की उपेक्षा करने से उनका तप क्षण भर में क्षीण हो जाता है। राजा अंग का वंश नष्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसमें उनके पराक्रमी और धर्मात्मा राजा हो चुके हैं। इसलिए हमें उनका उत्तराधिकारी अवश्य उत्पन्न करना होगा जो अपने पुरूषार्थ से प्रजा की रक्षा कर सके।'
तब उन्होंने आपस में विचार कर राज्य के उत्तराधिकारी के लिये वेन की जंघा को बड़े जोर से माथा तो उसमें से एक बौना पुरूष उत्पन्न हुआ। उसका रंग काला था, उसके सभी अंग टेढ़े-मेढे और छोटे थे। उसके जन्म लेते ही राजा वेन के सभी भयंकर पापों को अपने ऊपर ले लिया। बाद में, वह और उसके वंशधर वन और पर्वतों पर रहने वाले 'निषाद' कहलाये। इसके बाद मुनियों ने वेन की भुजाओं का मंथन किया। उस्मने से दिव्य स्वरुप धारण किये हुए स्त्री-पुरूष का एक जोड़ा प्रकट हुआ। उस पुरूष के दाहिने हाथ में भगवान् विष्णु की हश्रेखाएं और चरणों में कमल का चिन्ह अंकित देखकर उन्होंने उसे भगवान विष्णु का ही अंश समझा।
मुनिगण प्रसन्न होकर बोले - "यह पुरूष भगवान् narayan की कला से प्रकट हुआ है और यह स्त्री साक्षात लक्ष्मी का अवतार है। यह दिव्य पुरूष अपने सुयश का विस्तार करने के कारण संसार में पृथु के नाम से प्रसिद्द होगा। सुन्दर वस्त्राभूषणों से अलंकृत यह अतीव सुन्दर स्त्री इसकी पत्नी आर्ची होगी। पृथु रूप में स्वयं भगवान् विष्णु ने संसार की रक्षा के लिये लक्ष्मीरूपा आर्ची के साथ अवतार लिया है।"
महात्मा पृथु जैसे सत्पुत्र ने उत्पन्न होकर अपने शुभ-कर्मों द्वारा पापी वेन को नरक से छुडा दिया। तत्पश्चात ऋषि-मुनियों ने पृथु के राज्यभिशेक का आयोजन किया। इस शुभ अवसर पर समस्त देवगन उपस्थित हुए। भगवान् विष्णु ने पृथु को अपना सुदर्शन चक्र, ब्रह्माजी ने वेदमयी कवच, भगवान् शिव ने दस चक्राकार चिन्हों वाली दिव्य तलवार, यायुदेव ने दो चंवर, धर्म ने कीर्तिमय माला, देवराज इन्द्र ने मनोहर मुकुट, यमराज ने कालदंड, अग्निदेव ने दिव्य धनुष और कुबेर ने सोने का राजसिंहासन भेंट क्या।
जब मुनिगण पृथु की स्तुति करने लगे, तब पृथु बोले - "मान्यवरो ! अभी इस लोक में मेरा कोई भी गुण प्रकट नहीं हुआ, फिर आप किन गुणों के लिये मेरी स्तुति करेंगे? आप केवल परब्रह्म परमात्मा की ही स्तुति करें। भगवान् विष्णु के रहते तूच मनुष्यों की स्तुति नहीं करते। इसलिए कृपा आप मेरी स्तुति न करें।" उनकी बात सुन सभी ऋषि-मुनि आत्मविभोर हो गए। तब पृथु ने उन्हें अभिलिषित वस्तुएँ देकर संतुष्ट किया। वे सभी राजा पृथु को आशीर्वाद देने लगे। जब ऋषि-मुनिओं ने राजा का राज्याभिषेक किया, उन दिनों पृथ्वी अन्नही हो गई थी, प्रजाजन के शरीर अन्न के अभाव में बड़े दुर्बल हो गए थे, उन्होंने राजा पृथु से सहायता की विनती की।
प्रजाजन की करूणा विनती सुनकर पृथु का मन करूणा से द्रवित हो गया। कुछ देर विचार करके उन्हें पृथ्वी के अन्नहीन होने का कारण ज्ञात हो गया। वे जान गए कि पृथ्वी ने सभी प्रकार के अन्न और औषधियों को अपने गर्भ में छिपा लिया है। तब उन्होंने क्रोधित होकर धनुष उठाया और पृथ्वी को लक्ष्य बनाकर बाण चलाने के लिये उघत हो गए। उन्हें बाण चढ़ाए देखकर पृथ्वी अपने प्राण बचाने के लिये गाय का रूप रखकर भागने लगी।
पृथ्वी को गाय-रूप में भागते देख क्रोधित पृथु उसका पीछा करने लगे। वह प्राण बचाते हुए जिस-जिस स्थान पर जाती, वहीं-वहीं उसे राजा पृथु हाथ में धनुष-बाण लिये दिखाई देते।
जब उसे कहीं भी शरण न मिली तो वह भयभीत होकर उन्हीं की शरण में आए और बोली - "महाराज ! आप सभी प्राणियों की रक्षा करने को सदा तत्पर रहते हैं, फिर मुझ दीन-हीन और निरपराधिनी को क्यों मरना चाहते हिं? आप धर्मज्ञ हैं, फिर क्या आपका क्षत्रिय धर्म एक स्त्री क वध करने की अनुमति देगा? स्त्रियाँ कोई अपराध करें तो साधारण जीव भी उन पर हाथ नहीं उठाते, फिर आप जैसे करूणामय और दीन-वत्सल ऐसा कैसे कर सकते हैं? फिर सोचें कि मेरा वध करें के बाद अपनी प्रजा को कहाँ रखेंगे?"
तब पृथु बोले - "पृथ्वी ! तुमने यज्ञों का भाग लेकर भी प्रजा को अन्न नहीं दिया, इसलिए आज मैं तुम्हे समाप्त कर दूंगा। तुम्हारे बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। तुमने ब्रह्म्माजी द्वारा उत्पन्न किये गए अन्नादि बीजों को अपने गर्भ में छिपा लिया है और उन्हें न निकालकर अनेक जीवों की हत्या कर रही हो। जो केवल अपना पोषण करने वाला तथा अन्य प्राणियों के प्रति निर्दय हो - उसका वध शाश्त्रों में तर्कसंगत है। अब मैं तुम्हारे गर्भ को अपने बानों से चिन्न-भिन्न कर दूंगा और प्रजाजन कि क्षुधा शांत कर योगबल से उन्हें धारण करूंगा।"
क्रोध की तीव्रता से राजा पृथु उस समय साक्षात काल के समान दिखाई पड़ रहे थे। उनके भयंकर रूप को देखकर पृथ्वी करूं स्वर में उनकी स्तुति करते हुए बोली - "राजन ! ब्रह्माजी ने जिस अन्नादि को उत्पन्न किया था, उसे केवल दुराचारी मनुष्य ही खा रहे थे। अनेक राजाओं ने मेरा आदर करना छोड़ दिया था, इसलिए मैंने अन्न को अपने गर्भ में छिपा लिया। यदि आप वह अन्न प्राप्त करना चाहते हैं तो मेरे योग्य एक बछडा, दोहन पात्र और दुहने वाले कि व्यवस्था कीजिये। मैं दूध के रूप में आपको वे पदार्थ प्रदान कर दूंगी। एक बात और राजन ! आप मुझे समतल कर दें। जिससे कि मेरे ऊपर इन्द्र बरसाया गया जल वर्ष भर बना रहे। यह आप सभी के लिये मंगलकारी होगा।"
तब पृथु ने स्वयंभू मनु को बछडा बनाकर अपने हाथों से ही पृथ्वी का सारा दुग्ध दुह लिया। फिर उन्होंने अपने धनुष की नोक से पर्वतों को तोड़कर पृथ्वी को समतल कर दिया। तत्पश्चात उन्होंने पृथ्वी को अपनी पुत्रीरूप में स्वीकार किया। दैत्य मधु-कैटभ के मेड से निर्मित होने के कारण पृथ्वी को पहले मेदिनी कहा जाता था, किन्तु राजा पृथु की पुत्री बनने के बाद यह पृथ्वी नाम से प्रसिद्द हुई। इस प्रकार राजा पृथु ने पृथ्वी का मनोरथ सिद्ध करते हुए अपनी प्रजा की रक्षा की।
Posted by Udit bhargava at 10/03/2010 05:50:00 pm 0 comments



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